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विवादित कॉन्ग्रेस MLA ने महिला सरपंच का किया अपमान, बगल की कुर्सी से हटा जमीन पर बिठाया

चुनाव जीतने के बाद से ही लगातार अपने तेवर दिखा रही राजस्थान के ओसियाँ से कॉन्ग्रेस विधायक दिव्या मदेरणा का एक और वीडियो सामने आया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में विधायक महिला सरपंच को अपने बराबर बैठने से रोकती हुई दिख रही है। महिला सरपंच का अपमान करते हुए विधायक ने उन्हें मंच पर बैठने से रोक दिया। खेतासर गाँव की सरपंच चंदू देवी को विधायक दिव्या ने अपने बगल की कुर्सी से उठ कर मंच से नीचे पंडाल में बैठने को कहा। मजबूर सरपंच को मंच छोड़ कर नीचे बैठना पड़ा। इस वीडियो को लेकर विधायक साहिबा की जबरदस्त किरकिरी हो रही है। सोशल मीडिया पर लोगों ने विधायक के इस तेवर पर निशाना साधा। सरपंच के पति ने कहा कि चंदू देवी ने किसी भी प्रकार का विरोध नहीं किया क्योंकि वह एक सीधी-सादी महिला हैं और जीतने के बाद पहली बार गाँव आई विधायक का अपमान नहीं करना चाहती थीं।

वीडियो में साफ़-साफ़ देखा जा सकता है कि महिला सरपंच जैसे ही आकर विधायक के बगल में बैठती हैं, विधायक को यह नागवार गुजरता है। इसके बाद विधायक उन्हें कुर्सी से उठने का इशारा कर के नीचे बैठने को कहती हैं। इसके बाद सरपंच चंदू देवी को वापस जाना पड़ता है। महिला सरपंच ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि विधायक ने जनप्रतिनिधि होने के बावजूद उन्हें बराबर नहीं बैठने दिया और उनका अपमान किया। सरपंच ने कहा कि यह विधायक की सोच हो सकती है लेकिन उन्होंने ग्रामीणों के आग्रह करने पर विधायक का स्वागत किया और मंच पर पहुँचीं। इस पूरे घटनाक्रम पर सफाई देते हुए विधायक ने कहा कि वे कॉन्ग्रेस के कार्यक्रम में गई थीं लेकिन सरपंच भाजपा की थी।

सरपंच ने कहा कि गाँव का प्रथम नागरिक होने के कारण उनके लिए मंच पर कुर्सी लगाई गई थी लेकिन विधायक ने फिर भी उन्हें बैठने से मना कर दिया। इस से पहले चुनाव जीतने के बाद पहली बार क्षेत्र में पहुँची दिव्या मदेरणा का एसडीएम को फटकारते हुए वीडियो वायरल हुआ था। उन्होंने एसडीएम को धमकी देते हुए कहा था कि प्रदेश में सबसे पहले सीएम गहलोत हैं और जोधपुर में सबसे पहले उनका स्थान आता है। उन्होंने अपने कार्यक्रम में लेट आए एसडीएम को फटकारते हुए कहा था कि विधायक का कार्यक्रम छोड़कर आपके पास क्या अर्जेन्ट काम हो सकता है। उन्होंने एसडीएम से पूछा था कि क्या वह सीएम के पास गए थे जो अर्जेन्ट कार्य को देरी का कारण बता रहे हैं।

इसके अलावा पुलिस अधिकारियों को घुड़की देते हुए भी विधायक का वीडियो वायरल हुआ था। मथानिया बाईपास पर पुलिस अधिकारियों को फटकारते हुए दिव्या मदेरणा ने उन्हें कहा था कि सरकार और विधायक दोनों बदल गए हैं, इसीलिए वे भी अपना रवैया बदल लें। विधायक ने अपने पास शासन की बन्दूक होने की धमकी दी थी।

2010 में जिला परिषद का चुनाव जीती मदेरणा ने 2018 राजस्थान विधानसभा चुनाव में तत्कालीन भाजपा विधायक भारा राम चौधरी को हराया था। विधायक दिव्या मदेरणा के पिता पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा बहुचर्चित नर्स भँवरी देवी केस में आरोपित हैं। भँवरी देवी के पति ने कहा था कि महिपाल के कहने पर उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया गया था। इसके बाद सीएम गहलोत ने महिपाल मदेरणा को मंत्रिमंडल से बरख़ास्त कर दिया था। इस से पहले 1970 में पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत के भतीजे दिलीप सिंह की हत्या के मामले में भी महिपाल आरोपित रह चुके हैं। दिलीप सिंह की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी।

प्रमोद सावंत ने राजभवन में रात 2 बजे गोवा के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, कैबिनेट ने भी ग्रहण की शपथ

गोवा में मनोहर पर्रिकर के उत्तराधिकारी के रूप में प्रमोद सावंत को पार्टी ने जिम्मेदारी सौंपी है। प्रमोद सावंत ने रात 2 बजे गोवा के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। प्रमोद सावंत को गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने पद और गोपनियता की शपथ दिलाई। बता दें कि प्रमोद सावंत के अलावा गोवा में दो डिप्टी सीएम भी बनाए गए हैं। इस अवसर पर प्रमोद सावंत ने कहा, “पार्टी ने जो जिम्मेदारी मुझे दी है उसे निभाने की मेरी पूरी कोशिश रहेगी। मैं जो भी कुछ हूँ मनोहर पर्रिकर की वजह से ही हूँ। उन्होंने ही मुझे राजनीति में लाया और उन्हीं के बदौलत मैं गोवा विधानसभा का स्पीकर बना।”

पेशे से किसान और आर्युर्वेदिक डॉक्टर प्रमोद सावंत मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने से पहले गोवा विधानसभा के अध्यक्ष हैं। 45 वर्षीय डॉ. सावंत की पत्नी सुलक्षणा भी बीजेपी में नेत्री हैं और साथ में शिक्षिका भी हैं। गोवा बीजेपी के नेता 45 साल के डॉ. प्रमोद सावंत का जन्म 24 अप्रैल 1973 को हुआ। सैंकलिम विधानसभा क्षेत्र से चुनकर आए डॉ. प्रमोद सावंत का पूरा नाम डॉ. प्रमोद पांडुरंग सावंत है।

MGP के सुदिन धवलिकर और गोवा फॉरवर्ड पार्टी के विजय सरदेसाई डिप्टी सीएम बनाए गए हैं। प्रमोद सावंत के साथ दोनों डिप्टी सीएम और मंत्रिमंडल ने भी शपथ ग्रहण किया। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के रविवार (मार्च 17, 2019) को हुए निधन के बाद से यह पद खाली था।   

रंग ला रहे भारत के प्रयास, लंदन कोर्ट ने नीरव मोदी के ख़िलाफ़ जारी किया गिरफ़्तारी वारंट

ताज़ा ख़बरों के अनुसार लंदन के वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने आर्थिक भगोड़े नीरव मोदी के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी किया है। एएनआई ने प्रवर्तन निदेशालय के सूत्रों के हवाले से यह सूचना दी। इसके बाद नीरव मोदी की कभी भी गिरफ़्तारी हो सकती है। दरअसल, बैंकों का 13 हजार करोड़ रुपया डकार कर फरार नीरव मोदी पिछले दिनों लंदन की सड़कों पर अपना लुक बदलकर निडर घूमता दिखा था। मीडिया के सवालों को उसने हँस कर टाल दिया था। उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया जा चुका है। इसके बाद ब्रिटेन की वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और गिरफ़्तारी वारंट जारी कर दिया। इसे भारत सरकार की एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

इस दौरान भारत में प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई की टीमें लंदन स्थित सम्बंधित विभागों से लगातार संपर्क में है। भारतीय हाई कमीशन को भी संपर्क में रखा गया है। रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि कुछ ही दिनों में भारतीय एजेंसियों की टीमें लंदन के लिए रवाना होंगी। हाल ही में लंदन की सड़कों पर नीरव मोदी के दिखने के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी बयान जारी किया था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा था कि नीरव मोदी के प्रत्यर्पण को लेकर कार्यवाही की जा रही है। लंदन में उनके दिखने का मतलब यह नहीं है कि उसे तुरंत भारत लाया जा सकता है। इसके लिए एक चरणबद्ध प्रक्रिया होती है, जिसे पूरी की जा रही है।

भगोड़ा हीरा कारोबारी नीरव मोदी लंदन में शानो-शौकत की ज़िंदगी जी रहा है। नवभारत टाइम्स में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, वह लंदन के वेस्ट एंड इलाके के जिस अपार्टमेंट में रह रहा है उसकी कीमत 73 करोड़ रुपए के आसपास है। नीरव मोदी ने अपने आवास से कुछ दूरी पर ही हीरे का नया कारोबार शुरू किया है, जो उसके फ्लैट से जुड़ा हुआ है। मई 2018 उसने नई कंपनी बनाई, जो उसके अपार्टमेंट से लिंक्ड है। यह कंपनी घड़ी और जूलरी का होलसेल और रिटेल कारोबार करने के लिए लिस्टेड है। ब्रिटेन की वेस्टमिंस्टर कोर्ट की तरफ से वारंट जारी करने से एक उम्मीद बँध रही है कि नीरव मोदी की गिरफ्तारी हो सकती है। इसके बाद उसका प्रत्यर्पण भी हो सकता है।

ख़बर आई थी कि पंजाब नैशनल बैंक को ₹13 हजार करोड़ का चूना लगाने वाले भगोड़े हीरा कारोबारी के अवैध बंगले ध्वस्त किए जाएँगे। महाराष्‍ट्र के रायगढ़ जिले में अलीबाग बीच के पास उसके ‘अवैध’ बंगले हैं, जिन्हें इसी सप्ताह ध्वस्त किया जाएगा। ये वही बंगले हैं जहाँ कभी नीरव भव्‍य पार्टियाँ दिया करता था। हाल ही में इस बंगले को कलेक्‍टर ऑफ़िस ने जाँच के बाद अवैध घोषित किया था।

दादी का घर घूमने वाली प्रियंका गाँधी ने कुछ ही दूर दादाजी फ़िरोज़ के क़ब्र को पूछा तक नहीं, जानिए क्यों?

प्रियंका गाँधी रविवार (मार्च 17, 2019) की रात स्वराज भवन में गुजारी। इस दौरान ‘भावुक’ प्रियंका ने अपनी दादी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को भी याद किया। उन्होंने बताया कि उनकी दादी बचपन में उन्हें ‘जॉन ऑफ ओर्क’ की कहानी सुनाया करती थी। लेकिन, प्रियंका गाँधी ने अपने दादाजी को याद करना मुनासिब नहीं समझा। आनंद भवन से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित फ़िरोज़ गाँधी की कब्र को प्रियंका ने वैसे ही नज़रअंदाज़ किया, जैसे राहुल व सोनिया करते आए हैं। ऐसे में प्रियंका गाँधी जब अपनी दादी की बात कर रही थी, लोगों द्वारा यह पूछना लाजिमी था कि वह अपने दादा को कब याद करेंगी? पारसी समुदाय से आने वाले फ़िरोज़ जहाँगीर गाँधी का निधन 8 सितंबर 1960 को हो गया था। फ़िरोज़ ने महत्मा गाँधी से प्रेरित होकर अपना सरनेम ‘गैंडी’ से ‘गाँधी’ कर लिया था।

प्रियंका गाँधी से पहले राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी भी फ़िरोज़ गाँधी के कब्र को नज़रअंदाज़ करते आए हैं। कॉन्ग्रेस के प्रथम परिवार सहित सभी बड़े नेता राजीव गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गाँधी की समाधी पर तो जाते रहे हैं लेकिन फ़िरोज़ गाँधी की समाधी को कोई पूछता तक नहीं। फ़िरोज़ के अलावा गाँधी परिवार के अन्य पूर्वजों की जयंती या पुण्यतिथि के मौके पर सभी बड़े कॉन्ग्रेसी नेताओं का जमावड़ा लगता है लेकिन फ़िरोज़ की जयंती और पुण्यतिथि कब आकर निकल जाती है, इसका पता भी नहीं चलता। उनका कब्र यूँ ही सूना पड़ा होता है, सभी मौसम में, बारहो मास। चुनावी मौसम में भी कॉन्ग्रेस द्वारा इंदिरा, राजीव और नेहरू तो ख़ूब याद किए जाते हैं लेकिन उनकी ही पार्टी में फ़िरोज़ का नाम लेने वाला भी कोई मौजूद नहीं है।

ऐसा नहीं फ़िरोज़ गाँधी कॉन्ग्रेसी नहीं थे या राजनीति में उनकी हिस्सेदारी नहीं थी। गाँधी परिवार की परंपरागत सीट रायबरेली के पहले सांसद भी फ़िरोज़ गाँधी ही थे। 1952 में हुए स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव में उन्होंने यहाँ से जीत दर्ज की थी। इसके बाद 1957 में भी उन्होंने यहाँ से जीत दर्ज की थी। राजनीति में सक्रिय रहने वाले फ़िरोज़ गाँधी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भी काफ़ी मुखर थे। आप जान कर चौंक जाएँगे कि उनके विरोध के कारण प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कैबिनेट में वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। उस दौरान कॉन्ग्रेस नेताओं के बड़े उद्योगपतियों के साथ अच्छे-ख़ासे सम्बन्ध बनने लगे थे, जिसका फ़िरोज़ ने भरपूर विरोध किया था।

क्या कॉन्ग्रेस इसीलिए फ़िरोज़ गाँधी को याद नहीं करना चाहती क्योंकि उनका नाम आते ही उनका नेहरू सरकार की आलोचना करना फिर से प्रासंगिक हो जाएगा? क्या कॉन्ग्रेस इसीलिए फ़िरोज़ को याद नहीं करना चाहती क्योंकि उनका नाम आते ही उनके कारण नेहरू के मंत्री के इस्तीफा देने की बात फिर से छेड़ी जाएगी? क्या कॉन्ग्रेस फ़िरोज़ खान की बात इसीलिए नहीं करना चाहती क्योंकि बड़े कॉंग्रेस नेताओं व उद्योगपतियों के बीच संबंधों की बात फिर से चल निकलेगी? जब उनका नाम आएगा, तो इतिहास में फिर से झाँका जाएगा। अगर उनका नाम आएगा तो उनके सुनसान कब्रगाह की बात आएगी, कॉन्ग्रेस नेताओं व गाँधी परिवार की थू-थू होगी। अब कॉन्ग्रेस चाह कर भी फ़िरोज़ गाँधी की प्रासंगिकता को ज़िंदा नहीं करना चाहेगी क्योंकि उनसे सवाल तो पूछे जाएँगे।

फ़िरोज़ गाँधी की सूनी पड़ी कब्र

आपको बता दें कि पारसी फ़िरोज़ गाँधी का अंतिम संस्कार पूरे हिन्दू रीती-रिवाजों के साथ किया गया था। बीबीसी के अनुसार, उन्होंने कई बार अंतिम संस्कार के पारसी रीति-रिवाजों से नाख़ुशी जताई थी। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका क्रिया-कर्म हिन्दू तौर-तरीकों से ही किया जाए। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने राहुल गाँधी को उनके दादा की याद दिलाई। जनवरी 2019 में शर्मा ने राहुल गाँधी को कुम्भ में आने का आमंत्रण देते हुए उन्हें फ़िरोज़ गाँधी के कब्रगाह पर मोमबत्ती जलाने की सलाह दी थी। शर्मा ने कहा था कि राहुल के ऐसा करने से दिवंगत आत्मा को शांति मिलेगी, फ़िरोज़ गाँधी की कब्रगाह भी प्रयागराज में ही है।

पारसी कब्रगाह के एक कोने में फ़िरोज़ गाँधी की कब्र अभी भी आगुन्तकों की बाट जोह रही है। राहुल गाँधी शायद एक-दो बार वहाँ जा चुके हैं लेकिन पिछले 8 वर्षों से शायद ही गाँधी परिवार का कोई व्यक्ति वहाँ गया हो। पिछले एक दशक में प्रियंका गाँधी के वहाँ जाने के कोई रिकॉर्ड नहीं हैं। आलम यह है कि कब्रिस्तान की रखवाली के लिए एक चौकीदार है जिसके रहने के लिए दो कमरे बने हुए हैं। इसके अलावा कब्रिस्तान में एक कुआँ और एक मकान है। कब्र और कब्रिस्तान की स्थिति जर्जर हो चुकी है। अपने ही परिवार की उपेक्षा के कारण यह स्थिति हुई है। कहा जाता है कि 1980 में उनकी बहू मेनका गाँधी ने यहाँ का दौरा किया था। मेनका गाँधी अभी मोदी कैबिनेट में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।

अगर कॉन्ग्रेस फ़िरोज़ गाँधी की बात करती है तो यह भी याद दिलाया जाएगा कि उन्ही की पत्नी इंदिरा गाँधी ने अपने पति के द्वारा बनवाए गए क़ानून को कचरे के डब्बे में फेंक दिया था। नेहरू काल में नियम था कि संसद के भीतर कुछ भी कहा जा सकता था लेकिन अगर किसी पत्रकार ने इस बारे में कुछ लिखने या बोलने की कोशिश की तो उसे सज़ा तक मिल सकती थी। इसे हटाने के लिए फ़िरोज़ गाँधी ने संसद में प्राइवेट मेम्बरशिप बिल पेश किया। बाद में इस क़ानून को फ़िरोज़ गाँधी प्रेस लॉ के नाम से जाना गया। आपातकाल के दौरान इंदिरा ने अपने पति के नाम के इस क़ानून की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी। क्या कॉन्ग्रेस को इस बात के चर्चा में आने का डर है? बाद में विरोधी जनता पार्टी की सरकार ने इस क़ानून को फिर से लागू किया। इस तरह से फ़िरोज़ गाँधी को अपनों ने ही दगा दिया, विरोधियों ने अपनाया।

क्या कारण है कि देश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक परिवार के पूर्वज की कब्रगाह पर कचरों का ढेर लगा पड़ा है? दशकों तक केंद्र से लेकर यूपी तक कॉन्ग्रेस की सरकार रही लेकिन फ़िरोज़ गाँधी उपेक्षित क्यों रहे? सवाल तो पूछे जाएँगे। प्रियंका से भी पूछे जाएँगे। दादी को याद कर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाली प्रियंका को दादा को याद करने से शायद कोई राजनीतिक फ़ायदा न मिले। अफ़सोस कि भारत में एक ऐसा भी परिवार है जो अपने पुरखों को याद करने के मामले में भी सेलेक्टिव है। आशा है कि प्रियंका गाँधी उत्तर प्रदेश कैम्पेन के दौरान एक न एक बार तो फ़िरोज़ गाँधी की समाधी पर ज़रूर जाएँगी।

जिस ‘गंगा’ को लेकर हमेशा पीएम मोदी पर साधा निशाना, क्यों आज उसी की शरण में पहुँची प्रियंका

चुनाव के समय में राजनीति के गलियारे में हलचल होना तो लाजिमी है। कुछ राजनेता या राजनेत्रियों को चुनाव के समय ही देश की जनता और उनकी समस्याएँ दिखाई देती हैं। इन्हीं में से एक हैं हाल फिलहाल में ही राजनीति में सक्रिय होने वाली कॉन्ग्रेस नेत्री प्रियंका गाँधी वाड्रा। जिन्हें मोदी सरकार के कार्यकाल के साढ़े चार साल बाद याद आया कि देश और देश की जनता संकट में है।

दरअसल, कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने अपने चुनावी स्वार्थ साधने के लिए प्रयाग से काशी तक ‘गंगा यात्रा’ किया। इस दौरान उन्होंने एक जनसभा को संबोधित करते हुए देश की जनता प्रति अपनी सहानुभूति दिखाते हुए कहा कि इस समय देश संकट में है, इसलिए उन्हें घर से बाहर निकलना पड़ा।

अब यहाँ पर ये सवाल बन पड़ता है कि उनके मुताबिक देश में अभी जो भी समस्याएँ हैं, जिसकी वजह से देश संकट में है, वो क्या इन्हीं पिछले छ: महीने में उत्पन्न हुई है? वास्तव में तो उनका ये मानना है कि जब से कॉन्ग्रेस के हाथ से सत्ता छिनकर मोदी सरकार के हाथ में आई, तभी से समस्याएँ हैं। तो फिर वो इतने दिन कहाँ थी? क्यों नहीं उन्होंने भारत भ्रमण करके देश के जनता की समस्याओं को जानने और समाधान करने की कोशिश की? अभी अचानक से क्यों याद आई? चूँकि, अभी चुनाव है इसलिए आपको देश की जनता और देश के ऊपर संकट नज़र आ रहा है।

वैसे गौर करने वाली बात तो ये भी है कि जिस वाराणसी क्षेत्र से पीएम मोदी ने 2014 में चुनावी बिगुल फूँका था और कहा था कि वो यहाँ खुद नहीं आए हैं। उन्हें माँ गंगा ने बुलाया है और फिर उन्होंने गंगा सफाई की बात की थी, जिसके लिए बाद में मंत्रालय भी बनाया गया। गंगा की सफाई को लेकर कॉन्ग्रेस ने हमेशा सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार जनता को बरगला रही है। साथ ही गंगा की सफाई को लेकर भी सवाल उठाए। आज उसी कॉन्ग्रेस की महासचिव माँ गंगा की शरण में जाकर जनता से वोट माँग रही है। वो जनता से कह रही हैं, “गंगा उत्तर प्रदेश का सहारा है। मैं गंगा का सहारा लेकर आपके बीच पहुँचूँगी।” इसके साथ ही उन्होंने गंगा जल भी पिया। जब आपकी नज़र में गंगा इतनी अस्वच्छ है तो फिर आप इसका जल पीकर जनता को क्या दिखाना चाहती हैं?

इससे तो साफ जाहिर होता है कि प्रियंका ने इन सब चीजों का सहारा हिंदुत्व और गंगा प्रेम दिखाने के लिए लिया है। जिससे कि वो हिंदू वोटरों को साधने में सफल हो सकें। वरना हमेशा पीएम मोदी का विरोध करने वाली प्रियंका क्यों आज उनका अनुसरण कर चुनाव जीतने की कोशिश में जुटी है?

कर्नाटक: लैब परीक्षणों में इंदिरा कैंटीन का भोजन खाने योग्य नहीं, भोजन में हानिकारक बैक्टीरिया पाया गया

कर्नाटक के इंदिरा कैंटीन फिर से विवादों में घिर गई है क्योंकि कॉर्पोरेटर उमेश शेट्टी ने आरोप लगाया है कि कैंटीन में परोसा जाने वाला भोजन खाने योग्य नहीं है। उन्होंने कथित तौर पर रमैया उन्नत परीक्षण प्रयोगशाला और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान द्वारा दी गई रिपोर्ट को आरोपों को आधार बनाया। इसमें कहा गया कि भोजन संतोषजनक मापदंडों पर खरा नहीं उतरता जो कि खाने योग्य नहीं है।

डेक्कन हेराल्ड की ख़बर के अनुसार, मुदलपाल, ब्यातारण्यपुरा, जयनगर, जेपी नगर और नागापुरा वार्ड कैंटीन से प्राप्त भोजन पर परीक्षण किया गया था। नमूनों की तौर पर चावल, सांभर और अन्य व्यंजन शामिल किए गए थे।

उमेश शेट्टी ने ख़बर का हवाला देते हुए कहा कि इंदिरा कैंटीन से पुरामिकिकास (नगरपालिका कार्यकर्ता) को दिया जाने वाला भोजन खाने योग्य नहीं है। दो प्रयोगशालाओं में यह परीक्षण करने के बाद, यह पाया गया कि भोजन में हानिकारक बैक्टीरिया मौजूद थे जो विभिन्न स्वास्थ्य बीमारियों का कारण बन सकते हैं। उन्होंने राज्य सरकार से ऐसे भोजन के निर्माताओं के ख़िलाफ़ हस्तक्षेप करने और कार्रवाई करने की भी अपील की।

कर्नाटक के डिप्टी सीएम जी परमेस्वर ने कहा है कि उन्होंने बीबीएमपी कमिश्नर को 198 वार्डों में सभी इंदिरा कैंटीनों में दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता की तुरंत जाँच करने का निर्देश दिया है। अगर खाद्य गुणवत्ता में मिलावट पाई गई तो ठेकेदारों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी।

बता दें कि इंदिरा कैंटीन योजना कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा अगस्त 2017 में सिद्धारमैया के नेतृत्व में शुरू की गई थी। यह तमिलनाडु की अम्मा कैंटीन से प्रेरित थी, जिसके तहत ज़रूरतमंदों को कम क़ीमतों पर दिनभर भोजन उपलब्ध कराना था। हालाँकि, यह योजना अपने उद्घाटन के बाद से ही विभिन्न विवादों का हिस्सा रही है। बेंगलुरु में इंदिरा कैंटीन के उद्घाटन के दो दिनों के भीतर ही ख़बरें सामने आई थीं कि इंदिरा कैंटीन में प्लास्टिक ड्रम में आए खाने की उचित गुणवत्ता की जाँच किए बिना परोसा गया था।

आतंकी हाफ़िज़ सईद की जानकारी लीक होने पर पाक को लगी मिर्ची, संयुक्त राष्ट्र में उठाई जाँच की माँग

पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र से जाँच की अपील की है कि जमात-उद-दावा के सरगना हाफि़ज़ सईद के संबंध में जानकारी भारत तक कैसे पहुँची। पाकिस्तान जिस जानकारी की बात कर रहा है उसका संबंध आतंकी हाफ़िज़ की वो याचिका है जिसमें उसने ख़ुद को वैश्विक आतंकवादियों की सूची से बाहर करने की माँग की थी। हालाँकि उस याचिका को संयुक्त राष्ट्र ने ख़ारिज कर दिया था।

बता दें कि समाचार एजेंसी, प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (PTI) ने 7 मार्च 2019 को अपनी एक ख़बर में लिखा था कि संयुक्त राष्ट्र ने मुंबई हमलों के सरगना हाफ़िज़ सईद का नाम प्रतिबंधित आतंकियों की सूची से हटाने की याचिका ख़ारिज कर दी। PTI को यह जानकारी उसके गोपनीय सूत्रों द्वारा प्राप्त हुई थी कि भारत ने आतंकी सईद की गतिविधियों से संबंधित बेहद गोपनीय सूचनाओं समेत विस्तृत साक्ष्य पेश किए थे जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने हाफ़िज़ की याचिका ख़ारिज करने का फ़ैसला किया था

ख़बर के अनुसार, पाकिस्तान सरकार के सूत्र ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी राजदूत मलीहा लोधी ने संयुक्त राष्ट्र को बक़ायदा एक पत्र लिखकर यह माँग की है कि 15 सदस्यीय समिति में से किसने भारत की समाचार एजेंसी PTI को हाफ़िज़ सईद की याचिका ख़ारिज होने संबंधी जानकारी दी। यही जानकारी पाकिस्तान के गले नहीं उतर रही है।

पाकिस्तान एक तरफ तो आतंकियों से अपने संबंधों को नकारता रहता है और दूसरी तरफ आतंकी सरगनाओं की जानकारी लीक होने से तिलमिला उठता है। अपनी इस दलगत नीति से वो जिस मंतव्य को साधने का प्रयास करता है वो किसी से छिपा नहीं है बावजूद इसके वो अपनी झूठी राजनीति करने से भी बाज नहीं आता।

जनता को भड़काना केजरीवाल को पड़ा महँगा, लोगों ने कहा ‘सदी के सबसे बड़े ठग, मक्कार, फ्रॉड, 420, फर्जीवाल’

कई बार बड़े पद पर पहुँचने के बाद सोशल मीडिया पर बे-बुनियाद कुछ भी लिख देना बहुत महँगा पड़ सकता है। अगर यकीन न हो, तो दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल के हालिया ट्वीट का ही उदाहरण ले लीजिए। इस ट्वीट में केजरीवाल ने अपनी पैठ बनाने के लिए और मोदी सरकार की साख मिट्टी में मिलाने के लिए एक ट्वीट किया।

इस ट्वीट में केजरीवाल ने लिखा, “29 साल का एक लड़का मिला। 24 साल की उम्र में उसने मोदी जी को वोट दिया था क्योंकि मोदी जी ने कहा था नौकरी देंगे। अभी तक बेरोज़गार है। ना नौकरी लगी, ना शादी हो रही। एक बार और मोदी जी को वोट दे दिया तो अगली बार तक 34 का हो जाएगा। तब तक बहुत देर हो जाएगी। इस बार दोबारा ग़लती मत करना।”

केजरीवाल ने इस ट्वीट को करने से पहले शायद अंदाजा भी नहीं लगाया होगा कि इसके बदले उन्हें ट्विटर पर जनता की ओर से किस तरह की प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ेगा। बेरोज़गारी का हवाला देते हुए जो केजरीवाल ने एक आभासी लड़के की कहानी बताई, जिसका न कोई नाम था और न ही कोई पता। उसके बारे में पढ़कर कई लोगों ने उस लड़के के लिए उसी ट्वीट पर नौकरी का प्रस्ताव रख डाला। किसी ने केजरीवाल से उस लड़के की जानकारी माँगी तो किसी ने उस लड़के का नंबर पूछा।

गजब तो तब हुआ जब केजरीवाल, लड़के की बेरोज़गारी पर जनता को अटकाने का प्रयास करते रह गए और दिलीप कुमार नाम के शख्स ने उन्हें बताया कि उनकी पत्नी ने मोदी सरकार की स्टार्ट-अप इंडिया के तहत कंपनी शुरू की थी जिसमें अब तक 8 लोगों को नौकरी दी जा चुकी है। उन्होंने अपनी पत्नी की कंपनी में उस बेरोजगार लड़के को नौकरी देने की इच्छा रखी। और अंत में यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर वह अपनी पत्नी की कंपनी में उस लड़के को रख सकते हैं, लेकिन उसके लिए केजरीवाल के पास कोई बेरोज़गार भी तो होना चाहिए?

केजरीवाल के इस ट्वीट पर एक लड़की का भी ट्वीट आया, जिसमें लड़की ने उनकी बात पर काउंटर करते हुए बताया कि वो 18 साल की थी जब मोदी सरकार को वोट दिया था। उसके बाद उसे कॉलेज में स्कॉलरशिप भी मिल गई और नौकरी भी लग गई। साथ ही उस लड़की के साथ स्कूल में पढ़ने वाले सभी लोगों की नौकरियाँ लग गई या कोई अपना व्यवसाय कर रहा है, सिर्फ़ उन्हें छोड़ कर जो कुछ नहीं करना चाहते। लड़की ने यह सब लिखने के बाद कहा कि, सोच लो किसे वोट दूँगी!

चुनाव जीतने के लिए जो हथकंडा केजरीवाल ने आजमाया वो इस बार उन पर ही महंगा पड़ गया, लोग मोदी के ख़िलाफ़ जाने की जगह उनकी ही चुटकी लेने लगे। एक शख्स ने तो केजरीवाल के लिए जनता की राय का वीडियो बनाकर ही पोस्ट कर दिया। इस ट्वीट में उन्हें सदी का सबसे बड़ा ठग, मक्कार, धोखे़बाज, फ्रॉड 420 तक कह दिया गया।

केजरीवाल का मुख्यमंत्री पद पर बैठकर ऐसी ओछी राजनीति करना, बेहद हास्यास्पद है। प्रधानमंत्री के किए वादों का स्मरण जिन केजरीवाल को है, वो हर बार अपनी ही बात से मुकरने के लिए विख्यात पहचान बना चुके हैं। जिसकी वजह से वो जनता की ऐसी प्रतिक्रियाओं का आधार बनते हैं। बच्चों की कसम खाने वाले केजरीवाल 45 साल की उम्र में कहते थे कि मुख्यमंत्री बनने के लिए कभी कॉन्ग्रेस से गठबंधन नहीं करेंगे, लेकिन वही केजरीवाल 51 की उम्र तक पहुँचते हुए कॉन्ग्रेस से गठबंधन के लिए लालायित दिखाई पड़ते हैं। ऐसे में कौन समझाए कि सवाल उठाने के लिए जनता को तथ्य केजरीवाल ने ही उपलब्ध कराए हैं।

सीएम अरविंद केजरीवाल के लिए जरूरी है कि वह अब 5 साल पूरे होने से पहले अपने पद की गरिमा को समझ लें, और अगले चुनाव होने तक ऐसे गलीच किस्म की राजनीति से खुद को दूर करें, क्योंकि उन्होंने अपने कार्यकाल में ‘क्या-क्या’ किया है, वो जनता अच्छे से जान और समझ चुकी है। अब बहका पाना मुश्किल है, इसमें किसी प्रकार का आंतरिक सर्वेक्षण मदद नहीं कर पाएगा।

ठाणे: 2 वर्षों से यौन शोषण कर रहा था संपादक, ट्रेनी महिला ने मार डाला

मुंबई में एक समाचार पत्रिका के संपादक की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इंडिया अनबाउंड नामक इस पत्रिका के संपादक नित्यानंद पांडे विगत शुक्रवार (मार्च 15 , 2019) को ही गायब हो गए थे। उनके लापता होने की ख़बर मीडिया में आई थी और पुलिस ने भी मामला दर्ज किया था। अब यह मामला यौन शोषण से जुड़ा नज़र आ रहा है। पुलिस ने इस सम्बन्ध में एक ट्रेनी पत्रकार और एक प्रिंटर को गिरफ़्तार किया है।

मृत संपादक नित्यानंद पांडे का शव रविवार को विघटित अवस्था में बरामद किया गया गया। पुलिस ने गहन छानबीन के बाद 24 वर्षीय ट्रेनी पत्रकार अंकिता मिश्रा को गिरफ़्तार किया, जिसने शुरुआत में कुछ भी बताने से साफ़ इनकार कर दिया। पुलिस द्वारा सख्ती बरतने के बाद पूरा मामला सामने आया। अंकिता ने संपादक की हत्या से सम्बंधित सभी राज पुलिस के सामने खोल दिए। उसने पुलिस को बताया कि मृत संपादक उसे लगातार परेशान करते थे और 2 सालों से उसका यौन उत्पीड़न भी कर रहे थे।

अंकिता ने पुलिस को बताया कि उसने संपादक पांडे से बार-बार ऐसा करने को मना किया लेकिन वह नहीं माने। इसके बाद अंकिता ने मैगज़ीन के प्रिंटर सतीश मिश्रा के साथ मिलकर एक योजना तैयार की। पांडे से छुटकारा पाने की जुगत में अंकिता ने उन्हें एक सुनसान जगह पर बुलाया। ऐसा करने के लिए अंकिता ने झूठ बोला कि वह उन्हें कोई प्रॉपर्टी दिखाना चाहती है। वहाँ अंकिता ने पांडे को एक मसालेदार ड्रिंक्स पिला दिया।

ड्रिंक्स पीने के बाद पांडे जैसे ही बेहोश हुए, अंकिता और सतीश ने गला घोंटकर उनकी हत्या कर दी। दोनों ने सम्पादक की लाश को भिवंडी के एक सुनसान इलाक़े में फेंक दिया। इसके बाद दोनों ही फरार हो गए। शव की बरामदगी के बाद पुलिस के जनसम्पर्क अधिकारी ने बताया था- “रविवार को भिवंडी तालुका के खारबाओ गाँव में नित्यानंद पांडेय का शव मिला। उनके सिर पर चोट के निशान हैं। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है।

45 वर्षीय नित्यानंद पांडे के बारे में बताया जाता है कि वह मुंबई व ठाणे के सबसे भव्य जीवन जीने वाले पत्रकारों में से एक थे। शानदार महँगी गाड़ियों के शौक़ीन पांडे के मैगज़ीन को कई सरकारी विज्ञापन भी मिला करते थे। वेबसाइट के दावे के अनुसार, उनकी पत्रिका एक लाख से अधिक ग्राहकों को ख़बरें सीधे मेल किया करती थी।

मनोहर पर्रिकर के रक्षा मंत्री रहते बिना किसी घोटाले के ₹90,000 करोड़ के डिफेन्स कॉन्ट्रैक्ट साइन हुए थे

मनोहर पर्रिकर ने फेडरेशन ऑफ़ गुजरात इंडस्ट्रीज़ के एक समारोह में अपने बचपन के समय की एक कहानी सुनाई थी। कहानी उनके गाँव पर्रा के बारे में थी जहाँ उच्च गुणवत्ता वाले बड़े-बड़े और रसीले तरबूज उगते थे। पर्रा का एक किसान तरबूज खाने की प्रतियोगिता करावाता था जिसमें बच्चे भाग लेते थे। बच्चों को यह निर्देश दिया जाता था कि तरबूज खाते समय बीज को चबाना नहीं है बल्कि एक टोकरी में थूकना है। किसान उन बीजों को इकठ्ठा कर उनसे पुनः बढ़िया तरबूज उगाते थे।

पढ़ाई के लिए गाँव छोड़ने के छः साल बाद जब मनोहर पर्रिकर लौटे तो उन्हें पता चला कि पर्रा में अब वैसे बढ़िया और बड़े-बड़े तरबूज नहीं होते जैसे पहले होते थे। कारण यह था कि जो किसान प्रतियोगिता करवाता था वह प्रतियोगिता में बड़े तरबूज रखता था ताकि उसके बीज बिना किसी अतिरिक्त श्रम के एकत्रित किए जा सकें। लेकिन जब उस किसान के बेटे ने खेती की कमान संभाली तो उसने बड़े तरबूज बाजार में बेच दिए और प्रतियोगिता में छोटे तरबूज रखने लगा। इस कारण तरबूजों की अगली पीढ़ी आकार में छोटी और गुणवत्ता में फीकी हो गई।

मनोहर पर्रिकर की कहानी का मंतव्य यह था कि यदि हमें अगली पीढ़ी में काबिल लोग चाहिए तो उन्हें अच्छे शिक्षकों के माध्यम से अच्छी शिक्षा देनी होगी। दुर्भाग्य से यह प्रक्रिया शासन प्रणाली में लागू नहीं होती। भारत में जिस प्रकार मंत्रालयों में कामकाज होता है उस व्यवस्था को देखें तो पता चलता है कि निर्णय लिए जाने के बाद भी दशकों तक गतिरोध बना रहता है और प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाती। फिर एक दिन कोई ऐसा मंत्री आता है जो काम में तेज़ी दिखाते हुए निर्णयों को फाइलों से बाहर क्रियान्वयन के धरातल पर लाता है। भारत में यशवंत राव चव्हाण और जॉर्ज फर्नांडीज़ के बाद मनोहर पर्रिकर ऐसे ही रक्षा मंत्री हुए।

रक्षा मंत्री रहते हुए श्री पर्रिकर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने मंत्रालय के बाबुओं में व्याप्त अविश्वास और नकारात्मकता को दूर करने में बहुत हद तक सफलता पाई थी। वरिष्ठ डिफेन्स जर्नलिस्ट नितिन गोखले अपने ब्लॉग में लिखते हैं कि 2016 में आई रक्षा खरीद नीति (Defence Procurement Procedure) में ‘Buy- IDDM’ (Indigenously Designed, Developed and Manufactured) क्लॉज़ मनोहर पर्रिकर ने जुड़वाया था। रक्षा खरीद में स्वदेशी उत्पादों को वरीयता देने का श्रेय मनोहर पर्रिकर को जाता है। उन्होंने खरीद की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के यथासंभव प्रयास किए थे।

दरअसल 2001-02 से पहले भारत की अपनी कोई रक्षा खरीद नीति नहीं थी। सन 1992 में जरूर एक रक्षा खरीद प्रक्रिया दस्तावेज बनाया गया था लेकिन उस पर कुछ काम नहीं हुआ था। उसके दस साल बाद राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी समिति के सुझावों पर अमल करते हुए Defence Procurement Management Structures and Systems नामक संस्था बनाई गयी जिसने पहली बार DPP-2002 नामक दस्तावेज तैयार किया।

भारत में डिफेन्स प्रोक्योरमेंट प्रोसीजर एक विकासशील नीतिगत प्रक्रिया है। पहले हमने केवल खरीदने की बात की थी, फिर रक्षा क्षेत्र में खरीद के साथ निर्माण पर ज़ोर दिया गया। विदेश से हथियार खरीदने की प्रक्रिया में हमने ऑफसेट और ट्रांसफर ऑफ़ टेक्नोलॉजी को भी जोड़ा। आठ DPP के बाद नौवीं DPP-2016 में हथियारों, विमानों, युद्धपोत और अन्य उपकरणों के कलपुर्ज़े बनाने वाली स्वदेशी कंपनियों से खरीदने का निर्णय किया गया।

रक्षा मंत्री रहते हुए मनोहर पर्रिकर ने यह सुनिश्चित किया कि रक्षा उत्पादन में भारतीय कंपनियों के हित सुरक्षित रहें। Buy-IDDM क्लॉज़ उन वेंडरों से जुड़ा है जो भारत में उत्पादन करते हैं। देश में डिज़ाइन से लेकर निर्माण करने वाली कंपनियों के लिए 40% देसी पुर्ज़ों का प्रयोग ज़रूरी है और यदि डिज़ाइन और उत्पाद स्वदेशी नहीं है तो कम से कम 60% पुर्ज़े देसी होने चाहिए। ऐसी नीतियाँ बनाई गईं जिससे भारतीय इंडस्ट्री को भी बढ़ावा मिले। मध्यम और छोटे उद्यमियों (MSME) को कैपिटल दिया गया जो पहले बड़ी इंडस्ट्री पर निर्भर थे।

मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में ही चालीस वर्षों से लंबित सशस्त्र सेनाओं की वन रैंक वन पेंशन (OROP) मांग पूरी की गई। इसका सबसे ज्यादा फायदा जूनियर कमीशंड अधिकारियों को मिला जो चालीस की आयु पूरी करते-करते सेना से रिटायर हो जाते थे।

पर्रिकर के कार्यकाल में अमेरिका से LEMOA (Logistics Exchange Memorandum of Agreement) समझौता भी किया गया। यह समझौता सामरिक दृष्टिकोण से एक अलग तरह का महत्व रखता है। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से भारत और अमेरिका दुनिया भर में फैले एक दूसरे के सैन्य ठिकानों से रसद सहायता साझा कर सकेंगे। इसमें हथियार और गोला बारूद शामिल नहीं है। दरअसल लॉजिस्टिक्स का अर्थ है हथियार और गोला बारूद के अतिरिक्त युद्ध में उपयोगी सामग्री जिसमें सैनिकों के खान पान से लेकर लड़ाकू विमान का ईंधन भी शामिल हैं। वामपंथियों ने आदतानुसार इस समझौते का यह कह कर विरोध किया था कि इससे भारत भी अमरीका का पिट्ठू देश बन गया है। जबकि वास्तविकता यह है कि यदि अमरीका किसी भी ऐसे देश पर हमला करता है जिससे भारत के दोस्ताना सम्बंध हैं तो भारत इस समझौते से अलग होने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है।

रक्षा मंत्री रहते हुए मनोहर पर्रिकर ने इस विषय पर बयान भी दिया था जिससे उन अटकलों को विराम मिला जिसमें यह कहा जा रहा था कि LEMOA पर हस्ताक्षर करने से भारत अमेरिकी सैन्य अड्डे के लिए अपनी धरती देने को बाध्य होगा। अमेरिका ऐसे समझौते कई देशों के साथ कर चुका है। अन्य देशों के साथ हुए समझौते को अमेरिका लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट नाम देता है किंतु भारत को विशेष सामरिक साझेदार बनाने के परिप्रेक्ष्य में इसे Logistics Exchange Memorandum of Agreement नाम दिया गया। यहाँ यह देखना आवश्यक है कि LEMOA गत दस-बारह वर्षों से अटका पड़ा था, जिसे अंततः मनोहर पर्रिकर ने समझौते का रूप देने का महत्वपूर्ण कार्य किया था।

बहुत से विचारक इसी उधेड़बुन में रत थे कि अमरीका भारत को नाटो जैसा सहयोग देगा या नहीं। जल्दबाजी में नफा नुकसान का आंकलन करने की बजाए यदि हम द्विपक्षीय सम्बन्धों का स्वरूप देखें तो पता चलेगा कि LEMOA भविष्य में अमरीका से तकनीकी सहायता साझा करने की पृष्ठभूमि भी तैयार करता है। हम अमेरिका से दो और फाउंडेशनल समझौते करने की ओर अग्रसर हैं: एक- Communication and Information Security Memorandum of Agreement (CISMOA) और दूसरा- Basic Exchange and Cooperation Agreement (BECA). पिछले साल तक भारत के परिप्रेक्ष्य में CISMOA का नाम बदलकर COMCASA रखकर इसपर नेगोशिएशन की प्रक्रिया चालू हो चुकी थी।

सन् 1974 में विख्यात और बहुत हद तक कुख्यात हेनरी किसिंजर ने कहा था कि अमेरिका विश्व को जो योगदान दे सकता है और जो दुनिया अपेक्षा भी करती है वह है अमरीका की तकनीकी क्षमता। इस सन्दर्भ में तत्कालीन अमेरिकी रक्षा सचिव एश्टन कार्टर के दिमाग की उपज Defence Technology and Trade Initiative (DTTI) कायदे से एक सन्धि न होने के बावजूद भारत के लिए विशेष रूप से लाभदायक है। लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट डीटीटीआई को सफलता की ओर अग्रसर करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसका श्रेय मनोहर पर्रिकर को मिलना चाहिए।

यूपीए के कार्यकाल के खबरें आती थीं कि युद्ध हो जाए तो भारत के पास दस दिनों तक लड़ने की ही सामग्री होगी। भारत के महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक (CAG) की रिपोर्ट के अनुसार नए हथियार तथा उपकरण खरीदने में लगभग ₹20,000 करोड़ व्यय होते। मनोहर पर्रिकर ने रक्षा मंत्री रहते हुए केंद्र सरकार के इमरजेंसी वित्तीय अधिकारों के तहत आर्मी के लिए ₹5,800 करोड़ तथा वायुसेना के लिए ₹9,200 करोड़ की राशि उपलब्ध करवाई थी। डिफेंस एक्वीजीशन कॉउन्सिल (DAC) ने लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपए की रक्षा खरीद को Aceeptance of Necessity (जो कि डीपीपी का ही एक भाग है) के स्तर पर सहमति प्रदान की थी। यह भी उल्लेखनीय है कि पर्रिकर के कार्यकाल में ₹90,000 करोड़ के डिफेन्स कॉन्ट्रैक्ट साइन हुए थे वह भी बिना किसी घोटाले के।

मनोहर पर्रिकर के ढाई साल के रक्षा मंत्री के कार्यकाल में अनेक ऐसे कार्य हुए जिनके कारण देश उन्हें एक निष्ठावान, कर्मठ और सुयोग्य प्रशासक के रूप में सदैव याद रखेगा।