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‘शाह की रैली से TMC को डर, हेलीकॉप्टर उतारने की अनुमति नहीं देना सिर्फ एक बहाना’

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की सरकार ने मालदा जिले में अमित शाह के हेलीकॉप्टर को उतारने की अनुमति देने से इनकार किया है। अब बीजेपी ने इस मामले में बीएसएफ को हेलीकॉप्टर सुरक्षित लैंड करवाने के लिए पत्र लिखकर मदद माँगी है। दरअसल बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 22 जनवरी को मालदा में एक रैली को संबोधित करेंगे। उन्हें कोलकाता से रैली में हिस्सा लेने मालदा के लिए हेलीकॉप्टर से रवाना होना है।

प्रशासन की दलील

जिला प्रशासन ने कहा है कि इस सप्ताह में वीवीआईपी हेलीकॉप्टर उतारने की अनुमति देना संभव नहीं है। प्रशासन ने पत्र लिखकर कहा कि मालदा मंडल के कार्यकारी इंजीनियर, पीडब्ल्यूडी (सिविल) की रिपोर्ट के अनुसार, मालदा में हवाई अड्डे पर काम चल रहा है। धूल और अन्य सामान रनवे के चारों ओर पड़ा है, साथ ही निर्माण के चलते अस्थायी हेलीपैड का रख-रखाव ठीक से नहीं किया गया है। इस स्थिति में हवाई अड्डा हेलीकॉप्टरों की सुरक्षित लैंडिंग के लिए उपयुक्त नहीं है। इसी वजह से अमित शाह के हेलीकॉप्टर को लैंडिग की अनुमति दे पाना संभव नहीं है।

ग्राउंड रिपोर्ट में प्रशासनिक दलील का पर्दाफ़ाश

प्रशासन द्वारा हेलीकॉप्टर की लैंडिंग में खतरा बताने के बाद एक अंग्रेजी टीवी चैनल ने मौके का मुआयना किया तो प्रशासन की सारी पोल खुल गई। हेलीपैड क्षेत्र और रनवे के पास निर्माण सामग्री का नामो-निशान तक नहीं मिला। वहीं हवाई अड्डे पर काम करने वाले स्थानीय कर्मचारियों की मानें तो हेलीकॉप्टर नियमित रूप से हवाई अड्डे से बाहर चल रहे हैं।

हवाई अड्डे के आस-पास काम करने वाली दीपाली दास कहती हैं, “मंत्री और यात्री हेलीकॉप्टर से यहाँ आते हैं। पहले यहाँ सेवा बाधित थी लेकिन अब यहाँ ऐसा कुछ नहीं है। यहाँ ममता बनर्जी और मिथुन चक्रवर्ती के पास हेलीकॉप्टर है और वो लोग यहाँ उतरते रहे हैं।”

मालदा से बीजेपी नेता संजय शर्मा ने कहा कि पार्टी ने इस संबध में प्रशासन से बात की है। उन्होंने कहा, “टीएमसी इस बात को लेकर घबराई हुई है कि अगर अमित शाह मालदा की इस रैली में आएँगे, तो बीजेपी को अधिक समर्थन मिलेगा।” उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में कोई लोकतंत्र नहीं है, सरकार इस हवाई अड्डे का उपयोग कर रही है, लेकिन हमने जब अनुमति माँगी तो नियम बदल गए।

नागरिकता बिल: क़रीब 31,000 अप्रवासियों को मिलेगा दीर्घकालिक वीज़ा

भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान के अल्पसंख्यक समुदायों के क़रीब 31,000 अप्रवासियों को उनके ‘धार्मिक उत्पीड़न’ के आधार पर दीर्घकालिक वीज़ा दिए जाने की स्वीकृति मिल गई है। इसके अलावा जिन लोगों ने भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया है, उन्हें नागरिकता अधिनियम के प्रस्तावित संशोधनों के अनुसार तत्काल प्रभाव से जल्द वीज़ा दिया जाएगा।

पहले यह माना जा रहा था कि यह बिल केवल असम में रहने वाले बांग्लादेशी अप्रवासियों को ही नागरिकता प्रदान करेगा, जबकि ऐसा नहीं है। बता दें कि साल 2011 से 08 जनवरी, 2019 तक 187 से अधिक बांग्लादेशियों को दीर्घकालिक वीज़ा नहीं दिया गया था।

2011 से 8 जनवरी 2019 के बीच 34, 817 अप्रवासियों को वीज़ा जारी किए गए थे। इसमें अधिकांश लाभार्थी पाकिस्तानी अप्रवासियों के होने की संभावना है। नागरिकता संशोधन विधेयक पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की रिपोर्ट के अनुसार कुल 31,313 अप्रवासियों में से पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश के 25,447 हिंदू, 5807 सिख, 55 ईसाई, 2 बौद्ध और 2 पारसी समुदायों के लोग दीर्घकालिक वीज़ा पर रह रहे थे। जबकि 15,107 पाकिस्तानी दीर्घकालिक वीज़ा धारक राजस्थान में रह रहे हैं, 1,560 गुजरात में, 1,444 मध्य प्रदेश में, 599 महाराष्ट्र में, 581 दिल्ली में, 342 छत्तीसगढ़ और 101 उत्तर प्रदेश में हैं।

7 जनवरी 2019 को संसद के दोनों सदनों में रखी गई जेपीसी रिपोर्ट के अनुसार, इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) ने समिति के समक्ष अपने बयान में कहा था कि तीनों देशों के 31,313 अल्पसंख्यकों ने ‘धार्मिक उत्पीड़न’ के दावों के आधार पर दीर्घकालिक वीज़ा प्रदान किया है। इसके अलावा जिन्होंने भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए आवेदन किया है, उन्हें नागरिकता अधिनियम में प्रस्तावित परिवर्तनों को अमल में लाते हुए जल्द वीज़ा उपलब्ध कराया जाएगा। आईबी के निदेशक ने पैनल को बताया कि भविष्य में किसी भी ‘धार्मिक उत्पीड़न’ के दावे पर रॉ (RAW) के माध्यम से खोजबीन की जाएगी और उसके बाद ही भारतीय नागरिकता प्रदान करने पर विचार किया जाएगा।

विदेश में रहकर चुकाया देश का कर्ज़, अब घर बैठे कर सकेंगे श्री काशी विश्वनाथ के दर्शन

वाराणसी का एक लड़का जो कुछ समय पहले मिशिगन में जाकर बस गया था। उसने एक ऐसी ऐप को बनाया है जिससे लोग काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन अपने घर में बैठे ही कर पाएंगे।

हमारा भारतीय समाज अपने धर्म और संस्कारों की वज़ह से पूरे विश्व भर में जाना जाता है। लेकिन, आज के समय में कुछ भारतीय ऐसे भी है जो बेहतर भविष्य की कल्पना करते हुए विदेश पहुँचकर भारत को भुला देते हैं। ऐसे लोगों के लिए रुपेश श्रीवास्तव नाम के ये व्यक्ति एक प्रेरणा की तरह हैं।

हाल ही में रुपेश ने एक ऐसी ऐप को बनाया किया है, जिससे काशी विश्वनाथ मंदिर को देखने की इच्छा रखने वाले कई श्रद्धालु घर बैठे ही पूरे मंदिर के दर्शन कर पाएँगे। इस ऐप का इस्तेमाल करने के लिए आपको सिर्फ इस ऐप को डाउनलोड करना है और थ्री डी चश्मे की मदद से इसका आनंद उठाना शुरू कर देना है।

एक तरफ जहाँ काशी विश्वनाथ में होने वाली आरती, पूजा-पाठ के दर्शन करने के लिए लोगों की लंबी लाइन लगती हैं, वहीं इस ऐप की मदद से लोग आसानी से लाइव पूजा आरती को सुन और देख पाएँगे।

वर्चुअल स्पेस द्वारा मिलने वाले इस मंदिर के दर्शन को योगी आदित्यनाथ ने प्रवासी भारतीय दिवस के दिन सोमवार (21 जनवरी, 2019) को लांच किया है। बता दें कि कुम्भ में इसकी प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी।

मिशिगन में यंगसॉफ्ट इंक (Youngsoft Inc) के सीईओ रुपेश श्रीवास्तव ने इस ऐप को बनाया है। श्रीवास्तव इस मुकाम पर पहुँचने के बाद कहते हैं कि लगभग 25 साल पहले वो बतौर टाटा स्टील के कर्मचारी बनकर यूएस की तरफ मुड़ गए थे और अब वो वतन को कुछ देना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने इस ऐप का निर्माण किया है, ताकि वो अपने देश को कुछ लौटा सकें।

व्यापम घोटाला: पूर्व BJP नेता सहित 8 को CBI की क्लीन-चिट

CBI ने परिवहन आरक्षक भर्ती घोटाला मामले में 26 आरोपितों के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दाख़िल कर दिया है। जाँच एजेंसी ने इस मामले में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार में शिक्षा मंत्री रहे लक्ष्मीकांत शर्मा और 7 अन्य को क्लीन-चिट दे दी है। 2014 में इस स्कैम के सामने आने के बाद स्पेशल टास्क फ़ोर्स ने शर्मा को गिरफ़्तार भी किया था। घोटाले में नाम आने के बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया था।

CBI ने जो आरोप-पत्र तैयार किया है, उसमें लक्ष्मीकांत शर्मा के अलावा उनके ओएसडी रहे ओमप्रकाश शुक्ला, आईजी स्टाम्प इंद्रजीत कुमार जैन, तरंग शर्मा, भरत मिश्रा, मोहन सिंह ठाकुर, सुरेंद्र कुमार पटेल और संतोष सिंह उर्फ राजा तोमर को क्लीन-चिट दी गई है। विशेष न्यायाधीश सुरेश सिंह की अदालत में पेश किए गए चार्जशीट में CBI ने आरोपितों के ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत न मिलने क्लीन-चिट देने की वजह बताई।

बता दें कि 2012 में मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मण्डल (MPPEB) द्वारा आयोजित परीक्षाओं में घोटाले की बात सामने आई थी, जिसके बाद इसकी जाँच CBI को सौंप दी गई थी। इस परीक्षा में 56,000 से भी अधिक छात्र शामिल हुए थे। इस घोटाले के सामने आने के बाद इसका नाम प्रोफेशनल एग्ज़ामिनेशन बोर्ड (Professional Examination Board) रख दिया गया था।

सीबीआई द्वारा जिन 26 आरोपितों के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दायर की गई है, उन पर जालसाजी, आपराधिक षड्यंत्र, भ्रष्टाचार निरोधक कानून, आईटी कानून और अन्य सम्बद्ध धाराएँ लगाई गई हैं। मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल को शॉर्ट में व्यापम के नाम से जाना जाता है।

आरोप-पत्र में उन लोगों के नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने उम्मीदवारों और व्यापम अधिकारियों के बीच बिचौलियों की भूमिका निभाई थी। इनके अलावा ऐसे कई नाम शामिल हैं, जो वास्तविक उम्मीदवारों के बदले फ़र्जी उम्मीदवार बन कर परीक्षा में शामिल हुए थे। व्यापम के पूर्व प्रमुख अधिकारी रहे पंकज त्रिवेदी सहित मण्डल के कई बड़े नाम भी इसमें शामिल हैं।

CBI द्वारा चार्जशीट दायर करने के साथ ही अब पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को अदालत से बरी करने की बस औपचारिकता बाकी रह गई है।

प्रोग्रेसिव कामरेडों की वैज्ञानिक सोच का सच

उनका प्रिय सवाल आपने न सुना हो, ऐसा तो नहीं हो सकता! चाहे आप किसी भी क्षेत्र में प्रगति की बातें कर लें, ये नारेबाज गिरोह का प्रिय सवाल आएगा ही। आप मंगलयान कहेंगे तो वो पूछेंगे, इससे ग़रीब को रोटी मिलेगी क्या? आप शिक्षा के क्षेत्र में नए विषयों को जोड़े जाने की बात करें तो वो पूछेंगे, इससे ग़रीब को रोटी मिलेगी क्या? आप बुलेट ट्रेन कहें, सड़कों का निर्माण कहें, उत्तर-पूर्व में कोई पुल बनने की बात करें, कुछ भी कह लें वो हर बार पूछेंगे, इससे ग़रीब को रोटी मिलेगी क्या? उनके आपसी झगड़े भी देखेंगे तो वो सरकार के किसी फ़ैसले के समर्थन में एक भी शब्द कह बैठे अपने ही साथी को फ़ौरन ‘टुकड़ाखोर’ बुलाना शुरू कर देते हैं।

ऐसे में जब नारेबाज गिरोहों की ‘वैज्ञानिक सोच’ की बात होगी तो ज़ाहिर है कि रोटी जहाँ से आती है, उस कृषि पर ही चर्चा होगी। भारत तो वैसे भी कृषि प्रधान देश माना जाता है, इसलिए भी कृषि पर हुए ‘वैज्ञानिक शोध’ की चर्चा होनी चाहिए। हमारा ये किस्सा हमें पिछली शताब्दी के शुरुआत के दौर में आज से करीब सौ साल पहले ले जाता है। ये दौर रूस में कम्युनिस्ट शासन का ‘लाल काल’ कहा जा सकता है। इस काल में, स्टालिन के नेतृत्व में, कम्युनिस्ट शासन (शोषण) के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले हज़ारों लोग गुलाग (नाज़ी कंसंट्रेशन कैंप जैसी जेलों) में फिंकवा दिए गए। मारे गए लोगों की गिनती भी लाखों में की जाती है।

इसी दौर में एक अज्ञात से तथाकथित कृषि वैज्ञानिक हुए जिनका नाम था ट्रोफिम ल्यिसेंको (Trofim Lysenko)। इन्होंने 1928 में गेहूँ उपजाने की एक नई विधि ढूँढने का दावा किया। उनका कहना था कि इस विधि से खेती करने पर उपज तीन से चार गुना तक बढ़ाई जा सकती है। इस विधि में कम तापमान और अधिक आर्द्रता वाले माहौल में गेहूँ उपजाना था। खेती से थोड़ा बहुत भी वास्ता रखने वाले जानते हैं कि नवम्बर में जब गेहूँ बोया जाता है, तब जाड़ा आना शुरू ही होता है। मार्च के अंत में इसकी फसल काटने तक, ठण्ड और आर्द्रता वाला मौसम ही होता है। ल्यिसेंको का दावा था कि ठण्ड और आर्द्रता के एक ख़ास अनुपात से पैदावार कई गुना बढ़ेगी।

ऐसे दावे करते वक्त उन्होंने विज्ञान और अनुवांशिकता सम्बन्धी जो नियम बीजों और खेती पर लागू होते, उन्हें ताक पर रख दिया। इस अनूठी सोच के विरोधियों को उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा (अगर इस नाम की कोई चीज़ होती हो तो) का शत्रु घोषित करना शुरू कर दिया। अपने विरोधियों की तुलना वो साझा खेती का विरोध कर रहे किसानों से भी करने लगे। सन् 1930 के दौर में रूस खेती के नियमों को जबरन बदलने की कोशिशों के कारण खाद्य संकट के दौर से गुजर रहा था। सन् 1935 में जब ल्यिसेंको ने अपने तरीके के विरोधियों को मार्क्सवाद का विरोधी बताया तो स्टालिन भी वो भाषण सुन रहे थे। भाषण ख़त्म होते ही स्टालिन उठ खड़े हुए तो ‘वाह कॉमरेड वाह’ कहते ताली बजाने लगे।

इसके बाद तो ल्यिसेंको के तरीकों पर सवाल उठाना जैसे कुफ्र हो गया! वैसे तो ‘वैज्ञानिक सोच’ का मतलब सवालों को सुनना और विरोधी तर्कों को परखना होता है, लेकिन वैसा कुछ गिरोहों की “वैज्ञानिक सोच” में नहीं होता। लेनिन अकैडमी ऑफ़ एग्रीकल्चरल साइंसेज ने 7 अगस्त 1948 को घोषणा कर दी कि ‘ल्यिसेंकोइज्म’ को ही ‘इकलौते सही तरीके’ के तौर पर पढ़ाया जाएगा। बाकी सभी सिद्धांतों को बुर्जुआ वर्ग का और फासीवादी विचारों का कहते हुए हटा दिया गया। 1934 से 1940 के बीच कई वैज्ञानिकों को स्टालिन की सहमति से, ल्यिसेंकोइज्म का विरोधी होने के कारण मरवा दिया गया, या जेलों में फेंक दिया गया।

निकोलाई वाविलोव को 1940 में गिरफ़्तार किया गया था और कम्युनिस्ट कंसंट्रेशन कैंप में ही उनकी 1943 में मौत हो गई। गिरफ़्तार किए गए या कंसंट्रेशन कैंप में डालकर मरवा दिए गए वैज्ञानिकों में आइजेक अगोल, सोलोमन लेविट भी थे। हरमन जोसफ मुलर को अनुवांशिकता (जेनेटिक्स) पर बातचीत जारी रखने के कारण भागना पड़ा और वो स्पेन के रास्ते अमेरिका चले गए। 1948 में ही अनुवांशिकता (जेनेटिक्स) को रूस ने सरकारी तौर पर बुर्जुआ वर्ग की (फासीवादी) सोच घोषित करते हुए, ‘फ़र्ज़ी विज्ञान’ (सूडो-साइंस) घोषित कर दिया। जो भी अनुवांशिकता पर शोध कर रहे वैज्ञानिक थे, उन्हें नौकरियों से निकाल दिया गया।

इस पूरे प्रकरण में 3000 से ज्यादा वैज्ञानिकों को गिरफ़्तार किया या मार डाला गया था। उनकी नौकरियाँ छीन ली गईं और कइयों को देश से भागने पर मजबूर होना पड़ा। कहने की ज़रूरत नहीं है कि कृषि की दुर्दशा ऐसे फ़र्ज़ी विज्ञान से पूरे ल्यिनकोइज्म के दौर में जारी रही। ये सब 1953 में स्टालिन की मौत होने तक जारी रहा था। बाकी और दूसरी चीज़ों की तरह ही ‘वैज्ञानिक सोच’ के मामले में भी होता है। ‘कॉमरेड की वैज्ञानिक सोच’ का हाल काफी कुछ भस्मासुर से छू देने जैसा है। जिस चीज़ को वो छू दें, उसका समूल नाश होना तय ही है।

आज़म ख़ान ममता के महागठबंधन से नाख़ुश, कहा मुस्लिम प्रतिनिधित्व नदारद

शनिवार (19, जनवरी 2019) को कोलकाता में ममता की अगुवाई पर आयोजित महागठबंधन की रैली पर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान ने तंज कसा है। आज़म ख़ान ने सवालिया होते हुए कहा कि यह मुस्लिम हित का प्रतिविधित्व करने में विफल है। रविवार को आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से मुख़ातिब होते हुए उन्होंने कहा कि विपक्ष ने स्वार्थी होकर सिर्फ़ कुछ राजनीतिक मुद्दों को ही सामने रखा जबकि उनके मुद्दों में राष्ट्रीय हित नदारद रहा।

मेगा रैली में अपेक्षित मुस्लिम प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति के लिए महागठबंधन पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, “दूसरी सबसे बड़ी आबादी या मुस्लिम अल्पसंख्यक का प्रतिनिधित्व केवल नाम मात्र का था। कश्मीर से केवल एक नेता और असम से दूसरे नेता ने रैली में भाग लिया। मुस्लिम अपने प्रतिनिधित्व को लेकर चिंतित हैं।”

इसके अलावा उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कोलकाता में जो मेगा रैली आयोजित हुई उसमें राष्ट्रहित के लिए सभी को एक साथ शामिल होना चाहिए था। महागठबंधन बनाने वाले राजनीतिक दलों ने रैली के मंच से कई राजनीतिक मुद्दों को उठाया। इस बात पर भी चर्चा की गई कि राष्ट्र कहाँ जा रहा है, लेकिन दुर्भाग्य इस बात है कि इसका नेतृत्व करने वाला अब तक कोई तय नहीं हो सका।

आज़म ख़ान इतने पर ही नहीं रुके और रैली में शामिल नेताओं की सूची का भी ज़िक्र किया, जिसमें एनसीपी प्रमुख शरद पवार, पूर्व एचडी देवगौड़ा, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, आंध्र प्रदेश, दिल्ली और कर्नाटक के सीएम के एन चंद्रबाबू नायडू, अरविंद केजरीवाल, एचडी कुमारस्वामी, पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला सहित राजद नेता तेजस्वी यादव और द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) एमके स्टालिन, विपक्षी मेगा रैली में हिस्सा लिया। इन सभी नेताओं का एक मंच पर आने का मक़सद केवल वर्तमान सरकार के ख़िलाफ़ अपनी एकजुटता को प्रदर्थित करना था।

हालाँकि, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और यूपीए प्रमुख सोनिया गाँधी के साथ-साथ बीएसपी सुप्रीमो मायावती सहित तीन राजनीतिक दिग्गज़ों ने इस कार्यक्रम को नाक़ाम कर दिया और मेगा रैली में एकता की ताक़त को विफल कर दिया। अक्सर वे इस समारोह में शामिल होने के लिए अपनी पार्टी के प्रतिनिधियों को ही भेजते हैं।

6 लाख रोज़गार, ₹1.2 लाख करोड़ का राजस्व: कुम्भ मेले से यूपी सरकार को ऐसे होगा फ़ायदा

प्रयागराज में कुंभ का मेला इस समय लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। ऐसा लगता है मानो प्रयागराज में कुंभ नहीं बल्कि कुंभ में प्रयागराज बस गया है। कुम्भ की लोकप्रियता का आलम ये है कि अलग-अलग देशों से विदेशी पर्यटक भी इसमें बड़ी तादाद में आ रहे हैं। इस वजह से प्रयागराज में लगने वाला कुम्भ वैश्विक स्तर पर मनाया जाने वाला त्यौहार कहा जा रहा है।

कुम्भ मेले की शुरुआत इस साल 15 जनवरी से हुई। लगातार सात हफ्तों तक चलने वाला यह मेला 4 मार्च को खत्म होगा। एक तरफ जहाँ कुम्भ मेले से पूरे देश में धार्मिक और आध्यात्मिक माहौल है, वहीं सीआईआई की रिपोर्ट के अनुसार इससे उत्तर प्रदेश में न केवल 6 लाख से अधिक रोज़गार के रास्ते खुलेंगे बल्कि राज्य सरकार को 1.2 लाख करोड़ रुपए का राजस्व भी प्राप्त होगा।

50 दिन तक चलने वाले इस कुम्भ मेले के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने ₹4200 करोड़ आवंटित किए थे, जो 2013 में हुए कुम्भ के बजट से तिगुना है। बता दें कि साल 2019 के कुम्भ के दौरान आतिथ्य क्षेत्र (हॉस्पिटेलिटी सेक्टर) से 2,50,000 लोगों को रोज़गार प्रदान करने का उद्देश्य है। जबकि एयरलाइन और हवाई अड्डों पर 1,50,000 और 45,000 टूर ऑपरेटरों को रोजगार देना है। सीआईआई के एक अध्ययन के अनुसार, इको टूरिज्म और मेडिकल टूरिज्म में भी रोजगार की संख्या 85,000 तक आंकी जा रही है।

इसके अलावा असंगठित क्षेत्र में भी कुम्भ से फर्क पड़ेगा। यहाँ लगभग 55,000 नई नौकरियाँ पैदा होंगी। इन नौकरियों में टूर गाइड, टैक्सी ड्राइवर, दुभाषिए, स्वयंसेवक आदि शामिल हैं। इन सबकी वजह से सरकारी एजेंसियों और व्यापारियों के काम के साथ-साथ आय में भी वृद्धि होगी।

एक तरफ जहाँ यह उम्मीद की जा रही है कि उत्तर प्रदेश को इस मेले की वजह से 1.2 लाख करोड़ रुपए का फायदा होगा, वहीं पड़ोसी राज्यों (राजस्थान, उत्तराखंड,पंजाब और हिमाचल प्रदेश) के राजस्व में भी इससे बढ़ोतरी होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि कुम्भ तक आने के बाद लाखों की तादाद में पर्यटक आस-पास के राज्यों में भी घूमने जाते हैं। कुम्भ की वजह से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देश के कई व्यापारों में भी बढ़ोतरी होगी और साथ ही देश की अर्थव्यवस्था पर भी इससे फर्क पड़ेगा।

कुम्भ पर बात करते हुए उत्तर प्रदेश के वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल का कहना है कि पिछली सरकार ने 2013 में हुए कुम्भ पर 1,300 करोड़ रुपए खर्च किए थे, जबकि 2019 में इस मेले के लिए 4,200 करोड़ रुपए आवंटित किया गया। उन्होंने बताया कि पिछली बार के मुकाबले इस बार कुम्भ के लिए पहले से दोगुनी जगह तय की गई। 2013 में जहाँ 1,600 हेक्टेयर्स में कुम्भ लगा था, वहीं 2019 में यह 3,200 हेक्टेयर में लगाया गया है।

उम्मीद की जा रही है कि 4 मार्च तक लगभग 12 करोड़ लोग इस मेले में अपनी उपस्थिति को दर्ज़ करा सकते हैं। कुम्भ का यह मेला न केवल भारत में ही इतनी प्रसिद्धि पा रहा है बल्की अपनी संस्कृति और सभ्यता की वज़ह से यह विश्व भर में लोकप्रिय होता जा रहा है।

जेल में महारानी की ज़िंदगी जी रही थी शशिकला

अन्नाद्रमुक (AIADMK) से निष्कासित नेता शशिकला जेल में पूरी ठाठ-बाट की ज़िन्दगी जी रही थी। ख़बरों के अनुसार उन्हें जेल में स्पेशल ट्रीटमेंट दी जा रही थी। कभी तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता की क़रीबी रही शशिकला अभी भ्रष्टाचार के आरोप में जेल की सज़ा काट रही है। RTI से इस बात का ख़ुलासा हुआ है कि शशिकला को जेल में वो सारी सुविधाएँ मिल रही थी जो उन्हें उनके निजी बंगले पर मिलती।

बेंगलुरु जेल में बंद शशिकला जेल का खाना तक नहीं खाती। ख़ुलासे के मुताबिक़ उनके लिए जेल में अलग से एक रसोइये की व्यवस्था की गई थी जो उनके खाने का सारा इंतज़ाम करता था। इतना ही नहीं, सज़ायाफ़्ता शशिकला की कई बड़े अधिकारियों से मिलीभगत है, जिस कारण प्रशासन के अंदर का कोई व्यक्ति इन गड़बड़ियों के ख़िलाफ़ बोलने का साहस नहीं जुटा पाता।

जुलाई 2017 में कर्नाटक की IPS अधिकारी डी रूपा ने तत्कालीन पुलिस महानिदेशक को एक रिपोर्ट सौंपी थी जिसमे शशिकला को जेल में ख़ास ट्रीटमेंट मिलने की बात बताई गई थी। इस रिपोर्ट से प्रशासनिक गलियारों में खलबली मच गई थी क्योंकि इसमें कहा गया था कि ख़ुद को मिलने वाली सुविधाओं के बदले शशिकला ने जेल अधिकारीयों को ₹2 करोड़ की रिश्वत खिलाई है। इसके बाद रूपा के आरोपों को सरकारी महक़मे ने ख़ारिज़ कर दिया था और उनका तबादला ट्रैफ़िक विभाग में कर दिया गया था।

सरकार ने रूपा के ख़ुलासों की जाँच का ज़िम्मा रिटायर्ड IAS अधिकारी विनय कुमार को सौंपी थी। पता चला है कि शशिकला के अलावे जेल में बंद उनके अन्य सहयोगियों को भी रहने के लिए अलग कमरे दिए गए थे। सीएनएन न्यूज़ 18 के पास मौज़ूद जाँच कॉपी में लिखा गया है:

“15 जुलाई 2017 को जब उस वक्त की डीआईजी जेल पहुँची तो उन्होंने देखा कि शशिकला और उसके साथी इलावरसी के लिए जेल के एक हिस्से को घेर दिया गया था। जेल की पाँच सेल पर इन दोनों का कब्ज़ा था और इनके सारे सामान चारों तरफ बिखरे पड़े थे।”

जेल में शशिकला के लिए अलग बर्तनों तक की भी व्यवस्था की गई थी। विनय कुमार की जाँच रिपोर्ट के अनुसार शशिकला से मिलने आने-जाने वाले लोगो के लिए कोई मनाही नहीं थी। नियमानुसार एक सज़ायाफ़्ता कैदी को महीने में दो बार ही किसी बाहरी व्यक्ति से मिलने की इजाज़त दी जा सकती है लेकिन शशिकला के मामले में इस नियम को ताक पर रख दिया गया। नियमतः मुलाक़ात की अवधि भी 45 मिनट से ज्यादा नहीं होनी चाहिए लेकिन शशिकला ने लोगों से 4 घंटे तक मुलाक़ात की।

RTI कार्यकर्ता नरसिम्हा मूर्ति ने कहा कि वो चाहते हैं कि सरकार दोषियों के ख़िलाफ़ जल्द से जल्द कारवाई करे। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद IPS अधिकारी डी रूपा ने भी खुशी जताई है। उन्होंने कहा कि अगर जेल में किसी को VIP ट्रीटमेंट मिलता है तो इस से अन्य कैदियों में गलत सन्देश जाता है। इस से उनके अंदर ये भावना आ जाती है है कि पैसे से सबकुछ ख़रीदा जा सकता है और सिस्टम को अपने हिसाब से नचाया जा सकता है।

बता दें कि शशिकला पिछले दो वर्षों से जेल में है। जयललिता की मृत्यु के बाद पार्टी पर उन्होंने पकड़ बनानी शुरु ही किया था तब तक उनके ख़िलाफ़ अदालत का फ़ैसला आ गया था। इसके बाद AIADMK में गुटबाज़ी का दौर शुरू हो गया था और तमिलनाडु की राजनीति उथलपुथल के दौर से गुज़र रही थी। शशिकला पर अदालत ने ₹10 करोड़ का जुर्माना भी लगाया था।

सबसे साफ़ और सबसे गंदे ट्रेनों की लिस्ट आ गई, रिजर्वेशन से पहले जान लें अपने ट्रेन की हालत

देश में एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए किसी भी व्यक्ति के ज़ेहन में यातायात साधनों में सबसे पहले रेल का ही नाम आता है। नौकरी-पलायन-रोजगार या फिर सैर-सपाटा… आज रेल हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। आज के समय में लाखों लोग दिन-प्रतिदिन इसमें सफर करते हैं। ऐसे में जरूरी है कि देश की स्वच्छता के साथ-साथ रेलवे की स्वच्छता पर भी बराबर ध्यान दिया जाए।

इसी कड़ी में साल 2018 के लिए ट्रेन क्लीनलीनेस सर्वे में 210 ट्रेनों की जाँच-पड़ताल की गई। इस सर्वे में बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। सर्वेक्षण के मुताबिक एक तरफ जहाँ शताब्दी देश की सबसे साफ ट्रेन है, वहीं पर दुरंतो को सफाई के मामले में सबसे गंदी ट्रेन का दर्ज़ा मिला है।

रेलवे की सफाई का यह सर्वेक्षण दो मानदंडो पर किया गया- पहला शौचालय की सफाई के आधार पर और दूसरा कोच की पर्याप्त सफाई के आधार पर। इन मानदंडों पर खरी उतरती हुई पुणे-सिकंदराबाद तथा हावड़ा-राँची शताब्दी के साथ-साथ तीन अन्य शताब्दी ट्रेनें स्वच्छता के मामले में सबसे ऊपर रहीं।

राजधानी ट्रेनों का भी सर्वे किया गया। 23 राजधानी ट्रेनों में से एक तरफ जहाँ मुंबई-नई दिल्ली राजधानी सबसे स्वच्छ दिखी, वहीं दिल्ली-डिब्रूगढ़ राजधानी को सबसे ज्यादा गंदी राजधानी का ‘तमगा’ दिया गया।

इन 210 ट्रेनों के बीच किए गए सर्वेक्षण में ट्रेनों को दो सूची में विभाजित किया गया- एक प्रीमियम और दूसरी नॉन प्रीमियम। सर्वेक्षण में 15,000 यात्रियों ने रेटिंग दी। हालाँकि अभी इस सर्वेक्षण के नतीज़े पूर्ण रूप से सामने नहीं आए हैं। आपको बता दें कि स्वच्छता मानदंडो पर रेलवे स्टेशनों की रैंकिंग को भी सार्वजनिक किया जा चुका है।

सर्वेक्षण में यात्रियों ने शौचालय की सफाई, बेड रोल्स की सफाई, पेस्ट मैनेजमेंट की प्रभावशीलता, हाउसकीपिंग स्टाफ के काम और डस्टबिन की उपलब्धता के आधार पर ज़ीरो से पांच तक के अंक दिए।

ट्रेन में शौचायल की सफाई पर बात करते हुए रेलवे के एक अधिकारी ने इस बात को स्वीकारा कि रेलवे में शौचायल की स्वच्छता को बनाए रख पाना वाकई बहुत कठिन काम है। उनके अनुसार एक शौचालय दिनभर में लगभग 60 बार इस्तेमाल किया जाता है।

आपको बता दें कि रेलवे की एन्वायरन्मेंट एंड हाउसकीपिंग मैनेजमेंट शाखा द्वारा स्वच्छता की जाँच करने का यह पहला सर्वेक्षण है।

7000 km नई सड़कें, 120 km/h की रफ़्तार: जानें क्या है भारतमाला 2.0

हाईवे विकास की अगली योजनाओं का सारा का सारा फोकस अब एक्सप्रेसवेज बनाने में होने वाला है ताकि वाहन बिना किसी बाधा के फ़र्राटे भर सके। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार 2024 तक सरकार 3000 किलोमीटर नए एक्सप्रेसवे बना कर तैयार कर लेगी। इतना ही नहीं, देश के कुछ प्रमुख शहरों के बीच 4000 किलोमीटर नए ग्रीनफ़ील्ड हाईवे भी बनाए जाएँगे। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने इसके लिए तैयारियाँ शुरू कर दी हैं।

3000 किलोमीटर के नए एक्सप्रेसवे वाराणसी-राँची-कोलकाता, इंदौर-मुंबई, बेंगलुरु-पुणे और चेन्नई-त्रिची सहित कई शहरों को जोड़ने का काम करेगी। इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए सड़क एवं परिवहन मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया:

“भारतमाला के पहले चरण के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने में हमें लगभग दो साल लग गए थे। इससे अगली बहुत सी परियोजनाओं के लिए डीपीआर तैयार करने से समय की बचत होगी और तेजी से निष्पादन के लिए उच्च गुणवत्ता वाली विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।”

बता दें कि डीपीआर में देरी के कारण सरकार को पहले भी कई बार परियोजनाओं में देरी का सामना करना पड़ा है। इसीलिए, इस बार सरकार इस मामले में सख्त है और अधिकारीगण इसे तय समय सीमा के भीतर पूरा करने में लगे हुए हैं। सरकार ने इस बार पहले से ही कंपनियों को डीपीआर बनाने के लिए आमंत्रित करना शुरू कर दिया है।

ग्रीनफ़ील्ड हाईवे के तहत पटना-राउरकेला, झांसी-रायपुर, सोलापुर-बेलगाम, गोरखपुर-बरेली और वाराणसी-गोरखपुर के बीच हाइवेज बनाए जाएँगे। अभी मौज़ूदा सड़क कॉरिडोर को बढ़ाने के बजाय सरकार ग्रीनफ़ील्ड हाइवेज पर इसीलिए ध्यान दे रही है ताकि जमीन अधिग्रहण में देरी न हो। इस में सरकार को लागत भी कम आएगी, क्योंकि जमीन ख़रीदने के लिए अधिक क़ीमत नहीं देनी पड़ेगी। साथ ही, अतिक्रमण से भी बचा जा सकेगा।

सरकारी सूत्रों के अनुसार इन सभी परियोजनाओं को 2024 तक पूरा कर लिया जाएगा। अभी हाल ही में केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी को पत्र लिख कर सूचित किया था कि राजधानी की कुछ सड़कों को भी भारतमाला के तहत विकसित किया जाएगा। इस से दिल्ली में लगातार बढ़ रही ट्रैफ़िक समस्या से निज़ात मिलने की उम्मीद है। ये सड़कें 6 लेन की होंगी।

इसके अलावा सरकार ने इस बार इस बात का भी ध्यान रखा है कि नई सड़क परियोजनाएँ नेशनल पार्क, बर्ड-सैंक्चुरी इत्यादि के आसपास न हो ताकि वन विभाग, पर्यावरण विभाग इत्यादि से क्लीयरेंस लेने की नौबत ही न आए। अक्सर ऐसा देखा गया है कि इस प्रकार की क्लीयरेंस के चक्कर में फ़ाइलें इस विभाग से उस विभाग तक घूमती रहती हैं और परियोजनाओं में देरी का कारण बनती हैं।