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1993 के घूस काण्ड की पार्टियाँ झारखंड में BJP के ख़िलाफ़ एकजुट

2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा को रोकने के लिए विपक्षी दल कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। नरेंद्र मोदी के लहर से पार पाने के लिए झारखंड में विपक्षी दलों ने एकजुट होना शुरू कर दिया है। इसी क्रम में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन ने कॉन्ग्रेस व अन्य दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना ज़ाहिर की है।

झारखंड में लोकसभा की कुल 14 सीटें हैं। राज्य में आदिवासियों की संख्या अच्छी तादाद में है। आदिवासियों के वोट बैंक पर झामुमो की पकड़ मजबूत है। यही वजह है कि आदिवासी नेता होने के नाते शिबू सोरेन की पार्टी को आदिवासियों का वोट मिल जाता है। जबकि राज्य के गैर-आदिवासी वोटों का झुकाव भाजपा की तरफ़ ज्यादा है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि झारखंड में अगर किसी पार्टी ने गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री दिया भी है तो वो भाजपा ही है।

भारतीय राजनीति में शिबू सोरेन कौन हैं? शिबू एकलौते ऐसे नेता हैं, जिन्होंने खुलेआम कॉन्ग्रेस सरकार को बचाने के लिए रिश्वत लेने की बात स्वीकार की थी। शिबू सोरेन वो नेता हैं, जिनके ऊपर भीड़ को उकसा कर 10 लोगों को मरवाने का आरोप है। यही नहीं, शिबू सोरेन पर सत्ता का भय दिखाकर लोगों के जमीन को हथियाने और अपने पीए को जान से मरवाने के मामले भी हैं। इनमें से कुछ मामलों में शिबू बरी हो गए हैं, कुछ मामले में जाँच चल रही है, जबकि कुछ मामले जग-ज़ाहिर हैं।

आज शिबू से जुड़े एक ऐसे ही मामले की बात करते हैं, जो सबों के सामने है। प्रभात खब़र को लिखे अपने लेख में वरिष्ट पत्रकार सुरेंद्र किशोर लिखते हैं कि एक अप्रैल 1997 को दिल्ली की एक आदालत में लोग बहस के बीच में झामुमो नेता का बयान सुनकर हतप्रभ रह गए थे।

दरअसल रिश्वत के आरोपित झामुमो सांसद शैलेंद्र महतो ने बहस के दौरान कहा था, “जज साहब, सरकार मेरे बैंक खाते में जमा रिश्वत की राशि जब्त कर सकती है।” और इस तरह झामुमो सांसद ने स्वीकार किया कि शिबू सोरेन के द्वारा पीवी नरसिंह राव के समर्थन में वोट देने के लिए उन्हें 40 लाख रुपए रिश्वत दिए गए थे।

याद रहे कि केंद्र में कॉन्ग्रेस सरकार को बचाने के लिए शिबू सोरेन, शैलेंद्र महतो, साइमन मरांडी व सूरज मंडल ने करोड़ों रुपयों का घूस लिया था। इस मामले में फ़ैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा था कि संविधान ने हमारे हाथ बांध रखे हैं। कोर्ट ने तब जो कहा था उससे ज़ाहिर है कि भविष्य में रिश्वतखाेरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए संविधान में संशोधन की ज़रूरत है। पर दु:ख की बात यह है कि इतने साल के बाद भी किसी राजनीतिक दल ने अब तक इस मामले के लिए संशोधन की दिशा में कोई पहल नहीं की है।

अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत में ही शिबू ने अपराध का सहारा लिया था। दरअसल 1975 की एक रैली में शिबू ने लोगों के बीच भड़काऊ भाषण दिया था। शिबू के भाषण को सुनकर लोगों की भीड़ उग्र हो गई थी। उग्र भीड़ ने 10 लोगों को मौके पर लिंच कर दिया था। इन दस में से नौ लोग मुस्लिम समुदाय के थे। राजनीति में आदिवासियों का मसीहा बनने के लिए शिबू ने उग्र रूप धारण कर लिया था।

झारखंड के बोकारो जिले में शिबू सोरेन की बहु सीता सोरेन पर ज़बरन ज़मीन कब्जा करने का आरोप है। बोकारो स्टील प्लांट के 40 से अधिक रिटायर्ड अफ़सरों ने शिबू सोरेन पर ज़मीन कब्ज़ाने का आरोप लगाया है। एनडीटीवी रिपोर्ट के मुताबिक लोगों ने कई अधिकारियों के पास ज़मीन कब्जा मुक्त कराने का आग्रह किया, लेकिन किसी अधिकारी ने शिबू सोरेन के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं दिखाई।

जानकारी के लिए बता दें कि 2000 में बिहार से झारखंड राज्य अलग हुआ था। झारखंड के अलग होने के बाद दो दशक में पहली बार भाजपा ने राज्य में स्थाई सरकार बनाई है। इससे पहले शिबू सोरेन के झामुमो व बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) जैसे दलों के बीच सत्ता का बंदर-बाँट होता रहा था। ऐसे में एक बार फ़िर से झारखंड में झामुमो व कॉन्ग्रेस के बीच राजनीतिक गठबंधन के कारण पुरानी यादें तरोताजा होना स्वाभाविक सी बात है।

कॉन्ग्रेस को गठबंधन में न रखकर सुधारा है अपना ‘चुनावी अंकगणित’ – अखिलेश यादव

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने यूपी में हुए गठबंधन से कॉन्ग्रेस को अलग करने पर पर्दा उठाया है। अखिलेश का कहना है कि कॉन्ग्रेस के लिए ‘अपार सम्मान’ होने की बावजूद भी देश की सबसे पुरानी पार्टी को गठबंधन से इसलिए बाहर किया है ताकि ‘चुनावी अंकगणित’ को नतीज़ों में सही रखकर भाजपा सरकार को मात दी जा सके।

इस पूरे विषय पर बात करते हुए अखिलेश ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी से उनके संबंध अच्छे हैं और वो बहुत खुश होंगे अगर उनके गृह राज्य का व्यक्ति प्रधानमंत्री बनेगा।

अखिलेश से जब इस बारे में पूछा गया कि चुनावी नतीजों के बाद क्या वो कॉन्ग्रेस के साथ काम करना चाहेंगे तो उन्होंने कहा कि अभी वो इसका का ज़वाब नहीं दे सकते हैं। इस विषय पर वो चुनाव के बाद ही जवाब देंगे।

आपको बता दें कि 19 जनवरी को हुई कोलकाता में रैली के दौरान पीटीआई से बातचीत में कहा था कि देश को नया प्रधानमंत्री चाहिए और इन चुनावों के बाद वो देश को जरूर मिलेगा।

अखिलेश कहते हैं कि यदि यूपी की सीटों की संख्या पर गौर किया जाए, तो मालूम पड़ेगा कि बीजेपी सरकार के पास बहुमत नहीं हैं। उनकी मानें तो बीजेपी हमेशा सामाजिक इंजीनियरिंग की बात करती है, इसलिए इस गठबंधन के ज़रिए उन्होंने भी अपनी अंकगणित ठीक करने का फैसला किया है।

अखिलेश का कहना है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल में बहुत सारे विकास कार्य किए लेकिन उसके बाद भी वो चुनावों को हार गए। अपने चुनाव हारने के पीछे उन्होंने अपने बिगड़े हुए चुनावी अंकगणित को कारण बताया।

इस गठबंधन को लेकर उनका कहना रहा कि उन्होंने बसपा एवं राष्ट्रीय लोक दल के साथ होकर गठबंधन कॉन्ग्रेस के लिए दो सीटें छोड़ी हैं, ऐसा करके उन्होंने अपने बिगड़े हुए अंकगणित को ठीक कर लिया है।

याद दिला दें कि 2017 में लोकसभा चुनाव के दौरान अखिलेश ने कॉन्ग्रेस के साथ चुनाव जीतने के लिए हाथ मिलाया था लेकिन फिर भी प्रचंड बहुमत के साथ बीजेपी ने यूपी की सत्ता को संभाला था ।

एक तरफ जहाँ गठबंधन मे सपा-बसपा ने दो सीटें कॉन्ग्रेस के लिए छोड़ी थीं। वहीं पर कॉन्ग्रेस ने अलग से यूपी में पूरी 80 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है।

अखिलेश का सीटों पर किए बँटवारे पर कहना है कि सीटों पर समझौता करके उन्होंने विपक्षी एकता को मज़बूत किया है।

प्रधानमंत्री की रेस में सबसे नज़दीक तो मैं खुद हूँ: यशवंत सिन्हा

भारतीय जनता पार्टी से मनमुटाव के चलते बागी भूमिका में उतरे पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा है कि इस देश में अगर कोई नौकरी, सड़क, कारख़ानों और शहरों की स्थिति को सुधार सकता है तो वो स्वयं हैं। सोमवार (जनवरी 21, 2019) को दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान यशवंत सिन्हा से जब पूछा गया कि उनकी नज़र में कौन प्रधानमंत्री देश में नौकरियों की चुनौती को कम कर सकता है? इस प्रश्न पर यशवंत सिन्हा ने ज़वाब देते हुए कहा, “मेरे ज़ेहन में तो कोई नहीं है, इस रेस में सबसे नज़दीक तो मैं ख़ुद हूँ।”

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के सवाल पर यशवंत सिन्हा ने कहा कि हाल ही में उनके नाम को लेकर कुछ चर्चा शुरू हुई थी, लेकिन गडकरी के लिए कोई संभावनाएँ नहीं है। इसके आगे उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह आगामी चुनाव में 200 से कम सीटें आने के बावज़ूद नेतृत्व से नहीं हटेंगे।

ज्ञात हो कि बीते दिनों कोलकाता में आयोजित टीएमसी के समारोह में शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे बीजेपी के असंतुष्ट नेताओं ने शनिवार (जनवरी 19, 2019) को विपक्षी नेताओं के साथ मंच साझा करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को हटाने का आह्वान किया था।

हाल ही में यशवंत सिन्हा ने कहा था कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्रमुख ममता बनर्जी में एक बेहतर प्रधानमंत्री बनने के ‘सभी गुण’ मौज़ूद हैं। उन्होंने उम्मीद जताई थी कि पश्चिम बंगाल और टीएमसी 2019 के आम चुनावों में मोदी को पराजित करने में एक अहम भूमिका निभाएँगे।


यायावरों को पंख देकर वरदान साबित हुई है UDAN योजना

घूमने का जब भी ज़िक्र होता है तो लोगों के ज़ेहन में सबसे पहले गिने-चुने नाम ही उभकर आते रहे हैं, शिमला, मनाली, गोवा, मसूरी या फिर बहुत सोचा तो लद्दाख! गलती उनकी नहीं है, हमारे आस-पास के समाज में शुरू से ही इन नामों को इतना ज्यादा बढ़ाकर और खूबसूरती के साथ पेश किया गया है कि कई लोगों का तो घूमने के नाम पर लक्ष्य ही सिर्फ़ यहीं तक पहुँचना मात्र है।

लेकिन सच्चाई तो यह है कि, कि भारत जैसे विविधता से भरे देश में जो लोग इन जगहों के स्थान पर अन्य पौराणिक महत्त्व के स्थानों पर जाने का हौसला करते भी हैं, वो साधन विहीन रह जाते हैं और इस कारण मात्र दो से तीन जगहों पर ही सिमट कर रह जाते हैं। पौराणिक उन्नत भारतीय परम्पराओं और सभ्यताओं के कारण हमारे देश में ऐसी तमाम अनोखी धरोहरें हैं, जो इन तय की गई जगहों से कहीं ज्यादा खूबसूरत भी हैं, और इतिहास के कई पन्नों को स्वयं में सहेजे हुए भी हैं।

वर्षों से इन सभी जगहों को उपेक्षा झेलनी पड़ी है और इन्हें नज़रअंदाज किया जाता रहा है। इन धरोहरों को पहचान दिलाने और पर्यटकों के साथ इन जगहों की दूरी समाप्त करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा ‘UDAN योजना’ की शुरूआत की गई थी।

इस योजना के तहत कई ऐसी जगहों पर होने वाली यातायात और आवागमन सम्बन्धी असुविधाओं पर ग़ौर किया गया और ‘UDAN’ की मदद से उस समस्या का निवारण भी किया गया। वर्ष 2017 में बीजेपी सरकार के नेतृत्व में नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा शुरू की गई ‘UDAN योजना’ ने भारत के लोगों को देश के सभी पर्यटक स्थलों पर पहुँचाने की दिशा में सराहनीय कदम उठाया है। पर्यटकों के लिए हवाई जहाज़ की सुविधा उपलब्ध करा कर लोगों से उन सभी पर्यटन स्थलों की दूरियों को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है, जहाँ पर पर्यटक सिर्फ़ परिवहन की असुविधा और दूरी की वजह से नहीं पहुँच पाते थे। इस योजना के शुरू होने के 20 महीनों में ही लगभग 11 लाख यात्रियों ने इस योजना का लाभ उठाया है।

उदाहरण के तौर पर, कर्नाटक में ‘हम्पी’ नामक जगह हमारी इन्हीं पौराणिक धरोहरों में से एक हैं। एक समय पर यातायात के साधनों की कमी के कारण यहाँ तक पहुँचना बेहद मुश्किल काम था, लेकिन अब सरकार ने इसका भी इंतजाम कर दिया है।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने हम्पी को अपनी ’52 Places to go in 2019′ की सूची में दूसरे नम्बर पर स्थान देते हुए कहा है कि UNESCO द्वारा घोषित इस विश्व विरासत तक पहुँचना आज के समय में भी बहुत मुश्किल है। लेकिन आपको बता दें कि हाल ही में ट्रूजेट एयरलाइन (TruJet Airline) ने हैदराबाद के साथ-साथ बैंगलुरू से बल्लारी तक UDAN योजना के तहत विमान सेवा का इंतज़ाम किया है, जिसके बाद हम्पी की दूरी अब मात्र 25 मील की रह गई है।

इसके साथ ही बल्लारी को विद्यानगर एयरपोर्ट से जोड़ दिया गया है, जो UDAN योजना के तहत अनुचित हवाई अड्डों में आता था।

ट्रूजेट एयरलाइन ने हैदराबाद से विद्यानगर के लिए विमान की सुविधा सितम्बर 21, 2017 को शुरू की थी, जबकि इस विमान सुविधा को बैंगलुरू से मार्च 01, 2018 को शुरू किया गया था। हम्पी से 40 किमी की दूरी पर बने विद्यानगर हवाई अड्डे से पहले हम्पी के नज़दीक पड़ने वाला एयरपोर्ट बेलगौम (Belgaum) था, जिसकी दूरी हम्पी से 270 किलोमीटर पर थी।

नागर विमानन महानिदेशक द्वारा बताए गए मार्च 2018 के आँकड़ों के अनुसार, बैंगलुरू-विद्यानगर के मार्ग पर विमान सुविधा चालू होने के बाद 2,820 यात्रियों ने उड़ान भरी, जबकि यदि ट्रूजेट एयरलाइन द्वारा शुरू की जाने वाली सुविधा से पहले के आँकड़ों पर बात करें, तो कुल 60 लोग ही इस रूट के लिए विमान में बैठकर उड़ान भरते थे। वर्ष 2018 में मार्च से नवम्बर माह तक 28,677 लोगों ने इस सुविधा का लाभ उठाया।

इसी तरह, हम्पी के अलावा पाक्योंग से अब पर्यटकों के लिए सीधे सिक्किम जाना आसान हो गया है। अक्टूबर 2018 में स्पाइस जेट ने पाक्योंग ने कोलकाता और गुवाहाटी को जोड़ दिया है। इससे पहले सिक्किम की राजधानी गंगटोक तक पहुँचने के लिए पर्यटकों को बदगोरा उतरना पड़ता था, जिसके बाद उन्हें 5 से 6 घंटे सड़क के माध्यम से यात्रा करनी होती थी।

डीजीसीए के डाटा के अनुसार, कोलकाता-पाक्योंग-कोलकाता रूट 4 अक्टूबर 2018 को शुरू किया गया था, जिसका फायदा अक्टूबर से नवम्बर के मध्य 4,790 लोगों ने उठाया।

हम्पी और पाक्योंग की तरह ही हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला भी अन्य पर्यटक स्थलों की अपेक्षा अधिक दूरस्थ स्थानों पर है, लेकिन UDAN योजना की मदद से अब वहाँ पहुँचना भी आसान हो गया है। दिल्ली से शिमला की दूरी लगभग 360 किलोमीटर है। UDAN योजना की मदद से अप्रैल 17, 2017 से सितंबर 23, 2018 के बीच दिल्ली-शिमला मार्ग पर 14,041 लोगों ने यात्रा की है।

इसके अलावा कई पहाड़ी इलाके जैसे, उत्तराखंड राज्य में पंतनगर और पिथौरागढ़ भी इस योजना के द्वारा देहरादून से जोड़े गए हैं। उत्तराखंड सरकार के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 में 2,43,688 पर्यटक पिथौरागढ़ जिले में आए, जबकि उधमसिंह नगर जिले में 1,40,794 पर्यटक दिखे। पिथौरागढ़ जिले को देहरादून से जनवरी 17, 2019 को हवाई सेवा द्वारा जोड़ा गया था, जबकि देहरादून-पंतनगर को जनवरी 04, 2019 को शुरू किया गया।

बता दें कि UDAN को व्यापकता के साथ दूर-दूर के क्षेत्रों पर पहुँचाने का यही मकसद है कि भारतीय पर्यटन स्थलों और पर्यटकों के बीच की दूरी को ख़त्म की जा सके। इसके लिए नागरिक उड्डयन मंत्रालय पर्यटन मंत्रायल के साथ मिलकर काम कर रहा है। उदाहरण के लिए खजुराहो भले ही एक विकसित हवाई अड्डा है, लेकिन वहाँ पर कभी विमानों को लगातार उड़ते नहीं देखा जाता है क्योंकि वहाँ पर्यटक सिर्फ एक विशेष समय पर ही आते हैं। उड्डयन मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, “हम ऐसी जगहों के लिए एक ऐसा बिज़नेस मॉडल तैयार कर रहें हैं, जिससे इन जगहों को साल के किसी भी समय घूमने के लायक जगह बनाया जा सके।”

इसके साथ ही आपको बता दें, UDAN योजना इन दिनों अपने आखिरी चरण पर काम कर रही है, जिसमें वो 60 पर्यटक मार्गों पर काम करेंगे। इसमें बीकानेर-जैसलमेर-जोधपुर-उदयपुर-अहमदामाद-भुज-पोरबंदर-राजकोट आदि शामिल हैं।

UDAN योजना द्वारा किया जा रहा कार्य वाकई बेहद सराहनीय है, एक तरफ जहाँ लोग पर्यटक स्थलों पर जाने के बारे में सिर्फ सोच कर रह जाते थे, वहीं अब उत्साह के साथ लोग अपनी इन धरोहरों को देखने पहुँच रहे हैं, जो वर्षों से नज़रअंदाज किए जा रहे थे। ‘UDAN’ की मदद से ही अब लोगों के पास गोवा, शिमला, मसूरी के अलावा भी विकल्प मौज़ूद हैं, जहाँ पर वो एक नए माहौल में साँस ले सकेंगे और नए अनुभवों को भी एकत्रित कर सकते हैं। घुमन्तु और यायावरों के लिए UDAN योजना वरदान साबित हो रही है।

PM मोदी: ‘विश्व में बढ़ी है भारत की साख, तकनीक के इस्तेमाल से भ्रष्टाचार पर 100% तक लगी है लगाम’

वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15वें ‘प्रवासी भारतीय दिवस’ का उद्घाटन किया। इस मौके पर उन्होंने प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए कहा: ”आप सभी के सहयोग से बीते साढ़े 4 वर्षों में भारत ने दुनिया में अपना स्वाभाविक स्थान पाने की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाया है। पहले लोग कहते थे कि भारत बदल नहीं सकता लेकिन हमने इस सोच को ही बदल दिया है। हमने बदलाव करके दिखाया है।”

उन्होंने कहा कि दुनिया आज हमारी बात और हमारे सुझावों को पूरी गंभीरता के साथ सुन रही है और समझ भी रही है। पर्यावरण की सुरक्षा और विश्व की प्रगति में भारत के योगदान को दुनिया स्वीकार कर रही है। आज भारत अनेक मामलों में दुनिया की अगुवाई करने की स्थिति में है।

प्रधानमंत्री ने इसका उदाहरण देते हुए कहा कि इंटरनेशनल सोलर अलायंस ऐसा ही एक मंच है। इसके माध्यम से हम दुनिया को ‘One World, One Sun, One Grid’ की तरफ ले जाना चाहते हैं। आज भारत दुनिया की तेज़ी से बढ़ती आर्थिक ताकत है और खेलों में भी हम बड़ी शक्ति बनने की तरफ निकल पड़े हैं।”

पीएम ने इस मौके पर विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा: “आप में से अनेक लोगों ने भ्रष्टाचार को लेकर हमारे देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री की एक बात जरूर सुनी होगी जिन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार दिल्ली से जो पैसा भेजती है उसका सिर्फ 15 प्रतिशत ही लोगों तक पहुँच पाता है।

इतने वर्ष तक देश पर जिस पार्टी ने शासन किया और उसने देश को जो व्यवस्था दी थी, उस सच्चाई को उन्होंने स्वीकारा था लेकिन अफसोस ये रहा कि बाद के अपने 10-15 साल के शासन में भी इस लूट को, इस लीकेज को बंद करने का प्रयास नहीं किया।

देश का मध्यम वर्ग ईमानदारी से टैक्स देता रहा और जो पार्टी इतने सालों तक सत्ता में रही वो इस 85 प्रतिशत की लूट को देखकर भी अनदेखा करती रही। हमने टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके इस 85 प्रतिशत की लूट को 100 प्रतिशत खत्म कर दिया है।”

पीएम ने कहा कि बीते साढ़े चार वर्षों में 5 लाख 78 हजार करोड़ रुपए हमारी सरकार ने अलग-अलग योजनाओं के तहत लोगों को सीधे उनके बैंक खाते में ट्रांसफर किए हैं।

अकर्मण्य मोदी हैं ‘रियल एक्शन हीरो’ जबकि PM के लिए ममता बनर्जी सबसे उपयुक्त: शत्रुघ्न

वर्तमान में बीजेपी के नेता शत्रुघ्न सिन्हा का इस समय अपनी पार्टी के प्रति बागी रूप देखने को मिल रहा है। हाल ही में ममता बनर्जी की पार्टी द्वारा आयोजित यूनाइटेड रैली में शामिल हो कर उन्होंने इस बात को साबित भी कर दिखाया है।

शत्रुघ्न के इस रवैये की वज़ह से उनके खिलाफ पार्टी द्वारा कार्रवाई भी की जा सकती है। इस पर उनका कहना है कि जिस दिन भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व उनसे पार्टी छोड़ने को कहेंगे, वो उसी दिन पार्टी छोड़ देंगे।

बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी ने कुछ दिन पहले शत्रुघ्न के बारे में कहा था कि वो जिस तरह से बीजेपी पर निशाना साध रहे हैं, उस हिसाब से तो उन्हें पार्टी छोड़ देनी चाहिए। सुशील मोदी की इस बात का ज़वाब देते हुए शत्रुघ्न ने कहा, “मोदी कौन हैं? मैं सिर्फ़ एक मोदी को जानता हूँ जो देश के प्रधानमंत्री हैं, हमारे माननीय नरेंद्र मोदी। अब ये छुटभैया लोग हमें बताएँगे कि हमें क्या करना चाहिए। उनको जाकर बोलिए कि पब्लिसिटी पाने के लिए मेरे नाम का इस्तेमाल न करें।”

IANS को दिए एक साक्षात्कार में शत्रुघ्न सिन्हा ने देश के पीएम नरेंद्र मोदी को ‘रियल एक्शन हीरो’ बताया, जबकि उनके अनुसार प्रधानमंत्री के लिए सबसे उपयुक्त ममता बनर्जी हैं।

ममता बनर्जी की सराहना करते हुए शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि उनके राज्य के प्रति त्याग और समर्पण को एक बार देखिए! वो ज़मीन से उठी हैं, उन्हें गरीबों की और लाचार लोगों की परवाह है।

ममता बनर्जी के पीएम बनने के सवाल पर शत्रुघ्न सिन्हा ने बड़े आत्मविश्वास के साथ ज़वाब दिया, “हाँ, क्यों नहीं? लेकिन दिल्ली अभी दूर है। इस समय हमें देश में राजनैतिक संकट पर ध्यान देने की ज़रूरत है, जो गठबंधन अच्छे से कर रहा है।”

उन्होंने पीएम के बारे में बात करते हुए कहा कि उनकी अकर्मण्यता ने उन्हें जनता से दूर कर दिया है, जिसकी वज़ह से जनता गुस्से में भी है और निराश भी है।

98 ईसाई आदिवासियों ने पुनः अपनाया हिंदू धर्म, 9 साल पहले प्रलोभन से कराया गया था धर्मान्तरण

त्रिपुरा में 23 आदिवासी परिवारों के 98 ईसाइयों ने फिर से हिंदू धर्म अपना लिया है। उनकी घर-वापसी हिन्दू जागरण मंच ने कराई है। बता दें कि इससे पहले क्रिसमस के मौक़े पर मैनपुरी में बजरंग दल ने 20 ईसाईयों की हिन्दू धर्म में वापसी कराई थी।

त्रिपुरा में चाय बागान में काम करने वाले ये मज़दूर पूर्व में हिंदू थे। 9 साल पहले प्रलोभन देकर उन्हें ईसाई बनाया गया था। न्यूज़ 18 की रिपोर्ट के अनुसार, हिंदू जागरण मंच की त्रिपुरा इकाई के अध्यक्ष उत्तम डे ने बताया कि इन लोगों ने 2010 में ईसाई धर्म को अपना लिया था।उनाकोटी जिले के सोनामुखी चाय बागान में ये सभी काम करते थे। इनमें अधिकतर लोग बिहार और झारखंड के हैं। चाय बागान के बंद होने के बाद तंगहाली में इन्हें लालच देकर ईसाई बना दिया गया था। इन मज़दूरों में से अधिकतर लोग उरांव और मुंडा समुदाय के हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, अगरतला से 180 किलोमीटर दूर कालियाशहर जिले में रविवार को संपन्न घर-वापसी कार्यक्रम से विश्व हिंदू परिषद भी जुड़ी हुई थी।

हिन्दू से ईसाई और फिर हिन्दू बनने वाले एक शख्स बिरसा मुंडा ने बताया कि उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रलोभन दिया गया था। उसने कहा, ‘हम बहुत गरीब लोग हैं। ईसाइयों ने हमें बहकाकर हमारा धर्म परिवर्तन कराया। वे हमारे साथ ख़राब व्यवहार करते थे। इसलिए हमने तंग आकर अपनी इच्छा से फिर से हिंदू धर्म अपनाने का निर्णय लिया।’

वो मुग़ल बादशाह, जो बेटे की याद में रोते-रोते मरा… जबकि बेटा था ‘इस्लाम का दूत’

सत्रहवीं शताब्दी के मध्य का समय था। 70 साल का एक बीमार और बूढ़ा आदमी रोज़ उठता, खिड़की से ताज़महल को निहारता और फिर अपने बिस्तर पर लेट जाता। यह क्रम रोज़ चलता। पास में क़ुरानशरीफ़ की एक पुस्तक रखी होती, जिसकी आयतें पढ़ते-पढ़ते उसके दिन गुजरते। कभी-कभार कुछ मौलवी भी आया करते थे, जो उसके लिए क़ुरानशरीफ़ का पाठ करते। देखभाल करने के लिए बूढ़े की बेटी उसके साथ रहती थी। बूढ़े को एक ऐसी बीमारी ने जकड़ रखा था जो काफ़ी दर्दनाक थी। उसका पेशाब बूँद-बूँद कर गिरता था और उसे काफ़ी दर्द सहना पड़ता था। अपने भाग्य को कोसते हुए बेचारा बूढ़ा किसी तरह अपनी ज़िंदगी गुज़र-बसर कर रहा था।

ऐसा नहीं था कि बूढ़े के बेटे नहीं थे। उसके चार बेटे थे, जिनमें से अब सिर्फ़ एक ही ज़िन्दा बचा था। जिस बेटे को वो सबसे ज़्यादा प्यार करता था, जिसे अपने वारिस के रूप में देखता था- उसका कटा हुआ सर एक दिन उसके पास पहुँचा था। अपने बेटे के कटे हुए सर को याद कर वो हर दिन रोया करता था। उसे अपने सबसे प्यारे बेटे के मारे जाने से भी ज्यादा दुःख इस बात का था कि उसे मारने वाला भी उसका ही बेटा था। वो लाचार और बीमार बूढ़ा व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि तीस साल दिल्ली की गद्दी पर राज करने वाला शहंशाह था। वही जिसने ताज़महल बनवाया। मुग़ल आक्रांताओं के वंश का एक बड़ा नाम- शाहजहाँ।

22 जनवरी, 1666- क़रीब साढ़े तीन सौ साल पहले वो आज का ही दिन था, जब शाहजहाँ ने अंतिम साँस ली थी। लेकिन उस से पहले जो भी हुआ वो इस्लामिक सत्ता संघर्ष का ख़ून से रंगा वो अध्याय है, जिस पर भारतीय इतिहास कभी गर्व नहीं करेगा। मरने से पहले 74 वर्षीय शाहजहाँ के दिमाग में वो बातें जरूर कौंधी होंगी, जो उसने ठीक 38 साल पहले किया था। उसके दिमाग में वो काण्ड याद आए होंगे, जिसे उसने ख़ुद सत्ता पाने के लिए अंजाम दिया था। आज वो सब लौट कर उसके पास वापस आ गया था। जो भी उसने किए, उसकी सज़ा उसे जीते-जी मिल गई थी। सारा हिसाब चुकता हो गया था।

जब इतिहास ने ख़ुद को दोहराया

इस्लामिक साम्राज्यवाद में सत्ता के हस्तांतरण के लिए कभी कोई नियम नहीं रहा। भारतीय राजतन्त्र में सबसे बड़े बेटे को सत्ता देने का चलन था, अगर वो अयोग्य हो तो दूसरे बेटे को सत्ता सौंप दी जाती थी। लेकिन दुनियाभर में जहाँ भी इस्लामिक सत्ता के हस्तांतरण की बात आती है- वहाँ खून से सनी एक ऐसी कहानी भी मिलती है, जो बाद में महान कहलाने वाले बादशाहों के चेलों को रास न आए। महान कहे जाने वाले अकबर ने दिल्ली के लोगों को मार-मार कर उनकी खोपड़ियों का पहाड़ बना डाला और उसी पर चढ़ कर सत्ता के क्षितिज पर पहुँचा। शाहजहाँ ने भी कुछ ऐसा ही किया था।

गद्दी पर बैठने के बाद सबसे पहला काम जो उसने किया था- वो था अपनी सौतेली माँ नूरजहाँ को कारावास में डालना। ये महज़ एक संयोग ही था कि 22 जनवरी 1666 को उसकी मृत्यु हुई और 23 जनवरी 1628 को उसने अपने भाई-भतीजे सहित कई रिश्तेदारों को मार कर सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत की थी। जिस तरह उसने अपने भाइयों को मारा था, ठीक उसी तरह आज उसके बेटे एक दूसरे के ख़ून के प्यासे बन बैठे थे, जिसका अंत उसके तीन बेटों की मौत के साथ हुआ।

अब इतिहास के ख़ुद को दोहराने की बारी थी। शाहजहाँ की मृत्यु से पहले क़रीब 15 सालों तक उसका बेटा औरंगज़ेब उस से मिलने तक नहीं आया। मिलना तो दूर, उसने अपने बीमार बाप की हाल-चाल की ख़बर लेने तक की भी ज़हमत नहीं उठाई। जो उसने अपनी माँ के साथ किया था, उसका बेटा आज वही अपने बाप के साथ कर रहा था। आठ सालों तक एक किले में बंद रहते-रहते उसे अपना इतिहास तो याद आता ही होगा।

धन के लालची औरंगज़ेब ने अपने पिता को कंगाल कर दिया था। सत्ता सँभालने के कुछ दिनों बाद ही उसने आगरा के धनालय को अपने कब्ज़े में लिया। उसने शाहजहाँ से उसकी हीरे की अँगूठी तक छीन ली। दिल्ली का नया बादशाह मानसिक तौर पर इतना दरिद्र था कि उसने अपने पिता के सारे जवाहरात जबरदस्ती ले लिए। उसने शाहजहाँ से उसकी मोतियों की माला भी माँगी लेकिन शाहजहाँ ने कहा कि वो इस से ख़ुदा को याद करता है। शाहजहाँ ने कहा कि वो इसे औरंगज़ेब को देने की बजाय मिटटी में फ़ेंक देना ज्यादा बेहतर समझेगा।

जिस ख़ुदा का वास्ता देकर शाहजहाँ ने औरंगज़ेब को अपनी 100 मोतियों से बनी माला देने से मना कर दिया, उसी ख़ुदा का बहाना बना कर औरंगज़ेब ने उसकी सारी दौलत छीन ली।

बेटे का पत्र, पिता के नाम

औरंगज़ेब के शासन को अपनी लेखनी में समेटने वाले खाफ़ी ख़ान ने लिखा था कि जब शाहजहाँ आगरा किले में रहता था तब उसके और औरंगज़ेब के बीच कई पत्रों के आदान-प्रदान हुए थे। उन पत्रों में औरंगज़ेब की उसके पिता के प्रति सोच पता चलती है। यहाँ हम औरंगज़ेब के पत्रों की भाषा और विचार का उल्लेख करेंगे ताकि पता चले कि जिस क़ुरानशरीफ़ को शाहजहाँ अपने ढलते दिनों में पढ़ रहा था, उसी क़ुरानशरीफ़ को अपने जवानी के दिनों में पढ़ कर औरंगज़ेब ने क्या सीखा था?

अपने पत्र में औरंगज़ेब ने शाहजहाँ को लिखा- “आपकी बीमारी के दौरान दारा शिक़ोह ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया था। उसने इस्लाम को ख़त्म करने और हिंदुत्व को बढ़ावा देने की ठान ली थी।” औरंगज़ेब ने इन पत्रों में अपने आपको इस्लाम का दूत बताया था। उसने अपनी हिंसात्मक करतूतों की वज़ह ‘दिव्य आज्ञा’ बताया था। उसका दावा था कि ये दिव्या आज्ञा उसे सीधे अल्लाह द्वारा मिल रही थी। इसका कारण बताते हुए उसने शाहजहाँ को लिखा कि अगर अल्लाह ने उसके कार्यों को स्वीकृति नहीं दी होती तो उसे इतने सारे युद्धों में जीत कैसे मिलती?

औरंगज़ेब को इस्लामिक साहित्य का ज्ञाता माना जाता था। असल में आज भारत में जो इस्लामिक कट्टरवाद की आधुनिक धारा बह रही है, उसका काफ़ी श्रेय औरंगज़ेब को भी दिया जा सकता है। औरंगज़ेब का ‘इस्लाम’ ऐसा था, जिसने उसे अपने भाई की गर्दन काट कर पिता के पास भेजने को प्रेरित किया था। औरंगज़ेब का इस्लामिक ज्ञान इतना ‘अच्छा’ था कि उसने अपने बीमार बाप को मरने के लिए छोड़ दिया और नज़रबंद कर डाला। आज जिस ताज़महल की कीमत $100 करोड़ डॉलर से भी अधिक आँकी जाती है, उसका निर्माण कराने वाला बादशाह एक दशक से भी अधिक तक उपेक्षित जीवन जी कर मर गया।

औरंगज़ेब ने अपने पत्र में शाहजहाँ को इस बात की भी याद दिलाई कि कैसे उसने सत्ता पाने के लिए अपने भाई-भतीजों की हत्या की थी। औरंगज़ेब ने अपने पिता को उसके कुकर्मों की याद दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उसने अपने पिता को याद दिलाया कि उसने उन लोगों की हत्याएँ की, जिन्होंने उसे चोट तक नहीं पहुँचाई थी। इन पत्रों में लिखी बातें इस बात का गवाह है कि आपके कुकर्म आपका पीछा नहीं छोड़ते और कभी न कभी लौट कर वापस आते ही हैं। नज़रबंदी के दौरान हालत यह थी कि शाहजहाँ से कोई मिलने भी आता तो औरंगज़ेब की आज्ञा से।

एक उपेक्षित बादशाह की मौत

आख़िरकार कलमा पढ़ते-पढ़ते और मौलवियों के नमाज़ के बीच शाहजहाँ ने आज (जनवरी 22) के ही दिन सन 1666 में अंतिम साँस ली थी। हिन्दुस्तान पर तीस सालों तक राज करने वाले मुग़ल बादशाह को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार तक नसीब न हुआ। उसकी बेटी जहाँनारा बेगम, जिसने सालों तक उसकी देखभाल की थी, ने ही उसकी अंतिम क्रिया संपन्न की। औरंगज़ेब अपने बाप के मरने की ख़बर सुन कर भी वहाँ नहीं आया, उसने अपने बेटे को भेजा लेकिन वह भी समय पर न पहुँच सका।

1666 में वो आज की ही तारीख़ थी जब आगरा के किले में नज़रबंद एक बूढ़े मुग़ल बादशाह ने आख़िरी साँस ली। उसके सारे कुकर्म लौट कर वापस उसके ही पास आए और इतिहास ने अपने-आप को फिर से दोहराया।
शाहजहाँ की मौत को दर्शाती अवनींद्र नाथ टैगोर की पेंटिंग: मुग़ल बादशाह और उसकी बेटी जहाँनारा (फोटो साभार: विकीमीडिया)

1652 से शाहजहाँ के मरने तक- 14 सालों तक औरंगज़ेब अपने पिता से नहीं मिला। जिस ताज़महल को निहारते-निहारते शाहजहाँ ने जीवन के अंतिम कुछ वर्ष गुजारे थे, जिस ताज़महल की कब्र में उसकी बेग़म मुमताज़ दफ़न थीं- उसी ताज़महल में उसकी भी क़ब्र बनाई गई।

सोर्स 1: (‘Emperors of the Peacock Throne: The Saga of the Great Mughals’ By Abraham Eraly)

सोर्स 2: (‘Illustrated Dictionary of the Muslim World’ By Marshall Cavendish)

सोर्स 3: (‘Travels in the Mogul Empire’ By Francois Bernier)

6 दिन में 5 BJP नेता का मर्डर: मध्य प्रदेश में राजनैतिक हत्याओं का दौर जारी

मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार में राजनैतिक हत्याओं का दौर रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। सोमवार (जनवरी 21, 2019) को ग्वालियर भाजपा के ग्रामीण जिला मंत्री नरेंद्र रावत के भाई छतरपाल सिंह रावत की लाश पार्वती नदी के पुल के पास मिली। प्रथम दृष्टया यह धारदार हथियार से गोदे जाने का मामला लगता है। छतर सिंह के शरीर पर ज़ख़्म के कई निशान भी मिले हैं।

मृतक छतरपाल सिंह रावत खुद भी भाजपा कार्यकर्ता थे। पुलिस ने फिलहाल इसे आपसी रंजिश बताया है और पंचनामे के बाद शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है। ‘आपसी रंजिश’ शब्द को भी अगर अंतिम सत्य मान लिया जाए तो भी मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए कानून-व्यवस्था की लचर स्थिति पर खुद को पाक-साफ़ बताना बहुत मुश्किल होगा। चुनाव से पहले कमलनाथ ने ‘उन्हें देख लेंगे’ की धमकी भी दी थी।

मध्य प्रदेश में राजनैतिक हत्याओं की बात करें तो पिछले छह दिनों में अब तक पाँच भाजपा नेताओं/कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है:

  • 16 जनवरी (बुधवार) – इंदौर में कारोबारी और भाजपा नेता संदीप अग्रवाल को सरेआम गोलियों से भून दिया गया था।
  • 17 जनवरी (गुरुवार) – मंदसौर नगर पालिका के दो बार अध्यक्ष रहे भाजपा नेता प्रहलाद बंधवार की सरे बाजार गोली मारकर हत्या कर दी गई।
  • 20 जनवरी (रव‍िवार) – गुना में परमाल कुशवाह को गोली मारी गई। परमाल भारतीय जनता पार्टी के पालक संयोजक शिवराम कुशवाह के रिश्तेदार थे और खुद भी भाजपा के कार्यकर्ता थे।
  • 20 जनवरी (रव‍िवार) – बड़वानी में भाजपा के मंडल अध्यक्ष मनोज ठाकरे को पत्थरों से कुचलकर बेरहमी से मार डाला गया।
  • 21 जनवरी (सोमवार) – ग्वालियर भाजपा के ग्रामीण जिला मंत्री नरेंद्र रावत के भाई छतरपाल सिंह रावत की लाश मिली। छतरपाल सिंह रावत खुद भी भाजपा कार्यकर्ता थे।

पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और कई भाजपा नेता ने मध्य प्रदेश में राजनैतिक हत्याओं पर चिन्ता जताते हुए ट्वीट भी किया।

आदर्श स्थिति में इंसानी जान की कीमत बराबर होनी चाहिए। हत्या पर समाज में रोष बराबर होना चाहिए। फिर चाहे उसका नाम गौरी लंकेश हो या छतरपाल सिंह रावत। लेकिन देश के लगभग सभी बड़े और स्थापित मीडिया हाउस ने जिस तरह से गौरी लंकेश (एक इंसान) की मौत पर कवरेज़ की थी, उन्हीं मीडिया मठाधीशों ने छह दिनों में पाँच हत्याओं पर सिंपल रिपोर्ट फाइल करने के अलावा न तो कवरेज़ किया, न रोष दिखाया!

कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल मुख्यमंत्री कमलनाथ पर तो दागा ही जाना चाहिए। साथ ही यह भी ज़रूरी है कि मीडिया को भी उसके दायित्वों और सेलेक्टिव कवरेज़ के लिए घेरा जाए।

वाड्रा के चेक से ड्राइवर के नाम पर जमीन ख़रीद: कोर्ट का आदेश, माँ समेत ED के सामने पेश हों रॉबर्ट

बीकानेर जमीन घोटाले के मामले में सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। राजस्थान हाईकोर्ट ने उन्हें उनकी माँ समेत प्रवर्तन निदेशालय (ED) के सामने पेश होने का आदेश दिया है। बता दें कि वाड्रा पर बीकानेर के कोलायत क्षेत्र में अवैध तरीक़े से 275 बीघा जमीन ख़रीदने का मामला चल रहा है। वाड्रा और उनकी माँ के अलावा स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड (SHPL) के सभी साझीदारों को भी ED के सामने पेश होने का आदेश दिया गया है।

ED इस मामले में अशोक कुमार और जय प्रकाश बगरवा को पहले ही गिरफ़्तार कर चुकी है। दोनों महेश नागर के क़रीबी बताए जाते हैं। महेश नागर वाड्रा का ख़ास आदमी है और SHPL का अधिकृत प्रतिनिधि भी था। नागर ही वो बिचौलिया है, जिसने वाड्रा के दिए चेक से अपने ड्राइवर के नाम पर जमीद ख़रीद कर इस घोटाले को अंजाम दिया था। एजेंसी ने दावा किया है कि उसके पास वाड्रा के ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत हैं। एजेंसी कई दिनों से वाड्रा से पूछताछ के लिए प्रयास कर रही थी लेकिन उसे सफ़लता नहीं मिल पा रही थी।

इस पूरे घोटाले में वाड्रा की मुखौटा कम्पनी एलीजनी फिनलीज का नाम सामने आया है। इस सिलसिले में ED ने वाड्रा के दफ़्तर में छापा भी मारा था। एजेंसी ने नवंबर 2018 के आख़िरी हफ़्ते में उन्हें तीसरी बार सम्मन जारी किया था। ज्ञात हो कि उस से पहले वो दो बार ED के सम्मन को दरक़िनार कर चुके थे। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस पुष्पेंद्र भाटी की पीठ से केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) राजदीप रस्तोगी ने कहा कि जाँच को रोका नहीं जा सकता।

रॉबर्ट वाड्रा के वकील ने कोर्ट से कहा कि उनके क्लाइंट की बेटी की तबियत ख़राब है और उनकी लंदन में सर्जरी होनी है। इसके बाद अदालत ने दोनों वकीलों को पेशी की तारीख तय करने को कहा। बताया जाता है कि रॉबर्ट-प्रियंका की बेटी मिराया को खेल के दौरान घुटनों में चोट लग गई थी। ज्ञात हो कि सब जूनियर वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुकी मिराया बास्केटबॉल खिलाड़ी हैं।

इसके अलावा ASG रस्तोगी ने कोर्ट से वाड्रा की गिरफ़्तारी पर लगी रोक हटाने की भी माँग की। इस पर कोर्ट ने कहा कि अगर वो और उनके साझीदार दोषी पाए जाते हैं तो उनकी गिरफ़्तारी पर लगी रोक हटाने के लिए अलग से अर्ज़ी दाख़िल करनी पड़ेगी। ASG ने कोर्ट से कहा कि मनी लॉन्डरिंग के इस मामले में वाड्रा व अन्य साझीदारों से पूछताछ होनी बहुत जरूरी है क्योंकि बिना इसके जाँच आगे नहीं बढ़ पाएगी।

इस से पहले एक अलग मामले में रॉबर्ट वाड्रा के ख़िलाफ़ गैर ज़मानती वॉरंट भी जारी किया जा चुका है। अभी हाल ही में राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री भंवर सिंह भाटी ने रॉबर्ट वाड्रा को क्लीन चिट देते हुए कहा है कि उनके द्वारा जमीन खरीद में किसी भी तरह की अनियमितता नहीं की गई है।