पुणे में कश्मीरी पत्रकार जिब्रान नज़ीर ने शिक़ायत दर्ज की थी कि उन पर स्थानीय युवाओं द्वारा कश्मीरी होने के कारण ‘हमला’ किया गया था। हालाँकि, पुलिस ने आरोपित दत्तराय लाहोटे और अज़हरुद्दीन शेख को गिरफ़्तार भी कर लिया था। लेकिन इस मामले में नया मोड़ ये आया है कि शिक़ायत दर्ज कराने वाले नज़ीर ने अपनी शिक़ायत वापस ले ली और दावा किया कि उन्हें पक्के तौर पर यह नहीं पता कि उन पर हुआ ‘हमला’ उन्हें टारगेट करके किया गया था।
I find no reason to believe that the attack on m last night, because I come from Kashmir, was an organised one. Thus, I withdrew my complaint against the accused. But, apparently, mob affliction is making inroads to Pune as well. @CPPuneCity please take notice
रिपोर्ट की मानें तो नज़ीर पर हमले की शुरुआत रोड रेज जैसा है। जानकारी के अनुसार नज़ीर बाइक पर सवार था। जैसे ही वो रेड सिग्नल पर रुका तभी दो युवक लगातार हॉर्न बजा रहे थे। इसके बाद नज़ीर के साथ उन दो युवकों की बहस होने लगी। नज़ीर ने बताया कि दोनों ने कथित तौर पर उस पर चिल्लाना शुरू कर दिया क्योंकि उसकी बाइक में जो नंबरप्लेट थी वो हिमाचल प्रदेश से पंजीकृत थी। नज़ीर ग़ुस्से में चिल्लाया और कहा कि वो हिमाचल से नहीं बल्कि जम्मू-कश्मीर से है। तब दोनों युवकों ने कथित रूप से उसकी पिटाई कर दी और कहा कि वो उसे वापस कश्मीर भेज देंगे।
इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार, उन युवकों ने नज़ीर से न सिर्फ़ माफ़ी माँगी बल्कि उसके वाहन की मरम्मत कराने का वादा भी किया। इसके बाद नज़ीर ने अपनी शिक़ायत वापस ले ली।
वहीं Newslaundry की एक ख़बर के अनुसार, हमलावरों ने उसे आतंकवादी भी बताया था। नज़ीर को मारते हुए वे दोनों युवक बार-बार उसे कश्मीर वापस जाने के लिए कह रहे थे। लेकिन जब हमलावरों को यह पता चला कि वो एक पत्रकार है तो उनमें से एक ने नज़ीर का प्रेस कार्ड छीन लिया और उनसे कहा कि वह कश्मीर में अपने घर वापस चले जाएँ और वहाँ जाकर पत्रकारिता करें।
अब इन परिस्थितियों में कुछ सवाल एकाएक ही उठ खड़े होते हैं, जैसे कि आख़िर नज़ीर ने शिक़ायत वापस क्यों ले ली, जबकि उसके साथ मारपीट हुई थी? क्या नजीर द्वारा बताई गई घटना की जानकारी में कोई गड़बड़ थी, जिसे उसने ग़लत रूप देने की कोशिश की?
फ़िलहाल, पुणे पुलिस ने संज्ञान लेते हुए इस मामले को अपराध के रूप में दर्ज कर लिया है। बता दें कि अब दत्ताराय और अज़हरुद्दीन के ख़िलाफ़ धारा-279 (रैश ड्राइविंग), 337 (दूसरों की जान ख़तरे में डालने या दूसरों की व्यक्तिगत सुरक्षा को नुक़सान पहुँचाना) और आईपीसी की धारा-323 (जान बूझकर चोट पहुँचाने के उद्देश्य से) के तहत दर्ज किया जाएगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जुलाई 2016 में फर्टिलाइजर के गोरखपुर के मैदान में एम्स और खाद कारखाने का शिलान्यास करने आए थे। तब उन्होंने कहा था कि एम्स और खाद कारखाने की ही नीव नहीं रख रहे हैं, बल्कि पूर्वांचल के विकास की भी नीव रख रहे हैं। करीब ढाई साल बाद रविवार (फ़रवरी 24, 2019) को फर्टिलाइजर के इसी मैदान से प्रधानमंत्री ने एम्स की ओपीडी का उद्घाटन, किसान सम्मान योजना की शुरुआत सहित ₹9,000 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण कर उस नीव पर विकास की भव्य इमारत खड़ी होने का ऐलान किया।
एलपीजी गैस पाइप लाइन
गोरखपुर में आयोजित किसान मोर्चा के दो दिवसीय सम्मेलन में आखिरी दिन गोरखपुर पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘गोरखपुर-आजमगढ़ लिंक एक्सप्रेस-वे’ और ‘गोरखपुर-कांडला LPG गैस पाइप लाइन‘ जैसी कई परियोजनाओं की आधारशिला रखकर पूर्वांचल के विकास में नया अध्याय जोड़ दिया।
At a cost Rs, 9000 crores world’s longest LPG Pipeline will cover 2757 KM from Kandla in Gujarat to Gorakhpur in UP pic.twitter.com/Xj0P8v73RF
पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के मुताबिक, यह देश की एक चौथाई आबादी को रसोई गैस की आपूर्ति करेगा। सरकारी तेल कंपनी इंडियन ऑइल कॉर्पोरेशन (IOC) गुजरात तट से पूर्वी उत्तर प्रदेश के शहर गोरखपुर तक गैस पाइपलाइन बिछाएगी।
खाद कारखाना चलाने के लिए गुजरात के कांडला से गोरखपुर तक LPG गैस पाइप लाइन लगाए जाने की परियोजना का प्रधानमंत्री ने अपनी गोरखपुर रैली के दौरान शिलान्यास कर दिया है। इस योजना के तहत 2,757 किलोमीटर लंबी गैस पाइप लाइन लगाई जाएगी। गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों से होकर आने वाली इस पाइप लाइन से खाद कारखाने के अलावा 13 बाटलिंग प्लांटों को गैस आपूर्ति की जाएगी।
IOC गुजरात के कांडला में LPG आयात के बाद गैस को लंबी पाइपलाइन के जरिए अहमदाबाद (गुजरात), उज्जैन (भोपाल), कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी और लखनऊ (उत्तर प्रदेश) होते हुए गोरखपुर तक पहुँचाएगी। यह संभवत: दुनिया में सबसे लंबी LPG पाइपलाइन होगी। पाइपलाइन से 3.75 मिलियन टन गैस हर साल गुजरेगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज सोमवार (फरवरी 25, 2019) को नेशनल वॉर मेमोरियल का उद्घाटन करेंगे। 40 एकड़ के क्षेत्र में फैले इस वॉर मेमोरियल में हमारे 25,942 बलिदानी जवानों के नाम अंकित होंगे। यह पूरे देश के लिए गर्व का क्षण है क्योंकि देश के लिए वीरगति को प्राप्त होने वाले जवानों को सम्मान मिलने जा रहा है। यह सर्वविदित है कि जो हमे छोड़ कर चले गए, हम उन्हें वापस नहीं ला सकते। लेकिन हाँ, हम उन्हें याद कर और उनका उचित सम्मान कर आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा ज़रूर दे सकते हैं। नेशनल वॉर मेमोरियल एक ऐसा ही प्रयास है। चक्रव्यूह की तर्ज पर बने इस मेमोरियल में चार वृत्ताकार परिसर होंगे। इसमें 21 परमवीर चक्र विजेताओं की मूर्तियाँ भी होंगी।
राष्ट्रीय युद्ध स्मारक (NWM)
अब देश की सबसे पुरानी पार्टी ने इस वॉर मेमोरियल को लेकर राजनीति शुरू कर दी है। कपिल सिब्बल ने पूछा है कि क्या वॉर मेमोरियल से सैनिकों की ज़िंदगियाँ बच जाएँगी? साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल दागा कि उनकी सरकार ने पिछले 4 वर्षों में जवानों के लिए क्या किया है? कपिल सिब्बल शायद अपनी ही पार्टी का इतिहास भूल गए हैं क्योंकि वॉर मेमोरियल बनाने की माँग आज से नहीं बल्कि 60 वर्षों से चली आ रही है। उनकी सरकार ने इसे तभी से ठंडे बस्ते में डाल रखा था। कपिल सिब्बल के बेतुकी बातों का जवाब देने से पहले ज़रूरी है कि हम पहले वॉर मेमोरियल के इतिहास को देखें ताकि कॉन्ग्रेसीयों के दोहरे रवैये पर से पर्दा उठ सके।
नेशनल वॉर मेमोरियल और कॉन्ग्रेस: जवानों के साथ 6 दशक का अन्याय
सबसे पहले सशस्त्र बलों ने 1960 में नेशनल वॉर मेमोरियल बनाने की माँग की थी, जिसे तत्कालीन नेहरू सरकार ने तवज्जोह नहीं दिया। आख़िर क्या कारण है कि जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने वॉर मेमोरियल का निर्माण कराना उचित नहीं समझा? चाहे वह ‘वन रैंक वन पेंशन (OROP)’ हो या ‘नेशनल वॉर मेमोरियल (NWM)’, सशस्त्र बलों के जवानों की माँगों को नज़रअंदाज़ करना कॉन्ग्रेस की फ़ितरत रही है। अब जब 60 वर्षों बाद जवानों की इस माँग पर ध्यान देते हुए मेमोरियल का निर्माण कराया गया है, कॉन्ग्रेस पार्टी को खुजली हो रही है।
2009 में 49 वर्षों बाद कॉन्ग्रेस की तंद्रा टूटी और तत्कालीन यूपीए सरकार ने प्रणब मुखर्जी (उनके राष्ट्रपति बनने से पहले) की अध्यक्षता में एक मंत्रिमंडलीय समीति का गठन किया। इसके बाद इंडिया गेट के पास वॉर मेमोरियल बनाने की बात शुरू हुई और कॉन्ग्रेस सरकार के मंत्रालय आपस में ही लड़ बैठे। शहरी विकास मंत्रालय ने इंडिया गेट के पास वॉर मेमोरियल बनाने का विरोध किया। हेरिटेज कमेटी और केंद्रीय विस्टा कमेटी ने सरकार के इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि विरासतों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़-छाड़ नहीं होनी चाहिए।
India’s soldiers are India’s pride. The National War Memorial is a fitting tribute to India’s bravehearts.
It took 70 years and PM Modi to make the National War Memorial a reality!
यह सब इसीलिए हो रहा था क्योंकि सरकार के पास इच्छाशक्ति का अभाव था। अगर सरकार सच में गंभीर होती तो शायद 2010 तक यह मेमोरियल बन कर तैयार हो गया रहता। लेकिन विडम्बना देखिए कि 2012 राष्ट्र भारत-चीन युद्ध की 50वीं वर्षगाँठ मनाते हुए वीर सैनिकों के बलिदान को याद कर रहा था, तब तक सरकार के पास वॉर मेमोरियल के लिए कोई रूप-रेखा तय नहीं थी। अव्वल तो यह कि 2012 से पहले कभी भी भारत सरकार ने 1962 के बलिदानियों को श्रद्धांजलि अर्पित करने की ज़रूरत तक महसूस नहीं की। 2012 में जब पहली बार ऐसा हुआ, तब तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटोनी ने इंडिया गेट के पास वॉर मेमोरियल बनाने का ऐलान किया।
आज कपिल सिब्बल जिस वॉर मेमोरियल को कोसने चले हैं, उसके निर्माण का ऐलान उनके ही मंत्रिमंडल साथी ने किया था। क्या कपिल सिब्बल एके एंटोनी से यह पूछने की ताक़त रखते हैं कि उन्होंने अक्टूबर 2012 में नेशनल वॉर मेमोरियल बनाने की बात क्यों कही थी? जिस सिब्बल की सरकार ने सुरक्षाबलों की 50 वर्ष से चली आ रही माँग के सामने अंततः झुकते हुए वॉर मेमोरियल का अनुमोदान किया था, आज वही पार्टी उसे कोस रही है। इसीलिए कपिल सिब्बल से बार-बार कहा जाता है- येक पे रहने का, या तो घोड़ा बोलो या चतुर।
कॉन्ग्रेस पार्टी में कपिल सिब्बल अकेले ऐसे नेता नहीं हैं जिन्होंने वॉर मेमोरियल का विरोध किया हो। जब एके एंटोनी ने नेश्ननल वॉर मेमोरियल का ऐलान किया था, तब दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इसका विरोध किया था। तीन केंद्रीय मंत्रियों (कमलनाथ, शिंदे, एंटोनी) को अलग-अलग पत्र लिख कर उन्होंने इंडिया गेट के पास प्रस्तावित इस मेमोरियल का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि शहर के लोगों के लिए इंडिया गेट एकमात्र प्रसिद्ध ‘हैंगआउट प्लेस’ है और मेमोरियल के बनने से लोग यहाँ आना कम कर देंगे।
मोदी ने 2014 लोकसभा चुनाव से पहले ही कर दिया था ऐलान
जनवरी 2014 का समय था। अवसर था कालजयी गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ की स्वर्ण जयंती (50 वर्ष) का। मुंबई के रेसकोर्स में आयोजित इस समारोह में भारत रत्न लता मंगेशकर और तब भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार रहे मोदी के अलावा कई पूर्व सैनिक उपस्थित थे। इससे पहले लता मंगेशकर ने मोदी के प्रधानमंत्री बनने की कामना कर चुकीं थीं, जिसके बाद कुछ कॉन्ग्रेसी नेताओं ने उनका भारत रत्न वापस लेने की बात कह दी थी। लाखों लोगों की उपस्थिति के बीच उसी मंच से बोलते हुए मोदी ने कहा था:
“भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ अपने ‘जवानों के बलिदान’ के सम्मान में कोई युद्ध स्मारक नहीं बनाया गया। मुझे लगता है कि मेरे करने के लिए कुछ अच्छे काम छोड़ दिए गए हैं। भारत ने कई लड़ाइयाँ लड़ीं। इसमें हमारे हजारों जवान शहीद हुए, लेकिन उनकी शहादत को सम्मान देने के लिए कोई स्मारक नहीं है। क्या हमें युद्ध में शहीद हुए जवानों को याद नहीं करना चाहिए? क्या यहाँ एक युद्ध स्मारक नहीं होना चाहिए?”
इस से यह पता चलता है कि कॉन्ग्रेस भले ही जवानों की इस माँग को पूरा करने में विफल रही हो लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिमाग में यह चीज तब से थी, जब वो पीएम नहीं बने थे। इस मंच से उन्होंने किया था कि सत्ता में आते ही देश के सैनिकों की याद में युद्ध स्मारक का निर्माण कराया जाएगा। आज वह समय आ गया है जब देश को अपना युद्ध स्मारक मिलने जा रहा है। इसका राजनीतिकरण की कोशिश वही लोग कर रहे हैं, जो न तो इसका क्रेडिट लूटने लायक बचे हैं और न ही खुल कर इसकी आलोचना कर पा रहे हैं।
मुझे आश्चर्य भी होता था और पीड़ा भी कि भारत में कोई National War Memorial नहीं था | एक ऐसा मेमोरियल, जहाँ राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर जवानों की शौर्य-गाथाओं को संजो कर रखा जा सके | मैंने निश्चय किया कि देश में, एक ऐसा स्मारक अवश्य होना चाहिये: PM pic.twitter.com/03B3gs8iO8
मोदी के सत्ता सँभालने के कुछ ही महीनों बाद 2015 में एक कैबिनेट बैठक में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के लिए बजट का प्रावधान किया गया। इसके लिए ₹176 करोड़ तत्काल जारी किए गए। अगस्त 2016 में भारत सरकार की वेबसाइट पर इसके निर्माण के लिए एक ‘ग्लोबल डिज़ाइन कम्पटीशन’ आयोजित किया गया। जनवरी 2019 को इसका निर्माण पूरा हुआ और आज प्रधानमंत्री स्वयं इसका उद्घाटन कर रहे हैं। यह सब समय-निष्ठा के साथ संभव हो पाया क्योंकि शासन के पास इच्छाशक्ति थी, जवानों के प्रति श्रद्धा है। कॉन्ग्रेस सरकार के पास शायद यह इच्छाशक्ति नहीं थी जिसके कारण यह प्रस्ताव घोषणाओं और वास्तविकता के बीच फँस कर 60 सालों तक लटका रहा।
युद्ध स्मारकप्राचीन भारत सहित अन्य महाशक्तियों की परम्परा रहे हैं
भारतीय संस्कृति, गर्व और इतिहास की पहचान रहा है युद्ध स्मारक। प्राचीन राजा-महाराजाओं ने जब भी कोई युद्ध जीता या आक्रांताओं पर विजय पाई, उन्होंने उसकी याद में एक युद्ध स्मारक बनवाया। वे युद्ध स्मारक सैनिकों के बलिदान का प्रतीक होने के साथ-साथ उनकी वीरता की गाथा कहते थे। कई चित्रकलाओं से उनकी बहादुरी को दर्शाया जाता था। क्या सिब्बल और कॉन्ग्रेस आज अपने ही इतिहास और संस्कृति को भूल कर राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर सवाल खड़ी कर रही है?
युद्ध स्मारक हमारी परम्परा है, संस्कृति है (विजय स्तम्भ, चित्तौड़)
15वीं शताब्दी के मध्य में जब इस्लामी आक्रांताओं ने भारत पर क़हर बरपाना शुरू किया तब एक ऐसे योद्धा का उदय हुआ, जिसने सिर्फ़ राजस्थान ही नहीं बल्कि समस्त भारतवर्ष को राह दिखाने का कार्य किया। सुल्तान महमूद ख़िलजी के नेतृत्व वाली मालवा और गुजरात में बैठे इस्लामी आक्रांताओं को धूल चटाने और सुल्तान को मांडू की तरफ भागने को मजबूर करने के बाद चित्तौड़ के राजा महाराणा कुम्भा ने विजय स्तम्भ (कीर्ति स्तम्भ) का निर्माण कराया। यह आज भी हमे अपने गौरवपूर्ण इतिहास की याद दिलाता है। मुस्लिम, जैन व हिन्दू प्रतीक चिह्नों से अंकित इस स्तम्भ पर इसे बनाने वाले कारीगरों तक के नाम जुड़े हुए हैं।
कौटिल्य ने कहा था कि राष्ट्र और उसके सैनिकों के बीच एक पवित्र अनुबंध होता है और राष्ट्र अगर सैनिकों के साथ उस अनुबंध का सम्मान करने में विफल होता है तो सरकार के पास ऐसे सैनिक रह जाएँगे जो राष्ट्र का सम्मान नहीं करेंगे। वर्षों से सुरक्षाबलों की माँगें न मान कर कॉन्ग्रेस चाणक्य के इस वचन के विपरीत कार्य कर रही थी जिसके परिणामस्वरूप हमारे जवानों को वो उचित सम्मान नहीं दिया गया, जिसके वो हक़दार हैं।
विश्व के तमाम देशों में युद्ध स्मारक हैं जो बलिदानी सैनिकों की याद में बनाए गए हैं। इज़राइल और ब्रिटेन से लेकर हमारे बहुत बाद आज़ाद हुए बांग्लादेश तक- सभी ने अपने बलिदानी सैनिकों को उचित सम्मान देते हुए उनकी याद में स्मारक बनवाए। लेकिन, भारत में अब तक बलिदानियों को उसी इंडिया गेट पर श्रद्धांजलि दी जाती रही है, जिसे अँग्रेजों द्वारा विश्व युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए भारतीय सैनिकों की याद में बनवाया गया था। अर्थात यह, कि आज़ादी के बाद वीरगति को प्राप्त हुए भारतीय जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए कोई अलग स्थल अब तक नहीं था।
सिब्बल की युद्ध स्मारक पर घटिया राजनीति
कपिल सिब्बल का राष्ट्रीय युद्ध स्मारक को लेकर जो बयान आया है, वह बेतुका है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि भारत का इतिहास रहा है कि जिन्होंने भी मातृभूमि के लिए त्याग किया है, उन्हें भुलाया नहीं जाता। क्या कपिल सिब्बल के घर में उनके स्वर्गीय पिता की तस्वीर नहीं है? क्या देश में हर दूसरे-तीसरे चौराहे पर नेहरू, इंदिरा की मूर्तियाँ नहीं हैं? क्या याद किए जाने का सर्टिफिकेट सिर्फ़ नेताओं के पास ही है, बलिदान देने वाले सैनिकों का कोई मोल नहीं? कॉन्ग्रेस को इस मानसिकता से बाहर निकलना पड़ेगा। स्मारक, प्रतिमाएँ और तस्वीरें सिर्फ़ नेताओं की नहीं बल्कि मातृभूमि को प्राण अर्पण करने वाले वीरों की भी बननी चाहिए।
नेशनल वॉर मेमोरियल की शानदार झलकियाँ (साभार: PIB)
कपिल सिब्बल को समझना चाहिए कि अगर कोई अपने किसी मृत रिश्तेदार की तस्वीर लगाता है तो ऐसा नहीं है कि उसके दूसरे रिश्तेदार अमर हो जाएँगे या फिर मृत लोग वापस आ जाएँगे। यह सम्मान का प्रतीक होता है उनका, वो हमारा साथ छोड़ गए। और, ये वीर जवानों ने तो हमारे लिए अपने प्राणों की बलि दी है, देश के लिए दी है। उनकी स्मृति तो सहेज कर रखी ही जानी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इनके त्याग का माहात्म्य समझें और इन्हे सम्मान देना सीखें। जिस दिन सिब्बल को इन जवानों के प्रति श्रद्धा हो जाएगी, उस दिन वह भी युद्ध समारक पर राजनीतिक कींचड़ उछालना बंद कर देंगे।
हाल ही में शुक्रवार (फ़रवरी, 22 2019) को यूपी के देवबंद से जैश के दो संदिग्ध आतंकियों को हिरासत में लिया गया। इनके पकड़े जाने के बाद से ही एटीएस की पूछताछ इनसे जारी है। रविवार (फ़रवरी 24, 2019) को उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने संदिग्ध से लगातार 4 घंटे की पूछताछ की। इस पूछताछ में कई हैरान करने वाले खुलासे हुए हैं।
इस पूछताछ में इन दोनों संदिग्धों ने पुलवामा हमले के बाद सुरक्षाबलों द्वारा मारे गए मास्टरमाइंड अब्दुल रशीद गाजी से जुड़े होने की बात को भी स्वीकारा है। जाँच कर्ताओं ने दावा किया है कि इन दोनों के सेलफोन से वायस मैसेज मिला है जिसमें इन दोनों में से एक आतंकी ‘बड़े काम’ और ‘सामान’ से जुड़ी बात कर रहा है। इस बातचीत में ‘सामान’ को हथियारों और विस्फोटकों से जोड़ा जा रहा है।
पूछताछ में आतंकियों से प्राप्त जानकारियों को यूपी पुलिस ने जम्मू-कश्मीर के डीजीपी दिलबाग सिंह के साथ साझा किया है। टाइम्स ऑफ इंडिया से हुई बातचीत में डीजीपी ओपी सिंह ने कहा कि दोनों आतंकियों ने जैश के संबंधों को स्वीकारा किया है और साथ ही कुछ जरूरी जानकारी भी दी है, जो उम्मीद है भविष्य में काम आएगी।
एटीएस, पुलिस महानिरिक्षक असीम अरूण ने बताया कि शहनवाज ने कहा है कि वो आतंकी गतिविधियों में पिछले 18 महिनों से जुड़ा हुआ है जबकि आक़िब को इससे जुड़े 6 महीने हुए हैं। चार घंटे चली पूछताछ में मालूम चला है कि संदिग्ध आतंकी ब्लैकबेरी मैसेंजर और वर्चुअल नंबर का इस्तेमाल कर अपने संदेशों को एक दूसरे तक पहुँचाते थे। इन्ही संदेशों के ज़रिए यह कुछ बड़ी घटना को अंजाम देने की तैयारी कर रहे थे।
साथ ही एटीएस की जाँच में सामने आया है कि इन आतंकियों के मोबाइल में ऐसे ऐप डाउनलोड थे, जो प्ले स्टोर पर मौजूद ही नहीं हैं। इसके ज़रिए ही वह अपने साथियों के संपर्क में आते थे। बता दें कि आतंकियों के इस मॉड्यूल और संगठन के अन्य सदस्यों के बारे में भी अहम सुराग एटीएस के हाथ लगे हैं।
एक ओर जहाँ चुनावी रैलियों में कॉन्ग्रेस पार्टी दलितों की एकमात्र हितैषी होने का दावा करती है, वहीं पार्टी के भीतर उनकी दलित विरोधी मानसिकता को कर्नाटक के डेप्युटी CM, जो कि कॉन्ग्रेस के ही नेता हैं, ने सबके सामने रख दिया है। कर्नाटक की जेडीएस-कॉन्ग्रेस गठबंधन की सरकार में डेप्युटी CM और कॉन्ग्रेस नेता जी. परमेश्वर ने खुद के दलित होने की वजह से मुख्यमंत्री नहीं बन पाने का आरोप लगाया है। परमेश्वर ने कहा कि जाति की वजह से उन्हें 3 बार मुख्यमंत्री का पद देने से इनकार कर दिया गया।
K’taka Dy CM,G Parameshwara at an event in Davangere y’day alleged he was thrice denied CM post as he belonged to Dalit community,said, “PK Basavalingappa & KH Ranganath missed the CM post.Mallikarjun Kharge also couldn’t become CM. I missed it thrice. Somehow, I was made Dy CM.” pic.twitter.com/7g0AcKsde4
कर्नाटक के दावणगेरे में दलित समुदाय के अधिकारों से जुड़ी चलावड़ी रैली में भाग लेने आए उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने कहा, “मुझे दलित होने की वजह से दबाया गया। दलित होने की वजह से ही मुझे 3 बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुँचने दिया गया। मैंने मजबूरी में डेप्युटी सीएम की कुर्सी से संतोष किया, जिसके लिए मैं जरा भी इच्छुक नहीं था।”
जी. परमेश्वर ने कॉन्ग्रेस पार्टी पर अन्य दलित नेताओं को भी मौका नहीं देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस ने बी. बासवलिंगप्पा, के.एच. रंगनाथ, मल्लिकार्जुन खड़गे को भी प्रदेश के सीएम की कुर्सी तक पहुँचने नहीं दिया। यह सभी लोग मुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन जाति की वजह से मात खा गए और दलित उत्पीड़न का शिकार हो गए।”
हालाँकि कॉन्ग्रेस ने परमेश्वर के आरोपों को मानने से मना कर दिया है। पूर्व सीएम और सीनियर कॉन्ग्रेस नेता सिद्धारमैया ने कहा, “मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि परमेश्वर ने यह बयान क्यों और किस संदर्भ में दिया है। कॉन्ग्रेस पार्टी ही दलित तथा समाज के अन्य कमजोर तबकों का ख्याल रखती है।”
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) मार्च में एक ऐतिहासिक पीएसएलवी मिशन शुरू करने जा रहा है। भारतीय स्पेस हिस्ट्री में यह पहली बार होगा जब इसरो एक साथ तीन विभिन्न कक्षाओं में एक ही PSLV मिशन से अलग-अलग सैटेलाइट स्थापित करने जा रहा है।
ISRO Chairman K Sivan: Very soon we are going to make PSLVs from industry for which L&T and HAL have formed a consortium. Along with that small satellite launch vehicles will also be made by the industry. (23.02.2019) https://t.co/ek9IT4y3sk
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इसरो के अध्यक्ष के सिवन ने कहा, “इसरो मार्च के अंतिम सप्ताह में अभी तक की सूचना के अनुसार 21 मार्च को PSLV C-45 मिशन लॉन्च करेगा। श्री हरिकोटा से टेकऑफ करने के तुरंत बाद, रॉकेट सबसे पहले 763 किमी की कक्षा में डीआरडीओ का एक इलेक्ट्रॉनिक खुफिया उपग्रह एमिसैट (EMISAT) लॉन्च करेगा। डीआरडीओ पेलोड लॉन्च करने के तुरंत बाद, PS-4 चरण (रॉकेट का अंतिम चरण) 504 किमी की कक्षा में पहुँचने के लिए रॉकेट को फिर से स्टार्ट किया जाएगा, जहाँ यह 28 विदेशी उपग्रहों को स्थापित करेगा। इसके बाद, PS-4 फिर से दो ऑर्बिट के जम्प के साथ, 485 किलोमीटर की दूरी तय कर निर्धारित तीसरी कक्षा में पहुँच जाएगा, जहाँ अंतरिक्ष प्रयोगों के लिए एक प्रायोगिक मंच लॉन्च किया जाएगा।”
We’ll launch first 3 orbit mission with PSLV-C45 on Mar 21: ISRO Chairman K Sivanhttps://t.co/vfnebYrEHb
सिवन ने कहा, “PSLV C-45 पूरी तरह से एक नया रॉकेट होगा। इस बार इसमें चार स्ट्रैप-ऑन होंगे। 24 जनवरी को पिछले मिशन के विपरीत जब रॉकेट का अंतिम चरण सक्रिय रहने के लिए बैटरी का उपयोग करता था, इस बार हम सौर पैनलों का उपयोग करने जा रहे हैं ताकि कम से कम छह महीने तक इसे सक्रिय रखने के लिए सौर ऊर्जा का उपयोग किया जा सके।”
इसरो अध्यक्ष ने कहा कि इसरो अप्रैल के अंत में चंद्रयान-2 मिशन शुरू करेगा। दूसरे चंद्र मिशन की तैयारियों की समीक्षा करने के लिए उन्होंने कहा “6 मार्च को प्रख्यात विशेषज्ञों की एक राष्ट्रीय समीक्षा बैठक होगी। इस बैठक से एक दिन पहले, इसरो 5 मार्च को गगनयान अर्थात मानव अंतरिक्ष यान परियोजना पर एक राष्ट्रीय समीक्षा बैठक भी आयोजित करेगा।”
शीर्षक का सवाल अगर कोई ऐसा व्यक्ति करे जो किसी पार्टी को समर्थन नहीं देता, या किसी पार्टी के विरोध में नहीं है, तो सवाल सही लगता है। सवाल इसलिए सही लगता है कि उस व्यक्ति को पार्टियों और नेताओं के फोटो मोमेंट से ही समस्या हो सकती है। उसे लगता हो कि स्थिति आदर्श है, और चुनाव जीतने के लिए विकास के काम करा लिए जाएँ, वही बहुत है। उसे लगता हो कि हर आदमी को परफ़ेक्ट होना चाहिए।
लेकिन जो व्यक्ति एक विचारधारा, या पार्टी-पोलिटिक्स के साथ जगता, रहता, और सोता हो, दिन के दस पोस्ट उसके राजनैतिक होते हों, वो अगर मोदी द्वारा ‘स्वच्छता दूतों’ के पाँव धोने पर उपहास कर रहा है, तो उसकी मानसिकता पर सवाल उठते हैं।
जो भी व्यक्ति थोड़ा भी राजनीति से संबंध रखता है, चाहे वो एक सामान्य नागरिक के तौर पर हो, या फिर किसी पार्टी के कार्यकर्ता के तौर पर, वो जानता है कि चौबीसों घंटे मीडिया से घिरे रहना वाले नेता जो भी करते हैं, उसका पब्लिक में जाना तय है। साथ ही, जब बात पब्लिक में जाती है, तो एक संदेश जाता है। संदेश को आप किस तरह से देखते हैं, ये पूरी तरह आपके ऊपर है।
यही कारण है कि राहुल गाँधी को चुनावों के दौरान गोत्र बताने से लेकर जनेऊ पहनने और शिवभक्त से रामभक्त होना पड़ा था। पार्टी के या वृहद् समाज के वोटर्स को समेटने के लिए ऐसे काम होते रहे हैं, और होते रहेंगे। ऐसे ही काम चाहे धरना करने को लेकर हो, या सड़क पर रातों में अपनी ही सरकार में सोने को हो, बहुतों ने किया है। इन सबका महत्व है।
महत्व यही है कि आप जिनसे जुड़ना चाहते हैं, वहाँ तक आप शारीरिक रूप से नहीं पहुँच सकते, तो ऐसे संदेशों के ज़रिए पहुँचते हैं। एक पब्लिक फ़िगर का, नेता का, एक समय में सिर्फ स्पीच के माध्यम से ही नहीं, अपने बॉडी लैंग्वेज, अपनी सामान्य जिंदगी और अपनी आधिकारिक यात्राओं के दौरान किए गए छोटे-छोटे कार्यों से भी अपनी जनता से जुड़ने का मौका होता है।
कल जो मोदी ने किया, या मोदी जो अपनी रैलियों के दौरान करते हैं, उसके मायने होते हैं। आप विरोध में खड़े हैं तो आपको बेशक वो एक ड्रामा लगेगा, लेकिन वही काम आपके मतलब के लोग करते हैं, तो वो सामान्य सी बात होती है जो राहुल गाँधी हमेशा करते थे, लेकिन राजनीति के कारण उन्हें पब्लिक में करना पड़ा। ख़ैर, यहाँ बात राहुल बनाम मोदी की है भी नहीं।
चाहे वो उत्तर-पूर्व के राज्यों में रैलियों को संबोधित करते हुए उनकी वेशभूषा धारण करनी हो, उनकी जनजातीय परंपरा की पगड़ी, टोपी, कपड़े पहनने हों, मोदी ऐसे मौक़े नहीं छोड़ते। साथ ही, आप में से ही कई उन टोपियों का, कपड़ों का उपहास करते हैं। आप कर सकते हैं क्योंकि आपके लिए जीन्स-पैंट ही कपड़ा है, बाकी चीज़ें जो आपकी समझ में नहीं आती, वो नौटंकी है।
इसके मायने यही हैं कि मोदी अपने कुरते में भी स्पीच दे सकते थे, लेकिन उन्होंने उस इलाके की जनजातीय परंपरा को यह संदेश दिया कि देश का प्रधानमंत्री उनकी परंपरा का सम्मान करता है। आपको इसमें कुछ भी असामान्य नज़र नहीं आएगा क्योंकि आप न तो लोयथम रिचर्ड को जानते हैं, न ही नाइदो तनियम को। आप उन हजारों उत्तर-पूर्व के लोगों को नहीं समझ पाते, और मजाक करते हुए, टिप्पणियाँ करते हुए, उसके बालों के कारण उसकी जान ले लेते हैं।
आप जान ले लेते हैं क्योंकि आप उस समाज का हिस्सा हैं, जिनके लिए विविधता उपहास का विषय है। समाज ऐसे लोगों को मार देता है क्योंकि वो उनसे अलग दिखते हैं। नागालैंड की जनजाति की टोपी या फिर अरुणाचल से न्यासा जनजाति की पगड़ी को आप आजीवन देख नहीं पाते, अगर मोदी ने न पहना होता। इससे कम से कम यह तो हुआ ही होगा कि कोई आपको वैसा पहने दिख जाए तो उसे आप सीधा अफ़्रीका का नहीं मान लेंगे, और आपके अपने देश की विविधता का भान होगा!
उसी तरह, कितनी बार रुककर सफ़ाई कर्मचारी से ठीक से बात की है आपने? सीवरों में घुसकर मरने वाले लोग वही लोग हैं, जो हमारे समाज को साफ रखते हैं। कितनी बार अपने घर में झाड़ू लगाने आती महिला को आपने प्रेम से कुछ कहा है? कितनी बार आपने उसके बच्चे की मदद करनी चाही है? कितनी बार उसके परिवार के बारे में जानने की कोशिश भी की है? याद करेंगे तो शायद दो-तीन बार ऐसा किया होगा। हम में से बहुत वो भी नहीं करते।
गाँधी जी ने जब कहा था कि कोई भी कार्य छोटा नहीं होता, तो हमने किताबों से वो लाइन रट ली, लेकिन समझ नहीं पाए। इन बातों की समझ बाहर के कई देशों में है, इसलिए वहाँ नाली साफ करने वाले को एक प्रोफेसर से ज़्यादा पैसे मिलते हैं। वहाँ की समझ यह है कि कोई हमारी गंदगी हटा रहा है, कोई वह काम कर रहा है जो मैं स्वयं नहीं करना चाहता। इसलिए उस कार्य को करने वाले की अहमियत बढ़ जाती है।
मोदी जब स्वच्छता दूतों के पाँव धोता है तो वो सिर्फ एक ड्रामा नहीं है, वो एक स्टेटमेंट है कि राष्ट्र का मुखिया उन लोगों के कार्यों को, उनकी कोशिशों को, उनकी अहमियत को पहचान रहा है, जिनके कारण विश्व का सबसे बड़ा मेला सफ़ाई के मामले में बेहतरीन रहा। ये महज़ एक विडियो नहीं है, यह एक संदेश है कि हमें अपने घर की सफ़ाई करने वाले, हमारे काम निपटाने वाले लोगों को आभार प्रकट करना चाहिए।
पैर धोना एक प्रतीकात्मक कार्य है। लेकिन कभी-कभी ऐसे प्रतीक हमारे समाज में ज़रूरी होते हैं जहाँ हम हमेशा ही ऐसे लोगों को नीची निगाह से देखते हैं। आप नहीं देखते होंगे, हो सकता है, लेकिन समाज कैसे देखता है, वो हम सब जानते हैं। ये सिर्फ पाँव धोकर फोटो खिंचाना नहीं है, ये सद्भावना का संदेश है कि हमें अपना व्यवहार कैसा रखना चाहिए।
ऐसे में कोई अपने जीवन के आधे घंटे निकालकर, प्रतीक के लिए ही सही, उनके पास जाने की कोशिश करता है, उन्हें यह विश्वास दिलाता है कि वो जो कार्य कर रहे हैं, वो महान कार्य है, तो आपको समस्या क्यों होती है? आप ही तो वो लोग हैं जिन्होंने ‘स्वच्छता अभियान’ पर मोदी के झाड़ू पकड़ने को लेकर मजाक उड़ाया था। लेकिन आप आज भी उसके इम्पैक्ट को स्वीकारने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि आपके लिए तो मोदी को हर व्यक्ति के घर में जाकर झाड़ू लगाते हुए दिखना था।
आप इन मामूली बातों के बड़े असर से वाक़िफ़ नहीं हैं। शायद आपका अनुभव वैसा न हो, या सोशल मीडिया के बाइनरी में आप भी मिडिल ग्राउंड तलाशने में परेशान हो रहे हों। ‘स्वच्छता अभियान’ और ‘हर घर में टॉयलेट’ के मायने उन औरतों से पूछिए जिन्हें अंधेरे में शौच को जाना पड़ता था। लेकिन आप नहीं समझ पाएँगे क्योंकि आपके लिए झाड़ू और ट्वॉयलेट तो मामूली चीज़ें हैं, इन पर पीएम अपना समय क्यों दे रहा है।
लोगों को इस बात से आपत्ति हो जाती है कि मोदी अपनी माँ के पैर छूते हुए फोटो डालता है, बग़ीचे में घुमाते हुए फोटो डालता है। ऐसे लोग बहुत ही आसानी से भूल जाते हैं कि इसी फेसबुक, इन्स्टाग्राम या ट्विटर पर वो दिन भर अपने मन की बातें करते रहते हैं, अपनी प्रेमिका की तस्वीरें लगाते हैं, माँ के गले लिपटकर उन्हें चूमते हैं।
क्या प्रधानमंत्री को अपनी माँ के प्रति प्रेम दर्शाने का हक़ नहीं है? क्या वो पत्थर हो जाए? आखिर किस बेटे की लालसा नहीं होती कि वो जीवन में कुछ करे, और अपनी माँ को उसका एक हिस्सा न दे? जिस माँ के रक्त और मांस से ये शरीर बना है, जिस माँ का हिस्सा हम हैं, उसे अगर हम प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने आवास पर न लाएँ, उसके व्हील चेयर को ढकेलते हुए बग़ीचे में न घुमाएँ तो फिर प्रधानमंत्री बनकर अपने वैयक्तिक स्तर के आनंद से हम वंचित रह जाएँगे।
सोशल मीडिया का दौर है, तो जैसे आप अपनी माँ के गले लगकर फेसबुक पर लगा देते हैं, और लोग उसे देखकर खुश होते हैं, वैसे ही एक प्रधानमंत्री भी करता है। इसमें समस्या क्या है? प्रधानमंत्री अपने निजी जीवन के क्षण, अपने वैयक्तिक पोस्टों के माध्यम से शेयर न करे? मैं तो चाहूँगा कि हर व्यक्ति ऐसा करे क्योंकि न तो एक बेटे द्वारा अपनी माँ को चूमने से बेहतर कोई तस्वीर हो सकती है, न ही किसी सफ़ाई कर्मचारी के पाँव धोते प्रधानमंत्री से ज़्यादा समावेशी संदेश।
इसलिए, आप जब ऐसी बातों पर प्रश्न करते हैं, तो अपने आप को एक बार देख लिया कीजिए। दौर बहुत ही अच्छा है। हर दौर अच्छा होता है। हर दौर के लोग अच्छे होते हैं। जहाँ तक इस तंज का सवाल है कि ऐसे लोगों के बच्चे होते तो वो उनके ‘मूतने की तस्वीरें’ भी लगाता, तो यह जान लीजिए कि जो पहली बार पिता बनता है, वो इन बातों पर भी अपार आनंद पाता है। क्या पता आप ही जब उस स्थिति में होंगे तो अपने बच्चों के साथ की हर वैसी तस्वीर शेयर करेंगे।
ये ड्रामा नहीं है। ये ड्रामा आपके लिए हो सकता है क्योंकि आपको लगता है कि इसकी ज़रूरत नहीं है। और वो आप ही होंगे जो यह भी कहते पाए जाएँगे कि दलितों को पीटा जा रहा है, मोदी जी बयान क्यों नहीं देते। वही मोदी उसी दलित के घर चला जाएगा, तो आप कहेंगे चुनावों के समय नौटंकी हो रही है।
आप ही कहेंगे कि भाजपा और मोदी ‘सूट बूट की सरकार’ चलाते हैं, जिसका मतलब है कि उसे आम आदमी से कोई मतलब नहीं। वही आदमी जब किसी बुजुर्ग महिला के पाँव छूता है, तो आपको लगता है कि सब कैमरे के लिए हो रहा है। आप ही कहते हैं कि वंचितों के लिए मोदी ने क्या किया, उन्हें सताया जा रहा है, और जब मोदी उनके पाँव धोता है, तो आपको लगता है कि नौटंकी हो रही है।
आप शायद इन बातों के प्रभाव को समझ नहीं सकते। शायद समझना नहीं चाहते। या, आपकी समझ का दायरा इतना संकुचित है कि आपके लिए आप जो चाहते हैं, उससे इतर कुछ भी होता अजीब लगता है, नौटंकी लगती है। जो मोदी से जुड़े हैं, वैचारिक स्तर पर, या पार्टी के स्तर पर, उनमें ऐसे लाखों लोग हैं जो ऐसे तबक़ों से आते हैं जिन्हें हमेशा हेय दृष्टि से देखा गया है। इन लोगों तक अगर जुड़ाव का एक संदेश ही जा रहा है कि मोदी उनके कार्यों की सराहना करता है, तो उनके लिए ‘सम्मान’ नाम के शब्द के मायने व्यापक हो जाएँगे। लेकिन आपको क्या, आप नहीं समझेंगे, क्योंकि आप समझना नहीं चाहते।
कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की बहन प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट वाड्रा के राजनीति में एंट्री करने की अटकलों पर बयानबाजी शुरू हो गई है। मुरादाबाद में आजकल रॉबर्ट वाड्रा के होर्डिंग व पोस्टर लगे हैं। इन सभी पोस्टर में उनसे लोकसभा चुनाव लड़ने का आग्रह किया गया है। भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने इसे लेकर जहाँ कॉन्ग्रेस पर जबरदस्त तंज कसा है, वहीं कॉन्ग्रेस नेता संदीप दीक्षित का कहना है कि हर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है। मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ का सामना कर रहे वाड्रा ने भी सक्रिय राजनीति में आने का संकेत क्या दिया, उनको लोकसभा चुनाव लड़ाने की माँग होने लगी।
राजनीति में आने की अटकलों पर रॉबर्ट वाड्रा ने कहा, “पहले मुझे आधारहीन आरोपों से मुक्त होना है। उसके बाद मैं इस मामले (राजनीति में आने पर) पर काम करना शुरू करूँगा। अभी कोई जल्द नहीं है।”
रॉबर्ट वाड्रा के लोकसभा चुनाव लड़ने से संबंधित पोस्टर मुरादाबाद में लगने पर केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, “ये जो P-R (प्रियंका-राहुल) का सियासी सर्कस है, इसमें जोकर की एंट्री बाकी थी। अब जोकर की एंट्री दिखाई पड़ रही है।”
मुरादाबाद के युवाओं में वाड्रा को लेकर काफी जोश नज़र आ रहा है। युवा कॉन्ग्रेस की ओर से लगाए गए पोस्टर पर लिखा है कि रॉबर्ट वाड्रा मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए आपका स्वागत है। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उत्तर प्रदेश में सियासी सरगर्मी बढ़ने लगी है। कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी के सक्रिए राजनीति में उतरने के बाद अब उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के सियासी मैदान में एंट्री को लेकर हलचल तेज हो गई है।
वहीं, कल ही कॉन्ग्रेस पार्टी के सहयोगी महान दल जनता से अपील करती दिखी थी। ‘महान दल’ के अध्यक्ष केशव देव मौर्य वोटर्स से अपील कर रहे थे कि वोट देने के लिए प्रत्याशी मत देखना, चाहे वह कोई भी हो, अच्छा हो, बुरा हो, खराब हो, बाहर का हो, भीतर का हो, पाकिस्तान से भी आकर लड़े, बस हाथ का पंजा देखकर ही उसी को वोट देना। यह मात्र संयोग ही हो सकता है कि रॉबर्ट वाड्रा इनमें से ज्यादातर शर्तों पर एकदम ‘फिट’ नजर आते हैं।
मध्य प्रदेश के सुमावली विधान सभा से कॉन्ग्रेस विधायक हैं ऐंदल सिंह कंसाना। इनके बेटे हैं राहुल सिंह। राहुल आगरा-मुंबई हाइवे पर स्थित छौंदा टोल प्लाजा पर 15-20 बदमाशों के साथ हमला और तोड़-फोड़ करते हुए पाए गए।
दैनिक भास्कर की ख़बर के अनुसार यह घटना शनिवार-रविवार (फ़रवरी 24, 2019) रात की है। जब पूरा वाकया सीसीटीवी कैमरे में क़ैद हो गया। पुलिस का कहना है कि इन बदमाशों ने टोल के ऑफिस पर क़रीब पाँच मिनट तक ताबड़तोड़ गोलियाँ बरसाई। परिस्थिति को गंभीर होता देख वहाँ मौजूद सिक्योरिटी गार्ड्स ने इन बदमाशों पर जवाबी गोलीबारी की।
साभार: दैनिक भास्कर
दोनों तरफ से चली गोलियों में एक युवक गंभीर रूप से घायल हो गया। मुरैना के एसपी रियाज़ इक़बाल के मुताबिक़ विधायक ऐंदल सिंह कंसाना के बेटे राहुल सहित 15-20 अन्य लोगों के ख़िलाफ़ 307 धारा के तहत केस दर्ज किया गया है। घटना को अंजाम देने के बाद से ही अपराधी फरार हैं।
इस घटना की रिपोर्ट दर्ज कराते हुए टोल मैनेजर भगवान सिंह सिकरवार ने बताया कि रात के साढ़े 10 बजे राहुल उन्हें फोन करके धमकी दे रहा था कि टोल से उसकी और उसके नाम से जितनी भी गाड़ियाँ निकलेंगी, उनसे कोई शुल्क ना लिया जाए।
कांग्रेस सरकार में दबंगों का आतंक फिर से सिर उठाने लगा है. सुमावली से कांग्रेस विधायक ऐंदल सिंह कंसाना के बेटे राहुल सिंह ने 15 से 20 साथियों के साथ मिलकर एक टोल नाके पर जमकर उत्पात मचाया और फायरिंग की.https://t.co/T5cqxMsx8F
लेकिन, सीनियर मैनेजर द्वारा इस बात की मनाही के बाद राहुल अपने 15-20 साथियों के साथ वहाँ पहुँचा और जमकर गोलीबारी की। गोलीबारी की आवाज़ सुनते ही वहाँ पर हड़कंप मच गया और वहाँ मौजूद सभी कर्मचारी बूथ छोड़कर भागने लग गए। साथ ही उस हाइवे से गुज़रने वाले सभी वाहन भी अपनी जगह पर खड़े रह गए।
मामले के तूल पकड़ने के बाद कॉन्ग्रेस विधायक का बयान आया है कि फायरिंग के वक्त उनका बेटा टोल पर गया ही नहीं। साथ ही विधायक ने टोल टैक्स ठेकेदार की FIR को भी झूठा करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई करने को तैयार हो गया है, जिसमें जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाज़ो से सुरक्षाबलों की सुरक्षा की माँग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की खंडपीठ ने 19 वर्षीय प्रीति केदार गोखले और 20 वर्षीय काजल मिश्रा द्वारा दायर की गई याचिका पर केंद्र सरकार, रक्षा मंत्रालय, जम्मू-कश्मीर सरकार और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को भी नोटिस जारी किए।
Supreme Court issues notice to centre and Jammu & Kashmir government on a plea filed by two children of Army officers, seeking protection for Army personnel deployed in the state. The plea seeks formulation of a policy to protect human rights of security personnel. pic.twitter.com/OjgCTG7n0S
याचिका में सुरक्षाबल के मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए एक नीति तैयार करने की माँग भी की गई है। इस याचिका में सुरक्षा बलों पर ड्यूटी के दौरान भीड़ द्वारा पत्थरों से होने वाले हमलों का ज़िक्र किया गया है। बता दें कि जब सुरक्षाबल आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में लगे हुए होते हैं तब कई बार उन पर स्थानीय युवकों द्वारा पत्थरबाज़ी की जाती है। ऐसा करने के पीछे मक़सद यह होता कि सुरक्षा बलों का ध्यान भटकाया जाए और आतंकवादियों को भागने का मौक़ा मिल सके।
दोनों याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसी घटनाओं से जवानों के कर्तव्य पालन में बाधा तो आती ही है, साथ में उनकी तैनाती की जगह पर उनकी सुरक्षा को भी ख़तरा होता है।