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जेल में क्रिश्चियन मिशेल को नहीं मिल रहा अच्छा खाना: 16 किलो घटा वजन

अगस्ता वेस्टलैंड चॉपर घोटाला मामले में बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल ने गुरुवार (मई 9, 2019) को सीबीआई कोर्ट में शिकायत की है कि तिहाड़ जेल के अंदर उसे जो खाना दिया जाता है, उसकी गुणवत्ता ठीक नहीं हैं। उसने कोर्ट से कहा कि जेल में खराब खाना खाने की वजह से उनका वजन 16 किलोग्राम कम हो गया है। मिशेल ने बताया कि उसे खाने में सिर्फ उबली हुई सब्जी दी जाती है। मिशेल का कहना है कि डॉक्टर ने उसे सेहतमंद खाना देने के लिए कहा है, लेकिन फिर भी उसे अच्छा खाना नहीं दिया जा रहा है।

सीबीआई कोर्ट ने मिशेल की दलील सुनने के बाद जेल अथॉरिटी को खाने की जाँच करने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले में जेल अधिकारियों और जेल के डॉक्टरों से उनका लिखित जवाब माँगा है। मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार (मई 10, 2019) को 2 बजे होगी। इससे पहले भी मिशेल के वकील ने जेल में मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था, जिसके बाद कोर्ट ने मिशेल की पेशी का वारंट जारी किया था। वहीं, मिशेल ने अपने परिवार के साथ ईस्टर मनाने के लिए पिछले महीने कोर्ट में 7 दिनों की अंतरिम जमानत की माँग की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था।

गौरतलब है कि, मिशेल को पिछले साल 22 दिसंबर को संयुक्त अरब अमीरात ने भारत को सौंपा था। मिशेल को ₹3600 करोड़ के हेलीकॉप्टर सौदे के मामले में संयुक्त अरब अमीरात में गिरफ्तार किया गया था और 4 दिसंबर को भारत लाया गया। इसके बाद 28 दिसंबर को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

बुर्क़े में छिपकर अंजुम ने आमिर पर फेंका तेजाब, दोनों प्रेमी-प्रेमिका

महाराष्ट्र के अहमदनगर में बुर्का पहने एक लड़की ने अपने आशिक के ऊपर तेजाब फेंक दिया। वारदात के बाद लड़की जगह से भागने में कामयाब रही, लेकिन बाद में स्थानीय पुलिस ने उसे धर दबोचा। इस हमले में लड़के का चेहरा 15 प्रतिशत झुलस गया है। लड़के का इलाज सरकारी अस्पताल में चल रहा है।

जी न्यूज़ की खबर के मुताबिक अंजुम शेख (लड़की) और आमिर शेख (लड़के) के बीच पिछले दो साल से प्रेम संबंध थे, लेकिन कुछ समय बाद आमिर ने अंजुम से मुँह फेर लिया। जानकारी के मुताबिक जब आमिर दूसरी लड़कियों से ज्यादा बात करने लगा, तो अंजुम इस बात से नाराज़ हो गई। आमिर के इस रवैये से दुखी अंजुम अपना बदला लेने के लिए दिसंबर 2018 से प्लानिंग करने में जुटी हुई थी। बदला लेने के लिए लड़की ने अपने प्लान को क्राइम सीरियल देखकर तैयार किया।

योजना पूरी होने के बाद सोमवार (मई 6, 2019) अंजुम ने आमिर को शहर के तोरणा होटल में बुलाया। यहाँ इंतजार में खड़े आमिर पर अंजुम ने अचानक तेजाब से हमला किया और भागने में कामयाब हो गई। इस दौरान उसने बुर्का पहना हुआ था ताकि कोई उसे पहचान न पाए।

इस घटना के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस हरकत में आई और 3 दिन की जद्दोजहद के बाद अंजुम को गिरफ्तार करने में सफ़ल रही। मीडिया खबरों के अनुसार पुलिस इस बात की तफ्तीश में जुट गई है कि युवती ने तेजाब कहाँ से हासिल किया। इसके अलावा अंजुम के ख़िलाफ़ जानबूझकर किसी को गंभीर रूप से घायल करने की आईपीसी धारा 326(ए) के तहत मामला दर्ज हुआ है। इस धारा के तहत दोषी पाए जाने पर किसी को भी 10 साल की उम्रकैद की सजा हो सकती है।

क्या है सच दिल्ली के सरकारी स्कूलों के परीक्षा परिणामों का? ऐसे फैलाया जा रहा झूठ

दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल सहित आम आदमी पार्टी के सभी कार्यकर्ता और समर्थक यह कहते नहीं थकते कि ‘आप’ के राज में शिक्षा क्रांति हो गयी, दिल्ली के सरकारी स्कूल वर्ल्ड क्लास हो गए। फिर वे करोड़ों खर्च कर दिल्ली के हजारों स्कूलों में से एक में बना जिम और दो में बने स्विमिंग पूल का फोटो दिखाकर कहते हुए पाए जाएँगे कि भई कमाल कर दिया केजरीवाल ने!

आजकल एक और झूठ मार्केट में बड़ी तेजी से फैलाया जा रहा है कि सरकारी स्कूलों ने प्राइवेट स्कूलों को भी पछाड़ दिया है। बारहवीं के परीक्षा परिणामों का संदर्भ देते ऐसे लोग नज़र आते हैं लेकिन जब बात दसवीं के परीक्षा परिणामों की करें तो सब चुप्पी साध लेते हैं। फिर कोई ये नहीं बताता कि दिल्ली के स्कूलों का परिणाम 2006-07 में आये 77.12% के स्तर से भी नीचे क्यों चला गया? 2006-07 के बाद कभी भी दिल्ली का परिणाम विपरीत दिशा में जाता नज़र नहीं आया लेकिन बीते 2 वर्षों में रिकॉर्ड टूट गया। आईये समझते हैं क्या है दिल्ली के सरकारी स्कूलों की कहानी-

पहले बात 12वीं कक्षा की:

1) पहली बार यह सुनना बहुत अच्छा लगता है कि सरकारी स्कूल प्राइवेट से भी बेहतर परिणाम ला रहे हैं लेकिन दिल्ली के मामले में क्या ये पहली बार हो रहा है? दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने पहले भी प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ा है। 2009 और 2010 में सरकारी स्कूलों का 12वीं में प्रदर्शन प्राइवेट स्कूलों से बेहतर था। देखें सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के 12वीं परीक्षा परिणाम का ये आंकड़ा, जो दिल्ली सरकार द्वारा परीक्षा परिणाम आने के बाद हुए Result Analysis के जरिये साझा किया गया। इसलिए ये कहना कि ये ऐतिहासिक घटना है, गलत है!

2) ये भी कहना अतिरेक है कि परीक्षा परिणाम में सुधार केवल आप की सरकार बनने के बाद हुए। आँकड़े बताते है कि दिल्ली के सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के परीक्षा परिणामों के गैप पहले के मुकाबले बेहद कम हुए है:

देखिये आंकड़े

यहाँ देखा जा सकता है कि कभी 13% से पिछड़ने वाले दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने प्राइवेट स्कूलों की न केवल बराबरी की, बल्कि उसे पछाड़ा भी। बीते 3 साल से यही दुहराया जा रहा है लेकिन सरकारी और प्राइवेट के बीच का फासला बहुत अधिक का नहीं है जैसा बीते दशकों में था।

3) रही बात दिल्ली के बच्चों के प्रदर्शन की तो ये हमेशा से ही बेहतर रहा है। ऊपर के आँकड़े बताते हैं कि 2008-2015 तक दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का परीक्षा परिणाम कभी 85% से कम नहीं हुआ। पिछले 3 सालों में अगर मामूली बढ़त हुई भी है तो उसी अनुपात में प्राइवेट स्कूलों का भी परिणाम सुधरा है। इस वर्ष यानी 2018-19 में अगर सरकारी स्कूलों का आँकड़ा 94% था तो प्राइवेट स्कूलों के आँकड़े भी 90% से ऊपर थे।

4) यहाँ यह भी देखना पड़ेगा कि जहाँ सरकारी स्कूलों में बच्चें कम हो रहे है, वही प्राइवेट स्कूलों में बच्चे बढ़ रहे हैं हर साल।

दिल्ली के इकॉनोमिक सर्वे (2018-19) की रिपोर्ट देखिये:

5) सरकारी स्कूलों में नामांकन घट रहे हैं, वहीं प्राइवेट स्कूलों में कुल नामांकन का शेयर भी दिल्ली में बढ़ता जा रहा है। सरकार द्वारा जारी की गयी इकॉनोमिक सर्वे की रिपोर्ट के आँकड़े इसकी गवाही देते हैं। इसके मुताबिक 2014-15 में जहाँ प्राइवेट स्कूलों का शेयर 31% था, 2017-18 में वह बढ़कर 45.5% से भी अधिक हो गया।

6) यहाँ पर एक बेहद चौंकाने वाली बात है कि परीक्षा परिणाम भले ही चाहे जैसा आये, परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की संख्या हमेशा बढ़ती रही है, लेकिन जैसे ही आप सरकार में आई, परीक्षा में बैठने वाले विद्यार्थियों की संख्या घट गई।

देखिये बीते एक दशक से भी अधिक के आंकड़े:

1998-99 से लेकर 2007-08

2008-09 से लेकर 2017-18

जाहिर सी बात है, जब से आप आई है, दिल्ली के सरकारी स्कूलों से 12वीं की परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की संख्या कम होती जा रही है।

7) जो सबसे प्रमुख बात है कि हर साल 9वीं एवं 11वीं की परीक्षा में बड़ी संख्या में बच्चों को फेल किया जा रहा है ताकि केवल अच्छे बच्चें ही 12वीं की परीक्षा दे सकें। हर साल परीक्षार्थियों की घटती संख्या इसकी गवाही देते है जहाँ हर साल लगभग 50% बच्चों को 9 वीं में फेल कर दिया जाता है (देखें आँकड़े)

वही 11वीं कक्षा में भी 28-29% बच्चों को फेल कर दिया जाता है। पढ़ें इंडियन एक्सप्रेस की ये ख़बर.

इसके बावजूद परिणामों में आंशिक बढ़ोतरी को इस तरीके से बताया जाता है मानो करामात हो गई।

द प्रिंट की रिपोर्ट पढ़िए कि कैसे फेक तरीके से प्राइवेट स्कूलों को दिल्ली के सरकारी स्कूल पछाड़ रहे हैं- Delhi govt schools beat private schools in class 12 results. Reason: 50% flunk class 9

10वीं का परिणाम आते ही केजरीवाल सरकार के शिक्षा-क्रांति के दावे हवा हो जाते हैं।

जिस 12वीं के परिणाम पर आप और उसके समर्थक सरकार की प्रशंसा करते नही अघाते, उन्हें 10वीं का रिजल्ट आते ही साँप सूंघ जाता है।

जानते हैं कुछ तथ्य

1) इस वर्ष यानी 2018-19 में प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले दिल्ली के सरकारी स्कूल 21% पीछे रहे है। जहाँ दिल्ली के सरकारी स्कूलों का सामूहिक प्रतिशत 71.58% था, प्राइवेट स्कूलों का परिणाम 93.12% था। (संदर्भ)

2) पिछले सत्र यानी 2017-18 में 10वीं के परीक्षा परिणाम आये तो जहाँ सरकारी स्कूलों के 69.32% बच्चे पास हुए थे, प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के पास होने का प्रतिशत 89.45% था। यानी प्राइवेट और सरकारी स्कूलों के बीच फासला 20% का था। (संदर्भ)

दिल्ली बीते दो सालों में 10वीं की परीक्षा में राष्ट्रीय औसत से भी बेहद घटिया परिणाम दे रहा है इसके बावजूद इसकी जिम्मेवारी लेने के लिए कोई आगे नही आ रहा।

3) दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 10वीं के रिजल्ट की हालत एक दशक पहले भी ऐसी नही थी। यह आप सरकार को श्रेय जाता है कि दिल्ली का प्रदर्शन पिछले एक दशक का भी रिकॉर्ड तोड़ अपने सबसे निम्नतम स्तर पर आ गया है।

4) प्राइवेट और सरकारी के बीच के गैप को पाटने में जो मेहनत दिल्ली के सरकारी स्कूलों में आप की सरकार बनने से पहले हुई थी, उसे चौपट करने की जिम्मेवारी दिल्ली सरकार को ही लेनी चाहिए। सरकारी और प्राइवेट के बीच के नेगेटिव फासले को यानी -45% से जो सरकारे प्लस में ले आई थी, 2013 में प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ने का काम किया हो, आप की सरकार उसे दुबारा -21 में ले आई.

5) यह हालत तब है जब पिछले साल लगभग 42% बच्चे 9वीं की परीक्षा में फेल हो गए थे। यानी बेहतर बच्चे ही अगली कक्षा में भेजे गए।

जैसा कि ऊपर भी बताया गया, जिस 10वीं की परीक्षा में दिल्ली के सरकारी स्कूलों के परीक्षा परिणाम बीते दो सालों से बेहद ख़राब आ रहे है, उसी 10वीं की परीक्षा में 2013 में दिल्ली के बच्चों का प्रदर्शन प्राइवेट स्कूलों से बेहतर था। (संदर्भ)

5) दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में उन बच्चों को दुबारा नामांकन नहीं लेने दिया जा रहा, जो फेल हो गए थे। पिछले सत्र (2017-18) में ऐसे बच्चों की संख्या 66% थी।

पढ़ें दिल्ली हाई कोर्ट में अधिवक्ता अशोक अग्रवाल की याचिका का ये हिस्सा:

दिल्ली सरकार को 12वीं के Manipulated Achievement पर वाहवाही बटोरने की वजाए कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों का जबाब देना चाहिए कि –

1) लर्निंग आउटकम बढ़ाने के बड़े बड़े दावों के साथ “मिशन चुनौती” और “मिशन बुनियाद” चलाने के बावजूद भी इस तरह के परिणाम क्यों आ रहे हैं?

2) परीक्षा परिणामों को सुधारने के लिए बच्चों को क्यों फेल किया जा रहा है?

3) जो बच्चें फेल हो रहे है, उन्हें दुबारा नामांकन क्यों नही लेने दिया जा रहा?

4) सरकार चुनिन्दा स्कूलों की रंगाई-पुताई और कुछ भवन बनाकर वाहवाही लुटने की वजाए पढ़ने-पढ़ाने के ऊपर ध्यान क्यों नहीं दे रही?

दिल्ली सरकार के मुखिया को ध्यान रखना चाहिए कि कागज़ी आंकड़ों की बाजीगरी करके भले आप वाहवाही लूट लें, करोड़ों लुटाकर मीडिया का ध्यान भटका दें, जिन गरीब के बच्चों को स्कूली व्यवस्था से दूर कर रहे हैं, उन बच्चों के साथ खिलवाड़ कर राष्ट्र-अपराध कर रहे हैं।

इंडोनेशिया में मंदिर का विरोध, मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने दी जिहाद की धमकी

इंडोनेशिया के सुकतानि जिले के अंतर्गत आने वाले छोटे से गाँव सुकाहुरिप में मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने मंदिर निर्माण के खिलाफ जिहाद की धमकी दी है। बेकासी रीजेंसी के अंतर्गत आने वाले गाँव, वेस्ट जावा में प्रदर्शनकारी हरे झंडे और बैनर के साथ मंदिर निर्माण का विरोध करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस पर बैनर पर साफ-साफ लिखा है कि अगर उन्होंने मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ किया तो वो जिहाद को अंजाम देने के लिए तैयार हैं। इस घटना से संबंधित तस्वीरें और वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।

https://www.youtube.com/watch?time_continue=75&v=wLSZTtzjgIg

जानकारी के मुताबिक, गाँव में मंदिर निर्माण के लिए ग्राम प्रधान और आस-पास के लोगों से सहमति ली गई थी। जिस पर ग्राम प्रधान और वहाँ के स्थाई निवासियों द्वारा सहमति व्यक्त की गई थी, मगर गाँव के बाहर के एक संगठन ने मंदिर निर्माण पर विरोध जताते हुए प्रदर्शन किया।

बेकासी पुलिस प्रमुख कैंड्रा सुकमा कुमारा ने भी गाँव में प्रदर्शनकारियों द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शन की पुष्टि की है। उन्होंने भी गाँव के बाहर के एक संगठन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है। पुलिस प्रमुख ने कहा कि मंदिर के निर्माण की योजना बिना किसी रोक-टोक के 2017 से सुचारू रूप से चल रही थी, मगर हाल ही में इस तरह के विरोध प्रदर्शन शुरू हुए हैं।

बता दें कि, इस इलाके में तकरीबन 6,000 से 7,000 हिंदू रहते हैं, जिन्हें मंदिर जाने के लिए पड़ोस के बीकासी नगर पालिका के पुरा अगुंग तीर्थ भुआना जाना पड़ता है। जिसके लिए उन्हें काफी दूरी तय करनी पड़ती है। इसलिए इन समस्या को दूर करने के लिए हिंदू समुदाय ने मंदिर निर्माण करने के बारे में सोचा और इसके लिए एक समिति का भी गठन किया जिसमें मंदिर निर्माण की प्रक्रिया के बारे में योजना बनाई जा रही थी। मगर स्थानीय लोगों का समर्थन होने के बावजूद ये योजना असफल होती हुई दिखाई दे रही है।

रामजन्मभूमि: SC ने मध्यस्थता कमेटी का कार्यकाल 15 अगस्त तक बढ़ाया

अयोध्या रामजन्मभूमि मामले में आज (10 मई) को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस कलीफुल्ला कमिटी की रिपोर्ट पेश की गई। कमिटी की रिपोर्ट देखकर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुआई वाली संविधान पीठ ने कहा कि कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में मध्यस्थता को लेकर सकारात्मक प्रगति की बात कही है। सुप्रीम कोर्ट ने 15 अगस्त तककमिटी का कार्यकाल बढ़ा दिया है।

इस मामले में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा, “हमें मध्यस्थता कमिटी की रिपोर्ट मिली है और हमने इसे पढ़ा है। अभी समझौते की प्रक्रिया जारी है। हम रिटायर्ड जस्टिस कलीफुल्ला की रिपोर्ट पर विचार कर रहे हैं। रिपोर्ट में सकारात्मक विकास की प्रक्रिया के बारे में बताया गया है।” इसके अलावा उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट यह नहीं बताएगा कि मध्यस्थता कितनी प्रगति हुई है, यह गोपनीय रखा गया है।

सुनवाई के दौरान कुछ हिन्दू पक्षकारों ने मध्यस्थता की प्रक्रिया पर अपनी आपत्ति दर्ज की। उन्होंने कहा कि पक्षकारों के बीच कोई समन्वय नहीं है। वहीं मुस्लिम पक्षकारों की ओर से राजीव धवन ने कहा कि हम मध्यस्थता प्रक्रिया का पूरी तरह से समर्थन करते हैं। अयोध्या मामले में मध्यस्थता पैनल द्वारा सीलबंद लिफ़ाफे में पेश की गई रिपोर्ट को देखने के बाद कोर्ट ने अतिरिक्त समय देने की उनकी माँग को सहमति दी।

बता दें की अयोध्या में राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट का पिछले दिनों एक बड़ा फैसला आया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अयोध्या मसले का समाधान मध्यस्थता से निकाला जाए। मध्यस्थता के लिए पूर्व जस्टिस कलीफुल्ला की अध्यक्षता में एक पैनल बनाया गया था। इस पैनल में श्री श्री रविशंकर, वरिष्ठ वकील श्रीराम पांचू को शामिल किया गया था। मध्यस्थता की प्रक्रिया फैज़ाबाद में होनी थी और यह पूरी तरह से गोपनीय थी।

अयोध्या मामले के इतिहास पर नज़र डाले तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला घड़ी को उल्टी दिशा में घुमाकर 30 साल पीछे ले जाता दिखता है। क्योंकि, इससे पहले ऐसी ही कोशिश 1990 में की गई थी। अंतर बस इतना है कि उस समय यह पहल केंद्र सरकार ने की थी और इस बार इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है।

अरबी न पढ़ पाने पर मौलाना ने 6 साल की बच्ची को बेहरहमी से पीटा

नोएडा के सोरखा गाँव में एक 6 साल की बच्ची को बेल्ट से पीटने के आरोप में मदरसे के मौलाना पर मामला दर्ज़ हुआ है। मौलाना के ख़िलाफ़ बच्ची के माता-पिता ने शिकायत दर्ज करवाई है। जानकारी के मुताबिक अरबी शब्द न पढ़ पाने के कारण बच्ची को इतनी बेरहमी से पीटा गया कि वह बेहोश हो गई।

बच्ची के पिता के मुताबिक उनकी दो बेटियाँ मदरसे में पढ़ती हैं। वो अपनी दोनों बेटियों को मदरसे से हर 14वें दिन दो दिन के लिए घर लाते थे। 4 मई को जब उनकी पत्नी अपनी छोटी बच्ची को नहला रही थीं तब उसके शरीर पर उन्हें निशान दिखाई दिए। बेटियों से पूछने पर बड़ी लड़की ने पूरी घटना के बारे में बताया। परिवार का कहना है कि मौलाना ने अपनी यह हैवानियत तब दिखाई जब मासूम किसी अरबी के शब्द को नहीं पढ़ पा रही थी जिसके कारण मौलाना ने उसे बेल्ट से इतना पीटा कि वो 2 घंटों के लिए बेहोश हो गई।

बच्ची की बड़ी बहन ने बताया कि ऐसी घटना पहली बार नहीं हुई है। इससे पहले भी जब वो मौलाना के सवालों का जवाब नहीं दे पाते थे, तो मौलाना उनकी ऊंगलियों को मोड़ देता था और फिर गुस्से में बेल्ट से पीटता था। ऐसा सिर्फ़ इन दोनों बहनों के साथ नहीं होता था, बल्कि वह ऐसी हरकत सब बच्चों के साथ करता था।

बच्ची के साथ हुई इस घटना का विरोध करने के लिए जब माता-पिता मदरसा पहुँचे तो उन्हें वहाँ से भगा दिया गया। परिजनों ने 100 नंबर पर पुलिस को सूचना दी। पुलिस के पहुँचते ही मौलाना भाग निकला।

जी न्यूज़ की ख़बर के मुताबिक सेक्टर-49 थाने के एसएचओ अजय कुमार अग्रवाल ने बताया मौलाना नवाब हुसैन के खिलाफ मारपीट का मामला दर्ज किया है। पुलिस ने इस मामले में आईपीसी की धारा 323, 504 के तहत मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।

आतिशी ने कहा गौतम ने मेरे नाम के ‘गंदे’ पर्चे बाँटे, गौतम ने भेजा मानहानि नोटिस

पूर्वी दिल्ली से आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी आतिशी ने गुरुवार (मई 9, 2019) को भाजपा के उम्मीदवार गौतम गंभीर पर संगीन आरोप लगाए। आतिशी ने अपने खिलाफ ‘आपत्तिजनक और अपमानजनक’ टिप्पणियों वाला एक पर्चा पढ़ते हुए दावा किया कि गंभीर ने निर्वाचन क्षेत्र में ऐसे पर्चे बँटवाए हैं। इस पर गौतम ने आतिशी पर मानहानि का केस करने का फैसला किया।

गौतम गंभीर ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और प्रत्याशी आतिशी को मानहानि का नोटिस भिजवाया। गंभीर ने कहा कि वे बिना शर्त, माफ़ी माँगे और अपना झूठा बयान वापस लें, नहीं तो मानहानि का केस किया जाएगा।

इससे पूर्व गौतम गंभीर ने अपने ऊपर लगे कथित आरोपों पर ट्वीट करते हुए लिखा था, “मैं घोषणा करता हूँ कि केजरीवाल और आतिशी अगर साबित कर दें कि मैंने कुछ गलत किया है तो मैं अभी अपनी उम्मीदवारी वापस ले लूँगा, लेकिन वह अगर ऐसा न कर पाए तो क्या वे राजनीति छोड़ देंगे?”

अपने ऊपर लगे आरोपों पर गंभीर ने एक के बाद एक ट्वीट किए। गंभीर ने केजरीवाल पर ट्वीट करते हुए लिखा, “मैं किसी महिला की इज्जत उछालने के कृत्य से घृणा करता हूँ। अरविंद केजरीवाल, अपनी सहयोगी के साथ ऐसा काम आपने केवल चुनाव जीतने के लिए किया? श्रीमान मुख्यमंत्री आप गंदे हैं और आपके दिमाग को साफ करने के लिए आपकी झाड़ू की जरूरत पड़ेगी”

बता दें इन सब के बीच आप के बागी विधायक कपिल मिश्रा ने अपने ट्विटर पर एक स्क्रीनशॉट ट्वीट किया है। इसमें लोगों से उस पैम्पलेट को ट्वीट के जरिए शेयर करने को कहा जा रहा है, जिसमें आतिशी के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया है। इस स्क्रीनशॉट में एक ट्वीट करने पर 200 रुपए दिए जाने का भी दावा है। कपिल मिश्रा का कहना है कि इस सबूत को कोर्ट में ‘आप’ के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा सकता है।

शरद पवार का दावा, मैंने खुद देखा कि मेरी पार्टी को दिया वोट भाजपा में चला गया

राकांपा प्रमुख शरद पवार ने चुनावों में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के प्रयोग पर बृहस्पतिवार को चिंता जताते हुए दावा किया कि उन्होंने खुद एक प्रस्तुति के दौरान देखा था कि उनकी पार्टी के पक्ष में डाला गया वोट, भाजपा के पक्ष में चला गया। बहरहाल, पवार ने यह भी कहा कि वह इस बात का दावा नहीं कर रहे हैं कि सभी ईवीएम इसी प्रकार काम करती हैं।

पवार ने सतारा में संवाददाताओं से कहा, ‘‘मैं भी मशीन के बारे में चिंतित हूँ। हैदराबाद एवं गुजरात में कुछ लोगों ने एक ईवीएम मेरे सामने रखी और मुझसे एक बटन दबाने को कहा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने घड़ी (राकांपा का चुनाव चिन्ह) पर बटन दबाया और वोट कमल (भाजपा का चुनाव चिन्ह) के पक्ष में गया। मैंने खुद ऐसा होते देखा है।’’ 

पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं अन्य विपक्षी दल ईवीएम के प्रयोग को लेकर चिंता जताते रहे हैं। उनका दावा है कि इस मशीन में गड़बड़ी की जा सकती है।

‘द हिन्दू’ की ‘फ्रंटलाइन’ और TV9 ने 20 लाख EVM गायब होने की फेक न्यूज़ लगाने की बात स्वीकारी

भारतीय चुनाव आयोग (EC) ने कुछ मीडिया हाउसेस द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के बारे में स्पष्टीकरण जारी किया है जिसमें आरोप लगाया गया था कि 20 लाख इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) ECI के कब्जे से गायब हो गए थे। शेफाली बी. शरण, ईसीआई की प्रवक्ता ने आयोग की ओर से फ्रंटलाइन पत्रिका और टीवी 9 भारतवर्ष चैनल के संपादकों को संबोधित करते हुए एक आधिकारिक बयान जारी किया, जिसमें उनके झूठे दावों का खंडन किया गया है।

वेंकटेश रामाकृष्णन द्वारा लिखित “मिसिंग ईवीएम” शीर्षक की स्टोरी ‘24 मई, 2019’ फ्रंटलाइन पत्रिका के प्रिंट संस्करण में प्रकाशित हुई थी। फ्रंटलाइन एक पाक्षिक अंग्रेजी भाषा की पत्रिका है जिसका प्रकाशन चेन्नई के द हिंदू ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन द्वारा किया जाता है। टीवी चैनल TV9 भारतवर्ष ने यही आरोप दोहराते हुए एक रिपोर्ट प्रसारित की थी।

रिपोर्ट में बंबई उच्च न्यायालय में एक आरटीआई-आधारित जनहित याचिका के स्रोतों का हवाला देते हुए अपने दावे को सही ठहराने की कोशिश की गई थी। इस रिपोर्ट के माध्यम से, लेखक ने बताया है कि 2019 के आम चुनावों में ईवीएम के प्रति अविश्वसनीयता थी। इसी संदेह के दायरे में ECI को भी बदनाम करने की कोशिश की गई थी।

फ्रंटलाइन मैगज़ीन को जारी नोटिस

यह ध्यान देने योग्य है कि इस रिपोर्ट में आरटीआई आवेदन के माध्यम से प्राप्त की गई कुछ सूचनाओं को चुनिंदा रूप से उद्धृत किया है, जो कई सार्वजनिक प्राधिकरणों और बॉम्बे उच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका का हिस्सा है। पूरी रिपोर्ट में केवल आंशिक और एकतरफा जानकारी दी गई है, जो कि गलत तथ्यों पर आधारित है और आम जनता के मन में EVM एवं ECI के प्रति संदेह पैदा करने की कोशिश की गई है।

TV9 भारतवर्ष को जारी नोटिस

ईसीआई के बयान में EVM के रखरखाव से लेकर परिवहन तक के लिए कोई उचित प्रणाली और बुनियादी ढाँचे की अनुपस्थिति की रिपोर्ट में की गई अटकलों को खारिज कर दिया गया है, इन दावों को खारिज करते हुए, बयान में कहा गया है कि ईसीआई ईवीएम और वीवीपीएटी के सम्बन्ध में सख्त प्रोटोकॉल और अनुपालन प्रक्रियाओं का पालन करता है और कोई भी मशीन चुनाव आयोग की पूर्व अनुमति के बिना ईसीआई गोदाम से कहीं भी नहीं ले जाया जा सकता है।

बयान में इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला गया कि राज्य चुनाव आयोग (एसईसी) स्वतंत्र संवैधानिक निकाय हैं जो स्थानीय निकाय चुनाव कराते हैं और ईसीआई के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं। बयान में मतदाताओं के मन में संदेह पैदा करने के लिए ईवीएम के बारे कुछ मीडिया हाउसेस द्वारा झूठ फैलाने के लिए ऐसी फेक रिपोर्ट को दुर्भावनापूर्ण प्रयास बताया गया।

ईसीआई के प्रवक्ता ने बताया कि फ्रंटलाइन के संपादक ने स्वीकार किया है कि उनकी रिपोर्ट झूठी है और इस सम्बन्ध में एक अन्य रिपोर्ट प्रकाशित की जाएगी। वहीं दूसरी ओर, TV9 Bharatvarsh ने अपनी वेबसाइट और Youtube से अपनी रिपोर्ट हटा दी है।

यह पहली बार नहीं है जब हिंदू समूह के प्रकाशनों से जुड़ी पत्रिका झूठी और फर्जी खबर फैलाते हुए पकड़ी गई है। हमने पहले भी बताया था कि कस्तूरी एंड संस लिमिटेड के अध्यक्ष एन. राम और द हिंदू के प्रकाशक ने राफेल सौदे के बारे में भी झूठ बोला था।

हालाँकि, TV9 भारतवर्ष ने अपनी रिपोर्ट को डिलीट कर दिया है, लेकिन इस फर्जी रिपोर्ट को सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से अभी भी फैलाया जा रहा है। भले ही वे रिपोर्ट और वीडियो ईसीआई द्वारा झूठ करार दिए गए हों। मीडिया हाउसेस के अपनी फर्जी रिपोर्ट वापस लेने के बाद भी, वे सोशल मीडिया और ऑनलाइन मंचों पर तेजी से वायरल होते हैं, और इस तरह से ऐसी फर्जी रिपोर्ट बनाने का उद्देश्य पूरा हो जाता है।

प्रिय मीडिया गिरोह, हर दलित जीतेन्द्र की मौत जातिवाद के कारण नहीं होती

हाल ही में उत्तराखंड से के एक जनजातीय क्षेत्र से आई एक खबर ने देशभर में दलित-सवर्ण के मुद्दे को नई चिंगारी देने का काम किया। यदि मीडिया में बैठे गिद्द-गिरोह के शब्दों में कहें तो इस घटना ने दलित-सवर्ण मुद्दे को एक दिशा देने का काम किया। इस सारे प्रकरण में सबसे हैरान करने वाली बात ये देखने को मिली, कि जो भी मीडिया गिरोह इस खबर को, जिस लिबास में बेचकर अपनी विकृत मानसिकता को बेच सकता था, उसने वही किया। जौनसार-जौनपुर क्षेत्र में ‘जौनपुर में एक दलित युवक की पिटाई’ के नाम से खबर पढ़ते ही मैं शंका से इस मामले को देखता रहा और हुआ भी यही। जिस प्रकार देशभर के तमाम प्रमुख मीडिया चैनल्स से लेकर, निष्पक्ष पत्रकारों और हिटलर के लिंग नापने वाले मीडिया गिरोह के पत्थरकारों ने बिना ‘दलित’ शब्द के नहीं पढ़ाया या सुनवाया, एक बार के लिए मैं भी इस प्रकरण को संदेह की दृष्टि से देखने को मजबूर हो गया।

मीडिया के गिद्ध-गिरोहों को ‘दलित’ की मृत्यु से फ़र्क़ पड़ता है?

निस्संदेह, टिहरी जिले के जौनपुर-जौनसार जैसे जनजातीय क्षेत्र में घटी यह घटना हैरान करने वाली है। हैरान इसलिए, क्योंकि मैं इसी जगह में पला-बढ़ा हूँ और इस समाज में किसी व्यक्ति की मृत्यु को ‘दलित की मृत्यु’ बताना सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात थी। हालाँकि, किसी व्यक्ति की मृत्यु को कोई भी तर्क सही साबित नहीं करता है। लेकिन, जब इस सम्पूर्ण प्रकरण को एक ‘दलित’ की मृत्यु में समेट दिया गया, तब यह जरूरी हो जाता है कि हम इस बात की समीक्षा करें।

यह समीक्षा खासकर मीडिया में हर वक़्त इस प्रकार की घटनाओं के इन्तजार में लार टपकाने वाले उस गिद्ध-गिरोह के कारण आवश्यक हो जाती है, जो दलित की मृत्यु में ‘देवभूमि में ऐसा चलता रहता है’ जैसे विशेषणों के साथ अपनी पूर्वग्रही मानसिकता के कीर्तिमान स्थापित करने का प्रयास करता है। ब्राह्मण और हिन्दू जैसे शब्दों से भी घृणा करने वाले कुछ लोग जब कुछ विकृत मानसिकता के लोगों को अपना हथियार बनाकर, एक युवक की मृत्यु पर ‘देवभूमि में ऐसा चलता रहता है’ जैसे कैप्शन बेचते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि वो पूरे देश भर में अपनी घृणित मानसिकता से निकलने वाले टार की मार्केटिंग में जुटे हुए हैं।

कुछ इसी प्रकार का उदाहरण मीडिया के इस समुदाय विशेष ने तब दिया था, जब पुलवामा आतंकी घटना के बाद JNU की  फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद के जरिए देहरादून में बैठे प्रेमनगर के जंगलों में छुपकर हर नशा करने वाले, जिहाद पढ़ने वाले, आतंकवादियों का समर्थन करने और दंगाई मानसिकता वाले कश्मीरी, कथित विद्यार्थियों के बारे में पेश किया था। यह गिरोह है, जो बस इस इन्तजार में रहता है कि आखिर कब मौका मिले और कब वो अपनी विषैली मानसिकता का बीजारोपण वहाँ पर कर सकें।

हिंसात्मक मानसिकता का शिकार सवर्ण और दलित कोई भी हो सकता है

यह भी जानना आवश्यक है कि इस घटना में जीतेन्द्र की जाति को दलित बताकर ‘देवभूमि में ऐसा चलता रहता है’ जैसे प्रसंग चलाने वाले वही लोग हैं, जो आज तक आतंकवाद का मजहब पता लगा पाने में नाकाम रहे हैं। यह सही भी है, यदि हर दूसरी आतंकवादी घटना का मजहब ढूँढा जाने लगे और घटना की संगीनता से ज्यादा हमारी चिंता का विषय धर्म-जाति और सम्प्रदाय ही बन जाए, तो ऐसे में श्री लंका में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के पीछे तो स्पष्ट रूप से मुस्लिम संगठन का हाथ है और न्यूजीलैंड में मस्जिद में मारे गए लोगों के पीछे एक क्रिश्चियन का हाथ है। लेकिन, हम सभी जानते हैं कि आतंकवाद का मजहब तलाशने से ज्यादा जरूरी उस मानसिकता द्वारा हुई हानि को कवर करना है। ठीक इसी प्रकार, यदि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है, तो फिर एक शादी समारोह के दौरान हिंसात्मक मानसिकता से उपजे विवाद में किसी ‘दलित’ की मृत्यु कैसे हो जाती है?

अमेरिका में बैठकर जनजातीय समाज पर चिंतन से बेहतर अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना है

शादी में जिस जीतेन्द्र के साथ मारपीट हुई, वह दलित था या नहीं से पहले उन लोगों पर विचार किया जाना चाहिए, जिन्होंने उन्माद में एक व्यक्ति को पीट दिया और उसने अवसाद में घर जाकर मिर्गी की दवाएँ एक साथ निगल ली थीं, जिस कारण उसे अगली सुबह अस्पताल ले जाना पड़ा। लेकिन क्या गिद्ध मीडिया के अमेरिका के कनेक्टिकट के न्यू हेवन में बैठी, येल में पीएचडी कर रही सामाजिक विचारक को यह पता है कि जिस घटना को वो एक AC कमरे में बैठकर सिर्फ अपने संगठन की विचारधारा को  खुश करने के लिए ‘देवभूमि में दलित की मृत्यु’ मात्र में समेट रही हैं, उस समाज में तो दलित-सवर्ण-अगड़ा-पिछड़ा जैसे शब्द महत्वहीन हैं?

लेकिन यह आम चलन है कि अपना कोई विदेशी सम्बन्ध बताकर भारत जैसे देश में अपने पाठकों और सम्पादकों की बौद्धिक क्षमता को चकमा देते हुए आसानी से अपनी विश्वसनीयता साबित की जाए। फिर चाहे वह अमेरिका में बैठा EVM एक्सपर्ट सैयद शूजा हो, या फिर NDTV द्वारा जर्मनी से उठाकर लाए गए प्रॉपेगैंडा पत्रकार ध्रुव राठी हो।

जौनपुर-जौनसार में नहीं है जातिगत भेदभाव

जनजातीय इलाका होने के कारण, जौनपुर-जौनसार में जातिगत भेदभाव मामूली स्तर पे भी नहीं है। यदि सामान्य शब्दों में कहूँ तो लोग आपस में एकदूसरे को खुलकर औजी-ओड-भामण-खस कहकर बुलाते हैं। यदि किसी खेत में बैल चोरी करने घुस जाए तो पूरा गाँव एक स्वर में आवाज लगाकर बुलाता है कि फलां खेत में ‘ल्वार-ओड-भामण’ की गाय-बैल घुस गई है। यहाँ के लोग वर्षों अशिक्षित जरूर रहे, नेहरू से लेकर इंदिरा, राजीव गाँधी के ऐतिहासिक नेतृत्व के समय भी। लेकिन, यहाँ पर सभी सामाजिक समीकरणों और जिम्मेदारियों से बँधे हुए जाति व्यवस्था को निभाते आए हैं। और किसी का, कभी भी इस आधार पर दमन या शोषण नहीं किया गया। ब्राह्मण-राजपूत-दलित, सभी यहाँ पर ‘जिमदार’ यानी भूमि के स्वामी हैं। ‘डोम’ यदि गाँव के लोगों की कृषि और पशुधन को संभालता है, तो औजी के बिना कोई भी पारम्परिक अनुष्ठान और कार्यक्रम संभव ही नहीं है, बदले में सारे गाँव के लोग उसे हर माह अनाज से लेकर, कपड़े, जमीन और धन देते हैं।

बढ़ई का काम करने वाले ‘ओड’, मकान बनाने से लेकर मिस्त्री कामों में पीढ़ी दर पीढ़ी इस परम्परा को सिखाते आए हैं। यह भी बताना जरूरी है कि इस इलाके में घरों की नक्काशी और लकड़ी का काम बेहद उम्दा किस्म का है। लोहार से लेकर तमाम अन्य जातियाँ, अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए रहते हैं। यह तालमेल भी मैंने शायद ही कहीं देखा होगा कि जितनी जमीन एक दलित परिवार के पास है, लगभग उतनी ही ब्राह्मण और राजपूतों के पास भी हैं। आर्थिक असमानता इस इलाके में नगण्य है।

जनजातीय क्षेत्रों की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहाँ पर बिना नारीवाद और प्रगतिशील होने का आडंबर किए ही, हर किसी को बराबर अधिकार और सम्मान प्राप्त हैं। यहाँ तक कि जौनपुर-जौनसार में पारिवारिक व्यवस्था मातृसत्तात्मक ही है। सभी जातियाँ एक ही गाँव में रहती हैं, सभी के मकान एक-दुसरे से चिपककर बसे हुए हैं। बिना किसी भेदभाव के लोग एक-दूसरे के साथ उठते-बैठते हैं। और शादी-विवाह और अन्य समारोह में भी सभी जातियाँ एक ही लंगर में खाना खाने बैठा करती हैं। ऐसे में इस बात की विश्वसनीयता स्वतः शून्य हो जाती है कि बसाण-गों में किसी युवक को उसकी जाति की वजह से मार दिया गया। लेकिन, आदत से मजबूर मीडिया गिरोहों के गिद्धप्रमुखों ने अपनी मक्कारी को खूब बेचा है। अब इनके निशाने पर उत्तराखंड भी है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं।

मिर्गी की दवाएँ एक साथ निगलने के कारण हुआ था जीतेन्द्र बेहोश

स्थानीय लोगों का कहना है कि जीतेन्द्र मिर्गी का मरीज था और लम्बे समय से दवाएँ ले रहा था। शादी के दौरान खाने के वक़्त हुई झड़प के बाद जीतेन्द्र ने अवसाद में घर जाकर सभी दवाएँ एकसाथ निगल ली जिस कारण सुबह उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। हालाँकि,अभी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट्स का आना बाकी है। सामाजिक समारोह में इस प्रकार की झड़प और हिंसा जौनपुर-जौनसार में आम बात है और यही वजह है कि समय-समय पर यहाँ पर 10-15 गाँव मिलकर शादी-विवाह में शराब और DJ को प्रतिबंधित करते आए हैं लेकिन ऐसे में किसी व्यक्ति की मृत्यु होना बेहद चौंकाने वाला प्रकरण है।

यह दुर्भाग्य है कि इस घटना में जिस जीतेन्द्र की मृत्यु हुई वह दलित था और मीडिया ने इसे ही मुद्दा बनाकर उत्तराखंड के सर पर जातिवाद जैसे शब्द स्थापित करने के हर सम्भव प्रयास कर रही है। यह मैं अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी से कहना चाहूँगा की यह घटना हिंसात्मक है, सामजिक उन्माद का उदाहरण है लेकिन इसकी वजह यदि मीडिया आपको पीड़ित की जाति दलित होना बता रही है, तो आपको आज ही उनसे किनारा कर लेना चाहिए क्योंकि वो उस विष को बेच रहे हैं, जिसे शायद आप पढ़ना चाहते हैं।

निष्पक्ष मीडिया के पत्थरकारों से सावधान

इस समय के महान निष्पक्ष पत्रकार रविश कुमार पांडेय जी अपने हालिया प्राइम टाइम के प्रेम्बल में कलेजे पर चोट खाए आशिक़ की भाँति उत्तराखंड में हुई जातिगत हत्या पर बोले। लेकिन, ध्यान देने वाली बात ये है कि रवीश बाबू बनारस में चुनाव कवर करने गए थे। प्राथमिकताओं का अंदाजा और विमर्श का केंद्र इसी एक हरकत से समझा जा सकता है कि किस तरह ‘डर का माहौल’ का राग अलाप उत्तराखंड में बची खुची, रही सही शांति के भी भंग करने का प्रोपगंडा चलाया जा रहा है। अपवादों को छोड़ दें, तो यह वही उत्तराखंड है, जो लोकपाल को सबसे पहले लागू करता है, कन्या धन योजना और ऐसे ही न जाने कितनी चीजों को सबसे आगे रखता है। इसी उत्तराखंड से सबसे ज्यादा प्रतिभाएँ संगीत और कला से लेकर तमाम अन्य क्षेत्रों में खूब नाम कमा रही हैं और यह बताना भी जरूरी हो जाता है कि उनमें से अधिकांश दलित ही हैं।

ये उसी देवभूमि की बात है, जिसमें धर्म-सम्प्रदाय, जाति आज भी चुनाव का मुद्दा नहीं हैं। यदि समकालीन परिदृश्य में ही बात करें तो वो सभी मुद्दे, जिन पर अन्य राज्यों में राजनीतिक दल हमेशा से ही हार-जीत के समीकरण का जायजा करती है, इस उत्तराखंड राज्य से नदारद मिलती है।

सवर्ण, अगड़ा, पिछड़ा या फिर दलितों के विषय पर ही आ जाएँ,  तो उत्तराखंड के हर पारम्परिक अनुष्ठान, छोटे-बड़े कार्यों, जागर (जगार) में भी ऐसा व्यक्ति जो कागजों और गिद्ध मीडिया  की नजर में ‘दलित’ है, उसके बिना कोई मंगलकार्य पूरा नहीं होता है। मात्र रस्मी तौर पर ही नहीं, अपितु पूर्ण भागीदारी के साथ उसका होना अनिवार्य होता है।

शादी समारोह के दौरान घटित हुई इस घटना में धूर्तता के साथ ‘देवभूमि’ शब्द जोड़ने वाले दी लल्लनटॉप जैसे निकृष्ट मीडिया गिरोहों को लार टपकाने से पहले यह बात मालूम होनी चाहिए कि भले ही वो सम-विषम नारी किस्म के पत्थरकारों से जितना भी उन्माद मचवाने की कोशिश कर लें, लेकिन इस राज्य की संरचना को वो और उनके सहयोगी पत्थरकार कोई हानि नहीं पहुँचा सकते हैं।

लार टपकाती मीडिया के ‘पत्थरकारों’ के उदाहरण इन तस्वीर में आप देख सकते हैं