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ममता की ‘मक्कारी’: BJP रथ यात्रा पर खौफ़ का खेल, रची झूठी इंटेलीजेंस रिपोर्ट से साज़िश

पश्चिम बंगाल में बीते दिनों हुए तमाम राजनीतिक और प्रशासनिक उठक-पटक के बीच इंडिया टुडे द्वारा किया गया स्टिंग ऑपरेशन ममता बनर्जी सरकार के झूठे दावे की पोल खोलने के लिए काफ़ी है। स्टिंग के जरिए यह बात सामने आई है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने जानबूझकर भाजपा की रथ यात्रा को गलत खुफिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए रुकवाया था। इसमें यह दावा किया गया था कि अगर राज्य में रथ यात्रा निकलती है तो साम्प्रादायिकता भड़केगी।

बीते दिनों भाजपा को कोलकाता में अलग-अलग स्थानों से 3 रथ यात्रा का आयोजन करना था। इस यात्रा को अमित शाह द्वारा हरी झंडी दिखाने के बाद प्रधानमंत्री मोदी की एक रैली को संबोधित करने के साथ इस अभियान को समाप्त करना था। लेकिन उस वक्त राज्य पुलिस और प्रशासन ने एक खुफिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि अगर राज्य में रथ यात्रा निकलेगी तो ‘सांप्रदायिक भेदभाव’ बढ़ेगा, इसलिए हम इसकी इजाज़त नहीं दे सकते हैं।

बीजेपी ने इसके बाद रथयात्रा पर रोक के फै़सले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था, लेकिन कोर्ट ने भी यह कहते हुए बीजेपी की याचिका ख़ारिज कर दी थी कि राज्य सरकार की ओर से जताई गई आशकाएँ बेबुनियाद नहीं हैं।

स्टिंग में ख़ुलासा, इंटेलीजेंस इनपुट था ‘बनावटी’

इंडिया टुडे के द्वारा किए गए स्टिंग ऑपरेशन में यह खु़लासा हुआ है कि ज़मीनी स्तर पर कोई खास इंटेलीजेंस इनपुट नहीं था, जिसके आधार पर रथ यात्रा पर रोक लगाने की बात को वाजिब ठहराया जा सके। दरअसल, स्टिंग करने वाली टीम पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले में एक खुफिया अधिकारी जेपी सिंह से मिली।

इसमें उन्होंने इस बात को माना कि रथयात्रा को अगर इजाज़त मिलती तो वह प्रोटेक्शन देते, लेकिन उनके पास इसकी इजाज़त ही नहीं थी। इन सारी बातों का खु़लासा उस वक्त हुआ जब रिपोर्टर ने सवाल पूछा कि आपके पास किस तरह के इनपुट थे और कहाँ-कहाँ दंगे हो सकते थे।

इसके अलावा एक अन्य सवाल में जब रिपोर्टर ने पूछा कि यह रिपोर्ट किसने बनाई थी, तो अधिकारी ने कहा, “हाँ, वो तो बनी, हर डिस्ट्रिक्ट ने बनाई। हर जगह ऐसा ही है… हम क्या बता रहे हैं कि मास्टर सिर्फ़ एक आदमी होता है दस लोग नहीं… रिपोर्ट उन्हीं के निर्देशों पर है और उसी के मुताबिक़ भेजी गई है।”

जेपी सिंह ने यह भी कबूल किया कि प्रस्तावित यात्रा पर उनकी रिपोर्ट अस्पष्ट इनपुट पर आधारित थी। उन्होंने कहा कि निर्देश ऊपर से आए थे। साथ में उन्होंने यह दावा भी किया कि सभी जिलों में खुफिया अधिकारियों ने रिपोर्ट बनाई थी।

एक अन्य अधिकारी बप्पादित्य घोष ने भी कहा कि उनके पास कोई सटीक इंटेलीजेंस नहीं थी, जो भाजपा की यात्रा को रोकने का कारण बने। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि वे कुछ राजनीतिक दबाव में थे। उन्होंने यह भी बताया कि मार्च 2018 में पश्चिम बर्धमान जिले से संबंधित सांप्रदायिक समस्या की सूचना उन्होंने दी थी। लेकिन वर्तमान समय में ऐसी किसी समस्या को लेकर ताजा इंटेलीजेंस इनपुट नहीं था।

दूल्हा-दुल्हन सब थे राज़ी, लेकिन निकाह से बिदक गए काजी!

पैसा-पैसा करती है तू पैसे पे क्यों मरती है…

यह गाना तो आपने सुना ही होगा? लेकिन जब असिलयत में इस गाने की तर्ज़ पर कुछ ऐसा देखने को मिल जाए, जिससे प्रशासन के भी हाथ-पाँव फूल जाएँ तो बात गंभीर हो जाती है। उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में एक काजी साहब ने उस वक़्त ‘माहौल’ बना दिया जब, उन्होंने कहा कि पैसा नहीं तो शादी नहीं, मतलब पहले दाम फिर काम। मतलब ‘माहौल’ इस कदर बन गया कि मियाँ-बीबी के राज़ी होने के बाद बिन काजी के शादी अटक गई। और विवाह संपन्न नहीं हो सका।

दरअसल, शाहजहाँपुर में एक सामूहिक विवाह कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जिसमें मिनिस्टर से लेकर अन्य तमाम दिग्गज पहुँकर सामूहिक विवाह की शोभा बढ़ा रहे थे। यहाँ न सिर्फ़ मुस्लिम कन्याओं का बल्कि हिंदू कन्याओं की शादी का प्रोग्राम भी बना था, जिसमें हिंदू कन्याओं की शादी तो हो गई, लेकिन जब बारी मुस्लिम कन्याओं की आई तो अंत समय पर काजी साहब ने धोखा दे दिया।

पहले दिखाया था ठेंगा, काजी ने लिया बदला

वैसे नेताओं के बारे में क्या कहा जाए? उनकी पूरी राजनीति ही ठेंगा दिखाने पर टिकी हुई है। खै़र यहाँ हम काजी साहब के बारे में बात कर रहे हैं। दरअसल, मुस्लिम कन्याओं की शादी के लिए शहर के नामी काजी वसीम मीनाई को बुलावाया गया था, लेकिन उन्होंने यह कहकर विवाह स्थल पर आने से इनकार कर दिया कि पिछले 3 सामूहिक विवाह कार्यक्रमों में निकाह करवाने के बाद भी उन्हें तय की गई रकम ₹500/निकाह नहीं दी गई थी।

शादी न करवाने के पीछे उनका दिया गया तर्क जायज है भाई! शादी-ब्याह अपनी जगह है, लेकिन अगर पैसा ही नहीं मिलेगा तो फिर बेगम के लिए समान और बच्चों के लिए चॉकलेट कहाँ से लेकर आएँगें काजी साहब? शादी के बाद जोड़े तो हनीमून पर रहेंगे और घर में बेगम उनका क्या हस्र करेंगी, इसके बारे में सोचा किसी ने? खै़र काजी साहब की मानें तो उन्हें प्रशासन ने मान मुनौवल करके तीन बार धोखा दिया है।

काजी शाहब ने दर्द बयाँ करते हुए तर्क दिया कि पिछले 3 सामूहिक विवाहों का लगभग ₹20,000 उधार है। काजी साहब की मानें तो प्रशासन के अधिकारी न सिर्फ़ उनसे मुफ़्त में निकाह पढ़वाते हैं, बल्कि फोन पर पैसे माँगने पर धमकी भी देते हैं।

मतलब भाई भलाई का जमाना ही नहीं रहा! जहाँ लोग मेहनत-मजदूरी करके एक दिन में ₹300-₹500 कमाते हैं, वहीं काजी साहब से 3 बार समारोह में निकाह भी पढ़वा लिया और उनका ₹20,000 भी लेके बैठ गए। फिलहाल काजी साहब की मानें तो नेकी करने पर बदी मिलने वाली कहावत उन पर लागू हो रही है।

पाक अधिकृत कश्मीर में माँ सरस्वती का निवास, भारत की धरोहर है यह शारदा पीठ

देश की चारों दिशाओं में चार मठ स्थापित करने तथा आचार्य गौड़पाद में महाविष्णु के दर्शन करने के पश्चात आदि शंकर को माँ सरस्वती की कृपा प्राप्त हुई थी। विद्यारण्य कृत ‘शंकर दिग्विजय’ ग्रंथ में वर्णित कथा के अनुसार शंकर अपने शिष्यों के साथ गंगा किनारे बैठे थे तभी किसी ने समाचार दिया कि विश्व में जम्बूद्वीप, जम्बूद्वीप में भारत और भारत में काश्मीर सबसे प्रसिद्ध स्थान है जहाँ शारदा देवी का वास है। उस क्षेत्र में माँ शारदा को समर्पित एक मंदिर है जिसके चार द्वार हैं। मंदिर के भीतर ‘सर्वज्ञ पीठ’ है। उस पीठ पर वही आसीन हो सकता है जो ‘सर्वज्ञ’ अर्थात सबसे बड़ा ज्ञानी हो।

उस समय माँ शारदा के उस मंदिर के चार द्वार थे जो चारों दिशाओं में खुलते थे। पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशा से आए विद्वानों के लिए तीन द्वार खुल चुके थे किंतु दक्षिण दिशा की ओर से कोई विद्वान आया नहीं था इसलिए वह द्वार बंद था। आदि शंकर ने जब यह सुना तो वे शारदा मंदिर के सर्वज्ञ पीठ के दक्षिणी द्वार के लिए निकल पड़े।

शंकर जब काश्मीर पहुँचे तब वहाँ उन्हें अनेक विद्वानों ने घेर लिया। उन विद्वानों में न्याय दर्शन, सांख्य दर्शन, बौद्ध एवं जैनी मतावलंबी समेत कई विषयों के ज्ञाता थे। शंकर ने सभी को अपनी तर्कशक्ति और मेधा से परास्त किया तत्पश्चात मंदिर का दक्षिणी द्वार खुला और आदि शंकर पद्मपाद का हाथ पकड़े हुए सर्वज्ञ पीठ की ओर बढ़ चले। तभी माँ सरस्वती ने शंकर की परीक्षा लेने के लिए उनसे कहा, “तुम अपवित्र हो। एक सन्यासी होकर भी काम विद्या सीखने के लिए तुमने एक स्त्री संग संभोग किया था। इसलिए तुम सर्वज्ञ पीठ पर नहीं बैठ सकते।”

तब शंकर से कहा, “माँ मैंने जन्म से लेकर आजतक इस शरीर द्वारा कोई पाप नहीं किया। दूसरे शरीर द्वारा किए गए कर्मों का प्रभाव मेरे इस शरीर नहीं पड़ता।” यह सुनकर माँ शारदा शांत हो गईं और आदि शंकर सर्वज्ञ पीठ पर विराजमान हुए। माँ सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त कर शंकर की कीर्ति चहुँओर फैली और वे शंकराचार्य कहलाए। आदि शंकराचार्य ने माँ सरस्वती की वंदना में स्तुति की रचना की जो आज प्रत्येक छात्र की वाणी को अलंकृत करती है- “नमस्ते शारदे देवि काश्मीरपुर वासिनी, त्वामहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि मे।”

कश्मीर में जिस मंदिर के द्वार कभी आदि शंकर के लिए खुले थे आज उसके भग्नावशेष ही बचे हैं। हम प्रतिवर्ष वसंत पंचमी और नवरात्र में माँ सरस्वती की वंदना शंकराचार्य द्वारा रची गई स्तुति से करते हैं लेकिन उस सर्वज्ञ पीठ को भूल गए हैं जिसपर कभी आदि शंकर विराजे थे। शारदा पीठ देवी के 18 महाशक्ति पीठों में से एक है। आज वह शारदा पीठ पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में है और वहाँ जाने की अनुमति किसी को नहीं है।

कश्मीर के रहने वाले एक डॉ अयाज़ रसूल नाज़की अपने रिश्तेदारों से मिलने पाक अधिकृत कश्मीर स्थित मुज़फ्फ़राबाद कई बार गए। अंतिम बार जब वे 2007 में गए थे तब उन्होंने शारदा पीठ जाने की ठानी। डॉ नाज़की की माँ के पूर्वज हिन्दू थे इसलिए वे अपनी जड़ों को खोजने शारदा पीठ गए थे। गत 60 वर्षों में वे पहले और अंतिम भारतीय कश्मीरी थे जो शारदा पीठ गए थे।

एक समय ऐसा भी था जब बैसाखी पर कश्मीरी पंडित और पूरे भारत से लोग तीर्थाटन करने शारदा पीठ जाते थे। आज वह शारदा पीठ उस क्षेत्र में है जिसे पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर कहता है। आज़ाद कश्मीर मीरपुर मुज़फ्फ़राबाद का क्षेत्र है जो जम्मू कश्मीर राज्य का अंग है।

मुज़फ्फ़राबाद झेलम और किशनगंगा नदियों के संगम पर बसा छोटा सा नगर है। किशनगंगा के तट पर ही शारदा तहसील में शारदा गाँव स्थित है। वहाँ आज शारदा विश्वविद्यालय के अवशेष ही दिखाई पड़ते हैं। कनिष्क के राज में यह समूचे सेंट्रल एशिया का सबसे बड़ा ज्ञान का केंद्र था। वस्तुतः कश्मीर की ख्याति ही ‘शारदा प्रदेश’ के नाम से थी। आर्थर लेवलिन बैशम ने अपनी पुस्तक ‘वंडर दैट वाज़ इण्डिया’ में लिखा है कि बच्चे अपने उपनयन संस्कार के समय ‘कश्मीर गच्छामि’ कहते थे जिसका अर्थ था कि अब वे उच्च शिक्षा हेतु कश्मीर जाने वाले हैं।

कश्मीर के शंकराचार्य के समकक्ष आदर प्राप्त आचार्य अभिनवगुप्त ने लिखा है कि कश्मीर में स्थान-स्थान पर ऋषियों की कुटियाँ थीं और पग-पग पर भगवान शिव का वास था।

शारदा पीठ का उल्लेख सर्वप्रथम नीलमत पुराण में मिलता है। इसके अतिरिक्त कल्हण ने राजतरंगिणी में लिखा है कि सम्राट ललितादित्य के समय में शारदा विश्वविद्यालय में बंगाल के गौड़ समुदाय के लोग शारदा पीठ आते थे। संस्कृत समूचे कश्मीर की भाषा थी और शारदा विश्वविद्यालय में 14 विषयों की पढ़ाई होती थी। शारदा विश्वविद्यालय में ही देवनागरी से भिन्न शारदा लिपि का जन्म हुआ था।

डॉ अयाज़ रसूल नाज़की ने Cultural Heritage of Kashmiri Pandits नामक पुस्तक में प्रकाशित अपने लेख में ‘सारिका’ या ‘शारदा’ की लोक प्रचलित कहानी लिखी है। हुआ यह कि एक बार कश्मीर में रहने वालों की वाणी चली गई। कोई न कुछ बोल सकता था न व्यक्त कर सकता था। आवाज़ चली जाने से लोग दुखी और परेशान थे। तब सबने मिलकर हरि पर्वत पहाड़ी पर जाने का निश्चय किया। वहाँ पहुँच कर सबने भगवान से प्रार्थना की। तभी एक बड़ी सी मैना आई और उस चिड़िया ने अपनी चोंच से पत्थरों पर खोए हुए अक्षरों को लिखना प्रारंभ किया। सबने मिलकर उन अक्षरों को बोलकर पढ़ा, और इस प्रकार सबकी वाणी लौट आई।

संभव है कि वाग्देवी सरस्वती ने कश्मीरी लिपि शारदा को इसी प्रकार प्रकट किया हो लेकिन शेष भारत ने शारदा देश, लिपि, आदि शंकर की सर्वज्ञ पीठ और देवी की शक्ति पीठ को भी लगभग भुला दिया है।

गुर्जर आरक्षण: कई ट्रेनें रद्द, बहुतों का बदलना पड़ा रास्ता

लोकसभा चुनावों के आते ही गुर्जर आरक्षण आंदोलन ने भी तूल पकड़ लिया है। शुक्रवार (फरवरी 8, 2019) को ये आंदोलन गुर्जर नेता किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में शुरू हुआ।

इस आंदोलन में गुर्जर समेत 5 समुदायों के लिए सरकारी नौकरियाें और शिक्षण संस्थानों में पाँच फ़ीसदी तक आरक्षण दिए जाने की माँग की है।

गुर्जर समुदाय के ये लोग सवाई माधोपुर के नज़दीक मलारना डूंगर में रेलवे ट्रैक और सड़क रास्ते पर धरना दे रहे हैं। इस धरने की वजह से रेल यातायात को काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अभी तक पश्चिम मध्य रेलवे ने दिल्ली-मुंबई की 5 ट्रेनें को रद्द कर दिया है जबकि 15 ट्रेनों के रास्ते बदलने पड़े हैं।

बैंसला ने एएनआई से बातचीत में कहा है कि अगर आर्थिक रुप से कमज़ोर वर्गों के लिए 10 फीसदी आरक्षण का इंतज़ाम किया जा सकता है तो उनके समुदाय के लिए क्यों नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि उनकी माँगों पर चूँकि अब तक ध्यान नहीं दिया गया है इसलिए उन्हें मजबूरन ही धरना प्रदर्शन करना पड़ा।

बता दें कि गुर्जरों की आरक्षण को लेकर माँग बहुत पुरानी हैं। साल 2007 से 2015 तक में गुर्जर कई बार आंदोलन कर चुके हैं।  इन आंदोलनों के दौरान रेल और सड़क यातायात को बाधित करना बहुत ही आम बात हो चुकी है।

SC के फ़ैसले से आहत मायावती ने कहा, ‘मीडिया और BJP कटी पतंग ना बनें तो बेहतर’

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने राज्य में कई जगहों पर हाथी की मूर्तियों को लगवाया था। इन मुर्तियों को लगाने के लिए मायावती ने सरकारी खज़ाने को ग़लत तरह से ख़र्च किया।

सुप्रीम कोर्ट ने मायावती के द्वारा सरकारी पैसा ख़र्च करके प्रतिमा लगाए जाने को ग़लत बताते हुए अपने फ़ैसले में मूर्तियों पर किए गए ख़र्च को लौटाने की बात कही। सुप्रीम कोर्ट द्वारा फ़ैसला सुनाए जाने के बाद अब इस मामले में मायावती की प्रतिक्रिया आई है।

मायावती ने इस मामले पर ट्वीट करते हुए कहा, “मीडिया कृपया कर माननीय सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को तोड़-मरोड़ कर पेश न करें। हमारी पार्टी माननीय न्यायालय में अपना पक्ष पूरी मज़बूती के साथ आगे रखेगी। हमें पूरा भरोसा है कि इस मामले में भी न्यायालय से पूरा इंसाफ़ मिलेगा। मीडिया व बीजेपी के लोग कटी पतंग ना बनें तो बेहतर है।”

मायावती ने इस मामले में एक और ट्वीट करते हुए कहा कि सदियों से तिरस्कृत दलित व पिछड़े वर्ग में जन्मे महान संतों, गुरुओं व महापुरुषों के आदर-सम्मान में निर्मित भव्य स्थल, स्मारक, पार्क आदि सरकारों द्वारा बनाई गई। इनसे उत्तर प्रदेश की नई शान, पहचान मिला और यह जगह व्यस्त पर्यटन स्थल बन गया। इन आकर्षक जगहों से सरकार को नियमित आय भी होती है।

इस ट्वीट को पढ़ने के बाद ऐसा लग रहा है मानों वो अपनी सरकार द्वारा बनाए गए स्मारक और पार्क आदि पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद ख़ुद का बचाव कर रही हों।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (फ़रवरी 8, 2019) को आदेश दिया कि बसपा अध्यक्ष मायावती को जनता का वो सारा धन लौटाना होगा जिसे उन्होंने अपने स्मारकों को बनाने में ख़र्च किया था।

यह आदेश न्यायलय ने एक वकील द्वारा दाखिल की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। जिसमें शिक़ायत थी कि कोई भी राजनैतिक पार्टी जनता के पैसों का इस्तेमाल अपनी मूर्तियाँ बनवाने के लिए या फिर प्रचार-प्रसार के लिए ख़र्च नहीं कर सकती।

कुम्भ: स्नान करती महिलाओं के फोटो लेने पर हाई कोर्ट सख़्त

कुम्भ जहाँ आस्था और पवित्रता का विषय है वहीं कुछ लोग कुम्भ में स्नान करती महिलाओं की तस्वीर खींचने से बज नहीं आ रहे थे। यहाँ तक की ऐसी कई तस्वीरें अख़बारों में भी छापी गई, मीडिया चैनलों में भी दिखाया गया। जिसका कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए, अखबार और मीडिया चैनलों पर स्नान करती महिलाओं की फोटो दिखाए जाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेला अधिकारियों और व्यवस्थापकों को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने निर्देश देते हुए कहा है कि ऐसा करने वालों पर कार्रवाई की जाएगी। हालाँकि, अदालत ने इस मामले में अगली सुनवाई पाँच अप्रैल को रखी है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वकील असीम कुमार की याचिका पर जस्टिस पीकेएस बघेल और जस्टिस पंकज भाटिया की खण्डपीठ ने सुनवाई की। कोर्ट ने मेला अधिकारी से प्रश्न किया कि जब स्नान घाट से 100 मीटर के दायरे में फोटोग्राफी प्रतिबंधित है तो यह सब कैसे हो रहा है? इस प्रतिबंध का कड़ाई से पालन किया जाए।

बता दें कि प्रशासन 1000 से ज़्यादा सीसीटीवी कैमरों की मदद से पूरे मेला क्षेत्र की निगरानी कर रहा है। पूरे इलाके पर नजर रखने के लिए 40 निगरानी टावर का भी निर्माण किया गया है। मेले में राज्य पुलिस बल, पीएसी और केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के करीब 22,000 जवानों की तैनाती भी की गई है। आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरे मेला क्षेत्र में 40 पुलिस थाने, 3 महिला पुलिस थाने और 60 पुलिस चौकियाँ भी स्थापित की गई हैं।

एक और मुश्किल में वाड्रा, अब माँ के साथ जयपुर में होगी पेशी

मनी लॉन्ड्रिंग और ज़मीन घोटालों को लकेर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की मुश्किलें बढ़ती जा रही है। दिल्ली समेत लंदन में हुए लैंड स्कैम को लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) उनसे लगातार पूछताछ में जुटा है। आज यानी 9 फ़रवरी को उनसे इस मामले में तीसरी बार पूछताछ हुई।

वाड्रा को अब 12 फ़रवरी को अपनी माँ मौरीन के साथ जयपुर स्थित ईडी के ऑफ़िस में पूछताछ के लिए पेश होना पड़ेगा। वाड्रा यहाँ ईडी निदेशालय के सामने बीकानेर के कोलायत में हुए ज़मीन ख़रीद के मामले में अपना पक्ष रखेंगे।

ख़बर की मानें तो राजस्थान हाईकोर्ट ने बीकानेर ज़िले के कोलायत क्षेत्र में 275 बीघा ज़मीन ख़रीद के मामले में रॉबर्ट वाड्रा और उनकी माँ को ईडी के सामने पेश होने का निर्देश दिया था। बता दें कि ईडी ने पिछले साल नवंबर के अंतिम सप्ताह में वाड्रा को तीसरी बार समन जारी किया था, लेकिन उन्होंने उसकी अनदेखी की थी।

पेशी को लेकर वाड्रा के वकील ने दलील दी थी कि उनके मुवक्किल जाँच में सहयोग के लिए तैयार हैं, लेकिन अभी वो अपनी बेटी के इलाज के लिए इंग्लैंड जा रहे हैं। जिस पर न्यायलय ने कहा था कि दोनों पक्षों के वकील पेशी की तारीख़ खु़द तय कर लें। जिसके बाद 12 फ़रवरी को वाड्रा और उनकी माँ को इस मामले में पेशी का आदेश दिया गया।

सिर्फ हिन्दुओं के पूर्वज नहीं हैं भगवान राम.. – बाबा रामदेव

गुजरात के नडियाद में आयोजित तीन दिनों के योग शिविर में बाबा रामदेव पहुँचे हैं। यहाँ पत्रकारों द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में रामदेव ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय गौरव से जुड़ा है।

रामदेव ने आगे कहा कि भगवान राम केवल हिंदुओं के नहीं बल्कि मुस्लिमों के भी पूर्वज थे। इसके अलावा रामदेव ने कहा कि इस मुद्दे को वोटबैंक की राजनीति से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।

69% लोग राम मंदिर के समर्थन में

बता दें कि पिछले दिनों इंडिया टुडे द्वारा चुनाव से ठीक तीन महीने पहले देश भर में अयोध्या राम मंदिर निर्माण पर एक सर्वे कराया था।

इस सर्वे में हिस्सा लेने वाले देश के 69% लोगों ने कहा कि मंदिर अयोध्या में विवादित जगह पर ही बनाया जाना चाहिए। जबकि इस सर्वे में हिस्सा लेने वाले 22% लोगों ने माना कि अयोध्या में विवादित जगह पर राम मंदिर नहीं बनाया जाना चाहिए।

2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान अयोध्या में विवादित स्थान पर राम मंदिर का निर्माण एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इंडिया टुडे द्वारा कराए गए इस सर्वे में देश के 13,000 लोगों ने हिस्सा लिया। सर्वे में हिस्सा लेने वाले 67% लोगों ने यह भी माना कि मोदी सरकार को अयोध्या में विवादित जगह पर मंदिर बनाने के लिए संसद में अध्यादेश लाना चाहिए। जबकि इसी सवाल के जवाब में 24% ने कहा कि सरकार को अयोध्या में विवादित जगह पर राम मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश नहीं लाना चाहिए।

Twitter की हिम्मत! संसदीय पैनल के सामने पेश होने से किया इनकार

ट्विटर सीईओ ने संसदीय पैनल के समक्ष 11 फ़रवरी को पेश होने से इनकार कर दिया है। इस मामले में ट्विटर की तरफ से वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि संसदीय पैनल द्वारा पर्याप्त समय नहीं दिए जाने की वजह से ट्विटर, पैनल के समक्ष 11 फ़रवरी को अपना पक्ष नहीं रख पाएगा।

दरअसल, ट्विटर पर यह आरोप है कि सरकार की तरफ झुकाव रखने वाले यूजर्स की या तो पोस्ट रीच कम कर दी जाती है, या फिर ऐसे लोगों के एकाउंट्स सस्पेंड कर दिए जाते है।

5 फ़रवरी को सरकार की तरफ से संसदीय पैनल ने इस मामले में ट्विटर को एक नोटिस भेजा था। इस नोटिस में अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाने के मामले में पार्लियामेंट्री बोर्ड के सामने ट्विटर को अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया था।

इस नोटिस में ट्विटर इंडिया को 11 फ़रवरी 2019 को दोपहर 3 बजे बोर्ड के सामने पेश होने के लिए कहा गया था।

बता दें कि ट्विटर इंडिया पर अक्सर दक्षिणपंथी लेखकों के विरुद्ध एक पक्षपातपूर्ण रवैया रखने के आरोप लगते रहे हैं। विगत दिनों ट्विटर ने कुछ हैंडल्स को सिर्फ़ इस कारण से प्रतिबंधित कर दिया था क्योंकि वो दक्षिणपंथी विचारधारा रखते थे। इसके विरोध में कुछ लोगों ने ट्विटर इंडिया कार्यालय के बाहर धरना प्रदर्शन भी किया था।

हिन्दुओं की जिस परिक्रमा को अकबर ने करवा दिया था बंद, योगी सरकार ने करवाई विधिवत शुरुआत

कुम्भ 2019 कई मामलों में ऐतिहासिक है। चाहे वह अकबर के समय से बंद पंचकोसी यात्रा की शुरुआत हो या भारत को संपेरो और भिखारियों का देश समझने वाले अन्य देशों को कुम्भ में लाकर नतमस्तक कर देने की पहल। आज वही देश अपने-अपने झंडों के साथ कुम्भ को विश्व धरोहर बनाने में लगे हुए हैं। यूनेस्को तो खैर पहले ही कुम्भ को विश्व धरोहर की संज्ञा दे चुका है। मोदी के साथ-साथ योगी सरकार हर मोर्चे पर पूरी तरह मुस्तैद है।

पंचकोसी यात्रा की बात करें तो कुम्भ में आए साधु संतों का कहना है कि ये धार्मिक परिक्रमा गंगा पूजन के बाद प्राचीन काल से ही होती रही है। लेकिन 550 साल पहले ये परिक्रमा मुगल बादशाह अकबर ने बन्द करवा दी थी। जिसके बाद यह लम्बे कालखंड तक स्थगित रही। कई दशक पहले संतों के प्रयास से किसी तरह शुरू भी हुई पर बीच में ही व्यवस्था के अभाव में 1993 में फिर बंद हो गई थी।

बता दें कि दशकों पहले से रुकी हुई परिक्रमा को चालू करने के लिए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और अखाड़ा परिषद की पहल पर प्रयागराज परिक्रमा का रूट तय किया गया। प्रयागराज पंचकोसी परिक्रमा के तहत प्रयागराज के प्राचीन पावन तीर्थों की परिक्रमा की जाती है। साधु संतों की माँग पर योगी सरकार ने इस अति प्राचीन पंचकोसी परिक्रमा को फिर से शुरू किया है। संतो द्वारा मार्ग निर्धारण के बाद से पंचकोसी परिक्रमा के सभी रास्ते पुनः निर्मित किए गए। इस पहल से काशी, मथुरा और वृन्दावन की तरह अब प्रयागराज में भी श्रद्धालु परिक्रमा का लाभ उठा पाएँगे और मनोवांछित पूण्य के भागी होंगे।

प्रयागराज में पूर्व दिशा में दुर्वासा ऋषि का आश्रम है तो पश्चिम में भारद्वाज ऋषि का, उत्तर में पाण्डेश्वर महादेव विराजमान हैं तो दक्षिण में पराशर ऋषि की कुटिया बनी हुई है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार प्रयागराज पहुँचकर इन चारों पावन स्थानों के दर्शन मात्र से ही प्रयाग की परिक्रमा पूरी मानी जाती है।

दो दिन पहले, दशकों से स्थगित प्रयागराज पंचकोसी परिक्रमा की शुरुआत से संतों, महात्माओं से लेकर आम श्रद्धालुओं में भी हर्ष का वातावरण है। संगम तट पर साधु संतों और जिला प्रशासन के अधिकारियों ने परिक्रमा का शुभारम्भ गंगा आरती से की।

प्रयागराज परिक्रमा के शुभारम्भ से पहले गंगा पूजन

गंगा पूजन के बाद अक्षयवट के दर्शन के बाद ये परिक्रमा शुरू होती है। जिसमे 12 माधव मंदिरों की पूजा और परिक्रमा के साथ उपरोक्त चारो तीर्थ स्थानों को परिक्रमा पथ में शामिल किया गया है। जिला प्रशासन का कहना है कि अब से इस परिक्रमा का आयोजन प्रयागराज में हर साल माघ मेले में किया जाएगा। परिक्रमा मार्ग पर साधु संतों और श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम भी किए गए हैं।

दूसरी तरफ सरकार ने पहली बार कुम्भ में कार्य कर रहे कर्मचारियों, सफाई कर्मियों के लिए पाँच अस्थायी प्राथमिक विद्यालयों की व्यवस्था भी की है। यहाँ बच्चों को पढ़ाने के लिए टीचर हैं और मिड-डे-मील की भी व्यवस्था की गई है। शासन द्वारा दो महीने की पढ़ाई फ्री रखी गई है। साथ ही लर्निंग कॉर्नर और आंगनबाड़ी केंद्र भी खोला गया है।

मेले में सेक्टर-2 में स्थापित प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक हितेश बताते हैं कि 15 दिसंबर से कुम्भ मेला क्षेत्र में 5 सेक्टर्स में पाँच अलग-अलग स्कूल चल रहे हैं। ये वे सेक्टर हैं, जहाँ मजदूर वर्ग के कैम्प बने हैं। चूँकि उनके माता-पिता रोज काम पर निकल जाते हैं, ऐसे में उनके बच्चे इन स्कूलों में पढ़ने आते हैं। यहाँ उन्हें ड्रेस, मोजे, जूते, बैग और किताबें दी गई हैं। उन्हें फल और दोपहर का खाना भी दिया जा रहा है।