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केरल में RSS नेता की हत्या की साज़िश में दिल्ली पुलिस ने तीन को किया गिरफ़्तार

केरल में लगातार एक के बाद बीजेपी और RSS के नेताओं और कार्यकर्ताओं की या तो हत्या हो रही है या साज़िश के सबूत मिलते रहें हैं। आज फिर केरल के आरएसएस नेता की हत्या की साज़िश के आरोप में दिल्ली पुलिस ने 3 लोगों को गिरफ़्तार किया है।

ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, तीनों आरोपितों को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गिरफ़्तार किया है। गिरफ़्तार किए गए आरोपितों में से एक अफ़ग़ानिस्तान का नागरिक है। एक आरोपित केरल का और तीसरा दिल्ली का रहने वाला बताया जा रहा है। इन तीनों ने आरएसएस नेता की हत्या की प्लानिंग की थी ताकि दंगे भड़क सके।

ज़ी न्यूज़ के मुताबिक तीनों आरोपित केरल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के किसी नेता की हत्या की साज़िश रच रहे थे। इस साज़िश के पीछे पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का हाथ होने के भी सबूत मिले हैं। हालाँकि, दिल्ली पुलिस ने आरएसएस नेता का नाम उजागर नहीं किया है।

फोन इंटरसेप्ट और कई अहम ख़ोजबीन के आधार पर रॉ की मदद से इन आरोपितों को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने दबोच लिया। गिरफ़्तार किए गए आरोपितों के नाम मोहम्मद सा बइफी (अफ़ग़ानिस्तान), शेख रियाजुद्दीन (दिल्ली का रहने वाला) और मुहथसिम केरल का रहने वाला है।

बिहार में कॉन्ग्रेस का हाथ थाम राजनीति करने वाली मीसा रामकृपाल का हाथ क्यों काटना चाहती हैं?

आज के समय में नेताओं के लिए दल-बदल की राजनीति सामान्य सी बात हो गई है। राजनीति में साथ रहते हुए कल तक जिसे ‘चाचा’ की उपाधी दी जाती थी, उसे गठबंधन से अलग होने पर ‘चोर’ कहा जाने लग जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन आश्चर्य की बात तब होती है, जब गाँधी के देश में राजनीतिक फ़ायदे व नुकशान के लिए बात खून ख़राबे तक पहुँच जाए।

राजद नेता और लालू प्रसाद की बेटी मीसा भारती ने कहा, “जब रामकृपाल बीजेपी में शामिल हो रहे थे, तब मेरा मन उनका हाथ गंडासे से काटने का हुआ था।” अब ज़रा सोचिए कि जब महज एक सांसद के पार्टी छोड़ने के बाद मीसा हाथ काटना चाहती है, फ़िर तो नीतीश कुमार के राजद से अलग होकर सरकार गिराने के बाद मीसा के मन में शायद मर्डर करने की बात चल रही होगी! नीचे आप भास्कर का वीडियो देखिए और राजनीतिक पतन पर सोचने को मज़बूर होइए।

मीसा के मुँह से इस बयान को सुनने के बाद राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को ज़रूर चोट पहुँचेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि जब लालू यादव की बेटी मीसा ने जन्म लिया था, तो देश में लोकतांत्रिक संकट का दौर चल रहा था। लोगों से बोलने के अधिकार छिन लिए गए थे। एक तरह से लोग राजनीतिक बंदी की जिंदगी जी रहे थे।

ऐसे दौर में जब लालू के घर में बेटी पैदा हुई तो लोगों को लगा कि आगे चलकर मीसा इंदिरा जैसी महिलाओं का जवाब होगी। जिन लोगों ने उस दौर को देखा है, आज भी मीसा शब्द सुनते ही उनके शरीर के रूह खड़े हो जाते हैं। लेकिन यह कहते हुए अफ़सोस होता है कि मीसा अपने नाम के मुताबिक कारनामे नहीं दिखा सकी, बल्कि मीसा ने तो इंदिरा से थोड़ा अलग पर समानांतर राह पकड़ के वो सब किया, जो कानूनी रूप से गलत है।

मीसा को आज हम जिस रूप में देख रहे हैं, दरअसल वो लालू यादव की ही देन है। एक कहावत ‘बापे पूत परापत घोड़ा, नै कुछ तो थोड़म थोड़ा’ लालू जी के प्रदेश में खूब बोला जाता है। इसका अर्थ है कि बच्चों पर बहुत ज्यादा नहीं तो भी कुछ न कुछ असर तो अपने पिता का पड़ता ही है।

मीसा ने आज रामकृपाल यादव के लिए जो हिंसक बयान दिया है, दरअसल वह मानसिकता लालू यादव की ही देन है। लालू यादव जेपी के पवित्र राजनीतिक आंदोलन से निकले हुए वो सिपाही हैं, जो अपने राजनीतिक नफ़ा-नुकसान के लिए बेहद निचले पायदान तक गए हैं।

सत्ता के लिए हिंसा का साथ देना या अपराधियों को गोदी में बिठाकर पुलिस की नज़रों से छिपा लेना लालू जी के लिए आम बात रही है। एक उदाहरण के ज़रिए इस बात को समझा जा सकता है कि अप्रैल 2016 में जब शहाबुद्दीन मर्डर केस में जेल में सजा काट रहे थे तब उसे राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा बनाया गया। यही नहीं, विधायक मर्डर केस में आरोपित बाहुबली राजद नेता प्रभुनाथ सिंह को भी लालू ने अपने गोद में बिठाए रखा।

बिहार का बच्चा-बच्चा यह बात जानता है कि 1990 की दौर को जातीय हिंसा, लूट-पाट व खून-ख़राबे की दौर के रूप में जाना जाता है। राम मंदिर के नाम पर आडवाणी को जेल भेजकर अपनी पीठ खुद ही थपथपाने वाले लालू यादव ने राज्य में फ़ैले जातीय हिंसा को रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।

जब मीसा ने गंडासे से रामकृपाल के हाथ काटने की बात कही, तब मुझे लालू के दौर में हुए बाथे और सेनारी कांड की याद आ गई। हिंसा के उस दौर में लोगों को गंडासे और तलवार से ही काटा गया था। सेनारी काँड में एक-एक परिवार के आधे दर्जन लोगों को बेरहमी से काटा गया था। जब बिहार में यह घटना घट रही थी तब लालू और राबड़ी इन घटनाओं के ज़रिए राजनीति की रोटी सेंकने में लगे हुए थे।

शायद मीसा ने लाशों पर अपने पिता को राजनीति करते हुए देखा होगा, तभी वो इस तरह की हिंसक बयान दे रही है।

मीसा जब बड़ी हो रहीं थी, उसने अपने पिता को चारा घोटाला करते देखा फ़िर मर्डर के आरोपित शहाबुद्दीन व प्रभुनाथ सरीखे लोगों के साथ गलबहियाँ लगाए बैठे देखा। यही वजह है कि मीसा जब भ्रष्टाचार के मामले में आरोपित होती है, या हिंसक बयान देती है। तब मुझे लगता है कि लालू की बेटी होने की वजह से मीसा के व्यवहार में यह सारी गलत चीजें आ गई है।

झारखंड में भी महागठबंधन: BJP के ख़िलाफ़ 8 पार्टियों का मोर्चा तैयार

इस समय पूरे देश में लोकसभा चुनावों की तैयारी से ज्यादा बीजेपी को सत्ता से हटाने के प्रयास चल रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बाद इस बात का उदाहरण झारखंड में भी देख को मिला, जहाँ पर विपक्षी दलों ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों को साथ मिलकर लड़ने का निर्णय किया है। खबरें हैं कि औपचारिक रूप से इस बात की घोषणा इस महीने के आखिर तक हो सकती है।

जनसत्ता में छपी रिपोर्ट के अनुसार लोकसभा चुनाव की अगुवाई कॉन्ग्रेस द्वारा की जाएगी लेकिन विधानसभा चुनाव में हेमंत सोरेन पार्टी का नेतृत्व करेंगे। झारखंड में कॉन्ग्रेस, आरजेडी, सीपीआई, सीपीएम, जेएमएम, सीपीआई-एमएल, मार्क्सवादी समन्वय समिति और झारखंड विकास मोर्चा प्रजातांत्रिक (जेवीएमपी) आदि पार्टियों के बीच गठजोड़ की बातें चल रही हैं।

इन सभी पार्टियों के गठजोड़ को लेकर हाल ही में राज्य में एक बैठक हुई थी, जिसमें जेएमएम के अध्यक्ष हेमंत सोरेन, जेवीएम अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी, आरजेडी अध्यक्ष अन्नपूर्णा देवी, बीएसपी विधायक शिवपूजन मेहता, कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार और कान्ग्रेस विधायक दल के नेता आलमगीर आलम के अलावा बहुत सारे वामपंथी दलों के सभी मुख्य नेता भी शामिल हुए थे।

राजनैतिक उठा-पटक के चलते एक तरफ जहाँ पर यूपी में बसपा-सपा का गठबंधन देखने को मिला है, वहीं अब झारखंड में सभी गैर-बीजेपी दल एक साथ आने जा रहे हैं। इसके अलावा ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन ने भी बीजेपी का दामन छोड़ते हुए अकेले विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। ये विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव होने के लगभग 4-5 महीने बाद होने हैं।

पिछले लोकसभा चुनावों का परिणाम याद दिलाते हुए बता दें कि 2014 में लोकसभा चुनाव में झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में से बीजेपी को 12 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। बाक़ी 2 सीटें जेएमएम की झोली में गई थीं। कॉन्ग्रेस समेत अन्य दलों का 2014 में खाता भी नहीं खुल पाया था।

अभी हाल ही में कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटनी ने इस बात को कहा था कि अकेले रहकर बीजेपी को हराना मुमकिन नहीं हैं, इसके लिए कॉन्ग्रेस को हर राज्य में उन पार्टियों के साथ गठबंधन पर विचार करना चाहिए जो बीजेपी को हराने के लिए कॉन्ग्रेस के साथ जुड़ना चाहते हैं।

UP में गौरक्षा: विदेशी शराब और बीयर पर विशेष शुल्क

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने गौ रक्षा को ध्यान में रखते हुए एक अहम फै़सला लिया है। यूपी कैबिनेट ने आवारा पशुओं के आश्रय गृहों को वित्तपोषित करने के लिए बीयर और विदेशी शराब की बिक्री पर एक विशेष शुल्क को मंजूरी दे दी। अब इस राजस्व का इस्तेमाल अस्थायी गाय आश्रयों को बनाने में किया जाएगा।

रेस्तराँ और होटलों में विदेशी शराब पर प्रति बोतल 10 रुपए का विशेष शुल्क जबकि बीयर पर 5 रुपए का शुल्क लगेगा। इसके अलावा इकोनॉमी ब्रांड्स के बीयर और विदेशी शराब की बॉटलिंग पर भी विशेष शुल्क लगाया गया है। ये शुल्क 1 रुपए से लेकर 3 रुपए प्रति बोतल तक है। प्रदेश में बनने वाली बीयर और शराब के आयात शुल्क पर 50 पैसे से 2 रुपए प्रति बोतल का शुल्क लगाया जाएगा।  

गौ रक्षा के लिए सालाना हो सकेगा लगभग 165 करोड़ रुपए का इंतज़ाम

आबकारी विभाग के आँकड़ों की मानें तो वर्तमान में हो रही शराब और बीयर की बिक्री के हिसाब से एक साल में गौ रक्षा के लिए लगभग 165 करोड़ रुपए जुटाया जा सकेगा। 2 जनवरी को सरकार ने शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा पशुओं के खतरे से निपटने के लिए राज्य में अस्थायी गौ आश्रमों की स्थापना के लिए निर्देश दिए थे।

आबकारी विभाग को इन आश्रयों को बनाने और रखरखाव करने के लिए विभिन्न वस्तुओं पर शुल्क लगाने के लिए कहा गया था। आबकारी मंत्री जय प्रताप सिंह ने कहा, “इस प्रणाली से राजस्व बढ़ेगा और विभाग राज्य में सालाना 165 करोड़ रुपए का योगदान दे सकता है।”

गगनयान भारत का पहला मानव मिशन, पायलट भी हो सकते हैं अंतरिक्ष यात्री

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के वैज्ञानिकों ने शुक्रवार (जनवरी 18, 2019) को संकेत दिया कि देश के पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ से जाने वाले अंतरिक्ष यात्री पायलट हो सकते हैं। इसके लिए उड़ान का पर्याप्त अनुभव रखने वाले लोगों की तलाश इसरो द्वारा की जा रही है। इसरो के चेयरमैन के. सीवन ने कहा कि मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए अंतरिक्ष यात्रियों के चयन में भारतीय वायुसेना और अन्य एजेंसियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

बता दें कि गगनयान प्रोजेक्ट की घोषणा पिछले साल पीएम मोदी ने की थी। पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वर्ष 2022 तक आज़ादी के 75 साल पूरे होने के अवसर पर, भारत का बेटा या बेटी अंतरिक्ष में जाएगा। साल 2022 या उससे पहले ही, भारतीय वैज्ञानिकों ने मानवसहित गगनयान लेकर अंतरिक्ष में तिरंगे के साथ जाने का दृढ संकल्प लिया है। इस लक्ष्य के हासिल होते ही भारत मानव मिशन भेजने वाले दुनिया के शीर्ष देशों में चौथा देश होगा।

एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए सीवन ने कहा कि पहले मानवरहित ‘गगनयान’ को दिसंबर 2020 में प्रक्षेपित किए जाने की योजना है। दूसरा मानवरहित यान जुलाई 2021 तक भेजे जाने की उम्मीद है और फिर अंतत: दिसंबर 2021 तक पहला मानवयुक्त गगनयान मिशन पूरा किए जाने की सम्भावना है।

चंद्रयान-2
चंद्रयान-2 प्रतीकात्मक चित्र

बीते कुछ वर्षों में भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में कई बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की हैं। इसरो प्रमुख के सीवन ने बताया कि भारत इस साल अप्रैल तक चंद्रयान-2 के लॉन्चिंग के लिए भी तैयार है। चंद्रयान -2 मिशन पर कुल 800 करोड़ रुपए खर्च किया जाना है। इस मिशन की मदद से चाँद से जुड़ी कुछ अहम जानकारियाँ जुटाने की कोशिश की जाएगी। इस मिशन लेकर इसरो पूरी तैयारी कर चुका है।

गगनयान की कुछ ख़ास बातें

1- गगनयान के तहत शुरुआती ट्रेनिंग भारत में होगी जबकि इसकी एडवांस ट्रेनिंग रूस में दी जाएगी। अंतरिक्ष में जाने वाले दल में महिला अंतरिक्ष यात्री के भी शामिल होने की संभावना है।

2- गगनयान मिशन को केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक बताते हुए इसके लिए 10,000 करोड़ रुपए का फंड जारी किया था।

3- गगनयान मिशन में भारत, रूस और फ्रांस से भी मदद ले रहा है। इसरो अभी तक इस मिशन पर 173 करोड़ रुपए खर्च कर चुका है।

4- इसरो अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए सबसे बड़े रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 का उपयोग करेगा।

5- अंतरिक्ष में जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों को ‘व्योमनॉट्स’ के नाम से जाना जाएगा। व्योम शब्द का अर्थ अंतरिक्ष होता है।

फ़ैक्ट चेक: ‘कुम्भ स्नान’ वाली नेहरू की फोटो वायरल, लेकिन पत्रकार-फ़िल्मकार कापड़ी फैला रहे फ़र्ज़ी जानकारी!

प्रयागराज में होने वाला इस वर्ष का कुंभ मेला न सिर्फ़ अपनी भव्य तैयारियों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसलिए भी केंद्र बिंदु बना हुआ है क्योंकि इस विशेष कुंभ मेले की धार्मिक मंडली की तैयारियों की समीक्षा ख़ुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की है। जहाँ एक तरफ इस कुंभ मेले के सफल आयोजन पर प्रधानमंत्री मोदी के कार्य की प्रशंसा हो रही है, वहीं दूसरी तरफ उनके आलोचक उन्हें घेरने से बाज नहीं आ रहे हैं।

हाल ही में, विनोद कापड़ी (फ़िल्म पिहू के निर्देशक, ज़ी न्यूज़ और इंडिया टीवी के पूर्व संपादक) ने जवाहरलाल नेहरू की एक फोटो को ट्विटर पर पोस्ट किया। इसमें उन्होंने दावा किया कि नेहरू ने 1954 के कुंभ मेले के दौरान डुबकी लगाई थी।

ताकि सनद रहे : पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी कुंभ में स्नान कर चुके हैं और जनेऊ भी धारण किए हुए हैं।#KumbhMela2019 pic.twitter.com/06DUeCHBwr

— Vinod Kapri (@vinodkapri) January 18, 2019

उनके ट्वीट का जवाब देते हुए एक यूज़र ने कॉन्ग्रेस नेता ए.गोपन्ना (A. Gopanna) की नेहरू की जीवनी – जवाहरलाल नेहरू: एन इलस्ट्रेटेड बायोग्राफी (Jawaharlal Nehru: An Illustrated Biography) – से वही फोटो पोस्ट की, जिसमें फोटो का जो कैप्शन दिया गया था, ‘1931 में इलाहाबाद में अपने पिताजी के अस्थि विसर्जन के दौरान जवाहरलाल नेहरू।’

इस प्रकरण के चलते कापड़ी और उस ट्विटर यूज़र के बीच शब्द-जंग छिड़ गई। कापड़ी ने दावा किया कि यह फोटो नेहरू के पिता के अस्थि विसर्जन की नहीं हो सकती क्योंकि उस समय नेहरू की उम्र 42 वर्ष की थी। कापड़ी ने तर्क दिया कि जो फोटो उन्होंने पोस्ट की, उसमें नेहरू बड़े दिख रहे हैं। इसलिए वह फोटो 1954 के कुंभ की ही है, जब नेहरू की उम्र 65 वर्ष थी।

बता दें कि ए गोपन्ना एक कॉन्ग्रेसी नेता हैं और फ़िलहाल वो एक प्रवक्ता होने के अलावा तमिलनाडु कॉन्ग्रेस के मीडिया विभाग के अध्यक्ष भी हैं। कॉन्ग्रेस नेता ए गोपन्ना ने नेहरू की जीवनी में नेहरू की इस फोटो को शामिल करते हुए कहा था कि यह 1931 में नेहरू द्वारा अपने पिता के अस्थि को विसर्जित करने से संबंधित है। पिछले साल मई में उनके द्वारा रचित ‘भारत के पहले प्रधानमंत्री की उनकी सचित्र जीवनी’ का अनावरण भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा किया गया था। इसलिए, बहुत कम संभावना है कि गोपन्ना अपनी पुस्तक में नेहरू की छवि को ग़लत बताएंगे।

इसके अलावा, ट्विटर यूज़र द्वारा ट्वीट की गई फोटो को पत्रकार विकास पाठक ने भी पिछले साल मई में पोस्ट किया था।

बता दें कि इस फोटो का उपयोग इंडिया टुडे के एक लेख में भी किया गया है। इसमें यह दावा किया गया कि यह फोटो नेहरू की माँ के अस्थि विसर्जन (1938) की है। नेहरू की माँ के अस्थि विसर्जन वाला तथ्य ओपन मैगज़ीन में प्रकाशित एक लेख में 1938 में भी दिया गया।
ए गोपन्ना लिखित जीवनी, इंडिया टुडे और ओपन मैगज़ीन के लेख से तो यही स्पष्ट होता है कि नेहरू की यह फोटो उनके माता या पिताजी के अस्थि विसर्जित करने से संबंधित है। दोनों ही मीडिया तंत्रों में से किसी ने भी इस फोटो को 1954 के कुंभ से नहीं जोड़ा है।

यदि हम केंद्रीय कारागार नैनी से नेहरू की एक और फोटो को देखें, जो 19 अक्टूबर 1930 से 26 जनवरी 1931 के बीच उनके पाँचवें कारावास के दौरान ली गई थी, तो नेहरू अपनी उस फोटो में विवादित फोटो से मिलते-जुलते दिखते हैं।

नेहरू अपने पाँचवें कारावास के दौरान नैनी सेंट्रल जेल में, सौजन्य: http://nehruportal.nic.in

जब कॉन्ग्रेस पार्टी के एक नेता ने अपनी पुस्तक में इस विवादित फोटो को जवाहरलाल नेहरू के पिताजी के अस्थि विसर्जन से संबंधित दिखाया है और कुछ मीडिया हाउसों ने उसी फोटो को उनकी माँ के अस्थि विसर्जन से संबंधित कर प्रकाशित किया है तो फिर इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि यह फोटो 1954 के कुम्भ के आस-पास की तो बिल्कुल नहीं है।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब विनोद कापड़ी को झूठ फैलाते हुए पकड़ा गया हो। इससे पहले, कापड़ी को हिंसा के बारे में झूठ फैलाते पकड़ा गया था, जिसका संबंध उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की हिंसा से था। जब झूठ पकड़ा गया, तो उन्होंने पुलिस पर ही उलटे-सीधे सवाल खड़े कर दिए थे।

झाड़ू के साथ लहराया था तिरंगा, केजरीवाल के ख़िलाफ़ FIR दर्ज

भारतीयों के लिए तिरंगा सिर्फ एक ध्वज नहीं है, यह एक भावना है। इसे देखकर इंसान के भीतर का राष्ट्रवाद स्वत: ही जागरूक हो उठता है। ऐसे में तिरंगे का अपमान शायद ही कोई ऐसा भारतीय होगा, जो झेल सकता है।

2014 में लोकसभा चुनावों के दौरान केजरीवाल पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का मामला सामने आया था। इसमें याचिका दर्ज करने वाले की शिकायत थी कि आम आदमी पार्टी के चुनाव चिह्न ‘झाड़ू’ को तिरंगे के साथ में लहराया गया है। अब कोर्ट ने इस पूरे मामले पर दिल्ली के सीएम केजरीवाल तथा आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के खिलाफ FIR की अनुमति दी है।

मध्य प्रदेश के सागर जिले की एक अदालत ने आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल पर FIR की अनुमति 5 साल पहले के पुराने मामले में दे दी है। इस याचिका को दर्ज करने वाले का नाम राजेंद्र मिश्र है। इनकी शिकायत है कि 2014 में लोकसभा के चुनावों के दौरान केजरीवाल के साथ उनकी पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को झाड़ू के साथ लहराया था।

राजेंद्र मिश्र ने झाड़ू के साथ राष्ट्रीय ध्वज को लहराने पर इसे राष्ट्रध्वज का अपमान बताया और कोर्ट में याचिका दर्ज की। इस आधार पर ही कोर्ट ने फैसला लिया। फिलहाल केजरीवाल या आम आदमी पार्टी के किसी भी नेता ने इस मामले पर कोई भी बयान नहीं दिया है।

आपको याद दिला दें 2016 में योग दिवस के दिन पीएम मोदी द्वारा तिरंगे को ओढ़ने पर उन्हें काफी ट्रोल किया गया था, जिसमें कई राजनैतिक दल भी शामिल थे। ट्रोलिंग में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता भी थे। अब सवाल यह है कि 2014 के इस मामले के दोबारा उजागर होने के बाद वही लोग क्या अपनी पार्टी और पार्टी के संयोजक केजरीवाल पर इस तरह के प्रश्न चिह्न लगाएँगे या फिर उनके समर्थन में सफाई पेश करेंगे।

’50 लाख बच्चों’ के पिता ‘वृक्ष मानव’ का 96 की उम्र में निधन

पर्यावरण को जीवन देने वाले, 8 साल की उम्र से पर्यावरण के प्रति समर्पित होने वाले, विश्‍वेश्‍वर दत्‍त सकलानी का 96 की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने अपना जीवन पर्यावरण को समर्पित कर दिया। जब वो आठ साल के थे, तब उन्होंने पहला पौधा लगाया था। अंतिम सांस लेने तक परिवार के मुताबिक उन्होंने करीब 50 लाख पौधे लगाए।

पर्यावरण के प्रति उनके समर्पण भाव को इस बात से समझा जा सकता है कि उनके परिवार में चार बेटे और पाँच बेटियाँ थीं, लेकिन उनके बेटे संतोष की मानें तो वो हमेशा कहा करते थे,  “मेरे नौ बच्चे नहीं, 50 लाख बच्‍चे हैं, और मैं अब उन्‍हें जंगलों में तलाशा करूंगा।”

भाई और पत्नी की मृत्यु के बाद नहीं टूटे विश्‍वेश्‍वर

भाई और पत्नी के निधन के बाद विश्‍वेश्‍वर के लिए उनका दुख भूल पाना मुश्किल था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। मौत का दुख सहने के लिए पौधे लगाने लगे। और अंतिम साँस लेने तक उन्होंने पर्यावरण को सुरक्षित करना अपना ज़िम्मा समझा। विश्‍वेश्‍वर ने टिहरी-गढ़वाल में पर्यावरण की तस्वीर बदल दी और करीब 50 लाख पौधे लगाए। पत्नी की मृत्यु के बाद आई दूसरी पत्नी भी उनकी इस मुहीम में शामिल हो गईं और लोगों को पर्यावरण के महत्व को समझाने लगीं।

1986 में प्रधानमंत्री ने किया सम्मानित

1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी उनके इस कार्य से प्रभावित हुए। तब विश्‍वेश्‍वर को इंदिरा प्रियदर्शिनी अवार्ड से सम्‍मानित किया गया था। उनके बेट संतोष स्‍वरूप सकलानी कहते हैं, “उन्‍होंने करीब 10 साल पहले देखने की शक्ति खो दी थी। पौधे रोपने से धूल और कीचड़ आँखों में जाता था, जिससे उन्‍हें परेशानी होने लगी थी। पिता जी जब छोटे थे, तब से उन्‍होंने पौधे रोपना शुरू किया था।” संतोष कहते हैं, “1958 में माँ का निधन हो गया, इसके बाद वो पेड़-पौधों के और करीब हुए।”

विश्‍वेश्‍वर ने तैयार कर दिया एक घना जंगल

सकलानी का काम भले ही उत्तराखंड तक ही सीमित रहा हो, लेकिन अपने जिले में उन्होंने पर्यावरण को बचाने का काम बखूबी किया। सूरजगांव के आस-पास उन्‍होंने एक घना जंगल तैयार किया, हालाँकि अब वह तेज़ी से गायब हो रहा है। उनके बेट संतोष कहते हैं, “दुर्भाग्‍य से जंगल का बड़ा हिस्‍सा पिछले कुछ सालों में खत्‍म हो गया है क्‍योंकि लोगों को दूसरे कार्यों के लिए जगह चाहिए।”

गाय के गोबर से किया ऐसा काम, सरकार ने दे डाले 10 इनाम

कहा जाता है अगर क्षमता हो तो इंसान क्या नहीं कर लेता, साधारण मिट्टी से भगवान की मूरत बनाने वाला एक कारीगर, मूर्ति निर्माण करके न केवल अपनी कारीगरी को जीवंत करता है अपितु उस मिट्टी को भी पूजन योग्य बना देता है, जिसके ज़मीन पर पड़े रहने की वज़ह से लोग केवल उसे धूल समझते हैं।

अपनी क्षमता का विस्तार करते हुए कुछ ऐसा ही कारनामा गुजरात के आणंद जिले में आने वाले झरोखा गाँव के जयेश पटेल ने कर दिखाया है। अभी तक आपको गाय का गोबर सिर्फ उपला (कंडा) बनाने वाली चीज़ लगती होगी। लेकिन जयेश ने गोबर से वो सभी चीज़ें निर्मित की हैं, जिनके बारे में कोई आम सोच वाला व्यक्ति सोच भी नहीं सकता है।

पर्यावरण का ख़्याल रखते हुए जयेश ने गोबर की मदद से इकोफ्रेंडली गमले, प्लाईवुड और अगरबत्ती निर्मित की है, जिनकी बिक्री गुजरात में धड़ल्ले से हो रही है। जयेश आज के समय में न केवल गाय का दूध बेचकर पैसे कमा रहे हैं, बल्कि गाय के गोबर से कई प्रयोग करके भी वो मालामाल हो रहे हैं।

जयेश हमारे आज के समाज में एक प्रेरणा की तरह हैं, जो अपने कार्य से इस बात की शिक्षा देते हैं कि गाय कोई ऐसा जानवर नहीं है, जिसका लालन-पालन केवल दूध के लालच में किया जाए।

जयेश के पास एक या दो गाय नहीं है बल्कि 15 गाय है। वो बेहद खुलकर इस पर बात करते हुए कहते हैं कि वो पहले गाय का दूध बेचकर पैसे कमा रहे थे लेकिन अब वो गाय के गोबर के प्रयोग से और भी ज्यादा धनवान बनते जा रहे हैं।

जयेश को एक किलो गोबर से 10 रुपए मिलते हैं और रोज़ाना के हिसाब से वो पूरे 14 से 15 किलो गोबर बेचते हैं। अपने द्वारा किए जा रहे गोबर के साथ प्रयोगों से हटकर जयेश ने बताया कि यदि चाहें तो इससे जैविक खाद बनाकर ऊँचे दामों पर बेचा जा सकता है।

इसके अलावा जयेश ने बताया कि वो गाय के गोबर का अधिक से अधिक उपयोग करने की कोशिशें करते हैं। इसलिए उन्होंने गोबर को सुखाने की मशीन भी बनाई है।

इस मशीन में वो गाय के गोबर को पहले सुखाते हैं और फिर उसका पाउडर बनाते हैं। इस पाउडर से वो अलग-अलग प्रॉडक्ट बनाने का प्रयास करते हैं और जो नहीं बना पाते हैं, उसे वो कच्चे माल के रूप में बेच कर भी पैसा कमा लेते हैं। अपने इस अनोखे विचार के कारण जयेश को गुजरात सरकार द्वारा 10 अवार्ड भी दिया जा चुका है।

नागरिकता संसोधन बिल को ख़त्म करें: नॉर्थ ईस्ट नेताओं का गृहमंत्री से आग्रह

नॉर्थ ईस्ट की नेशनल पीपुल्स पार्टी, मिजो नेशनल फ्रंट समेत नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (नेडा) की अन्य पार्टी के नेताओं ने राजनाथ सिंह से मिलकर नागरिकता संसोधन बिल को ठंडे बस्ते में डालने का आग्रह किया।

नागरिकता संसोधन बिल के मुद्दे पर राजनाथ सिंह से मिलने के लिए नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (नेडा) के सात नेता दिल्ली पहुँचे थे। नेडा की तरफ से राजनाथ सिंह से मिलने आए नेताओं में मुख्य रूप से मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा, मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरामथांगा और भाजपा नेता मित सिंह शामिल थे।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिलने आए नेडा के सभी नेताओं ने नागरिकता संसोधन बिल पर अपनी राय रखी। नेडा के नेताओं ने इस  मुद्दे पर नॉर्थ ईस्ट की जनता व सिविल सोसाइटी के लोगों की भावनाओं के बारे में भी गृहमंत्री को बताया।

नेडा के सात नेताओं में से ज्यादातर लोगों ने बिल के विरोध में अपनी राय रखी। उन्होंने देश के गृहमंत्री से कहा कि बिल पर हमें पुनर्विचार की जरूरत है। संगमा ने इस मीटिंग के बाद कहा कि नॉर्थ ईस्ट के ज्यादातर मुख्यमंत्री इस मसले पर एकमत हैं।

ऐसे में बेहतर होगा कि सरकार इस बिल पर पुनर्विचार करे। गृहमंत्री ने इस मुलाकात के बाद कहा कि हम जल्द ही नॉर्थ ईस्ट के सभी मुख्यमंत्रीयों के साथ बैठकर नागरिकता संसोधन बिल पर गहराई से बात करेंगे।

नागरिकता संसोधन विधेयक एक नज़र में

राजीव गांधी सरकार के दौर में असम गण परिषद से समझौता हुआ था कि 1971 के बाद असम में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले बांग्लादेशियों को निकाला जाएगा। 1985 के असम समझौते (ऑल असम स्टूडेंट यूनियन ‘आसू’ और दूसरे संगठनों के साथ भारत सरकार का समझौता) में नागरिकता प्रदान करने के लिए कटऑफ तिथि 24 मार्च 1971 थी। नागरिकता बिल में इसे बढ़ाकर 31 दिसंबर 2014 कर दिया गया है। यानी नए बिल के तहत 1971 के आधार वर्ष को बढ़ाकर 2014 कर दिया गया है। नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी व ईसाई शरणार्थियों को 12 साल के बजाय छह साल भारत में गुजारने पर नागरिकता मिल जाएगी।

ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य के अनुसार इस विधेयक से असम के स्थानीय समुदायों के अस्तित्व पर खतरा हो गया है। वे अपनी ही ज़मीन पर अल्पसंख्यक बन गए हैं। कैबिनेट द्वारा नागरकिता संशोधन बिल को मंजूरी देने से नाराज़ असम गण परिषद ने राज्य की एनडीए सरकार से अलग होने का ऐलान किया है।

यह संशोधन विधेयक 2016 में पहली बार लोकसभा में पेश किया गया था। विधेयक के खिलाफ धरना-प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि ये विधेयक 1985 के असम समझौते को अमान्य करेगा। इसके तहत 1971 के बाद राज्य में प्रवेश करने वाले किसी भी विदेशी नागरिक को निर्वासित करने की बात कही गई थी, भले ही उसका धर्म कुछ भी हो।

नया विधेयक नागरिकता कानून 1955 में संशोधन के लिए लाया गया है। भाजपा ने 2014 के चुनावों में इसका वादा किया था। कॉन्ग्रेस, तृणमूल कॉन्ग्रेस, सीपीएम समेत कुछ अन्य पार्टियाँ लगातार इस विधेयक का विरोध कर रही हैं। उनका दावा है कि धर्म के आधार पर नागरिकता नहीं दी जा सकती है, क्योंकि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है। भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना और जेडीयू ने भी ऐलान किया था कि वह संसद में विधेयक का विरोध करेंगे। बिल का विरोध कर रहे बहुत से लोगों का कहना है कि यह धार्मिक स्तर पर लोगों को नागरिकता देगा। तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी के अनुसार केंद्र के इस फैसले से करीब 30 लाख लोग प्रभावित होंगे। विरोध कर रही पार्टियों का कहना है कि नागरिकता संशोधन के लिए धार्मिक पहचान को आधार बनाना संविधान के आर्टिकल 14 की मूल भावनाओं के खिलाफ है। जबकि भाजपा नागरिकता बिल को पारित करके असम व दूसरे राज्यों में रहने वाले बाहरी लोगों को देश से बाहर निकालना चाहती ताकि नॉर्थ ईस्ट के मूल नागरिकों को किसी तरह से कोई समस्या न हो।