नरेंद्र मोदी सरकार पर अभिव्यक्ति की आज़ादी ख़त्म करने का आरोप अक्सर लगता रहा है। यह आरोप लगाने वाले भी ज्यादातर या तो महागठबंधन वाले होते हैं या फिर महागठबंधन वालों के वैचारिक समर्थक ‘शैंपेन लिबरल्स’। और महागठबंधन के लिए महत्वपूर्ण बसपा द्वारा याकूब कुरैशी नामक कसाई, जिन्होंने पैगम्बर माने जाने वाले मुहम्मद का कार्टून बनाने वाले कार्टूनिस्ट का सर कलम करने के लिए ₹51 करोड़ का इनाम रखा था, को अपना मेरठ लोकसभा क्षेत्र का उम्मीदवार बनाया है।
बताते हैं कि यह केवल उनके गुस्से की क्षणिक अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि जब फ़्रांसीसी पत्रिका शार्ली हेब्दो के 8 पत्रकार सच में मार डाले गए (उन्होंने कार्टून बनाने वाले के समर्थन में वह कार्टून फिर से छापा था) तो याकूब कुरैशी ने अपना बयान दोहराया, और कहा कि वे अभी भी इनामी राशि उन कसाइयों (pun intended) को देने के लिए तैयार हैं।
और साक्षी महाराज- साध्वी प्राची के बयानों को देश में बढ़ती असहिष्णुता का सबूत मानने वाले शैम्पेन लिबरल्स आज चुप हैं।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं पर हिंसा का भी आरोपित
कसाई कुरैशी पर इसी फरवरी में पर्यावरण कार्यकर्ताओं के साथ भी हिंसा करने का आरोप लगा था। वह कार्यकर्ता पर्यावरण बचाने के लिए (जो कि शैम्पेन लिबरल्स के पसंदीदा विषयों में से एक माना जाता है) के लिए माँस संयंत्रों पर प्रतिबन्ध चाहते थे। पर्यावरण सुधार संघर्ष समिति के पीड़ित पदाधिकारियों ने यह आरोप लगाया कि उन पर हमला 20-25 लोगों ने किया, जिनमें कुरैशी के माँस संयंत्र के मैनेजर साहब भी थे। मैनेजर साहब हमले वाली जगह के आस-पास ही कहीं रहने वाले बताए गए। हमले से पहले समिति के लोगों को धमकी भी दी गई थी। 15 दिन पहले भी हमला किया गया था।
अवैध होने के कारण बंद हुआ था कसाईखाना, बेटे पर जमीन कब्जियाने का आरोप
कसाई कुरैशी का कत्लखाना बंद करने के पीछे अधिकारियों ने जो कारण बताए थे, उनमें सबसे बड़ा उसके कई हिस्सों का अवैध होना था। बिना कई हिस्सों का नक्शा पास हुए उस कसाईखाने में भैंसे काटे जा रहे थे। मेरठ का पर्यावरण वैसे ही कसाईखानों की भीड़ से चरमरा रहा था। लिहाजा कसाई कुरैशी का कत्लखाना बंद कर दिया गया। उसी मामले में उन कत्लखानों के दोबारा चालू किए जाने का विरोध कर रही पर्यावरण सुधार संघर्ष समिति के लोग हमले का शिकार बने।
इसके अलावा कसाई कुरैशी के बेटे पर भी अवैध तरीके से एक किसान की जमीन पर कब्जा करने का आरोप लगा था। पीड़ित की जमीन हथियाने के अलावा उसे जान से मार डालने की धमकी भी मिली थी।
लोकसभा चुनाव 2019 तारीख के नजदीक आते ही चुनावी तपिश और तेज हो गई है और इसके साथ ही नेताओं की बिरादरी इस चुनावी महासमर में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर वो कदम उठा रही है, जिससे मतदाताओं को लुभाया जा सके। इसको लेकर नेताओं की जुबानी तल्खियाँ भी बढ़ती जा रही हैं। ‘भारिप बहुजन महासंघ’ (बीबीएम) पार्टी के अध्यक्ष प्रकाश अंबेदकर विपक्षी नेताओं पर तो वार करते ही रहते हैं, मगर इस बार उन्होंने अपने संबोधन में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को भी नहीं छोड़ा।
संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेदकर के पोते प्रकाश अंबेदकर ने यवतमाल में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि अगर वो सत्ता में आते हैं तो चुनाव आयोग को कम से कम दो दिन के लिए जेल भेजेंगे। उन्होंने चुनाव आयोग का हवाला देते हुए कहा कि वो कहते हैं पुलवामा पर बात नहीं करनी चाहिए। लेकिन वो इस मुद्दे पर बात करेंगे, हमें इसके लिए संविधान ने अधिकार दिया है। प्रकाश अंबेदकर के इस बयान के बाद चुनाव आयोग ने प्रतिनिधि कार्यालय से इस संबंध में रिपोर्ट माँगी है। स्थानीय जिला निर्वाचन अधिकारी से इस संबंध में जल्द रिपोर्ट करने को कहा है। प्रकाश अंबेदकर के खिलाफ आईपीसी की धारा 503, 506 और 189 के तहत आपराधिक धमकी और एक लोक सेवक को धमकाने की वजह से मामला दर्ज किया गया है।
FIR registered against Prakash Ambedkar, Vanchit Bahujan Aaghadi (VBA) leader by EC over his statement “…Let our govt come to power, we will not spare the EC. We will keep them in jail for 2 days. The Commission is no more neutral. It is functioning as a BJP aide.” (file pic) pic.twitter.com/bWo19M9kCL
हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब प्रकाश अंबेदकर ने इस तरह का विवादित बयान दिया है। अंबेदकर ने पिछले साल अक्टूबर में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत पर हमला करते हुए दावा किया था कि उनके पास अवैध हथियार हैं और शस्त्र अधिनियम के तहत उनकी गिरफ्तारी होनी चाहिए। बता दें कि, प्रकाश आंबेडकर ‘वंचित बहुजन आघाडी’ (वीबीए) की टिकट पर महाराष्ट्र की सोलापुर और अकोला लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। ‘वंचित बहुजन आघाडी’ (वीबीए), अंबेदकर के नेतृत्व वाले ‘भारिप बहुजन महासंघ’ और असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली पार्टी ‘एआईएमआईएम’ का गठबंधन है।
गौरतलब है कि दलित नेता प्रकाश अंबेदकर ने कहा था कि उनका राजनीतिक मोर्चा महाराष्ट्र की सभी 48 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगा। उनके इस ऐलान से राज्य में कॉन्ग्रेस और राकांपा के भाजपा के खिलाफ ‘महागठबंधन’ बनाने की कोशिशों को झटका लगा था। अंबेदकर ने कहा कि भाजपा विरोधी गठबंधन में शामिल होने के लिए कॉन्ग्रेस के साथ कोई बातचीत नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन बनाने के लिए कई प्रस्ताव सामने आए, लेकिन उसमें रोड़े आ गए। हम महाराष्ट्र में सभी 48 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे।”
राहुल गाँधी मुझे कई कारणों से प्रिय हैं। वो न सिर्फ भाजपा के स्टार कैम्पेनर हैं, बल्कि राजनीति के सर्कस में लालू जैसे जोकरों की कमी को कुछ हद तक पूरा करते हैं। लालू तो खैर विदूषक था और अपना बोया, जेल में काट रहा है, लेकिन राहुल अभी तक सिर्फ काट ही रहे हैं, वो भी अपनी पार्टी का।
कई तरह की मशीनों, कई तरह के मेड इन xyz, कई तरह के किसान लुभावन योजनाओं के बाद अब राहुल गाँधी ने ग़रीबों को ‘न्याय’ दिलाने के लिए फटे कुर्ते के नीचे के पाजामे पर बेल्ट कस लिया है। बहन फ्री-यंका ने भी भाई की कलाई पर न्याय बाँधा है, और बाकी चाटुकार मंडली तो बता ही रही है कि कहाँ से, किसका, क्या काटा जाएगा इसके लिए।
राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस दोनों को ही बजट और जीडीपी की समझ नहीं है, या इतनी ज़्यादा समझ है कि वो यह मानकर चलते हैं कि आम आदमी को तो बिलकुल ही नहीं है। इस पर हमने कल एक रिपोर्ट बनाई थी जहाँ कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य पर जीडीपी का 9% ख़र्च करने की बात कही गई है। आपको लगेगा कि सही बात है, इतना तो होना ही चाहिए। बस, इसी ‘होना ही चाहिए’ का फायदा उठाकर धूर्त नेता लोगों को उल्लू बना जाते हैं।
भारत की जीडीपी लगभग ₹190 लाख करोड़ है, और इस बार का बजट ₹28 लाख करोड़ के लगभग। सीधा गणित लगाएँ, तो हमारा बजट जीडीपी का कुल 14.7% पर आता है। कॉन्ग्रेस चाहती है कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर 9% (₹17 लाख करोड़) ख़र्च होना चाहिए, मतलब बाकी के 5.7% (₹11 लाख करोड़) में रक्षा, कृषि, इन्फ़्रास्ट्रक्चर, सरकारी कर्मचारियों के वेतन, नदियों की सफ़ाई से लेकर जितने भी विभाग हैं, सब आ जाएँगे। मनरेगा, फ़ूड सिक्योरिटी, ग़रीबों के आवास, उनको मिलने वाली सब्सिडी आदि सब इसी 5.7% में।
जीडीपी और बजट को अगर सीधे तरीके से समझना है तो यह समझिए कि जीडीपी आपके घर, खेत, गाड़ी, गहने, बग़ीचे सबका का पूरा मूल्य है, जो कि एक करोड़ रुपया हो सकता है, लेकिन बजट आपके खेतों से होने वाली आमदनी और आपकी सैलरी ही है। या बग़ीचे के आम बेचने के बाद एडिशनल पैसा। मतलब ये कि आपके घर, कार और खेतों का मूल्य तो है, लेकिन उस स्थिति में जब आप उसे बेच रहे हों।
अब आपके घर का बजट वह पैसा है जो आप इन एसेट्स से होने वाली आमदनी और अपनी नौकरी से पाते हैं, जिसे आप अपने परिवार की बेहतरी के लिए ख़र्च करते हैं। तो मानिए कि आपके घर में तमाम स्रोतों से पंद्रह लाख रुपए आ रहे हैं। इसी में, कभी आपको बिटिया की पढ़ाई, बच्चे के इलाज या माताजी द्वारा नानी को गिफ्ट देने के लिए कुछ एक्स्ट्रा पैसों की ज़रूरत हो जाती है। फिर आप उधार लेते हैं।
यही उधार जब सरकार लेती है, तो उसकी आमदनी से ज्यादा होने वाले ख़र्च के कारण फिस्कल डेफिसिट यानी वित्तीय घाटा बढ़ता है। इस उधार पर सरकार को आप ही की तरह ब्याज देना पड़ता है जो अगले साल की आमदनी से कटता है। अगर आमदनी बढ़ेगी नहीं, तो आप अगले साल फिर पीछे रह जाएँगे। साथ ही, आदमी एक बार में कार बेच सकता है, खेत का एक टुकड़ा बेच सकता है, लेकिन वो पूरे जीवन में एक से दो बार ही, क्योंकि उसके बाद आपके पास कुछ होगा नहीं बेचने को। या घर बेचकर आप बेघर हो जाएँगे, परिवार सड़क पर आ जाएगा।
अब इसे भारत के परिप्रेक्ष्य में समझिए। राहुल गाँधी ने बजट की जगह जीडीपी को ख़र्च करने की बात कही है। अब देश के एसेट्स को तो आप एक या दो बार बेच सकते हैं, किसी सरकारी कम्पनी के प्राइवेटाइजेशन के ज़रिए कुछ पैसा पा सकते हैं, या आपको कहीं तेल या सोने का भंडार मिल जाए तो अचानक थोड़ा बूस्ट मिल सकता है, लेकिन जितनी बूस्ट राहुल गाँधी घोषणापत्र में बता रहे हैं, वो माइंड इज़ इक्वल टू ब्लोन टाइप का है। उसके लिए आपको घर बेचना पड़ेगा।
और देश के संदर्भ में घर का मतलब देश ही है। वैसे आम आदमी तो घर बेच लेगा… एक मिनट… तो राहुल गाँधी भी तो देश बेच सकते हैं! ये मैंने बिलकुल भी ख़्याल नहीं किया था। ख़ैर, कहने का मतलब यह है कि आप ख़र्च करने की बात तो खूब कह रहे हैं, चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं, लेकिन उसके लिए आप पैसे कहाँ से लाएँगे इस पर आप या आपके पित्रोदा, बनर्जी और राजन कुछ खास नहीं बता रहे।
एक ने कहा कि मिडिल क्लास को कमर कसनी होगी कि वो टैक्स ज़्यादा दे, एक ने कहा इनकम टैक्स बढ़ा देंगे, अब राहुल ब्रो कह रहे हैं कि ऐसा कुछ नहीं करेंगे। पैसा बैंकिंग सिस्टम के उन लोगों से आएगा जिन्होंने इसे डोमिनेट किया हुआ है। क़ायदे से इस स्टेटमेंट का कोई अर्थ नहीं निकलता क्योंकि राहुल गाँधी ने फिर से एक फर्जी बात कह दी है, लेकिन वो भूल गए कि बैंकिंग सिस्टम स्वयं ही बहुत बेहतर स्थिति में नहीं है, क्योंकि उनके माताजी की सरकार ने नीरव मोदी, विजय माल्या जैसे चोरों को हजारों करोड़ बाँटे।
ग़रीबों को राहुल गाँधी ‘न्याय’ योजना से पैसे देने की बात कह रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई क्रेडिबल सोर्स ऑफ इनकम इन्होंने नहीं बताया। ये बात बिलकुल ही अलग है कि नेहरू जी ने दो-चार सोने की खानें कहीं छुपा रखी हो, जिससे अचानक से जीडीपी तीन गुणा बढ़ जाए, तो न्याय के लिए पैसे निकल आएँगे। लेकिन, इसकी जानकारी मैनिफ़ेस्टो में नहीं है, तो मैं इस पर कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं हूँ।
फिर से बजट की बात करना चाहूँगा क्योंकि जनसामान्य के लिए ये एक कॉम्प्लेक्स विषय की तरह पेश किया जाता है। मान लीजिए कि देश में टैक्स और अन्य स्रोतों से सौ रुपए आते हैं, तो ख़र्च भी उन्हीं सौ में से होंगे। अब अगर, आपने कोई नई स्कीम लाने की कोशिश की तो उसके ख़र्चे के लिए रुपए तो सौ ही हैं, योजनाएँ पहले दस थीं, अब हो गई ग्यारह। मतलब बाकी की योजना से पैसे काट कर, नई में लगाई जाएगी, या फिर आमदनी बढ़ाने की कोशिश होगी।
आमदनी बढ़ाने के लिए टैक्स बढ़ाना होगा, चाहे लोगों पर हो, या वस्तुओं पर। दोनों ही स्थिति में भार वापस आम आदमी पर ही पड़ेगा। ऐसा नहीं है कि बैंकिंग सिस्टम में पैसा रखा हुआ है, और सरकार जब चाहे निकाल लेगी। राहुल गाँधी को यही लगता है कि इतने बैंक हैं, वहाँ से पैसे ले लेंगे। राहुल गाँधी ऐसा सोच सकते हैं, क्योंकि वो राहुल गाँधी हैं।
बैंक के पास जब आप पैसे जमा करते हैं तो बैंक आपके पैसे को कहीं और लगाती है। वो किसी को ब्याज पर देती है, कहीं अपने व्यवसाय में लगाती है, जिससे उसे आमदनी होती है और आपको बैंक अपनी आमदनी का एक हिस्सा देती है। हमारे या आपके जैसे लोग दस-दस हजार जमा करते हैं, तो सौ लोगों का पैसा दस लाख बनकर बैंक के पास जाता है, जिसे बैंक किसी बड़े उद्योग में लगाती है। फिर उस उद्योग का फायदा, कुछ बैंक अपने पास रखती है, कुछ हमें देती है।
अब, जैसे कि कॉन्ग्रेस ने लोन माफ़ी की बात कर दी। लोन बैंक ही देती है, और सरकार ने उसके पैसे अब डुबा दिए। अब बैंक उस घाटे को, अगर ब्याज न भी ले, कहाँ से पूरा करेगी? बैंक अपने फायदे से उसे पाटने की कोशिश करेगी, या सरकार उसका घाटा सहेगी। दोनों ही स्थिति में फ़र्क़ किसे पड़ेगा? आम आदमी को। बैंक ने सहा, तो वो घाटे में जाएगी और अपना घाटा हमारी जेब तक कम ब्याज के रूप में पहुँचाएगी। अगर सरकार ने सहा, तो ज़ाहिर है कि किसी और सेक्टर का पैसा कृषि की लोनमाफी पर जाएगा, तो वो सेक्टर इससे प्रभावित होगा।
राहुल गाँधी को ऐसा नहीं लगता। राहुल गाँधी को लगता है कि बैंक में पैसा होता है, जिसे निकाला जा सकता है। इसलिए उन्होंने ये कह दिया कि न्याय योजना का पैसा बैंकों से आएगा। फिर से, यह भी ध्यान रहे कि भारत के जीडीपी में ये बैंक भी आते हैं। मतलब, जो है, सीमित है। जीडीपी ग्रोथ की जब बात होती है तो वो एक तय तरीके से बढ़ती है क्योंकि भारत के लोग या उद्योग (सरकारी या प्राइवेट) सरकार की नीतियों के दायरे में बढ़ते हैं।
इसलिए, जीडीपी में अचानक से उछाल नहीं आता। चूँकि, जीडीपी में अचानक से उछाल नहीं आता, तो बजट के लिए सरकार के पास आने वाली आमदनी में भी, अचानक से वृद्धि नहीं हो सकती। दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक को छेड़ने के लिए, दूसरे को भी छेड़ना पड़ेगा। राहुल गाँधी या कॉन्ग्रेस के धूर्त नेता जनता की अनभिज्ञता का फायदा उठाकर लोकलुभावन बातें तो कर देते हैं, लेकिन तरीके नहीं बताते।
इसी कारण भ्रम की स्थिति पैदा होती है। लोगों को बजट या जीडीपी की परिभाषा स्कूलों में बता दी जाती है, लेकिन उसके बाद उस विषय की समझ के नाम पर वो कभी आगे नहीं बढ़ता। हम या आप यह भी नहीं जानते कि सरकार पैसे क्यों छापती है, कितना छाप सकती है। इसी का फायदा राहुल गाँधी या कॉन्ग्रेस पार्टी उठाते हैं, जब वो कुछ भी कह कर निकल लेते हैं।
नोएडा में गुरुवार (अप्रैल 4, 2019) को जोया खान नाम की फर्जी महिला आईएसएफ अधिकारी को उसके पति के साथ गिरफ्तार किया गया। महिला पर आरोप है कि वह प्रॉक्सी मेल और आवाज़ बदलने वाले ऐप के जरिए पुलिस को झाँसा देती थी। इस ऐप की मदद से खुद ही वह पीए अनिल शर्मा बनकर अधिकारियों से फोन पर बात करती थी। पुलिस की मानें तो जोया, रिश्तेदारों और अपने परिवार वालों को फायदा पहुँचाने के लिए, स्कूलों में दाखिला कराने के लिए, रौब दिखाने के लिए फर्जी IFS होने का नाटक करती थी।
इस जोड़े के पास से नीली बत्ती लगी XUV और मर्सिडीज कार बरामद हुई है। साथ ही 3 फर्जी यूनाईटेड नेशन के आईकार्ड भी बरामद हुए है। इनकी एक गाड़ी पर भी यूनाइटेड नेशन का लोगो लगा हुआ था। इसके अलावा दो वॉकी-टॉकी, पिस्टलनुमा लाइटर, दो लैपटॉप, चार एंड्रॉयड फोन बरामद किए गए हैं।
— Wifi-Study.com & Exam-pur.com with Sarkari Result (@SarkariResultt) April 5, 2019
मीडिया खबरों के अनुसार जोया खान ने एसएसपी वैभव कृष्ण से खुद को गाजियाबाद निवासी बताकर संपर्क किया था। इस दौरान जब उसने ज्यादा रौब दिखाने की कोशिश की तो एसएसपी वैभव को उसपर शक हुआ। जब जाँच हुई को एसएसपी का शक सही निकला। इसके बाद आरोपी जोया को उसके पति के साथ पकड़ लिया गया है।
“Two cars with blue beacons atop them, a Mercedes and an XUV, were impounded from them. Both cars had logos of the United Nations. Two laptops, a pair of walkie talkies and a fake pistol were also seized from them,” top cop said. https://t.co/WjJ3ofRQI1
— Journalist Anurag K Sason (@AnuragSason) April 5, 2019
खबरों की मानें तो जोया ने दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए किया है। लेकिन जोया कि हरकतों को देखकर लगता है जैसे उसने इस तरह के फर्जीवाड़े में पीएचडी कर रखी हो। जोया फर्जी मेल आईडी बनाकर पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारियों को पर्सनल मेल करती थी। उसका उद्देश्य अपनी फर्जी पहचान के साथ दबदबे को कायम रखना था।
नोएडा से पकड़ाई फर्ज़ी IFS अधिकारी, नीली बत्ती की गाड़ी लेकर पीएम मोदी की रैली में भी पहुंची थी https://t.co/XlOswMtByw
यहाँ पर बता दें कि पुलिस की गिरफ्त में आई जोया खान मेरठ के कैंट इलाके की रहने वाली हैं। वह खुद को पीएम की सुरक्षा में तैनात प्रमुख सचिव भी बताती थी। जोया के पिता डॉक्टर हैं। जोया ने हर्ष प्रताप सिंह से कोर्ट मैरिज की थी, लेकिन उसके माता-पिता ने उसकी शादी की जानकारी होने से इंकार किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले के आदेश पर रोक लगा दी जिसमें हेराल्ड हाउस को खाली करने का निर्देश दिया गया था। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश के ख़िलाफ़ एसोसिएटिड जर्नल लिमिटेड (AJL) की अपील पर भूमि और विकास कार्यालय को नोटिस जारी किया है।
इससे पहले AJL ने 28 फरवरी के दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, ताकि नई दिल्ली के आईटीओ में स्थित हेराल्ड हाउस को खाली करवाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा उठाए जाने वाले सख़्त क़दम को रोका जा सके। अपनी याचिका में AJL ने शहरी विकास मंत्रालय के 30 अक्टूबर 2018 के हेराल्ड हाउस को खाली न करने के नोटिस पर भी रोक लगाई की माँग की थी।
1 मार्च को हाईकोर्ट की दो सदस्यी पीठ द्वारा हेराल्ड हाउस खाली करने के ख़िलाफ़ दायर AJL की अपील ख़ारिज कर दी गई थी। दिया था। AJL ने सिंगल बेंच के 21 दिसंबर के उसे आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें केंद्र सरकार के नोटिस के ख़िलाफ़ दायर याचिका को ख़ारिज कर दिया था।
ख़बर के अनुसार, 7 मार्च को केंद्र सरकार द्वारा AJL को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए 13 मार्च तक जवाब माँगा गया था। इस कारण बताओ नोटिस में केंद्र ने AJL से पूछा था कि दिल्ली के आईटीओ स्थित हेराल्ड हाउस को खाली करने का आदेश क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने कहा था कि AJL के 99 प्रतिशत शेयर्स यंग इंडिया (YE) को ट्रांसफर करने पर उसकी 400 करोड़ से अधिक की संपत्ति भी गुप्त तरीके से ट्रांसफर हो जाती है। बता दें कि यंग इंडिया में सोनिया और राहुल गाँधी शेयरधारक हैं। हाईकोर्ट से AJL की याचिका ख़ारिज होने के बाद सरकार ने कारण बताओ नोटिस जारी किया था।
ऐसे समय में जब बाबा भीमराव अम्बेदकर की जयंती नजदीक है, कुछ असामाजिक तत्व उन्माद फैलाने और समाज में अशांति फैलाने से बाज नहीं आते। इटावा जिले में बकेवर थाना के नोधना क्षेत्र में कुछ अराजक और असामाजिक तत्वों ने बाबा अम्बेदकर की प्रतिमा तोड़ डाली। इस घटना से इलाके में तनाव और अशांति का माहौल है। इस निंदनीय घटना की जानकारी मिलते ही आनन-फानन में प्रशासन ने नई प्रतिमा लगवाने का निर्णय लिया। इसके बाद ही लोगों का गुस्सा शांत हो पाया।
14 अप्रैल को बाबा साहब की जयंती होती है। इससे पहले ही थाना क्षेत्र में नोधना के मजरा रामनगर में अराजकतत्वों ने अम्बेदकर की प्रतिमा तोड़ दी। जानकारी मिलते ही भारी संख्या में लोग घटनास्थल पर पहुँच गए। क्षतिग्रस्त प्रतिमा को देख लोगों में आक्रोश पैदा हो गया।
सूचना मिलने पर मौके पर पहुँचकर प्रशासन ने मामले को रफा-दफा कराया। मीडिया के अनुसार जिला प्रशासन ने बाबा साहब की नई प्रतिमा लगवाने का निर्णय लिया है। इसी तरह की घटनाएँ 2017 और अप्रैल 2018 में भी देखने को मिली थीं, जब बाबा अम्बेदकर की प्रतिमा को अराजकतत्वों ने तोड़ डाला था।
इस प्रकार की हरकतें करने वाले शरारती तत्वों को ये समझना चाहिए कि बाबा साहब के कद को उनकी इस तरह की हरकतें कभी नुकसान नहीं पहुँचा पाएँगी। हाँ, प्रतिमा को नुकसान पहुँचाना सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ सकता है।
बड़े-बड़े घोटालों में सफलतापूर्वक अपना नाम दर्ज कराने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी का इन दिनों एक नया चेहरा देखने को मिल रहा है। इस नए चेहरे में कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गाँधी कभी देश को जागरूक करते दिखते हैं तो कभी प्रेरणादायी भाषण देते हुए। राहुल कभी नागरिकों को मतदाता होने की ताकत याद दिलाते हैं, तो कभी समाज के सताए लोगों (विशेष रूप से पत्रकार) की मदद के लिए तत्पर रहते हैं। उनकी देश की प्रति बढ़ती निष्ठा को देखकर ऐसा लगता है जैसे वो मान चुके हैं कि इन सब चीज़ों को करने से अगस्ता वेस्टलैंड जैसे घोटालों का भार उन पर से उतर जाएगा।
जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं। राहुल की पीआर नीतियाँ और भी पारदर्शी होती जा रही है। हमेशा राफेल डील की रट्ट बाँधकर पीएम को दोषी दिखाने वाले राहुल गाँधी इन दिनों समाज के लिए खुद को मसीहा बताने में जुटे हुए हैं। क्योंकि, शायद वो अब समझ चुके हैं कि जनता को मोदी के ख़िलाफ़ भड़का कर लोकसभा में सीटें हासिल नहीं होने वाली हैं। वैसे तो 2014 के बाद से वो टुकड़े-टुकड़े गैंग के समर्थन में भी खड़े दिखाई दिए थे लेकिन अब वो मानवता का प्रत्यक्ष चेहरा बनकर उभर रहे हैं। जैसे कल (अप्रैल 4, 2019) वो वायनाड पहुँचे यहाँ पर उन्होंने और उनकी बहन प्रियंका गाँधी ने एक्सीडेंट में घायल पत्रकार की मदद की और खूब सुर्खियाँ बटोरीं। राहुल घायल पत्रकार को स्ट्रेचर पर सहारा देते हुए नज़र आए तो प्रियंका उनके जूते संभालते नज़र आईं।
The media bus met with an accident at the end of @RahulGandhi‘s roadshow in Wayanad. Few journalists were hurt.
जाहिर है चारों तरफ मौजूद कैमरों ने राहुल गाँधी के साथ कॉन्ग्रेस पार्टी की छवि को भी उठाया। जिसका असर कल सोशल मीडिया पर देखने को मिला। मोदी सरकार के आने के बाद जो लोग लोकतंत्र पर खतरा बता रहे थे वो कल इस घटना पर राहुल-प्रियंका के सहयोग को लोकतंत्र का और मीडिया का संरक्षक बताकर कई लोगों को संवेदनाओं के बारे में समझा रहे थे। खैर, ये पहली बार नहीं था कि राहुल ने पत्रकारों की मदद के लिए पहले से मौजूद रहे हों। इससे पहले भी एक पत्रकार की मदद करते हुए उनकी वीडियो वायरल हो चुकी है।
याद दिला दें इस वीडियो में राहुल गाँधी एक्सीडेंट में चोटिल पत्रकार को अपनी बुलेटप्रूफ गाड़ी में अपने साथ बैठाकर ले जाते नज़र आ रहे थे। इस वीडियो में राहुल पत्रकार के माथे को साफ़ करते भी दिखे। इस वीडियो को 5 सेकेंड तक देखने पर आपके भीतर खुद ही राहुल के लिए प्यार उमड़ पड़ेगा जैसे कल के बाद अभी भी उमड़ रहा होगा। लेकिन वीडियो को थोड़ा सा आगे देखने पर आपको इसकी गंभीरता का अंदाजा होगा।
“Sir, dobara kijiye, media ke liye isko kaam mein lunga…” By god, “Krantikari, bahut krantikari” wala scene yaad aa gaya. https://t.co/fU41SYuJVj
दरअसल, इस वीडियो में चोटिल राजेंद्र खुद राहुल गाँधी को दुबारा से रुमाल फेरने को कहते हैं। ताकि वो उसे अपने मीडिया चैनल पर भेजकर राहुल के लिए जनमत निर्माण कर सकें।
Journalist Rajender Vyas met with an accident. Congress President stop his cavalcade and took him to Aiims. pic.twitter.com/p7q1Vk1fFO
यह नौटंकी से भरे पत्रकार की नाकामी कहिए या राहुल की गलत पीआर नीति। न राहुल को इसका फायदा पहुँचा और न ही उस पत्रकार को। क्योंकि अब पाठक खुद तय करता है कि वीडियो में निहित भावों की गंभीरता और प्रामाणिकता क्या है।
चुनाव के मद्देनजर ये सच है कि अमेठी को छोड़कर वायनाड से नामांकन करना राहुल के लिए गले में फँसी हड्डी जैसा है। उन्हें भी मालूम है कि चुनावों में भले ही उनके भाषणों और नीतियों का जादू चले न चले, लेकिन कैमरे के सही इस्तेमाल से जनता जरूर आकर्षित होती है।
लेकिन राहुल को समझने की भी जरूरत है कि अब देश की जनता इतनी जागरूक हो चुकी है कि उन्हें मालूम है विश्व भर में पीआर के क्षेत्र में संभावनाएँ ऐसे ही नहीं विकसित हुईं है। अधिकतर लोग इन दोनों घटनाओं के बारे में जानते हैं कि घटना स्थल पर राहुल की मौजूदगी और उनकी संलिप्ता इन्हीं की जनमत निर्माण नीतियों का नतीजा है।
लोकसभा चुनाव को लेकर जहाँ देश में राजनीतिक सरगर्मियाँ अपने चरम पर है, वहीं बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की किताब ‘गोपालगंज टू रायसीना: माइ पॉलिटिकल जर्नी’ को लेकर घमासान मचा हुआ है। इस किताब के माध्यम से कई नए खुलासे हो रहे हैं, जिससे बिहार की राजनीति में उथल-पुथल जारी है।
लालू प्रसाद ने यह पुस्तक नलिन वर्मा के साथ मिलकर लिखी है, जिसका प्रकाशन रूपा पब्लिकेशंस कर रही है। लालू ने इस किताब में दावा किया है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग होने के 6 महीने बाद दोबारा से महागठबंधन में शामिल होना चाहते थे, लेकिन इसके लिए वो राजी नहीं हुए। लालू प्रसाद के साथ-साथ उनके बेटे और बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने भी दावा किया है कि नीतीश कुमार महागठबंधन में वापस आना चाहते थे। लालू यादव ने अपनी इस आत्मकथा में दावा किया है कि नीतीश कुमार ने दोबारा महागठबंधन में शामिल होने के लिए अपने सहयोगी और जदयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर को 5 बार उनके पास बातचीत के लिए भेजा, लेकिन उन्होंने नीतीश कुमार की महागठबंधन में दोबारा एंट्री पर इसलिए रोक लगा दिया क्योंकि नीतीश ने उनका भरोसा तोड़ दिया था और वह उन पर दोबारा विश्वास नहीं कर सकते थे।
Tejashwi Yadav on Nitish Kumar wanted to rejoin mahagatbadhan says Lalu in upcoming book: I say this with full responsibility, Nitish Kumar made many attempts to get back and ally with us, he tried many different approaches, that also within 6 months of returning to NDA pic.twitter.com/gdGJTFaP0b
लालू ने इस किताब में कहा है कि उन्हें नीतीश कुमार से कोई नाराजगी नहीं थी, मगर उन्हें इस बात को लेकर चिंता थी कि अगर उन्होंने प्रशांत किशोर की बात मानकर नीतीश को दोबारा महागठबंधन में शामिल कर लिया, तो बिहार की जनता इसको किस तरीके से लेगी? लालू का कहना है कि नीतीश के महागठबंधन में शामिल करने के लिए प्रशांत किशोर ने उनके बेटे और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव से भी मुलाकात की थी और प्रशांत किशोर ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि अगर ऐसा होता है तो लोकसभा चुनाव में महागठबंधन की उत्तर प्रदेश और बिहार में बड़ी जीत होगी। बीजेपी को इन दोनों राज्यों से समाप्त कर दिया जाएगा।
लालू के इस सनसनीखेज दावों को लेकर प्रशांत किशोर ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए सभी दावों को पूरी तरीके से बकवास बताया है। प्रशांत किशोर ने ट्वीट करते हुए लिखा कि लालू प्रसाद ने अपने आप को चर्चा में बनाए रखने के लिए एक नाकामयाब कोशिश की है। लालू के अच्छे दिन अब पीछे रह गए हैं। हालाँकि, प्रशांत किशोर ने अपने ट्वीट में यह बात स्वीकार किया है कि जदयू में शामिल होने से पहले उन्होंने लालू प्रसाद से कई बार मुलाकात की थी, लेकिन अगर उन्होंने इस बात का खुलासा कर दिया कि इस दौरान दोनों के बीच क्या-क्या बातें हुईं थी, तो इससे लालू प्रसाद यादव को काफी शर्मिंदगी महसूस होगी।
The claims made by Laluji as reported are BOGUS. This is nothing but a poor attempt seeking relevance by a leader whose best days are behind him.
Yes, we did meet many times before I joined JDU, but if I were to tell what all was discussed then he would be quite embarrassed. https://t.co/9B5clUBxea
इसके साथ ही जदयू के महासचिव केसी त्यागी ने भी लालू के इन दावों का सिरे से खंडन किया है। उन्होंने कहा, “मैं जदयू के एक बड़े पदाधिकारी की हैसियत से कह सकता हूँ कि 2017 में रिश्ते बिगड़ने के बाद नीतीश ने महागठबंधन में जाने की इच्छा कभी प्रकट नहीं की। अगर उनका ऐसा इरादा होता तो इस प्रस्ताव को पार्टी में आंतरिक चर्चा के लिए जरूर लाया जाता। जदयू का राजद से अलगाव बिल्कुल स्थाई है और नीतीश कुमार भ्रष्टाचार पर समझौता करने वाले नहीं हैं। इसलिए, लालू का दावा बिल्कुल झूठा है।” गौरतलब है 2017 में तेजस्वी यादव के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के साथ नई सरकार बना ली थी।
राहुल गाँधी की आय को लेकर पहले भी चर्चा की जा चुकी है कि वो किस तरह से पैसा बनाते हैं। राहुल गाँधी ने न कभी नौकरी की और न ही उनका कोई बिज़नेस है जिसे उनकी आय का स्रोत मान लिया जाए। यह पाया गया कि सांसद के रूप में वेतन के अलावा, राहुल गाँधी भूमि सौदों के माध्यम से और अर्जित संपत्तियों से किराए की आय के माध्यम से भी कमा रहे थे। हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इस तरह के सौदों में शामिल होने और ऐसी संपत्ति हासिल करने के लिए उन्होंने पहले पर्याप्त संसाधन कैसे हासिल किए।
राहुल गाँधी की संपत्ति 2004 में ₹55,38,123 रुपए से बढ़कर 2009 में ₹2 करोड़ और आखिरकार, 2014 में ₹9 करोड़ रूपए से अधिक हो गई। यहाँ यह भी बताना ज़रूरी है कि 2011-12 में, राहुल गाँधी आय से अधिक इनकम के एक मामले में आरोपित थे। राहुल को AJL के माध्यम से ₹155 करोड़ के मामले में, आईटी विभाग ने राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी को ₹100 करोड़ का टैक्स नोटिस भेजा था।
राहुल गाँधी ने अब वायनाड, केरल से अपना नामांकन दाखिल करते हुए चुनावी हलफ़नामा दायर किया है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि वो वहाँ से भी चुनाव लड़ेंगे।
उनके नवीनतम हलफ़नामे के अनुसार, उनकी संपत्ति 5 वर्षों में ₹9.35 करोड़ से बढ़कर ₹15.88 करोड़ हो गई।
2004 से 2014 तक जब कॉन्ग्रेस सरकार सत्ता में थी तब राहुल गाँधी की संपत्ति ₹55 लाख से बढ़कर ₹9.35 करोड़ रुपए हो गई जबकि मोदी सरकार 2014 से 2019 तक सत्ता में रही, राहुल गाँधी की संपत्ति ₹9.35 करोड़ से बढ़कर ₹15.88 करोड़ हुई।
2019 के चुनावी हलफ़नामे के अनुसार राहुल गाँधी की आय ₹1.11 करोड़ है। 2012-2013 में उनकी आय ₹92.47 लाख थी।
राहुल गाँधी की सबसे कम घोषित आय वर्ष 2015-2016 में थी, जहाँ उनकी घोषित आय ₹86.56 लाख थी। दिलचस्प बात यह है कि चार्ट से यह स्पष्ट होता है कि मोदी सरकार के सत्ता में आते ही राहुल गाँधी की आय में गिरावट शुरू हो गई।
अपने 2019 के हलफ़नामे में, राहुल गाँधी ने अपनी माँ सोनिया गाँधी से ₹5 लाख का व्यक्तिगत ऋण लिया और उन पर ₹72,01,904 की देनदारी भी शेष है।
अपनी पिछली ख़बरों में, हमने यह विस्तृत रूप से बताने की कोशिश की थी कि राहुल गाँधी अपने पैसे कैसे कमाते हैं। एक सांसद का वेतन उनकी वैध आय का एकमात्र स्रोत है। हमने रिपोर्ट की थी कि कैसे वर्षों तक उनकी आय में वो गुप्त सौदे भी शामिल थे जिन पर रोक लग गई।
राहुल गाँधी संयुक्त रूप से अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा के साथ एक फार्महाउस का मालिक है, इसके अलावा घोटाले के आरोपियों से किराए के रूप में आय अर्जित की, जो अभी भी कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा जाँच के अधीन थे।
2013 में, राहुल गाँधी और उनकी बहन, प्रियंका ने दिल्ली में अपने 4.69 एकड़ के फार्महाउस को फ़ाइनेंशियल टेक्नोलॉजीज (इंडिया) लिमिटेड (FTIL) को किराए पर दे दिया, महज़ 10 महीने बाद ही नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (NSEL) को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। FTIL द्वारा प्रमोटेड कंपनी ने मानको का उल्लंघन किया था। वास्तव में, कॉन्ग्रेस सरकार ने 5 जून, 2007 की अधिसूचना के माध्यम से फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स रेगुलेशन एक्ट के प्रावधानों का अनुपालन करने से NSEL को छूट दी थी। बाद में, यह पता चला कि NSEL उन्हीं अनुबंधों पर काम करता था जिनमें छूट की शर्तों का उल्लंघन शामिल था।
FTIL ने महरौली के इंदिरा गाँधी फार्म हाउस को ₹6.7 लाख के मासिक किराए पर लेने के लिए 11 महीने के लीज समझौते पर हस्ताक्षर किए। FTIL ने राहुल और प्रियंका गाँधी को क्रमश: 20.10 लाख रुपए के दो अलग-अलग चेक की 40.20 लाख रुपए की ब्याज-मुक्त जमा राशि का भुगतान किया गया। दिलचस्प बात यह है कि ₹9 लाख संबंधी उनके चुनावी हलफ़नामे के अनुसार राहुल गाँधी ₹6.7 लाख प्रति माह की किराये की आय अर्जित कर रहे थे, वो भी तब जब फार्महाउस का किराए से मूल प्रॉपर्टी की क़ीमत महज़ कुछ रुपए ही अधिक थी।
जबकि जून 2013 में NSEL घोटाला सामने आया था, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा ने जनवरी 2013 से अक्टूबर 2013 तक अपने फार्महाउस को FTIL में किराए पर दे दिया। इससे पता चलता है कि करोड़ों का घोटाला सामने आने के बाद राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी FTIL से मुनाफ़ा कमा रहे थे।
अब, राहुल गाँधी की संपत्तियों में यूपीए के तहत 1600% की वृद्धि हुई है, लेकिन मोदी सरकार के तहत ”सिर्फ़” 70% से पता चलता है कि गाँधी परिवार के बुरे दिन चल रहे हैं, सत्ता की मलाई खाने वालों ने शायद इसकी कभी कल्पना भी नहीं की होगी।
भाजपा सांसद और लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने इंदौर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। यह घोषणा उन्होंने एक पत्र के माध्यम से की है।
पार्टी अपना निर्णय मुक्त होकर नि:संकोच मन से करे
सुमित्रा महाजन ने पत्र में लिखा है, “भाजपा ने अभी तक इंदौर से लोकसभा के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है, संभव है कि पार्टी निर्णय लेने में कुछ संकोच कर रही है। हालाँकि, मैंने पार्टी के नेताओं पर ही इस बारे में निर्णय छोड़ा था। लेकिन उनके मन में कुछ असमंजस है। इसलिए मैं यह घोषणा करती हूँ कि मुझे लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ना है। अब पार्टी अपना निर्णय मुक्त होकर और नि:संकोच मन से करे। इंदौर के लोगों ने अभी तक मुझे जो प्रेम दिया और भाजपा के कार्यकर्ताओं की मैं दिल से आभारी हूँ।
पत्र की कॉपी
लगातार 8 बार जीत चुकी हैं चुनाव
सुमित्रा महाजन की इस घोषणा के बाद भाजपा किसे इंदौर लोकसभा सीट से मैदान में उतारेगी इस पर अब भी असमंजस बरकरार है। सुमित्रा महाजन आठ बार से लगातार जीत रहीं हैं। उन्होंने कॉन्ग्रेस दिग्गज नेता प्रकाशचंद्र सेठी को हराकर यह सीट जीती थी, कॉन्ग्रेस नेता सेठी देश के गृह मंत्री रह चुके थे और उनकी गिनती उस समय कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं में होती थी। हालाँकि, मीडिया में चर्चा थी की सुमित्रा महाजन नौंवी बार भी चुनाव लड़ने के मूड में थी लेकिन सुमित्रा महाजन ने आज पार्टी को पात्र लिखकर इन अफवाहों पर विराम लगा दिया है। पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त सुमित्रा महाजन ने संकेत दिए थे कि 2014 का चुनाव उनका आखिरी चुनाव होगा।