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नए डेटा तो छोड़िए, पुराने हिसाब से भी मोदी सरकार के दौरान महंगाई घटी और रोजगार बढ़े

भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यान्वयन मंत्रालय (Ministry of Statistics and Programme Implementation) के अंतर्गत नेशनल सैम्पल सर्वे कार्यालय द्वारा जारी किए गए डेटा को 108 अर्थशास्त्रियों ने सरकार द्वारा छेड़छाड़ किया हुआ बताया है। नेशनल सैम्पल सर्वे कार्यालय (NSSO) के प्रमुख एक महानिदेशक होते हैं, जो अखिल भारतीय आधार पर विभिन्‍न क्षेत्रों में व्‍यापक स्‍तर पर सर्वेक्षण करने के लिए जिम्‍मेदार होते हैं। प्रारंभिक डेटा विभिन्‍न सामाजिक-आर्थिक विषयों पर राष्‍ट्रव्‍यापी स्‍तर पर घरों का सर्वेक्षण, वार्षिक औद्योगिक सर्वेक्षण (एएसआई) आदि करके एकत्र किया जाता है। इन सर्वेक्षणों के अलावा, एनएसएसओ गाँव और शहरों में क़ीमतों से संबंधित डेटा एकत्र करता है।

अर्थशास्त्रियों ने इस डेटा को नकारते हुए सरकार पर सांख्यिकी संस्थाओं पर हमले करने का आरोप लगाया था। अपने अपील में उन्होंने सभी पेशेवर अर्थशास्त्रियों, सांख्यिकीविदों और स्वतंत्र शोधकर्ताओं से अनुरोध किया था कि वे सरकार द्वारा ‘असहज डेटा को दबाने’ की प्रवृत्ति के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए एक साथ आएँ। और सरकार पर सार्वजनिक आँकड़ों की पहुँच और अखंडता को बहाल करने और संस्थागत आज़ादी को फिर से स्थापित करने का प्रयास करें।

इस बयान में कहा गया है, “हाल ही में, भारतीय आँकड़े और इससे जुड़े संस्थानों को राजनीतिक रूप से प्रभावित किया जा रहा है। वक्तव्य में एनएसएसओ के समय-समय पर जारी होने वाले श्रम बल सर्वेक्षण के आँकड़ों को रोकने और 2017- 18 के इन आँकड़ों को सरकार द्वारा निरस्त किए जाने संबंधी समाचार रिपोर्ट पर भी चिंता जताई गई है।”

इसके जवाब में 131 चार्टर्ड अकॉउन्टेंट्स के समूह ने उनकी चिंता को ख़ारिज कर दिया और उनके आरोपों को बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित बताया। चार्टर्ड अकॉउन्टेंट्स ने इसकी तुलना अवॉर्ड वापसी से की। अर्थशास्त्रियों की इस चिंता का जवाब देते हुए अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने फाइनेंसियल एक्सप्रेस में एक लेख लिखा है। इस लेख में सिलसिलेवार ढंग से 108 अर्थशास्त्रियों द्वारा जताई गई चिंताओं का उत्तर दिया गया है। उस लेख के कई ऐसे पहलू हैं, जिनके बारे में आपको जानना ज़रूरी है। यहाँ हम उस लेख में लिखी महत्वपूर्ण बातों पर चर्चा करेंगे।

2015 में केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने एक नया सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product) सीरीज शुरू किया था, जिसमें 2012-13 और 2013-14 से पहले के मुक़ाबले ज्यादा विकास दर की बात कही गई थी। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय देश में सांख्यिकीय क्रियाकलापों में समन्‍वय करता है और सांख्यिकीय मानक तैयार करता है।

नए जीडीपी सीरीज ने सीएसओ के डेटा को रिप्लेस किया है, जो 2006 से पहले उपलब्ध नहीं था। इसे ‘Annual Survey Of Industries (ASI)’ के नाम से जारी किया जाता था। इस कारण पिछले डेटा से इसकी तुलना कैसे की जाए, इसी को लेकर विवाद हो रहा है। अब कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए इंडस्ट्री बैलेंस शीट को लेकर विवाद हो रहा है। आपको बता दें कि विवाद शुरू होने से एक दिन पहले ही एएसआई का 2016-17 सीएसओ की वेबसाइट पर जारी किया गया। याद रखिए कि अभी तक एएसआई के डेटा की आलोचना नहीं की गई है। इसीलिए यहाँ उसी के आँकड़ों का जिक्र किया जा रहा है।

सुरजीत भल्ला लिखते हैं कि उन्होंने इस प्रकार की आलोचना पहले कभी नहीं देखी। फैक्ट और फिक्शन की बात करते हुए उन्होंने अपने लेख में लिखा है कि महंगाई दर का कम होना सरकार अपनी बड़ी उपलब्धियों में से एक बताती रही है। यूपीए कार्यकाल के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था ऊँची महंगाई दर की मार झेल रही थी। सुरजीत ने 108 अर्थशास्त्रियों के दावों पर करारा प्रहार करते हुए लिखा है कि ये अर्थशास्त्री वैश्विक बाजार में तेल के घटते दामों का मोदी सरकार को फ़ायदे पहुँचाने की बात तो करते हैं लेकिन वे यह नहीं बताते कि यूपीए के पहले कार्यकाल के दौरान मनमोहन सरकार को ‘विस्फोटक ग्लोबल ग्रोथ’ का फ़ायदा मिला था। यही कारण था कि भारत की जीडीपी ऊँचे स्तर पर पहुँची थी।

मुद्रास्फीति डेटा, CPI और WPI (ग्राफ़िक्स साभार: फाइनेंसियल एक्सप्रेस)

ये अर्थशास्त्री 2008 के बाद आए वित्तीय संकट के दौरान ऊँची महंगाई दर का विशाल भारतीय अर्थव्यवस्था पर गलत प्रभाव पड़ने की चर्चा करने से भी बचते हैं। आलोचकों का मानना है कि नोटेबंदी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था गड़बड़ अवस्था में चली गई थी। नोटेबंदी के आलोचकों ने इसे एक बड़ा ब्लंडर बताया था। लेकिन, एएसआई का डेटा क्या कहता है? आँकड़े कहते हैं कि महंगाई दर में स्पष्ट रूप से कमी आई। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Customer Price Index) मुद्रास्फीति में 400bps (बेस पॉइंट्स) की कमी दर्ज की गई। यह 9% के औसत से घटकर 5% की औसत पर पहुँच गया।

थोक मूल्य सूचकांक (WPI) की गणना थोक बाजार में उत्पादकों और बड़े व्यापारियों द्वारा किए गए भुगतान के आधार पर की जाती है। इसमें उत्पादन के प्रथम चरण में अदा किए गए मूल्यों की गणना की जाती है। इसी तरह थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index) में 420bps की औसत से कमी दर्ज की गई। अर्थात यह कि CPI मुद्रास्फीति में और WPI मुद्रास्फीति से तेज़ गिरावट दर्ज की गई।

एएसआई के पुराने विश्वसनीय डेटा भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि मोदी के कार्यकाल में आउटपुट ग्रोथ भी अच्छा रहा है। हाँ, नॉमिनल वेज ग्रोथ में ज़रूर छोटी सी कमी दर्ज की गई है, लेकिन महंगाई काफी नीचे गिरी है। अतः, यह रियल वेजेज में तेज़ वृद्धि की ओर इशारा करता है। रोजगार की बात करें तो एएसआई के डेटा के मुताबिक़ उसमे भी वृद्धि दर्ज की गई है। रोजगार के मामले में अगर NDA के तीन वर्ष के शासनकाल और UPA-2 के पीछे तीन वर्षों के कार्यकाल की तुलना करें तो पता चलता है कि मोदी के शासनकाल में रोजगार में दोगुनी दर से वृद्धि दर्ज की गई है।

वो 3 टर्म जिन्हें जानना जरूरी

  • उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI)
  • ग्रामीण मूल्य संग्रह (RPC)
  • थोक मूल्य सूचकांक (WPI)

शहरी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-U): यह पूरे देश भर की शहरी आबादी के लिए प्रासंगिक खुदरा कीमतों के सामान्य स्तर में समय के साथ बदलाव को मापने के लिए बनाया गया है। शहरी क्षेत्रों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के संकलन का आधार वर्ष 2010 रखा गया है। इन कीमतों का संग्रह NSSO के द्वारा 310 चुनिंदा शहरों के 1114 कोटेशन से किया जाता है। CPI-U जनसंख्या के तीन व्यापक खंडों (संपन्न, मध्यम-वर्गीय और गरीब) के आधार पर वस्तुओं की कीमतों का संकलन करती है।

ग्रामीण मूल्य संग्रह (RPC): ग्रामीण खुदरा मूल्य पर एकत्र किए गए डेटा का उपयोग कृषि श्रमिकों/ग्रामीण मजदूरों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के संकलन के लिए किया जाता है। वर्तमान में, श्रम ब्यूरो, श्रम और रोजगार मंत्रालय, कृषि श्रमिकों/ग्रामीण मजदूरों के लिए CPI का संकलन और प्रकाशन करता है। इसके लिए 1986 में 260 कमोडिटिज़ की लिस्ट बनाई गई थी। कृषि श्रमिकों/ग्रामीण मजदूरों के उपभोग पैटर्न के संबंध में कीमतों में हो रहे परिवर्तन के आँकड़ों को इन्हीं 260 कमोडिटिज़ के आधार पर लिखा जाता है। देश के सभी राज्यों में फैले चुनिंदा 603 गाँवों/बाजारों से यह आँकड़ा हर महीने एकत्र किया जाता है। इसके अलावा कृषि-आधारित 12 जबकि 13 गैर-कृषि व्यवसायों से संबंधित दैनिक मजदूरी के आँकड़े भी जमा किए जाते हैं।

थोक मूल्य सूचकांक (WPI): वर्तमान में WPI की मौजूदा सीरीज के लिए कीमतों के डेटा संग्रहण की सुविधा NSSO ही प्रदान करती है। इसे आर्थिक सलाहकार, औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग के साथ-साथ वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा संकलित किया जाता है। वर्तमान में इसके लिए हर सप्ताह 3813 यूनिटों से 4548 कोटेशनों का संग्रह किया जाता है। यानी पूरे देश में एक महीने में 18192 कोटेशन। यह भी जानें कि WPI की यह मौजूदा सीरीज का आधार वर्ष 2004-05 है।

UP और बंगाल के बाद कॉन्ग्रेस को बिहार में भी झटका, सीट शेयरिंग पर तेजस्वी का अल्टीमेटम

ऐसा प्रतीत होता है कि कोई भी प्रमुख क्षेत्रीय दल कॉन्ग्रेस से गठबंधन में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है या पार्टी की माँगों को मानने के लिए तैयार नहीं है। बिहार में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कॉन्ग्रेस को अल्टीमेटम देते हुए 8 सीटों पर मान जाने को कहा है। इस से ज्यादा सीटों की माँग को नकारते हुए उन्होंने कॉन्ग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने को भी कहा। बता दें कि बिहार में राजग का गठबंधन फाइनल हो चुका है और पार्टियों ने सीटों का बँटवारा भी तय कर लिया है। जदयू और भाजपा 17-17 सीटों पर चुनावी समर में उतरेंगे जबकि लोजपा के खाते में 7 सीटें गई हैं। एक तरफ राजग ने नितीश और मोदी के चेहरे के साथ चुनावी प्रचार अभियान का श्रीगणेश कर दिया है तो वहीं दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन का पेंच है कि सुलझता ही नहीं।

सीट शेयरिंग के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस की लगातार आनाकानी से परेशान राष्ट्रीय जनता दल ने पार्टी को मंगलवार (मार्च 19, 2019) तक स्थिति साफ़ करने को कहा है। बता दें कि बिहार की कुल 40 लोकसभा सीटों में से कॉन्ग्रेस 11 पर लड़ना चाह रही है जबकि लालू यादव की पार्टी उसे 8 से ज्यादा सीटें नहीं देना चाहती। राजद ने साफ़-साफ़ कर दिया है कि या तो कॉन्ग्रेस 11 से 8 सीटों पर आए या बिहार में अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने को तैयार रहे। अगर ऐसा नहीं होता है तो राजद महागठबंधन के बाकी सहयोगियों के साथ सीटों का बँटवारा कर लेगी। तेजस्वी के 15 मार्च के ट्वीट से भी इस बात का अंदेशा लगाया जा रहा था।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, आरजेडी सूत्रों के मुताबिक, तेजस्वी ने पटना स्थित एक होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए हॉल भी बुक कर लिया है जहाँ वह संभवत: आरएलएसपी के उपेंद्र कुशवाहा, एचएएम-एस के जीतन राम माँझी और मुकेश साहनी (विकासशील इनसान पार्टी) के साथ मंगलवार को सीटों का ऐलान कर सकते हैं। तेजस्वी ने कॉन्ग्रेस पर दबाव डालने के लिए कुछ वामदलों के नेताओं को आमंत्रित किया है। हमने एक रिपोर्ट में बताया था कि राजद सुप्रीमो लालू यादव राँची स्थित बिरसा मुंडा जेल से ही सारे निर्णय ले रहे हैं। फिलहाल वह राजेंद्र इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RIMS) में दाख़िल हैं, जहाँ उनसे मिलने के लिए रोज नेताओं की कतार लग रही है।

शुरुआत में पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव ने कॉन्ग्रेस को 7 सीटों का ऑफर दिया था लेकिन कॉन्ग्रेस की 15 सीटों की माँग के कारण वह 1 सीट और देने को राजी हो गए। बिहार कॉन्ग्रेस प्रचार समिति के अध्यक्ष डॉक्टर अखिलेश प्रसाद सिंह के 11 सीटों पर चुनाव लड़ने के बयान के बाद दोनों दलों में तल्ख़ी बढ़ गई। बिहार में सातों चरणों में मतदान होने हैं। कॉन्ग्रेस ने दावा किया है कि मंगलवार तक मुद्दे को सुलझा लिया जाएगा।

उत्तर प्रदेश में अखिलेश-माया की पार्टी ने महागठबंधन कर कॉन्ग्रेस को दरकिनार कर दिया। कॉन्ग्रेस ने ‘त्याग’ का परिचय देते हुए महागठबंधन के नेताओं के लिए 7 सीटें छोड़ी ने मायावती ने कॉन्ग्रेस की इस दरियादिली को ठुकराते हुए बसपा से कोई उम्मीद न रखने की सलाह दी। उधर पश्चिम बंगाल में ही वामदलों ने कॉन्ग्रेस को धता बताते हुए गठबंधन कर लिया। पश्चिम बंगाल कॉन्ग्रेस ने वाम मोर्चे के साथ गठबंधन की अपनी सभी संभावनाओं को समाप्त करने की घोषणा कर दी। बता दें कि पश्चिम बंगाल कॉन्ग्रेस की यह घोषणा तब की गई जब वाम मोर्चे ने 42 संसदीय सीटों में से 25 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा दो दिन पहले ही कर दी थी।

FY 2018-19 का आयकर कलेक्शन ₹10 लाख करोड़ पार, मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के साथ-साथ मोदी सरकार ने कर चोरी रोकने में भी बड़ी सफलता हासिल की है, जिसका नतीजा है कि आयकर के मामले में वर्तमान केंद्र सरकार यह काम कर पाई। मोदी सरकार ने महज 4 साल में आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या दोगुनी कर दी है। कॉन्ग्रेस सरकार के कार्यकाल में 3 करोड़ के आस-पास रहने वाली रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या अब 7 करोड़ का आँकड़ा छूने के करीब पहुँच गई है। खास बात यह है कि पिछले वित्त वर्ष में लगभग 1 करोड़ नए करदाताओं ने आयकर रिटर्न दाखिल किया है। वहीं परोक्ष कर के तहत पंजीकृत संख्या में भी GST लागू होने के बाद बड़ी संख्या में वृद्धि हुई है।

नवीनतम सरकारी आँकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष (FY2019) में 16 मार्च 2019 को आयकर कलेक्शन ने ₹10 लाख करोड़ का रिकॉर्ड आँकड़ा पार कर लिया है। बता दें कि यह आँकड़ा अस्थायी है क्योंकि देश भर से पूरे अग्रिम कर के आँकड़े अभी तक नहीं आए हैं। जबकि अप्रैल-जनवरी की अवधि के दौरान शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह ₹7.89 लाख करोड़ रहा। हालाँकि, मार्च के मध्य तक का प्रारंभिक मूल्याँकन ₹10 लाख करोड़ आँकड़े को पार कर गया है।

चालू वित्त वर्ष के लिए प्रत्यक्ष कर संग्रह का लक्ष्य ₹12 लाख करोड़ रखा गया है। यह लक्ष्य पहले के ₹11.5 लाख करोड़ के अनुमान से अधिक है, जिसे 2019-20 के अंतरिम बजट में ₹50,000 करोड़ से संशोधित किया गया था। इस विषय पर आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने भी कहा था, “हम प्रत्यक्ष करों पर लक्ष्य को पूरा करने का विश्वास रखते हैं। लेकिन, अप्रत्यक्ष कर के मामले में कुछ कमी हो सकती है।”

प्रत्यक्ष कर में हुई है बढ़ोत्तरी

NDA सरकार के दौरान प्रत्यक्ष कर संग्रह (Direct Tax Collections) में वृद्धि हुई है। अंतरिम बजट प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि भारत का कर आधार (Tax Base), जो कर दाताओं (Tax payers) की कुल संख्या को इंगित करता है, पिछले कुछ वर्षों में 3.79 करोड़ से 6.85 करोड़ तक बढ़ गया है। इसके अलावा, पिछले वित्त वर्ष (FY18) में भारत का tax-to-GDP अनुपात 5.98% था, जो एक दशक में सबसे अच्छा प्रदर्शन था।

मोदी सरकार में दोगुनी हुई आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या

GST जैसे मुद्दों पर विपक्ष द्वारा फैलाये गए तमाम झूठ के बावजूद सरकारी आँकड़े बताते हैं कि आयकर विभाग ने पिछले 5 वर्षों में ₹977 करोड़ बचाए हैं, जिसमें GST का सबसे बड़ा योगदान रहा है। वित्त वर्ष 2013-14 में कुल मिलाकर 3.79 करोड़ रिटर्न दाखिल किए गए थे। जबकि, वर्ष 2017-18 में 6.86 करोड़ आयकर रिटर्न दाखिल किए गए, जो कि लगभग 80.5% की वृद्धि दर्शाता है।

तेजाब हमला निर्मम अपराध, दोषी नरमी का हक़दार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

तेजाब हमले का नाम सुनते ही हमारी रूह काँप जाती है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं। तो जरा उन लोगों के बारे में सोचिए, जिन्होंने इस दर्द को झेला है, इसे जिया है। कभी एकतरफा प्यार, तो कभी आपसी दुश्मनी की वजह से सैकड़ों लड़कियों के ऊपर तेजाब से हमला होता आ रहा है। ये हमला उन्हें ना सिर्फ शारीरिक तौर पर बल्कि मानसिक तौर पर भी गहरा आघात पहुँचाता है। इससे शरीर तो झुलसता ही है साथ ही आत्मा भी झुलस जाती है।

तेजाब हमला निर्मम अपराध

अभी ताजा मामले में उच्चतम न्यायालय ने भी तेजाब हमले को ‘असभ्य व निर्मम’ करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये एक असभ्य व निर्मम अपराध है, जिसके लिए किसी तरह की कोई नरमी नहीं बरती जा सकती। बता दें कि शीर्ष अदालत ने करीब 15 साल पहले 2004 में 19 वर्षीय लड़की पर तेजाब फेंकने के अपराध में 5 साल जेल में गुजारने वाले दो दोषियों को आदेश दिया कि वे पीड़ित लड़की को डेढ़ डेढ़ लाख रूपए का अतिरिक्त मुआवजा भी दें। इस मामले पर न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा कि न्यायालय इस स्थिति से बेखबर नहीं है कि पीड़िता को इस हमले से जो भावनात्मक आघात पहुँचा है, उसकी भरपाई दोषियों को सजा देने या फिर किसी भी मुआवजे से नहीं की जा सकती। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दोनों दोषियों को सुनाई गई 10 वर्ष की सजा को घटाकर 5 वर्ष कर दिया था। राज्य सरकार हाईकोर्ट की इसी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला सुनाया।

तेजाब हमले के बाद करना पड़ता है अंतहीन मुसीबतों का सामना

तेजाब हमले को लेकर आम तौर पर लोग यही सोचते हैं कि सिर्फ चेहरा ही या फिर शरीर का कोई एक अंग ही तो जला या खराब हुआ है, मगर वो नहीं जानते कि जो लड़कियाँ इसकी शिकार होती हैं, उन्हें अंतहीन मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। लोगों को ऐसा लगता है कि ये दर्द सिर्फ जले हुए भाग के ठीक होने तक ही रहता है, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि इसका असर अंदरूनी टिश्यू पर भी होता है, क्योंकि जो तेजाब डाला जाता है, वो सिर्फ शरीर के ऊपरी भाग पर ही नहीं, बल्कि अंदरुनी टिश्यू में भी चला जाता है। जिसका असर बाद में पता चलता है। इसकी वजह से लीवर, फेफड़े वगैरह भी डैमेज हो जाते हैं, जिससे पीड़िता की मौत भी हो सकती है।

तेजाब हमले की पीड़ित महिलाओं को होने वाली परेशानियों को लेकर बीबीसी ने इसके विशेषज्ञ सर्जन से बात की है। जिसमें ये बताया गया है कि इस दौरान पीड़िता किन किन परिस्थितियों से गुजरती है। इसका इलाज अलग-अलग चरणों में होता है। पहले तो इसे दवाओं की मदद से ठीक करने की कोशिश की जाती है, मगर जब घाव दो से तीन हफ्तों में ठीक नहीं होता, तो दूसरे चरण में ‘स्किन ग्राफटिंग’ करनी पड़ती है। इसमें पीड़ित के शरीर से त्वचा की एक पतली परत ली जाती है और जले हुए हिस्से पर नई त्वचा की परत लगा दी जाती है और अगर जले हुए हिस्से में खून की सप्लाई सही होता है वो हिस्सा धीरे धीरे ठीक हो जाता है। अमूमन ऐसी स्थिति में पीड़ित के शरीर के ही किसी हिस्से की त्वचा की परत लेकर लगाया जाता है, लेकिन जब पीड़ित इस स्थिति में नहीं होता है कि उसके शरीर के किसी हिस्से से त्वचा ली जा सके, तो फिर ऐसे में अस्थाई तौर पर किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर के किसी हिस्से की त्वचा लेकर लगा दिया जाता है, मगर ये ज्यादा दिन के लिए काम नहीं करता है, जल्द ही पीड़ित को अपनी स्किन देनी पड़ती है।

तेजाब पीड़िता प्रज्ञा ने की मिसाल कायम

अक्सर ऐसा देखा जाता है कि तेजाब हमले के बाद पीड़िता टूट जाती है, उनका आत्मविश्वास खत्म हो जाता है, उनके अंदर हीन-भावना घर कर जाती है, लेकिन कुछ ऐसी भी लड़कियाँ हैं, जो कि हौसला दिखाते हुए मिसाल कायम करती है और दूसरों को भी प्रेरित करती है। इन्हीं में से एक हैं- वाराणसी की प्रज्ञा सिंह। प्रज्ञा बताती हैं कि साल 2006 में उनके ऊपर तेजाब से हमला किया गया था, जिसमें उनका चेहरा बुरी तरह से जल गया था। इसे ठीक होने में लगभग दो साल लग गए। हालाँकि उनके सामने तेजाब हमले से उबरने के लिए कॉस्मेटिक सर्जरी का विकल्प था, जिससे उनके घाव के निशान खत्म हो सकते थे और उनका चेहरा पहले की तरह बन सकता था, लेकिन उन्होंने हिम्मत और आत्मविश्वास का परिचय देते हुए अपने इसी चेहरे के साथ आगे की ज़िंदगी को जीना स्वीकार किया। प्रज्ञा ने पीड़ित बने रहने की बजाए ऐसे जघन्य अपराधों की शिकार हुई पीड़िताओं के लिए बदलाव लाने की ठान ली और साल 2013 में उन्होंने अतिजीवन फाउंडेशन की स्थापना की। इसके तहत वो अपने जैसी पीड़िताओं की मदद करने के साथ ही उनकी मुफ्त सर्जरी भी करवाती है। उनकी ज़िंदगी संवारने के लिए उन्हें नौकरी भी दिलवाती है।

तेजाब हमले से नहीं रुकती ज़िंदगी

प्रज्ञा जैसी महिलाओं को देखकर प्रेरणा मिलती है कि तेजाब हमले के जख्मों से ज़िंदगी रूकती नहीं है, बस हौसलों की कमी होती है। अगर वो हौसला दिखा दिया जाए तो ज़िंदगी थोड़ी सी आसान हो जाती है। वहीं हिमाचल प्रदेश की 19 वर्षीय तेजाब पीड़िता के मामले में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से सुनाया गया फैसला सराहनीय है।

कालाहांडी में हुई प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबल में झड़प, गार्ड को जला दिया जिंदा

ओडिशा के कालाहांडी में सोमवार (मार्च 18, 2019) को देश की सबसे बड़ी एल्यूमिनियम कंपनी वेदांता लिमिटेड रिफाइनरी प्लांट को जलाने का प्रयास किया गया। इस बीच वहाँ प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों की झड़प में दो लोगों को अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा।

पुलिस के मुताबिक ओडिशा औद्योगिक सुरक्षाबल के सुरक्षाकर्मी और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प में एक सुरक्षाकर्मी को जिंदा जला दिया गया और 20 लोग घायल भी हुए हैं। जनसत्ता में छपी रिपोर्ट के मुताबिक वहाँ (कालाहांडी) के एसपी बी गंगाधर ने बताया कि रेंगोपाली और उसके आसपास के गाँवों के निवासी लांजीगढ़ में रिफाइनरी के पास कंपनी में युवकों के लिए नौकरी की माँग कर रहे थे।

इसी बीच कुछ प्रदर्शनकारियों ने मुख्य गेट से प्लांट में घुसने का प्रयास किया, लेकिन सुरक्षा में तैनात ओआईएसएफ के सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें वहीं रोक दिया, जिसके बाद झगड़ा बढ़ा और पत्थरबाज़ी शुरू हो गई। कंपनी द्वारा जारी बयान में बताया गया कि इस झड़प में दो लोग की मौत हो गई है और एक सुरक्षाकर्मी समेत कुछ प्रदर्शनकारी घायल हो गए, जिन्हें अस्पताल ले जाया गया है।

अस्पताल प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि शरीर पर गंभीर चोटें लगने के कारण एक सुरक्षाकर्मी और एक प्रदर्शनकारी की मौत हुई है। मरने वाले प्रदर्शनकारी की पहचान दानी पात्रा के रूप में की गई है। दानी लाजीगढ़ का मूल निवासी था।

वेदांता कंपनी के बारे में बता दें कि भारत की सबसे बड़ी एल्यूमिनियम उत्पादक कंपनी है। इस कंपनी से हर साल 2.3 मिलियन टन एल्यूमिनियम का उत्पादन होता है। यह कंपनी भारत के एल्यूमिनियम उद्योग में 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखती है।

कॉन्ग्रेस की 5वीं लिस्ट जारी, प्रत्याशियों को बदलने का खेल भी शुरू

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव की तारीखें नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे सियासी हलचल भी तेज हो रही है। सभी पार्टियाँ चुनाव जीतने की भरपूर कोशिशों में जुटी हुई हैं। इसी कड़ी में कॉन्ग्रेस ने सोमवार (मार्च 18, 2019) की रात अपने उम्मीदवारों की पाँचवीं सूची जारी कर दी। जिसमें उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और लक्षद्वीप की 56 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं।

पार्टी ने आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए 132 और ओडिशा विधानसभा सीटों के लिए 36 सीटों पर भी उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। पार्टी महासचिव मुकुल वासनिक की तरफ से जारी किए गए बयान के मुताबिक उत्तर प्रदेश की 3, आंध्र प्रदेश की 22, असम की 5, ओडिशा की 6, तेलंगाना की 8, पश्चिम बंगाल की 11 और लक्षद्वीप की एक लोकसभा सीट पर उम्मीदवार घोषित किए गए हैं।

उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद से डॉली शर्मा, बुलन्दशहर से बंशीलाल पहाड़िया और मेरठ से हरेंद्र अग्रवाल को टिकट दिया गया है। आपको बता दें कि मेरठ से पहले ओमप्रकाश शर्मा को उम्मीदवार बनाया गया था, जिसे अब बदल दिया गया है। वहीं, पश्चिम बंगाल में जांगीपुर से पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पुत्र अभिजीत मुखर्जी, बहरामपुर से अधीर रंजन चौधरी और रायगंज से दीपा दास मुंशी को उम्मीदवार बनाया गया है। इससे पहले कॉन्ग्रेस उत्तर प्रदेश एवं कुछ अन्य राज्यों के लिए चार बार में कुल 81 उम्मीदवारों की घोषणा कर चुकी है, जिनमें सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के नाम भी शामिल हैं।

आपको बता दें कि दो दिन पहले ही लोकसभा चुनाव को मद्देनजर रखते हुए कॉन्ग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के नामों की चौथी सूची जारी की थी। इस सूची में कुल 27 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की गई थी। जिसमें 7 नाम उत्तर प्रदेश से, 2 नाम अरुणाचल प्रदेश से, 5 नाम छत्तीसगढ़ से, 1 नाम अंडमान निकोबार और 12 नाम केरल से थे। इसमें शशि थरूर समेत कई दिग्गजों का नाम शामिल था। इस लिस्ट के तहत वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री शशि थरूर को तिरुवनंतपुरम से चुनाव मैदान में उतारा गया है। वहीं अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नबम टुकी को अरुणाचल प्रदेश पश्चिम से टिकट दिया गया है।

‘विमान से जाने वाले की लाश ही वापस आती है’ – पर्रिकर का वो लेख, जो हर माँ-बाप-पति-पत्नी को पढ़ना जरूरी

मनोहर पर्रिकर- एक ऐसा नाम, जो गोवा वासियों के लिए बेहद अपनत्व भरा है। उनकी अनेक कहानियाँ गोवा भर में प्रचलित हैं। चार बार गोवा वासियों के सेवा का प्रण ले जीवन पर्यन्त ख़ुद पूरी तरह समर्पित कर देना आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा स्रोत रहेगा। शिखर पर पहुँच कर भी सादगी को जीना उनके लिए दिखावा नहीं बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा था।

आज बेशक गोवा के मुख्यमंत्री और पूर्व रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर जी ब्रह्मलीन हो चुके हैं। लेकिन उनका पूरा जीवन जनता को समर्पित रहा। हालाँकि एक सत्य यह भी है कि उनके बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। उन्होंने अपने निजी दुखों को कभी भी अपने काम और जनता की सेवा पर हावी नहीं होने दिया। लोग यह तो जानते हैं कि उनकी मृत्यु कैंसर से हुई। लेकिन शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि उनकी पत्नी का निधन भी कैंसर से ही हुआ था। ये भी शायद बहुत कम लोगों को पता होगा कि पत्नी मेधा को खोने के बाद वो निजी रूप से टूट गए थे परंतु जनता और पार्टी की सेवा में कभी अपना निजी दुख न आड़े आने दिया, न ही कभी कहीं वाणी से व्यक्त ही किया।

बस एक बार पता नहीं कौन से मनोभाव में उन्होंने ख़ुद को एक लेख के माध्यम से व्यक्त किया था। उन्होंने अपनी निजी पीड़ा पर एक भावुक लेख एक मराठी पत्रिका में लिखा था, जिसका सुरेश चिपलूनकर जी ने अनुवाद किया है। उन्होंने यह लेख अपनी षष्ठीपूर्ति के अवसर पर एक मराठी पत्रिका “ऋतुरंग” (दिवाली अंक 2017) में लिखा था। एक राजनेता के जीवन में पर्दे के पीछे चलते हुए उसके जीवन के घटनाक्रमों और दुःख-दर्द में भीगी हुई कलम से लिखा हुआ यह अदभुत लेख है। यह लेख मनोहर पर्रिकर को राजनीति से अलग एक पति, पिता और बेटे के रूप में तो व्यक्त करती ही है, साथ ही उनके जीवन के उन पहलुओं को भी उजागर करती है जो अभी तक समाज से अछूता रहा है।

मनोहर पर्रिकर जी लिखते हैं

“राजभवन का वह हॉल कार्यकर्ताओं की भीड़ से ठसाठस भरा हुआ था। पहली बार गोवा में भाजपा की सरकार बनने जा रही है, यह सोचकर सभी का उत्साह मन के बाँध तोड़ने को आतुर था। मेरे निकट के मित्र, गोवा के भिन्न-भिन्न भागों से आए हुए असंख्य कार्यकर्ता इस शपथ समारोह के कार्यक्रम में दिखाई दे रहे थे। इन सभी की वहाँ उपस्थिति का कारण एक ही था, मुझे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेते हुए देखना। मैंने जिनके साथ राजनीति में प्रवेश किया ऐसे मेरे सहकारी, मेरे हित-चिन्तक, पार्टी के कार्यकर्ताओं की इस भारी भीड़ में मुझे मेरे दोनों बेटे, भाई-बहन सभी लोग दिखाई दे रहे थे। परन्तु फिर भी सामने दिखाई देने वाला चित्र अधूरा सा था। मेरी पत्नी मेधा, और मेरे माता-पिता इन तीनों में से कोई भी उस भीड़ में नहीं था। मुझे तीव्रता से इन तीनों की याद आ रही थी। मैंने जिस बात की कभी कल्पना तक नहीं की थी, वह अब सच होने जा रही थी, अर्थात मैं गोवा का मुख्यमंत्री बनने जा रहा था, परन्तु फिर भी इस आनंद के क्षण में दुखों के पल भी समाए हुए थे।

नियति के खेल निराले होते हैं। एक-दो वर्ष के अंतराल में ही मेरे सर्वाधिक पास के ये तीनों ही व्यक्तित्त्व मुझसे हमेशा के लिए दूर जा चुके थे। जिनके होने भर से मुझे बल मिलता था, प्रेरणा मिलती थी ऐसे मेरे “आप्त स्वकीय” जनों की कमी कभी कोई नहीं भर सकता था। एक तरफ भाजपा गोवा में पहली बार सत्ता स्थान पर विराजमान होने का आनंद और दूसरी तरफ इस घनघोर आनंद में मेरे साथ सदैव सहभागी रहने वाले माता-पिता और पत्नी का वहाँ मौजूद नहीं होना, ऐसी दो विपरीत भावनाएँ मेरे मन में थीं। यदि ये तीनों आज होते तो उन्हें कितना आनंद हुआ होता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अपनी जिम्मेदारी निभाते समय ये तीनों सतत मेरे पीछे मजबूती से खड़े रहे। राजनीति में मेरा प्रवेश अचानक ही हुआ। इस नई जिम्मेदारी को मैं ठीक से निभा सका, इसका कारण इन तीनों का साथ ही था। आज मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करते समय उन्हें यहाँ होना चाहिए था, ऐसा रह-रहकर लगता था। वास्तव में देखा जाए तो अब मेरे राजनैतिक जीवन का एक नया प्रवास शुरू हुआ था, लेकिन मेरे अपने जो लोग साथ होने चाहिए थे, वही नहीं थे।

अक्सर हम अपने एकदम नजदीक वाले व्यक्ति को गृहीत (ग्रांटेड) मानकर चलते हैं, कि ये तो अपना ही व्यक्ति है, ये कभी अपने को छोड़कर जाने वाला नहीं है। यह सदैव अपने साथ ही रहेगा, परन्तु वैसा होता नहीं है। अचानक ऐसी कई बातें और घटनाएँ होने लगती हैं कि आपको समझ ही नहीं आता कि क्या करना चाहिए, बल्कि मैं तो कहूँगा कि अक्सर इतनी देर हो जाती है कि अपने हाथ में करने लायक कुछ बचता ही नहीं। मेरी पत्नी मेधा के बारे में भी ऐसा ही घटित हुआ। अत्यधिक तेजी से उसकी बीमारी बढ़ी। किसी को भी समय दिए बिना उस बीमारी ने हमसे उसे छीन लिया। सब कुछ अच्छा चल रहा था। ऐसा भी कभी हो सकता है, यह विचार तक कभी मन में नहीं आया था। मनुष्य ऐसा ही होता है।

मुझे आज भी वे दिन अच्छे से स्मरण हैं। हमारी शादी को पंद्रह वर्ष बीत चुके थे। एक तरफ मेरी फैक्ट्री का काम बढ़ता जा रहा था, और दूसरी तरफ राजनीति में आई नई जिम्मेदारियों के कारण मेरा दिनक्रम अत्यधिक व्यस्त हो गया था। ऐसा लगने लगा था कि शायद कुछ वर्ष में ही भाजपा गोवा में सत्ता में आ सकती है। मेधा को बीच-बीच में कभी-कभी बुखार आता रहता था, उसने अपना कष्ट अपने शरीर को ही भोगने दिया, बताया नहीं। मेरी व्यस्तता के कारण मैं भी गंभीरता से उसे डॉक्टर के यहाँ नहीं ले गया। मैंने उसे कहा कि घर के ही किसी व्यक्ति के साथ चली जाओ और पूरा चेकअप करवा लो, उसके अनुसार वह डॉक्टर के यहाँ जाकर आई। सिर्फ उसकी रिपोर्ट आनी बाकी थी। पार्टी की एक महत्त्वपूर्ण बैठक चल रही थी, तभी मुझे डॉक्टर शेखर सालकर का फोन आया, मैंने जल्दबाजी में फोन उठाया और शेखर ने कहा कि मेधा की ब्लड रिपोर्ट अच्छी नहीं है। आगे के समस्त चेकअप के लिए मेधा को तत्काल मुम्बई ले जाना पड़ेगा। मुझे कुछ सूझा ही नहीं। अगले ही दिन हम मेधा को मुम्बई ले गए। अभिजीत (मेरा बेटा) बहुत छोटा था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी माँ को लेकर हम कहाँ जा रहे हैं।

मुम्बई पहुँचने पर पता चला कि मेधा को ब्लड कैंसर है। पैरों के नीचे से जमीन सरकना किसे कहते हैं, यह उस क्षण जीवन में पहली बार मुझे पता चला। मेधा तो मेरे साथ ही रहेगी, उसे कभी कुछ नहीं होगा मैंने अपने मन में ऐसा गृहीत भाव रखा हुआ था। सभी लोग ऐसा ही मानकर तो चलते हैं। लेकिन अचानक पता चला कि केवल अगले कुछ ही माह, कुछ ही दिन बाद शायद वह न रहे, इस विचार मात्र ने मुझे भीषण रूप से बेचैन कर दिया। मुम्बई में ही उसका उपचार चालू हुआ। परन्तु एक माह से पहले ही उसका निधन हो गया। देखते ही देखते वह मुझे छोड़कर चली गयी। वह थी, इसीलिए मुझे कभी अपने बच्चों की चिंता नहीं थी, परन्तु अब अचानक मुझे बच्चों की भी चिंता होने लगी। उत्पल तो फिर भी थोड़ा समझदार हो गया था, परन्तु अभिजीत को यह सब कैसे बताऊँ यह मुझे समझ नहीं आ रहा था।

मेधा के जाने का सबसे बड़ा धक्का अभिजीत को ही लगा। उसने अपनी माँ को उपचार के लिए विमान से मुम्बई जाते हुए देखा था, लेकिन विमान से उसकी माँ का शव ही वापस आया। अभिजीत के बाल-मन पर इसका इतना गहरा प्रभाव हुआ कि उसने लम्बे समय तक मुझे विमान से यात्रा ही नहीं करने दिया। उसके मन में कहीं गहरे यह धँस गया था कि विमान से जाने वाले व्यक्ति की लाश ही वापस आती है। उन दिनों अभिजीत को संभालना बहुत कठिन कार्य था। ऊपर ही ऊपर कठोर निर्णय लेने वाला राजनीतिज्ञ यानी मैं, अन्दर ही अन्दर पूरी तरह से टूट चुका था। राजनैतिक व्यस्तताओं एवं जिम्मेदारियों ने मेरा दुःख कुछ कम किया और मैं स्वयं को अधिक से अधिक काम में झोंकने लगा।

मेरा और मेधा का प्रेमविवाह हुआ था। मेधा मेरी बहन की ननद थी, इसलिए मैं अपनी बहन के विवाह के समय से ही उसे पहचानता था। मैं आईआईटी मुम्बई पढ़ने गया। पढ़ाई के अगले कुछ वर्ष मेरा ठिकाना IIT मुम्बई ही रहा। बहन मुम्बई में ही थी। पढ़ाई के दौरान IIT में पूरा सप्ताह तो पता ही नहीं चलता था कि कैसे निकल गया, परन्तु रविवार को घर के खाने की याद तीव्रता से सताती थी। स्वाभाविक रूप से बहन के मेरे यहाँ साप्ताहिक फेरे लगने लगे। इन्हीं दिनों वहाँ एक लम्बे बालों वाली, उन बालों में गजरा-वेणी लगाने वाली एक घरेलू सी लड़की ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। धीरे-धीरे हमारी मित्रता हो गई। चूँकि, उसे पढ़ने का बहुत शौक था, इसलिए हमारी चर्चाएँ अक्सर अध्ययन अथवा सामाजिक-देश संबंधी विषयों पर होती थीं। मुझे भी पता नहीं चला कि कब मैं उसके प्रेम में पड़ गया। चूँकि, लड़की रिश्तेदारी में ही थी, परिजनों ने देखी हुई थी, इसलिए इस प्रेमविवाह का विरोध होने का सवाल ही नहीं उठा।

मुम्बई IIT से निकलने के बाद मैंने कुछ दिन वहीं नौकरी की। लेकिन मुझे नौकरी में रूचि नहीं थी, मुझे अपनी फैक्ट्री शुरू करनी थी। नौकरी छोड़ते समय ही मैंने मेधा से विवाह करने का निर्णय लिया। सभी को घोर आश्चर्य हुआ, क्योंकि सामान्यतः मध्यम वर्गीय मराठी परिवारों में ऐसा ही होता है कि नौकरी मिले, जीवन में थोड़ी स्थिरता आए, तभी शादी का विचार किया जाता है। ऐसे समय नौकरी हाथ में न हो और मैं विवाह करूँ यह सभी के लिए कुछ अटपटा सा था। लेकिन मेरी माँ मेरे निर्णय से सहमत थी। उसने कहा, “..मनु अगर तूने यह निर्णय लिया है तो सोच समझकर ही लिया होगा…” एक बेहद सादे समारोह में हमारा विवाह हुआ। मैंने गोवा जाकर अपनी फैक्ट्री शुरू करने का निर्णय लिया था और मेधा इस निर्णय में मेरे साथ थी। उसी के कारण मैं इतना बड़ा कदम उठाने की हिम्मत जुटा सका था। मुम्बई के गतिमान और व्यस्त जीवनशैली से निकलकर मेधा हमारे गोवा के म्हापसा स्थित घर में रम गई। धीरे-धीरे वह म्हापसा के सामाजिक उपक्रमों में भी सहभागी होने लगी। मैंने म्हापसा के पास ही एक फैक्ट्री शुरू की थी, उसका बिजनेस भी जमने लगा था। संघ के संचालक के रूप में भी मेरी जिम्मेदारी थी। इसके बाद अधिक समय बचता ही नहीं था, लेकिन मेधा उत्पल और अभिजात की जिम्मेदारी बखूबी संभाल रही थी। यानी एक तरह से जीवन एक स्थिर स्वरूप में आने लगा था।

गोवा आने के बाद कुछ ही दिनों में मुझे “संघचालक” की जिम्मेदारी दी गई। घर के सभी लोग संघ के कार्य में लगे ही थे, परन्तु मैं राजनीति की तरफ जाऊँगा ऐसा मुझे या उन्हें कभी नहीं लगा। 1994 के चुनावों में भाजपा की तरफ से उम्मीदवार की खोजबीन जारी थी। संघ ने मुझे उम्मीदवार चुनने का कार्य दिया था। अनेक लोगों से इंटरव्यू और भेंट करने के बाद मैंने कुछ नाम समिति के पास भेजे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। मैंने जिनके नाम चुनाव समिति को भेजे थे, उन सभी ने आपस में एकमत होकर मेरा ही नाम उम्मीदवार के रूप में पेश कर दिया। मेरे लिए और मेधा के लिए भी यह एक झटके के समान ही था। 1994 में मेरी राजनैतिक पारी शुरू हुई। मेरे लिए पणजी विधानसभा क्षेत्र चुना गया। भाजपा का गठबंधन महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी से था, लेकिन मुकाबला कड़ा था, इसलिए चुनाव प्रचार में मेधा के साथ मेरे माता-पिता भी जुट गए थे। यह मेरे लिए उनका पहला और अंतिम चुनाव प्रचार था। राज्य की राजधानी का मैं प्रतिनिधि चुना गया और इस प्रकार मेरे जीवन का अलग चरण आरम्भ हुआ।

राजनीति के कामों ने मुझे और भी अत्यधिक व्यस्त बना दिया। सब कुछ इतना अचानक घटित होता चला गया कि विचार करने का समय ही नहीं मिला। मेधा उन दिनों कुछ बेचैन रहती थी। फैक्ट्री चलाने और उसकी व्यावसायिक गतिविधियों के नुकसान को लेकर उसने चिंता जताई। मुझे भी पूर्णकालिक राजनीति पसंद नहीं थी, मैंने मेधा से वादा किया कि केवल दस वर्ष ही मैं राजनीति में रहूँगा और उसके बाद अपनी फैक्ट्री और बिजनेस पर ध्यान केंद्रित करूँगा। लेकिन समस्याएँ बताकर थोड़े ही आती हैं। राजनीतिक जीवन में प्रवेश करते ही कुछ दिनों में हृदयाघात से पिताजी का निधन हो गया। मानो घर का मजबूत आधार स्तंभ ही ढह गया। इस दुःख से बाहर भी नहीं निकल पाया था कि माताजी का भी स्वर्गवास हो गया। ईश्वर ने मानो मेरी परीक्षा लेने की ठान रखी थी।

माताजी के दुःख से उबरने के प्रयास में ही मेधा की बीमारी सिर उठाने लगी थी, यानी संकट एक के बाद एक चले ही आ रहे थे। उधर राजनैतिक जीवन में यश और सफलता की सीढ़ियाँ बिना किसी विशेष प्रयास के चढ़ता जा रहा था, लेकिन इधर एक-एक करके “मेरे अपने” मुझसे जुदा होते जा रहे थे। यदि मेधा जीवित रहती तो शायद उसे राजनीति छोड़ने वाला दिया हुआ वचन निभाया होता, लेकिन उसके न रहने के बाद मैंने खुद को राजनीति में पूरा ही झोंक दिया। अनेक लोग मुझसे पूछते हैं कि आप 24 घंटे काम क्यों करते हैं? लेकिन मैं भी क्या करूँ, जिसके कारण मैं राजनीति छोड़ने वाला था अब वही नहीं रही। परन्तु मेधा को दिए हुए वचन का आंशिक भाग मैंने पूरा किया, अपनी फैक्ट्री की तरफ अनदेखी नहीं की। आज भी मैं चाहे जितना व्यस्त रहूँ, दिन में एक बार फैक्ट्री का चक्कर जरूर लगाता हूँ और खुद भी वहाँ कुछ घंटे काम करता हूँ।

हाल ही में रक्षामंत्री बनने के बाद मेरी षष्ठीपूर्ति (60 साल की आयु पूरी होने पर) के अवसर पर कार्यकर्ताओं ने मेरे लिए एक सम्मान समारोह रखा था। इस कार्यक्रम में केन्द्रीय स्तर के सभी नेता और मित्र मौजूद थे। अपने शुभकामना भाषण में एक कार्यकर्ता ने (जिसे मालूम नहीं था कि मेधा अब इस दुनिया में नहीं है) कहा कि, “सर, आपने भी कभी ये गाना गाया होगा…. हम जब होने साठ साल के, और तुम होगी पचपन की…”, यह सुनते ही मेरी आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसमें उस बेचारे कार्यकर्ता की कोई गलती नहीं थी। अगले ही क्षण मेधा का मुस्कुराता हुआ चेहरा मेरे सामने आ गया। मैं तो साठ साल का हो चुका था, लेकिन जो पचपन की होने वाली थी वह मेरा साथ छोड़ चुकी थी। आज मेरे पास लगभग सब कुछ है, लेकिन जिसका साथ हमेशा के लिए चाहिए था, अब वही नहीं रही…”


सन्दर्भ :- मराठी पत्रिका “ऋतुरंग” दिवाली अंक 2017
मूल मराठी लेखक :- मनोहर पर्रिकर
अनुवाद :- Suresh Chiplunkar

13 साल की दलित से गैंगरेप, वीडियो बना किया वायरल: भाई ने देखा तो कराया FIR, 5 मुस्लिम युवक गिरफ़्तार

उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर से एक ऐसी चौंकाने वाली ख़बर आई है, जिसे उचित मीडिया कवरेज नहीं मिला। यहाँ कुछ मुस्लिम युवकों ने एक 13 वर्षीय नाबालिग छात्रा का तब सामूहिक बलात्कार किया, जब वह शौच के लिए घर से निकली थी। इतना ही नहीं, मुस्लिम युवकों ने गैंगरेप का वीडियो भी बना कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। इस नृशंस अपराध का मामला लगभग एक महीने बाद प्रकाश में तब आया जब उक्त किशोरी के भाई ने वीडियो को सोशल मीडिया पर देखा। रतनपुरी थाना क्षेत्र के तितावी में हुई इस घटना को लेकर इलाक़े में तनाव बना हुआ है।

हिंदुस्तान अख़बार के स्थानीय संस्करण में छपी ख़बर

स्थानीय अख़बारों में छपी ख़बर के अनुसार, उक्त किशोरी देर शाम शौच के लिए घर से बाहर निकली थी। वह पाँचवी कक्षा की छात्रा है। कुछ मुस्लिम युवकों ने सुनसान जगह देख कर उसे जबरन उठा लिया और खाली पड़े एक मकान में ले गए। उसी मकान में उन्होंने इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया। हथियार व तमंचे से लैस मुस्लिम युवकों के सामने दलित किशोरी की एक न चली और चिल्लाने के बावजूद सुनसान जगह होने के कारण उसकी आवाज़ किसी ने नहीं सुनी।

दैनिक जागरण के स्थानीय संस्करण में छपी ख़बर

अपराध को अंज़ाम देने के बाद अपराधी किशोरी को बदहवास अवस्था में छोड़ कर फरार हो गए। डर व लोक-लाज के कारण पीड़िता ने अपने घर में किसी को इस घटना की जानकारी नहीं दी थी। जब उसके भाई ने वायरल हुए वीडियो को देखा तो अपने पिता के साथ थाने में इस मामले की शिकायत की। जिसके बाद किशोरी को मेडिकल परिक्षण के लिए भेज दिया गया। पुलिस ने मामले का संज्ञान लेते हुए बलात्कार के पाँचों आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया है। वो मोबाइल भी बरामद कर लिया गया है, जिससे घटना के वक्त वीडियो बनाया गया था। गिरफ़्तार युवकों के नाम दानिश, माज उमामा, फरीद और सबूर हैं। उमामा के पास से तमंचा व हथियार भी बरामद किए गए हैं।

बलात्कार के आरोपित मुस्लिम युवकों द्वारा सोशल मीडिया पर वायरल की गई गैंगरेप की क्लिप को गाँव में भी कई लोगों ने देखा। अपराधियों पर पॉस्को एक्ट, एससी-एसटी एक्ट और आईटी एक्ट के तहत मुक़दमे दर्ज किए गए। हिंदुस्तान अख़बार में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, कुछ दिनों पूर्व हुई इस वारदात के बाद आरोपितों ने किशोरी को ब्लैकमेल भी किया था।

अमर उजाला के स्थानीय संस्करण में इस ख़बर के बारे में विस्तृत जानकारी

सभी अपराधियों ने मिलकर पीड़िता के परिजनों को धमकाया भी था। पीड़िता को जान से मारने की धमकी भी दी गई। क्षेत्र में तनाव की स्थिति होने के कारण अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है।

मोदी लहर बरकरार, बहुमत के साथ केंद्र में फिर लौटेगी मोदी सरकार: टाइम्स नाउ-VMR सर्वे

इस बार लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल से 19 मई तक सात चरणों में होने तय हुए हैं। ऐसे में चुनाव के पहले चरण की तारीख़ आने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। 2019 में सत्ता को लेकर हर पार्टी अपने-अपने दावे कर रही है, लेकिन आख़िरी नतीजे क्या होंगे यह तो 23 मई को ही मालूम पड़ेगा। उससे पहले लोगों की जिज्ञासा को कुछ हद तक शांत करने करने के लिए टाइम्स नाउ द्वारा एक सर्वे कराया गया है। जिसके निष्कर्ष बताते हैं कि इस बार भी लोगों का मूड एनडीए सरकार को ही सत्ता में लाने का है।

पाकिस्तान के बालाकोट में हुए हमले के बाद यह सबसे बड़ा सर्वे है। जिसका उद्देश्य ये जानना था कि क्या इस बार एनडीए सरकार को दूसरा कार्यकाल संभालने का मौक़ा मिलेगा? क्या नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे? हालाँँकि, इस सर्वे के मुताबिक 2014 में चली मोदी लहर के मुकाबले इस बार एनडीए के हिस्से में कम सीटें आती दिख रही हैं, लेकिन बावजूद इसके जीत एनडीए की ही होगी।

सर्वे के मुताबिक एनडीए को 543 में से 283 सीटें मिलने का अनुमान है, वहीं यूपीए केवल 135 सीटों पर सिमट जाएगी। इसके साथ ही इस सर्वे में ये बात भी निकलकर सामने आई कि दक्षिण भारत में एनडीए का जादू कुछ खास नहीं चल पाएगा, लेकिन बंगाल में बीजेपी को बढ़त प्राप्त होगी। इसके अलावा नार्थ इस्ट और हिंदी पट्टी वाले राज्यों में बीजेपी का दबदबा खासा कायम रहने वाला है। सर्वे बताता है कि भाजपा की पकड़ हिन्दी पट्टी राज्यों में बेहद मज़बूत है और सहयोगी दलों के बहुमत का आँकड़ा छूने के आसार भी नज़र आ रहे हैं।

यूपी में हुए सर्वेक्षण के अनुसार भाजपा अपना 2014 वाला जादू बरकरार रखने में असफल दिखाई पड़ रही है, क्योंकि 2014 में भाजपा का 43.3 फीसदी वोट साझा था और सहयोगियों के साथ मिलकर भाजपा ने 73 सीटें जीती थीं, लेकिन लग रहा है इस बार बीजेपी को केवल 42 सीटों पर ही संतुष्ट होना पड़ेगा। हालाँकि जीत तब भी बीजेपी की ही तय होने का अनुमान है, क्योंकि महागठबंधन के खाते में 36 और कॉन्ग्रेस के खाते में केवल 2 सीटें आ सकती हैं।

जैसा कि हमने बताया कि सर्वे के अनुसार बीजेपी और एनडीए को सत्ता वापसी कराने में हिंदी पट्टी के राज्य काफ़ी मददगार साबित होंगे। सर्वे कहता है कि दिल्ली की 7 सीटों पर बीजेपी का कब्जा होगा, जबकि मध्य प्रदेश के 29 में से 22 सीटों पर बीजेपी के जीतने के और राजस्थान में 25 में से 20 सीटें जीतने के अनुमान हैं।

काफी अड़चनें आने के बाद भी बीते कुछ दिनों से पश्चिम बंगाल में बीजेपी खुद को मज़बूत दिखाने में जुटी हुई है। ऐसे में यह सर्वे बीजेपी के लिए खुशखबरी लेकर आया है। अगर यह अनुमान हक़ीक़त में बदलते हैं, तो भाजपा को 32 फीसदी वोट शेयर और 11 सीटें प्राप्त हो सकती है। जबकि कॉन्ग्रेस और लेफ्ट का खाता खुलना न के बराबर नज़र आ रहा है।

बिहार में मोदी की लहर का जादू बरकरार है। 2014 में जहाँ पूरा चुनाव एकतरफा नज़र आ रहा था, वहीं हल्की फेर-बदल के साथ स्थिति वैसी ही हैं। 2014 में बिहार में बीजेपी को 51.5% वोट शेयर के साथ 30 सीटें मिली थी, जबकि 2019 में 48.40 वोट शेयर के साथ 27 सीटें मिलने का अनुमान है। वहीं यूपीए को चुनावों में 42.40 फीसदी वोट शेयर और 13 सीटें मिल सकती हैं।

दक्षिण राज्यों जीत हासिल करने की हर संभव कोशिशें बीजेपी द्वारा की जा रही है, लेकिन सर्वें के आधार पर इन सीटों पर भाजपा को फायदा मिलता नहीं दिख रहा है। 2014 में भी भाजपा को यहाँ से निराशा हाथ लगी थी और टाइम्स नाउ के सर्वे के मुताबिक इस बार भी परिस्थितियाँ पहले के मुकाबले बहुत बेहतर होती नहीं दिख रही हैं। तेलंगाना में टीआरएस के जीतने की संभावनाएँ हैं, क्योंकि यहाँ सर्वे भी उसे 17 में 12 सीट देता दिखा रहा है।

वहीं आन्ध्र प्रदेश में कॉन्ग्रेस को पिछले चुनावों में 8 सीटों पर जीत हासिल हुई, लेकिन इस बार यह आँकड़ा 22 सीटों के साथ जीत तक पहुँच संभव है। बता दें कि इससे पहले भी टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक मेगा पोल किया था जिसके नतीजों ने दर्शाया था कि इस बार बीजेपी को क़रीब 84 प्रतिशत लोग वापस सत्ता में लाना चाहते हैं।

हिन्दूफोबिया टपकता है हसन मिन्हाज के शो से

सोशल मीडिया पर कहीं पढ़ा था कि इस्लाम ने नरसंहार-पर-नरसंहार करते जाने और खुद को नफ़रत और असहिष्णुता का पीड़ित दिखाने की जुड़वाँ कला (twin arts) सदियों में परिष्कृत की है।

‘भारतीय’-अमेरिकी “मजहबी” (यह वह खुद लगाते हैं, हम नहीं) कॉमेडियन हसन मिन्हाज के नेटफ्लिक्स कॉमेडी शो ‘पैट्रियट एक्ट’ का भारतीय चुनावों पर एपिसोड इसी की तस्दीक करता है।

झूठ, प्रोपेगैंडा, अर्ध-सत्य, एकतरफा नैरेटिव बुनने की कोशिश- हसन मिन्हाज समुदाय विशेष

chutzpah यह कि हाँ, हाँ, हम तो समुदाय वाले हैं, इसलिए हमें तो बोलना ही नहीं चाहिए इन मुद्दों पर, वर्ना हम पाकिस्तान के एजेंट घोषित हो जाएँगे। गोया आपके घर कोई चोरी करे और उसके बाद बोले हाँ, हाँ, अब तो हमें चोर बोलोगे ही!

ओपनिंग ही विक्टिम-कार्ड से

शो शुरू करने से पहले ही हसन मिन्हाज वीडियो क्लिप्स चलाते हैं जिनमें उनके शुभचिंतक उन्हें भारतीय राजनीति पर न बोलने की सलाह देते हैं। एक मित्र तो उनसे कहते हैं कि ‘बाहर बहुत गंदगी है वहाँ, तुम अगर उन पर बोलोगे तो वही गन्दगी तुम पर आ जाएगी।’ उनके शो को देखकर यह साफ़ पता चलता है कि वह गंदगी हिदुत्व या हिन्दू धर्म को ही कह रहे हैं। ठीक भी है- जब इस्लाम काफ़िरों को इन्सान ही ‘काबिल-ए-क़त्ल’ मानता है तो आत्माभिमानी काफ़िर हिन्दू जाहिर तौर पर इन्सान नहीं, गंदगी ही बचेगा।

एयरस्ट्राइक पर पाकिस्तान का पक्ष, भारत का मखौल

हसन मिन्हाज शुरू से भारत सरकार को विलेन के तौर पर पेश करते हैं। वह बताते हैं कि ‘भारत सरकार मुकदमा कर देगी’ के डर से वह कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं दिखा सकते- यानि अगर डर न होता तो दिखा देते कि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है, है न?

उसके बाद वह बताते हैं कि कैसे दूसरों के कश्मीर के नक़्शे धुंधले कराते-कराते भारत के खुद के नक़्शे धुंधले हो गए और इसीलिए भारतीय वायुसेना आतंकवादियों को मारने की जगह पेड़ों पर बम गिरा आई। Chutzpah इसी को कहते हैं- आप पाकिस्तान की बोली भी बोलिए, और पाकिस्तान-समर्थक, जिहाद-समर्थक कहे जाने से बचने के लिए खुद ही यह ‘भविष्यवाणी’ कर दीजिए कि अब आपको पाकिस्तान का एजेंट करार दिया जाएगा।

असहिष्णुता का प्रोपेगैंडा, माइनॉरिटी होने पर भी इस्लामी एकाधिकार

हसन बताते हैं कि मोदी के आने के बाद से भारत अल्पसंख्यकों के प्रति ज़्यादा आक्रामक हो गया है। न केवल यह साफ झूठ है बल्कि इस्लाम की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति को भी वो एक बार फिर उजागर करते हैं।

उनके लिए ‘माइनॉरिटी’ केवल प्यारे, शांतिप्रिय समुदाय वाले ही हैं- जो न मंदिर तोड़कर मस्जिदें बनाते हैं, न मज़हब के आधार पर 4 शादियों के विशेषाधिकार से लेकर कमलेश तिवारी का सर कलम करने तक की माँग रखते हैं, और न ही नाम बदल-बदल कर हिन्दू लड़कियों से धोखे से शादी करने और उनका मज़हब बलात् बदलने का प्रयास करते हैं।

हसन मिन्हाज की माइनॉरिटी की परिभाषा में न तो बौद्ध, जैन, सिख आते हैं, और न ही भारत में बाहर से आए और शांति से रह रहे पारसी और यहूदी। क्योंकि माइनॉरिटी की परिभाषा और उसका समूचा फायदा ऐंठने पर भी हिन्दुओं/मूर्तिपूजकों को नीचा देखने वाले ईसाईयों व समुदाय विशेष का ही तो एकछत्र अधिकार है न?

केवल अल्पसंख्यक मंत्रालय के अंतर्गत अल्पसंख्यकों के लिए खास तौर उन्हें सिविल सर्वेंट बनाने के लिए ‘नई उड़ान’ योजना लाई गई, उनके हुनर को सलामत रखने के लिए ‘हमारी धरोहर’ योजना शुरू की गई, स्कूल ड्रापआउट्स के लिए ‘नई मंजिल’ योजना लाई गई।

इसी कालखण्ड में हिन्दुओं ने सबरीमाला और शनि शिगनापुर मंदिर खो दिए, केवल और केवल हिन्दुओं द्वारा संचालित स्कूलों पर लागू आरटीई आज भी बदस्तूर जारी है, संविधान की धारा 25-30 हमें मज़हबी प्रताड़ना और सरकारी हस्तक्षेप से नहीं बचाती- अगर मोदी सरकार से किसी को मज़हबी तौर पर नाराज़ होना चाहिए तो हिन्दुओं को, न कि आपके जैसे उन कट्टरपंथियों को जिनका हिंदुस्तान से कोई लेना-देना ही नहीं है।

पंथनिरपेक्षता का झूठ, हिन्दुओं में हज़ारों वर्णों का झूठ

“सेक्युलरिज्म भारत के संविधान में प्रतिष्ठापित है”। साफ झूठ।

भारत के संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने जबरन उस समय ठूंसा था जब हिंदुस्तान में लोकतंत्र नहीं था, आपातकाल था।

इसके विपरीत जिस हिन्दू-धर्म/हिंदुत्व को आप गंदगी, ‘आक्रामक’, व ‘अल्पसंख्यक-विरोधी’ कहते हैं, उसी हिंदुत्व ने भारत में समुदाय विशेष वालों सहित सभी मज़हबों और आस्थाओं के लोगों को हज़ारों साल पनाह दी। उस समय न संविधान था न संविधान में लिखा हुआ ‘सेक्युलरिज्म’। इसके बावजूद लाखों लोगों की हत्या और बलात्कार के बाद भी, हज़ारों मंदिरों के तोड़े और जलाए जाने के बाद भी हिन्दू और हिंदुस्तान ने समुदाय विशेष को अपने बीच बनाए रखा।

हसन मिन्हाज का अगला झूठ था कि हिन्दू समाज “हज़ारों वर्णों” में बँटा हुआ है। और उनके झूठ की तस्दीक खुद उनकी स्क्रीन पर ‘ब्राह्मण’, ‘क्षत्रिय’, ‘वैश्य’, ‘शूद्र’ (और साथ में ‘दलित’) को हाईलाईट करना करता है। साफ पता चलता है कि मकसद खाली हिन्दू समाज को बँटा हुआ दिखाकर और बाँटने की ज़मीन तैयार करना है।

हसन भारत को ‘दुनिया की सबसे विभिन्नता भरी जगहों में से एक’ तो बताते हैं, पर यह गोल कर जाते हैं कि यह विभिन्नता ‘गंदे’, काफ़िर हिंदुत्व/हिन्दू धर्म के चलते है। उनके प्यारे इस्लाम में तो एक अल्लाह की सरपरस्ती न मानने वाले को जहन्नुम में भेजने का वादा भी है और उसे जल्दी-से-जल्दी जहन्नुम के लिए रवाना कर देने के लिए जिहाद का हुक्म भी। यह काफिर हिन्दुओं का “एकं सद् विप्रैः बहुधा वदन्ति” ही है, जिसने हिंदुस्तान में आपकी प्यारी ‘डाइवर्सिटी’ को जिंदा रखा है।

कश्मीर, गुजरात दंगों पर फिर से प्रोपेगैंडा

कश्मीर की ‘त्रासदी’ का ज़िक्र करते हुए हसन मिन्हाज भूल कर भी उन कश्मीरी पण्डितों का ज़िक्र नहीं करते जिन्हें तीस साल पहले अपनी औरतों का बलात्कार और मासूम बच्चों का बेरहमी से कत्ल दिखाने के बाद अपने घरों से दरबदर कर दिया गया था।

हसन वामपंथियों के उस पसंदीदा विषय को भी उठाते हैं जिसे हिंदुस्तान के वामपंथियों ने उठाना बंद कर दिया है क्योंकि पता है कि उस झूठ से मोदी को फायदा ही हो रहा है- 2002। वह ‘मोदी ने 2002 में कुछ नहीं किया’ का रोना तो रोते हैं पर यहाँ इसकी साँस-डकार भी नहीं लेते कि 2002 के दंगों के पीछे कारक 60 बेकसूर, निहत्थे, अहिंसक कारसेवकों को इस्लामी भीड़ द्वारा जिन्दा जला दिया जाना था।

नोटबंदी पर वह ‘गरीबों को बड़ी तकलीफ हुई’ का रोना रोते हैं पर यह भूल जाते हैं कि उन्हीं गरीबों ने कुछ ही हफ़्तों बाद भाजपा को उत्तर प्रदेश में प्रचण्ड बहुमत दिया।

असम में वह भाजपा पर ‘प्रवासियों’ से नागरिकता छीनने का आरोप लगाते हैं। शायद अमेरिका में अवैध प्रवास की राजनीति करते-करते वो भूल गए हैं कि हिंदुस्तान के काफ़िर गैरकानूनी तरीके से आने वालों को ‘प्रवासी’ नहीं घुसपैठिया कहते हैं।

आदित्यनाथ, दलितों, लिंचिंग पर फिर झूठ

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ तो उनका झूठ ऐसा है कि लगता है उनका खुद बोलने का मन नहीं, ज़बरदस्ती बुलवाया जा रहा है। रजत शर्मा से आदित्यनाथ के इंटरव्यू का वीडियो चलता है। रजत शर्मा पूछते हैं कि योगी को, सन्यासी को असलहों का क्या काम? आदित्यनाथ जवाब देते हैं कि उनकी शिक्षा शस्त्र और शास्त्र दोनों में हुई है।

हसन मिन्हाज इस वार्तालाप का साफ़ तौर पर झूठा अनुवाद करते हैं। वे कभी इसे हथियारों का साम्य ध्यान लगाने से जोड़ना बताते हैं तो कभी हथियारों और अनुशासन की एकता का दावा करने का आरोप आदित्यनाथ पर लगाते हैं।

काफ़िरों के बारे में यहाँ पर हसन मिन्हाज को एक बात बता देना ज़रूरी है। हम काफ़िरों के ‘गंदे’ धर्म हिंदुत्व में आदित्यनाथ जिस नाथ संप्रदाय से आते हैं, उसकी परंपरा ही शस्त्र और शास्त्र में साम्य बिठाकर चलने की रही है। और नाथपंथी योगियों का हथियार उठाना भी सामान्यतः हसन मिन्हाज के ‘पाक’ इस्लाम के हमलों और कत्ले-आम के खिलाफ रहे हैं।

और हम ही क्यों, शस्त्रधारी योगियों की परंपरा जापानी और चीनी काफ़िरों की भी रही है।

आदित्यनाथ पर वह मुगलकालीन नामों वाली जगहों का नाम हिन्दू कर देने का आरोप लगाते हैं। पर यह नहीं बताते कि उन जगहों के पहले हिन्दू ही नाम थे, जिन्हें तलवार की नोक पर इस्लामी शासकों ने बदला था।

दलितों और लिंचिंग पर वह दो झूठ बोलते हैं:

  1. दलित समुदाय विशेष की तरह एक ‘अल्पसंख्यक’ समुदाय हैं
  2. लिंचिंग की घटनाएँ मोदी के आने के बाद से हो रहीं हैं

दलित हिन्दू हैं या नहीं यह तो उन्हें जाकर दलितों से ही पूछना चाहिए कि वे हिन्दू हैं या समुदाय विशेष की ही तरह अल्लाह के बन्दे। काफ़िर दलित वह जवाब देंगे कि हसन मिन्हाज याद ही रखेंगे। लिंचिंग की घटनाएँ मोदी के आने के बाद से हो रहीं हैं वाली झूठ के खिलाफ़ दो ही सबूत काफ़ी हैं- एक किसी अज्ञात स्रोत द्वारा इकट्ठा किया गया नमूना, और दूसरा अनीश्वरवादी, नोटावादी (यानि इन पर हिन्दू राष्ट्रवाद या राजनीतिक हित का आरोप नहीं लग सकता) वैज्ञानिक-लेखक आनंद रंगनाथन का यह ट्वीट, जो केवल 2013 की लिंचिंग की प्रमुख घटनाएँ इंगित करता है।

इस्लाम को सुधारने पर दीजिए ध्यान

हसन मिन्हाज जी, बेहतर होगा कि आप अपना समय हिन्दूफोबिया फैलाने की बजाय इस्लाम की एकाधिकारवादी, वर्चस्ववादी, मध्ययुगीन बर्बरता को मिटाने पर खर्च करें। कॉमेडी मैटर की वहाँ भी कमी नहीं है।

बाकी हर मज़हब समय के अनुसार बदल चुका है पर आपका दीन आज भी 1400 साल पुरानी मानसिकता की जंजीरों में जकड़ा है।

रही बात हिंदुस्तान के समुदाय विशेष वालों की, तो जो आधुनिक समय और मुख्यधारा के साथ बदल रहे हैं, कट्टरता छोड़ कॉमन सेन्स और सिविक सेन्स को अपना रहे हैं, वह हिंदुस्तान से बेहतर किसी मुल्क को नहीं मानते। अहमद शरीफ का यह लेख आपकी आँखें खोल देने के लिए काफी होना चाहिए।