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भारतीय विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान में अपने उच्चायुक्त को बुलाया वापस, पाकिस्तानी उच्चायुक्त को किया तलब

पुलवामा आतंकी हमले के बाद विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तानी उच्चायुक्त को तलब किया है, और पाकिस्तान में मौजूद भारत के उच्चायुक्त को वापस बुलाया है। भारत के विदेश सचिव ने कहा कि पाकिस्तान अपने यहाँ आतंकी संगठनों पर तुरंत कार्रवाई करे।

विदेश सचिव ने पाकिस्तान के उस दलील को भी खारिज किया जिसमें उसने आतंकी हमले में पाकिस्तान की भूमिका से इंकार किया था, और कहा था कि बिना तथ्यों के आरोप लगाना सही नहीं है।

भारत सरकार ने इस आतंकी घटना के बाद पाकिस्तान में मौजूद अपने उच्चायुक्त अजय बिसारिया को वापस स्वदेश बुला लिया है। विदेश सचिव विजय गोखले ने पाकिस्तान के उच्चायुक्त सोहेल मोहम्मद को तलब करते हुए आतंकी हमले में शहीद जवानों को लेकर रोष जाहिर किया।

इसके अलावा गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कश्मीर पहुँचकर हालात का जायजा लिया। इस दौरान घाटी के बडगाम में राजनाथ सिंह, राज्यपाल मलिक और नॉदर्न कमांड के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह ने शहीद जवानों की श्रद्धांजलि दी। भारत के पड़ोसी देश नेपाल, भूटान, अफगानिस्तान और श्रीलंका ने इस घटना के बाद आतंक के ख़िलाफ़ एकजुट होकर लड़ाई लड़ने की बात कही है।

SC ने अयोध्या मामले में केंद्र को दिखाया संविधान पीठ का रास्ता

केंद्र सरकार की अयोध्या में विवादित ज़मीन छोड़कर बाकी बची ज़मीन मालिकों को वापस लौटाने वाली याचिका पर सुनावाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा है कि इस मामले में आप अपनी बात संविधान पीठ के पास रखें।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा, ”आपको जो कहना है, मुख्य मामले की सुनवाई करने वाली संविधान पीठ से कहें।” चीफ़ जस्टिस और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने इस मुद्दे को लेकर नई याचिका को मुख्य याचिका के साथ ही संलग्न करने का आदेश दिया है।

क्या है ज़मीन अधिग्रहण से जुड़ा मामला?

बता दें कि 1993 में केंद्र सरकार ने अयोध्या अधिग्रहण एक्ट के तहत मंदिर और उसके आसपास की ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया था। इसके बाद उस ज़मीन को लेकर दायर की गई सारी याचिकाओं को भी ख़त्म कर दिया गया था। इस एक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दायर की, इसके अनुसार 0.3 एकड़ के ‘विवादित’ क्षेत्र के अलावा बाक़ी के 67 एकड़ की भूमि को उनके मालिकों को लौटाया जा सकेगा। इसी 67 एकड़ के लिए केंद्र सरकार ने कोर्ट में अर्ज़ी दाख़िल की गई। अगर कोर्ट ने केंद्र सरकार के पक्ष में फ़ैसला दिया तो यह ज़मीन राम जन्मभूमि न्यास सहित सभी संबंधित पक्षों को लौटाई जाएगी।

बता दें कि इन 67 एकड़ में से लगभग 42 एकड़ भूमि राम जन्मभूमि न्यास की है। अदालत ने 1994 में कहा था कि जिसके पक्ष में निर्णय आएगा, उसे ही ज़मीन दी जाएगी। अदालत ने केंद्र सरकार को इस ज़मीन को ‘कस्टोडियन’ की तरह रखने को कहा था।

भूरे बनाम भारत सरकार मामले में ज़मीन पर यथास्थिति बरक़रार

2003 में सुप्रीम कोर्ट ने असलम भूरे बनाम भारत सरकार मामले में फै़सला देते समय यह माना था कि पूरी ज़मीन पर यथास्थिति बरक़रार रखना जरूरी है, क्योंकि फै़सला आने पर जिसके भी पक्ष में ज़मीन आए, उसे उस जगह तक पहुँचने में कोई दिक्कत न आए।

कोर्ट का तर्क था कि अगर ज़मीन दे दी जाती है, तो निर्माण कार्य हो सकता है और फै़सले के बाद जिस भी पक्ष को ज़मीन मिलेगी उसे उक्त स्थान तक पहुँचने में दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। अब मामले पर सरकार का कहना है कि फ़ैसला आने के इंतजार में बाक़ी ज़मीन का पड़ा रहना सही नहीं है। उसे उसके मालिकों को लौटा देना चाहिए। सरकार ने कहा है कि विवादित ज़मीन तक आने-जाने का रास्ता देने के लिए जगह छोड़ने को हम तैयार हैं।

उरी से पुलवामा तक… संसद से पठानकोट तक… सब का ज़िम्मेदार सिर्फ़ पाकिस्तान

पुलवामा में हुए आतंकी हमले ने पूरे विश्व का ध्यान इस समय आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे की तरफ मोड़ दिया है। लेकिन, आतंकवाद के केंद्र पाकिस्तान पर अब भी कोई खासा फर्क़ पड़ता नहीं दिख रहा है। एक तरफ़ जहाँ पूरे विश्व भर में इस भयावह घटना की निंदा की जा रही है। वहीं पाकिस्तान निंदा करना तो छोड़िए, बल्क़ि कह रहा है कि इस घटना से उसका कोई लेना-देना नहीं है।

पुलवामा में गुरुवार (फरवरी 14, 2019) को हुए आतंकी हमले की पूरी ज़िम्मेदारी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली। पाकिस्तान समर्थित इस संगठन का सरगना मसूद अजहर है, वही मसूद जिसका नाम साल 1991 में भारतीय विमान की हाई जैकिंग, 2001 में संसद पर हमले में और 2016 में पठानकोट के हमले में आ चुका है।

आतंकवाद की बढ़ती घटनाओं के बाद भी लगातार पाकिस्तान उसमें अपनी संलिप्ता नकारता आया है। इस भयावह घटना के बाद भारत संयुक्त राष्ट्र से पाकिस्तान में आज़ादी से घूम रहे इस आतंकी को बार-बार प्रतिबंधित करने की माँग कर रहा है। वहीं पाकिस्तान अपने यहाँ से संचालित होने वाली सभी आतंकी गतिविधियों पर बिल्कुल भी शर्म महसूस नहीं करते हुए कहता है कि वो भारत के लगाए आरोपों को ख़ारिज करता है

पूरे विश्व को मालूम है कि पाकिस्तान की धरती पर लगातार आतंकवादियों को पनाह दी जाती रही है। इसकी सूची बहुत लंबी है। लेकिन, पाकिस्तान को इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता। नतीजतन भारतीय सेना के ज़वानों को बिना किसी प्रत्यक्ष युद्ध के ही शहीद होना पड़ रहा है। 2016 में उरी हमले के बाद सेना पर यह दूसरा सबसे बड़ा आतंकी मामला सामने आया है।

आज पीएम आवास पर हुई सुरक्षा को लेकर चर्चा के बाद वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि पाकिस्तान से ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा वापस ले लिया गया है। साथ ही उन्होंने बैठक के बाद यह भी आश्वाशन दिया कि सरकार पूरी कोशिश करेगी कि पाकिस्तान को दुनिया से अलग कर दिया जाए।

पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जितने कड़े क़दम उठाए जाएँ, वो बहुत कम हैं। पाकिस्तान का कहना है कि उसका इन सबसे कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए भारत उसे इससे न जोड़े। सोचिए, जिस पाकिस्तान में हर आतंकी संगठन अपना घर मुख्यालय बनाकर रह रहा हो, उस पाकिस्तान को इनका अनुमान बिल्कुल नहीं होगा क्या? लगातार धर्म की आड़ में आतंकियों को पालने वाले पाकिस्तान को अच्छे से यह बात मालूम है कि जो आतंक का बीज वो अपनी सरज़मीं पर लगाता है, उसकी जड़ें भी बनेंगी और वो फैलेंगी भी। जैश-ए-मोहम्मद से लेकर अनेको आतंकियों को और आतंकी संगठनों को आज पाकिस्तान शरण देता है।

हर आतंकवादी को मिलती है जहाँ पनाह…उसे पाकिस्तान कहते हैं!

पाकिस्तान में मसूद ने 31 जनवरी 2000 को जैश-ए-मोहम्मद नाम के आतंकी संगठन का गठन किया था। शायद, इतना काफ़ी है कि पाकिस्तान को ही इस हमले का आरोपित बताया जाए। विदेश मंत्रालय के अनुसार इस आतंकी संगठन के सरगना मसूद अज़हर को पाकिस्तानी सरकार ने पाकिस्तान नियंत्रण वाले इलाकों में अपनी गतिविधियों चलाने और आतंकी ठिकानों को बढ़ाने के साथ ही भारत में और अन्य किसी भी जगह पर हमला करने की छूट दे रखी है। हालाँकि भारत ने कई बार मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित कराने का प्रयास किया है लेकिन इसमें चीन हर बार का अपनी टाँग फँसा देता है।

इसके अलावा दुनिया में सबसे ज़्यादा आतंकी हमलों को अंजाम दे चुका ‘तालिबान’ 1994 में अपने अस्तित्व में आया था। आज भी अलग-अलग देशों में यह सक्रिय है। क़रीब 60 हज़ार से अधिक आतंकियों का इसमें शामिल होने का अनुमान है। तालिबान की आतंकी गतिविधियों ने अफ़ग़ानिस्तान में हमेशा से ही ख़ौफ का माहौल बनाया हुआ है। जब अमरीकी सेना ने तालिबान को वहाँ से भगाया तो आतंकियों के कर्ता-धर्ता पाकिस्तान ने उसे अपने राष्ट्र में जगह दी। नतीजन आज पाकिस्तान के क्वेटा व पेशावर में इसके मुख्यालय कर मौजूद हैं।

अलकायदा जैसे खूँखार आतंकी संगठन का मुखिया ओसामा बिन लादेन भी पाकिस्तान में ही मिला था। आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का नेतृत्व करने वाले हाफिज़ सईद भी पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहा है। यह वही हाफिज़ सईद है जिस पर अमेरिका एक करोड़ डॉलर का इनाम घोषित कर चुकी है, लेकिन पाकिस्तान की मेहरबानी से हाफ़िज न नागरिकों की तरह आम जीवन जी रहा है, चुनाव के लिए पार्टी भी बना रहा है और चुनाव के लिए मैदान में उम्मीदवार भी उतार रहा है।

पाकिस्तानी तालिबान कहे जाने वाले ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान’ की स्थापना 2007 में हुई थी। इसमें 25 हज़ार आंतकी शामिल हैं। अमेरिकी संस्‍था नेशनल कंसोर्टियम फॉर द स्‍टडी ऑफ टेररिज्‍म एंड रिस्‍पॉन्‍सेज टू टेररिज्‍म ने अपनी रिपोर्ट में इसे 2017 का दुनिया का 11वां सबसे खूंखार आतंकी संगठन बताया है।

पाकिस्तान में लश्कर-ए-झंग्वी नाम का आतंकी संगठन भी पनाह पाए हुए है। 2009 में हुए श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हुए आतंकी हमले में भी इसी संगठन का नाम आया था।

हिज़्बुल मुज़ाहिद्दिन जिसका नाम आए दिन कश्मीर में हो कही आतंकी गतिविधियों में आता रहता है, उसका गठन भी 1989 में हो गया था। इस संगठन के आतंकी कैंप पाकिस्तान की सरज़मीं से चलते हैं। इसका मुख्यालय मुज़्फ़्फरबाद में है। इस समय इसके मुखिया सैयद सलाहुद्दीन हैं। जिसे अमेरिका ने  2017 में स्‍पेशियली डेजिनेटेड ग्‍लोबल टेररिस्‍ट घोषित किया है।

इतने सारे आतंकियों को पनाह देने वाला पाकिस्तान जब अपनी ग़लती को मानने की जगह उस पर हाथ खड़े करता है। तो ज़ाहिर है कि किसी भी राष्ट्र का और अपने राष्ट्र से प्रेम करने वाले राष्ट्रवादी का ख़ून खौलेगा ही। आज भारत में गौ प्रेम में अगर व्यक्ति कुछ बोल दे तो उस पर हिंदू आतंकी होने का टैग लग जाता है। लेकिन, पाकिस्तान की इन हरक़तों पर बोलने वाले सेकुलर लोग ऐसी घटनाओं पर शांति बनाए रखने जैसी बातें करते हैं। पाकिस्तान
का अस्तित्व में होना (जब तक वो आतंकवाद को पनाह देता है पूरे विश्व के लिए ख़तरनाक है, इसलिए ज़रूरी है उसे अलग कर दिया जाए।

ऊपर लिखे आतंकी संगठन बहुत चुनिंदा है जिनके अस्त्तिव में होने की ख़बर हमें मालूम है। लेकिन, सोचिए एक सरज़मीं पर जहाँ इतने आतंकी संगठन पल-पोस कर बढ़ रहे हों। वहाँ के आम जनों पर इसका क्या फ़र्क़ पड़ता होगा। क्या कभी वहाँ के नागरिकों को आतंकियों को शरण देने पर विरोध नहीं करना चाहिए? या, हमलों के बाद पल्ला झाड़ लेने वाली सरकार को क्या इसके ख़िलाफ़ कड़े क़दम नहीं उठाने चाहिए? ये कोई पहली घटना तो है नहीं… अगर हर आम जन के मन में उठ रहे सावलों के जवाब पाकिस्तान नहीं दे सकता, तो क्या यह मान लिया जाए कि वहाँ का हर व्यक्ति आतंकवाद के समर्थन में हैं। और, अगर ऐसा है तो इल्ज़ाम लगने पर पल्ला क्यों झाड़ा जा रहा है?

आख़िर कब तक 72 हूरों की कहानी और काफ़िरों के गुनाहों की शिक्षा देकर उन्हें आतंकी बनने की ओर बढ़ावा मिलता रहेगा? कब तक शांति को बनाए रखने वाला इस्लाम हर आतंकी संगठन का धर्म होगा? पाकिस्तान के कारनामों पर मैं अगर सवाल न भी करूँ तो यह सब सबूत बोलने लगते हैं, कि उरी से लेकर पुलवामा तक, संसद से लेकर पठानकोट तक सबका ज़िम्मेदार सिर्फ़ पाकिस्तान ही है।

फैक्ट चेक: क्या जाँच एजेंसियों के इनपुट होने के बावजूद पुलवामा सुरक्षा में कोताही बरती गई?

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में कायरतापूर्ण आंतकी हमले में देश की सुरक्षा में लगे 40 से अधिक जवान शहीद हो गए। 40 से अधिक जवानों के शहीद होने के बाद जब देश दु:ख की घड़ी में है। जब इस विषम परिस्थिति में शहीद परिवारों के साथ खड़े होने की जरूरत है। जब एक स्वर में आतंक के ख़िलाफ़ पूरे विश्व को एक संकेत देने की जरूरत है। ऐसे समय में कुछ लोग अपने ओछे ज्ञान के हवाले से आरोप-प्रत्यारोप करने और सरकार को कोसने में लगे हैं।

ऐसे समय में अटल बिहारी द्वारा संसद में कही गई वो पंक्ति याद की जानी चाहिए कि – सत्ता का खेल तो चलेगा, सरकारें आएँगी और जाएँगी, पार्टियाँ बनेंगी और बिगड़ेंगी, मगर यह देश रहना चाहिए और देश का लोकतंत्र रहना चाहिए।

दरअसल, इस दर्दनाक घटना के बाद कुछ लोगों द्वारा सोशल मीडिया के अलग-अलग माध्यमों पर एक पर्ची फैलाकर यह कहने की कोशिश की जा रही है कि सरकार को इस घटना के बारे में इनपुट पहले ही दी गई थी। सरकार को घटना के बारे में पहले ही सतर्क किया गया था, लेकिन रक्षा मंत्रालय और सेना के उच्चाधिकारियों द्वारा इस मामले में ध्यान नहीं दिया गया। इसके फलस्वरुप आतंकी ने इस घटना को अंजाम दिया है।

इस पर्ची को सोशल मीडिया के अलग-अलग माध्यमों पर भेजने वाले लोगों को सबसे पहले तो यह सोचना चाहिए कि क्या सरकार या सेना पर आरोप लगाने का यह सही समय है? क्या वो जानते हैं कि इनपुट होने के बावजूद सुरक्षा बलों ने सतर्कता नहीं बरती है? क्या ऐसी पर्ची सोशल मीडिया पर भेजने वालों ने सुरक्षा में लगे इन जवानों के पक्ष को जाना है? सोशल मीडिया पर यह पर्ची सर्कुलेट कर रहे लोगों के पास शायद इन सवालों के जवाब नहीं है। इन लोगों के पास यदि इस सवाल का जवाब होता तो शायद दु:ख की इस घड़ी में वो छिंटाकशी नहीं कर रहे होते।

यह बात सही है कि देश की सुरक्षा में लगे जाँच एजेंसियों के लोग दिन-रात काम कर रहे हैं। देश की सेवा में लगे जाँच एजेंसियों को आतंकी हमले के बारे में जैसे ही संदेह हुआ, उन्होंने देश की सुरक्षा में लगे CRPF, BSF, ITBP, CISF आदि को सतर्क करते हुए प्लाटून के आवागमन के दौरान सतर्क बरतने की सलाह दी थी।

ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि नोटिस भेजे जाने के बावजूद CRPF या रक्षा मंत्रालय द्वारा इस मामले में सतर्कता नहीं बरती गई है। सुरक्षा बल के जवानों को रवाना करने से पहले हाइवे की जाँच की गई थी।

सीआरपीएफ के इंसपेक्टर जनरल (ऑपरेशन) जुल्फीकार हसन ने कहा कि जम्मू-कश्मीर पुलिस ने पिछले दिनों आतंकी द्वारा आईडी ब्लास्ट किए जाने की संभावना जाहिर की थी। यही वजह है कि 78 गाड़ियों पर लगभग 2500 सीआरपीएफ के जवानों को भेजने से पहले हाइवे पर आईडी ब्लास्ट किए जाने की हर पहलु को सही से जाँच लिया गाया था। आतंकी को आईडी ब्लास्ट करने का कोई लूप-होल नहीं मिला, जिसके बाद स्कार्पियो की मदद से हमले को अंजाम दिया।

इसी तस्वीर के आधार पर सुरक्षा एजेंसी और सरकार पर आरोप लगाया जा रहा है

सीआरपीएफ के इंसपेक्टर जनरल (ऑपरेशन) जुल्फीकार हसन ने कहा कि जम्मू-कश्मीर पुलिस ने पिछले दिनों आतंकी द्वारा आईडी ब्लास्ट किए जाने की संभावना जाहिर की थी। यही वजह है कि 78 गाड़ियों पर लगभग 2500 सीआरपीएफ के जवानों को भेजने से पहले हाइवे पर आईडी ब्लास्ट किए जाने की हर पहलू को सही से जाँच लिया गया था। आतंकी को आईडी ब्लास्ट करने का कोई सही तरीका नहीं मिला, जिसके बाद स्कार्पियो की मदद से हमले को अंजाम दिया।

इसके अलावा अधिकारी ने कहा कि आतंकी द्वारा काफिले पर गोलीबारी किए जाने या फिर ग्रेनेड हमला करने की भी कोई संभवाना नहीं थी।

सीआरपीएफ इंस्पेक्टर हसन की मानें तो आमलोगों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए हाइवे को वनवे आवाजाही के लिए खुला छोड़ा गया था, जिसका गलत फायदा उठाकर आतंकी ने इस कायरतापूर्ण घटना को अंजाम दिया।

इस तरह सीआरपीएफ अधिकारी के इस बयान से साफ होता है कि देश की जाँच एजेंसी ने जो इनपुट दिया, उसके आधार पर सीआरपीएफ द्वारा रूट को अच्छे से जाँच लिया गया था। यही नहीं आतंकी द्वारा किए जाने वाले किसी भी तरह के अटैक की संभावना की बारीकी से जाँच की गई थी। लेकिन आम जनता के सुविधाओं के लिए जो छूट दी गई आतंकी आदिल अहमद ने उसका गलत फायदा उठाकर घटना को अंजाम दिया।

यदि सोशल मीडिया पर इस पर्ची को सर्कुलेट करने वाले लोग इन पहलुओं को जान लेते तो शायद उन्हें पता चल जाता कि सरकार और देश के सुरक्षा में लगे लोग अपनी तरफ़ से दिन रात इस तरह की घटना को रोकने के लिए काम कर रहे हैं।

यदि किसी कमी का फायदा उठाकर आतंकी इस तरह की कायर घटना को अंजाम देता है, तो हमें समझना होगा कि सरकार या देश की सुरक्षा में लगे जवानों की कमजोरी का पता कर आलोचना करने के बजाय हमें एक स्वर में आतंकी सोच के ख़िलाफ एकमत होकर खड़े होने की जरूरत है।

जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अज़हर के भाई के पुलवामा मास्टरमाइंड होने की संभावना

DNA के लेख के अनुसार, पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अज़हर के भाई, मुफ़्ती अब्दुल रऊफ़ असगर के मास्टरमाइंड होने का संदेह है। इस बाबत पुख़्ता सबूत जुटाने का प्रयास किया जा रहा है कि क्या अब्दुल रऊफ़ असगर ने पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी के साथ मिलकर इस आत्मघाती हमले की साज़िश रची थी?

बता दें कि इससे पहले एनआईए (राष्ट्रीय जाँच एजेंसी) नवंबर 2016 में जम्मू-कश्मीर के नगरोटा में सेना के एक शिविर पर हुए हमले से जुड़े मामले में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद के भाई मौलाना अब्दुल रोउफ असगर समेत 13 अन्य के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल की थी। इस चार्जशीट में जाँच एजेंसी के प्रवक्ता ने अपने बयान में कहा था कि दंड संहिता, ग़ैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम और विदेशी नागरिक अधिनियम के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी।

फ़िलहाल, जाँच एजेंसियों को पता चला है कि पिछले तीन महीनों में जैश-ए मौहम्मद आतंकी संगठन दक्षिण कश्मीर में अपनी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए फिर से अपना नेटवर्क दुरुस्त कर रहा है।

पुलवामा हमले की साज़िश रचने वाले जैश के आतंकी आदिल अहमद उर्फ वकास कमांडो का एक संदेशरूपी वीडियो भी जारी किया गया। ये वही आतंकी है जो मई 2018 में सेना के एनकाउंटर में बच निकला था। इसी ने विस्फोटक से भरी कार जवानों की बस से टकराई। 

पिछले साल (2018), सुरक्षा बलों ने घाटी में आतंकी मौहम्मद उस्मान को मार गिराया था। ये वही उस्मान है जो जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मौलाना मसूद अज़हर का भतीजा था। इससे पहले साल 2017 में, सुरक्षा बलों ने बारामूला में जैश के ऑपरेशनल चीफ़ ख़ालिद को मार गिराया था।

राज्य के घटनाक्रम पर नज़र रखने वालों ने कहा कि राज्य में एक आत्मघाती कार द्वारा किया गया यह हमला बहुत असामान्य था और पिछले दो दशकों में कश्मीर में ऐसा हमला नहीं हुआ है।

जैश-ए-मोहम्मद ने पहला आत्मघाती हमला साल 2000 में किया था, जब श्रीनगर के अफ़ाक अहमद शाह ने श्रीनगर में सेना के 15 कोर मुख्यालय के प्रवेश द्वार में विस्फोटक से लदी मारुति 800 को टक्कर देने की कोशिश की थी। हालाँकि, सैनिकों ने हमलावर को चुनौती दी और विस्फोटकों को समय से पहले विस्फोट करने के लिए मजबूर किया।

इसके बाद जैश संगठन ने फिर से उसी स्थान पर एक और आत्मघाती हमला किया, जिसे नाकाम कर दिया गया। इस तरह की बमबारी 2001 के दौरान हुई थी जब जैश संगठन ने श्रीनगर के जहाँगीर चौक पर पुराने विधानसभा भवन के गेट के बाहर विस्फोटकों से भरी एक टाटा सूमो में विस्फोट किया था। इस हमले में 38 लोग मारे गए थे और 40 अन्य घायल हुए थे। विस्फोट के बाद, जैश के तीन आतंकवादी विधानसभा परिसर में घुस गए, जिन्हें बाद में मार गिराया गया था।

पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले की पूरे राजनीतिक क्षेत्र में व्यापक निंदा हुई। अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा: “पुलवामा में सीआरपीएफ कर्मियों पर हमला निंदनीय है। मैं इस नृशंस हमले की कड़ी निंदा करता हूँ। हमारे बहादुर सुरक्षाकर्मियों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। पूरा देश शहीदों के परिवारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।” इस बीच, गृह मंत्री राजनाथ सिंह के भी आज श्रीनगर पहुँचने की उम्मीद है।

नाम टाइम्स ऑफ ‘इंडिया’ लेकिन काम ‘पाकिस्तान’ वाला; लानत है!

हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया तंत्र की हमारे देश में मज़बूत उपस्थिति है। सैंकड़ों अख़बार, न्यूज़ चैनल, न्यूज़ पोर्टल से लेकर रेडियो और यूट्यूब तक मीडिया हर जगह उपस्थित है। मीडिया से अपेक्षा की जाती है कि वो राष्ट्रहित की बात करे, जनता से जुड़े मुद्दों को उठाए और जनहित की बात करे। लेकिन हमारे देश में स्थिति उलट गई है। ऐसा लगता है कि मीडिया के एक गिरोह विशेष का भारतीय सुरक्षा बलों के ऊपर से भरोसा उठ गया है। ताज़ा मामला टाइम्स ऑफ इंडिया का है।

पुलवामा में हुए त्रासद आतंकी हमले के पीछे पाकिस्तान परस्त आतंकियों का हाथ है। सर्वविदित है कि पाकिस्तान इन आतंकी संगठनों का पोषक है, उनका अभिभावक है। अपनी सुविधा के हिसाब से पाकिस्तान इन आतंकियों का इस्तेमाल करता रहा है ताकि भारतीय सरज़मीं पर आतंक फैलाया जा सके। अब जब सिर्फ़ भारत में ही नहीं, भारत के बाहर भी पाकिस्तान पर उन आतंकी संगठनों पर कड़ी कार्रवाई करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है तब देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थान में से एक ने ऐसी ही भाषा अपनाई है, जो पाकिस्तान से मिलती-जुलती है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की भाषा, जो पाकिस्तान के बयान से काफ़ी मिलती जुलती है (साभार: TOI)

सिद्धू जैसे नेता पाकिस्तान के गुण गाते नहीं थकते। कश्मीर के अलगाववादियों का तो जीवन-यापन ही पाकिस्तान के पैसों से चलता है। कश्मीरी नेतागण का पाकिस्तान प्रेम जगज़ाहिर है। मीडिया के एक गिरोह का तो कहना ही क्या! टाइम्स ऑफ इंडिया ने पुलवामा हमले को लेकर जो हैडिंग बनाई है, वो शहीदों का अपमान है। जहाँ हमें उन रक्तपिपासु आतंकियों की निंदा करनी चाहिए जिन्होंने हमे इतना बड़ा घाव दिया है, यहाँ हमारे ही देश का मीडिया उन्हें आतंकी कहने में शर्म महसूस कर रहा है।

आतंकी को आतंकी कहना सीखिए जनाब

अब, टाइम्स ऑफ इंडिया के हैडिंग पर ग़ौर फरमाएँ। इसने अपने प्रमुख पृष्ठ की हैडिंग में लिखा है कि भारत सरकार ने पुलवामा हमले के लिए पाकिस्तान पर ‘आरोप’ मढ़ा है। देश की जनता TOI से पूछना चाहती है कि क्या यह सिद्ध नहीं है कि पाकिस्तान अपने आतंकियों को भेज कर कश्मीर में ख़ून का रमज़ान खेलता रहा है? क्या TOI को भी कुछ नेताओं की तरह आतंकी घटनाओं में पाकिस्तान का हाथ होने के सबूत चाहिए? प्रत्यक्ष के प्रमाण को देख कर भी इस प्रकार की अनर्गल बातें करना, क्या यह देश की प्रमुख मीडिया नेटवर्क को शोभा देता है?

TOI मानता है कि भारत सरकार पाकिस्तान पर आरोप लगा रहा है। इस मामले में पाकिस्तान का जो बयान आया है उस पर भी ग़ौर करना चाहिए। पाकिस्तान ने कहा कि वह बिना जाँच के भारतीय मीडिया और सरकार द्वारा हमले का लिंक पाकिस्तान से जोड़ कर तमाम आरोपों को सिरे से ख़ारिज करता है। पाकिस्तान इसे आक्षेप बताता है, टाइम्स ऑफ इंडिया इसे आरोप कहता है- दोनों में अंतर क्या है? हमारे देश का मीडिया देश के दुश्मनों की भाषा में बात करे, यह देश और देश का लोकतंत्र- दोनों के लिए ही ख़तरनाक है।

सबसे अव्वल तो यह कि टाइम्स ऑफ इंडिया को आतंकी को आतंकी कहने में भी शर्म महसूस हो रही है। पाकिस्तान की वास्तविकता को ‘आरोप’ कहने वाले TOI के लिए 40 से भी अधिक भारतीय जवानों की जान लेने वाला आत्मघाती हमलावर आतंकी नहीं है। वह ‘कश्मीर का स्थानीय युवा’ है। अब तो बस कीजिए जनाब। आपको करोड़ों लोग रोज पढ़ते हैं। आपके इस हैडलाइन से देश की जनता के दिल और दिमाग पर क्या प्रभाव पड़ेगा- कम से कम इसका तो ध्यान रखा कीजिए।

क्या पाकिस्तान जैश और अज़हर का पोषक नहीं है?

अपनी हैडलाइन के नीचे सबटाइटल के रूप में TOI ने लिखा है- ‘भारत ने पाकिस्तान पर जैश-ए-मोहम्मद’ और अज़हर मसूद का समर्थन करने के आरोप लगाए।’ अख़बार ने जैसी भाषा का प्रयोग किया है, उसे पढ़ कर पाकिस्तान और पाकिस्तान में पल रहा हर आतंकी ख़ुश होगा। जैश-ए-मोहम्मद एक आतंकी संगठन है, जो पाकिस्तान की धरती पर फलता-फूलता है। सर्वविदित है कि पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई ने उसे भारत में आतंक फ़ैलाने के लिए तैयार किया था। आतंकी संगठन जैश का आका अज़हर पाकिस्तान की छत्रछाया में पालते हैं।

जहाँ भारत सरकार अज़हर को गिरफ़्तार करना चाहती है, उसके ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है (उस अभियान के इस हमले के बाद और प्रबल होने की ज़रूरत है), उसे भारत के ही मीडिया का एक वर्ग पाकिस्तान पोषित नहीं मानता। अगर जनाब ऐसा है, तो आप अपना नाम बदल कर ‘टाइम्स ऑफ पाकिस्तान’ कर लीजिए, क्योंकि भारत सरकार, भारतीय सुरक्षा बल, भारतीय सेना और भारत की जनता की भावनाओं के ख़िलाफ़ लिख कर आपने अपने नाम में भारत का नाम रखने का हक़ खो दिया है।

भारत के भीतर भी ज़रूरी है सर्जिकल स्ट्राइक

पाकिस्तान के आतंकी आकाओं का सफ़ाया तो आवश्यक है ही, साथ ही ज़रूरी है देश के भीतर पनप रहे राष्ट्र-विरोधी मानसिकता वाले लोगों का सफ़ाया। हमने देखा कि कैसे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से निकला छात्र आतंक का दामन थाम लेता है। हम देखते हैं कि अलगाववादी भारत का नमक खा कर भारत-विरोधी कार्यकलाप में व्यस्त रहते हैं। कुछ नेताओं का भारतीय सुरक्षा बलों को सवालों के घेरे में खड़ा करना भी हमें दिखता है। हमारी नज़र के सामने ही कश्मीरी नेतागण पाकिस्तानपरस्ती वाली भाषा बोलते हैं। हम कुछ नहीं कर पाते।

सब कुछ सरकार नहीं करेगी। कुछ ज़िम्मेदारियाँ आम लोगों को भी लेनी होगी। जब हमारे सुरक्षा बल पाकिस्तान पोषित आतंकियों को सीमा पर मार गिरा रहे हों, हमे अपने देश-समाज में ऐसे पाकिस्तान परस्तों का बहिष्कार करना चाहिए। जो अख़बार भारत में व्यापार चला कर भारत के दुश्मनों की भाषा बोलता है, उसे बहिष्कृत कर उस से सवाल पूछे जाने चाहिए। उसे माफ़ी माँगने को मजबूर किया जाना चाहिए। तब वो ऐसी ग़लती दोबारा नहीं करेंगे।

जो नेता सुरक्षा बलों को कटघरे में खड़ा करता है, अपनी जान पर खेल कर हमारी जान की रक्षा करने वाले जवानों के ख़िलाफ़ -बोलता है- वो नेता जब चुनावों के दौरान वोट माँगने आए तो जनता द्वारा उसे राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। भारत में रह कर पाकिस्तान की भाषा बोलने वालों को यह बताने का समय आ गया है कि आप ऐसी घटिया हरक़त कर के देश की जनता को और उस जनता की मदद से चला रहे अपने व्यापार को ग्रांटेड नहीं ले सकते। अब समय आ गया है। सीमा को सेना दुरुस्त करेगी, देश को हम और हमारा समाज ठीक करेगा।

पुलवामा के वीर: गर्भवती पत्नी को अकेला छोड़ गए रतन ठाकुर

बृहस्पतिवार (14 फरवरी) को कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी आत्मघाती हमले में CRPF के 42 जवान शहीद हो गए। जवानों की शहादत के बाद से पूरे देश में मातम का माहौल छाया हुआ है। कई परिवार बिलख रहे हैं, तो कई अपनों की शहादत का बदला चाहते हैं। इन शहीदों में एक नाम रतन ठाकुर का भी है। बता दें कि रतन ठाकुर की पत्नी राजनंदनी गर्भवती हैं, उन्हें आज भी ये उम्मीद है कि उनके पति शायद वापस आ जाएँ। पूरे परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है।

रतन ठाकुर भागलपुर के कहलगाँव के रहने वाले थे। रतन के पिता निरंजन ने बताया कि दोपहर डेढ़ बजे रतन ने पत्नी राजनंदनी को फोन करके यह बताया था कि वो श्रीनगर जा रहे हैं और शाम तक वहाँ पहुँच जाएँगे। शाम को उनके पिता के पास रतन के ऑफिस से फोन आया और उनके किसी अन्य नंबर के बारे में पूछा गया।

शहीद जवान रतन के पिता ने बताया कि उन्हें हालात के अंदेशा हो गया था जिसकी पुष्टि टीवी देखते समय हो गई। उन्होंंने बताया कि टीवी ऑन करते ही उनका दिल बैठ गया। उन्हें एक अजीब सा डर लग रहा था। उन्होंने कहा कि उनका डर सही निकला उनका बेटा भी उन जवानों के साथ शहीद हो गया।

पत्नी से किया था होली पर घर आने का वादा

रतन ठाकुर ने अपनी पत्नी से होली पर आने का वादा किया था और इसी इंतज़ार में उनकी पत्नी के दिन कट रहे थे। बता दें कि रतन सिंह का चार साल का बेटा भी है जो कहता है कि उसके पिता ड्यूटी पर हैं। चार साल के इस बच्चे को हर पल अपने पिता का इंतज़ार रहता है।

रतन सिंह को याद करते हुए उनके पिता ने बताया कि एक दिन पहले ही उन्होंने बेटे से बात की थी। घर में छोटी बेटी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने उसकी शादी के बारे में अपने बेटे से बात की थी। इस पर बेटे का जवाब था कि चिंता मत करो हम हैं, सब निपट जाएगा। बेटे के इन्हीं आख़िरी शब्दों को याद करते हुए उनके पिता बिफर पड़ते हैं।

रतन के पिता का कहना है कि वो अपना दूसरा बेटा भी सरहद पर भेजने को तैयार हैं, बस उन्हें अपने शहीद बेटे की शहादत का बदला पाकिस्तान से मिलना चाहिए। एक पिता के इस जज़्बे और शहीद बेटे को ऑपइंडिया की ओर से शत्-शत् नमन।

घर के इन दीमकों का क्या करें? ‘हा-हा’ रिएक्शन देने वालों का भी मज़हब नहीं होता?

संवेदना मनुष्यों में एक बुनियादी भाव के रूप में बचपन से उपस्थित होती है। ध्यान रहे, मैं मनुष्यों की बात कर रहा हूँ, जिनमें मैं इन आतंकियों और उनकी हिमायत करने वालों को नहीं गिनता। जिनमें संवेदना नहीं होती, वो कई बार चुप रह जाते हैं क्योंकि कोई ख़बर उन्हें उस स्तर पर विचलित नहीं करती। ख़बरों का, ऐसी घटनाओं का, मानवीय क्षति का, हमारी निकटता से बहुत बड़ा संबंध होता है। यानी, आप घटना से प्रभावित लोगों से खुद को किस स्तर पर जोड़ कर देखते हैं। 

पुलवामा में 40 से ज़्यादा जवानों के जीवन का अंत हो गया, उनके प्राणों की बलि देश के नाम चढ़ गई। ये भारतीय इतिहास के सबसे बड़े आतंकी हमलों में से एक है। ज़ाहिर है कि ऐसे मौक़ों पर पूरा देश एक साथ खड़ा हो जाता है। माफ़ कीजिएगा, पूरा देश खड़ा नहीं होता क्योंकि कुछ लोगों की भावनाएँ हिंसा और आतंक के साथ महज़ इसलिए जुड़ जाती हैं क्योंकि बम फेंकने वालों के नाम इस्लामी हैं, और उनके भी। इतना काफी होता है खुद को एक आतंकी विचारधारा से जोड़ देने के लिए। 

आपने तस्वीर देख ही ली। तस्वीर लगे कि फोटोशॉप है तो पुलवामा पर लिखे गए लेखों, या किसी भी न्यूज़ वेबसाइट के फेसबुक पेज पर जाकर इससे संबंधित ख़बरों में ‘हा-हा’ रिएक्शन देने वालों के नाम देख लीजिए, आपको पता चल जाएगा कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ। 

मीडिया में ऐसे लोगों को ‘समुदाय विशेष’ कहा जाता है, जबकि इनकी विशेषता के नाम पर आतंकियों और हिंसक गतिविधियों में लिप्त लोगों के साथ खड़े होने के अलावा और कुछ नहीं दिखता। ये कुछ कट्टरपंथी हैं इस देश के। भले ही, कल को लोग यह भी कहने लगें कि ‘हा-हा’ रिएक्शन देने वालों का कोई मज़हब नहीं होता, वो बात और है। 

मैं बस तथ्यों की बात कर रहा हूँ। ये कोई एक्सिंडेंटल बात नहीं है कि वो ‘एंग्री’ रिएक्शन दे रहे थे, और ‘हा-हा’ चला गया। जितनी संख्या में दिया जा रहा, उस पर कोई सर्वेक्षण किया जाए तो पता चल जाएगा कि एक ठीक-ठाक प्रतिशत इतनी संवेदनहीनता दिखाने के साथ ही, आतंकियों के साथ खड़ा हो जाता है। क्या इसे देखकर यह मानने में आसानी नहीं होती कि इन्हीं नाम के कई लोग ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा लगा सकते हैं?

यह तो एक बात है, दूसरी बात इससे भी थोड़ा बढ़कर है, कई दूसरे समुदाय के नाम वाले लोग हैशटैग चला रहे हैं ‘हाउ इज़ द जैश’ जो कि ‘उरी’ फ़िल्म के बाद लोकप्रिय हुए संवाद ‘हाउ इज़ द जोश’ पर एक तंज है। ऐसे लोग बहुत हैं, और ट्विटर पर एक हैशटैग सर्च से पता चल जाएगा कि इन आतंकियों के पक्ष में लिखकर हँसने वाले लोग इसी देश के हैं, और समुदाय विशेष वाले ही हैं। मैं फैक्ट चेक करने वालों से आग्रह करूँगा कि पता करें ये लोग कौन हैं। 

कुछ नाम जिसमें मज़हब दिखता है, और घृणा भी

इन सब को देखने के बाद एक आम आदमी अगर ऐसे लोगों से घृणा करने लगता है, तो उसमें क्या गलत है? ऐसे लोग इस देश में ही नहीं, किसी भी सभ्य समाज में रहने लायक नहीं हैं जो इस तरह की दुर्भावना के साथ जीते हैं। ऐसे लोग ISIS को भी समर्थन देते हैं, पाकिस्तान को भी और आतंकियों को भी। यह समझने में आपको हर ऐसे मौक़े पर मदद मिल जाएगी। 

मुझे घिन आती है ऐसे लोगों से। हर किसी राष्ट्रवादी व्यक्ति को ऐसे कीड़ों से घिन आती है जो खाते इस देश का हैं, और गाते पाकिस्तान का हैं। ये गंदी नाले में रेंगने वाले नमकहरामों के झुंड हैं जो उन्हीं लोगों की लाश पर हँस लेते हैं जो उन्हें लगातार ज़िंदा रखे हुए हैं। ऐसे लोगों को पहचान कर इनसे पूछा जाए कि इस अश्लील हँसी का क्या मतलब है? या यह कह कर कन्नी काट लें कि ये तो कहीं के भी मजहबी हो सकते हैं? लेकिन, क्या सच में ये ‘कहीं के’ मजहबी हैं, या ‘यहीं के’ हैं जो AMU जैसी संस्थाओं में अपने विचारों की डफली आए दिन बजाते रहते हैं?

और हाँ, ये तर्क तो कोई न ही दे कि ये लोग ‘सच्चे मुस्लिम’ नहीं हैं। तो सच्चा मुस्लिम जो भी है वो ऐसे लोगों को लेकर चुप कैसे रह जाता है? क्या इन सच्चे मुस्लिमों ने कभी ऐसी घटनाओं पर हँसने वाले लोगों की निंदा की है? सोशल मीडिया में तो जिस अनुपात में ऐसे घटिया कट्टरपंथी हैं, उस अनुपात के बहुत ही छोटे अंश में भी इनके प्रति कोई निंदा जैसी बातें देखने को नहीं मिलती। तो फिर ये अच्छे मुस्लिम हैं कहाँ? आखिर अच्छे मुस्लिमों या ऐसी अच्छे मुस्लिमों से चलने वाली, ऐसे अच्छे मुस्लिमों को चिह्नित करने वाली संस्थाएँ कहाँ हैं?

दुःख की बात यही है कि भारत में ऐसे लोगों को भी ज़िंदा रहने की, अपनी घृणित और कुत्सित सोच पालने की, यहाँ के संविधान के संरक्षण में पनपने की आज़ादी है। जबकि ये वो दीमक हैं जो देश और समाज को लगातार खोखला कर रहे हैं। सेना और हमारे सुरक्षा बलों के जवान बाहरी ख़तरों से तो निपट लेंगे लेकिन ये ‘हा-हा’ करने वालों से कौन निपटेगा? इन्हें क्यों बर्दाश्त किया जा रहा है इस देश के ‘अच्छे लोगों’ द्वारा? 

पुलवामा आतंकी हमला: राहुल गांधी ने कहा: ‘पूरा विपक्ष है सरकार के साथ’

पुलवामा में हुए आतंकी हमले के एक दिन बाद कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी ने शुक्रवार (फरवरी 15, 2019) को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि पूरा विपक्ष और पूरा देश इस समय सरकार और जवानों के साथ खड़ा है।

पूर्व पीएम मनमोहन सिंह और वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए राहुल ने कहा, “आतंकवाद का मक़सद, देश को बाँटना है।” उन्होंने कहा, “यह हमला देश की आत्मा पर हुआ है। लेकिन जिन लोगों ने यह हमला किया है वह देश को ज़रा सी चोट नहीं पहुँचा सकते हैं, इस मामले में पूरा विपक्ष सुरक्षाबलों और सरकार के साथ हैं।”

राहुल गाँधी का यह बयान पीएम मोदी की टिप्पणियों के कुछ देर बाद बाद आया है जिसमें पीएम ने कहा कि यह एक भावनात्मक क्षण है और सभी को इसका राजनीतिकरण करने से बचना चाहिए।

पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने भी इस घटना की निंदा की है। उन्होंने कहा, “हम शहीद जवानों के परिवार वालों के साथ हैं। आतंकवाद के ख़िलाफ़ हमें सख्ती से पेश आने की आवश्यकता है। हम आतंकियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई में देश के साथ हैं।”

पुलवामा के वीर: आतंकी हमले में वीरगति को प्राप्त हुआ बनारस का लाल, माँ को है कैंसर

पुलवामा में हुए दुःखद आतंकी हमले में 40 से भी अधिक जवान मातृभूमि के लिए शहीद हो गए। पूरा देश शहीद जवानों की याद में गमगीन है और पाकिस्तान परस्त आतंकियों की एक सुर में निंदा कर रहा है। शहीद जवानों में नाम एक नाम अवधेश यादव का भी है। वाराणसी के निकट पड़ाव स्थित बहादुरपुर गाँव के लाल अवधेश भी आतंकयों के इस कायरतापूर्ण हमले में शहीद हो गए। इसे लेकर पूरे गाँव में आक्रोश है। लोग प्रदीप के परिजनों को सांत्वना देने के लिए उनके घर के बाहर इकट्ठे हो गए।

परिजनों व ग्रामीणों के बीच दीपू के नाम से जाने जाने वाले अवधेश की मृत्यु की सूचना शाम तक उनके परिजनों को नहीं दी गई थी। लेकिन, किसी भी अनहोनी की आशंका से परिवार में पहले से ही मातम का माहौल था। उनके शहीद होने की सूचना पाकर तो जैसे परिजनों पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। हरिकेश यादव के चार बेटे-बेटियों में अवधेश सबसे बड़े थे। उनके दो बहनों की शादी हो चुकी है। वह वर्ष 2006 में सीआरपीएफ की 145वीं बटालियन में शामिल हुए थे। अवधेश के छोटे भाई बृजेश अभी पढ़ाई कर रहे हैं।

अवधेश की शादी तीन साल पहले ही हुई थी। उनकी शादी सैयदराजा गाँव के जनार्दन यादव की पुत्री से हुई थी। अमर उजाला में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, उनकी पत्नी शिल्पी यादव ने बताया कि अवधेश तीन दिन पहले ही जल्दी लौटने का वादा कर ड्यूटी के लिए रवाना हुए थे। शिल्पी अपने तीन वर्ष के बेटे निखिल को कलेजे से लगा कर रो रही थी। रोती बिलखती शिल्पी यादव का रोते-रोते इतना बुरा हाल था कि वो बार-बार बेहोश हो रही थी। उनका बार-बार यही कहना था कि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा कि उनके पति अब इस दुनिया में नहीं रहे।

अवधेश के बूढ़े पिता हरिकेश यादव का भी रो-रो कर बुरा हाल था। ग्रामीण उन्हें समझाने में लगे थे। ग्राम प्रधान ने बताया कि अवधेश पूरे गाँव का गर्व था और हमेशा रहेगा। उन्होंने कहा कि अवधेश मातृभूमि की आन-बान-शान के लिए शहीद हुए हैं।

जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती हमले में शहीद हुए जवानों के नामों की सूची आधिकारिक तौर पर अभी तक जारी नहीं की गई है। पुलवामा में अवंतीपुरा के गोरीपुरा हमले में हुए इस आतंकी हमले में शहीद हुए जवानों के शवों को विशेष विमान से एयरबेस लाया जाएगा। जवानों का शव एक विशेष विमान से ग़ाज़ियाबाद के हिंडन एयरबेस लाया जाएगा। यहाँ से जवानों का पार्थिव शरीर उनके घर भेजा जाएगा। मीडिया में अभी तक आ रही ख़बरों के मुताबिक़ हमले में शहीद जवानों में क़रीब 12 जवान उत्तर प्रदेश के हैं।

देश के लिए शहीद हुए सभी जवानों को ऑपइंडिया की श्रद्धांजलि। हम इस त्रासद और कायरतापूर्ण हमले में शहीद हुए अन्य जवानों के बारे में भी आपको बताएँगे ताकि पूरा देश उनके परिजनों के दुःख में शामिल हो सके। इन रणबाँकुरों की प्रेरणादायक गाथा सुन कर आपका मस्तक गर्व से ऊँचा हो जाएगा।