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जन्म लेते ही कुछ के लिए भारत रत्न तय क्यों हो जाता था: असम में PM मोदी का कॉन्ग्रेस पर तंज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्वोत्तर राज्यों के दो दिवसीय दौरे पर हैं। पीएम ने असम के गोवाहाटी में उत्तर-पूर्व के लिए ₹18,000 करोड़ की लागत से शुरू होने वाली ‘न्यू गेटवे ऑफ ग्रोथ’ परियोजना का लोकार्पण किया। प्रधानमंत्री ने इस दौरान अमीनगांव में एक जनसभा को संबोधित भी किया। पीएम ने कहा, “आज नॉर्थ ईस्ट के विकास में नया इतिहास जुड़ रहा है। असम और नॉर्थ ईस्ट के विकास से जुड़े हज़ारों करोड़ के प्रोजेक्ट्स का लोकार्पण, उद्घाटन और शिलान्यास किया गया है।”

‘सच्चे भारत रत्नों को पहचानने का खेल दशकों से चल रहा’

प्रधानमंत्री नोदी ने इस दौरान कहा, “BC और AD यानि बिफोर कॉन्ग्रेस और आफ्टर डायनेस्टी का ही गौरवगान करने वालों से मैं आज यहाँ से पूछना चाहता हूँ कि आखिर आपने भारत के सच्चे रत्नों को न पहचानने का कुटिल खेल दशकों तक क्यों खेला।”

पीएम ने कहा कि आखिर ऐसा क्यों रहा कि कुछ लोगों के लिए जन्म लेते ही उनके लिए भारत रत्न तय हो जाता था और देश के मान-सम्मान के लिए जिन्होंने जीवन लगा दिया उनको सम्मानित करने में दशक लग जाते थे?

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज मुझे गर्व है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार के समय ही असम के दो सपूतों, गोपीनाथ बोरदोलोई और भुपेन हजारिका को भारत रत्न देने का काम किया गया है। पीएम ने कहा कि पूरा देश देख रहा है कि चौकीदार की चौकसी से कैसे भ्रष्टाचारी बौखलाए हुए हैं और सुबह-शाम मोदी-मोदी के नाम की रट लगाए हुए हैं।

‘असम और उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ मेरा विशेष लगाव’

पीएम मोदी ने कहा कि आपका स्नेह और आशीर्वाद मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जितना अधिकार आपका मुझ पर है, उतना ही दायित्व मेरा भी आपके प्रति है। नागरिकता संशोधन का विषय सिर्फ असम या नॉर्थ ईस्ट से जुड़ा नहीं है, बल्कि देश के अनेक हिस्सों में माँ भारती पर आस्था रखने वाली ऐसी संताने हैं, ऐसे लोग हैं जिनको अपनी जान बचाकर भारत आना पड़ा है।

पीएम ने कहा कि चाहे वो पाकिस्तान से आए हों, अफगानिस्तान से आए हों या फिर बांग्लादेश से, ये 1947 से पहले भारत का ही हिस्सा थे, जब आस्था के आधार पर देश का विभाजन हुआ। हमसे अलग हुए देशों में जो अल्पसंख्यक यानि हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध पारसी और ईसाई, वहाँ रह गए थे उनको संरक्षण देना हमारा दायित्व है।

कॉन्ग्रेस का खुल गया पोल, बीच बजरिया फट गया ढोल: राफ़ेल पर BJP ने दी 10 ‘पटकनी’

राफ़ेल सौदे पर कॉन्ग्रेस पार्टी की तरफ से मोदी नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को लगातार घेरने का प्रयास किया जा रहा है। राहुल गाँधी हमेशा से ही नए-नए तरीक़ों का इस्तेमाल करके भाजपा के ख़िलाफ़ टीका-टिप्पणी करते नज़र आते हैं। फिर भले ही कॉन्ग्रेस का हर दावा झूठा ही क्यों न साबित हो जाए।

भाजपा सरकार हर बार कॉन्ग्रेस द्वारा लगाए गए झूठे आरोपों का पर्दाफ़ाश करती आई है। एक बार फिर भाजपा ने अपने ऑफिशियल ट्विटर अकाउंट से राफ़ेल पर कॉन्ग्रेस के झूठे दावों का जवाब दिया।

  • कॉन्ग्रेस का आरोप नंबर 1: राहुल गाँधी ने फ्रांसीसी मीडिया की रिपोर्ट के हवाले से बताने की कोशिश की कि भारत सरकार ने दसॉल्ट कंपनी पर अंबानी को ऑफसेट पार्टनर बनाने के लिए दवाब बनाया।
  • BJP का जवाब: भाजपा ने ट्विट करके कॉन्ग्रेस के इस आरोप का जवाब देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट और दसॉल्ट के सीईओ बता चुके हैं कि ऑफसेट पार्टनर के चयन में भारत सरकार का कोई लेना-देना नहीं था।
  • कॉन्ग्रेस आरोप नंबर 2: राहुल गाँधी ने सुप्रीम कोर्ट के हवाले से देश में अफ़वाह फैलाने की कोशिश की कि डील में गंभीर अनियमितता पाई गई। इस तरह कॉन्ग्रेस ने इस मामले में प्रोपेगेंडा फैलाने की भी कोशिश की।
  • BJP का जवाब: भाजपा ने कॉन्ग्रेस की इस अफ़वाह का जवाब में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कॉन्ग्रेस के कहने पर कोर्ट में अपील करने वालों की याचिकाएँ ख़ारिज करते हुए कहा था कि भारत सरकार ने कुछ ग़लत नहीं किया है।
  • कॉन्ग्रेस आरोप नंबर 3: राहुल गाँधी ने दावा किया कि रक्षा मंत्रालय के एक बड़े अधिकारी को राफ़ेल डील के विरोध में डिसेंट नोट प्रस्तुत करने के लिए मोदी सरकार ने सज़ा दी।
  • BJP का जवाब: राहुल बेनक़ाब हो गए जब ख़ुद उस अधिकारी ने मीडिया को बताया कि किसी भी तरह की सज़ा उन्हें नहीं दी गई थी।
  • कॉन्ग्रेस आरोप नंबर 4: राहुल ने कहा था कि फ्राँस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद ने पीएम मोदी को चोर कहा, ऐसा इसलिए क्योंकि भारत सरकार ने उनसे रिलायंस कंपनी को डील में शामिल करने के लिए कहा था।
  • BJP का जवाब: भाजपा ने राहुल के इस आरोप पर जवाब देते हुए कहा कि ओलांद ने राहुल और उनकी पार्टी के इन आरोपों को ख़ुद ख़ारिज किया है। यही नहीं ज़रूरत पड़ने पर फ्राँस सरकार ने आधिकारिक बयान जारी करके भी इस मुद्दे पर सफ़ाई दी थी।
  • कॉन्ग्रेस आरोप नंबर 5: राहुल गांधी ने संसद में कहा था कि फ्राँस के राष्ट्रपति मैक्रों ने उनसे स्वयं कहा कि इसमें कोई गोपनीय धारा नहीं है।
  • BJP का जवाब: फ्राँस सरकार ने राहुल के आरोपों का जवाब दिया और कहा कि समझौते में शामिल सभी पार्टियों को इससे जुड़ी किसी तरह की जानकारी साझा करने की इजाज़त नहीं थी।
  • कॉन्ग्रेस आरोप नंबर 6: राहुल गाँधी ने यूपीए सरकार के दौरान राफ़ेल डील की कई क़ीमतें बताईं थी। संसद में राहुल ने ₹520 करोड़ बताया जबकि कर्नाटक में कहा ₹526 करोड़, राजस्थान में ₹540 करोड़ और दिल्ली में इसी डील की क़ीमत ₹700 करोड़ बताई थी।
  • BJP का जवाब: अपने ट्विटर पर भाजपा ने इस आरोप का जवाब देते हुए लिखा कि राहुल को झूठ बोलने के लिए नोबेल पुरस्कार दिया जाना चाहिए।
  • कॉन्ग्रेस आरोप नंबर 7: राहुल गाँधी ने कहा कि मोदी सरकार ने सैन्य अधिग्रहण के नियमों और प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया है।
  • BJP का जवाब: भाजपा ने इस आरोप का जवाब देते हुए कहा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि वास्तव में इस प्रक्रिया पर संदेह करने की कोई वजह नहीं है।
  • कॉन्ग्रेस आरोप नंबर 8: राहुल गाँधी ने कहा कि यूपीए ने ₹526/ ₹520/ ₹540 में डील की, जबकि एनडीए ने यह डील ₹1600 करोड़ में की।
  • BJP का जवाब: वे सेब की तुलना संतरे से कर रहे हैं। एनडीए द्वारा बातचीत के ज़रिए राफ़ेल विमान की तय की गई क़ीमत पूरे परिचालन पैकेज़ के साथ है।
  • कॉन्ग्रेस आरोप नंबर 9: राहुल गाँधी ने कहा कि 36 विमान ख़रीदने का निर्णय वायुसेना को नुक़सान पहुँचाने और दोस्त को फ़ायदा पहुँचाने के लिए किया गया।
  • BJP का जवाब: इस सवाल के जवाब में कहा गया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि यह निर्णय सैन्य तैयारियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया और इससे वायुसेना ख़ुश है।
  • कॉन्ग्रेस आरोप नंबर 10: 8 फ़रवरी को राहुल ने द हिंदू में छपे आधे फोटो और रिपोर्ट को आधार बनाकर प्रधानमंत्री मोदी को बदनाम करने का प्रयास किया।
  • BJP का जवाब: हमें पहले से पता है कि कॉन्ग्रेस, भाजपा सरकार पर आरोप लगाने के लिए फोटोशॉप एडिटेड फोटो की मदद लेते हैं। लेकिन कोई कितना भी झूठ बोले आख़िरकार जीत सत्य की ही होती है।

इस सभी सवालों के जवाब में बीजेपी ने कॉन्ग्रेस की भ्रम फैलाने वाली राजनीति पर विराम लगाया। रक्षा सौदों में कुछ बातें गोपनीय रखना राष्ट्रहित में होता है, लेकिन कॉन्ग्रेस इस राष्ट्रहित को किनारे करके बेवजह ही उलझाने वाली नीति को अपनाती है जो देश के लिए सही नहीं है।

कॉन्ग्रेस में ‘G’ प्रथा को तोड़िए चिदंबरम जी, सबरीमाला-राम मंदिर आपसे न हो पाएगा

लोकसभा चुनाव को अब ज्यादा समय नहीं बाक़ी बचा है। कुछ ही महीनों बाद यह तय हो जाएगा कि सत्ता की कुर्सी पर आने वाले पाँच सालों के लिए जनता किसे चुनेगी। चुनाव चाहे पंचायत का हो या फिर नगर निगम का, हवाओं में ऑक्सीजन से ज्यादा राजनीति अपने आप ही महसूस होने लगती है। और ऐसे में फिर, साल 2019 हो- लोकसभा के चुनाव हों- सत्ता में भाजपा की सरकार हो… तो सोचिए! विपक्षी पार्टियों में कितना हड़कंप होगा। हवा छोड़ दीजिए, खाने-पीने की चीजों तक पर राजनीति होगी। न सरकार के फैसलों को छोड़ा जाएगा और न देश की सेना को।

ऐसे ही थोड़ी बुआ-बबुआ ने सालों पुरानी दुश्मनी को भुलाकर अपने मेल को महागठबंधन का नाम दिया है… ‘राजनीति में कभी न आऊँगी’ कहने वाली प्रियंका ऐसे ही कॉन्ग्रेस की महासचिव थोड़ी बनी हैं… ज़हरीली शराब के मुद्दे पर ऐसे ही अखिलेश योगी सरकार को दोषी थोड़ी बता रहे हैं… ऐसी अनेकों अनेक बातें आपको सिर्फ़ यही बता रही हैं कि चुनाव नज़दीक है और अब कुर्सी की लड़ाई के लिए हर हथकंडा आज़माया जाएगा। अब इन हथकंडों में फिर चाहे राहुल को मशीन से आलू डालकर सोना ही क्यों न निकालना पड़ जाए, वो निकालेंगे और ऐसे करके एक बार फिर वो देश को सोने की चिड़िया जरूर बनाएँगे।

लोकसभा चुनाव नज़दीक हैं लेकिन राजनैतिक दल अपने मेनिफ़ेस्टो पर फ़ोकस करने से ज्यादा बयानबाज़ी करने में व्यस्त हैं। यह बात देश का लगभग हर नागरिक जानता है कि राम जन्मभूमि और सबरीमाला दो ऐसे संवेदनशील मामले हैं जिनसे हिंदू लोगों की धार्मिक भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। एक तरफ जहाँ अयोध्या में भगवान राम को छत दिलाने के लिए लोगों की जद्दोजहद ज़ारी है तो वहीं सबरीमाला में भगवान अयप्पा द्वारा लिए मूल प्रण को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।

ऐसे में लोकतांत्रिक देश की सबसे ‘सेकुलर’ पार्टी के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम का इस मामले पर बयान है कि राम मंदिर विश्वास का मामला है जबकि सबरीमाला ‘प्रथा’ है। चिदंबरम का मानना है कि इन मामलों को एक दूसरे के साथ मिलाना नहीं चाहिए। चिदंबरम ने यह टिप्पणी अपनी किताब ‘अनडॉटेड: सेविंग द आइडिया ऑफ इंडिया’ किताब के विमोचन के दौरान कही है।

पूर्व वित्त मंत्री ने सबरीमाला और राम मंदिर पर पूछे सवालों का जवाब देते हुए कहा, “राम मंदिर प्रथा का मामला नहीं है, यह विश्वास का मामला है, जबकि सबरीमाला एक प्रथा है जो कि आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के ख़िलाफ है।”

चिदंबरम का कहना है कि बीते चार साल देश के लिए त्रासदी से कम नहीं है, हर ओर तानाशाही ही नजर आई है। साथ ही पिछले चार सालों में किसानों के साथ इतना बुरा बर्ताव हुआ है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती है। चिदंबरम ने पूरी बातचीत में अपनी पार्टी को स्पष्ट तौर पर सेकुलर पार्टी बताते हुए कहा कि भाजपा की छवि साफ़ तौर पर मुस्लिम और अल्पसंख्यक विरोधी बनी है।

चिदंबरम जैसे वरिष्ठ नेता का ऐसा बयान वाकई किसी को भी सोचने पर मजबूर करेगा कि क्या वाकई भाजपा के काल में यह सब चल रहा है। क्या वाकई सबरीमाला मात्र एक प्रथा है। ऑपइंडिया पर लिखे आर्टिकल में  स्पष्ट रूप से इस बात का वर्णन है कि सबरीमाला मंदिर कोई प्रथा नहीं हैं बल्कि यह एक विश्वास है, ठीक उसी तरह जैसे हिंदू का विश्वास राम मंदिर में है, मुस्लिम का विश्वास अल्लाह में है और ईसाईयों का विश्वास ईशु में।

सबरीमाला में औरतों के प्रवेश पर जो निषेध है वो सिर्फ इसलिए क्योंकि उस मंदिर में विराजमान अयप्पा भगवान ने ब्रहमचर्य का प्रण लिया था, जिसके कारण उस मंदिर में तय उम्र की महिलाओं का जाना मना है। अब खुद सोचिए, अगर यह विश्वास नहीं है तो फिर क्या है… कल को अगर चिदंबरम राम मंदिर बनने पर ही कहने लगें कि राम तो मात्र एक कल्पना है ऐसे में उनके लिए इतना विवाद सिर्फ़ लोगों की अंधभक्ति को दिखाता है… तो क्या कर लिया जाएगा… शायद कुछ भी नहीं। क्योंकि जिन्हें भावनाओं को बिना जाने-समझे प्रथा का नाम देना है, वो कल को क्या कह दें, कुछ नहीं पता। ख़ास यह है कि ऐसे लोगों को फ़र्क़ भी कुछ नहीं पड़ता कि उनके कहने से कितने लोगों की भावनाएँ आहत होती हैं। अपने अधिकारों पर लड़ने वाले ‘सेकुलर’ लोग भगवान की निजता के अधिकार को ‘प्रथा’ बताकर छीनने की कोशिश कर रहे हैं… कलयुग यही है।

मुझे लगता है कि माननीय पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को अर्थशास्त्र से जुडे़ मुद्दों पर ही सीमित रह जाना चाहिए। उन्हें गौर करना चाहिए कि राहुल की न्यूनतम आय की घोषणा पर उनके द्वारा लगाया अनुमान गलत कैसे हो सकता है, क्योंकि समाजिक मुद्दों पर दिए गए उनके बयान तो किसी भी रूप में संतोषजनक नहीं हैं, ऐसे में वो अर्थशास्त्र पर ही फोकस करें।

‘विश्वास और आस्था’ को ‘प्रथा’ का नाम देने वाले चिदंबरम जी को पहले इन शब्दों में फर्क समझने की अति आवश्यकता है। प्रथा वो है, जिसमें कॉन्ग्रेस पार्टी की विचारधारा लीन है। ‘परिवारवाद’ है प्रथा चिदंबरम जी… और अगर ये प्रथा नहीं है तो ‘राहुल गाँधी’ ही क्यों कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष हैं… आप बन जाइए! आँकड़ों पर तो आप ‘गल्त’ हो ही चुके हैं अब सामाजिक मुद्दों पर भी बोलने लगे हैं, हद है। और इतनी उम्मीद तो हमें आप से है ही कि आप आज़ादी से पहले अस्तित्व में आई कॉन्ग्रेस पार्टी की साख़ यह कहकर तो बिलकुल धूमिल नहीं करेंगे कि हम एक तरफ से आलू डालेंगे तो वो दूसरी तरफ से सोना आएगा… उसके लिए राहुल गाँधी ही ‘परफ़ेक्ट’ हैं क्योंकि ‘प्रथा-वश’ वो अध्यक्ष भी हैं आपके।

मैं बतौर देश की नागरिक आप राजनेताओं की राजनीति को लगातार समझने का प्रयास कर रहीं हूँ, थोड़ा आप भी हम नागरिकों की जरूरतों और भावनाओं को समझने का प्रयास कीजिए। वरना आप सिर्फ मौक़ापरस्त होकर बयानबाजी करते रहेंगे और अपने लिए मौके की माँग करते रह जाएँगे।

शानदार ख़बर: 179 कश्मीरी छात्रों को IAF के विशेष विमान से भेजा गया जम्मू ताकि परीक्षा न छूटे

जम्मू-कश्मीर में भारी बर्फबारी और बारिश की वजह से जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पिछले चार दिनों से बंद पड़ा है। हाइवे बंद होने और उड़ानों की आवाजाही ठप होने के चलते लोगों को काफ़ी दिक्कतों से गुजरना पड़ रहा।

राज मार्ग बंद होने से सबके चलते दिक्कत खासकर उन छात्रों को हो रही थी, जिनको शुक्रवार (7 जनवरी) को ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट यानी (गेट) के दूसरे चरण के परीक्षा में शामिल होना था। छात्रों की समस्या को देखते हुए सरकार ने सराहनीय कदम उठाते हुए श्रीनगर के 179 छात्रों को विशेष विमान से जम्मू पहुँचा।

ख़बरों की मानें तो जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने मामले में संज्ञान लेते हुए श्रीनगर और दिल्ली में फंसे ऐसे सभी लोगों के लिए वैकल्पिक इंतजाम करने का निर्देश दिया था। बता दें की राज्य सरकार ने इसके लिए केंद्रीय रक्षा मंत्रालय से मदद का अनुरोध किया था। राज्य सरकार के अनुरोध के बाद छात्रों को एयरलिफ्ट करने के लिए वायुसेना का विशेष विमान श्रीनगर से जम्मू लाया गया। इसके अलावा सऊदी अरब से उमरा करके लौटे 180 यात्रियों को भी दिल्ली से श्रीनगर पहुँचाया गया।

कॉन्ग्रेस का ‘हाथ’ नहीं कमलनाथ के साथ! गोहत्या पर चिदंबरम-दिग्विजय का अलग राग

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार द्वारा गोहत्या और गायों की अवैध तस्करी के दो अलग-अलग मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका) के तहत की गई कार्रवाई को गलत बताया है।

दरअसल, प्रदेश के खंडवा जिले में गोहत्या के आरोप में तीन लोगों को, जबकि आगर मालवा जिले में गौ वंश की अवैध तस्करी के आरोप में दो लोगों पर रासुका के तहत कार्रवाई की गई है। चिदंबरम ने रासुका के तहत हुई तीन लोगों की गिरफ़्तारी को गलत बताते हुए इस मामले को मध्य प्रदेश सरकार के सामने उठाया है।

बता दें कि, इससे पहले इस मामले पर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने भी कहा था कि गोहत्या कानून के तहत आरोपितों पर कार्रवाई होनी चाहिए थी, पर इस मामले में एनएसए लागू करना अनावश्यक था। ख़बर की मानें तो तीन आरोपित नदीम, उसके भाई शकील व आजम पर रासुका के तहत कार्रवाई करते हुए तीनों को जेल भेजा दिया गया था।

मध्य प्रदेश में कमलनाथ की सरकार द्वारा यह दूसरी बार है जब राज्य में रासुका के तहत कार्रवाई की गई हो। कॉन्ग्रेस ने कहा कि ऐसे मुद्दे संवेदनशील हैं, इसलिए इन पर रासुका के तहत कार्रवाई करना जरुरी है। बता दें कि कई लोगों ने कड़े कानून और कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा इसके उपयोग के खिलाफ़ अपनी चिंता जाहिर की है। ख़बरों की मानें तो कमलनाथ सरकार पूरे राज्य में 1000 गौशाला भी खोलने जा रही है। इस योजना के प्रथम चरण के तहत पूरे राज्य से करीब 1 लाख गायों को इसमें सुरक्षित रखने का लक्ष्य रखा गया है।

अरुणाचल ने जो आज हासिल किया है, वो बहुत ही जल्द पूरे देश में होने वाला है: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज (फ़रवरी 9, 2019) अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में 4,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की विकास परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया।

प्रधानमंत्री ने अपने सम्बोधन में कहा कि आज अरुणाचल ने जो हासिल किया है, वो बहुत ही जल्द पूरे देश में होने वाला है।

PM मोदी ने कहा, “सौभाग्य योजना के तहत देश में करीब 2.5 करोड़ परिवारों के घरों से अंधेरे को दूर किया जा चुका है। विकास की इसी कड़ी में आज अरुणाचल में एक साथ दो एयरपोर्ट का उद्घाटन और शिलान्यास हो रहा है।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश के लिए तो ये और भी अहम अवसर है, क्योंकि आज़ादी के इतने वर्षों बाद तक यहाँ एक भी ऐसा एयरपोर्ट नहीं था जहाँ नियमित रूप से बड़े यात्री जहाज़ उतर पाएँ।

PM मोदी ने कहा कि सबका साथ, सबका विकास के इस मंत्र पर चलते हुए, बीते साढ़े 4 वर्षों में अरुणाचल और उत्तर पूर्व के विकास के लिए ना तो फंड की कमी आने दी गई और ना ही इच्छाशक्ति की।

प्रधानमंत्री ने अपने ही अंदाज़ में विकास की पंचधारा पर बात करते हुए कहा, “हमारी सरकार विकास की पंचधारा, बच्चों की पढ़ाई, युवा को कमाई, बुजुर्गों को दवाई, किसान को सिंचाई और जन-जन की सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए काम कर रही है। स्वास्थ्य सेवाओं की सेहत बेहतर होगी और अरुणाचल की संस्कृति को भी बढ़ावा मिलेगा।”

इतना ही नहीं प्रधानमंत्री मोदी ने विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता उजागर करते हुए कहा, “केंद्र सरकार देश के हर क्षेत्र की संस्कृति, भाषा, खान-पान, रहन-सहन को संरक्षित करने, उनका और विकास करने के लिए प्रतिबद्ध है। यही कारण है कि हमारी सरकार ने अरुणाचल की संस्कृति को ताकत देने के लिए यहाँ के अपने 24 घंटे के टीवी चैनल अरुण प्रभा को लॉन्च किया है।”

वहाँ की प्राकृतिक आभा की बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, “अरुणाचल के लिए ना तो प्रकृति ने कोई कमी छोड़ी है और ना ही अध्यात्म और आस्था से जुड़े स्थानों की यहाँ कमी है। नए एयरपोर्ट बनने से, नई रेल लाइन बिछने से, यहाँ देश विदेश के टूरिस्टों की संख्या भी बढ़ेगी। इससे युवाओं के लिए रोज़गार के अनेक नए अवसर बनेंगे। मैं अरुणाचल प्रदेश को सौभाग्य योजना के तहत करीब हर परिवार तक बिजली पहुँचाने के लिए बहुत बधाई देता हूँ।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि इन योजनाओं से अरुणाचल प्रदेश की दूसरे राज्यों से कनेक्टिविटी तो सुधरेगी ही साथ ही राज्य के पावर सेक्टर को भी मजबूती मिलेगी।

प्रधानमंत्री ने न्यू इंडिया के अपने संकल्प दोहराते हुए कहा कि मैं बार-बार कहता आया हूँ, “न्यू इंडिया तभी अपनी पूरी शक्ति से विकसित हो पाएगा, जब पूर्वी भारत, नॉर्थ ईस्ट का तेज़ गति से विकास होगा। ये विकास संसाधनों का भी है और संस्कृति का भी। ये विकास अलग-अलग क्षेत्रों को जोड़ने का भी है और दिलों को जोड़ने का भी।”

’10 साल तक PM मनमोहन सिंह की सरकारी फ़ाइलें सोनिया के यहाँ जाती थीं’ – किताब में खुलासा

दिवंगत पत्रकार और पद्म भूषण से सम्मानित कुलदीप नैयर की अंतिम किताब “ऑन लीडर्स एंड आइकन्स: जिन्ना से मोदी तक” का विमोचन शुक्रवार को हुआ। ख़बर यह है कि इस पुस्तक विमोचन समारोह में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शिरक़त नहीं की।

वहीं, कुलदीप नैयर के पुस्तक विमोचन में देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने न्यूयॉर्क से वीडियो कॉन्फ्रेंस के ज़रिए हिस्सा लिया। जेटली ने इस कार्यक्रम में दिवंगत पत्रकार को देश के पिछले 6-7 दशक में देश के सबसे प्रसिद्ध पत्रकारों में से एक बताया।

दरअसल, मनमोहन सिंह ने कुलदीप नैयर की किताब में ज़िक्र किए गए कुछ हिस्से को लेकर आपत्ति ज़ाहिर की है और इस संबंध में उन्होंने दिवंगत नैयर की पत्नी भारती को एक पत्र लिखा।

इस किताब के एक हिस्से में इस बात का उल्लेख है कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ‘सरकारी फ़ाइलें 10 जनपथ जाती थीं’ इस पर आपत्ति दर्ज करते हुए सिंह ने नैयर की पत्नी को लिखे पत्र में कहा कि किताब में उल्लेखित यह बात सच नहीं है और यह जानने के बावजूद उनके लिए विमोचन में शामिल होना शर्मनाक होगा।

मनमोहन सिंह के समारोह से दूरी बनाने के बाद दिवंगत पत्रकार के बेटे राजीव नैयर ने बताया कि उनके पिता को विवादों में बने रहना पसंद था और सिंह ने ख़ुद ही इस विवाद को जन्म दिया है क्योंकि किताब में वही बात लिखी गई हैं जो उन्होंने ख़ुद उनके दिवंगत पिता से कही थीं। लेकिन अब किताब पढ़ने के बाद वो इस बात को नकार रहे हैं।

राजीव ने 1 फरवरी को पूर्व पीएम द्वारा भेजे गए पत्र को पढ़ा। इसमें मनमोहन सिंह ने लिखा था कि इस किताब को पढ़ने के दौरान पेज 172 पर एक संदर्भ मिला कि उनके प्रधानमंत्रित्व काल में सरकार की फ़ाइलें सोनिया गाँधी के घर पर जाती थीं। यह कथन सत्य नहीं है, क्योंकि कुलदीप नैयर ने कभी भी इस तरह की कोई बातचीत उनसे नहीं की।

कार्यक्रम के बाद पत्रकार राजदीप सरदेसाई और कॉन्ग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के बीच चर्चा हो रही थी। इस बातचीत में कपिल सिब्बल ने कहा कि जब वो मंत्री थे तो वे सभी फ़ैसले सीधे ले सकते थे। 10 साल पद पर रहने के बावजूद न तो उन्हें कभी पीएम ने फ़ोन ही किया और न ही कभी किसी फ़ाइल के सिलसिले में 10 जनपथ से फ़ोन आया।

इसके बाद सिब्बल ने कहा कि कभी-कभी ऐसा होता है कि जानकारियाँ बाहर आती हैं, लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि वो सच ही हों। हालाँकि फिर उन्होंने दिवंगत नैयर पर सकारात्मक रुख़ अपनाते हुए कहा कि हमें उनके दृष्टिकोण की सराहना करनी चाहिए और उनसे सीख भी लेनी चाहिए।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संबोधित करते हुए अरुण जेटली ने कहा कि दिवंगत पत्रकार नैयर, देश के सम्मानित पत्रकारों में से एक थे। उनसे सहमति या असहमति हो सकती है लेकिन पिछले 60-70 सालों में उनसे बेहतर राजनीतिक रिपोर्टर शायद कोई नहीं हुआ।

…तो सोशल मीडिया पर भी छाएगी चुप्पी, चुनाव के 48 घंटे पहले ये है EC का प्लान

चुनाव आयोग ने क़ानून मंत्रालय को पत्र लिख कर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के सेक्शन 126 में संशोधन करके इसका दायरा सोशल माडिया, इंटरनेट, केबल चैनल्स और प्रिंट मीडिया के ऑनलाइन संस्करणों तक बढ़ाने की बात कही है।

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के सेक्शन 126 के अंतर्गत ‘इलेक्शन साइलेंस’ की बात आती है। इसके अनुसार चुनाव वाले क्षेत्र में मतदान से 48 घंटे पहले प्रचार पर रोक लगाने का प्रावधान है। साथ ही आयोग ने अधिनियम में अनुच्छेद 126(2) भी जोड़ने की बात की है, जिसके अंतर्गत इलेक्शन साइलेंस का दायरा बढ़ाने के बाद उल्लंघन पर कार्रवाई भी की जा सकेगी।

केंद्र सरकार को यह बातें लगभग तीन सप्ताह पहले ही पत्र के माध्यम से बता दी गई हैं। इस पर जल्द विचार करने का आग्रह किया गया, जिससे इसे साल 2019 में होने वाले आम चुनाव में लागू किया जा सके।

वर्तमान में सेक्शन 126 केवल सिनेमाघरों, टेलीविज़न या इसी तरह के उपकरणों के माध्यम से सार्वजनिक बैठकों या चुनावी मामले के किसी भी प्रदर्शन या आंदोलन को प्रतिबंधित करता है। चुनाव आयोग ने 17 जनवरी को विधि सचिव को भेजे गए अपने पत्र कहा कि इस सेक्शन में प्रिंट मीडिया का उल्लेख नहीं है। चुनाव आयोग ने लिखा, “राजनीतिक दल और उम्मीदवार इस अवधि के दौरान समाचार पत्रों में विज्ञापन जारी करते हैं, जिसमें मतदान का दिन भी शामिल होता है।”

चुनाव आयोग ने बताया कि उसने सेक्शन 126 के प्रावधानों की समीक्षा के लिए गठित एक समिति की 10 जनवरी की रिपोर्ट पर विचार किया था। 10 जनवरी की रिपोर्ट में समिति ने 48 घंटे पूर्व लगने वाले इस बैन के दायरे को बढ़ाने की सिफ़ारिश की थी। इसमें यह बात भी शामिल है कि कोई भी कोर्ट सेक्शन 126(1) के अंदर होने वाले उल्लंघनों का स्वतः संज्ञान नहीं ले सकता जब तक आयोग या राज्य चुनाव अधिकारी इसकी अनुशंसा नहीं करता। यह बात 13 जून 2014 को चुनाव आयोग को दिए गए एक राय में पूर्व अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई द्वारा किए गए प्रस्ताव के अनुरूप थी।

चुनाव आयोग, मीडिया को परिभाषित करते हुए सेक्शन 126(2) को जोड़ना चाहता है। इसके अंतर्गत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इंटरनेट, रेडियो, टेलीविज़न, केबल चैनल, प्रिंट मीडिया के इंटरनेट या डिजिटल संस्करण आते हैं। वहीं प्रिंट मीडिया में न्यूज़ पेपर, मैग़ज़ीन और प्लेकार्ड को भी शामिल किया गया है।

आपको बता दें कि विधि आयोग ने अपने 255वें रिपोर्ट में सेक्शन 126 में संशोधन की बात कही थी। पूर्व चुनाव आयोग एसवाई क़ुरैशी ने भी 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चुनाव के 48 घंटे पूर्व प्रचार पर लगने वाले प्रतिबंध में प्रिंट मीडिया को शामिल करने के लिए पत्र लिखा था।

‘परिवारवाद’ की छवि को मिटाने की जुगत में कॉन्ग्रेस

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं वैसे-वैसे कॉन्ग्रेस पार्टी अपने नए-नए चुनावी तरीक़े इस्तेमाल में ला रही है। अभी-अभी राजनीति में क़दम रखने वाली प्रियंका गाँधी वाड्रा को शायद फूँक-फूँक कर पाँव रखने के निर्देश दिए जा रहे हैं, जिन्हें वो बख़ूबी निभा भी रही हैं।

जानकारी के मुताबिक शुक्रवार (8 फ़रवरी 2019) को कॉन्ग्रेस की आधिकारिक बैठक में शामिल होने पहुँची प्रियंका गाँधी की सीट राहुल गाँधी के साइड में आवंटित न करके थोड़ा अगल की गई क्योंकि उस समय राहुल के साइड वाली सीट पर ज्योतिरादित्य सिंधिया बैठे थे। जब इस बात पर ग़ौर किया गया तो जो बात सामने आई वो हैरान कर देने जैसी थी।

ऐसा इसलिए किया गया ताकि पार्टी के अन्य सदस्यों के बीच यह संदेश जा सके कि कॉन्ग्रेस के लिए जितनी महत्वपूर्ण प्रियंका गाँधी हैं, उतने ही महत्वपूर्ण बाक़ी सब सदस्य भी हैं। बैठने की सीट पर किए गए इस मंथन को अगर राजनीतिक स्टंट ही कहा जाए तो बेहतर है।

चूँकि अभी प्रियंका गाँधी का राजनीतिक क़द बहुत छोटा है इसलिए उन्हें अधिक तवज्ज़ो देना तो वैसे भी किसी मायने में फिट नहीं बैठता। सबको एक बराबर दिखाने की भला ऐसी भी क्या नौबत आन पड़ी, ये सोचने वाली बात है। अनुमान तो यही लगाया जा सकता है कि शायद आज बरसों बाद कॉन्ग्रेस पार्टी अपनी वंशवाद की राजनीतिक छवि से ऊपर उठने का प्रयास कर रही है।

सवाल यह है कि क्या केवल इतने भर से कॉन्ग्रेस पार्टी अपनी बरसों पुरानी परिवारवाद की छवि को मिटाने में सफल हो सकती है? वैसे यह इतिहास रहा है कि राजनेताओं के बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर बनने की बजाए राजनीति को ही अपना करियर बनाते हैं। इसमें कोई नई बात तो नहीं है, लेकिन प्रियंका का राजनीति में क़दम रखना आए दिन तरह-तरह के अजीबो-गरीब इतिहास रचने की फ़िराक में रहता है।

सही मायने में तो अगर कहा जाए कि आज भी कॉन्ग्रेस अपने परिवारवाद के परंपरागत तरीक़े से निकल नहीं पाई है तो कहना ग़लत नहीं होगा। क्योंकि ऐसे तमाम अवसर हैं, जहाँ कॉन्ग्रेस ने अपनी पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के बच्चों के राजनीतिक करियर को सँवारने की ज़िम्मेदारी अपने कंधे पर ली। परिवारवाद के साये में फलती-फूलती कॉन्ग्रेस भला और कर भी क्या सकती थी। प्रियंका गाँधी की सीट का आवंटन इस ओर भी इशारा करता है कि कहीं न कहीं कॉन्ग्रेस को ख़ुद भी यह एहसास होता है कि वो वंशवादी परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए है, जिसे दुनिया की नज़र से धूमिल करना होगा अन्यथा इसका ख़ामियाज़ा आने वाले समय में भुगतना पड़ेगा। फ़िलहाल कॉन्ग्रेस अपनी साम, दाम, दंड की हर नीति अपनाने में व्यस्त है जिससे पार्टी सत्ता में वापसी का रास्ता बना सके।

कॉन्ग्रेस खेमे में पूर्व नेताओं की संतानें हैं, जिनके राजनीतिक करियर को पंख इसी पार्टी ने दिए। ऐसे में क्या यह सवाल नहीं उठ खड़ा होता कि जो पार्टी ख़ुद परिवारवाद की राजनीति करती आई हो, वो पूर्व नेताओं की संतानों के राजनीतिक भविष्य को सँवारने का काम तो नहीं करने लगी?

कॉन्ग्रेस द्वारा जिनका भविष्य चमकाया गया उनमें कुँवर नटवर सिंह के बेटे जगत सिंह, दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह, कमलनाथ के बेटे नकुल नाथ, राजेश पायलेट के बेटे सचिन पायलेट, नवीन जिंदल जैसे कई नाम शामिल हैं जिन्होंने अपनी वंशवादी परंपरा को ज़िंदा रखा।

वैसे तो प्रियंका गाँधी के लिए राजनीति कोई नई बात नहीं है फिर पार्टी बैठक में सीट का आवंटन कॉन्ग्रेस की विचारधारा को स्पष्ट करता है। यह तो तय है कि प्रियंका गाँधी के बैठने के स्थान का निर्धारण पहले से ही तय रहा होगा, अब चाहे इस निर्धारण के पीछे राहुल गाँधी का हाथ रहा हो या सोनिया गाँधी का इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है।

राजनीति में प्रियंका गाँधी की एंट्री के साथ ही कई मुद्दों को भी हवा मिल गई। उनके सौन्दर्य से लेकर वाड्रा को ईडी कार्यालय तक छोड़ना और उन्हें वापस लाना। इन दिनों प्रियंका गाँधी को इस तरह से पेश किया गया जैसे भारतीय महिलाओं में इकलौती वो ही आदर्श महिला हैं, उदाहरण के लिए उनका पत्नी-रूप इन दिनों काफ़ी फेमस है। इसके बाद बारी आती है उनकी शक्ल पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी (उनकी दादी) से मिलने-जुलने की। उनकी दादी से हूबहू मिलती-जुलती शक्ल कई दिनों तक सोशल मीडिया पर छाया रहा। मतलब ये कि किसी न किसी बहाने से ही सही लेकिन मुख्यधारा की मीडिया को मौक़ा तो मिल ही जाता है, जिसपर वो ख़बर बना डालते हैं। इस बात का सबूत तो रोज़ाना मिल ही जाता है।

वहीं अगर बात करें बीजेपी की तो शुरूआत करते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से। उनके बारे में जगज़ाहिर है कि वो किसी राजनीतिक परिवार से नहीं आते। उनका और उनके परिवार का राजनीति से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। यह बात अलग है कि देशहित उन्हें राजनीति में ले आया। इस देशहित में पत्नी मोह भी उनके आड़े नहीं आया। बीजेपी के अन्य नेताओं पर भी अगर नज़र डाली जाए तो राजनीतिक परिवारों से ताल्लुक रखने वालों की सँख्या न के बराबर या बहुत कम होगी।

कॉन्ग्रेस के लिए अब भी यह सोचने का वक़्त है कि केवल सीट का स्थान बदल लेने भर से परिवारवाद का ठप्पा नहीं हटता बल्कि उसके लिए कड़े फ़ैसले भी लेने पड़ते हैं। इसके लिए पारिवारिक स्वार्थों की आहुतियाँ देनी पड़ती हैं, और इनके लिए कॉन्ग्रेस न पहले कभी सहज थी और न अब। यदि ऐसा होता तो कॉन्ग्रेस का दामन इतने सारे क़द्दावर नेता कभी न छोड़ते।

इन नेताओं में जीके वासन, विजय बहुगुणा,रीता बहुगुणा जोशी, कृष्णा तीरथ, हरक सिंह रावत, यशपाल आर्या, चौधरी बीरेंद्र सिंह, दत्ता मेघा, जगमीत सिंह बरार, अवतार सिंह भड़ाना, रंजीत देशमुख, मंगत राम शर्मा जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इन नेताओं ने अपने हिस्से की ज़मीन न मिलते देख पार्टी से अपना नाता तोड़ना उचित समझा।

अंत में यही कहना सटीक लगता है कि आगामी लोकसभा चुनाव के लिए कॉन्ग्रेस की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं, जिस पर समय रहते सोचा नहीं गया तो भावी परिणाम निश्चित रूप से उसके ख़िलाफ़ हो सकते हैं। इस पर कॉन्ग्रेस को अभी और गहन मंथन की आवश्यकता है।

कभी ना, कभी हाँ: 78 साल के शरद पवार फिर से लोकसभा चुनाव लड़ने को तैयार!

2018 में एक रैली के दौरान चुनाव लड़ने से मना करने वाले एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार ने संकेत दिए हैं कि वो 2019 लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं। यह फै़सला उन्होंने शुक्रवार (फरवरी 8, 2019) राज्य स्तरीय मीटिंग के बाद लिया है।

78 साल के हो चुके शरद पवार ने आगामी लोकसभा चुनावों के लिए 10 सीटों का लक्ष्य रखा है। बता दें कि अगर शरद पवार लोकसभा चुनाव में लड़ने के लिए खड़े होते हैं तो वे माढा संसदीय सीट पर ही चुनाव लड़ेंगे। साल 2009 में एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने इसी क्षेत्र से चुनावों में जीत हासिल की थी। फिलहाल, यहाँ के सांसद अभी मोहिते पाटिल हैं।

पुणे में 3 घंटे से ज्यादा देर तक चली एक मीटिंग के बाद शरद पवार के दोबारा चुनाव लड़ने का फ़ैसला लिया गया। पवार ने एनसीपी की इस राज्य स्तरीय मीटिंग के बाद कहा कि पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता और माढ़ा के सांसद विजय सिंह मोहिते पाटिल भी चाहते हैं कि वे चुनाव लड़ें।

शरद पवार ने कहा कि पार्टी के सब लोगों का कहना है कि वो उनका कहना मानेंगे। इसलिए उन्हें खुद भी कार्यकर्ताओं के फैसले को मानते हुए चुनाव लड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि वो इस बारे में सबको सोचकर सूचित करेंगे।

बता दें कि इस मीटिंग में शरद पवार, एनसीपी प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटील, छगन भुजबल और माढ़ा चुनाव क्षेत्र के सांसद विजयसिंह मोहीते पाटील मौजूद थे।