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कभी ना, कभी हाँ: 78 साल के शरद पवार फिर से लोकसभा चुनाव लड़ने को तैयार!

2018 में एक रैली के दौरान चुनाव लड़ने से मना करने वाले एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार ने संकेत दिए हैं कि वो 2019 लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं। यह फै़सला उन्होंने शुक्रवार (फरवरी 8, 2019) राज्य स्तरीय मीटिंग के बाद लिया है।

78 साल के हो चुके शरद पवार ने आगामी लोकसभा चुनावों के लिए 10 सीटों का लक्ष्य रखा है। बता दें कि अगर शरद पवार लोकसभा चुनाव में लड़ने के लिए खड़े होते हैं तो वे माढा संसदीय सीट पर ही चुनाव लड़ेंगे। साल 2009 में एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने इसी क्षेत्र से चुनावों में जीत हासिल की थी। फिलहाल, यहाँ के सांसद अभी मोहिते पाटिल हैं।

पुणे में 3 घंटे से ज्यादा देर तक चली एक मीटिंग के बाद शरद पवार के दोबारा चुनाव लड़ने का फ़ैसला लिया गया। पवार ने एनसीपी की इस राज्य स्तरीय मीटिंग के बाद कहा कि पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता और माढ़ा के सांसद विजय सिंह मोहिते पाटिल भी चाहते हैं कि वे चुनाव लड़ें।

शरद पवार ने कहा कि पार्टी के सब लोगों का कहना है कि वो उनका कहना मानेंगे। इसलिए उन्हें खुद भी कार्यकर्ताओं के फैसले को मानते हुए चुनाव लड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि वो इस बारे में सबको सोचकर सूचित करेंगे।

बता दें कि इस मीटिंग में शरद पवार, एनसीपी प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटील, छगन भुजबल और माढ़ा चुनाव क्षेत्र के सांसद विजयसिंह मोहीते पाटील मौजूद थे।

ग्राउंड रिपोर्ट #4: वो 3 नई तकनीकें, जिससे गंगा अब हो रही निर्मल

नमामि गंगे परियोजना के तहत गंगा को साफ़ करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। इनमें प्रमुख रूप से गंगा के किनारे घाटों को साफ़ करने से लेकर ‘गंगा ग्रामीण प्रहरी’ की नियुक्ति है।

इसी तरह सरकार ने गंगा के पानी को साफ़ करने के लिए भी सीवेज़ ट्रीटमेंट प्लांट के अलावा तीन नई तकनीक का इस्तेमाल किया है। इनमें प्रमुख रूप से बायोरेमीडिएशन, जियो सिंथेटिक ट्यूब और इंस्टिट्यूट रेन ट्रिटमेंट है। प्रयागराज में कुम्भ के दौरान गंदे पानी को गंगा में जाने से रोकने के लिए इन तीनों तकनीक को ट्रायल के रूप में शुरू किया गया है।

प्रयाग राज में नाले पर इंस्टिट्यूट रेन ट्रीटमेंट से पानी साफ हो रहा है

दरअसल प्रयाग राज शहर के सभी नालों से निकलने वाले पानी को सीवेज़ ट्रीटमेंट प्लांट तक ले जाना बेहद खर्चीला और मुश्किल होता है। प्रयाग राज शहर में इस समय 46 ऐसे नाले हैं, जिसका पानी सीधे गंगा में मिल रहा था। ऐसे में गंदे पानी को रोकने के लिए इंस्टिट्यूट रेन ट्रीटमेंट तकनीक के तहत 6 नाले, जियो ट्यूब तकनीक के माध्यम से 5 नाले जबकि 35 नालों को बायोरेमीडिएशन तकनीक से साफ़ किया जा रहा है।

बायो रेमीडिएशन तकनीक के जारिए प्रयाग राज में पानी को साफ़ किया जा रहा है

इन तकनीक के बारे में जानकारी देते हुए उत्तर प्रदेश जल निगम के अधिकारी पीके अग्रवाल ने बताया कि अभी इन सभी नई तकनीक का हम ट्रायल कर रहे हैं। इसके बाद एक टीम रिसर्च करेगी कि कौन सी तकनीक कम पैसे में ज्यादा बेहतर तरह से पानी को साफ़ कर रही है।

क्या हैं ये तीन तकनीक, कैसे करते हैं काम

  • इंस्टिट्यूट रेन ट्रीटमेंट : यह तकनीक नेशनल एंवायरमेंटल इंजीनियर रिसर्च इंस्टिट्यूट (नेरी) के प्रयास से प्रभाव में आई है। नमामि गंगे अधिकारियों के मुताबिक नाले के गंदे पानी को साफ़ करने के लिए कम पैसे में यह एक बेहतर तकनीक है। इस तकनीक पर काम करने वाले नेरी संस्थान के छात्र ने बताया कि यह एक तरह का पोर्टेबल एसटीपी है। इसमें सबसे पहले गंदे पानी के साथ आने वाले सॉलिड कचरे को रोकने के लिए नाले में व्यवस्था की जाती है। इसके बाद सैप्टिक टैंक व एनॉक्सिक टैंक है। इस टैंक में बैक्टीरियल ग्रोथ होती है। यह बैक्टीरिया छोटे-छोटे सॉलिड कचरे को समाप्त कर देती है। इसके बाद नाले में एरोकॉन ब्लॉक लगाया जाता है, जिसमें बैक्टीरिया आसानी से फंस जाते हैं। इसके बाद साफ़ पानी निकलता है, जिसे गंगा में जाने दिया जाता है।
  • जियो ट्यूब तकनीक : इस तकनीक के बारे में प्रधानमंत्री अपने मन की बात में चर्चा कर चुके हैं। इस तकनीक में सबसे पहले नाले के पानी से सॉलिड कचरे को अलग किया जाता है। इसके बाद पानी को डोजिंग यूनिट में लाया जाता है। इस मशीन में ही पॉलिमर को मिलाया जाता है। इसके बाद पानी में मौजूद छोटे-छोटे सॉलिड को समाप्त करने के लिए यहीं बैक्टीरिया को भी पैदा किया जाता है। इसके बाद इस पानी को जियो ट्यूब के अंदर ले जाया जाता है, जहाँ पानी में मौजूद सॉलिड कचरा ट्यूब के अंदर रह जाता है। इसके बाद साफ पानी ट्यूब से बाहर आता है। ट्यूब से बाहर आ रहे पानी को गंगा में जाने दिया जाता है जबकि ट्यूब से निकलने वाले कचरे को जलावन या खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
  • बायोरेमीडिएशन : इस समय प्रयागराज में इस तकनीक के जरिए सबसे अधिक नालों को साफ़ किया जा रहा है। इस तकनीक में नाले के अंदर कुछ-कुछ दूरी पर पानी में रूकावट के लिए साधन लगाए जाते हैं। इस तरह ठोस कचरे को बाहर कर लिया जाता है। इसके बाद पानी को एक टैंक में जमा किया जाता है। इस टैंक के पानी में बैक्टीरिया पैदा करने के लिए बैक्टो क्लीन केमिकल डाला जाता है। इसके बाद एक तरह पानी में मौजूद सभी बैक्टीरियल गंदगी यहाँ पानी से अलग हो जाता है। इसके बाद पानी को नदी में बहने दिया जाता है।

इसी कड़ी का तीसरा लेख यहाँ पढ़ें: ग्राउंड रिपोर्ट #3: दिल्ली की बीमार यमुना कैसे और क्यों प्रयागराज में दिखने लगी साफ?

इसी कड़ी का दूसरा लेख यहाँ पढ़ें: ग्राउंड रिपोर्ट #2: नमामि गंगे योजना से लौटी काशी की रौनक – सिर्फ अभी का नहीं, 2035 तक का है प्लान

इसी कड़ी का पहला लेख यहाँ पढ़ें: ग्राउंड रिपोर्ट #1: मोदी सरकार के काम-काज के बारे में क्या सोचते हैं बनारसी लोग?

कोलकाता पुलिस ने CBI के पूर्व अंतरिम निदेशक की पत्‍नी के घर पर मारा छापा

पश्चिम बंगाल में टकराव की राजनीति बढ़ती जा रही है ताज़ा मामला जुड़ा है, कोलकाता पुलिस ने सीबीआई के पूर्व निदेशक नागेश्वर राव से जुड़ी कंपनियों पर छापा मारा है से। राव के जिन ठिकानों पर पुलिस ने छापा मारा उनमे से एक सेंट्रल कोलकाता में है और दूसरा सॉल्ट लेक में उनकी पत्नी एंजेला मर्केंटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस बात की प्रबल आशंका है कि पुलिस ने ये छापा CBI द्वारा कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के घर पर मारे गए छापे का बदला लेने के लिए मारा है। इस बीच, राजीव कुमार शिलॉन्ग पहुंच गए हैं। शारदा घोटाले के सिलसिले में शनिवार को मेघालय की राजधानी में सीबीआई द्वारा उनसे पूछताछ की जाएगी।

वहीं नागेश्वर राव ने इसे पूरे छापे को एक प्रोपेगेंडा करार दिया। इससे पहले 30 अक्टूबर 2018 को उन्होंने एक बयान जारी कर एंजेला मर्केंटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड से कोई भी संबंध होने से इंकार किया था। राव ने अपनी सफाई में 2010 से लेकर बाद के वर्षों के घटनाक्रमों को सामने रखा है।

बता दें कि एंजेला मर्केंटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड (AMPL) एक गैर-बैंकिंग वित्त कंपनी (NBFC) है।  यह कथित तौर पर फ़रवरी 1994 में शुरू की गई थी। शशि अग्रवाल, प्रतीक अग्रवाल, प्रवीण अग्रवाल और सुनील कुमार अग्रवाल इस कंपनी के निदेशक हैं।

बता दें कि शारदा चिटफंड मामले की जाँच कर रहे सीबीआई के अधिकारियों को रविवार को राजीव कुमार के कोलकाता के पार्क स्ट्रीट स्थित रेजिडेंस में घुसने नहीं दिया गया और उन्हें हिरासत में ले लिया गया था। सीबीआई अधिकारी राजीव कुमार से पूछताछ करना चाहते थे।

सीबीआई के इन अधिकारियों को पहले पार्क स्ट्रीट थाने और फिर सेक्सपियर सरनी थाने में ले जाया गया था। इस पूरे बवाल के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ हल्ला बोलते हुए धरने पर बैठ गईं थीं।

रवीश जी, आर्टिकल ट्रान्सलेट करने के बाद भांडाफोड़ होने पर लेख क्यों नहीं लिखते?

पत्रकारिता के स्वघोषित चरम मानदंड ने, जो बराबर किसी न किसी अंग्रेज़ी प्रोपेगेंडा का अनुवाद हिन्दी में अपने वाल पर डालते रहते हैं ये कहकर कि हिन्दी पत्रकारिता ने हिन्दी पाठकों का नुकसान ही किया है, आज ‘द हिन्दू’ की चिरकुटई (जो आधे घंटे में धो कर सुखा दी गई) का अनुवाद किया।

वीडियो में इसी लेख को यहाँ देखें

चूँकि सरकार के ख़िलाफ़ वाली बात थी, तो हमेशा की तरह ख़बर या ख़ुलासे ‘चौंका देने वाले’ से लेकर अब ‘सन्न कर देने’ वाले तक पहुँची है। रवीश जी आजकल हर फ़र्ज़ी ख़बर का अनुवाद करते हुए सन्न हो जाते हैं, चौंक जाते हैं, अघोषित आपातकाल देखने लगते हैं, या छत पर जाकर बार-बार देखने लगते हैं कि एनडीटीवी का केबल तो अमित शाह काट नहीं रहा!

जस्टिस लोया वाली बात पर सुप्रीम कोर्ट के जवाब आने के बाद इन्होंने कोई आर्टिकल नहीं लिखा। अमित शाह के बेटे पर सवाल उठाने वाले आर्टिकल का भी अनुवाद करने के बाद इन्होंने उसके फ़र्ज़ी और ‘स्पिन-फ़्रेंडली’ पाए जाने पर कुछ ज्ञान नहीं दिया। कारवाँ द्वारा अजित डोभाल के बेटे पर सवाल उठाने वाले फ़र्ज़ीवाड़े का भी अनुवाद करने के बाद इन्होंने कोई माफ़ी नहीं माँगी।

चलिए माफ़ी भी मत माँगिए, लेकिन ये तो लिख ही सकते हैं कि चौंकाने और सन-सननन-साँय-साँय कराने से लेकर ‘बताता है कि इसकी जड़ें कितनी गहरी हैं’ वाले लेख को सत्य मानकर आपने जो ब्रह्मज्ञान अपने फ़ेसबुक वाल और प्राइम टाइम में दिया, उस पर लेटेस्ट ये चल रहा है। जब आदमी कोर्ट में केस करता है तो फिर आप ‘फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन’ पर आ जाते हैं, प्रेस फ़्रीडम पर अटैक दिखने लगता है आपको!

मतलब, आपने जो लिख दिया वही अंतिम सत्य है, और एक नागरिक को कोर्ट जाने का भी अधिकार नहीं क्योंकि आपने उस आर्टिकल का अनुवाद किया है? या आपको लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के जज तभी तक कंपीटेंट हैं जब तक वो आपके मतलब की बातें करते हैं, और बाकी समय वो बेकार हो जाते हैं? ये किस तरह का अप्रोच है?

आप आधे समय टीवी नहीं देखने की बात करते हैं, और यह भी बताते हैं कि टेलिग्राफ़ का घटिया शीर्षक कैसे नए पत्रकारों के लिए सीखने लायक है। जबकि आपको पता है कि वो सीखने लायक नहीं, खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे से आगे कुछ भी नहीं है।

आज भी आपने राफ़ेल वाले मुद्दे पर एन राम के लेख का अनुवाद करते हुए आपने विस्तार से लिख दिए। आधे घंटे में सरकार ने, उस नेगोशिएशन टीम ने और रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने ख़ारिज कर दिया। यही नहीं, आपके सामने भी तो उसी सोशल मीडिया पर उस नोट का पूरा भाग आया होगा, क्या आपने उसी नोट का सही हिस्सा कभी लगाया अपने वाल पर?

लेख लिखने के 8 घंटे बाद तक भी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिखा इनके वाल पर

या आपको लगता है कि आपने जो लिख दिया वो लिख दिया? क्या आपकी बुद्धि इतनी क्षीण पड़ गई है कि आपको ये पता नहीं चल रहा कि ‘द हिन्दू’ ने जानबूझकर ऊपर और नीचे के हिस्सों को क्रॉप कर दिया था? क्या आपने कहीं ये लिखा कि इससे एन राम की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है?

आपने नहीं लिखा, क्योंकि वो आपको सूट नहीं करता। हो सकता है आप शाम में प्राइम टाइम भी कर दें, और ये साबित करने में तैंतीस मिनट निकाल दें कि ‘अगर इतना कुछ हो रहा है तो जाँच क्यों नहीं करा लेती सरकार’? जबकि, आपको अच्छे से पता है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपना निर्णय दे दिया है। आपको अच्छे से पता है कि रक्षा मसलों को पब्लिक में गोपनीयता और द्विपक्षीय संधियों के कारण नहीं रखा जा सकता।

लेकिन इससे आपका मन नहीं भरता। क्योंकि आप लगातार झूठ की चाभी टाइट करके अपने करियर को रेंगने के लिए ऊर्जा दे रहे हैं। जब पूरे भारत में बिजली आती है तो आप चौंतीस मिनट बताते हैं कि तीन गाँव में तो नहीं आई। इस बात पर आप तीन मिनट ही बोलते कि ‘सरकार का दावा गलत है, लेकिन बिजली पहुँचाना एक बहुत बड़ी बात है’, तो भी समझ सकता था।

झूठ बोल कर निकल लेना आपकी आदत और मजबूरी दोनों ही है। आप आज के प्राइम टाइम में फिर से यही बात कहेंगे कि ‘जाँच से पीछे क्यों हट रही है सरकार’। आपको देखने वाले रवीश भक्त भी सोशल मीडिया पर बवाल काट देंगे कि ‘हाँ भाई, जाँच से क्यों भाग रही है सरकार’। जबकि आप जानते हैं, आप ये कहते रह सकते हैं, क्योंकि जो जाँच होनी थी वो हो गई, बस आपको मैग्निफाइंग ग्लास लेकर राफ़ेल के कॉकपिट में राहुल गाँधी के साथ बुलाना रह गया है!

पत्रकारिता सरकार के विरोध में ही नहीं होती, पत्रकारिता समाज को सूचित करने को कहते हैं। सरकार की ख़ामियों को भी बताइए, और उपलब्धियों को भी। उपलब्धियों के प्रतिशत में हेर-फेर लगे तो बत्तीस मिनट उपलब्धि पर बोलकर, तीन मिनट बताइए कि डेटा गलत दे रही है सरकार। मैं अब ये नहीं कहता कि मैं रवीश का प्राइम टाइम देखा करता था, क्योंकि अब आपने सुधरने की उम्मीद छोड़ दी है। मतलब, संभावना नहीं दिखती।

आपको तो अनुभव है इतना कि आप पत्रकारिता की नई परिभाषा गढ़ सकते हैं। एन राम जैसे लोगों का पतन देखकर लगता है कि पत्रकारिता विचारधारा से ऊपर कभी नहीं उठ सकती। ये लोग स्तम्भ हुआ करते थे, लोग आपके रिपोर्ट की क़समें खाते थे, आईएएस बनने की इच्छा रखने वाले इसी ‘हिन्दू’ को पढ़कर इंटरव्यू में कोट करते थे।

अब यही एन राम, यही हिन्दू और यही रवीश कुमार हर दिन ऐसे कारनामे कर रहे हैं कि मुझे कोई कल को पूछे कि पत्रकारिता में क्या नहीं करना चाहिए तो इनके नाम बताने में झिझक नहीं होगी। आप और आपका गिरोह पत्रकारिता के नाम पर कलंक है। आप टीवी पर आने वाले एक अवसादग्रस्त व्यक्ति हैं, पत्रकार नहीं।

आपको आयुष्मान योजना का लाभ लेकर मनोचिकित्सक से मिलना चाहिए, उसके बाद अपने पुराने संस्थान में लौटकर, नए लोगों से बात करनी चाहिए। और अंत में अपनी ही रिपोर्ट देखनी चाहिए जो आपने नौकरियों पर की, एसएससी पर की, गाँवों पर की, राजनीति पर की। आप वो कार्यक्रम देखिएगा जो आपने राजनीति पर की, न कि किसी नेता या पार्टी पर।

एयर मार्शल प्रमुख एसबीपी सिन्हा ने कहा ‘हिंदू रिपोर्ट राफ़ेल डील को खराब करने का प्रयास है’

राफ़ेल सौदे में भारत की तरफ़ से कीमतों को तय करने वाली टीम का नेतृत्व करने वाले एयर मार्शल एसबीपी सिन्हा ने कहा कि एयर- II के उप सचिव एसके शर्मा इस टीम का हिस्सा नहीं थे।

एयर मार्शल एसबीपी सिन्हा ने राफ़ेल सौदे के लिए भारतीय वार्ता टीम (INT) का नेतृत्व किया था। उन्होंने राफ़ेल मुद्दे पर द हिंदू की रिपोर्ट पर आश्चर्य व्यक्त किया है। सिन्हा ने कहा इस रिपोर्ट में तथ्यों को छिपाकर पेश किया गया है। सिन्हा ने आगे यह भी कहा कि इस तरह के लेख राफ़ेल सौदे को खराब करने का प्रयास है।

एसपी सिन्हा ने कहा कि हिन्दू में इस मामले में लेख लिखने वाले एसके शर्मा इस टीम का हिस्सा ही नहीं थे। सिन्हा ने लेख पर सवाल उठाते हुए कहा कि शर्मा ने रक्षा सौदे को बिगाड़ने के लिए कहीं किसी के इशारे पर यह लेख तो नहीं लिखा है?

दरअसल इंडियन नेगोशिएटिंग टीम (INT) का नेतृत्व भारतीय वायु सेना के उप-प्रमुख द्वारा किया गया था। संयुक्त सचिव और अधिग्रहण प्रबंधक (वायु), संयुक्त सचिव (रक्षा ऑफसेट प्रबंधन विंग), संयुक्त सचिव और अतिरिक्त वित्तीय सलाहकार इस टीम के हिस्सा थे। इसके अलावा वायु स्टाफ के सहायक प्रमुख (योजना) सदस्य के रूप में, प्रबंधक (वायु) सलाहकार (लागत) भी इस टीम में होते हैं।

ऐसे में यह आश्चर्य की बात है कि एसके शर्मा जब इस दल के हिस्सा ही नहीं थे, तो उन्हें राफ़ेल डील से जुड़ी कोई जानकारी कैसे हो सकती है।

उन्होंने यह भी कहा कि द हिंदू के लेख में जो लिखा गया है वह राफ़ेल डील से जुड़ी आंतरिक सूचना है। ऐसे में एयर II के उप सचिव एसके शर्मा को डील से जुड़ी जानकारी नहीं है तो उन्होंने बगैर किसी तथ्य के यह लेख कैसे लिखा यह सोचने वाली बात है।

यह एक आतंरिक नोट है। एसपी सिन्हा ने यह भी कहा कि इस नोट का भारतीय निगोशिएशन टीम से कोई लेना-देना नहीं है। संयुक्त सचिव और एक्वीजीशन मैनेजर (एयर) ने भारतीय निगोशिएशन टीम का हिस्सा होने के बावजूद उस नोट को कैसे आगे बढ़ाया जिसे रक्षा मंत्रालय ने ख़ारिज कर दिया था। निगोशिएशन टीम को बताए बगैर उन्होंने ऐसा करके रक्षा मंत्रालय के नियमों का उल्लघंन किया है।

‘द हिंदू’ की राफ़ेल कहानी का उल्लेख करते हुए, एसपी सिन्हा ने यह भी कहा कि यह लेख तथ्यों को छिपाकर 36 राफ़ेल जेट की खरीद के लिए हुई बातचीत को खराब करने का प्रयास था। उन्होंने कहा कि नोट एक आंतरिक मामला था और इसका भारतीय वार्ता टीम से कोई लेना-देना नहीं था।

सिन्हा की मानें तो अखबार में छपी बातों का राफ़ेल के मूल्य निर्धारण से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि यह बातचीत न केवल मूल्य निर्धारण के लिए बल्कि अन्य चीजों के लिए भी है। उन्होंने अखबार में छपी खबर के बारे में कहा कि यह संप्रभु गारंटी और सामान्य नियमों और शर्तों के बारे में था। इससे ज्यादा इसका निगोशिएशन से कुछ लेना देना नहीं है।

राहुल गाँधी के नित्य उड़ते ‘राफ़ेल’ और देश की धूमिल होती छवि

जोसेफ गोएबल्स का एक कथन है कि झूठ को इतनी बार बोलो कि वह सच बन जाए। दुर्भाग्य से कॉन्ग्रेस पार्टी आजकल यही कर रही है। राफ़ेल खरीद को लेकर कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी इतने झूठ बोल चुके हैं कि उन्हें लगता है कि उनकी कही गई किसी भी बात को अब सच मान लिया जाएगा। लेकिन अपने इन सैकड़ों झूठ के पीछे की सच्चाई या तो राहुल गाँधी समझ नहीं पा रहे हैं या समझने से जी चुरा रहे हैं।

किसी भी देश की रक्षा व्यवस्था उसके समूचे सुरक्षा ढाँचे का महत्वपूर्ण अंग होता है। आजकल पारंपरिक युद्धों का ज़माना तो रहा नहीं फिर भी जल, थल और नभ में तैनात बड़े और भारी भरकम हथियार आयुध भंडार की शोभा बढ़ाते हैं। बड़ी-बड़ी मिसाइलें, विमान वाहक युद्धपोत, परमाणु पनडुब्बियाँ, और युद्धक विमान शत्रु को पहले हमला न करने देने के मकसद से बनाए जाते हैं। इसे हम ‘deterrence’ कहते हैं। आज विश्व का पूरा हथियार उद्योग इसी ‘deterrence’ पर टिका हुआ है।

भारत को किन देशों से खतरा है यह ऐसे नहीं समझ में आता। जब हम दक्षिण एशिया का सामरिक मानचित्र देखते हैं तब समझ में आता है कि पाकिस्तान और चीन ने अपने आयुध भंडार में हमारे विरुद्ध कितने सारे हथियार जमा कर लिए हैं। इसी कारण भारत को भी दक्षिण एशिया में अपनी सुरक्षा को मज़बूत करने के लिए मिसाइलों, एयरक्राफ्ट करियर और परमाणु क्षमता वाले युद्धक विमानों की आवश्यकता है।

भारतीय वायुसेना में कम से कम 44 स्क्वाड्रन की आवश्यकता है लेकिन हमारे पास अभी केवल 32-35 स्क्वाड्रन हैं। अटल जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए वायुसेना की स्क्वाड्रन बढ़ाने के लिए राफ़ेल विमान खरीद को मंज़ूरी दी थी। रक्षा क्षेत्र में खरीद और तकनीकी हस्तांतरण की नीति भारत में एक दिन में नहीं उपजी बल्कि विगत दो दशकों में इसका क्रमिक विकास हुआ।

दरअसल सन 2001 से पहले भारत के पास कोई स्थाई रक्षा खरीद एवं प्रबंधन की लिखित प्रक्रिया नहीं थी इसीलिए बोफोर्स और अन्य घोटाले सामने आते थे या होने की आशंका बनी रहती थी। 2001 के बाद रक्षा मंत्रालय ने क्रमशः 15 वर्ष, 5 वर्ष और सालाना एक्वीजीशन प्लान के अंतर्गत नीतियाँ बनाईं और यह निर्धारित किया कि हमें क्या कब और किस मात्रा में खरीदना है।  

सन 2001 में पहली बार Defence Procurement Management Structures and Systems बनाया गया और उसके बाद 2002 में पहली बार Defence Procurement Procedure (DPP) दस्तावेज़ तैयार हुआ। इस दस्तावेज़ में तब से अब तक कई संशोधन हो चुके हैं। अंतिम DPP 2016 में जारी हुई थी। राफ़ेल की खरीद और ऑफसेट नीति इसी दस्तावेज़ की नियमावली पर आधारित है जिसके अनुसार वर्ष 2019 के अंत तक राफ़ेल युद्धक विमानों की पहली खेप भारतीय वायुसेना को मिल जाएगी।

ऑफसेट नीतियों के अनुसार रिलायंस और अन्य कंपनियों को विमान के पार्ट बनाने का ठेका और अन्य तकनीक हस्तांतरित की जाएगी। लेकिन राहुल गाँधी ने राफ़ेल की खरीद पर लगातार अनर्गल बचकाने बयान और आरोपों की झड़ी लगाते हुए 18 वर्षों में हुई इस प्रगति की छवि उसी तरह धूमिल करने का प्रयास किया जैसे उनके पिताजी ने बोफोर्स खरीद में हुए घोटाले के आरोपी क्वात्रोच्चि को भगाकर किया था।

आखिर प्रधानमंत्री पर अपने बेसिरपैर के आरोपों से राहुल गाँधी क्या सिद्ध करना चाहते हैं? यही कि उन्हें भारत का मानचित्र देखने की भी फुर्सत नहीं है? या फिर वो यह बताना चाहते हैं कि देखो कॉन्ग्रेस की सरकार में एक अदद रक्षा खरीद नीति तक नहीं निर्मित हो पाई थी? स्पष्ट है कि राहुल गाँधी को देश की सामरिक ताक़त बढ़ने से कोई मतलब नहीं है। वो केवल ढेला फेंक कर भागने वाली टुच्ची राजनीति करने में मशगूल हैं। और इस कृत्य में उन्होंने एन राम जैसे खलिहर पत्रकारों को भी मिला लिया है।

वैसे राहुल गाँधी की अधिक गलती भी नहीं है। उनके ख़ानदान में तो सेना के मनोबल को गिराने वाले प्रधानमंत्रियों का इतिहास रहा है। नेहरू के समय ही जीप घोटाला हुआ, इंदिरा गांधी के समय 1971 का युद्ध जीतने के पश्चात् वन रैंक वन पेंशन खत्म कर दी गई थी। कहते हैं कि जब जनरल सर रॉय बुचर डिफेंस मॉडर्नाइजेशन का प्लान लेकर नेहरू के पास गए थे तो नेहरू ने उनसे कहा था कि भारत को सेना की ज़रूरत ही नहीं है। यह नेहरूवियन मानसिकता ही है जिसके कारण देश में रक्षा-सुरक्षा विषयों के उत्कृष्ट जानकार पत्रकारों की कमी है। जो हैं वे लुटियन दिल्ली में बैठकर सेना की एक टुकड़ी के एक मूवमेंट को सैन्य तख्तापलट साबित करने का षड्यंत्र रचते हैं।     

2004-14 तक सोनिया गाँधी सत्ता में प्रत्यक्ष दखलंदाज़ी करती थीं, तो ऐसा क्या हुआ था कि डॉ मनमोहन सिंह ने अंतिम चरण में पहुँच चुकी (कॉन्ग्रेस के अनुसार) राफ़ेल डील पर हस्ताक्षर नहीं किए? इसका जवाब राहुल गांधी क्यों नहीं देते? डॉ मनमोहन सिंह ने अपने  कार्यकाल में किससे पूछ कर भारत-पाक के मध्य ‘सॉफ्ट बॉर्डर’ बनाने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया था? सियाचेन का विसैन्यीकरण कर नियंत्रण रेखा को स्थाई सीमा बनाने का विचार मनमोहन सिंह के दिमाग में कैसे आया था? राहुल गांधी को बचकाने सवालों के राफ़ेल उड़ाने से पहले इन सवालों के जवाब देने चाहिए।

लाशों में गौ सेवा और शराब ले आने वाले संवेदनहीन अखिलेश अपने समय की 33 मौतें भूल गए

उत्तर प्रदेश में ज़हरीली शराब को पीने के कारण सहारनपुर के अलग-अलग गाँवों में 16 लोग और कुशीनगर में 10 लोग अपनी जान से हाथ धो चुके है। यूपी में इन ज़हरीली शराबों की वजह से कुल 26 मौतें हो चुकी हैं। साथ ही दर्जनों लोग अस्पताल में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं।

ज़ाहिर है ऐसे संवेदनशील मामले पर सरकार द्वारा सख़्त कार्रवाई की जानी चाहिए। इसलिए प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने मामले में सख़्ती बरतते हुए जिलाधिकारियों को जल्द कार्यवाई करने के आदेश भी दिए हैं।

एक तरफ जहाँ इन घटनाओं से प्रदेश में दहशत फैली हुई है और प्रशासन में भी हड़कंप मचा हुआ हैं, वहीं मौके का फ़ायदा उठाते हुए पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने इस मामले पर भी राजनीति करनी शुरू कर दी। ज़हरीली शराब के कारण लगातार हो रहीं मौतों के बीच अखिलेश ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर तंज कसते हुए इन मौतों का ज़िम्मेदार मुख्यमंत्री योगी और उनकी सरकार को बताया।

अखिलेश के बयान पर बात करने से पहले बता दें कि कुछ दिनों पहले यूपी सरकार ने पूरे राज्य में गोशालाएँ बनाने के लिए गौ कल्याण उपकर (सेस) लगाने का फ़ैसला किया था। इसके तहत 0.5 प्रतिशत सेस शराब के अलावा यह ‘कर’ उन सभी वस्तुओं पर है, जो उत्पाद कर के दायरे में आती हैं। लेकिन अखिलेश ने सरकार के फैसले को अपने बयान के साथ खूब तोड़-मरोड़ कर पेश किया।

अखिलेश ने लखनऊ स्थित सपा के दफ्तर में कहा कि योगी सरकार ने शराब पर गौ कल्याण टैक्स लगाया है। सरकार ने लोगों को लालच दिया है कि गाय सेवा सिर्फ़ तभी अच्छी होगी जब लोग शराब ज्यादा पिएँगे। अखिलेश का कहना है कि ग़रीब को नहीं पता है कि उसे कौन-सी शराब पीनी है। लेकिन सरकार को सब पता है, शराब पीने वालों को बढ़ाना चाहती है। उनका मानना है कि सरकार को यह भी पता है कि कौन ऐसी ज़हरीली शराब बना रहा है।

अखिलेश यादव के ऐसे बयानों को सुनकर लगता है कि योगी सरकार पर लगातार किसी भी मामले में, किसी भी तरह से आरोप लगाने वाले पूर्व सीएम अपना समय भूल गए हैं। योगी सरकार पर उँगली उठाने वाले अखिलेश भूल रहे हैं कि उनके राज में उन्नाव और लखनऊ में 33 लोगों की मौतें ज़हरीली शराब पीने से हुई थी। इसके बाद तात्कालीन सरकार और प्रशासन की ओर से काफ़ी बड़े-बडे़ दावे भी किए गए थे।

ऐसे में अखिलेश का इस मामले पर योगी सरकार को घेरना बेहद शर्मनाक है क्योंकि अखिलेश भी ऐसी स्थिति का सामना अपने शासनकाल में कर चुके हैं। जिनका सामना आज योगी आदित्यनाथ की सरकार कर रही है। अगर कोई शख़्स अपने घर पर शराब पी ले और उसे कुछ हो जाए तो उसकी ज़िम्मेदारी राज्य की नहीं होती। स्थिति को सुधारने पर बात करने से ज़्यादा अखिलेश का सरकार पर आरोप मढ़ना दर्शाता है कि वो सिर्फ़ मौक़ापरस्त राजनीति को हवा दे रहे हैं।

ज़हरीली शराब पीने से कई राज्यों में कभी न कभी दुर्भाग्यपूर्ण मौतें होती रही हैं। ऐसे लोगों पर, जो ऐसी शराब बनाते हैं, किसी सरकार ने एक्शन लिया होगा, किसी ने नहीं। ये हमें पता नहीं चलता क्योंकि मीडिया मौत की संख्या बता कर, सरकारों को कोस कर नए मुद्दे तलाशने में लग जाती है।

ख़ैर, अच्छा होता कि अखिलेश यादव अपनी संवेदनहीनता को, अपने समय में मौत होने के बावजूद, इस बात तक ही सीमित रखते कि उत्तर प्रदेश में ज़हरीली शराब कौन बना रहा है। उनका ये सवाल उचित होता कि प्रशासन आख़िर क्यों इन शराब की भट्टियों को चलने देता है। अगर वो लाइसेंस वाले हैं, तो अखिलेश यादव उन पर हत्या के मुक़दमे चलाने की बात कर सकते थे।

लेकिन नहीं, इन तार्किक बातों को छोड़कर उन्होंने लोगों की मौत को गाय और राजस्व से जोड़ दिया। इस तरह की बयानबाज़ी बताती है कि अखिलेश को लोगों की मौत से कोई लेना-देना नहीं, उन्हें बस मुस्कुराते हुए मज़े लेने की आदत है क्योंकि आजकल बुआ-बबुआ गठबंधन के बाद खाली बैठे हैं।

दलाल, हरामज़ादा, पूतना, दरिंदा, चोर, भड़वा आदि आराम से क्यों बोलने लगे हैं हमारे नेता?

हम, आप, बाकी पूरी दुनिया के समझदार लोग कई बात कई बार बोलते हैं जिनमें से ‘मानवता हुई शर्मसार’ सबसे ज्यादा बार इस्तेमाल होता है। मानवता के शर्मसार होने का एक राजनैतिक समकक्ष भी है जो हम आम लोग और राजनेता भी बार बार इस्तेमाल करते हैं: ‘पॉलिटिक्स हैज़ टच्ड अ न्यू लो’ या राजनीति ने नए न्यूनतम स्तर को छू लिया है। 

अगर ये बात बार-बार कही जा रही हो तो इसका मतलब है कि दिनोंदिन राजनीति गिरती ही जा रही है। राजनीति से यहाँ मतलब नेताओं की बयानबाज़ी से है। हमेशा कोई आकर कुछ ऐसा बोल जाता है कि लगता है इससे बुरा कोई क्या बोलेगा आज के दौर में। ताज़ातरीन बयान है गिरिराज सिंह द्वारा ममता बनर्जी को ‘पूतना‘ और ‘किम जोंग उन‘ कहने का। 

अभी एक ख़बर आई कि गिरिराज सिंह ने ममता बनर्जी को ‘पूतना’ और ‘किम जोंग उन’ कहा है। भाजपा समर्थकों और ममता विरोधियों को ऐसे बयान सुनकर बहुत आनंद मिलने लगता है, लेकिन ऐसे बयानों को बढ़ावा देने से बचना चाहिए। इस तरह के बयान देकर आप कल को मर्यादा और गरिमा नामक शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते।

ये बयान कम और बेहूदगी ज़्यादा है। इस तरह के कई बयान भाजपा नेताओं ने कई बार दिए हैं। कभी बेकार की बातों पर पाकिस्तान भेजने की बात, तो कभी ‘रामजादा‘ कहना, भाजपा और सहयोगी दलों के कुछ नेता इस तरह के वाहियात बातें कहने के लिए ही ख्याति प्राप्त करने लगे हैं। ऐसे ही राहुल गाँधी ने राफ़ेल जपने, ‘चौकीदार चोर है‘ कहने से पहले, सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीति करते हुए मोदी को ‘ख़ून की दलाली‘ करने वाला कहा था। 

बात मोदी या भाजपा, राहुल या काँग्रेस की नहीं है। भाजपा ने भी ऐसे ही विचित्र बयान दिए हैं जिससे शर्मसार राजनीति और भी शर्मसार होती चली गई है। सोनिया गाँधी का ‘ज़हर की खेती‘ वाला बयान भी सामने आता है। फिर याद आता है केजरीवाल का ट्वीट जिसमें उन्होंने मोदी को ‘कायर और विकृत मानसिकता वाला‘ (कावर्ड एण्ड अ साइकोपाथ) कहा था। 

इसी श्रृंखला में देखिए तो मोदी द्वारा लिए गए नए-नए नाम, ‘रोज़ जंगलराज का डर‘ (RJD), ‘जनता का दमन और उत्पीड़न‘ (JDU) याद आता है। फिर नितीश का ‘बड़का झूठा पार्टी‘ (BJP) याद आता है। मोदी का मज़े लेकर ‘शहज़ादे‘, ‘50 करोड़ की गर्लफ़्रेंड’, ‘जीजाजी‘ बोलना भी याद आता है। काँग्रेस का मोदी को अपनी ‘माँ और बीबी को छोड़ने वाला‘ कहना आदि याद आता है। बात पार्टी से नेता और फिर एकदम निजी स्तर तक पहुँच गई।

ये क्यों होता है? आज के दौर में इंटरनेट, और आम जनता जो समाचार देखती-पढ़ती है, दो खेमें में बँट जाती है। सब एक विचारधारा पकड़ लेते हैं। एक आदमी या तो राष्ट्रभक्त है, या राजद्रोही। ये दोनों परिभाषाएँ भी ये खुद तय करते हैं। कोई मोदी भक्त है, कोई आपटार्ड है। कोई राहुल गाँधी को पप्पू कहता है, कोई केजरीवाल को युगपुरूष, कोई मोदी को फेंकू। 

बातचीत का स्तर हर दिन गिरता जा रहा है और इसी को हमारे नेता भुना रहे हैं। जहाँ एक गाली देकर काम चल जाए, वहाँ लंबा भाषण क्यों दें? जहाँ सिर्फ चुटकुलेबाजी से काम चल जाए वहाँ कोई विकास के मुद्दे पर क्यों बोलेगा? जहाँ आदमी हिंदू राष्ट्र माँग रहा है वहाँ नवाजुद्दीन के रामलीला से निकाले जाने पर वो क्यों दुखी होगा?

जहाँ लोगों को प्रधानमंत्री की हर बात झूठी लगती है वो आखिर सेना की नीयत पर सर्जिकल स्ट्राइक के विडियो माँगकर संदेह क्यों नहीं प्रकट करेगा? जहाँ ये बोलकर ही काम चल जाए कि मोदी हमें काम करने नहीं देता वहाँ काम करने की क्या जरूरत है क्योंकि आपकी पार्टी के समर्थक तो इसी में ख़ुश हैं! जहाँ लोग ‘पचास हजार करोड़ चइए कि साठ हजार करोड़?’ पर ही ताली पीट ले रहे हों, वहाँ विकास की बात करके क्या मिलेगा?

एक दौर था जब विपक्ष सत्तारूढ़ की इज़्ज़त करता था और उनसे इज़्ज़त पाता था। एक दौर था जब विपक्ष के नेता सत्ता के नेताओं की बड़ाई करते थे, और उन्हें भी वापस में वही सम्मान मिलता था। आज टीवी और सोशल मीडिया के दौर में बड़ा, शक्तिशाली और समझदार वो है जो सामने वाले को सबसे विचित्र और गिरे हुए संबोधनों से नवाजता है। 

आज समर्थक ‘रामजादा’ और ‘साइकोपाथ‘ दोनों को अपने अपने हिसाब से डिफ़ेंड करते हैं क्योंकि उन्हें सामने वाले का कहा गाली लगती है और अपने नेता वाला सटीक चित्रण। आज ज़हर की खेती, ख़ून की दलाली, सूटबूट की सरकार आदि का प्रयोग वो भी कर रहे हैं जिनके हाथ हर तरह के दंगों और सेना से संबंधित घोटालों से सने हैं।

इस तरह के बयानों को अगर ग़ौर से देखें तो पाएँगे कि ये तब आते हैं जब सामने वाला अपनी हार मान चुका होता है। जब सामने वाले को लगता है कि इस चुनाव में बाकी बातों से हमारे लोग हमें वोट नहीं करेंगे तो ‘रामजादा’ आता है। जब अपनी कमी छुपानी होती है तो ‘साइकोपाथ’ आता है। जब अपनी हार सुनिश्चित दिखती है तो ‘ज़हर की खेती’ याद आती है। 

ये जुमले डेस्पेरेशन की पैदाइश हैं। भले ही आप मुझे ‘संदर्भ’ और बाकी बातें समझाने लगें, लेकिन राजनैतिक मर्यादा की बात करने वाले लोगों को, या उनकी पार्टी से जुड़े केन्द्रीय मंत्रियों के इस तरह से किसी भी नेता के लिए बोलना राजनीति नहीं, एक गलत सोच का नतीजा है।

हजार लोग तालियाँ बजा देंगे, सोशल मीडिया पर शेयर भी हो जाएगा, लेकिन फिर राहुल गाँधी द्वारा अपशब्द कहने, आँख मारने, या ‘चोर’ आदि कहने पर आपको मर्यादा और सीमाओं की बात नहीं करनी चाहिए। पब्लिक में नेता क्या बोलता है, क्या करता है, इससे जनता प्रभावित होती है। हो सकता है कि ऐसी ही बातें करते हुए वोट भी मिलते हों, लेकिन इससे राजनैतिक बयानबाज़ी का स्तर नीचे ही गिरता है, और प्रोत्साहन मिलते रहने से वो सुधरने से तो रहा। 

आज के दौर में जब दुनिया स्त्री अधिकारों को लेकर, उनके शोषण आदि को लेकर सजग हो रही है, और उस पर बातें हो रही हैं, तब ऐसी बयानबाज़ी किसी को मदद नहीं पहुँचा सकती। 

ऐसा भी नहीं है कि गिरिराज सिंह ने जो कहा वो संदर्भ बताने पर सही नहीं है, क्योंकि विपक्ष ने तो मोदी को हिटलर से लेकर ज़हर की खेती करने वाला, चूहा, मास मर्डरर, दरिंदा, भड़वा, मेंढक, दिमाग़ी रूप से दिवालिया, मौत का सौदागर, बर्बादी लाने वाला, रावण, यमराज, और पागल कुत्ता तक कहा है। इसके बावजूद, इस तरह की बातें एक केन्द्रीय मंत्री के मुँह से शोभा नहीं देती। 

ख़ास कर तब, जब आपके पास विपक्ष को घेरने के लिए तमाम आँकड़े हैं, तथ्य हैं, और अपनी पार्टी के किए गए कामों की लम्बी फ़ेहरिस्त है। पार्टी को चाहिए कि इस तरह की बयानबाज़ी करने वाले नेताओं पर रोक लगाए, क्योंकि विपक्ष और वामपंथी मीडिया ऐसे बयानों के लेकर उड़ने के लिए बैठा रहता है। जब नैरेटिव बनाने का समय आए तब ऐसी बेकार की बात करते हुए किसी और को बेलने का मौका देना समझदारी तो बिलकुल नहीं। 

ये स्तर कितना नीचे जाएगा कोई नहीं जानता। हो सकता है किसी दिन माँ-बहन की गालियाँ भी सुनने को मिले क्योंकि अब वही बचा है। किसी दिन संसद में मोदी को राहुल चप्पल मार दें, या मोदी राहुल को, ये भी संभव हो सकता है। अब सारी गणना चुनाव को जीतने नहीं, किसी भी तरह जीतने पर आ गई है। अब आपको चुनावी रणनीतिकार के हिसाब से चलना होता है जो कि हावर्ड में पढ़कर आया है, वो आपसे वो भी करवा लेगा जो आपने सोचा भी नहीं होगा।

वो भी सिर्फ एक सवाल के बल पर: आपको चुनाव जीतना है या नहीं?

आंध्र CM नायडू ने ₹1 करोड़ आंदोलन पर खर्च किया, जबकि आँगनबाड़ी सेविकाओं को नहीं मिल रहा वेतन

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने मोदी सरकार के ख़िलाफ़ विरोध के लिए ₹1 करोड़ रुपए खर्च किए, जबकि राज्य की आँगनबाड़ी कर्मचारियों को समय से सरकार वेतन भी नहीं दे पा रही है।

इंडिया टुडे ने अपने रिपोर्ट में इस बात का दावा किया है कि आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए राज्य सरकार ने दिल्ली में केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन किया। इस आंदोलन में हिस्सा लेने वाले लोगों के यातायात की व्यवस्था राज्य सरकार द्वारा की गई थी।

तेलुगू देशम पार्टी (TDP) समर्थकों को दिल्ली भेजने के लिए दो ट्रेनों की बुकिंग राज्य सरकार द्वारा की गई थी। केंद्र सरकार के विरोध के लिए यातायात पर हुए एक करोड़ रूपए के खर्च राज्य सरकार ने वहन किए।

इंडिया टुडे ने अपने रिपोर्ट में इस बात का भी दावा किया है कि आंध्र सरकार भले ही आंदोलन पर सरकारी खजाने से पैसे खर्च कर रही हो, लेकिन राज्य के आँगनबाड़ी कर्मचारियों को समय से वेतन देने के लिए सरकार के पास पैसा नहीं है।

यही नहीं आंध्र प्रदेश आँगनबाड़ी कर्मचारी संगठन के सचिव ने बताया कि पिछले तीन महीने से राज्य के आँगनबाड़ी कर्मचारियों को समय से वेतन नहीं मिल पा रहा है। सचिव ने ये भी बताया कि कई बार राज्य के मुख्यमंत्री को इस संदर्भ में लिखा जा चुका है, बावजूद इसके इस मामले पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।

इसके अलावा राज्य के आंगनबाड़ी सचिव का यह भी कहना है कि सरकार नई स्कीम लॉन्च करे, यह अच्छी बात है परंतु पहले हम कर्मचारियों को समय से पैसा मिले यह ज्यादा जरूरी है।

जानकारी के लिए बता दें कि मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने लगभग 9,400 करोड़ रुपये की राशि ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं और बच्चों के विकास ( DWACRA) की नई स्कीम में देने की घोषणा की थी।

इस स्कीम के तहत ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं और बच्चों के विकास के लिए काम करने वाली सभी महिलाओं के लिए 10,000 रुपये की देने की घोषणा मुख्यमंत्री द्वारा की गई थी। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि नई स्कीम को सरकार कैसे लॉन्च कर पाएगी जब राज्य भर के आँगनबाड़ी में काम कर रहे कर्मचारियों को समय से सरकार पैसा ही नहीं दे पा रही है।

शारदा, नारदा के लुटेरों को चौकीदार छोड़ेगा नहीं: ममता के गढ़ में मोदी की हुंकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ममता बनर्जी के गढ़ में हुंकार भरते हुए आगामी लोकसभा चुनाव के लिए शंखनाद कर दिया। प्रधानमंत्री ने भगवान शिव को याद करते हुए अपने भाषण की शुरूआत की और कहा कि इस पूरे क्षेत्र को महादेव का, भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त है और मैं जलपेशधाम की धरती पर भोलेनाथ के चरणों में श्रद्धा पुष्प अर्पित करता हूँ। उत्तरी पश्चिम बंगाल स्थित जलपाईगुड़ी के मयनागुड़ी में पीएम ने विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए वहाँ की संस्कृति से लेकर विकास योजनाओं तक की चर्चा की।

नरेंद्र मोदी ने ममता के गढ़ में हुंकार भरा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के प्रमुख अंश आप नीचे पढ़ सकते हैं:

  • अब से थोड़ी देर पहले, क़रीब 2 हज़ार करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले ‘फलाकाता- सलसलाबाड़ी’ नेशनल हाईवे की फोर लेनिंग के प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया गया है। जब ये प्रोजेक्ट पूरा हो जाएगा तो इससे सिलीगुड़ी आने-जाने के लिए सुविधा बढ़ जाएगी।
  • आपका जीवन आसान बनाने के लिए, इन क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को मज़बूत करने के लिए केंद्र सरकार निरंतर काम कर रही है। यहाँ नेपाल और बांग्लादेश की सीमा को जोड़ने वाले एशियन हाईवे नंबर 2 और नंबर 48 समेत हज़ारों करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट केंद्र सरकार ने स्वीकृत किए हैं।
  • आज आपकी दशकों पुरानी एक और माँग पूरी हुई है। थोड़ी देर पहले ही कलकत्ता हाईकोर्ट की जलपाईगुड़ी खंडपीठ का उद्घाटन किया गया है। इस खंडपीठ के लिए जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, कलिंगपोंग, कूच बिहार और इस क्षेत्र के सभी बहनों-भाइयों को बहुत-बहुत बधाई।
  • अब आपको हाईकोर्ट से जुड़े अपने मामलों के लिए कोलकाता नहीं जाना पड़ेगा, यहीं जलपाईगुड़ी में ही आपको समाधान मिलेगा। इससे समय की बचत तो होगी ही, आपका पैसा भी बचेगा।
  • आप सभी साक्षी हैं कि सिलीगुड़ी म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के साथ क्या बर्ताव किया जा रहा है? नॉर्थ बंगाल की क़ानून व्यवस्था की स्थिति क्या है? यहाँ उद्योग-धंधे विकसित नहीं किए गए, युवा पलायन के लिए मजबूर हैं। सिंचाई की परियोजनाएँ लटकी हुई हैं, ये हाल बनाकर रखा गया है।
  • पश्चिम बंगाल की इस सरकार ने माटी को बदनाम कर दिया है और मानुष को मजबूर कर दिया है। जो पश्चिम बंगाल कला और संस्कृति के लिए जाना जाता था, वो अब हिंसा के लिए चर्चा में रहता है।
  • ये पूरा उत्तर बंगाल 3T के लिए famous है- Tea, Timber और Tourism. इन तीनों को ही बेरुख़ी का शिकार होना पड़ा है, चाहे कोलकाता में कम्यूनिस्टों की सरकार रही हो या फिर कम्यूनिस्ट पार्ट-2, यानी टीएमसी की सरकार। इस पूरे क्षेत्र के संतुलित विकास पर कभी ध्यान नहीं दिया गया।
  • केंद्र की NDA सरकार के लिए, भारतीय जनता पार्टी के लिए सबका साथ, सबका विकास नीयत भी है और नीति भी इसी पर चलती है। यही कारण है कि यहाँ के बंद पड़े चाय बागानों को हमने खुलवाया है। चाय बागान में काम करने वाले श्रमिकों के, मजदूरों के बैंकों में खाते खुलवाए हैं।
  • जो महीने में ₹5 हज़ार, ₹10 हज़ार, कमाता है, ₹15 हज़ार रुपए से कम कमाता है, ऐसा हर व्यक्ति इस योजना का लाभार्थी होगा। इसके लिए औसतन 100 रुपए का अंशदान हर महीने देना होगा और जितना अंशदान मेरे मजदूर भाई-बहन देंगे, उतना ही केंद्र सरकार उनके पेंशन खाते में डालेगी।
  • जो सस्ता राशन आपको मिल रहा है, मुफ़्त में रसोई गैस का कनेक्शन मिल रहा है, सस्ती दवाइयाँ मिल रही हैं, वो केंद्र सरकार भेज रही है। इसी तरह ग़रीबों को पश्चिम बंगाल में 23 लाख से ज़्यादा और यहाँ जलपाईगुड़ी में 65 हज़ार से ज़्यादा पक्के घर मिल चुके हैं, जिसमें से अनेक लाभार्थी यहाँ भी मौजूद हैं।
  • पश्चिम बंगाल में माँ, माटी, मानुष के नाम पर जिनको आपने सत्ता दी, जिनको कम्यूनिस्टों के कुशासन से मुक्ति दिलाने का ज़िम्मा दिया, उन्होंने वही ख़ून-ख़राबे का पॉलिटिकल कल्चर अपना बना लिया है। आज स्थिति ये है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तो दीदी हैं, लेकिन दादागिरी किसी और की चल रही है, शासन TMC के ‘जगाई-मधाई’ चला रहे हैं।
  • टीएमसी सरकार की तमाम योजनाओं के नाम पर बिचौलियों का अधिकार है। दीदी, दिल्ली जाने के लिए परेशान हैं और बंगाल के ग़रीब और मध्यम वर्ग को सिंडिकेट के गठबंधन से लुटने के लिए छोड़ दिया है।
  • त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी ने ये काम कर दिखाया है, अब पश्चिम बंगाल में भी ये होने वाला है। आप सभी के सहयोग से, सही मायने में सबका साथ, सबका विकास, पश्चिम बंगाल में आने वाला है और जगाई-मधाई जाने वाला है। भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता गुंडागर्दी के इस ‘निज़ाम’ से लड़ने के लिए तैयार हैं।
  • देश के इतिहास में ये पहली बार देखा गया है कि कोई मुख्यमंत्री हज़ारों ग़रीब लोगों को लूटने वालों के पक्ष में दिन-दहाड़े धरने पर बैठ जाए। महात्मा गाँधी ने विदेश में रंगभेद के ख़िलाफ़, विदेशी लोगों के हक़ के लिए दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति के ख़िलाफ़ सत्याग्रह किया, नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने विदेश में रहकर, लोगों को जोड़ा और मुश्किल में फंसे भारतवासियों के लिए आंदोलन किया।
  • पश्चिम बंगाल की बहनें-बेटियाँ मज़दूर-कामगार, करोड़ों लोग आज ममता दीदी से सवाल पूछ रहे हैं। जिन्होंने अपने जीवन भर की कमाई लुट जाने की वजह से प्राण त्याग दिए, उनके परिवार वाले आज ममता दीदी से सवाल पूछ रहे हैं। वो जानना चाहते हैं कि चिटफंड घोटाले की जाँच से आप इतना क्यों डरी हुई हैं? क्यों जिन लोगों पर जाँच में लापरवाही बरतने का आऱोप है, उनके लिए धरना दे रही हैं।
  • मैं शारदा, नारदा, रोज़ वैली की ठगी के शिकार हर परिवार को विश्वास दिलाने आया हूँ, कि चौकीदार इनको छोड़ेगा नहीं। चाहे वो लुटेरा हो या फिर लुटेरों का संरक्षक, किसी को भी छोड़ा नहीं जाएगा।
  • आज कोलकाता को भ्रष्टाचारियों और भ्रष्टाचारियों को बचाने वालों का मंच बना दिया गया है। मैं कोलकाता में मंच बनाकर मोदी-मोदी बोलने वाले हर उस व्यक्ति को कहना चाहता हूँ, कि भ्रष्टाचारियों को कवर देने के लिए आप कहाँ-कहाँ धरना देंगे।
  • आज हर उस व्यक्ति को मोदी से कष्ट है, जो पूरी तरह से भ्रष्ट है। हम ग़रीब को लूटने वाले, देश की सेना को धोखा देने वाले राज़दारों को विदेशों से उठाकर ला रहे हैं और ये उनको बचाने के लिए पूरी ताक़त लगा रहे हैं।
  • मैं महा-मिलावट में जुटे इन सभी दलों को कहना चाहता हूँ कि, दलालों, बिचौलियों और धोखेबाज़ों को बचाने के आपके प्रयास, मोदी कभी सफल नहीं होने देगा। कल मैं लोकसभा में देख रहा था, कि जैसे ही मैंने महा-मिलावट कहा, इन लोगों ने हंगामा शुरू कर दिया था। जब-जब देश को इनकी सच्चाई बताओ, ये ऐसे ही हंगामा करते रहे हैं। ये महा-मिलावट एक ऐसा घालमेल है जिसकी अपनी कोई विचारधारा नहीं है, देश के लिए कोई विज़न नहीं है।
  • आप ख़ुद देखिए, पश्चिम बंगाल कॉन्ग्रेस के नेता लगातार बोल रहे हैं कि बंगाल में अराजकता है, भ्रष्टाचारियों और गुंडों का राज है, लेकिन दिल्ली में मिस्टर वाड्रा के साले साहब दीदी धुन में मस्त हैं। आज पश्चिम बंगाल में अजीब सी स्थिति बन गई है। यहाँ की सरकार देशभर से आए ऐसे लोगों का स्वागत करती है जिनपर गंभीर आरोप हैं। यहाँ की सरकार घुसपैठियों का भी स्वागत करती है लेकिन दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल, भाजपा के नेताओं को रोका जाता है।
  • अब आपके साथ भाजपा है और संकल्प गुंडों और सिंडिकेट पश्चिम बंगाल की मुक्ति का है। देश में लोकतंत्र है, जो पश्चिम बंगाल पर भी लागू होता है। बीजेपी का कार्यकर्ता धमकियों से नहीं डरता। अगर हिंसा से बीजेपी के कार्यकर्ता डर जाते तो 2 सांसदों वाली पार्टी पूर्ण बहुमत की सरकार ना बना पाती और देश के अधिकतर राज्यों में सरकार में ना होती।
  • हाल में हुए पंचायत के चुनाव में पश्चिम बंगाल की जनता ने ट्रेलर दिखा दिया है। उस हिंसा की पराकाष्ठा कर दी गई थी, बूथ के बूथ लूट लिए गए थे, लेकिन फिर भी जनता ने भाजपा के प्रत्याशियों को भारी संख्या में जिताया। मैं पश्चिम बंगाल की जनता को भी कहना चाहता हूँ, यहाँ के हर युवा साथी को आश्वस्त करना चाहता हूँ, कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आपको अपने हक़ का इस्तेमाल करने से कोई ताक़त रोक नहीं पाएगी।
  • लोकसभा चुनाव की व्यवस्था देश के चुनाव आयोग के नेतृत्व में होगी और सुरक्षा और निष्पक्षता की पूरी गारंटी देने का प्रयास होगा। इस बार भी आपका एक वोट, केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली, मज़बूत सरकार बनाने में मदद करेगा।
  • ये पूर्ण बहुमत वाली सरकार की ही ताक़त है, जिससे देश के विकास को इतनी गति मिल रही है। दशकों से अटके हुए काम पूरे किए जा रहे हैं। आप सोचिए, साढ़े 4 वर्ष पहले अगर आपने एक मजबूत सरकार के लिए वोट नहीं दिया होता तो, भारत-बांग्लादेश सीमा विवाद आज भी नहीं सुलझ पाता।
  • आज यहाँ जलपाईगुड़ी में, मैं देश से जुड़े एक महत्वपूर्ण विषय पर भी अपनी बात रखना चाहता हूँ। ये विषय महिला सशक्तिकरण, महिलाओं को अवसरों की समानता और महिलाओं के न्याय का है, ये विषय तीन तलाक़ का है। महिला अधिकारों पर झूठ बोलने वाली कॉन्ग्रेस ने अपनी असली सच्चाई भी देश के सामने रख दी है। तुष्टिकरण के लिए कॉन्ग्रेस किस हद तक जा सकती है, ये भी उसने कल फिर बता दिया है। कॉन्ग्रेस ने अब खुलकर कह दिया है कि वो तीन तलाक़ पर बन रहे कानून का विरोध करती है।
  • कॉन्ग्रेस ने फिर दिखा दिया है कि उसे सुप्रीम कोर्ट की परवाह नहीं है, जो तुरंत तीन तलाक़ को असंवैधानिक घोषित कर चुका है। राजीव गाँधी के समय, शाह बानो केस में कॉन्ग्रेस ने जो गलती की थी, अब वही गुनाह उसने कर दिया है। वो भूल गई है कि तीन तलाक़ से पीड़ित मुसलिम महिलाओं को कितने बुरे दौर से गुज़रना होता है, कितने संकटों से गुज़रना होता है।
  • यहाँ पश्चिम बंगाल की भी अनेक बहनों को इस तरह के अत्याचार से गुज़रना पड़ा है। वो बरसों से तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ क़ानून की माँग कर रहीं थीं, जिसे हमारी सरकार पूरा करने का प्रयास कर रही है। लेकिन, तुष्टिकरण के लिए किसी भी हद से गुज़रने वाली कॉन्ग्रेस ने, न सिर्फ़ तीन तलाक़ क़ानून को संसद में रोका, बल्कि उसे अब ख़त्म करने की भी बात करने लगी है।
  • ये लोग कुछ भी बोलें, मैं देश की सभी मुस्लिम बहनों-बेटियों को ये भरोसा देना चाहता हूँ कि तीन तलाक़ क़ानून को हटने नहीं दिया जाएगा। बीजेपी, महिलाओं के अधिकार के लिए महिलाओं के न्याय के लिए, पूरी तरह प्रतिबद्ध है।