Home Blog Page 6036

कश्मीर में जिहाद को रोकने के लिए अपनाने होंगे ‘out of the box’ विकल्प

पुलवामा में CRPF के काफिले से 350 किलो विस्फोटक से लदे एक वाहन को टकरा कर 40 से अधिक जवानों की प्राण लेकर जिहादियों ने पुनः अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं। हालाँकि ऐसी वारदातें पहले भी विदेशों में हो चुकी हैं लेकिन उन्हें ‘Lone Wolves’ कहकर भुला दिया गया है। ऐसे ‘लोन वुल्फ’ या अकेले छुट्टा भेड़िये आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए स्वतः प्रेरित होते हैं। इन्हें प्रेरणा मिलती है सोशल मीडिया और अन्य वेबसाइट पर निरंतर फैलते मज़हबी उन्मादी ज़हर से।

महत्वपूर्ण यह है कि किसी विस्फोटक भरे वाहन को ले जाकर भिड़ा देना, हमला करने का सबसे आसान तरीका होता है और यह पहले में भी कश्मीर में आज़माया जा चुका है। इसे Suicide Vehicle Borne Improvised Explosive Device (SVBIED) का नाम दिया गया है। संदीप उन्नीथन लिखते हैं कि यह तरीका लेबनानी गृह युद्ध में विकसित हुआ था जब अक्टूबर 1983 में बेरूत में इस्लामी जिहादी संगठन ने 241 अमरीकी मरीन सैनिकों की हत्या कर दी थी।

कश्मीर में पाकिस्तान पोषित आतंकवादी इस प्रकार की वारदातों को नब्बे के दशक में और पुनः 2001 से 2005 के बीच भी अंजाम दे चुके हैं। अप्रैल 2003 में जैश-ए-मुहम्मद ने फिदायीन हमले में एक विस्फोटक भरी कार को श्रीनगर में ऑल इंडिया रेडिओ स्टेशन के गेट से टकरा दिया था और वह धमाका इतना तीव्र था कि कार का इंजन कुछ सौ मीटर दूर स्थित एक ब्रॉडकास्टर के दफ्तर में जा कर गिरा था।

इस प्रकार की वारदात एक झटके में अंजाम तो दी जाती हैं लेकिन इसकी तैयारी बहुत पहले से की जाती है। भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री लाना, उसे वाहन पर असेम्बल करना, कई दिन पहले से इलाके की रेकी करना और पूरा प्लान बनाने में अच्छा-खासा समय लगता है। यह स्थानीय सहायता के बिना संभव ही नहीं है।

आतंकवादियों ने विस्फोटक भरे वाहन से हमला करने की रणनीति करीब डेढ़ दशक पहले से नहीं अपनाई थी। संभवतः इसीलिए सुरक्षा बलों से चूक हुई। वरिष्ठ विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल अता हसनैन (सेवानिवृत्त) लिखते हैं कि ऐसे में गुरुवार की घटना को पूरी तरह से इंटेलिजेंस फेल्योर नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह घटना अपने आप में बहुत सारे सवाल खड़े करती है।

पहली बात तो यह कि इंटेलिजेंस का दायरा केवल विभिन्न इंटेलिजेंस एजेंसी के अधिकारियों तक ही क्यों सीमित रहे? कश्मीर की पूरी समस्या ही इंटेलिजेंस जुटाने और उसपर एक्शन लेने से संबंधित है। ज़्यादा मात्रा में मिलने वाली सूचनाएँ या कच्ची जानकारी (raw intelligence) में से कार्रवाई के लायक (actionable intelligence) सूचनाएँ निकालना एक चुनौती होती है। इंटेलिजेंस जुटाने के लिए कश्मीर में विभिन्न एजेंसियाँ दो प्रकार के एजेंट्स का उपयोग करती हैं।    

एक होते हैं डबल एजेंट जो सीमा पार पाकिस्तान के कब्जे वाले अड्डों में घुलमिल जाते हैं। उनसे हमें जो सूचनाएँ मिलती हैं वे अत्यंत गोपनीय होती हैं और दीर्घकालिक परिणाम देने वाली होती हैं। दूसरे होते हैं डुअल (dual) एजेंट जो पैसा लेकर तात्कालिक सूचना देते हैं। ये हमारे देश के इंटेलिजेंस अधिकारी नहीं होते। यदि जिहादी गुटों ने इनको ज्यादा पैसा दिया है तो ये सुरक्षा बलों की जानकारी उनको दे देते हैं। इंटेलिजेंस जुटाने का इस प्रकार का खतरनाक खेल कश्मीर में खेला जाता है।

कुल मिलाकर आतंकियों से लड़ने के लिए हमारी रणनीति आक्रामक (offensive) या प्रतिकारात्मक (counter offensive) होती है। लेकिन असली समस्या बंदूकधारी आतंकवादी नहीं हैं। समस्या है कश्मीर के नागरिकों की आतंकियों से साठ-गाँठ की संभावना। सेना और अन्य सुरक्षा बल इसे समाप्त करने के लिए बहुत सारे काम करते हैं। भारतीय सेना अस्पताल से लेकर स्कूल तक चलाती है। बाढ़ में तो कश्मीरियों को सेना ने अपने कंधों पर ढोया था, फिर भी कश्मीरी युवा बहक जाते हैं। इसका कारण है कि हम अपनी इंटेलिजेंस प्रणाली को सुधारने के लिए ‘आउट ऑफ़ द बॉक्स’ जाकर नहीं सोचते।

जनरल अता हसनैन ने ही एक बार कहा था कि हमें कश्मीर में लगभग 5000 ‘सूचना योद्धा’ अर्थात ‘information warrior’ तैनात करने चाहिए। इनकी आयु 25 से कम होनी चाहिए और इन्हें एक शोध संगठन के अधीन काम करना चाहिए जिसमें कश्मीर मामलों के जानकार, मनोवैज्ञानिक, और इस्लाम के जानकार शामिल हों। अमरीकी सेना ऐसे ‘सूचना-लड़ाकों’ को संवेदनशील इलाकों में तैनात करती है।

अब समय आ गया है कि हम केवल offensive या counter offensive न होकर ‘Subversive Measures’ अपनाएँ। इंटेलिजेंस प्रणाली में बड़े फेरबदल की आवश्यकता है। हमें ऐसे अधिकारी चाहिये जो कश्मीर की आब-ओ -हवा में घुल मिल जाएँ और वहाँ के नागरिकों के अंदर की मज़हबी कट्टरता को ‘dilute’, ‘manipulate’ और अंततः ‘subvert’ करने का कार्य करें। कोई संस्था वहाँ जमीन लेकर प्रवचन देने के लिए आश्रम तो बना नहीं सकती इसलिए यह काम इंटेलिजेंस एजेंसियाँ ही कर सकती हैं।

सबसे पहले इंटेलिजेंस एजेंसियों के बजट में वृद्धि करने की आवश्यकता है। आंतरिक सुरक्षा के लिए वर्ष 2017 में इंटेलिजेंस ब्यूरो का बजट मात्र ₹1577 करोड़ था। एक ऐसी काउंटर इंटेलिजेंस एजेंसी जिसके कंधों पर पूरे देश में आतंकी घटनाओं को रोकने का दारोमदार है और जिसके लिए कश्मीर सबसे बड़ी चुनौती है उसके लिए यह बजट बहुत ही कम है। विभिन्न इंटेलिजेंस एजेंसियों में कश्मीर में सर्वाधिक सक्रिय इंटेलिजेंस ब्यूरो है। लेकिन इन्हें किसी को गिरफ्तार करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। ये जम्मू कश्मीर पुलिस, सेना या CRPF को सूचना भर देते हैं जिसके आधार पर कार्रवाई होती है। ऐसे में आईबी को अधिक अधिकार और साधन सम्पन्न करने की आवश्यकता है।

आउट ऑफ़ द बॉक्स विकल्पों में अत्याधुनिक तकनीक जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग भी करना होगा। आधुनिक तकनीक जैसे बिग डेटा एनालिटिक्स की सहायता से आतंकवादी घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने के प्रयास पहले भी किये जा चुके हैं। अमरीका की मेरीलैंड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वी एस सुब्रमण्यन ने ऐसी एल्गोरिदम की खोज की है जिससे उन्होंने इंडियन मुजाहिदीन और लश्कर ए तय्यबा जैसे संगठनों की हरकतों की भविष्यवाणी की थी। वे इसे SOMA और Temporal Probabilistic Rules कहते हैं। इनकी सहायता से प्रोफेसर सुब्रमण्यन ने 2013 में नरेंद्र मोदी की पटना रैली में हुए बम धमाकों की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी।

इस प्रकार के तरीकों का प्रयोग करना आज समय की मांग है। विस्फोटक भरे वाहन टकरा देने की टैक्टिक भले ही डेढ़ दशक पुरानी हो चुकी लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी पुनरावृत्ति नहीं हो सकती। हमें यह समझना होगा कि कश्मीर में प्रॉक्सी वॉर चरम पर है। इसके कोई लिखित नियम नहीं हैं। सुरक्षा बलों पर हमला कर देश के मनोबल को गिराने का काम कई दशकों से चल रहा है। यह थका देने वाला मनोवैज्ञानिक युद्ध है अतः इससे लड़ने के उपाय भी पारंपरिक नहीं हो सकते।  

हुर्रियत नेताओं की सुरक्षा वापस ली जा सकती है, पुलवामा हमले के बाद सरकार ने किया बड़ा फैसला

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में कायरतापूर्ण आतंकी हमले के बाद सरकार ने बड़ा फैसले लेते हुए हुर्रियत नेताओं की सुरक्षा वापस लेने की बात कही है। दरअसल, इस दर्दनाक आतंकी हमले के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बयान दिया था कि घाटी में कुछ लोग नापाक ताकतों के साथ खड़े हैं। यही नहीं घाटी में पाकिस्तान और आईएसआई से पैसा लेने वाले लोग भी मौजूद हैं। उन्होंने शाम में कहा था कि सेना को हुर्रियत नेताओं की सुरक्षा पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया है। इस बयान के कुछ समय बाद ही सरकार द्वारा हुर्रियत नेताओं की सुरक्षा वापस लेने की बात कही जा रही है।

राजनाथ सिंह के इस बयान से साफ हो गया था कि पाकिस्तानी पैसा पर पलने वाले हुर्रियत नेताओं के ख़िलाफ़ सरकार जल्द कोई बड़ा फैसला लेने वाली है। सरकार ने अपने इस फ़ैसले से देश में पल रहे आतंकी और देशद्रोही को कड़ा संदेश दिया है।

राजनाथ सिंह के साथ बैठक में राज्यपाल, होम सेक्रेट्री, चीफ सेक्रेट्री, डीजीपी जम्मू कश्मीर, आर्मी कमांडर और डीजी सीआरपीएफ के साथ कुछ आला अधिकारी भी मौजूद थे। इस बैठक में सेना को जरूरी निर्देश दे दिए गए हैं। सुरक्षाबलों का हौसला बुलंद करके आतंक के खिलाफ कार्रवाई करने की बात राजनाथ सिंह ने कही है। राजनाथ सिंह ने कहा कि इस लड़ाई में पूरा देश सेना और सरकार के साथ खड़ा है।

उन्होंने कहा, ‘जम्मू कश्मीर की आवाम को मैं यकीन दिलाना चाहता हूं कि सीमा पार से आतंक फैलाने वालों के मंसूबों को सफल नहीं होने देंगे। मुझे खुशी है कि जम्मू कश्मीर की जनता हमारे साथ खड़ी है। कुछ ऐसे एलिमेंट हैं जो सीमा पार की ताकतों, आतंकी संगठन और आईएसआई के साथ उनकी मिली भगत है. यह लोग आतंकवाद की गहरी साजिश में भी शामिल हैं। आतंक फैलाने वाले यह लोग जम्मू कश्मीर की जनता और जवानों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

गृह मंत्री कश्मीर में मौजूद अलगाववादियों पर जमकर बरसे। उन्होंने कहा कि, ‘पाकिस्तान और आईएसआई से पैसा लेने वाली ताकतें भी यहां मौजूद हैं। मैंने सेना के अधिकारियों से कहा है कि ऐसे लोग जो पाकिस्तान से पैसा लेते हैं, आईएसआई के साथ जिन लोगों की मिली भगत है, उनकी सुरक्षा पर विचार करना चाहिए। देश की जनता से भी अपील करना चाहता हूं कि इस समय कई ऐसी ताकतें हैं जो देश में सांप्रदायिक सौहार्द को भी तोड़ने की कोशिश करेंगी।

उन्होंने कहा कि आज की बैठक में यह निर्णय हुआ है कि जिस समय सेना का काफिला चलेगा उस समय स्थानीय लोगों की आवाजाही को रोका जाएगा। इससे होने वाली असुविधा के लिए मैं क्षमा चाहता हूँ।

चीन ने दिखाया असली रंग, मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने से फिर किया इनकार

पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले की जहाँ एक तरफ वैश्विक स्तर पर इस हमले की कड़ी निंदा हो रही है वहीं दूसरी तरफ चीन ने अपना असली रंग दिखा ही दिया। हालाँकि चीन ने इस हमले की निंदा तो की है लेकिन इस हमले को अंजाम तक पहुँचाने वाले आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी मानने से इनकार कर दिया।

जानकारी के अनुसार, चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग के कहा, “चीन को पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले की जानकारी मिली है। हम इस हमले से स्तब्ध हैं। हम शहीदों के परिवारवालों के प्रति संवेदना जताते हैं। हम आतंकवाद के ख़िलाफ़ हैं और इसका पुरज़ोर विरोध करते हैं। इसके अलावा शुआंग ने उम्मीद जताई कि देश की इन आतंकी गतिविधियों से निपटने के लिए आपसी सहयोग करेंगे और क्षेत्रीय शांति तथा स्थिरता को बनाए रखेंगे।”

इसके बाद जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने की बात पूछी गई तो शुआंग ने कहा, “जहाँ तक इस मुद्दे के लिस्टिंग का सवाल है, मैं आपको कह सकता हूँ कि सुरक्षा परिषद की 1267 कमिटी ने लिस्टिंग और आतंकी संगठनों पर अपनी प्रक्रिया और शर्तें साफ़ कर दी हैं। जैश-ए-मोहम्मद को सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध सूची में शामिल किया गया है, चीन इस मसले को ज़िम्मेदारपूर्ण तरीक़ो से हैंडल करना जारी रखेगा।”

बता दें कि अज़हर पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने की माँग करते हुए भारत ने कहा, “हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सभी सदस्यों से जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख अज़हर समेत आतंकियों की लिस्ट के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की 1267 सैंक्शंस कमिटी के तहत आतंकी घोषित करने के लिए समर्थन देने की फिर अपील करते हैं। हम पाकिस्तान के कब्ज़े वाले इलाकों से संचालित आतंकी संगठनों को भी बैन करने की माँग करते हैं।” लेकिन UNSC के स्थायी सदस्य चीन ने भारत की इस माँग पर सहमति देने की बजाए फिर से इनकार किया है।

ऐसा माना जा रहा कि पुलवामा हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक बार फिर अज़हर को वैश्विक आतंकी करार देनी की माँग उठाई जाएगी। फिर भले ही सरकार की तरफ से यह पहली प्रतिक्रिया हो। जैश प्रमुख मसूद के अलावा उसके भाई अब्दुल रउफ असगर को भी आतंकी लीडर के तौर पर शामिल किया गया है। आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को तो 1267 कमिटी के द्वारा ग़ैरक़ानूनी करार दिया जा चुका है, लेकिन उसका प्रमुख अज़हर अभी भी बेख़ौफ़ बाहर घूम रहा है।

चीन का यह दोहरा चरित्र एक बार नहीं बल्कि कई बार पहले भी देखने को मिल चुका है। इससे पहले भी वो भारत के संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधों के तहत अज़हर को वैश्विक आतंकी की लिस्ट में नामजद करने के प्रयासों को विफल करता आया है। इसके अलावा चीन के संबंध भारत के साथ विवादित रहे हैं कभी डोकलाम को लेकर तो कभी पाकिस्तान को सहायता देने के बहाने। वहीं हाल के दिनों में पाकिस्तान और चीन के बीच संबंध प्रगाढ़ होते दिख रहे हैं, जिसके चलते चीन हमेशा से ही भारत के साथ दोहरा रवैया अपनाता चला आया है।

सैनिकों के मूवमेंट के दौरान नहीं होगा आम लोगों का आवागमन: गृहमंत्री राजनाथ सिंह

पुलवामा में हुए आतंकी हमले में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए गृहमंत्री राजनाथ सिंह जम्मू-कश्मीर पहुँचे। उन्होंने यहाँ शहीदों को श्रद्धांजलि देने के बाद अधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में उनके साथ चीफ़ सेक्रेट्ररी जम्मू-कश्मीर, आर्मी कमांडर, गवर्नर सत्यपाल मलिक, डीजी सीआरपीएफ और कुछ सीनियर अफ़सर मौजूद रहे।

बैठक में एक अहम फै़सला लेते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि अब जब भी सैनिकों का बड़ा काफ़िला चलेगा, तो आम लोगों का आवागमन थोड़ी देर के लिए रोका दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इससे लोगों को थोड़ी दिक्कत जरूर होगी लेकिन वो उनसे क्षमा चाहते हैं।

आतंकवाद के मुद्दे पर दुनिया हमारे साथ है

गृहमंत्री ने कहा, “आतंकवाद पर हम लगाम लगाकर ही रहेंगे। दुनिया के कई देश आतंकवाद को खत्म करने के लिए प्रयासरत हैं, हम साथ मिलकर आतंकवाद के ख़िलाफ़ निर्णायक लड़ाई को जीतेंगे। जम्मू-कश्मीर में कुछ लोगों के तार आतंकी संगठन आईएसआई से जुड़े हैं हम उन्हें खत्म करेंगे। भारत सरकार शहीद जवानों के परिवार के साथ हमेशा खड़ी है। सभी राज्य सरकारों से अपील है कि शहीदों के परिवारों की मदद करें।”

गृहमंत्री ने कहा कि सभी अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए गए हैं, अब सीमा पार से आतंक फै़लाने वालों के मंसूबे किसी भी हाल में कामयाब होगा। उन्होंने कहा, “सुरक्षाबलों के हौसले पूरी तरह से बुलंद हैं। आतंकवाद के ख़िलाफ़ हम जो लड़ाई लड़ रहे हैं, उसमें हमें कामयाबी मिलेगी।”

‘जम्मू-कश्मीर की जनता आतंक से लड़ाई में हमारे साथ’

गृहमंत्री ने कहा, “जम्मू-कश्मीर की आवाम को मैं अपनी तरफ से यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि सीमा पार से आतंक फैलाने वाली ताकतों के मंसूबों को हम कामयाब नहीं होने देंगे। मुझे इस बात की खुशी है कि जम्मू-कश्मीर की जनता आतंकवाद के ख़िलाफ़ इस लड़ाई में हमारे साथ पूरी तरह से है। कुछ ऐसे तत्व हैं जो कि सीमापार की आतंकवादी ताकतों और आईएसआई के साथ उनकी मिली भगत है। और आतंकवाद की गहरी साजिश में ऐसे कुछ लोग शामिल हैं। मैं कहना चाहता हूँ कि ऐसे लोग जम्मू-कश्मीर की जनता के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और हमारे नौजवानों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं।”

पुलवामा हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में लगा कर्फ़्यू, सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने की अपील

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आत्मघाती आतंकी हमले के बाद से लोग भारी प्रदर्शन कर रहे हैं। लोगों में बढ़ते रोष को देखते हुए प्रशासन द्वारा शहर में कर्फ़्यू लगा दिया गया है। जवानों की शहादत पर लोगों ने जम्मू शहर में जौहरी चौक, पुरानी मुंडी, रेहरी, शक्तिनगर, पक्का डंगा, जानीपुर, गाँधीनगर और बख्शीनगर समेत कई जगहों पर बड़े पैमाने पर पाकिस्तान के विरोध में नारे लगाते हुए प्रदर्शन किया।

यही नहीं गुर्जर नगर इलाक़े में हिंसक झड़पें होनी की भी ख़बर सामने आई हैं। बताया जा रहा है कि यहाँ पथराव के कारण माहौल तनावपूर्ण रहा और पथराव में कुछ गाड़ियाँ क्षतिग्रस्त भी हुई हैं।

पुलिस की सख़्ती से हालात क़ाबू में रहे

हिंसक झड़पों को देखते हुए जम्मू-कश्मीर पुलिस चौकन्नी हो गई थी, यही कारण है कि इलाक़े में कोई बड़ी झड़प नहीं हुई। पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बजरंग दल, शिवसेना और डोगरा फ्रंट के कार्यकर्ताओं ने आतंकवादी विरोधी नारे लगाए साथ ही कैंडल मार्च भी निकाला। पाकिस्तान के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी करते हुए लोग सड़कों पर निकल आए और पाकिस्तानी झंडे को जलाकर अपना ग़ुस्सा भी ज़ाहिर किया।

बताया जा रहा है कि हिंसक झड़प और प्रदर्शन के दौरान डीआईजी विवेक गुप्ता सहित लगभग 40 लोग घायल हुए हैं। बता दें कि जम्मू चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (जेसीसीआई) ने बृहस्पतिवार को आतंकवादी हमले का विरोध करते हुए जम्मू में बंद का आह्वान किया था।

शांति-व्यवस्था बनाए रखने की अपील

जम्मू के डेप्यूटी कमिश्नर रमेश कुमार ने कहा, “हमने एहतियात के तौर पर जम्मू शहर में कर्फ़्यू लगा दिया है।” साथ ही उन्होंने शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए शहर में लोगों से अपील भी की है।

बता दें कि, जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ क़ाफ़िले पर कल (14 फ़रवरी 2019) को हुए आतंकवादी हमले में सीआरपीएफ के 42 जवान शहीद और दर्जनों जवान गंभीार रूप से घायल हुए थे। जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने सीआरपीएफ के क़ाफ़िले में एक बस में विस्फ़ोटक लदी एसयूवी घुसा दी थी, जिसके बाद यह हादसा हुआ था।

भारत नहीं, हिन्दू है आतंकियों का निशाना; हिन्दूफोबिया हर जगह विकृत रूप में दिख रहा है

इस बात के तमाम उदाहरणों के बाद भी कि वैश्विक पटल पर मज़हबी आतंकवाद का एक ही चेहरा है, उनके नारों में एक ही नाम है, उनके झंडों पर एक ही मज़हब की बात है, ‘इस्लामोफोबिया’ नामक शब्द मुख्यधारा में प्रचलित हो चुका है। जब ‘आतंक का कोई मज़हब नहीं होता’ जैसे सड़े तर्क को डिफ़ेंड करने से लोग थकने लगते हैं, तब वो हार कर सामने वाले को ‘इस्लामोफोब’ या ‘इस्लाम से नफ़रत करने वाला’ कह कर निकल लेते हैं। 

पुलवामा हमले को देखिए और उसके आत्मघाती आतंकी की बातें सुनिए तो आपको पता चलेगा कि कैसे आतंकियों के हमले का निशाना अब ‘भारत देश’ की जगह ‘गोमूत्र पीने वाले हिन्दू’ हो चुके हैं। अमरनाथ यात्रा पर हुए हमले की यादें भी ताजा ही होंगी। इन्हें पढ़कर ‘हिन्दूफोबिया’ किसी को नज़र नहीं आता। 

कॉन्ग्रेस की सरकारों ने ‘हिन्दू टेरर’ जैसी फ़र्ज़ी बातों को मेन्स्ट्रीम ज़रूर कर दिया था, लेकिन ‘बाप का, दादा का, भाई का, सब का’ बदला लेने वाले फैजल को कोई भी हिन्दूफोब कहने को तैयार नहीं होता! जबकि ऐसे हर आतंकी घटना पर फैजल, अहमद, मोहम्मद, नजीर, बाबर जैसे ही नामों की मुहर लगी होती है। आखिर ‘काफ़िर’ किसे कहते हैं आतंकी, क्या उसकी जड़ में धर्म से घृणा की बात नहीं है? 

पिछले चार सालों में जैसे मोदी सरकार को लोकप्रियता मिली है, और सेना ने जिस बहादुरी से इन पत्थरबाज़ों और आतंकियों को सैकड़ों की तादाद में जहन्नुम में ठूँसा है, उससे इन आतंकियों का निशाना देश और उसकी सेना नहीं, ‘गाय का पिशाब पीने वाले हिन्दू’ और ‘काफ़िर हिन्दुस्तानी’ हो गए हैं। ये लड़ाई अब हिन्दुओं के ख़िलाफ़ है, न कि स्टेट के। 

और वैसे भी, अगर ये आतंकी लड़ाई स्टेट के ख़िलाफ़ थी तो कश्मीरी हिन्दुओं को शिव और सरस्वती की भूमि को छोड़कर भागने को क्यों मजबूर होना पड़ा? जबकि, असल बात तो यह है कि भारत इन इस्लामी आतंकियों के लिए ‘फ़ाइनल फ़्रंटियर’ रहा है। इस पर फ़तह पाने के लिए जो ‘गजवा-ए-हिन्द’ का नारा लगता है, वो क्या पोलिटिकल है या फिर पूरी तरह से मज़हबी आतंकवाद का अश्लील प्रदर्शन?

हिन्दुओं में ग़ज़ब की सहनशीलता है, इसलिए हम इन बातों पर चर्चा भी करते हैं तो दबी आवाज में क्योंकि बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का समुदाय विशेष हमें ‘बिगट’ और ‘कम्यूनल’ कहने की फ़िराक़ में बैठा रहता है। जो मानसिकता हमारे समाज में बुरी तरीके से फैली हुई है, उसे स्वीकारने में भी हम नरमी बरतते हैं क्योंकि कोई आकर ‘अदरक-लहसुन तहज़ीब’ का हवाला दे जाता है। 

लेकिन क्या ये आतंक की लड़ाई कश्मीर की पोलिटिकल आज़ादी तक ही सीमित है? फिर मंदिरों को क्यों तोड़ा जाता है? सरस्वती पूजा के जुलूस पर पत्थरबाज़ी क्यों होती है? दुर्गापूजा के विसर्जन पर दंगे क्यों होते हैं? रामनवमी के मौक़े पर मुस्लिम बहुल इलाके से गुज़रते हुए चप्पल क्यों फेंका जाता है? क्या ये महज़ कुछ लोगों की, कुछ ‘मिसगाइडेड यूथ’ का पागलपन है, या इसमें ज़्यादा लोगों की सहमति है? इसकी भर्त्सना की आवाज़ में नमाज़ के लाउडस्पीकर वाली बुलंदी क्यों नहीं?

आखिर ऐसा क्या हो गया है इस समाज में कि मोदी के आने के बाद ‘समुदाय विशेष’ के लोगों में ‘वन्दे मातरम्’ न गाने की, ‘भारत माता की जय’ न बोलने की संक्रामक बीमारी फैलती ही जा रही है? और इसका जस्टिफिकेशन ये कह कर दिया जाता है कि ‘इस तरह’ का राष्ट्रवाद ज़हर है? राष्ट्रवाद ज़हर है? फिर तो राष्ट्र ही ज़हरीला हो गया, यहाँ ऐसे लोग कर क्या रहे हैं? ये ‘इस तरह’ आखिर है क्या? 

इन लोगों को, ये जो भी हैं और जिनसे भी इन्हें समर्थन मिलता है, ये बात स्वीकारने में किस बात की लज्जा आती है कि ये भारत देश के नागरिक हैं। इनकी पहली पहचान वही है। धर्म देश के विचार को कभी भी लील नहीं सकता, ख़ासकर तब जब वो धर्म के आधार पर ही बना देश न हो।

ये हिन्दूफोबिया नहीं तो और क्या है कि केन्द्रीय विद्यालय में हो रही सद्विचारों वाली प्रार्थना में हिन्दू धर्म दिखने लगता है? नफ़रत का भाव तर्क नहीं देखता, वो बस नफ़रत करने लगता है। जब आप हर बात में हिन्दू-मुस्लिम खोज लेंगे तो आपको अच्छी बातें भी इसलिए बुरी लगने लगेंगी क्योंकि वो संस्कृत में है। ये तर्क नहीं, धर्म से नफ़रत करना है।

जबकि जिन हिन्दुओं को इस्लामोफोबिक कह कर ज्ञान दे दिया जाता है वो दिन में पाँच बार, अपनी सुबह की कच्ची नींद टूटने से लेकर रात को सोने तक, लाउडस्पीकर पर दूसरे धर्म का नारा बर्दाश्त करता है। बर्दाश्त इसलिए करता है क्योंकि ‘अदरक-लहसुन’ तहज़ीब का अदरक वाला हिस्सा उसने सर पर उठा रखा है, और लहसुन वाले भूल चुके हैं अपनी ज़िम्मेदारी। 

साथ ही, आप सोशल मीडिया पर खोजते रहिए कि इन आतंकी हमलों पर कितने लोग खुलकर अपनी बातें रखते हैं। आप गिन लीजिए कि ऐसे लोगों का प्रतिशत क्या है जिनका नाम आतंकियों के नाम वाले मज़हब से मिलता है। गिन लीजिए कि ऐसे नाम वाले कितने लोग ऐसे हमलों के बाद ‘हा-हा’ रिएक्शन देकर हँसते हैं। 

ये अश्लील हँसी हमले के समर्थन से ज़्यादा हमलावरों के हिन्दूफोबिक विचारों को हवा देने के लिए है। ये कोई सामान्य बात नहीं है कि किसी देश की बहुसंख्यक जनता के धर्म, प्रतीक चिह्नों, संस्कृति, परम्पराओं का आए दिन मजाक उड़ाया जाता है और एक तय रास्ते से उनके त्योहारों को निशाना बनाया जाता है। 

सोशल मीडिया पर ही कई लोग जब इस तरह की घृणा और हिन्दुओं के प्रतीकों पर लगातार हो रहे हमलों पर लिखते हैं तो हिन्दुओं का ही एक हिस्सा यह कहने लगता है कि ‘हम तो सनातन हैं, हमें ज़्यादा नहीं सोचना चाहिए’। जबकि, ज़रूरत है ज़्यादा सोचने की क्योंकि आंतरिक हमलों से निपटने के लिए हमारी तैयारी बिलकुल भी नहीं है। 

हिन्दुओं ने कभी दूसरे मज़हबों को अपना निशाना नहीं बनाया, बल्कि ऐतिहासिक तौर पर निशाना बनते ही रहे हैं। साथ ही, आज भी निशाने पर वही हैं। चाहे वो सीधे तौर पर संकटमोचन मंदिर में ब्लास्ट हो, अमरनाथ यात्रा पर हमला हो या फिर पुलवामा में सीआरपीएफ़ के जवानों पर, ये हमला अब भारत नहीं, भारत के हिन्दुओं पर है। 

अब उनके विचारों का विषैलापन बढ़ता जा रहा है क्योंकि सीमा पर सेना अपना काम बहुत अच्छे से कर रही है। इसलिए अब आत्मघाती हमले से पहले मरने वाला आतंकी हिन्दुओं को मारकर जन्नत पहुँचने की बातें करता है। इसे हम महज़ आतंकी वारदात मानकर चुप नहीं बैठ सकते, ये तय तरीके से हिन्दुओं तक, और समर्थन देने वाले कट्टरपंथियों तक, पहुँचाने की है कि ये हमला सेना पर नहीं भारत के गाय पूजने वाले हिन्दुओं पर है। 

2014 में मसूद अज़हर की वापसी और आतंक की स्क्रिप्ट का पुनर्लेखन

जनवरी 2014 का महीना था। पूरा भारत आम चुनाव के लिए तैयार हो रहा था, नरेंद्र मोदी के उद्भव से उत्साहित जनता राजनीतिक चर्चों में मशगूल थी, राजनीतिक पार्टियाँ और उनके स्टार प्रचारक हवाई दौरे से लेकर ज़मीनी पदयात्रा तक- जनता तक पहुँचने के लिए सारे विकल्पों का प्रयोग कर रहे थे। 2G घोटाले की मार से अभी-अभी उबरे देश में 3D रैलियाँ की जा रही थी। लेकिन ठीक उसी समय पाकिस्तान में कुछ ऐसी घटनाएँ घट रही थी, जिन पर मीडिया या अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान नहीं गया। वो घटनाएँ, जिनके दूरगामी परिणाम हुए। उस दौरान भले ही ये घटनाएँ छोटी-मोटी प्रतीत हुई हो, लेकिन उसके दुष्प्रभावों ने भारत को कई बार झकझोरा।

खूंखार आतंकी की वापसी

जनवरी 2014 का महीना था। मौका था अफ़ज़ल गुरु द्वारा लिखी गई पुस्तक के विमोचन का। जी हाँ, वही अफ़ज़ल गुरु जो भारत के संसद भवन पर हुए हमले का मास्टरमाइंड था। उसे फाँसी दे दी गई थी। पाक अधिकृत कश्मीर की कथित राजधानी मुज़फ़्फ़राबाद में आयोजित इस रैली में एक ऐसे शख़्स ने एंट्री ली, जिस से पूरे पाकिस्तानी मीडिया में खलबली मच गई। भारतीय जाँच एजेंसियों तक के कान खड़े हो गए। रैली में आए 10,000 लोगों को आतंकी मसूद अज़हर ने फोन के द्वारा सम्बोधित किया।

उस दौरान पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भारत को आश्वासन दिया था कि मसूद अज़हर की वापसी से उसे डरने की ज़रुरत नहीं है। लेकिन, जिस आतंकी ने भारत को अगनित घाव दिए हों, उसकी वापसी से भारत भला कैसे चिंतित नहीं होता? मसूद अज़हर का नाम आते ही कंधार प्लेन हाईजैक से लेकर 6 विदेशियों के अपहरण तक- ख़ून और आतंक से सनी दास्तानें याद आ जाती है। कई दिनों से निष्क्रिय मसूद अज़हर का आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद कहने को तो पाकिस्तान में प्रतिबंधित था और यह भी मान लिया गया था कि संगठन पर मसूद की पकड़ ढ़ीली पड़ रही है। लेकिन, मसूद की वापसी के पीछे उसका कुछ और ही इरादा था।

अगर मसूद अज़हर की उस रैली में कही गई बातों पर हम आज ग़ौर करें, तो पता चलता है कि पठानकोट और पुलवामा की पटकथा उसी वक़्त लिखी जानी शुरू कर दी गई थी। मसूद अज़हर ने पाकिस्तान सरकार से जिहाद पर लगे कथित प्रतिबन्ध को हटाने की माँग की। मसूद के उस भाषण ने पाकिस्तानी आतंकियों को नए जोश से लबरेज कर दिया, वहाँ के अधिकतर आतंकियों को मसूद के भीतर एक मसीहा नज़र आने लगा। ख़ासकर जो कश्मीर की ‘आज़ादी’ के नाम पर आतंक फैलाने वाले समूह थे, उनमे नई ऊर्जा का संचार हुआ।

पाकिस्तान ने मसूद को फिर से स्थापित किया

मुज़फ़्फ़राबाद की वो रैली काफ़ी अच्छे तरीक़े से आयोजित की गई थी। अगर एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन के नेता ने इतना बड़ा आयोजन करवा लिया तो कोई यह कैसे मान सकता है कि पाकिस्तानी प्रशासन, आईएसआई और पाकिस्तानी सेना आतंकवाद को बढ़ावा नहीं दे रही है। रैली इतने सुव्यवस्थित तरीक़े से आयोजित की गई थी और समर्थकों को आयोजन स्थल तक लाने के लिए ऐसे इंतजाम किए गए थे, जिस से पता चलता है कि इस रैली को आयोजित करवाने में पाकिस्तान सरकार का पूरा हाथ था।

रैली का स्थल और तारीख़ का चुनाव भी काफ़ी तैयारी के बाद किया गया था। आयोजन की तारीख़ थी- 26 जनवरी। यानी भारत का गणतंत्र दिवस। तिरंगे के रंग में रंगे भारत की जनता तक शायद इस रैली की ख़बर पहुँची ही नहीं, या फिर हमने इसे हलके में लिया। किसे पता था कि इस एक रैली की वजह से भारतीय सपूतों को मातृभूमि की बलि-बेदी पर क़ुर्बान होना पड़ेगा। जहाँ एक भी भारतीय नागरिक या सुरक्षा बल के जवान की मृत्यु दुःखद और त्रासद है, किसे पता था कि वहाँ 50 से भी अधिक (पठानकोट और पुलवामा) शहीद हो जाएँगे।

उस रैली को सम्बोधित करते हुए मसूद ने कहा था कि भारत में आतंक फैलाने के लिए उसके पास हज़ार से भी अधिक जिहादी तैयार बैठे हैं। उसके भाई असगर ने भी उस रैली में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था- वही असगर जो पुलवामा हमले का भी मास्टरमाइंड है। उस रैली में वो सारे किरदार जमा हुए थे, जो भारत के टुकड़े करने का दिवास्वप्न देखते हैं। पाकिस्तानी अख़बार डॉन ने पाकिस्तान सरकार के दोहरे रवैये पर सवाल खड़े करते हुए कहा था कि एक प्रतिबंधित संगठन के नेता ने कैसे इतना बड़ा आयोजन कर लिया।

यह कैसा प्रतिबन्ध? यह कैसा रवैया?

हुक्मरानों का यह दावा रहा है कि जैश पर प्रतिबन्ध पाक अधिकृत कश्मीर में लागू नहीं होता। डॉन अख़बार ने इस पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह हास्यास्पद है क्योंकि मसूद अज़हर पाकिस्तान के पंजाब में स्थित बहावलपुर से ही संगठन के सारे कामकाज देख रहा था। मसूद के उस भाषण को रिकॉर्ड कर के पाकिस्तान में सर्कुलेट किया गया। लोगों को और जिहादियों को उसके भाषण के अंश सुनाए गए। कुल मिला कर देखा जाए तो उस एक रैली से खूंखार मसूद अज़हर पाकिस्तान की व्यवस्था में सक्रिय होकर अपना आतंकी किरदार निभाने के लिए फिर से जी उठा था।

मसूद अज़हर को बचाने में चीन का भी अहम रोल रहा है। भारत ने जब-जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद पर प्रतिबन्ध लगाने की बात की, तब-तब चीन ने भारत के इस क़दम पर वीटो लगा दिया। पाकिस्तान की बची-खुची प्राकृतिक सम्पदाओं पर नज़र गड़ाए बैठे चीन ‘बेल्ट एन्ड रोड’ में उसका साथ पाने के लिए भी पाकिस्तान की तरफ़दारी करता रहा है। साम्राज्यवाद की मानसिकता के मारे चीन ने तो यहाँ तक भी कह दिया था कि पाकिस्तानी सरज़मीं पर भारत द्वारा की गई कोई भी कार्रवाई सीधा चीन पर आघात माना जाएगा।

पाकिस्तान और आतंकवाद: यह रिश्ता क्या कहलाता है…

जब पठानकोट पर आतंकी हमला हुआ था, तब भारत और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के दबावों के कारण चीन ने मसूद अज़हर को कस्टडी में लेने का दावा किया था। 2008 मुंबई हमले के बाद अंडरग्राउंड हुआ मसूद जब 2014 में निकला, तभी पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों को उसे गिरफ़्तार करना चाहिए था। लेकिन, ऐसा नहीं किया गया। मसूद और असगर- दोनों भाइयों के ख़िलाफ़ मई 2016 में ही इंटरपोल द्वारा रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया जा चुका है, लेकिन फिर भी पाकिस्तान में उन्हें खुले में रैली करने की छूट है।

2008 मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड हाफ़िज़ सईद वहाँ के चुनावों में भाग लेता है, मसूद को जिहादी रैली आयोजित करने की पूरी छूट दी जाती है, इंटरपोल की नोटिस के बावजूद इन्हें गिरफ़्तार नहीं किया जाता- यह सब दिखाता है कि पाकिस्तान जान-बूझ कर आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है, आतंकियों को पोषित कर रहा है। सबूत पर सबूत देने के बावजूद पाकिस्तान आतंकियों पर कार्रवाई करने में विफल रहा है। आपको बता दें कि इंटरपोल किसी भी आतंकी के ख़िलाफ़ तभी नोटिस जारी करता है, जब उसे सबूत दिया जाए कि फलाँ अपराधी ने फलाँ अपराध किया है। वही सबूत अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के लिए विश्वसनीय हैं लेकिन पाकिस्तान के लिए बस एक काग़ज़ का टुकड़ा है।

असल में राजनीति, सेना और आतंकवादी- ये सभी पाकिस्तान में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ये तीनों एक-दूसरे के हितैशी हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को ही तालिबान ख़ान के नाम से जाना जाता है क्योंकि तालिबान व आतंकी संगठनों के प्रति उनका रवैया बहुत ही सॉफ्ट रहा है। वो उनकी वकालत करते रहे हैं। इमरान तो बस एक मुखौटा है, सत्ता अभी भी पाकिस्तानी सेना के हाथों में ही है।

Pulwama Terror Attack: गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने शहीद जवान को दिया कंधा

आतंकी हमले में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए गृहमंत्री राजनाथ सिंह जम्मू-कश्मीर के पुलवामा पहुँचे। गृहमंत्री ने वहीं एक शहीद जवान के शव को कंधा दिया। समाचार एजेंसी एएनआई ने एक वीडियो ट्वीट किया है, इस वीडियो में गृहमंत्री राजनाथ सिंह और कश्मीर के DGP दिलबाग सिंह शहीद जवान को कंधा देते हुए नजर आ रहे हैं।

इसके बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह, जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक और भारतीय सेना के उत्तरी कमांड के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने पुलवामा हमले में शहीद सीआरपीएफ के जवानों को श्रद्धांजलि भी दी।

दरअसल, जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकियों द्वारा किए गए हमले में सीआरपीएफ के 40 से अधिक जवान शहीद हो गए हैं। श्रीनगर-जम्मू हाइवे पर स्थित अवंतीपोरा इलाके में आतंकियों ने जवानों की गाड़ी को निशाना बनाते हुए आतंकी घटना को अंजाम दिया।

हमले के बाद दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों में सुरक्षा एजेंसियों द्वारा अलर्ट जारी किया गया है। बताया जा रहा है कि सुरक्षाबलों के काफ़िले पर जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन ने आत्मघाती हमला किया जिसमें करीब 40 से अधिक जानें गईं।

इस घटना की कड़ी निंदा करते प्रधानमंत्री ने पुलवामा आतंकी घटना पर बोलते हुए कहा: “साथियो, पुलवामा हमले के बाद, अभी मन:स्थिति और माहौल दुःख और साथ ही साथ आक्रोश का है। ऐसे हमलों का देश डटकर मुकाबला करेगा, रुकने वाला नहीं है।”

इसके अलावा प्रधानमंत्री ने कहा, “मैं पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। उन्होंने देश की सेवा करते हुए अपने प्राण न्योछावर किए हैं। दुःख की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएँ, उनके परिवारों के साथ हैं।”

प्रधानमंत्री ने इस मामले पर सर्वदलीय बैठक भी बुलाई है।

NDTV की डेप्यूटी न्यूज़ एडीटर सस्पेंड, जवानों की शहादत का उड़ाया था मजाक

विवादों में रहने वाले मीडिया हाउस एनडीटीवी ने अपने Deputy News Editor को पुलवामा हमले को लेकर किए गए एक विदास्पद फे़सबुक पोस्ट के बाद निलंबित कर दिया। एनडीटीवी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर लिखा, “संगठन के एक एडिटर द्वारा की गई टिप्पणियों की हम निंदा करते हैं। हमने उन्हें 2 सप्ताह के लिए निलंबित कर दिया है। आगे की कार्रवाई पर कंपनी की अनुशासनात्मक समिति विचार करेगी।”

दरअसल, निधि सेठी ने अपने फे़सबुक पर एक टिप्पणी पोस्ट की थी, जिसमें जैश-ए-मोहम्मद द्वारा आतंकवादी हमले का महिमामंडन किया गया था। निधि ने लिखा था, “काल्पनिक 56 इंची पर 44 भारी पड़ गए।” इसके साथ, उन्होंने हाल ही में आई फिल्म उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक के प्रसिद्ध डायलॉग ‘हाउज़ द जोश’ पर एक हैशटैग #HowstheJaish जोड़ा था।

निधि के पोस्ट को लेकर सोशल मीडिया पर कई लोगों ने एनडीटीवी से पूछा कि क्या वह अपने कर्मचारी के विचार से सहमत हैं? फे़सबुक पर किए गए उनके पोस्ट को ट्विटर पर स्क्रीनशॉट डालते हुए लोगों ने उनकी कड़ी निंदा की। लोगों ने लिखा कि क्या निधि सेठ जवानों के शहीद होने पर जश्न मना रही हैं?

आलोचनाओं में घिरने के बाद निधि ने बड़ी तेज़ी के साथ अपना फे़सबुक एकाउंट डीएक्टिवेट कर दिया। जिससे उनके द्वारा किए गए पोस्ट को अब नहीं देखा जा सकता। फिलहाल यह देखना बाक़ी है उनके इस निंदनीय कृत्य पर क्या कार्रवाई होगी?

यह बड़ी चिंता का विषय है कि जब एक तरफ शहीदों की शहादत पर देश उबल रहा हो और दूसरी तरफ पत्रकार निधि की यह हरक़त भुलाए नहीं भूली जा सकती। बता दें कि निधि के अलावा देश में और भी लोग हैं जो जवानों के शहीद होने पर जश्न मना रहे हैं। ऐसा ही एक और मामला सामने आया है जिसमें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र बसीम हिलाल ने भी अपने ट्विटर हैंडल से आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, लेकिन बाद में उसने अपना अकाउंट ही डिएक्टिवेट कर दिया।

आपको बता दें कि बसीम हिलाल को धारा 153A (दो धर्मों में शत्रुता बढ़ाने के लिए) और सूचना एवं प्रौद्योगिक की धारा 67 (इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री को प्रकाशित या प्रसारित करने के लिए) के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया है और उसे प्रशासन ने यूनिवर्सिटी से निलंबित भी कर दिया।

‘How’s the Jaish’ ट्वीट करने वाले AMU छात्र पर केस दर्ज, ट्वीट के बाद डिएक्टिवेट किया अकॉउंट

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे जम्मू-कश्मीर के एक छात्र बसीम हिलाल को ज़िला पुलिस ने पुलवामा हमले के बाद बेहद आपत्तिजनक ट्वीट करने के आरोप में मामला दर्ज कर लिया है।

एक तरफ जहाँ इस आतंकी हमले में हमारे सेना के 42 जवान शहीद और दर्जनों घायल हुए हैं, वहीं AMU (अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) से गणित में बीएससी कर रहे इस कश्मीरी छात्र ने अपने ट्विटर पर “How’s the Jaish” लिखा। इसके बाद उसने अपने इस ट्विटर अकॉउंट को डिएक्टीवेट कर दिया।

बसीम हलील के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

बता दें कि बसीम की इस हरक़त के लिए उसे धारा 153A (दो धर्मों में शत्रुता बढ़ाने के लिए) और सूचना एवं प्रौद्योगिक की धारा 67 (इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री को प्रकाशित या प्रसारित करने के लिए) के तहतमामला दर्ज कर लिया गया है। बसीम को AMU से सस्पेंड भी कर दिया गया है। साथ ही परिसर में उसका प्रवेश भी वर्जित कर दिया गया।

बसीम हिलाल पर एएमयू की तरफ़ से उमर सलीम पीरज़ादा ने बताया कि जब उन्हें इस अत्यधिक आपत्तिजनक ट्वीट का पता चला तो तत्काल संज्ञान लेते हुए बसीम को एएमयू से निलंबित कर दिया गया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय को बदनाम नहीं होने दिया जाएगा।

कुछ समय से छात्रों की राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के चलते अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी विवादों में घिरी रहती है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि जब किसी छात्र को यूनिवर्सिटी से निलंबित किया गया हो, सितंबर 2016 में उरी हमले के बाद मुद्दसर यूसुफ़ नाम के कश्मीरी छात्र को भी आपत्तिजनक कमेंट करने पर यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया था।