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मोदी बनाम गडकरी, भाजपा का सीक्रेट ‘ग्रुप 220’, और पत्रकारिता का समुदाय विशेष

मीडिया ने अपनी तरफ से कसर नहीं छोड़ी है कैम्पेनिंग में। लगातार नए झूठ बनाए गए, विचित्र तरह के सवाल उठाए गए, लेकिन हर तरफ से लगातार मुँह की खाने के बाद भी मीडिया ने मोदी को किसी भी तरह नीचे लाने के लिए अपनी रचनात्मकता, जिसे अंग्रेज़ी में क्रिएटिविटी कहते हैं, नहीं छोड़ी। हमने और आपने पिछले कुछ समय में ‘मोदी की जगह गडकरी’ वाली बात ज़रूर सुनी होगी।

ये वही मीडिया है, और ये वही लम्पटों का समूह है जो मोदी को घेरने के लिए एक हाथ पर यह कहता है कि विकास नहीं हुआ है, रोजगार कहाँ हैं, और दूसरे हाथ पर, फिर से मोदी को ही घेरने के लिए ही, यह कहता है कि गडकरी ने सही काम किया है, उसका काम दिखता है।

ये बात मैं भी मानता हूँ कि मैंने मोदी को किसी भी हाइवे पर बेलचा लेकर गिट्टी और कोलतार के मिक्सचर को उड़ेलते हुए नहीं देखा। न ही मैंने मोदी को किसी भी जगह कोलतार के ड्रम के नीचे आग लगाकर उसे गर्म करता देखा। मीडिया ने भी नहीं देखा, वरना कहते कि वो समुदाय विशेष वालों को जलाने के लिए ऐसा कर रहा है।

ख़ैर, जब मोदी ने न तो कोलतार खौलाया, न ही गिट्टी वाला मिक्सचर डाला, तो फिर इन्फ़्रास्ट्रक्चर बनाने का श्रेय मोदी को कैसे जाएगा?

तो बात यह है कि काम किया है गडकरी ने, इसलिए उसको प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए, ऐसी बात स्टूडियो में गम्भीर चेहरा बनाकर, लोकतंत्र को हर रात मारने के बाद, माउथ टू माउथ देकर अगले दिन फिर से मारने के लिए ज़िंदा करने वाले एंकर लगातार करते दिख जाते हैं। एंकर न भी दिखे तो माओवंशी लम्पट पत्रकार गिरोह आँखों में चमक लिए, ऐसा कहता, लिखता, या बोलता नज़र आ ही जाता है।

इसका उद्देश्य कोई देश सेवा नहीं है। इसका उद्देश्य यह क़तई नहीं है कि उन्हें सच में लगता है कि मोदी की जगह गडकरी बेहतर होगा। नहीं, इसका उद्देश्य बस इतना है कि किसी तरह भाजपा भीतर से टूटने लगे। भला पीएम बनने की लालसा किसे नहीं होती? स्टूडियो में बैठा पत्रकार भी पद्मश्री पाने के बाद, अपने आप को राज्यसभा के माध्यम से पीएम की कुर्सी पर पहुँचने का सपना ज़रूर देख लेता है।

ऐसे में किसी नेता को यह बताना कि तुम्हारी क़ाबिलियत मोदी से ज्यादा है, और तुम्हें मीडिया का भी समर्थन हासिल है, यह एक ऐसा ऑफ़र है, जो वन कान्ट रिफ्यूज टाइप का है। आप जरा सोचिए इस बात को ठीक से कि इसके पीछे की मंशा क्या हो सकती है। नितिन गडकरी एक ऐसे मंत्री हैं जो भाजपा अध्यक्ष रह चुके हैं, मंत्रालय का काम हर शहर और गाँव में दिख रहा है, भाजपा के उन चुनिंदा मंत्रियों में हैं जिनके बारे में मीडिया और सोशल मीडिया ऑर्गेनिकली लिखता है।

ये एक तरीक़ा होता है एकता को तोड़ने का। लेकिन मीडिया यहाँ पर एक गलती कर रहा है। ‘दो सिगरेट हैं आपके पास और माचिस/लाइटर न हो, तो कैसे जलाएँगे’ वाले चुटकुले में आपको एक सिगरेट की बड़ाई करनी होती है और दूसरा ईर्ष्या से जल जाता है। मीडिया का लाइन यही है कि किसी तरह इस पार्टी के कोर ग्रुप में दरार पैदा करो, और महात्वाकांक्षा अपना काम कर देगी।

मीडिया यह भूल गई कि भाजपा उन मूल्यों से चलने वाली पार्टी नहीं है जिसमें इस तरह की बचकानी बातों से दरार आ जाए। जब मोदी राष्ट्रीय राजनीति में नहीं थे, तब उन्हें भाजपा ने नेतृत्व दिया था। अब तो उनके पास अनुभव है, हर तरह के काम हैं दिखाने के लिए, और जनता में स्वीकार्यता है, तब फिर भाजपा के भीतर कौन ऐसा मूर्ख होगा जो उससे अलग होकर अपनी सीट गँवाना चाहेगा?

जब मैं सीट गँवाने की बात करता हूँ तो मैं बहुत गम्भीर हूँ। सीट गँवाने से मतलब यह है कि जनता के लिए मोदी और भाजपा एक हैं, सरकार ‘मोदी सरकार’ के रूप में ज़्यादा प्रसिद्ध है, न कि राजग सरकार के रूप में। इसमें बहुत लोग तानाशाही खोज निकालेंगे, उनके लिए आयुष्मान योजना का प्रावधान है। मोदी सरकार का मतलब यह है कि सरकार और उसके मंत्रियों ने मिलकर ऐसा काम किया है कि कैबिनेट पार्टी के नाम से ऊपर, अपनी नेतृत्व क्षमता के बल पर उभर का सामने आ रहा है।

तो, इस भ्रम में रहना कि गडकरी का नाम दस बार फेंककर वो गडकरी को मोदी के विरोध में खड़ा कर लेंगे, या मजबूर कर देंगे कि NDA के बाकी नेता मोदी से अलग जाकर, गडकरी के साथ हो जाएँ, ऐसा कहना या सोचना मानसिक कमजोरी है। इसका मतलब है कि आपको राजनीति और मानवीय भावों को परखना नहीं आता। 

जब बाकी दलों के नेता मोदी-शाह के कारण भाजपा में आना चाह रहे हैं, तो यह सोचना कि चुनावों के बाद कम सीट पड़ जाने पर कोई इन दोनों को मजबूर कर देगा, ये सस्ते नशे से उपजा हुआ विचार है। मोदी और शाह मजबूर नहीं होते, उनके जलवे से बाकी लोग मजबूर होकर भाजपा में आ रहे हैं। आप उन दो व्यक्तियों की संगठन क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं जिन्होंने अल्पमत के बावजूद सरकारें बना रखी हों! 

अब बात आती है कि क्या भाजपा को वाक़ई में बहुमत नहीं मिल पाएगा? संभव है कि ऐसा हो जाए। संभव है कि कर्नाटक की तरह केन्द्र में भी यूपीए की सरकार बनकर आ जाए जिसमें हर पार्टी की साझेदारी हो। और संभव है कि भाजपा को तीन सौ से ज़्यादा सीटें मिल जाएँ। संभव कुछ भी है, लेकिन मीडिया संभव की संभावना को प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही।

बाद में 220 सीट मिले, यह एक संभावना है, लेकिन अभी से ही यह तय कर दिया जाए कि बाद में 220 सीट ही मिले, इसे सधा हुआ कैलकुलेशन कहते हैं। यहाँ आप विचारों से संभावना को निश्चितता की तरफ ढकेलते नज़र आते हैं। यहाँ आप डेस्पेरेशन में एक दाँव खेलते हैं कि लेट्स थ्रो सम शिट् ऑन द वाल एंड सी व्हाट स्टिक्स! 

लेकिन, जब दीवार पर आपने फेंकी ही टट्टी है, तो चिपककर कुछ रह ही गया, तो उसका क्या हो पाएगा! अब उम्मीद का क्या करें, आशा पर ही जीवन चलता है। मीडिया यही आशा कर रहा है। मठाधीश लगे हुए हैं कि किसी तरह एक काल्पनिक बात को मेनस्ट्रीम किया जाए, और लोगों के बीच इस पर चर्चा चलाई जाए। 

इसके केन्द्र में एक और ढकोसला है कि मोदी की छवि हार्ड कोर हिन्दुत्व नेता की तरह है, और कुछ लोग थोड़ा माइल्ड नेतृत्व चाहते हैं। पहली बात तो यह है कि मोदी हार्ड कोर हिन्दू ही नहीं बन पाया, और उसके कारण गाली भी खूब सुन रहा है। दूसरी बात यह है कि माइल्ड और अल्ट्रामाइल्ड सिगरेट होता है, सत्ता के नेतृत्व का एक ही ध्येय होता है: सत्ता पाना, सत्ता में होना, सत्ता को पास रखना, और हर बार सत्ता में आना।

मोदी के समर्थक तो चाहते हैं कि वो थोड़ा हार्डकोर हो। वो तो इस बात से नाराज हो जाते हैं कि वो ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात मोदी क्यों करता है जबकि समुदाय विशेष तो उसे वोट देने से रहा। कुछ समर्थकों ने इस पर कई बार सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी बात रखी है कि मोदी को हिन्दुओं की बात करनी चाहिए क्योंकि हिन्दुओं ने उसे जिताया है।

इसलिए हार्ड और सॉफ़्ट वाला लॉजिक एकेडेमिक डिबेट और डीटैच्ड लॉजिक वाले पैनल डिस्कशन में खूब चलता है। इन लोगों ने जानबूझकर यह सोच रखा है कि जनता यही सोचती है। लेकिन, जनता क्या सोचती है, उसके लिए बाहर निकलना पड़ता है।

खैर, नितिन गडकरी को सच्चाई पता है, और उन्हें अपनी सीमाओं का भी भान है। इसलिए वो ऐसी अफ़वाहों को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं कि भाजपा में एक ऐसा ग्रुप है जो चाहता है कि मोदी को 220 सीटें मिलें ताकि गडकरी को पीएम बनाया जाए। इसके भीतर का एक अनकहा लॉजिक यह बताया जाता है कि मोदी किसी को पैसा बनाने नहीं दे रहा, इसलिए मंत्री सत्ता तो चाहते हैं लेकिन प्रधानमंत्री की जगह मोदी को छोड़कर किसी और को चाहते हैं। 

ये लॉजिक नहीं है, ये लम्पटों के भीतर बैठा चोर है जो सही चलती व्यवस्था पर विश्वास ही नहीं कर पा रहा कि कॉन्ग्रेस काल की डकैती क्यों नहीं हो पा रही। अब उनके पास कोसने के लिए रवीश जैसे लोगों के पास जो सवाल बचे हैं उनमें से प्रमुख यह हैं कि ‘आप मोदी से सवाल पूछिए कि कितने कपड़े पहने थे, रैलियों के डिज़ायनर कपड़े कहाँ से आते हैं।’ मैं मजाक नहीं कर रहा, द वायर के एक कार्यक्रम में सरकार से सवाल पूछने को उकसाते हुए रवीश ने यही सवाल पूछने को कहा था।

इसलिए चिल मारिए। टीवी खूब देखा कीजिए, सोशल मीडिया पर खूब लिखिए। जो मन में आता है लिखिए। ये समय चुप रहने का नहीं है। लिखना नहीं आता, तो बोलिए।अगर आपके कारण पाँच आदमी प्रभावित हो रहा है, तो कीजिए। चाहे आप जिस विचारधारा से चलते हों, तर्क का दामन मत छोड़िए। थोड़ा दिमाग लगाइएगा तो पता चल जाएगा कि मीडिया आपको कैसे प्रभावित करने की कोशिश में है। 

जब मीडिया नितिन गडकरी को, इंटरव्यू के लिए समय लेने के बाद, इस तरह से भटकाने की कोशिश करता है, तो आप तो फिर भी आम जनता कहलाते हैं। 

इस आर्टिकल का वीडियो यहाँ देखें

राहुल गाँधी की सुस्त रणनीति से चिंतित मीडिया, ‘इन्वेस्टमेंट’ खतरे में

इस बात में कोई दोराय नहीं कि नरेन्द्र मोदी के मुकाबले में आज कोई राष्ट्रीय रूप से पहचाने जा सकने वाला नेता है तो वह कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ही हैं। हालाँकि इसमें उनकी खुद की मेहनत शायद ही है। मेहनत अगर किसी का है तो वो उनके खानदान का है और उससे भी ज्यादा योगदान कुलीनतंत्र यानि Oligarchy की मलाई काटने के आदी हो चुके मीडिया के समुदाय विशेष का।

मोदी के सामने राहुल गाँधी की न तो उपलब्धियों की कोई ऐसी गंभीर फेहरिस्त है, न ही कोई ऐसी ‘गेम-चेंजिंग’ वैकल्पिक विचारधारा या योजना। बावजूद इसके, मीडिया के एक धड़े ने 5 साल तक यह उम्मीद नहीं छोड़ी कि कभी तो राहुल गाँधी उनके तारणहार बनेंगे! राहुल 2.0, 2.5, चिर-युवा- कोई ‘रूप’ नहीं बचा, जिसका आह्वाहन नहीं किया।

और अब जबकि इस सारी मेहनत के बाद अंततः लोगों ने राहुल गाँधी को थोड़ा-बहुत गंभीरता से लेना शुरू किया, लगा कि चलो 5 साल की मेहनत बर्बाद नहीं होगी- गठबंधन के कंधे पर सवार होकर राहुल गाँधी किसी तरह सरकार शायद बना लेंगे, और इतने ‘इन्वेस्टमेंट’ पर कुछ तो ‘रिटर्न’ बन ही जाएगा! पर राहुल गाँधी हैं कि गठबंधन पक्का करने में देर किए जा रहे हैं, और मोदी-शाह इस देरी का फायदा ले रहे हैं। ज़ाहिर सी बात है कि मीडिया के एक धड़े में कॉन्ग्रेस की संभावित हार को लेकर अफरा-तफरी का माहौल है।

निष्पक्षता का अब आवरण भी नहीं

नीचे इन ट्वीट्स में जो चिंता है, वह किसी नेता या घोषित आग्रह वाले व्यक्ति की हो तो कोई आपत्ति नहीं हो सकती। पर निष्पक्षता का छद्म आवरण ओढ़कर पत्रकारिता के नाम पर राजनीति करने वालों को कम-से-कम आवरण का तो लिहाज करना चाहिए था।

पर शायद राहुल गाँधी की जीत और मोदी की हार पर इन्होंने इतना कुछ ‘दाँव’ पर लगा दिया है कि अब खुलकर अपनी असलियत दिख जाने की कीमत पर भी भाजपा को हराने की हिमायत करना इनकी मजबूरी है।

इस वार्तालाप का तो आधार ही मोदी को हराने की दिशा में क्या सही हो रहा है और कहाँ और ‘मेहनत’ करनी होगी, इस पर चर्चा है। (Click कर के पूरा वार्तालाप पढ़िए, और खुद तय करिए)

पुराना है ये नापाक हो चुका याराना

पत्रकारों का अपने काम की परिभाषा, यानि हो रही घटनाओं को यथास्थिति पत्रांकित करने, से आगे जाकर राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप आज का नहीं है। इसकी जड़ें शायद सत्ता और पत्रकारिता जितनी ही पुरानी होंगी। फिर कई सारे महान नेताओं ने भी अपने राजनितिक करियर की शुरुआत पत्रकारिता से की थी- वाजपेयी, प्रणब मुखर्जी, भगत सिंह, बोस, आडवाणी, और पत्रकारिता के gold-standard गणेश शंकर विद्यार्थी।

पर इन सभी ने तो अपने राजनीतिक आग्रह कभी छिपाए नहीं, खुल कर एजेण्डा अखबारों में एजेण्डा पत्रकारिता की। कई अन्य पत्रकारों ने यथासंभव निष्पक्ष पत्रकरिता करते हुए भी अपनी निजी पसंद-नापसंद भी बता दी ताकि उनके पाठक उनसे प्रभावित हुए बगैर तथ्यों के आधार पर निर्णय करें।

लेकिन नहीं! पत्रकारिता का यह समुदाय विशेष इन लोगों के ठीक उलट है। यह पत्रकारिता को तो केवल जरिये के तौर पर इस्तेमाल करता है- असली मकसद होता है पहले पाठकों के बीच अपना एक प्रभाव-क्षेत्र कायम करना, और फिर उस प्रभाव क्षेत्र का प्रयोग कर उन नेताओं का एजेण्डा आगे बढ़ाना, जो इस प्रभाव-मण्डल की कीमत दे सके।

हमारी बात पर यकीन न हो तो कॉन्ग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड में छपे इस लेख को देख लीजिए जिसमें कैसे इस कैंसर की कहानी सुनाई गई है।

मोदी ने इस पर रोक लगा दी थी- इसी का दुःख है जो छलक-छलक कर बाहर आ रहा है।

अब न तो कोई खबर चलाने के पैसे आ रहे थे, न दबाने के। यहाँ तक कि कैबिनेट नोटों की जिस ‘सप्लाई’ के ज़रिए ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ की सनसनीबाजी चलती थी, मोदी उस छेद को भी अगर बंद नहीं कर पाए तो बहुत छोटा जरूर कर दिया। राजदीप सरदेसाई का वो दर्द याद है कि अब प्रधानमंत्री के विशेष विमान में वीआईपी बनकर चलने नहीं मिलता??

तीसरी मलाई जो पहले कटती थी और अब बंद हो गई, वो है सत्ता की दलाली यानि ‘पावर-ब्रोकिंग’ की। सरकारें बनवाने, गिरवाने, और बचाने में नेताओं के करीबी पत्रकारों की भूमिका पर कई लोगों ने काफी कुछ लिखा है। दिल्ली प्रेस क्लब ही ‘लुटियंस ज़ोन’ शब्द के नकारात्मक हो जाने के पीछे सबसे बड़ा कारक है। अर्णब गोस्वामी ने तो यहाँ तक कहा था कि भारत में मीडिया हाउसों को मुख्यालय दिल्ली के बाहर कर देना चाहिए- चाहे वे मुंबई या बंगलौर से चलें, चाहे बिहार या दक्षिण भारत के गाँवों से, पर सत्ता से पत्रकारों की करीबी टूटनी चाहिए।

2G घोटाले में भी इसी समुदाय विशेष की विशेष सदस्या द्रमुक और कॉन्ग्रेस के बीच संवाद-सेतु का काम करते पकड़ीं गईं थीं।

राहुल गाँधी को वापिस लाने के लिए यह बेचैनी शायद इसी ‘पावर-ब्रोकिंग’ संस्कृति को वापिस लाने की जद्दोजहद है।

पूर्व मंत्री तारिक़ अनवर ने मोदी के वंश पर उठाए सवाल, कॉन्ग्रेस MLA ने बताया नामर्द

नरेंद्र मोदी द्वारा वंशवाद को लेकर लिखे गए ब्लॉग प्रकाशित होने के बाद कॉन्ग्रेसी नेता बौखला गए हैं और उन्होंने प्रधानमंत्री को लेकर व्यक्तिगत और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करनी शुरू कर दी हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री तारिक़ अनवर ने नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत छींटाकशी करते हुए कहा कि वे इस तरह बोल रहे हैं क्योंकि उनका कोई वंश ही नहीं रहा है। उन्होंने पूछा कि जिसका कोई वंश ही न हो, वो कैसे ये बातें कह सकता है? उन्होंने कहा कि चूँकि मोदीजी को आगे भी अपना वंश बढ़ाना नहीं है, इसीलिए इस तरह की बातें कर रहे हैं। तारिक़ अनवर के इस बयान की निंदा करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने इसे ‘बिलकुल घिनौना बयान’ करार दिया। अनवर पाँच बार लोकसभा और 2 बार राज्यसभा के सांसद रह चुके हैं।

भाजपा ने कहा कि तारिक़ अनवर का बयान कॉन्ग्रेसी नेताओं की सामूहिक वंशवादी मानसिकता को दर्शाता है जो केवल एक परिवार की ही गुलामी करना जानते हैं। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अनवर के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि देश के 130 करोड़ लोग ही मोदी के परिवार हैं। ये भाजपा में ही है, जहाँ एक बूथ स्तरीय कार्यकर्ता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकता है। उन्होंने नितिन गडकरी और अमित शाह का उदाहरण देते हुए ऐसा कहा। प्रसाद ने प्रधानमंत्री के उस बयान की याद दिलाई, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन पर फेंके जाने वाले गलियों के पत्थर से वे आगे बढ़ने के लिए सीढ़ी बना लेते हैं।

उधर कर्णाटक कॉन्ग्रेस के विधायक बी नारायण राव ने भी पीएम पर ओछी टिप्पणी करते हुए उन्हें नामर्द बताया। विधायक ने कहा कि जो लोग शादी कर सकते हैं लेकिन बच्चे नहीं पैदा कर सकते, वे नामर्द हैं। उन्होंने कहा कि मोदी झूठ बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं, काम करने वाले नहीं। नारायण कर्णाटक के बसवकल्याण से विधायक हैं। बीदर लोकसभा क्षेत्र के भीतर आने वाले बसवकल्याण से बी नारायण ने 2018 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की थी।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ब्लॉग में कॉन्ग्रेस और वंशवादी राजनीति पर करारा वार किया है। पीएम ने लिखा कि 2014 के जनादेश को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि तब भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर वंशवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था। उन्होंने लिखा, ‘तब आम चुनाव में देशवासियों ने भ्रष्टाचार में डूबी उस सरकार से मुक्ति पाने और एक बेहतर भविष्य के लिए मतदान किया था। जब कोई सरकार ‘फैमिली फर्स्ट’ की बजाए ‘इंडिया फर्स्ट’ की भावना के साथ चलती है तो यह उसके काम में भी दिखाई देता है। यह हमारी सरकार की नीतियों और कामकाज का ही असर है कि बीते 5 वर्षों में भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है।’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ब्लॉग को शब्दशः पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

आर्थिक भगोड़ा नीरव मोदी लंदन में गिरफ़्तार, भारत के दबाव के चलते लन्दन पुलिस ने की कार्रवाई

आर्थिक भगोड़े नीरव मोदी को लंदन में गिरफ़्तार कर लिया गया है। थोड़ी देर में उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा। लंदन मेट्रोपोलिटन पुलिस ने यह कार्रवाई की है। उसे वेस्टमिंस्टर मेजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश किया जाएगा। वैसे, विश्लेषकों का मानना है कि उसे ज़मानत मिल जाने की संभावना है लेकिन उसके बाद प्रत्यर्पण के लिए सुनवाई शुरू हो जाएगी।

लंदन के वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने आर्थिक भगोड़े नीरव मोदी के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट जारी किया था। एएनआई ने प्रवर्तन निदेशालय के सूत्रों के हवाले से यह सूचना दी थी। अंदेशा लगाया जा रहा था कि इसके बाद नीरव मोदी की कभी भी गिरफ़्तारी हो सकती है। दरअसल, बैंकों का 13000 करोड़ रुपया डकार कर फरार नीरव मोदी पिछले दिनों लंदन की सड़कों पर अपना लुक बदलकर निडर घूमता दिखा था। मीडिया के सवालों को उसने हँस कर टाल दिया था। उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी किया जा चुका था। इसके बाद ब्रिटेन की वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया और गिरफ़्तारी वॉरंट जारी किया था। अब उसे गिरफ़्तार भी कर लिया गया है। इसे भारत सरकार की एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

इस दौरान भारत में प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई की टीमें लंदन स्थित सम्बंधित विभागों से लगातार संपर्क में थी। भारतीय हाई कमीशन को भी संपर्क में रखा गया है। हाल ही में लंदन की सड़कों पर नीरव मोदी के दिखने के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी बयान जारी किया था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा था कि नीरव मोदी के प्रत्यर्पण को लेकर कार्यवाही की जा रही है। उन्होंने कहा था कि लंदन में उनके दिखने का मतलब यह नहीं है कि उसे तुरंत भारत लाया जा सकता है। इसके लिए एक चरणबद्ध प्रक्रिया होती है, जिसे पूरी की जा रही है। अब उसकी गिरफ़्तारी के बाद सरकार ने राहत की साँस ली होगी।

भगोड़ा हीरा कारोबारी नीरव मोदी लंदन में शानो-शौकत की ज़िंदगी जी रहा था। नवभारत टाइम्स में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, वह लंदन के वेस्ट एंड इलाके के जिस अपार्टमेंट में रह रहा है, उसकी कीमत 73 करोड़ रुपए के आसपास है। नीरव मोदी ने अपने आवास से कुछ दूरी पर ही हीरे का नया कारोबार शुरू किया है, जो उसके फ्लैट से जुड़ा हुआ है। मई 2018 में उसने नई कंपनी बनाई थी, जो उसके अपार्टमेंट से लिंक्ड है। यह कंपनी घड़ी और जूलरी का होलसेल और रिटेल कारोबार करने के लिए लिस्टेड है। गिरफ़्तारी के बाद उसका प्रत्यर्पण भी हो सकता है।

ख़बर आई थी कि पंजाब नैशनल बैंक को ₹13000 करोड़ का चूना लगाने वाले भगोड़े हीरा कारोबारी के अवैध बंगले ध्वस्त किए जाएँगे। महाराष्‍ट्र के रायगढ़ जिले में अलीबाग बीच के पास उसके ‘अवैध’ बंगले हैं, जिन्हें इसी सप्ताह ध्वस्त किया जाएगा। ये वही बंगले हैं जहाँ कभी नीरव भव्‍य पार्टियाँ दिया करता था। हाल ही में इस बंगले को कलेक्‍टर ऑफ़िस ने जाँच के बाद अवैध घोषित किया था।

गोधरा कांड: 16 साल बाद पकड़ा गया याकूब, मिली उम्रकैद, ट्रेन में आग लगाकर 59 की जान लेने में था शामिल

साल 2002 के गोधरा मामले के आरोपित याकूब पटालिया को अहमदाबाद की एक विशेष एसआईटी अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। दरअसल, यह याकूब नाम का शख्स उसी भीड़ का हिस्सा था जिसने 27 फरवरी 2002 के दिन साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाई थी और जिस आग में 59 हिन्दुओं ने झुलसकर दम तोड़ दिया था।

याकूब के ख़िलाफ़ सितंबर 2002 में ही एफआईआर दर्ज हुई थी। जिसके बाद उसपर हत्या की कोशिश समेत आईपीसी की विभिन्न धाराओं के साथ मुकदमे चलाए गए थे। इनकी सजा से बचने के लिए वह तब से भाग रहा था, लेकिन विगत वर्ष पुलिस ने 16 साल बाद याकूब को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की और 64 वर्षीय याकूब को मामले की जाँच में जुटी एसआईटी को सौंप दिया।

इससे पहले 2015 में इस मामले में याकूब के भाई कादिर को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन मामले की सुनवाई के दौरान ही कादिर की जेल में मौत हो गई थी।

बता दें कि अक्टूबर 2017 में गुजरात के उच्च न्यायलय ने इस पूरे कांड में 11 आरोपितों की मौत की सजा को उम्रकैद में बदला था, और साथ में 20 आरोपितों की उम्रकैद की सज़ा को बरकरार रखा था। वहीं निचली अदालत ने इस मामले में 31 आरोपितों को दोषी ठहराते हुए 63 को बरी कर दिया था।

साल 2002 में 27 फरवरी को साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में गुजरात के गोधरा स्टेशन पर समुदाय विशेष के कुछ लोगों ने आग लगा दी थी, जिसमें 59 लोगों की मौत हो गई थी। मृतकों में अधिकतर कार सेवक थे। इस घटना के बाद 28 फरवरी से 31 मार्च तक गुजरात में दंगे भड़के। जिसके कारण 1200 से अधिक लोग मारे गए थे और साथ ही 1500 लोगों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज हुई थी।

गोवा में BJP सरकार ने हासिल किया विश्वासमत, CM सावंत को 20 विधायकों का समर्थन

गोवा के नए मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने सदन में बहुमत साबित कर दिया है। सावंत के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने फ्लोर टेस्ट 20-15 से पास कर लिया। बता दें कि 36 सदस्यीय गोवा विधानसभा में बहुमत के लिए 19 का जादुई आँकड़ा चाहिए होता है। भाजपा को इस से 1 अधिक यानि 19 विधायकों का समर्थन मिला, वहीं विरोध में सिर्फ़ 15 विधायक थे। इसी तरह 5 मतों के अंतर से प्रमोद सावंत के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने विश्वासमत हासिल कर लिया। प्रमोद सावंत को भाजपा के 11, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (MGP) के 3, गोवा फॉरवॉर्ड पार्टी (GFP) एवं 3 निर्दलीय का भी समर्थन मिला।

विरोध में कॉन्ग्रेस के 14 और शरद पवार की राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के 1 विधायक ने मत दिया। भाजपा के 7 विधायक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद सत्ता के लिए चल रही रस्साकशी में प्रमोद सावंत ने रात के 2 बजे ही शपथ ले लिया था।

गोवा में मनोहर पर्रिकर के उत्तराधिकारी के रूप में प्रमोद सावंत को पार्टी ने जिम्मेदारी सौंपी है। प्रमोद सावंत ने रात 2 बजे गोवा के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। प्रमोद सावंत को गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने पद और गोपनियता की शपथ दिलाई। बता दें कि प्रमोद सावंत के अलावा गोवा में दो डिप्टी सीएम भी बनाए गए हैं। इस अवसर पर प्रमोद सावंत ने कहा, “पार्टी ने जो जिम्मेदारी मुझे दी है उसे निभाने की मेरी पूरी कोशिश रहेगी। मैं जो भी कुछ हूँ मनोहर पर्रिकर की वजह से ही हूँ। उन्होंने ही मुझे राजनीति में लाया और उन्हीं के बदौलत मैं गोवा विधानसभा का स्पीकर बना।”

पेशे से किसान और आर्युर्वेदिक डॉक्टर प्रमोद सावंत मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने से पहले गोवा विधानसभा के अध्यक्ष हैं। 45 वर्षीय डॉ. सावंत की पत्नी सुलक्षणा भी बीजेपी में नेत्री हैं और साथ में शिक्षिका भी हैं। गोवा बीजेपी के नेता 45 साल के डॉ. प्रमोद सावंत का जन्म 24 अप्रैल 1973 को हुआ। सैंकलिम विधानसभा क्षेत्र से चुनकर आए डॉ. प्रमोद सावंत का पूरा नाम डॉ. प्रमोद पांडुरंग सावंत है।

तेलंगाना में कॉन्ग्रेस को झटका, पूर्व मंत्री व दिग्गज नेता डीके अरुणा हुईं BJP में शामिल

तेलंगाना में कॉन्ग्रेस पार्टी को बड़ा झटका लगा है। जहाँ बंगाल से लेकर गुजरात तक पार्टी के नेता लगातार दूसरे दलों में शामिल हो रहे हैं, तेलंगाना में पूर्व मंत्री डीके अरुणा ने भी भाजपा का दामन थाम लिया है। डीके अरुणा तेलंगाना की एक शक्तिशाली राजनीतिक परिवार से आती हैं और उनका परिवार 1957 से ही गडवाल की राजनीति का एक अहम हिस्सा रहा है। अरुणा के भाजपा के टिकट पर महबूबनगर से चुनाव लड़ने का क़यास लगाए जा रहे हैं। भाजपा में शामिल होने के बाद अरुणा ने कहा:

“तेलंगाना में कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए थोड़ी भी उम्मीदें नहीं बचीं हैं और अपने लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए मैंने भाजपा में शामिल होने का निर्णय लिया है। भाजपा सत्ता में वापस लौटेगी और नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे।”

डीके अरुणा के ससुर सत्या रेड्डी 1957 और 1978 में गडवाल के विधायक बने थे। 1983 और 1985 में उनके बेटे समर सिम्हा रेड्डी क्षेत्र के विधायक बने। अरुणा समर रेड्डी के भाई भरत रेड्डी की पत्नी हैं। अरुणा गडवाल में अपने परिवार की राजनीतिक प्रतिष्ठा को आगे ले जाने में सफल रहीं और उन्होंने 2004, 2009 और 2014 में जीत कर विधानसभा पहुँचीं। 1994 में उनके पति भरत सिम्हा रेड्डी ने भी जीत दर्ज की थी। उस चुनाव में दोनों भाई आमने-सामने थे। अरुणा के पिता चित्तम नरसी रेड्डी भी कॉन्ग्रेस के टिकट पर मकथल से विधायक बने थे।

डीके अरुणा राज्य के मुख्यमंत्री के चद्रशेखर राव से अपने तल्ख़ रिश्तों के लिए भी जानी जाती हैं। दोनों के बीच अक्सर बयानबाज़ी का दौर चलता ही रहता है। अरुणा के पिता एवं भाई की 2005 के एक नक्सली हमले में हत्या कर दी गई थी। उसके बाद उनके दूसरे भाई राम मोहन रेड्डी विधायक बने थे। कुल मिला कर देखें तो अरुणा के साथ-साथ उनके पिता, पति, भाई, ससुर और देवर- ये सभी विधायक रह चुके हैं। अरुणा राजशेखर रेड्डी और रोसैया की कैबिनेट में राज्यमंत्री रह चुकी हैं।

जोगुलाम्बा गड्वाल जिले के गठन में भी अरुणा अहम भूमिका थी। उन्होंने इसके लिए के चंद्रशेखर राव पर दबाव डाला था। उनका घर क्षेत्र की राजनीति का मुख्यालय माना जाता है। भाजपा ने डीके अरुणा का स्वागत करते हुए कहा कि उनके आने से तेलंगाना में पार्टी को मज़बूती मिलेगी। 2018 के विधानसभा चुनाव में 119 सदस्यीय तेलंगाना विधानसभा में कॉन्ग्रेस के 19 विधायक जीत कर पहुँचे थे, जिसमे से 8 विधायक पार्टी छोड़ कर टीआरएस में जा चुके हैं।

‘अश्लील वीडियो बनाकर सेवादारों ने किया था ब्लैकमेल’, पुलिस ने पेश किया 366 पन्नों का चालान

12 जून 2018 को मध्य प्रदेश के इंदौर में भय्यूजी महाराज की खुदकुशी ने सबको हैरानी में डाल दिया था। सबके भीतर सवाल उठ रहे थे कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया? उस दौरान पूरे मामले की जाँच को उनके सुसाइड नोट के भरोसे छोड़ दिया गया था।

लेकिन, अब जाँच के बाद जो तथ्य निकलकर सामने आए हैं, वो बेहद हैरान करने वाले हैं। सोमावार (मार्च 18, 2019) को आज़ाद नगर सीएसपी सुरेंद्र सिंह तोमर ने 366 पेज का चालान कोर्ट में पेश किया। इसके मुताबिक भय्यूजी महाराज ने सुसाइड तो किया था लेकिन अपने तीन सेवादारों से परेशान और उनकी ब्लैकमेलिंग से तंग आकर।

इस चालान में दावा किया गया है कि भय्यूजी ने अपने सेवादार विनायक दुधाले, शरद देशमुख और पलक पुराणिक की ब्लैकमेलिंग से तंग आकर खुदकुशी की। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक इस मामले की छानबीन में 125 लोगों से पूछताछ की गई और 28 लोगों के बयान दर्ज हुए। साथ ही 12 चश्मदीदों के दिए बयानों का भी दो से अधिक बार परीक्षण किया गया।

इसी बीच पुलिस ने भय्यूजी महाराज के सेवादारों पलक, विनायक और शरद की चैटिंग की जाँच से पाया कि यह तीनों ही उनकी संपत्ति हासिल करने के लिए 2 साल से उनके साथ रहकर बड़ी साजिश रच रहे थे।

चूँकि भय्यूजी डिप्रेशन की बीमारी से जूझ रहे थे तो ऐसे में ये सेवादार उन्हें डॉक्टर द्वारा दी गई दवाई को हाई डोज में देते थे, जिससे वह तीन-तीन दिन तक बेहोशी की हालत में सोए रहते थे। इसी दौरान पलक और भय्यू महाराज के कई अश्लील तस्वीरें खींची गईं, जिसके बाद उन्हें ब्लैकमेल किया जाने लगा।

ब्लैकमेलिंग से परेशान होकर वह मानसिक रूप से बीमार हो गए। जाँच के आधार पर पुलिस का दावा है कि सुसाइड नोट को सेवादारों ने षड्यंत्र के तहत आत्महत्या करने से पहले लिखवाया था।

खबरों के मुताबिक पलक भय्यू जी के संपर्क में पिछले दो साल से थी और वह उनसे शादी भी करने को इच्छुक थी, लेकिन इस बीच महाराज ने डॉ. आयुषी से शादी कर ली। जिसके बाद पलक ने काफ़ी हंगामा किया और उन्हें 16 जून तक शादी करने का समय दिया था।

भय्यूजी महाराज से यह तीनों सेवादार ₹1.5 लाख महीना लेते थे। इसके अलावा ये लोग महाराज को ब्लैकमेल करके एक करोड़ से ज्यादा राशि पहले ही हड़प चुके थे और साथ ही आश्रम की संपत्ति को हथियाने के लिए तिजोरी और दान में मिलने वाली सामग्री का लेखा-जोखा अपने कब्जे में कर लिया था।

मसूद अज़हर के पीछे अब पड़ गया जर्मनी, ग्लोबल आतंकी घोषित कराने के लिए EU में प्रस्ताव किया पेश

वैश्विक स्तर पर भारत को एक और कूटनीतिक सफलता मिलती दिख रही है। यूरोपियन यूनियन में मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित कराने के लिए जर्मनी ने पहल किया है। बता दें कि पुलवामा में हुए हमले के बाद से भारत लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को घेरने की जुगत में लगा हुआ है। इसमें उसे सफलता भी मिलती दिख रही है। पहले सुरक्षा परिषद के सभी देशों द्वारा संयुक्त रूप से पुलवामा हमले की निंदा करना और फिर पाकिस्तान को मिले एमएफएन का दर्जा वापस लेना – भारत ने एक से बढ़ कर एक पहल कर के पाकिस्तान को सबक सिखाया। भारत द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकी कैम्पों पर की गई एयर स्ट्राइक के बदले पाकिस्तान ने एफ-16 से भारतीय सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, जिसके लिए अमेरिका भी उस से नाराज़ है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन के अड़ंगे के कारण जैश सरगना अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित नहीं किया जा सका लेकिन यूरोपियन यूनियन में ऐसा प्रस्ताव आने के बाद अब चीन पर भी दबाव बढ़ेगा। जर्मनी का अगर ये प्रस्ताव काम करता है तो यूरोप के क़रीब 28 देशों में मसूद अजहर के यात्रा करने पर बैन लग जाएगा। जर्मनी ने इस प्रस्ताव को अभी सिर्फ़ पेश किया है, इसी पर किसी तरह के समाधान का प्रस्ताव अभी पास नहीं हुआ है।

ख़बरों के अनुसार, जर्मनी का कहना है कि सभी 28 देश अपनी तरफ से इस बात के लिए पूरी कोशिश करेंगे कि पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे। इसे भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है। फ्रांस पहले ही मसूद अज़हर पर प्रतिबन्ध लगा चुका है। फ्रांस ने अन्य देशों से भी जैश पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने की अपील की थी। अड़ंगा लगाने पर अमेरिका ने चीन को फटकारते हुए बयान जारी किया था।

अमेरिका की ओर से जारी बयान में मसूद अज़हर को साफ तौर पर ग्लोबल आतंकी कहा गया था। तीखे शब्दों का प्रयोग करते हुए अमेरिकी बयान में इस तथ्य को उभारा गया था कि चौथी बार चीन ने मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित होने से बचाया है। और, उसे सुरक्षा परिषद को अपना काम करने देने में बाधक नहीं बनना चाहिए। दक्षिण एशिया में शांति और स्थायित्व के लिए चीन अगर प्रतिबद्ध है तो उसे पाकिस्तान या किसी भी देश के आतंकियों को संरक्षण नहीं देना चाहिए। अंत में बयान की भाषा और सख्त हो गई, जब चीन को एक तरह की वॉर्निंग देते हुए कहा गया कि यदि आतंकियों को संरक्षण देने की आपकी नीति में बदलाव नहीं आता है तो सुरक्षा परिषद के सदस्य देश अन्य कड़े कदम उठाने के लिए मजबूर होंगे।

संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की 1267 अलकायदा प्रतिबंध कमिटी के तहत अज़हर पर प्रतिबन्ध का प्रस्ताव रखा गया था। यह प्रस्ताव पुलवामा आतंकी हमले के बाद फ्रांस, इंग्लैंड और अमेरिका की ओर से पेश किया गया था। पुलवामा आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे। जिस तरह से सभी शक्तिशाली देश अज़हर को आतंकी घोषित करने की पहल में लगे हुए हैं, भारत को पाकिस्तानी आतंकी गतिविधियों के ख़िलाफ़ बड़ी सफलता मिलती दिख रही है।

‘जब भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर वंशवादी पार्टी को मिला था पूर्ण बहुमत’

लोकसभा चुनाव अब नजदीक है। ऐसे में लोकतंत्र का असली स्वरूप क्या होना चाहिए और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कैसे काम करना चाहिए – इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज एक ब्लॉग लिखा है। इस ब्लॉग में उन्होंने 2014 के चुनाव में मतदाताओं की प्राथमिकता से लेकर वंशवाद और सत्ता-सुखवाद तक का जिक्र किया है।

पढ़िए उस इंसान का ब्लॉग, जो न सिर्फ प्रधानमंत्री है बल्कि एक ऐसा शख्स भी जिसने बहुमत के बावजूद लोकतांत्रिक मूल्यों को जिन्दा रखने के लिए गठबंधन धर्म को भी बखूबी निभाया।

वह 2014 की गर्मियों के दिन थे, जब देशवासियों ने निर्णायक रूप से मत देकर अपना फैसला सुनाया:

परिवारतंत्र को नहीं, लोकतंत्र को चुना।

विनाश को नहीं, विकास को चुना।

शिथिलता को नहीं, सुरक्षा को चुना।

अवरोध को नहीं, अवसर को प्राथमिकता दी।

वोट बैंक की राजनीति के ऊपर विकास की राजनीति को रखा।

2014 में देशवासी इस बात से बेहद दुखी थे कि हम सबका प्यारा भारत आखिर फ्रेजाइल फाइव देशों में क्यों है? क्यों किसी सकारात्मक खबर की जगह सिर्फ भ्रष्टाचार, चहेतों को गलत फायदा पहुंचाने और भाई-भतीजावाद जैसी खबरें ही हेडलाइन बनती थीं।

तब आम चुनाव में देशवासियों ने भ्रष्टाचार में डूबी उस सरकार से मुक्ति पाने और एक बेहतर भविष्य के लिए मतदान किया था।

वर्ष 2014 का जनादेश ऐतिहासिक था। भारत के इतिहास में पहली बार किसी गैर वंशवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था।

जब कोई सरकार ‘Family First’ की बजाए ‘India First’ की भावना के साथ चलती है तो यह उसके काम में भी दिखाई देता है।

यह हमारी सरकार की नीतियों और कामकाज का ही असर है कि बीते पांच वर्षों में, भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है।

हमारी सरकार के दृढ़संकल्प का ही नतीजा है कि आज भारत ने सेनिटेशन कवरेज में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। 2014 में जहां स्वच्छता का दायरा महज 38% था, वो आज बढ़कर 98% हो गया है। हमारी सरकार के प्रयासों से ही हर गरीब का आज बैंक में खाता है। जरूरतमंदों को बिना बैंक गारंटी के लोन मिले हैं। भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया गया है। बेघरों को घर उपलब्ध कराए गए हैं। गरीबों को मुफ्त चिकित्सा की सुविधा मिली है और युवाओं को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर मिले हैं।

आज हर क्षेत्र में हुए इस बुनियादी परिवर्तन का अर्थ यह है कि देश में एक ऐसी सरकार है, जिसके लिए देश की संस्थाएं सर्वोपरि हैं।

भारत ने देखा है कि जब भी वंशवादी राजनीति हावी हुई तो उसने देश की संस्थाओं को कमजोर करने का काम किया।

संसद:

16वीं लोकसभा की कुल प्रोडक्टिविटी शानदार तरीके से 85% रही, जो 15वीं लोकसभा से कहीं अधिक है।

वहीं 2014 से 2019 के बीच राज्यसभा की प्रोडक्टिविटी 68% रही।

अंतरिम बजट सत्र में लोकसभा की प्रोडक्टिविटी जहां 89% रही, वहीं राज्यसभा में यह महज 8% देखी गई।

दोनों सदनों की प्रोडक्टिविटी के इन आंकड़ों का क्या अर्थ है, इसे देश भली-भांति जानता है। यह स्पष्ट हो जाता है कि जब भी किसी गैर वंशवादी पार्टी की संख्या सदन में अधिक होती है तो उसमें स्वाभाविक रूप से अधिक काम करने की प्रवृत्ति होती है।

देशवासियों को यह पूछना चाहिए कि आखिर राज्यसभा ने उतना काम क्यों नहीं किया, जितना लोकसभा में हुआ? वे कौन सी शक्तियां थीं, जिन्होंने सदन के भीतर इतना हंगामा किया और क्यों?

प्रेस और अभिव्यक्ति:

वंशवाद को बढ़ावा देने वाली पार्टियां कभी भी स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता के साथ सहज नहीं रही हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया सबसे पहला संवैधानिक संशोधन फ्री स्पीच पर रोक लगाने के लिए ही था। फ्री प्रेस की पहचान यही है कि वो सत्ता को सच का आईना दिखाए, लेकिन उसे अश्लील और असभ्य की पहचान देने की कोशिश की गई।

यूपीए के शासनकाल में भी ऐसा ही देखने को मिला, जब वे एक ऐसा कानून लेकर आए, जिसके मुताबिक अगर आपने कुछ भी ‘अपमानजनक’ पोस्ट कर दिया तो आपको जेल में डाल दिया जाएगा।

यूपीए के ताकतवर मंत्रियों के बेटे के खिलाफ एक ट्वीट भी निर्दोष आदमी को जेल में डाल सकता था।

कुछ दिनों पहले ही देश ने उस डर के साये को भी देखा, जब कुछ युवाओं को कर्नाटक में एक कार्यक्रम के दौरान अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की वजह से गिरफ्तार कर लिया गया, जहां कांग्रेस सत्ता में है।

लेकिन, मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि किसी भी तरह की धमकी से जमीनी हकीकत नहीं बदलने वाली है। अगर वे जबरदस्ती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रोकने का प्रयास करेंगे, तब भी कांग्रेस को लेकर लोगों की धारणा नहीं बदलेगी।

संविधान और न्यायालय:

25 जून, 1975 की शाम जब सूरज अस्त हुआ, तो इसके साथ ही भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की भी तिलांजलि दे दी गई।

तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा जल्दबाजी में दिए गए रेडियो संबोधन को सुनें तो स्पष्ट होता है कि कांग्रेस एक वंश की रक्षा करने के लिए किस हद तक जा सकती है।

आपातकाल ने देश को रातों-रात जेल की कोठरी में तब्दील कर दिया। यहां तक कि कुछ बोलना भी अपराध हो गया।

42वें संविधान संशोधन के जरिए अदालतों पर अंकुश लगा दिया गया। साथ ही संसद और अन्य संस्थाओं को भी नहीं बख्शा गया।

जनता की भावनाओं को देखते हुए इस आपातकाल को तो समाप्त कर दिया गया, लेकिन इसे थोपने वालों की संविधान विरोधी मानसिकता नहीं बदली। कांग्रेस ने अनुच्छेद 356 का लगभग सौ बार इस्तेमाल किया। सिर्फ श्रीमती इंदिरा गांधी ने ही लगभग पचास बार ऐसा किया। अगर उन्हें कोई राज्य सरकार या नेता पसंद नहीं आता था, तो सरकार को ही बर्खास्त कर दिया जाता था।

अदालतों की अवमानना करने में तो कांग्रेस ने महारत हासिल कर ली है। श्रीमती इंदिरा गांधी ही थीं, जो “Committed Judiciary” यानि ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ चाहती थीं। वो चाहती थीं कि अदालतें संविधान की जगह एक परिवार के प्रति वफादार रहें।

‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ की इसी चाहत में कांग्रेस ने भारत के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की नियुक्ति करते समय कई सम्मानित जजों की अनदेखी की।

कांग्रेस के काम करने का तरीका एकदम साफ है – पहले नकारो, फिर अपमानित करो और इसके बाद धमकाओ। यदि कोई न्यायिक फैसला उनके खिलाफ जाता है, तो वे इसे पहले नकारते हैं, फिर जज को बदनाम करते हैं और उसके बाद जज के खिलाफ महाभियोग लाने में जुट जाते हैं।

सरकारी संस्थान:

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपनी एक टिप्पणी में योजना आयोग को ‘A bunch of jokers’ यानि ‘जोकरों का समूह’ कहा था। उस समय योजना आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. मनमोहन सिंह थे।

उनकी इस टिप्पणी से साफ जाहिर होता है कि कांग्रेस सरकारी संस्थाओं के प्रति किस प्रकार की सोच रखती है और कैसा सलूक करती है।

यूपीए शासन के दौर को याद कीजिए, उस समय कांग्रेस ने CAG पर सिर्फ इसलिए सवाल उठाए थे, क्योंकि उसने कांग्रेस सरकार के 2G घोटाला, कोयला घोटाला जैसे भ्रष्टाचार को उजागर किया था।

यूपीए शासन के समय में CBI कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन बनकर रह गई थी- लोकसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों के खिलाफ इसका बार-बार दुरुपयोग किया गया।

आईबी और RAW जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में जानबूझकर तनाव पैदा किया गया।

केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए नीतिगत निर्णय को एक ऐसे व्यक्ति ने फाड़ दिया था, जो कैबिनेट का सदस्य भी नहीं था और वह भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान।

NAC यानि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को प्रधानमंत्री कार्यालय के समानांतर खड़ा कर दिया गया था। और वही कांग्रेस आज संस्थानों की बात करती है!

इतना ही नहीं, जरा याद कीजिए, 1990 के दशक में केरल कांग्रेस के राजनीतिक फायदे के लिए देश की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसी ISRO में एक काल्पनिक जासूसी कांड की कहानी गढ़ी गई। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि इसका खामियाजा एक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक और देश को भुगतना पड़ा।

सशस्त्र बल:

कांग्रेस हमेशा से रक्षा क्षेत्र को कमाई के एक स्रोत के रूप में देखती आई है। यही कारण है कि हमारे सशस्त्र बलों को कभी भी कांग्रेस से वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे।

1947 के बाद से ही, कांग्रेस की हर सरकार में तरह-तरह के रक्षा घोटाले होते रहे। घोटालों की इनकी शुरुआत जीप से हुई थी, जो तोप, पनडुब्बी और हेलिकॉप्टर तक पहुंच गई।

इनमें हर बिचौलिया एक खास परिवार से जुड़ा रहा है।

याद कीजिए, कांग्रेस के एक बड़े नेता ने जब सेना प्रमुख को गुंडा कहा तो उसके बाद पार्टी में उसका कद बढ़ा दिया गया। इससे पता चलता है कि अपनी सेना के प्रति भी वे कैसा तिरस्कार का भाव रखते हैं।

जब हमारी सेना आतंकियों और उसके सरपरस्तों के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो कांग्रेस के नेता राजनीतिक नेतृत्व पर ‘खून की दलाली’ का आरोप लगाते हैं।

जब हमारी वायुसेना के जांबाज आतंकियों पर हमला करते हैं, तो कांग्रेस उनके दावे पर सवाल उठाती है।

कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव:

राजनीतिक दल उस जीवंत संस्था की तरह होते हैं, जहां भिन्न-भिन्न विचारों का सम्मान होता है। लेकिन दुख की बात है कि कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र में कोई विश्वास ही नहीं है।

अगर कोई नेता पार्टी अध्यक्ष बनने का सपना भी देखे, तो कांग्रेस में उसे फौरन बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया में भी उनके व्यवहार में घमंड और अधिकार का भाव दिखाई देता है। वर्तमान में उनका शीर्ष नेतृत्व बड़े-बड़े घोटालों में जमानत पर है। जब कभी कोई अथॉरिटी घोटाले से जुड़े सवाल पूछती है, तो वे लोग जवाब देना तक उचित नहीं समझते।

क्या वे लोग अपनी जवाबदेही से डरे हुए हैं?

जरा सोचिए:

प्रेस से पार्लियामेंट तक।

सोल्जर्स से लेकर फ्री स्पीच तक।

कॉन्स्टिट्यूशन से लेकर कोर्ट तक।

संस्थाओं को अपमानित करना कांग्रेस का तरीका रहा है।

उनकी सोच यही है कि सब गलत हैं, और सिर्फ कांग्रेस सही है। यानि ‘खाता न बही, जो कांग्रेस कहे, वही सही’।

जब भी आप वोट देने जाएं, अतीत को एक बार जरूर याद करें कि किस प्रकार एक परिवार की सत्ता की लालसा के चलते देश ने भारी कीमत चुकाई।

जब उन्होंने हमेशा ही देश को दांव पर लगाया है तो यह तय है कि अब भी वे ऐसा ही करेंगे।

याद रखिए, अगर हम अपनी स्वतंत्रता बचाए रखना चाहते हैं तो हमें हर पल सतर्क रहना होगा।

आइए, हम सजग-सतर्क बनें। हमारे संविधान निर्माताओं ने जो संवैधानिक संस्थाएं हमें सौंपी हैं, उन्हें और मजबूत बनाने का प्रयत्न करें।

PS: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ब्लॉग का संपादन नहीं किया गया है। उसे शब्दशः रखा गया है।