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Hey न्यूयॉर्क टाइम्स f**k you, फिर से!

साल 2014 की बात है जब मंगल मिशन के अंतर्गत भारत पहले ही प्रयास में मंगल पर पहुँचने वाला दुनिया का पहला देश बना था। इसके बाद न्यूयॉर्क टाइम्स में एक कार्टून छपा था, जिसकी सोशल मीडिया से लेकर भारतीय समाचार पत्रों में जमकर आलोचना हुई थी।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए मोदी सरकार के नेतृत्व में सितंबर 2014 का महीना ऐतिहासिक साबित हुआ था। मंगलयान (मार्स ऑर्बिटर) ने पहली ही कोशिश में मंगल की कक्षा में प्रवेश कर रिकॉर्ड बनाया था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), अमेरिकी नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA), रूसी संघीय अंतरिक्ष एजेंसी (RFSA) और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद मंगल तक पहुँचने वाली चौथी अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी बनकर उभरी थी। इस मिशन की ख़ास बात यह थी कि यह दुनिया का सबसे किफायती मंगल अभियान है। इसमें करीब ₹450 करोड़ खर्च हुए और इस तरह से अपने मंगल मिशन में भारत ने चीन को भी पछाड़ दिया था। वो इसलिए, क्योंकि चीन और जापान अपने पहले मंगल मिशन में नाकामयाब रहे थे।

लेकिन भारत के मंगल मिशन को लेकर अमेरिकी अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने अपनी अभिजात्य मानसिकता को छुपा नहीं पाया था और एक विवादित कार्टून को माध्यम बनाकर भारत के अंतरिक्ष अभियानों पर कटाक्ष करने का प्रयास किया। इस कार्टून में पगड़ी पहने हुए एक भारतीय शख्स को गाय के साथ ‘एलीट स्पेस क्लब’ का दरवाजा खटखटाते दिखाया गया था। भीतर क्लब के कमरे में संभ्रात से दिख रहे कुछ लोग बैठे हैं और एक सदस्य को अखबार पढ़ते दिखाया गया, जिसमें भारत का मंगल मिशन टॉप हेडलाइन था। कमरे में बैठे दोनों ही सदस्य बाहर के शख्स के दरवाजा खटखटाने से खुश दिखाई नहीं दे रहे थे। इस कार्टून की चौतरफा आलोचना हुई।

यह कार्टून उन पुराने दिनों की याद दिलाता है, जब ब्रिटिश उपनिवेशवाद के समय इसी तरह एलीट क्लब हुआ करते थे, जिसमें सफेद चमड़ी वाले लोगों को ही प्रवेश मिलता था। (न्यूयोर्क टाइम्स, 2014)

शायद अमेरिकी अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने यह कार्टून उन पुराने दिनों की याद दिलाने के लिए जारी किया था, जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था और श्वेत-अश्वेत के बीच भेदभाव अपने चरम पर था। अखबार के इस कार्टून की आलोचना खूब हुई थी क्योंकि यह एक कार्टून मात्र न होकर ‘नस्लीय टिप्पणी’ के तौर पर देखा गया था, जो एक विकासशील देश के नागरिकों की बड़ी कामयाबी से जन्मी असहजता का प्रतीक था। यह कार्टून हर हाल में घमंडी और नस्लीय मानसिकता की उपज था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज राष्ट्र को संबोधित करते हुए ऐंटी सैटलाइट वेपन A-SAT सफलतापूर्वक लॉन्च किया और DRDO के सभी वैज्ञानिकों को इसके लिए बधाई भी दी। भारत ने अंतरिक्ष में आज एक और कामयाबी का परचम लहराया है और मिशन शक्ति (Mission Shakti) की सफलता के साथ अमेरिका, चीन, रूस के बाद भारत दुनिया का चौथा सबसे शक्तिशाली देश बन गया है। खास बात यह रही कि भारत ने किसी अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन भी नहीं किया है। मिशन शक्ति, विश्वभर की सभी शक्तियों के लिए मोदी सरकार द्वारा दिया गया एक बेहतरीन सन्देश है।

वहीं, दूसरी ओर इस देश के विपक्ष में बैठे कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इस बड़ी उपलब्धि में भी परिवारवाद के नशे में चूर हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी ने तुरंत इस कामयाबी का श्रेय भी बिना समय बर्बाद किए राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी की दादी इंदिरा और जवाहरलाल नेहरू को देते हुए जता दिया कि देश के हर बड़े-छोटे संस्थान, बौद्धिक केंद्र पर गाँधी परिवार ने सत्ता में रहकर एहसान किया है। ये वही पार्टी है जिसका मानना था कि पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करने नरेंद्र मोदी नहीं बल्कि सेना गई थी। हालाँकि, नरेंद्र मोदी ने ये छटपटाहट कभी नहीं दिखाई और श्रेय हमेशा सेना, रक्षा संस्थानों, DRDO और ISRO को ही दिया है।

देखा जाए तो न्यूयॉर्क टाइम्स में छपा हुआ वह कार्टून कॉन्ग्रेस की अभिजात्य मानसिकता को दर्शाता है, जिसमें क्लब में बैठे हुए कुछ सभ्रांत लोग सिर्फ इसलिए असहज हो जाते हैं क्योंकि कोई आम नागरिक प्रधानमंत्री बनकर खुद को देश का प्रधानसेवक कहकर अपने हर कार्य को राष्ट्र को समर्पित करता है।

गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने डिप्टी सीएम को मंत्रिमंडल से हटाया, BJP में शामिल हुए 2 MLA

गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने डिप्टी सीएम सुदीन धवलीकर को मंत्रिमंडल से हटा दिया है। एमजीपी नेता सुदीन धवलीकर सावंत के नेतृत्व वाली गोवा कैबिनेट में परिवहन और सार्वजनिक निर्माण विभाग को संभाल रहे थे।सुदीन धवलीकर को एमजीपी विधायक दीपक पावस्कर और गोवा के पर्यटन मंत्री मनोहर अजगांवकर ने एमजीपी से अलग कर दिया और बुधवार की सुबह भाजपा के साथ अपने विधायी विंग का विलय कर दिया।

पावस्कर और अजगांवकर ने एमजीपी विधायक दल को भाजपा के साथ गोवा विधानसभा अध्यक्ष माइकल लोबो के साथ विलय करने का पत्र सुबह 1 बजे दिया। बता दें कि इससे पहले बुधवार को बीजेपी ने एमजीपी विधायकों के पार्टी में विलय पर चर्चा के लिए पणजी में अपने मुख्य कार्यालय में अपने विधायकों और पदाधिकारियों की एक आपात बैठक बुलाई।

इस विलय ने गोवा विधानसभा के 36-सदस्यीय सदन में भाजपा की ताकत 12 से बढ़ाकर 14 कर दी, जिससे अब बीजेपी में विधायकों की संख्या विपक्षी कॉन्ग्रेस के बराबर हो गई है।


पूरा घटनाक्रम ये रहा कि सरकार में अहम सहयोगी रही महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी का मंगलवार आधी रात के बाद भारतीय जनता पार्टी में ‘विलय’ हो गया। MGP के 2 विधायकों, मनोहर अजगांवकर और दीपक पावस्कर ने अपनी पार्टी को बीजेपी में शामिल कर लिया। 3 में सें 2 विधायकों ने विधायी शाखा का विलय किया है। इसका अर्थ यह हुआ कि वे दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में आने से बच गए हैं। क्योंकि इस कानून के तहत यह अनिवार्य है कि विलय के लिए दो तिहाई सदस्यों की सहमति हो। विधायकों ने मंगलवार को MGP से अलग होकर MGP (2) समूह बनाया था और अब उन्होंने विधायी इकाई का BJP में विलय कर दिया। लोबो ने इस बात की पुष्टि की कि उन्हें विलय के संबंध में देर रात पौने एक बजे पत्र मिला। उन्होंने बताया कि इस पत्र पर सुदीन धवलीकर के हस्ताक्षर नहीं हैं। 

#मिशन_शक्ति: क्या ख़ास है इसमें, जिसने भारत को बना दिया अंतरिक्ष महाशक्ति – मुख्य बिंदु

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आज बुधवार (मार्च 26, 2019) को भारत के अंतरिक्ष महाशक्ति बनने की घोषणा की गई। उन्होंने कहा कि भारत ने आज एक अभूतपूर्व सिद्धि हासिल की है। भारत ने आज अपना नाम ‘स्पेस पॉवर’ के रूप में दर्ज करा लिया है। अब तक रूस, अमेरिका और चीन को ये दर्जा प्राप्त था, अब भारत ने भी यह उपलब्धि हासिल कर ली है।

बकौल प्रधानमंत्री, हमारे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में 300 किलोमीटर दूर LEO (Low Earth Orbit) में एक लाइव सैटेलाइट को मार गिराया है। ये लाइव सैटेसाइट जो कि एक पूर्व निर्धारित लक्ष्य था, उसे एंटी सैटेलाइट वेपन (A-SAT) द्वारा मार गिराया गया है। यह मिशन सिर्फ़ 3 मिनट में पूरा कर लिया गया।

मिशन शक्ति के बारे में प्रमुख बातें

पीएम ने बताया कि भारत ने ‘ऑपरेशन शक्ति’ के माध्यम से अंतरिक्ष शक्ति के रूप में ख़ुद को स्थापित कर लिया है और हमें भविष्य की चुनौतियों का सामना करने और अपने नागरिकों के जीवन स्तर में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए आधुनिक तकनीकों को अपनाना ही होगा।

पीएम ने बताया कि भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में जो काम किया है, उसका मूल उद्देश्य भारत की सुरक्षा, आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगति है। आज का यह ‘मिशन शक्ति’ इन सपनों को सुरक्षित करने की ओर एक अहम कदम है।

मिशन शक्ति के बारे में प्रमुख बातें

पीएम ने कहा, “मैं मिशन शक्ति से जुड़े सभी अनुसंधानकर्ताओं और अन्य सहयोगियों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ, जिन्होंने इस असाधारण सफलता को प्राप्त करने में योगदान दिया है। हमें हमारे वैज्ञानिकों पर गर्व है।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्बोधन के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने एक-दूसरे को बधाइयाँ दी। यह सचमुच ख़ास है क्योंकि यह पराक्रम इस से पहले विश्व में सिर्फ़ 3 देश (अमेरिका, रूस और चीन) ही कर सके हैं।

मिशन शक्ति: सैटेलाइट को मार गिरा भारत बना अंतरिक्ष महाशक्ति, दुनिया का चौथा देश

पीएम नरेंद्र मोदी ने आज राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, “ऐंटी सैटलाइट वेपन A-SAT सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया। मैं इसके लिए डीआरडीओ के सभी वैज्ञानिकों को इसके लिए बधाई देना चाहता हूं।”

“भारत ने अपना नाम अंतरिक्ष महाशक्ति के रूप में दर्ज करा लिया है। अब तक अमेरिका, रूस और चीन को ही यह उपलब्धि हासिल है। भारत चौथा देश है जिसने आज यह सिद्धि प्राप्त की है। हमारे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में 300 किलोमीटर दूर (Low Earth Orbit) में एक सैटेलाइट को मार गिराया। यह एक पूर्व निर्धारित लक्ष्य था। इसे सिर्फ़ 3 मिनट में मार गिराया गया। इसका नाम मिशन शक्ति था। यह एक अत्यंत कठिन ऑपरेशन था। इसके लिए उच्च कोटि की तकनीकी क्षमता की आवश्यकता थी। हमारे लिए यह गर्व की बात है। यह पराक्रम भारत में ही विकसित मिसाइल से पूरा किया गया। इसके लिए इस से जुड़े सभी लोगों को बधाई।”

अंतरिक्ष हमारे जीवनशैली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। कृषि से लेकर संचार और मौसम, शिक्षा, मेडिकल तक उपग्रहों का लाभ हमें मिल रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज बुधवार (मार्च, 2019) को सोशल मीडिया पर बताया कि वो 12 बजे दोपहर को देशवासियों के बीच एक सन्देश लेकर आएँगे। उसके बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि यह सन्देश किस बारे में होगा? मोदी के देश के नाम सन्देश देने से पहले उनके साथ वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों की भी उपस्थिति थी। विश्लेषकों ने बताया कि सुरक्षा से सम्बंधित सभी अधिकारियों व मंत्रियों ने पीएम के साथ एक बैठक की। सन्देश पहले ही रिकॉर्ड कर लिया गया था।

नायडू ने किया मुस्लिमों के लिए ‘नमाज़ रूम’ का वादा’: प्रचार के लिए J&K से फ़ारूक़ अब्दुल्ला को बुलाया

आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू अपने सभी दाँव खेल रहे हैं। साम, दाम, भय और भेद की राजनीति के पुराने खिलाड़ी नायडू को शायद इस बार अपने क़िले में सेंध लगती दिख रही है। तभी तो उन्होंने हज़ारों किलोमीटर दूर श्रीनगर से फ़ारूक़ अब्दुल्ला को प्रचार के लिए बुलाया है। फ़ारूक़ अब्दुल्ला ख़ुद को पूरे भारत के मुस्लिमों का चेहरा मानते हैं और शायद इसीलिए विपक्षी गठबंधनों व खेमों में उन्हें ख़ास इज़्ज़त दी जाती है। चाहे केजरीवाल का धरना हो, ममता बनर्जी का शक्ति प्रदर्शन हो, अशोक गहलोत का शपथ ग्रहण समारोह हो या विपक्षी एकता दिखाने की जुगत हो, फ़ारूक़ अब्दुल्ला इन सभी कार्यक्रमों में उपस्थिति दर्ज कराते हैं। हालाँकि, कश्मीर से बाहर उनकी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस की उपस्थिति नगण्य है लेकिन फिर भी दिल्ली की राजनीति में उनकी ख़ासी दिलचस्पी है।

‘द हिन्दू’ में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, आंध्र के कडपा और कुर्नूल ज़िले में मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए नायडू ने रैली की। इस दौरान केंद्र की वर्तमान राजग सरकार को मुस्लिम विरोधी बताने के साथ-साथ उन्होंने मुस्लिमों के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा दी। कडपा के 32% व कुर्नूल के 16% मुस्लिम जनसंख्या को लुभाने की जुगत में लगे नायडू को पता है कि ये बहुत बड़ा आँकड़ा है और इनकी बदौलत वह इस क्षेत्र में अच्छी बढ़त हासिल कर सकते हैं। कडपा ज़िले की लगभग एक तिहाई जनसंख्या मुस्लिम है। शायद इसीलिए, जम्मू कश्मीर से फ़ारूक़ अब्दुल्ला को बुलाकर वहाँ घुमाया जा रहा है।

चंद्रबाबू नायडू कुछ महीनों पहले तक राजग का हिस्सा थे। मुस्लिमों के मन से इस याद को साफ़ करने का प्रयास कर रहे नायडू के लिए जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ से अच्छा मुस्लिम चेहरा कहाँ मिलता? उन्होंने मुस्लिमों के लिए जिन घोषणाओं की झड़ी लगाई, जरा उनके बारे में भी जानिए। उन्होंने मुस्लिमों के लिए निम्नलिखित घोषणाएँ की:

  • इमामों के प्रशिक्षण के लिए कॉलेज स्थापित किया जाएगा
  • नमाज़ पढ़ने के लिए 50 स्क्वायर यार्ड का नमाज़ रूम बनवाया जाएगा
  • ‘Almaspet Circle’ का नाम बदल कर टीपू सुल्तान के नाम पर कर दिया जाएगा
  • अमीन पीर दरगाह को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा

मुस्लिमों को बरगलाने के लिए चंद्रबाबू नायडू ने पाकिस्तान पर भारतीय वायुसेना द्वारा की गई एयर स्ट्राइक और राम मंदिर मुद्दे का भी सहारा लिया। मुख्यमंत्री नायडू ने इन्हें भाजपा का चुनावी स्टंट बताया। इतना ही नहीं, मुस्लिमों को लुभाने के लिए उन्होंने भाजपा सरकार पर कई आरोपों की झड़ी लगाई। उनकी घोषणाओं के बारे में जानने के बाद उनके आरोपों को भी देखिए:

  • राजग सरकार के आने के बाद से ही मुस्लिम ख़ुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं
  • लोगों के खाने की चॉइस पर हमला किया जा रहा है
  • अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक क्रियाएँ नहीं करने दी जा रही हैं
  • तीन तलाक़ बिल से मुस्लिमों को डराया जा रहा है

टीडीपी सुप्रीमो यहीं नहीं रुके। उन्होंने को लुभाने के लिए पिछले दो दशकों से भाजपा विरोधी पार्टियों के सबसे बड़े मुद्दे गुजरात दंगों को भी बाहर निकाला। उन्होंने कहा कि गुजरात दंगों के दौरान 2500 मुस्लिम मारे गए थे। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी के साथ ख़ुद को जोड़ते हुए कहा कि वो और अटलजी, दोनों ही पहले ऐसे नेता थे, जिन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री पद से नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की माँग की थी। उन्होंने दावा किया कि यही कारण है जिससे नरेंद्र मोदी उनके और उनके राज्य से प्रतिशोध ले रहे हैं।

इस दौरान उन्होंने तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर पर निशाना साधते हुए उनका समर्थन करने वालों को गद्दार बताया। उनका इशारा आंध्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष जगन मोहन रेड्डी और उनकी पार्टी वाईएसआर कॉन्ग्रेस की तरफ था। ‘द न्यूज़ मिनट’ के अनुसार, फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने तो दो क़दम और आगे बढ़ते हुए दावा किया कि आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की मृत्यु के बाद जगन ख़ुद को सीएम बनाने के लिए कॉन्ग्रेस के आला नेताओं को घूस देने के लिए भी तैयार थे। उन्होंने दावा किया कि जगन ने उनके पास आकर ख़ुद को सीएम बनाने के लिए कॉन्ग्रेस नेताओं को 1500 करोड़ रुपए घूस देने का वादा किया था। उन्होंने कहा कि जगन को वोट करने का अर्थ हुआ मोदी को वोट करना।

कॉन्ग्रेसी MLA ने पार्टी दफ़्तर से उठवा लीं 300 कुर्सियाँ… क्योंकि पार्टी ने उसे नहीं दिया लोकसभा का टिकट

चुनाव का मौसम है। लोकसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान हो चुका है और बहुत हद तक कई पार्टियों द्वारा अपने उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की जा चुकी है। ऐसे में दल बदल से लेकर बाग़ी तेवर अपनाने तक नेतागण कई हथकंडे आज़मा रहे हैं। कभी कोई नेता अपने समर्थकों सहित पल भर में दूसरी पार्टी में शामिल हो जा रहा है तो कोई अपनी ही पार्टी के ख़िलाफ़ बयान दे रहा है। लेकिन कॉन्ग्रेस के एक विधायक ने कुछ अलग ही तरीका अपनाया। औरंगाबाद से टिकट की आस लिए कॉन्ग्रेस विधायक अब्दुल सत्तार पर पार्टी ने भरोसा नहीं जताया और सुभाष झंबाद को टिकट दे दिया। इस से नाराज़ विधायक ने अपने समर्थकों के साथ मिलकर जो किया, उस से कॉन्ग्रेस के अन्य नेता भी एक पल के लिए चौंक गए।

नाराज़ कॉन्ग्रेस विधायक अब्दुल सत्तार ने अपने समर्थकों की मदद से कॉन्ग्रेस दफ़्तर की साड़ी कुर्सियाँ ही उठवा लीं। उन्होंने कॉन्ग्रेस कार्यालय से 300 के क़रीब कुर्सियों को गायब करा दिया। सिलोद से विधायक अब्दुल पार्टी पहले ही छोड़ चुके हैं। कुर्सियाँ उठवाने के पीछे कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि इस पर उनका मालिकाना हक़ है और चूँकि वे पार्ट छोड़ चुके हैं, तो उन्होंने अपनी कुर्सियाँ ले लीं। उन्होंने कहा, “हाँ, ये कुर्सियाँ मेरी थीं और मैंने कॉन्ग्रेस की बैठकों के लिए इन्हें उपलब्ध कराया था। अब मैंने पार्टी छोड़ दी है और इसलिए अपनी कुर्सियाँ भी ले ली हैं। जिन्हें टिकट मिला है, वे व्यवस्था करें।” विधायक के इस रवैये के कारण कॉन्ग्रेस की बैठक राकांपा के दफ़्तर में हुई।

कॉन्ग्रेस के लोकसभा प्रत्याशी झंबाद ने कहा कि सत्तार को जरूरत होगी, इसलिए कुर्सियाँ ले गए हैं। उन्होंने कहा कि वो लोग निराश नहीं हैं। सुभाष झंबाद ने बताया कि अब्दुल अभी भी कॉन्ग्रेस में हैं क्योंकि उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है। बाद में सत्तार ने कहा कि उन्हें अब कॉन्ग्रेस ने लोकसभा टिकट देने का आश्वासन दिया है। सत्तार ने कहा कि कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक चव्हाण ने उन्हें औरंगाबाद या जलना से टिकट देने की बात कही है। उन्होंने कहा कि जब से उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़ने की घोषणा की है, तभी से पार्टी के आला नेता उनसे संपर्क में हैं और उन्हें टिकट ऑफर कर रहे हैं।

कुछ लोगों का कहना है कि प्रदेश अध्यक्ष अशोक चव्हाण ही पार्टी आलाकमान पर दबाव बढ़ाने के लिए अब्दुल सत्तार से ये उलटी-सीधी हरकतें करवा रहे हैं। इसे चव्हाण और राज्य में कॉन्ग्रेस प्रभारी मुकुल वासनिक के बीच के द्वन्द से जोड़ा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि चव्हाण ने अब्दुल से इस्तीफा दिलाकर कॉन्ग्रेस आलाकमान को साफ़ कर दिया है कि उम्मीदवारों के चयन में उनकी भूमिका प्रमुख होनी चाहिए। विधायक अब्दुल को पूर्व मुख्यमंत्री चव्हाण का क़रीबी माना जाता है। उन्होंने भाजपा नेताओं से बातचीत भी शुरू कर दी थी और कहा था कि दिल्ली में बैठे कॉन्ग्रेस के नेता चव्हाण का सम्मान नहीं कर रहे।

‘द हिन्दू’ के सूत्रों का मानना है कि विधायक अब्दुल ख़ुद को टिकट न मिलने की स्थिति में शिवसेना नेता चंद्रकांत को हराने के लिए कन्नड़ से विधायक हर्षवर्धन जाधव को टिकट दिलवाना चाहते थे। जाधव प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रावसाहिब दान्वे के दामाद हैं। अब्दुल जाधव को टिकट दिलवा कर रावसाहिब को मराठवाड़ा में चित करने का सपना पाल रहे थे। इसके अलावा अब्दुल ने जलना में रावसाहिब को नीचा दिखाने के लिए उनके प्रतिद्वंदी माने जाने वाले शिवसेना नेता अर्जुन खोटकर को कॉन्ग्रेस में शामिल करने का भी प्रयास किया था लेकिन वो विफल हो गए। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने रावसाहिब और खोटकर के बीच सुलह करा दी।

पाकिस्तान के सिंध में एक और हिन्दू नाबालिग लड़की का अपहरण, पिता ने लगाई गुहार

दो नाबालिग हिन्दू लड़कियों के अपहरण और इस्लामिक धर्मान्तरण का मामला अभी थमा भी नहीं था कि पाकिस्तान स्थित सिंध से एक और हिन्दू लड़की के अपहरण का मामला सामने आया है। सिंध सूचना विभाग द्वारा जारी बयान के अनुसार, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री हरिराम किशोरी ने 16 वर्ष की एक हिन्दू लड़की के अपहरण मामले में संज्ञान लिया है। उक्त लड़की के अपहरण का समाचार सोशल मीडिया पर तेज़ी से फ़ैल रहा था, जिसके बाद मंत्री ने संज्ञान लिया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री एक तरफ तो ‘नया पाकिस्तान’ में सभी धर्मों के साथ सामान व्यवहार का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ हिन्दू लड़कियों पर अत्याचार होते जा रहे हैं और सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही।

जब भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने दो हिन्दू लड़कियों का अपहरण, जबरन शादी और इस्लामिक धर्मान्तरण के मुद्दे पर पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग से रिपोर्ट माँगी, तो पाकिस्तान के सूचना मंत्री फवाद ख़ान चौधरी बिफर पड़े और उन्होंने सुषमा को ट्रोल करने की कोशिश की। अंततः सुषमा स्वराज की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद उन्हें मुँह की खानी पड़ी। इधर सिंध में अब मेघवार समुदाय की लड़की के अपहरण का मामला सामने आया है। घटना बाड़ीं जिला स्थित टांडो बाघों गाँव का है। पीड़िता के पिता ने ज़िले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) सरदार हसन नियाज़ी से मामला दर्ज कर दोषियों पर कार्रवाई करने की गुहार लगाई है।

हालाँकि, अभी तक अपहरण का सही समय नहीं पता चल पाया है लेकिन मंत्री हरिराम ने मामला दर्ज करने के साथ-साथ पीड़िता के परिवार को सुरक्षा मुहैया कराने के भी निर्देश दिए हैं। इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए मंत्री हरिराम किशोरी ने कहा:

“सिंध में बाल विवाह निषेध कानून के तहत नाबालिग लड़कियों के विवाह पर पाबंदी है। 18 साल से कम उम्र की लड़की से शादी करना आपराधिक कृत्य है। क़ानून का सिंध में कड़ाई से पालन किया जा रहा है। हमारी सरकार नाबालिग हिंदू लड़कियों की सुरक्षा के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है। सिंध सरकार अल्पसंख्यक संरक्षण आयोग बनाने की तैयारी में है और इसके मसौदे को मुख्यमंत्री ने दो दिन पहले मंजूरी दी है।”

बता दें कि अपहरण का पहला वाला मामला सिंध के घोटकी ज़िले से आया था। सुषमा स्वराज द्वारा मुद्दे को उठाए जाने के बाद एक मौलवी सहित 7 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। गिरफ़्तार हुए लोगों में से एक निक़ाह कराने वाला अधिकारी भी शामिल है। शनिवर (मार्च 23, 2019) को इस मामले के 2 अलग-अलग वीडियो के वायरल होने के बाद पाकिस्तान सरकार हरकत में आई थी। स्थानीय अदालत ने लड़कियों को सुरक्षा मुहैया कराने के भी निर्देश दिए हैं।

हालाँकि स्थानीय मेघवाल समुदाय के नेता शिव लाल ने पाकिस्तान सरकार व अधिकारियों द्वारा कही गई बातों को बस ज़बानी जमा-ख़र्च बताया था। स्थानीय दाहरकी पुलिस थाने के आगे नाराज़ मेघवाल समुदाय के लोगों ने धरना प्रदर्शन भी किया। अपने हाथ में बैनर लिए इन लोगों की नाराज़गी इस बात को लेकर थी कि 7 दिन बीत जाने के बावजूद उन लड़कियों को बरामद नहीं किया जा सका है।

होटल में नाबालिग छात्रा से गैंगरेप और वीडियो रिकॉर्डिंग: आरोपित अफ़रोज़ गिरफ़्तार, एहतेशाम फ़रार

दिल्ली के पहाड़गंज से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ विशेष समुदाय के लोगों द्वारा एक नाबालिग छात्रा के साथ रेप किया गया। आरोपितों ने 17 वर्षीय छात्रा को एक होटल में ले जाकर उसके साथ गैंगरेप किया। छात्रा की शिकायत पर पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए पोक्सो (Protection of Children from Sexual Offences) एक्ट और सामूहिक दुष्कर्म का मामला दर्ज कर लिया है। बता दें कि पोक्सो एक्ट 2012 के मई महीने में संसद से पास किया गया था। पुलिस ने एक आरोपित अफ़रोज़ को गिरफ़्तार कर लिया है जबकि दूसरे आरोपित एहतेशाम की तलाश जारी है।

पुलिस के अनुसार, पीड़िता 11वीं कक्षा की छात्रा है, जो हरिनगर के सरकारी स्कूल में पढ़ती है। अफ़रोज़ इसी इलाक़े में परिवार के साथ रह रही पीड़िता का पड़ोसी है। छात्रा के अनुसार, गत वर्ष सितम्बर में अफ़रोज़ उसे बहाने से पहाड़गंज स्थित एक होटल में ले गया। होटल का नाम किंग कैस्टल बताया जा रहा है। जब वो वहाँ पहुँची, तो अफ़रोज़ का दोस्त एहतेशाम वहाँ पहले से ही मौजूद था। दोनों ने नाबालिग को पहले तो जान से मारने की धमकी दी, उसके बाद उसके साथ रेप किया।

इतना ही नहीं, आरोपितों ने हैवानियत की हदें पार करते हुए इस कुकृत्य का वीडियो भी रिकॉर्ड कर लिया। इसके बाद आरोपितों ने छात्रा को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। वो छात्रा को गैंगरेप वाला वीडियो वायरल करने की धमकी देने लगे। वीडियो सार्वजनकि करने की धमकी देकर आरोपितों ने नोएडा में छात्रा का फिर से रेप किया। इसके बाद पीड़िता ने परिजनों को सारी बातें बताई। परेशान किशोरी ने 16 मार्च को पहाड़गंज थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिसके पाद पुलिस सक्रिय हुई।

पुलिस ने किशोरी का मेडिकल कराया और उसके बाद मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू की। शिकायत दर्ज होने के बाद दोनों ही आरोपित फ़रार थे। इसमें से एक को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया, जिसका नाम अफ़रोज़ है। एहतेशाम अभी भी फ़रार है और पुलिस उसकी तलाश कर रही है।

राहुल गाँधी: एक ही रैली में 10 झूठ

राजस्थान के सूरतगढ़ में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी अपनी ही रौ में बह गए। और बहे भी ऐसे कि एक-के-बाद-एक करते-करते 10 झूठ एक ही रैली में बोल आए।

1. कॉन्ग्रेस की ‘विचारधारा’

राहुल गाँधी दावा करते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव ‘विचारधारा’ की लड़ाई हैं, और इस लड़ाई में वह और कॉन्ग्रेस ही भारत के एकलौते तारक-उद्धारक हैं। वह भाजपा (जो कि 1980 में बनी ही थी) पर 1947 में विभाजन के समय भारत के विभाजन का समर्थन करने का आरोप लगाते हैं, और अपनी पार्टी को एकता, प्रेम, और भाईचारे का समर्थक बताते हैं।

पर सच्चाई इसके उलट है। कॉन्ग्रेस वही पार्टी है जिसने ‘हिन्दू आतंकवाद’ का शिगूफा छेड़ा और भारत की छवि बर्बाद की। राहुल गाँधी खुद अमेरिकी राजदूत से एक शाखा लगा कर व्यायाम-देशभक्ति सिखाने और बाढ़ में स्वयंसेवक भेजने वाले आरएसएस को आतंकी अल-कायदा से खतरनाक संगठन बता आए थे। साधुओं को जेल भेजने और मोदी को सत्ताच्युत करने की अपील पाकिस्तान में करने वाली भी यही पार्टी है।

हिन्दुओं को जाति से लेकर भाषा तक हर तरीके से बाँटना और समुदाय विशेष को एकजुट कर, तुष्टीकरण कर, वोटबैंक बनाना ही कॉन्ग्रेस की नीति है।

2. ‘मोदी ने मनरेगा बर्बाद कर दिया’

राहुल गाँधी के अनुसार मोदी ने मनरेगा और अन्य जनकल्याण योजनाओं को राजनीतिक विद्वेष के चलते बर्बाद कर दिया। यह दावा भी यथार्थ के विपरीत है। राजग सरकार ने न केवल मनरेगा में न केवल आमूलचूल सुधार किए, ताकि लाभार्थियों तक इसके लाभ सीधे पहुँचें, बल्कि इसके लिए बजट आवंटन भी सर्वकालिक उच्चतम स्तर ₹60,000 करोड़ मोदी सरकार के इस वर्ष के अंतरिम बजट में हुआ है।

3. ‘HAL के मिग-21 से बालाकोट पर हमला’

राफेल का मुद्दा नाहक उठाने में राहुल गाँधी को सरकारी विमान-निर्माण कम्पनी HAL से अत्याधिक प्रेम हो गया है। रैली में उन्होंने दावा किया कि HAL के बनाए मिग-21 विमानों से ही बालाकोट पर हमला हुआ था। जबकि बालाकोट पर बमबारी मिराज-2000 लड़ाकू जेटों से की गई थी। इसे बनाने वाली वही दसाँ है जिससे कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राफेल बनाने को लेकर खफा हैं। वहीं HAL के काम-काज पर संसद की वह समिति सवाल खड़े कर चुकी है जिसके मुखिया कॉन्ग्रेस के लोकसभा दल के नेता श्री मल्लिकार्जुन खड़गे हैं।

4. ‘राफेल…’

राफेल का भूत राहुल गाँधी के फिर से चिपट गया। बीच में ऐसा लगा था कि जब ऑपइंडिया ने राफेल की डील असफल होने में उनका निजी आर्थिक हित दिखा दिया तो राफेल वाला भूत शायद उतर गया हो, पर इस रैली में वह फिर इसी भूत से पीड़ित नज़र आए।

राफेल की संप्रग सरकार के समय कीमत और शर्तों से लेकर दसाँ द्वारा अनिल अम्बानी के चयन की प्रक्रिया तक वह हर पहलू पर झूठ बोलते पकड़े गए हैं। यहाँ तक कि वह कभी यह दावा करते थे कि पूर्व रक्षा मंत्री पार्रिकर ने उनके कान में घोटाले की बात कबूली, तो कभी पत्रकार एन राम के फोटोशॉप किए गए रक्षा मंत्रालय के नोट से दोबारा उन्हीं पार्रिकर को उनके अंतिम दिनों में घेरने की कोशिश करते।

5. ‘मोदी ने अम्बानी को ₹30,000 करोड़ दिए’

राहुल गाँधी कभी यह साफ-साफ नहीं बता पाए कि आखिर मोदी ने अम्बानी को कितने का ‘गलत फायदा’ पहुँचाया। वह कभी ₹1 लाख करोड़ कहते हैं, कभी ₹1 लाख 30 हजार करोड़, कभी 1 लाख उड़ा कर केवल ₹30 हजार करोड़।

जबकि सच्चाई यह है कि ऑफसेट का पूरा कॉन्ट्रैक्ट ही ₹29,000 करोड़ का है जिसमें दसाँ के अलावा MBDA, Thales और Safran नामक तीन और कम्पनियों की भी देनदारी बनती है।

6. ‘अमीरों का कर्जा माफ़ किया’

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष यह भी अक्सर कहते हैं कि मोदी ने अमीरों का कर्जा कर दिया। पर कितने का किया, यह संख्या भी चुनाव पास आने के साथ बढ़ती रहती है। 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान यह आँकड़ा ₹20,000 करोड़ था, जो आज ₹3.5 लाख करोड़ हो गया।

एक बार फिर अगर हम सच्चाई के आईने को देखें तो अमीरों का कर्जा माफ करना तो दूर, मोदी सरकार ने ₹9,000 करोड़ न चुकाने पर विजय माल्या की ₹13,000 करोड़ की संपत्ति जब्त कर ली, और Insolvency and Bankruptcy Code के जरिए 2 साल में ₹3 लाख करोड़ की वसूली कर्ज लेकर न चुकाने वाले बड़े लेनदारों से की।

7. ‘हमने 2 दिन में किसानों का कर्जा माफ किया’

जिन राज्यों में कॉन्ग्रेस हालिया समय में राज्य सरकार में आई है, वहाँ कर्ज माफी का आलम यह है कि किसान सर पीट रहे हैं। किसी ने कर्ज-माफी स्कीम में खुद के अपात्र होने पर आत्महत्या कर ली, तो ₹24,000 की कर्ज माफी की उम्मीद में किसी को ₹13 से ही संतोष करना पड़ा। किसान सामूहिक आत्महत्या की भी धमकी दे रहे हैं।

राजस्थान में ही, जहाँ राहुल गाँधी बोल रहे थे, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कर्ज माफी न कर पाने का ठीकरा भाजपा के सर फोड़ दिया। वहीं कर्नाटक में कर्ज-माफी के बाद भी किसानों को कर्ज चुकाने का नोटिस थमाया जाना जारी है। ₹44,000 करोड़ की कर्ज माफी का दावा करने वाली कर्नाटक की संप्रग सरकार केवल 800 लाभार्थी प्रस्तुत कर पाई।

8. ‘विजय माल्या से मिले अरुण जेटली’

राहुल गाँधी वित्त मंत्री अरुण जेटली पर आरोप लगाते हैं कि शराब व विमान कारोबारी ने विदेश फरार होने के पूर्व जेटली से ‘मुलाकात’ की थी। जेटली यह साफ कर चुके हैं कि माल्या ने राज्यसभा सदस्यता का दुरुपयोग कर उनसे बात करने का प्रयास भर किया था, पर उन्होंने बात करने से साफ मना कर दिया था।

फिर राहुल गाँधी एक कॉन्ग्रेस नेता को ‘चश्मदीद’ बना के ले आए कि जेटली-माल्या में 20 मिनट बात हुई थी। पर अरुण जेटली के उस दिन के शिड्यूल में ऐसी बातचीत ही नामुमकिन निकली

इसके अलावा यह भी सवाल लाजमी है कि मोदी या जेटली की अगर माल्या से कोई साठ-गाँठ होती तो क्या आज माल्या को प्रत्यर्पण और कर्ज की लगभग डेढ़गुणा संपत्ति का जब्त होना झेलना पड़ता?

9. ‘मोदी ने आलोक वर्मा को हटाया’

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने यह भी दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट से अपनी नियुक्ति जीत कर आए सीबीआई प्रमुख अलोक वर्मा को मोदी ने गलत तरीके से हटा दिया। यहाँ भी सच्चाई कुछ और है। आलोक वर्मा की अदालती जीत प्रक्रियागत मुद्दा थी– सुप्रीम कोर्ट ने उनके हटाए जाने के फैसले पर टिप्पणी न करते हुए केवल यह पाया था कि उन्हें हटाने के लिए न्यायोचित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ था। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक उन्हें हटाने का अधिकार केवल उन्हें नियुक्त करने वाली उस समिति का था जिसके सदस्य मुख्य न्यायाधीश, पीएम, और लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता थे।

आलोक वर्मा को अंत में इसी समिति के बहुमत के निर्णय से पदमुक्त किया गया

10. ‘जय शाह को मोदी ने पैसा दिया’

राहुल गाँधी ने मृतप्राय ‘जय शाह मुद्दे’ को फिर उछाल यह जताने की कोशिश की कि मोदी ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह को गलत तरीके से पैसा दे कर उनके ₹50,000 के व्यापार को ₹80 करोड़ महीने का बना दिया था। इस आरोप का ऑपइंडिया विस्तृत रूप से खण्डन अपने पोर्टल पर छाप चुका है

आखिर में  

राहुल गाँधी की चुनावी रणनीति साफ है- मीडिया के समुदाय विशेष की मदद से फर्जी ख़बरें फैलाते रहना, और जनता को बेहोश रखने के लिए ‘₹12,000 महीना’ जैसी हवा-हवाई स्कीमों का चूरन हवा में उड़ाते रहना। पर उनकी इस नीति को कितनी सफलता मिलेगी, यह वक्त ही तय करेगा।

नई शोधनीति में ‘राष्ट्रहित’ की अनुशंसा पर ये बिलबिलाहट क्यों?

किसी सभ्यता की सामाजिक न्याय व्यवस्था वह गुलदस्ता होती है जिसका प्रत्येक फूल उसी समाज में घटित दुर्घटनाओं, संस्मरणों, आध्यात्मिक चिंतन, सामाजिक चेतना एवं उसके सतत प्रवाह का फल है। मानव चेतना और बुद्धि का स्वभाव होता है कि वह सत्य के पक्षधर हैं। यह प्राकृतिक है, क्योंकि न्याय प्रकृति का ही मूल गुण है।बुद्धिजीवी इसे “Nature balances its act” की क्रिया से निरूपित कर देते है। हमे ज्ञात है भिन्न-भिन्न चिकित्सा पद्धतियाँ – यूनानी, चीनी, आयुर्वेद, मिस्री – आदि वहाँ की सभ्यता एवं उसी आधार पर जन्मी चिंतन प्रक्रिया का ही प्रारूप है। इसी के आधार पर हम कह सकते हैं कि सभ्यताओं के विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उद्यम व उपक्रम भी भिन्न होते हैं। भारतीय सभ्यता इसका एक मूल उदाहरण है, जहाँ यदि रोजमर्रा की घरेलू क्रियाओं पर ध्यान दें तो पता चलेगा की यहाँ क्रिया-कलापों और संज्ञाओं का सूक्ष्म वर्गीकरण उपस्थित है। जैसे भारतीय सभ्यता ही घी और मक्खन का अंतर करती है। यह एक बहुत सूक्ष्म परख है जो प्राचीन भारतीय जीवन के अन्य क्षेत्रों जैसे खेती, शिक्षा, चिकित्सा, राज्यव्यवस्था, न्याय व्यवस्था आदि में खोजी जा सकती है।

मक्खन से घी बन जाने की यात्रा जटिल है परन्तु घी की आवश्यकता इस सभ्यता को क्यों पडी? संसार की अन्य सभ्यताएँ भी मक्खन में संतुष्ट थी। घी भारतवासियों की परंपरा का अभिन्न अंग है। जन्म, भोजन, यज्ञ , चिकित्सा और अंतिम क्रियाएँ घी की आहुती से पूर्ण होती हैं, इसके वैज्ञानिक कारण हैं। पश्चिमी सभ्यता रुचिकर भारतीय परम्पराओं का अंगीकरण कर रही है। योग हो या शुद्ध शाकाहारी भोजन परंपरा, उनका सन्दर्भ भारतीय ही है फिर चाहे वे उसका वरण कैथोलिक छतरी में करते हों। विश्व की आवश्यकता ने उसे वैश्विक गाँव बनाया है और गाँव में आवश्यकता अनुसार सहायता और सहभागिता का चलन ही उसे स्थिर रख पाता है। अतः किसका सामान किसके पास है यह तो पता होना चाहिए अन्यथा विवाद होगा।

विद्वान इसी विवाद को ‘Clash of Civilizations’ की संज्ञा देते हैं। अब सभ्यताओं की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे अपने सामान की सूची तैयार करें जो पूर्ण रूप से सत्यापित हो, प्रयोगिक हो और सर्वमान्य भी हो। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘Intellectual Property Rights‘ इसी विवाद को ध्यान में रखते हुए प्रतिपादित किए गए हैं। भारतीय सभ्यता ने एक सहस्त्राब्दी की लम्बी ग़ुलामी के दौर से वापसी की है। यह स्वाभाविक है कि अब उसे अपने अस्तित्व की कसौटी से गुजरना है, अपनी खोयी हुई गरिमा को पुनः स्थापित करना है। अब यह अति आवश्यक हो जाता है की स्वतंत्र भारत में हम अपनी स्वदेशी व्यवस्थाओं से कुरीतियों और अव्यवस्था को विस्थापित कर दें। यह तभी संभव है जब स्वदेशी व्यवस्थाओं पर पुनः शोध प्रारम्भ हो और उन्हें प्रयोग में लेकर सत्यापित तथा स्थापित किया जाए।

गत वर्षों में भारत सरकार ने एक निर्णय किया था कि देश में यह मूल्यांकन किया जाए कि कितना सोना किस व्यक्ति के अधिकार में है, ज्ञात हो जाए और इसके बाद उसे चलन में लाया जाए। यह देश की आर्थिक उन्नति में लाभदायक सिद्ध हो सकता था, निहित भ्रष्टाचार पर चोट हो सकती थी परन्तु ‘Standard Reference Material’ के तौर पर उच्च गुणवत्ता का सोना ही उपलब्ध नहीं था जो की भारतीय मानकों पर आधारित हो और स्वदेशी भी हो। इतनी महीन समस्याओं के समाधान के लिए भी हमारे वैज्ञानिक संस्थान पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं हो पा रहे हैं।

इसका कारण खोजने के लिए शोधार्थियों को कुछ नीचा देखना पड़ सकता है परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि हम आलसी या मंद बुद्धि हो गए हैं बल्कि हम कुछ दिशाहीन हैं। इस पथभ्रष्टता के पीछे विफल हो चुकी नीतियों का भारत जैसे विकासशील देश में लागू हो जाना है। जो हमे दिन प्रतिदिन अंधी दौड़ में लगा रही है जिसके अगुवा सफल और विकसित देश हैं। इन्ही विकसित देशों की विफल वैज्ञानिक, सामाजिक, नैतिक, न्यायिक, नीतियों  के आगे हम अपनी स्वदेशी व्यवस्थाओं को बौना कर रहे हैं।

हमे चाहिए कि हम अच्छे से अच्छे शोध के माध्यम से इन्ही स्वदेशी व्यवस्थाओं को उन्नत करें, नीतियाँ उन्नत करें। इस कार्य के लिए सरकारों की सुदृढ़ इच्छाशक्ति अति आवश्यक है जहाँ ये समझा जाए की स्वदेशी शोध का क्या महत्त्व है और उसकी क्या आवश्यकताएँ हैं। हमारी न्याय व्यवस्था भी इसी स्वदेशी शोध से उत्पन्न सन्दर्भों के आभाव में विदेशी सन्दर्भों पर भरोसा कर न्याय एवं सुझाव देती है। फिर चाहे वो न्याय भारतीय परम्पराओं को अस्वस्थ कर दे। यही मुख्य वजहों में से एक है कि भारतीयता, पाश्चात्य सभ्यता का लिबास ओढ़ रही है। सरकारों की कमज़ोर इच्छाशक्ति, शोध की दिशाहीनता, शोधार्थियों की पराधीन मानसिकता इस उन्नति में मुख्य रूप से बाधक हैं। इनमें से कुछ समस्याएँ हमारे परिवेश और वातावरण के कारण होती हैं जो अस्थायी और उपचार योग्य हैं।

एक वीभत्स और भयानक समस्या भी हैं जिसे ‘अज्ञात के भय‘ की संज्ञा दी जा सकती है।  यह समस्या शिक्षाविदों की ‘सामंतवादी मानसिकता की जड़ता’ के कारण है। जिसमें एक खास शिक्षण क्षेत्र के प्राध्यापक या शोधकर्ता स्वयं को उस क्षेत्र का क्षेत्रपाल समझने लगते हैं और किसी भी नवीनता का पुरजोर विरोध करते हैं। समयानुकूल परिवर्तन के प्रति जड़ रवैया रखते हैं। यह तबका सदैव व्यवस्थाओं और सरकारों के प्रति शिकायतपूर्ण, निंदात्मक रहा करता है। अपनी जन्मभूमि और पहचान पर शर्मिन्दा रहता है। अपनी पात्रता के औज़ार से रोज़ नई परिभाषाएँ गढ़कर सामाजिक एकता और देश की सम्प्रभुता को चुनौती देता है। निकट इतिहास में कॉन्ग्रेस सरकार में देश के प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह जी को परमाणु समझौते पर इसी गिरोह ने झुकाया था।

भारत में रक्षा समझौता हो या कोई सामाजिक, आर्थिक, नीति यह गिरोह उसे समस्या बनाकर प्रस्तुत करने में महारथी है। यह परम्परा तब और आगे चली जाती है जब इसी गिरोह के हाथों नई पीढ़ी का चयन यथास्थिति बनाए रखने की दिशा में किया जाता है। नई नीतियाँ जो इस परंपरा के लिए मुफीद न हो, इस गिरोह को पीड़ा देती हैं। अतः इस मानसिकता से निजात पाने के लिए दृढ संकल्प, सकारात्मक इच्छाशक्ति और कड़ी मेहनत की आवश्यकता है।

अभी 25 मार्च 2019 को एक घटना सामने आयी जिसमें केरल विश्वविद्यालय के अंग्रेजी संस्थान की प्रोफेसर डॉ मीणा. टी. पिल्लई, जो कि अंग्रेजी और तुलनात्मक साहित्य अध्ययन बोर्ड की सदस्य भी हैं, ने अपनी सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया। डॉ पिल्लई ने विश्वविद्यालय के द्वारा सभी विभागाध्यक्षों को जारी उस सर्कुलर के विरोध में पद त्याग दिया जिसमे लिखा था- “All the Heads of the Department are hereby directed to convene the meeting of faculties and to prepare a shelf of projects to be taken for research study pertaining to their subject considering national priorities. The student can opt from the shelf of projects.”

यह सर्कुलर मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उस सुझाव पर जारी हुआ जिसमें यह अनुशंसा की गयी की पीएचडी का रुझान उन शीर्षकों की ओर जाए जो राष्ट्रहित में हैं। अब यदि सरकार को समस्या समझ में आई है तो यह गिरोह समस्या बन रहा है। इसे राष्ट्र खतरे में लगने लगा है क्योंकि इनकी राष्ट्रीयता निर्धारण की स्वयंभू प्रभुसत्ता को चुनौती मिल रही है। इन क्षेत्रपालों का शासन क्षेत्र संकट में है।  क्या कारण है कि देश के अन्य संस्थानों जिनमें “Institute of Eminence” भी निहित हैं, ने इस अनुशंसा पर हो रही शुरूआती राजनीति पर अब तक कोई अपेक्षित स्वभाविक प्रतिक्रिया नहीं दी? अगर यह एक गलत मंशा है तो? जबकि इन्हीं संस्थानों के प्रोफेसर वैश्विक पटल पर एक पहचान रखते हैं।

इस खास तरह के गिरोह के शोध कार्य का तुलनात्मक अध्ययन मानकों के आधार पर जैसे “एच इंडेक्स”, “साइटेशन”, “Peer Reviewed Journals”  किया जाए तो पता चलेगा कि सभी प्रकाशित पत्रों में कितने राष्ट्रहित में है, कितने साधनवाही हैं या सिर्फ ऐसी समस्याओं का प्रतिपादन है जो इस समाज के बीच वैमनस्य और भेद को जन्म दे रही है। उपरोक्त मानकों की बात तो दूर की कौड़ी है। इतना हल्ला क्यों मचाया है भाई? क्योंकि बात यह है कि सर्कुलर में ‘नेशनल इंट्रेस्ट’ शब्द ही क्यों सम्मिलित किया गया है? इस गिरोह की मनोदशा क्या है? ये कौन लोग हैं जो इस बात को झुठलाना चाहते हैं कि राष्ट्रहित का चिंतन किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में और वामपंथी व्यवस्था में भी जनता के द्वारा चुनी गयी सरकार का परम कर्तव्य होता है।

जिन्हें “राष्ट्रहित” शब्द से ही परहेज़ हो उनके विषय में क्या समझा जाना चाहिए? यहाँ अंग्रेजी के “बोर्ड ऑफ़ स्टडीज” के मेंबर के रूप में इनकी उपयुक्तता बनती थी? यह पाठक स्वयं निर्धारित करें। ये भी साफ़ है कि डॉ पिल्लई ने नौकरी से इस्तीफ़ा नहीं दिया। ये वैसा ही है जहाँ “अवार्ड वापसी गिरोह” पुरस्कार की राशि डकार कर मोमेंटो ही वापस करता है और दबाव बनाता है। यह उनकी अपनी निजी स्वतंत्रता भी हो सकती है कि वो ऐसा कर रही हैं परन्तु विषय गंभीर हो जाता है जब शशि थरूर और राहुल गाँधी जैसे राजनेता इसका समर्थन कर रहे हैं, ट्वीट और रीट्वीट कर रहे हैं।

पूर्व में ही गढ़ी जा चुकी इस राजनैतिक पृष्ठभूमि में डॉ पिल्लई केवल बलि का बकरा ही साबित होने वाली हैं। या यूँ कहा जा सकता हैं ऐसा उन्होंने स्वयं के लिए चुना हैं। यह ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बौने लोग रातों रात कीर्तिमान बनाकर प्रस्तुत होते हैं। इनके बौनेपन की ये प्रमाणिकता होती है की ये नतीज़न कुछ न कर पाने में पारंगत हैं। वो एक हिंदी की कहावत है – वही ढाक के तीन पात, न चौथा लगे, न पाँचवे की आस। निकट भविष्य में भारतीय शिक्षाविद जगत में षड्यंत्रजनित भारी भूचाल का अंदेशा है। इस गिरोह का सर्वोत्तम गुण है कि जो नीति देश हित में हो ये उसके खिलाफ जान की बाज़ी लगाता है।  इसकी शिनाख्त आवश्यक है अतः देश का शोधार्थी अपने कर्त्तव्य और राष्ट्रिय चरित्र का वहन करे

लवी त्यागी
रिसर्च स्कॉलर
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