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टैक्सी चलाने नेपाल गया अमजद, ‘अजय’ बन कर हिन्दू लड़की को उठा लाया: रेप के लिए भाई चंगेज को सौंपा, मौलाना ने अरबी में कुछ पढ़ कर बना दिया मुस्लिम

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में एक नेपाली लड़की से ‘लव जिहाद’ की घटना सामने आई है। यहाँ नेपाल के धनघड़ी जिले की रहने वाली हिन्दू लड़की ने अमजद खाँ पर नाम बदल कर खुद से निकाह करने और बाद में प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। अमजद के साथ उसकी अम्मी और भाई सहित कुल 5 लोग नामजद किए गए हैं। सोमवार (9 सितंबर, 2024) को दर्ज इस FIR में चंगेज खाँ भी नामजद है। चंगेज खाँ वही युवक है जिसने इसी माह हिन्दू महिला से छेड़खानी के मुद्दे पर भारतीय ‘बजरंग दल’ से विवाद किया था।

यह मामला पीलीभीत जिले के थाना क्षेत्र पूरनपुर का है। यहाँ 9 सितंबर (सोमवार) को नेपाल के धनघड़ी की रहने वाली एक हिन्दू महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में पीड़िता ने बताया कि साल 2013 में वह नेपाल के ही धनघड़ी में जॉब करती थी। तब पीलीभीत का अमजद टैक्सी चलाया करता था और अक्सर गाड़ी ले कर नेपाल आता-जाता रहता था। यही अमजद पीड़िता से पहली बार मिला जिसने अपना नाम अजय बताया। अमजद ने पीड़िता से मोबाइल नंबर शेयर कर लिया और धीरे-धीरे उसे अपने प्यार के जाल में फँसा लिया।

कुछ दिनों की बातचीत के बाद अमजद ने पीड़िता को भारत में बेहतर नौकरी दिलाने का वादा किया और अपने साथ ले आया। भारत में उसने पीड़िता को पीलीभीत के ही कलीमनगर इलाके में अपने जीजा वाहिद खान के यहाँ रखा। यहाँ आरोपित पीड़िता से निकाह का दबाव बना कर छेड़खानी करने लगा। पीड़िता के विरोध के बाद वह पीछे हटा। इसी रात जब पीड़िता सो रही थी तब अजय अचानक उसके बिस्तर पर आ गया। उसने पीड़िता के मुँह पर तमंचा सटा दिया और रेप किया। रेप के बाद उसने कहीं भी बताने पर पीड़िता को मार डालने की धमकी दी।

जब पीड़िता ने इसकी शिकायत अमजद की बहन से की तो उसने हँस कर जवाब दिया, “तुम हो ही इतनी सुंदर। वो बेचारा खुद को कहाँ तक रोके ?” इसके बाद अजय ने पीड़िता से कई बार बलात्कार किया। पीड़िता जब खुद को नेपाल भेजने की बात करती थी तो उसको मार डालने की धमकी मिलती थी। भारत में कोई सहारा न होने की वजह से पीड़िता सब कुछ सहन करती रही। कुछ दिनों तक अपने जीजा के यहाँ रखने के बाद अमजद पीड़िता को पीलीभीत के बीसलपुर स्थित अपनी खाला के घर ले गया।

यहाँ अमजद की अम्मी कैसर जहाँ और बहन सोनम पीड़िता से मिलने आए। इनको अमजद का भाई नफीस अपने साथ लाया था। यहाँ इन सबने मिल कर पीड़िता को 2 ऑप्शन दिए। पहला अमजद से निकाह करना या दूसरा मौत को गले लगाना। पीड़िता से यह भी कहा गया कि वो निकाह के बाद हिंदू तौर तरीकों से जी सकती है। अब तक पीड़िता को पता चल गया था कि अमजद हिन्दू नहीं बल्कि मुस्लिम है। कोई विकल्प न होने की वजह से पीड़िता ने अपनी जान बचाने के लिए निकाह की हामी भर दी।

शिकायत में आगे बताया गया है कि निकाह के दौरान पीड़िता को बिना पढ़ने का मौक़ा दिए कई कागजातों पर दस्तखत करवाए गए। कोर्ट मैरिज के बाद अमजद पीड़िता को फिर से अपने जीजा के घर कलीमनगर ले गया। यहाँ रात को पीड़िता के कमरे में अमजद के बजाय लगभग 35 वर्षीय एक युवक घुसा जो कोर्ट मैरिज के दौरान लगातार मौजूद था। पीड़िता चिल्लाने लगी तो लोग बाहर से आए। उन्होंने बताया कि 35 वर्षीय युवक का नाम फ़िरोज़ खान है। तब पीड़िता को पता चला कि अमजद के बदले धोखे से उसका निकाह फ़िरोज़ से करवा दिया गया है।

यहीं पर पीड़िता को पता चला कि फ़िरोज़ अमजद का बड़ा भाई है। 4 बच्चों के अब्बा फ़िरोज़ की पहली बीवी मर चुकी है। यह सुन कर पीड़िता बहुत रोई पर उसके पास कोई विकल्प नहीं बचा था। कुछ दिनों के बाद फ़िरोज़ पीड़िता को ले कर बरेली गया। बरेली में कुछ मौलाना भी आए थे। इन मौलानाओं ने पीड़िता का नाम पूछ कर अरबी भाषा में कुछ कहा। यहीं पर पीड़िता को बताया गया कि उसे इस्लाम कबूल करवा के उसका नाम महरून निशा कर दिया गया है। पीड़िता को गाय का मांस आदि खाने के लिए कहा गया।

बकौल पीड़िता, जब उसने इन बातों का विरोध किया तो उसकी बेरहमी से पिटाई की गई। पीटने वालों में फ़िरोज़ का मामला रंगीला भी शामिल था। पीड़िता ने तमाम यातनाओं को सहते हुए 2 बच्चों को जन्म दिया। इस बीच नशे का आदी फ़िरोज़ उसे लगातार मारता-पीटता रहा। मौक़ा देख कर फ़िरोज़ के भाई चंगेज खाँ और अमजद भी पीड़िता से बलात्कार करते रहे। चंगेज खान तो पीड़िता को नहाते हुए बाथरूम में भी झाँका करता था। आरोप है कि वह आए दिन नाबालिग उम्र की हिन्दू और सिख लड़कियों को घर भी लाता था।

शिकायत में पीड़िता ने आगे बताया है कि आए दिन कई मौलाना चंगेज से मिलने आते थे। वो उसके लिए कोई न कोई नया गिफ्ट ले कर आया करते थे। कुछ दिनों के बाद पीड़िता के जमा किए गए पैसों पर चंगेज और उसके अन्य परिजनों ने कब्ज़ा कर लिया। साल 2022 में पीड़िता पर चंगेज और उसके भाई अमजद ने तलवार से हमला किया। जैसे-तैसे इस हमले से पीड़िता ने खुद को बचाया और नेपाल चली गई। अब पीड़िता ने आरोपितों को सजा दिलाने का मन बनाया और उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की।

पुलिस ने इस मामले में चंगेज खान, अमजद खान, फ़िरोज़ खान, रंगीला और चंगेज की अम्मी को नामजद करते हुए केस दर्ज कर लिया है। इन सभी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64, 352, 351 (3), 115 (2), और 76 के तहत कार्रवाई की गई है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। पुलिस मामले की जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई कर रही है। भारतीय बजरंग दल ने आरोपितों पर कठोर कार्रवाई की माँग की है।

नाबालिग लड़की को जीप में बिठाया, यूपी से लेकर उत्तराखंड तक किया बलात्कार: कॉन्ग्रेस समर्थक साजिद पाशा का अस्पताल सील, इनाम भी घोषित

उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में एक नाबालिग लड़की से अपहरण और रेप का मामला सामने आया है। रेप का आरोप साजिद पाशा और मुदस्सिर पर लगा है जो जिले के एक नामी अस्पताल का संचालक है। शुक्रवार (31 अगस्त, 2024) पीड़िता का अपहरण कोचिंग कराने के बहाने किया गया था। 5 दिनों बाद लड़की को थार गाड़ी से बरामद किया गया था। पुलिस ने इस मामले में मुदस्सिर को गिरफ्तार कर लिया है जबकि फरार साजिद पर 25 हजार का इनामी घोषित किया गया है। साजिद पाशा के अस्पताल को सील कर दिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह घटना रामपुर के स्वार थाना क्षेत्र की है। यहाँ का रहने वाला साजिद पाशा ग्रीन सिटी नाम का अस्पताल चलाता है। साजिद पर आरोप है कि उसने 31 अगस्त को कक्षा 11 की एक नाबालिग छात्रा को कोचिंग के बहाने अपने पास बुलवाया था। यहाँ उसने थोड़ी दूर पर और छात्राएँ होने का झाँसा दे कर पीड़िता को विश्वास में लिया और अपनी थार गाड़ी में बिठा लिया। हालाँकि, आगे कोई भी छात्रा नहीं थी और आरोपित ने पीड़िता का अपहरण कर लिया।

बताया जा रहा है कि साजिद पाशा यहाँ से पीड़िता को अपने साथ ले कर उत्तराखंड के रामनगर स्थित एक रिजॉर्ट ने ले गया था। यहाँ बंधक बना कर पीड़िता से 3 दिनों तक रेप किया। इसके बाद पीड़िता को हल्द्वानी और रुद्रपुर ले जा कर बलात्कार किया गया। पीड़िता के मुताबिक उसे रिवाल्वर दिखा कर चुप रहने के लिए धमकाया जाता था। होटल और रिसॉर्ट के कमरे फर्जी पहचान पत्र पर बुक किए जाते थे। साजिद के पास पुलिस की फर्जी ID होने की भी बात सामने आ रही है।

लगातार 5 दिनों तक बलात्कार करने के बाद साजिद पीड़िता को रामपुर ले आया। पुलिस का बढ़ता दबाव देखते हुए साजिद ने पीड़िता को अपने पार्टनर मुदस्सिर सौंप दिया और खुद फरार हो गया। पुलिस ने पीड़िता को मुदस्सिर की गाड़ी से बरामद कर लिया। मुदस्सिर को गिरफ्तार भी कर लिया गया है। गिरफ्तारी के समय मुदस्सिर पीड़िता को बरेली ले कर जा रहा था। जैसे-तैसे पीड़िता अपने पिता को लोकेशन भेजने में सफल रही।

बरामदगी के बाद पीड़िता ने अपने साथ हुए अत्याचार के बारे में पुलिस को बताया। पीड़िता के पिता ने योगी आदित्यनाथ से फरार चल रहे साजिद पाशा पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। उन्होंने साजिद को खनन माफिया बताया जिसके साथ प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड भी चलते हैं। अस्पताल के साथ उसका प्रॉपर्टी डीलिंग का भी धंधा है। साजिद 2 बीवियों का शौहर है। उसकी एक बीवी पिछला विधानसभा चुनाव भी लड़ चुकी है।

सोशल मीडिया पर साजिद पाशा खुद को कॉन्ग्रेस पार्टी का समर्थक बताता है। साजिद पाशा के अस्पताल को सील कर दिया गया है। रामपुर के पुलिस अधीक्षक विद्यासागर मिश्रा ने बताया कि एक आरोपित को गिरफ्तार कर के फरार चल रहे दूसरे की तलाश जारी है। साजिद पर 25 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया गया है।

जिस हिन्दू की भरी अदालत में उखाड़ ली गई थी शिखा, उसका मोहिनी तोमर ने दिया था साथ: हैदर-सलमान को जाना पड़ा था जेल, अब हो गई महिला वकील की हत्या

उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में रविवार (3 सितंबर, 2024) को मोहिनी तोमर नाम की महिला वकील की हत्या कर दी गई है। संदिग्ध हालातों में उनकी लाश एक नहर से बरामद हुई है। महिला वकील के पति ने पुलिस में FIR दर्ज कर के मुस्तफा कामिल, असद मुस्तफा, हैदर मुस्तफा, सलमान, मुनाजिर रफी के साथ केशव मिश्रा को नामजद आरोपित बनाया है। इन सभी आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है। FIR में हत्या के कारणों में एक यह भी बताया गया है कि मोहिनी तोमर ने वकील मुस्तफा कामिल के बेटों की जमानत अर्जी का विरोध किया था। ऑपइंडिया ने इन आरोपों की जमीनी पड़ताल की।

जमानत विरोध पर मिली थी अंजाम भुगतने की धमकी

गुरुवार (5 सितंबर, 2024) को दर्ज अपनी FIR में मोहिनी तोमर के पति ब्रजतेंद्र सिंह ने बताया है कि हत्या से 20-25 दिन पहले उनकी पत्नी काफी परेशान रहती थी। जब ब्रजतेंद्र सिंह इसकी वजह पूछी तो मोहिनी तोमर ने बताया कि उन्होंने मुस्तफा कामिल के बेटों की जमानत का विरोध किया था। इसी वजह से आरोपितों द्वारा पीड़िता को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियाँ दी जा रहीं थीं। तब पीड़िता ने अपने पति से आशंका जताई थी कि उनके साथ कभी भी कोई गंभीर घटना घट सकती है।

हिन्दू युवक को बेरहमी से पीटा था कोर्ट में

जिस मामले में मोहिनी तोमर को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियाँ दी जा रहीं थी वो घटना मंगलवार (30 जुलाई, 2024) की है। तब कोतवाली नगर में शिवशंकर नाम के एक युवक ने शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायत में शिवशंकर ने बताया था कि 30 जुलाई को वो कुछ काम से कासगंज की जिला अदालत गए थे। तभी वकील कामिल मुस्तफा के 2 बेटे हैदर और सलमान वहाँ आ धमके। इनके साथ वकीलों की ड्रेस में 10-15 लोग और थे। इन सभी ने मिल कर शिव शंकर को गंदी-गंदी गालियाँ देनी शुरू कर दी।

जब शिव शंकर ने इसका विरोध किया तो हैदर और सलमान ने साथ आए साथियों सहित उनकी पिटाई शुरू कर दी। ये सभी हमलावर पीड़ित को पीटते हुए CJM कोर्ट तक ले गए। इस पिटाई से शिव शंकर की टी शर्ट फट गई। सीने और गर्दन पर कई वार किए जाने से शिवशंकर गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्होंने बताया कि अगर अदालत में मौजूद पुलिसकर्मी न पहुँचते तो कामिल मुस्तफा के दोनों बेटे अपने साथियों के साथ मिल कर उनकी हत्या कर देते। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

नोच ली थी शिवशंकर की शिखा भी

पीड़ित ने अपनी शिकायत में आरोपितों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की माँग की थी। ऑपइंडिया द्वारा जुटाई गई जानकारी के मुताबिक, हमलावरों ने शिवशंकर की शिखा तक नोच डाली थी और उन्हें सार्वजनिक तौर पर बुरी तरह से अपमानित भी किया था। तब पुलिस ने इस शिकायत पर हैदर, सलमान को नामजद करते हुए 10-15 अज्ञात अधिवक्ताओं पर FIR दर्ज कर ली थी। इन सभी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 191 (2), 115 (2), 352 और 351 (3) के तहत केस दर्ज कर लिया था।

मोहिनी तोमर ने उठाया था शिव शंकर को न्याय दिलाने का बीड़ा

ऑपइंडिया द्वारा जुटाई गई जानकारी के मुताबिक, शिवशंकर को पीटने के बाद आरोपित निश्चिन्त थे कि उनके खिलाफ कोर्ट में कोई वकील खड़ा नहीं होगा। इस बाबत अदालत में दबदबा रखने वाला सीनियर एडवोकेट कामिल मुस्तफा ने अपने दोनों नामजद बेटों को बचाने के प्रयास भी शुरू कर दिए थे। तब महिला वकील मोहिनी तोमर ने खुल कर शिवशंकर का साथ दिया था। बताया जाता है कि मोहिनी के प्रयास कामिल मुस्तफा के दाँव-पेंच पर भारी पड़े थे।

शिवशंकर की पिटाई के बाद कासगंज कोतवाली में 31 जुलाई 2024 को दर्ज FIR नंबर 507/2024 में तब एडवोकेट कामिल मुस्तफा के बेटे सलमान और हैदर को जेल जाना पड़ा था। जिला अदालत में इन दोनों आरोपितों की जमानत का विरोध वकील मोहिनी तोमर ने किया था। मोहिनी के पति का आरोप है कि इसी वजह से न सिर्फ कामिल मुस्तफा बल्कि उनके बेटे भी अंदर ही अंदर खुन्नस खा रहे थे।

फ़िलहाल महिला अधिवक्ता की हत्या के आरोप में कासगंज पुलिस ने मुस्ताफा कामिल, उनके बेटे हैदर मुस्तफा, असद मुस्तफा और सलमान मुस्तफा सहित सभी 6 नामजद आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। कासगंज की पुलिस अधीक्षक अपर्णा रजत कौशिक के मुताबिक मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जा रही है।

तकनीकी खराबी बता कर कपिल सिब्बल ने सौंपी सिर्फ 27 मिनट की वीडियो फुटेज, CBI ने पूछा – हमसे क्यों छिपा रहे? RG Kar पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश – सुनिश्चित करें डॉक्टरों की सुरक्षा

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार (9 सितंबर, 2024) को सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल स्थित RG Kar मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में हुई महिला डॉक्टर की बलात्कार और हत्या की घटना पर सुनवाई हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दौरान प्रदर्शनकारी डॉक्टरों को काम पर वापस लौटने के लिए कहा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंगलवार शाम 5 बजे तक अगर वो काम पर लौट जाते हैं तो उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए। पश्चिम बंगाल सरकार के वकील कपिल सिब्बल ने आश्वासन दिया कि ट्रांसफर वगैरह जैसी कोई कार्रवाई इस स्थिति में नहीं की जाएगी।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने TMC सरकार को निर्देश दिया कि अस्पतालों में कामकाज के लिए एक सुरक्षित और सुविधाजनक माहौल तैयार किया जाए। निर्देश दिया गया कि डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर कदम उठाए जाएँ, ताकि उनके मन में आत्मविश्वास का संचार हो। अलग ड्यूटी रूम, स्वच्छ शौचालय और CCTV कैमरे लगाने का निर्देश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से भी सुरक्षा की व्यवस्था करने को कहा। इस दौरान मुख्य सचिव ने बताया कि RG Kar सहित अन्य सरकारी अस्पतालों में सुविधाएँ दिए जाने के लिए फंड्स जारी कर दिए गए हैं।

राज्य सरकार ने इस दौरान डॉक्टरों पर आरोप लगाते हुए कहा कि हड़ताल की वजह से 23 मरीजों की मौत हुई है और 6 लाख मरीजों को इलाज से वंचित होना पड़ा है। राज्य सरकार की दलील थी कि इस हड़ताल की वजह से राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा ने कहा कि जूनियर डॉक्टरों को धमकियाँ मिल रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों से कहा कि वो काम पर लौटें, हर जिले के डीएम-एसपी उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे।

मुख्य न्यायाधीश DY चंद्रचूड़ ने कहा कि विरोध ड्यूटी की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट बलात्कार-हत्या के मामले का स्वतः संज्ञान लेने के बाद सुनवाई कर रही है। कपिल सिब्बल का कहना है कि CCTV फुटेज में कुछ खराबी थी, इस कारण मात्र 27 मिनट का क्लिप ही सुप्रीम कोर्ट को दिया गया। इस दौरान CBI के वकील ने कहा कि उनसे फुटेज क्यों छिपाई जा रही है? कपिल सिब्बल ने सील किए गए लिफाफे में इसे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश किया, इस पर CBI भड़क गई।

10 साल में हिंदू बढ़े 12%, मुस्लिम बढ़ गए 25%… ऐसे ही नहीं अवैध मस्जिद-मदरसों से उबला हिमाचल प्रदेश, लव-लैंड जिहाद से भी हो रहा डेमोग्राफी चेंज

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में अवैध रूप से बनाई गई संजौली मस्जिद को तोड़ने की माँग इन दिनों जोर पकड़ रही है। प्रदेश के हिन्दू सड़कों पर उतरे हुए हैं और राज्य में बन रहे अवैध ढांचों पर कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। उनकी इस माँग का समर्थन कॉन्ग्रेस सरकार के मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने भी किया है। हिमाचल प्रदेश में अब डेमोग्राफी में बदलाव का खतरा भी स्थानीय लोगों को लगने लगा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रदेश में तेजी से अवैध घुसपैठ हो रही है।

हिमाचल प्रदेश में डेमोग्राफी में बदलाव के साथ ही मस्जिद-मदरसों की संख्या में भी बढ़त देखी गई है। कई जगह इनका निर्माण अवैध रूप से हुआ है। प्रादेशिक स्तर पर हिन्दू हितों के लिए काम करने वालों का कहना है कि इस पूरे खेल में राज्य का वक्फ बोर्ड भी शामिल है। उनका कहना है कि राज्य में डेमोग्राफी बदलाव की कोशिशों में तेजी पिछले 3-4 साल से तेजी आई है।

10 साल में 25% बढ़ी मुस्लिम आबादी

हिमाचल प्रदेश हिन्दू बहुसंख्यक आबादी वाला राज्य है। यहाँ 90% से अधिक जनसंख्या हिन्दू धर्म को मानने वालों की है। लेकिन हिन्दू आबादी की वृद्धि दर राज्य की मुस्लिम आबादी से कहीं कम है। हिमाचल प्रदेश की जनगणना के आँकड़े से पता चलता है कि वर्ष 2001 से 2011 के बीच राज्य में मुस्लिम आबादी 25% की गति से बढ़ी। हिमाचल प्रदेश की मुस्लिम आबादी 2001 में 1.19 लाख थी। यह 2011 में बढ़ कर 1.49 लाख पहुँच गई। इसमें इस दौरान 25.6% की वृद्धि हुई। वहीं इस दौरान हिन्दू आबादी की वृद्धि दर केवल 12% रही।

यदि इसी वृद्धि दर को ही माना जाए तो इस समय हिमाचल प्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग 1.9 लाख हो गई होगी। इस संख्या में वह लोग शामिल नहीं हैं जो बाहर से आकर हिमाचल प्रदेश में रह रहे हैं या फिर जनसंख्या में गिने नहीं गए। हिन्दू जागरण मंच (HJM) के महामंत्री कमल गौतम का कहना है कि राज्य कुछ वर्षों पहले जिन इलाकों में 100 बाहरी मुस्लिम रह रहे थे वहाँ अब उनकी संख्या बढ़ कर चार गुनी हो गई है। उन्होंने डेमोग्राफी में बदलाव को बड़ी चिंता बताया है।

मस्जिद-मदरसों की संख्या तेजी से बढ़ी

हिमाचल प्रदेश में मात्र मुस्लिम आबादी और बाहरी घुसपैठ ही एक समस्या नहीं है। राज्य में मस्जिद-मदरसे भी तेजी से बढ़े हैं। हिन्दू जागरण मंच ने एक रिपोर्ट में बताया है कि राज्य कोरोना काल से पहले 393 मस्जिदें थी। लेकिन कोरोना के बाद इनकी संख्या 520 हो गई। बताया गया कि सिरमौर जिले में सबसे अधिक 130 मस्जिदें बन गई हैं। इसके अलावा चंबा में 87 और ऊना में 52 मस्जिदें हैं। प्रदेश में मदरसों की संख्या भी 35 है।

हिन्दू जागरण मंच का आरोप है कि उन जगह पर मस्जिदें बनाई जा रही हैं जहाँ कोई भी मुस्लिम नहीं रहता। इसके अलावा उनका निर्माण भी अनुमति के हो रहा है। संजौली की मस्जिद को लेकर हुआ विवाद इसी कारण है। यह मस्जिद असल में काफी छोटी थी और यहाँ मात्र दो मंजिल थी। लेकिन बिना अनुमति के यहाँ भी पाँच मंजिल मस्जिद खड़ी कर दी गई। यहाँ नगर निगम की नोटिस के बाद भी काम नहीं रोका गया। इसी तरह शिमला के कसुम्पटी में भी चोरी छुपे मस्जिद का निर्माण चल रहा था।

सिर्फ शिमला ही नहीं बल्कि मंडी में भी अवैध मस्जिद के निर्माण की बात सामने आई है। मंडी में PWD की जमीन पर मस्जिद का ढाँचा खड़ा कर दिया गया। यहाँ भी बिना नक्शा बनवाए ही काम किया गया।

हिन्दू जागरण मंच का कहना है कि पहले किसी व्यक्ति की जमीन खरीदी जाती है और उस पर एक ढाँचा खड़ा किया जाता है, इसके बाद आसपास की जमीन कब्जा ली जाती है। हिन्दू जागरण मंच ने यह भी बताया कि मस्जिदों को बाहर तिरपाल और टेंट से घेर कर अंदर चुपके से काम होता रहता है। मंडी में 2023 में एक अस्थायी मस्जिद को गिराया भी गया था।

अपराध भी बढ़ रहा

हिमाचल प्रदेश देश के सबसे शांत राज्यों में एक है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यहाँ भी ऐसे अपराध सामने आए हैं जिनमें बाहर से आने वाले मुस्लिम शामिल रहे हैं। हाल ही में बकरीद के दौरान सोलन में दुकान करने वाले जावेद नाम के एक युवक ने अपने स्टेटस पर कथित तौर पर गोकशी का फोटो लगाया। इसके बाद माहौल बिगड़ गया। यह युवक उत्तर प्रदेश का रहने वाला है। इससे पहले वर्ष 2023 में चंबा में मनोहर नाम के एक युवक की हत्या कर दी गई।

मनोहर का अपराध इतना था कि वह एक मुस्लिम लड़की से प्रेम करता था। उसकी लाश के तक टुकड़े टुकड़े कर दिए गए। यह मुद्दा हिमाचल में लम्बे समय तक छाया रहा। हिन्दू जागरण मंच का आरोप है कि इस मामले में ढिलाई बरती गई। इससे पहले 2022 में एक हिन्दू नाबालिग बच्ची प्राची की हत्या एक आसिफ नाम के एक युवक ने कर दी थी। आसिफ इस घर में अखबार बाँटने जाता था। इसके अलावा बाहर से आने वाले लोग यहाँ चेन स्नेंचिंग जैसे छोटे-मोटे अपराधों को भी बढ़ावा दे रहे हैं।

राज्य में घुसपैठ

लव जिहाद के मामले भी आए सामने

हिमाचल प्रदेश में लव जिहाद के मामले भी सामने आने लगे हैं। सितम्बर, 2023 में हिमाचल प्रदेश के मंडी से एक ऐसा ही गंभीर मामला सामने आया था। मंडी में जम्मू कश्मीर के एक युवक ने खुद को सेना का जवान बताया और अपना नाम सोनू बताया। वह जिस किराए के घर में रहता था, वहीं की रहने वाली एक लड़की को उसने अपनी हिन्दू पहचान बता कर फंसा लिया और फिर उसको अगवा करके जम्मू लेकर चला गया। लड़की को बाद में पता चला कि सोनू असल में अयाज है। इसके बाद लड़की किसी तरह वापस अपने घर पहुँच सकी।

उसने वापस आकर अपनी आपबीती बताई। अगस्त, 2023 में ही हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा से एक लड़की को एक युवक भगा कर राजस्थान लेकर गया। हरनोटा गाँव के लोगों ने बताया था कि इस वारदात में मुस्लिम युवक शामिल था। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि उनके इलाके में मुस्लिम युवक लगातार ऐसी ही वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।

क्या चंदन गुप्ता की वकील थीं मोहिनी तोमर, क्या मुनाजिर की जमानत का विरोध करने पर हुई हत्या? तिरंगा यात्रा में जिस हिंदू को मार डाला, उनके भाई ने दिया हर सवाल का जवाब

उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में मंगलवार (3 सितंबर 2024) को एक महिला वकील मोहिनी तोमर की हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड का आरोप एडवोकेट मुस्तफा कामिल, असद, हैदर, सलमान, मुनाजिर और केशव मिश्रा पर लगा था। अब तक इस मामले में 4 आरोपित गिरफ्तार हुए हैं जबकि 2 अन्य फरार हैं।

आरोपितों में से एक नाम ‘मुनाजिर रफी’ का भी है। साल 2018 में ये मुनाजिर चंदन गुप्ता हत्याकांड में भी आरोपित था। उस समय उसकी बेल याचिका का विरोध मोहिनी तोमर ने किया था। अब चूँकि उसी मुनाजिर का नाम मोहिनी तोमर हत्याकांड में आया है इसलिए हमने इस संबंध में चंदन गुप्ता के परिजनों से बात करते हुए जमीनी पड़ताल की और जाना कि आखिर मुनाजिर का कैसे चंदन गुप्ता केस में संबंध था और कैसे मोहिनी ने इसके खिलाफ आवाज उठाई थी।

मोहिनी तोमर के पति ने अपनी FIR में आरोप लगाया है कि मृतका ने साल 2018 के चंदन गुप्ता हत्याकांड में आरोपित मुनाजिर की जमानत का विरोध किया था। इस बावत चंदन गुप्ता के भाई विवेक ने बताया कि मोहिनी तोमर ने उनके भाई का केस लड़ने के लिए वकालतनाम लगाया था। हालाँकि मुकदमे को किसी और वकील ने लड़ा था। जब कासगंज कोर्ट में मुनाजिर की जमानत अर्जी पर बहस चल रही थी तब चंदन गुप्ता की तरफ से कई हिन्दू वकील खड़े हो गए थे। मुनाजिर का विरोध करने वाले इन वकीलों में मोहिनी तोमर भी शामिल थीं।

विवेक गुप्ता का कहना है कि मोहिनी तोमर सहित कई वकीलों के विरोध और पुलिस द्वारा पेश किए गए सबूतों की ही वजह से तब मुनाजिर की जम्मानत अर्जी ख़ारिज हो गई थी। हालाँकि असद और कामिल जैसे तमाम मुस्लिम वकीलों ने मुनाजिर को जमानत दिलाने की हर सम्भव कोशिश की थी। 4 से 5 महीने जेल काटने के बाद मुनाजिर को हाईकोर्ट से जमानत मिल पाई थी। इसी बीच केस का ट्रायल लखनऊ की अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया।

मुनाजिर को जेल भिजवाने में मोहिनी का था अहम रोल

विवेक ने हमें आगे बताया कि जब चंदन गुप्ता की हत्या में मुनाजिर रफी का नाम सामने आया था तब कचेहरी में वकीलों के 2 गुट बन गए थे। पहले गुट में अधिकतर मुस्लिम वकील थे जो मुनाजिर की नामजदगी को गलत बता रहे थे। वो प्रशासन पर इस नाम को हटाने का प्रयास भी कर रहे थे। कामिल और असद मुस्तफा भी इस गुट के सदस्य थे। वहीं दूसरा गुट हिन्दू वकीलों का था जो चाहता था कि मुनाजिर पर नियमानुसार एक्शन हो। हिन्दू गुट के वकीलों में मोहिनी तोमर प्रमुख थीं। आखिरकार जीत हिन्दू पक्ष के वकीलों की हुई और मुनाजिर को जेल भेज दिया गया।

भाई सहित मुनाजिर पर भी हिंसक भीड़ में शामिल होने का आरोप

मोहिनी तोमर के कत्ल वाली FIR में नामजद मुनाजिर रफ़ी पेशे से वकील है। वह कासगंज की कोर्ट में वकालत करता है। आरोप है कि 26 जनवरी 2018 को चंदन गुप्ता को जिस भीड़ ने घेर कर मारा था उसमें मुनाजिर अपने भाई आमिर रफी के साथ शामिल था। चंदन गुप्ता के भाई विवेक ने ऑपइंडिया को बताया कि मुनाजिर का नाम जाँच के दौरान आया था। वह न सिर्फ तिरंगा यात्रा को रोकने बल्कि जानलेवा हमला करने वाली भीड़ में भी शामिल था। दावा किया गया कि तब मुनाजिर रफ़ी के हाथों में हथियार भी देखे गए थे।

मुनाजिर की पैरवी कर रहे थे कामिल और असद

मोहिनी हत्याकांड में वकील मुनाजिर के साथ उसी के पेशे वाले कामिल और असद नामजद किए गए हैं। विवेक गुप्ता ने ऑपइंडिया को बताया कि इन तीनों में आपस में गहरा रिश्ता है। रिश्ते की जड़ में मुनाजिर, कामिल और असद का वकील और हम-मज़हब (मुस्लिम) होना बताया गया। विवेक गुप्ता का दावा है कि जब उनके भाई चंदन की हत्या के बाद मोहिनी तोमर सहित कई अन्य हिन्दू वकील मुनाजिर की गिरफ्तारी की माँग कर रहे थे तो असद और कामिल विरोधी खेमे में खड़े थे।

विवेक का दावा है कि चंदन हत्याकांड में मुनाजिर का नाम आने के बाद उसके समर्थन में मुस्लिम वकीलों की लॉबी खड़ी करने में असद और कामिल का बहुत बड़ा रोल था। इतना ही नहीं, मुनाजिर को गिरफ्तारी से न बचा पाने एक बाद असद और कामिल उसकी पैरवी करने लखनऊ तक गए थे। बकौल विवेक गुप्ता असद और कामिल ने चंदन हत्याकांड में न सिर्फ वकील मुनाजिर की मदद की थी बल्कि अन्य कातिलों को भी मुस्लिम होने के नाते भरपूर सहयोग किया था।

हर पीड़ित हिन्दू की यथाशक्ति मदद करती थीं मोहिनी

विवेक गुप्ता ने हमसे बातचीत के दौरान खुल कर स्वीकार किया कि उनके भाई की हत्या के बाद मोहिनी तोमर लगातार उनके परिवार की मदद कर रहीं थीं। विवेक ने यह भी बताया कि मोहिनी तोमर सिर्फ उनकी नहीं बल्कि कहीं भी मुस्लिमों द्वारा प्रताड़ित हिन्दुओं की मदद करने के लिए खुद से आगे आ जाती थीं जिसकी वजह से वो कट्टरपंथियों के निशाने पर थीं।

हमें अब दबाव नहीं बल्कि जान का खतरा

15 अगस्त 2022 को ऑपइंडिया ने चंदन गुप्ता के पिता से बात की थी। तब उन्होंने बताया था कि उनके परिवार को मुस्लिमों की तरफ से केस वापसी का दबाव मिल रहा है। इस बावत चंदन गुप्ता के भाई ने बताया कि अब उनकी गवाही हो चुकी है। विवेक ने कहा कि गवाही होने से पहले केस वापसी के खूब दबाव मिले लेकिन अब उन्हें जान का खतरा है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि कासगंज का प्रशासन उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

बताते चलें कि 26 जनवरी 2018 को कासगंज के कुछ युवकों ने तिरंगा यात्रा निकाली थी। इस यात्रा का नेतृत्व चंदन गुप्ता कर रहा था। अचानक ही मुस्लिम भीड़ ने इस यात्रा पर हमला किया। हमले में चंदन गुप्ता की मौत हो गई थी। इस मामले ने साम्प्रदायिक रंग ले लिया था और काफी दिनों तक कासगंज में कर्फ्यू जैसे हालत बने रहे। फ़िलहाल इस पूरे मामले का ट्रायल लखनऊ में चल रहा है।

राहुल गाँधी, राही मासूम रजा की स्क्रिप्ट नहीं है ‘महाभारत’, शोषित नहीं था वह एकलव्य जिसका अँगूठा दिखा आप भारत को कर रहे बदनाम: पढ़िए कैसे बिछा दी थी यादवों की लाशें

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी फ़िलहाल अमेरिका के दौरे पर हैं। जब-जब वो विदेश जाते हैं, भारत को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। कभी वो कहते हैं कि देश में केरोसिन तेल छिड़का हुआ है और आग लगाने के लिए एक छोटी सी चिंगारी काफी है, तो कभी कहते हैं कि मुस्लिमों, दलितों और जनजातीय समाज पर भारत में हमले हो रहे हैं। अब एक बार फिर से उन्होंने भारत देश और हिन्दू धर्म को बदनाम करने के लिए इतिहास की एक घटना को गलत तरीके से पेश किया है।

राहुल गाँधी ने ऑस्टिन स्थित ‘यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास’ में छात्रों के साथ संवाद करते हुए उनके मन में भारत और हिन्दू धर्म के प्रति घृणा भरी। रविवार (8 सितंबर, 2024) को कॉन्ग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष 3 दिवसीय अमेरिका दौरे पर डलास पहुँचे। इस दौरान ओवरसीज कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा भी उनके साथ थे। छात्रों से बात करते हुए राहुल गाँधी ने पूछा कि क्या उन्होंने एकलव्य की कहानी सुनी है? फिर उन्होंने कहा कि अगर आप भारत में आज क्या हो रहा है इसे समझना चाहते हैं तो इतना जान लीजिए कि रोज लाखों एकलव्य की कहानी चल रही है।

उन्होंने कहा कि वो लोग जिनके पास कौशल है उन्हें आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया जा रहा है। राहुल गाँधी ने कहा कि केवल 1-2 % लोगों को समर्थ बना कर भारत को शक्तिशाली नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने स्किल डेवलपमेंट की बात करते हुए एक अजीबोगरीब उदाहरण भी दिया जो समझ से परे था। बता दें कि अक्सर एकलव्य की कहानी बता कर भारत में एक समूह दलितों और जनजातीय समाज को भड़काता रहता है। आइए, जानते हैं कि एकलव्य की कहानी क्या थी।

एकलव्य की प्रचलित कहानी के जरिए कॉन्ग्रेसी प्रपंच

अक्सर एकलव्य से जुड़ी घटना को बड़े परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा जाता है। सिर्फ कहीं सीरियल में कुछ देख लिया, हो गया। न कोई मूल स्रोत तक पहुँचने की कोशिश करता है और न ही कोई उस समय की परिस्थिति और राजनीति को समझने की कोशिश करता है। ये वो दौर था जब हस्तिनापुर पूरे भारतवर्ष पर अपने आधिपत्य को स्थापित करने में लगा हुआ था और खुद हस्तिनापुर साम्राज्य में आंतरिक कलह की पटकथा लिखी जा रही थी। ये वो दौर था जब श्रीकृष्ण को मथुरा को लगातार हो रहे बाहरी हमलों से बचाना था।

सबसे पहले संक्षेप में जान लीजिए कि एकलव्य की क्या कहानी चलती है। कहा जाता है कि एक बार द्रोणाचार्य जंगल में अर्जुन सहित अपने अन्य शिष्यों के साथ जा रहे थे तो एक कुत्ता वहाँ भौंकता हुआ आया। तभी एक लड़के ने अचानक कई तीर उस कुत्ते के मुँह में छोड़े और वो चुप हो गया लेकिन मरा नहीं। द्रोणाचार्य ने देखा तो एकलव्य वहाँ धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। आश्चर्य की बात ये थी कि एकलव्य ने गुरु द्रोण की मूर्ति बना रखी थी, साथ ही उन्हें अपना शिक्षक भी मान लिया था।

फिर द्रोणाचार्य ने उससे बातचीत की और अंत में गुरु-दक्षिणा माँगी। द्रोणाचार्य ने अर्जुन को आशीर्वाद दे रखा था कि इस पृथ्वी पर उससे बड़ा धनुर्धर कोई नहीं हो पाएगा। उन्हें लगा कि एकलव्य कहीं अर्जुन से बड़ा न बन जाए, इसीलिए उन्होंने उसका अँगूठा माँग लिया। इसके बाद एकलव्य उतना अच्छा धनुर्धर नहीं रहा। कहानी ये चलती है कि द्रोणाचार्य का ये कृत्य ‘ब्राह्मणवाद’ में आता है और एकलव्य जनजातीय समाज से घृणा का शिकार बना। क्या सचमुच ऐसा ही था? आइए, समझते हैं।

जब एकलव्य की वीरता देख दंग रह गए पांडव और द्रोणाचार्य

मूल महाभारत में ये कथा किस रूप में है, सबसे पहले हमें ये समझना होगा। अर्जुन बचपन से ही महान धनुर्धर बन गए थे। एक बार द्रोणाचार्य ने रसोइए को बुला कर कहा था कि वो कभी भी अँधेरे में अर्जुन को भोजन न परोसे। वो द्रोणाचार्य के भी प्रिय बन गए थे। एक बार हवा चलने के कारण दीपक बुझ गया और अर्जुन अभ्यास के कारण अँधेरे में भी भोजन करने लगे, उनका हाथ सीधा थाली से मुँह तक जाता था। इससे इन्हें पता चला कि अँधेरे में भी अभ्यास किया जा सकता है।

इसी तरह अगर आप महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के बारे में पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि उनके नाम में ‘चाँद’ और फिर ‘चंद’ ही इसीलिए जुड़ा था क्योंकि सेना की अपनी नौकरी के दौरान वो चाँदनी रात में हॉकी का अभ्यास किया करते थे। जहाँ तक एकलव्य की बात है, वो भी बड़ा धनुर्धर था और उसने धनुर्विद्या के अभ्यास के लिए जंगल में ही द्रोणाचार्य की प्रतिमा तक गढ़ रखी थी। वह द्रोणाचार्य में श्रद्धा रखता था, साथ ही एकचित्त से अभ्यास करता था। अस्त्रों के विमोचन, आदान और संधान में वो दक्ष होने लगा।

उसी दौरान कौरव और पांडव, दोनों ही वन में विचरण कर रहे थे। एक व्यक्ति अपने कुत्ते के साथ जल आदि लेकर उनके साथ चल रहा था। उस कुत्ते ने एकलव्य को देखा और भौंकने लगा। इस दौरान बताया गया है कि एकलव्य का शरीर काला था, अंग मलिन थे। उसने मृग की छाल पहन रखी थी। महाभारत में एकलव्य के लिए ‘निषाद पुत्र’ और ‘व्याध पुत्र’ शब्द का प्रयोग किया गया है। यानी, निषाद और शिकारी का बेटा। खैर, इस पर हम आगे भी बात करेंगे। एकलव्य ने कुत्ते को भौंकते हुए देख कर एक साथ 7 बाण उसके मुँह में चलाए।

कुत्ता शांत हो गया और फिर पांडवों के पास वापस गया। ये सभी लज्जित हो गए कि आखिर वो कौन है जिसने शब्द के आधार पर कुत्ते के मुँह में बाण चलाया और इतनी फुर्ती दिखाई। एकलव्य को महाभारत में ‘वनवासी’ भी कहा गया है। वो दिन-रात लगातार बाण चला-चला कर अभ्यास कर रहा था। पांडवों के पूछने पर उसने अपना परिचय हिरण्यधनु के पुत्र और द्रोणाचार्य का शिष्य बताया। वापस लौट कर शिष्यों ने द्रोणाचार्य को सारी बातें बताईं। अर्जुन ने एकांत में द्रोणाचार्य से इस संबंध में बात की।

अर्जुन ने याद दिलाया कि गुरु द्रोण ने कहा था कि अर्जुन से बड़ा धनुर्धर उनका कोई शिष्य नहीं होगा, इसके बावजूद आपका दूसरा शिष्य (एकलव्य) मेरे से नहीं बल्कि सभी से श्रेष्ठ प्रतीत होता है। इसके बाद द्रोणाचार्य अर्जुन को लेकर वन में गए और जटाधारी एकलव्य को अभ्यास करते हुए देखा। एकलव्य ने द्रोणाचार्य के पाँव छूकर उन्हें प्रणाम किया। उसने द्रोणाचार्य को बताया कि वो उनका ही शिष्य है। द्रोणाचार्य ने कहा कि अगर तुम मेरे शिष्य हो तो मुझे गुरु-दक्षिणा दो।

महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार, एकलव्य ने सहर्ष इस माँग को स्वीकार किया और पूछा कि उन्हें क्या चाहिए। द्रोणाचार्य ने उससे दाहिनी हाथ का अँगूठा माँग लिया। एकलव्य के लिए ये माँग कठोर थी, फिर वो प्रसन्नचित्त था और उसने अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण कर बिना दुःख माने अपनी दाहिनी हाथ का अँगूठा उन्हें काट कर दे दिया। इसके बाद भी एकलव्य शेष उँगलियों का इस्तेमाल कर ही बाण चलाने लगे, लेकिन उनकी धनुर्विद्या में अब पहले सी तीक्ष्णता नहीं रही।

महाभारत वर्णित है कि इसके बाद द्रोणाचार्य प्रसन्न हुए कि कोई अर्जुन को नहीं हरा पाएगा। क्या एकलव्य सचमुच गरीब था? नहीं। एकलव्य के पिता हिरण्यधनु निषादराज थे। उनका अपना राज्य था। साथ ही जरासंध के साथ उनकी संधि थी। द्रोणाचार्य केवल कौरवों-पांडवों के गुरु ही नहीं थे बल्कि हस्तिनापुर के रणनीतिकारों में से भी थे, सेनापतियों में से थे। ऊपर से एक गरीब ब्राह्मण को दोस्त द्रुपद द्वारा धोखा दिए जाने के बाद हस्तिनापुर में भीष्म पितामह ने शरण दी थी और कार्यभार व पद सौंपा था।

द्रोणाचार्य जहाँ का रोटी खाते थे, उस राज्य के प्रति निभाई वफादारी

ऐसे में वो हस्तिनापुर के प्रति वफादार थे। उनके ये कार्य भी था कि हस्तिनापुर के खिलाफ पनपने वाले दुश्मनों का वो सफाया करें, और युद्ध में संवेदनाओं के लिए बहुत जगह नहीं होती। जरासंध न सिर्फ हस्तिनापुर का दुश्मन था, बल्कि श्रीकृष्ण का भी दुश्मन था। भीम ने मल्लयुद्ध में उसे हराया था। जरासंध के मित्र होने का अर्थ हुआ हस्तिनापुर का दुश्मन और द्रोणाचार्य ने केवल अर्जुन के लिए ये फैसला नहीं लिया, बल्कि जिस हस्तिनापुर ने उन्हें सब कुछ दिया था उसका प्रति अपनी वफादारी का प्रदर्शन करते हुए ये फैसला लिया।

इसमें जाति का कहीं से कुछ लेना-देना नहीं है और न ही इसका वर्णन है। उस समय की कूटनीति के हिसाब से ये फैसला लिया गया था। कई जगह ये भी जिक्र मिलता है कि एकलव्य अँगूठे के बिना भी धनुष-तीर का संधान कर सकता था, आज भी इस तकनीक को तीरंदाज अपनाते हैं। आज खेल प्रतियोगिताओं में सामान्यतः अँगूठे का इस्तेमाल नहीं किया जाता है, इसीलिए आप एकलव्य को आधुनिक तीरंदाजी का जनक भी कह सकते हैं। यानी, द्रोणाचार्य के मन में भी एकलव्य के प्रति सहानुभूति रही होगी, तभी उन्होंने उससे सिर्फ अँगूठा ही माँगा था, छल से उसकी हत्या नहीं की थी।

यदुवंशियों का हत्यारा थे एकलव्य, जरासंध का अनुचर

एकलव्य ने जरासंध की तरफ से मथुरा पर आक्रमण भी किया था, कई यादव योद्धाओं को उसने मार गिराया था। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण को भी अपनी प्रजा की सुरक्षा के लिए उससे युद्ध करना पड़ा। पुराणों में इसका भी जिक्र मिलता है कि कैसे कृष्ण-बलराम का जरासंध के साथ भयानक युद्ध हुआ था। युद्ध में एक बार एकलव्य गदा प्रहार से अचेत भी हो गया था, जिसके बाद शकुनि के पुत्र उलूक ने उसे बचाया। वहीं एकलव्य ने युद्ध में फँसे हुए जरासंध की अपनी सेना सहित मदद की थी।

जब जरासंध युद्ध में फँस गया था, तब एकलव्य ही था जो उसे लेकर रथ से युद्धभूमि से दूर ले भागा था। इस युद्ध में कृष्ण-बलराम की जीत हुई थी, लेकिन बड़ी संख्या में मथुरा की यादव सेना को क्षति पहुँची थी।आज जो यादव श्रीकृष्ण को अपना पूर्वज मानते हैं, क्या वो इस बात को स्वीकार करेंगे कि एकलव्य ने यदुवंश के कई वीरों को सदा के लिए भूमि पर लिटा दिया था। क्या राहुल गाँधी इसका जिक्र करेंगे? राही मासूम रज़ा द्वारा लिखी गई महाभारत के सीरियल को देख कर नहीं बल्कि पुस्तकें पढ़ कर राय बनानी चाहिए।

कुछ जगह ये भी जिक्र मिलता है कि एकलव्य, हिरण्यधनु का सिर्फ दत्तक पुत्र था। वो श्रीकृष्ण का रिश्तेदार था, ऐसे में उसके यदुवंशी होने की संभावना भी जताई जाती है। एकलव्य ने पौंड्रक के साथ मिल कर भी मथुरा पर आक्रमण किया था। श्रीकृष्ण जब ‘रणछोड़’ बने थे और एक पर्वत में छिप गए थे, तब वहाँ आग लगा कर उन्हें मार डालने की साजिश में भी वो शामिल था। बलरामजी ने उन्हें पराजित किया था, अंत में युद्ध में ही श्रीकृष्ण के हाथों उसका वध हुआ।

अपने बेटे तक को द्रोणाचार्य ने नहीं सिखाया ब्रह्मास्त्र

जहाँ तक गुरु द्रोणाचार्य की बात है, उन्होंने तो पात्रता और अपात्रता के संबंध में अपने बेटे तक से समझौता नहीं किया। उन्होंने अश्वत्थामा को ब्रह्मास्त्र के संधान का तो ज्ञान दिया, लेकिन संहार का नहीं। कर्ण भी उनका ही शिष्य था, लेकिन यहाँ से उसे ब्रह्मास्त्र मिलने की आशा नहीं थी तो वो चला गया। वो महेंद्र पर्वत पर परशुराम जी के पास गया। इससे साफ़ है कि द्रोणाचार्य की वफादारी राष्ट्र के प्रति थी, वो जातिवादी नहीं थे बल्कि एक कूटनीतिज्ञ थे, एक रणनीतिकार के रूप में उन्होंने ये फैसला लिया।

द्रोणाचार्य ने तो कई राज़ अपने बेटे तक को नहीं बताए थे, ऐसे में एकलव्य का आगे बढ़ जाना वो कैसे स्वीकार करते क्योंकि वो हस्तिनापुर के लिए खतरा बन सकता था। हस्तिनापुर का कुलगुरु होने के कारण उन्होंने सोचा कि उनकी विद्या का प्रयोग उनके ही खिलाफ होगा जिनके लिए वो काम करते हैं, तो ये अधर्म हो जाएगा। जरासंध अधर्मी था और धर्म-परायण राजाओं का शत्रु भी। उसने कई राजकुमारों को बंदी बना कर रखा था। द्रोणाचार्य ने बिना अँगूठे के धनुर्विद्या का जो प्रयोग सिखाया, वो आज तक चला आ रहा है।

बड़ी बात देखिए, अँगूठा कट जाने के बाद भी एकलव्य ने मथुरा की सीमा में हाहाकार मचा दिया था। उसका स्पष्ट मानना था कि जरासंध ही उसका राजा रहा है और वो उसके प्रति वफादार रहेगा। श्रीकृष्ण को ये भी पता था कि एकलव्य अगर महाभारत के युद्ध में शामिल हुआ तो कौरवों का पलड़ा बहुत भारी हो जाएगा। एकलव्य के बेटे ने महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया था और भीम के हाथों मारा गया था। महाभारत के युद्ध में तो भीष्म और द्रोण सब मारे गए, यानी जो भी योद्धा अधर्म का साथ देगा उसे मरना पड़ेगा।

‘कोलकाता में घर है, ED दिल्ली बुला रही’: कोयला घोटाला में समन रद्द करवाने सुप्रीम कोर्ट गए थे ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी, TMC सांसद को नहीं मिली राहत

कोयला घोटाला मामले में तृणमूल कॉन्ग्रेस (Trinamool congress) के सांसद अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) और उनकी पत्नी रुजिरा बनर्जी की याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने खारिज कर दिया ह। अपनी याचिका में उन्होंने घोटाले के संबंध में मिले ईडी के समन को चुनौती दी थी।

अपनी याचिका में उन्होंने कहा था कोलकाता में उनका सामान्य निवास स्थान है, लेकिन ED ने उन्हें नई दिल्ली में पेश होने को कहा। उनकी इस याचिका पर गौर करते हुए जस्टिस बेला त्रिवेदी और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने फैसला सुनाया। इससे पहले इस मामले में 13 अगस्त को फैसला सुरक्षित रखा गया था।

ईडी ने जो समन अभिषेक बनर्जी और उनकी पत्नी को भेजा उसमें कहा गया था कि घोटाले के पैसे को दिल्ली और विदेश मे ट्रांसफर किए गए थे, इसलिए दिल्ली मे पूछताछ की जा सकती है, जबकि बनर्जी और उनकी पत्नी का कहना था कि उन लोगों से पूछताछ कोलकाता में हो सकती है फिर भी उन्हें बुलाया जा रहा है।

बता दें कि इस मामले में अभिषेक बनर्जी की ओर से कपिल सिब्बल और रुजिरा बनर्जी की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी और गोपाल शंकरनारायण से कोर्ट में पेश हुए थे। हालाँकि बावजूद इसके उनकी याचिका पर गौर नहीं हुआ।

गौरतलब है कि इससे पहले पश्चिम बंगाल के स्कूलों में करोड़ों रुपये के भर्ती घोटाले में पैसे के लेन-देन की जांच के संबंध में अभिषेक बनर्जी कई बार ईडी के सामने पेश भी नहीं हुए गैं। वहीं इस मामले में ईडी ने अभिषेक बनर्जी की पत्नी रुजिरा बनर्जी से बात की है।

नहर में मिली वकील मोहिनी तोमर की लाश: पति ने बताया- चंदन गुप्ता केस में मुनाजिर रफी की बेल का किया था विरोध, तिरंगा यात्रा के दौरान हिंदू युवक की हुई थी हत्या

उत्तर प्रदेश के कासगंज में 3 सितंबर को जिला न्यायलय के गेट से गायब हुईं अधिवक्ता मोहिनी तोमर की लाश हजारा नहर में मिलने के बाद से जिले में बवाल है। पुलिस ने तहरीर मिलने के बाद 4 लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें दो आरोपितों के नाम हैदर और मुस्तफा भी हैं।

अब मीडिया रिपोर्ट्स में इस हत्या से जुड़ी दो थ्योरी सामने आ रही हैं। कहीं बताया जा रहा है कि मोहिनी तोमर की हत्या उनके कोर्ट में चल रहे हालिया केस को लेकर हुई। वहीं कहीं पर इस हत्या को 6 साल पुराने चंदन गुप्ता केस से जोड़कर भी बताया जा रहा है।

हालिया मामला शिवशंकर नाम के शख्स से जुड़ा है जिसकी पैरवी मोहिनी तोमर कर रही थीं। इस मामले को लेकर पता चलता है कि कुछ समय पहले एक क्रिकेट मैच में हारने के बाद हैदर, मुस्तफा और सलमान की टीम ने शिवशंकर से गाली-गलौच की थी और बाद में उन्हें पीटा भी गया था। मोहिनी तोमर की ओर से ये केस कोर्ट में पेश किया गया।

शिवशंकर के अनुसार, शुरू में तो उनसे मामले में राजीनामा कराने का दबाव बनाया जा रहा था, हालाँकि बाद में जब मामला हाई कोर्ट जाने को हुआ तो उन्हें धमकियाँ मिलने लगीं और फिर मोहिनी का अपहरण करके इस हत्या को अंजाम दिया गया।

वहीं मोहिनी तोमर के पति ने एफआईआर में बताया कि कुछ समय से उनकी पत्नी काफी परेशान रहने लगी थीं। जब उन्होंने इस घटना के बारे में बार-बार पूछा तब जाकर उन्होंने बताया कि चूँकि उन्होंने मुस्तफा कामिल के बेटों की जमानत का विरोध किया इसलिए उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं। इसके अलावा मुनाजिर रफी का नाम भी मृतिका के पति द्वारा एफआईआर में लिखाया गया है। उन्होंने बताया कि रफी का नाम चंदन गुप्ता केस में सामने आया था। उसके बाद मोहिनी ने उस मामले में भी रफी की बेल का विरोध किया था।

उन्होंने अपनी तहरीर में बताया कि वकील मुस्तफा कामिल, असद मुस्तफा, हैदर मुस्तफा, सलमान, मुनाजिर रफी, केशव मिश्रा ने योजनाबद्ध तरीके से उसकी मोहिनी तोमर को किसी व्यक्ति के माध्यम से न्यायालय में मुख्य गेट के बाहर बुलाकर उनका अपहरण कर लिया। इसके बाद अज्ञात स्थान पर ले जाकर हत्या करवा दी।

अब इस मामले को लेकर विभिन्न जगहों पर हिंदू संगठन और वकील प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने सड़क जाम करते हुए हाईवे पर जाम लगा दिया गया। अधिवक्ताओं ने हाईवे पर बैठ इंसाफ के लिए नारेबाजी की। वहीं पुलिस ने मामले में आरोपितों के विरुद्ध एक्शन लेते हुए आरोपितों की गिरफ्तारी की पुष्टि की है।

चंदन गुप्ता हत्या- उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में 26 जनवरी 2018 को निकली ‘तिरंगा यात्रा’ पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने हमला किया था। इस हमले में चंदन गुप्ता उर्फ़ अभिषेक की मौत हो गई थी। ‘तिरंगा यात्रा’ में शामिल लोगों पर गोलियाँ चलाई गई थी। पथराव हुआ था। इसी घटना में चंदन गुप्ता की मौत हो गई थी।

सबकी हो भागीदारी, विदेशी पैसे पर लगे रोक… इन 9 सुझावों पर गौर कर वक्फ बिल को प्रभावी बना सकती है JPC, इसके बिना ‘मजहबी जमींदार’ से जमीन बचाना मुश्किल

देश में वक्फ संपत्तियों पर लगातार उपजते विवाद और इनसे होने वाले पचड़ों के बाद केंद्र सरकार हाल ही में वक्फ संशोधन अधिनियम विधेयक लेकर आई है। वक्फ में सुधार के उद्देश्य से लाए गए इस बिल को सरकार ने 8 अगस्त, 2024 को मानसून सत्र के दौरान संसद में रखा था। बिल पर विपक्ष के कुछ सदस्यों के विरोध के बाद इसके लिए संयुक्त संसदीय कमिटी (JPC) को भेज दिया गया। बिल वर्तमान में इसी कमिटी के पास है। कमिटी का बिल को लेकर बैठकों का दौर जारी है।

JPC ने इस संबंध में अगस्त माह के अंत में जनता से बिल पर सुझाव माँगे हैं। समिति ने कहा है कि वह इस बिल को लेकर आम जनता, इसके भागीदारों और साथ ही NGO समेत बाकी लोगों की राय जानना चाहती है। कमिटी ने अपने संपर्क सूत्र भी दिए हैं और बताया है कि उसे इस पते पर लोग अपने सुझाव भेज सकते हैं। उसने डिजिटल तरीके से भी सुझाव देने को कहा है। वक्फ बिल को लकर कमिटी चाहती है कि उसके पास सभी भागीदारों की राय उसे मिले, ताकि उसे कानून बनाने में आसानी रहे।

वक्फ में क्या बदलाव का है प्रस्ताव?

इस बिल में सरकार ने वक्फ संपत्तियों को लेकर होने वाले विवादों को सुलझाने के लिए कई बदलावों का प्रस्ताव किया है। इस बिल में कहा गया है कि कोई व्यक्ति तभी अपनी सम्पत्ति को वक्फ बना सकता है जब वह 5 साल से इस्लाम धर्म में मान रहा है। इसके अलावा बिल में यह भी बताया गया है कि किसी सरकारी सम्पत्ति को वक्फ नहीं बताया जा सकेगा। वक्फ घोषित करने से पहले उसका सर्वे करने के लिए वक्फ कमिश्नर की नियुक्ति के लिए भी प्रावधान किया गया है।

नए बिल में यह भी प्रावधान किया गया है कि केन्द्रीय स्तर पर एक वक्फ काउंसिल बनाई जाएगी। इसका काम सरकार और बाकी वक्फ बोर्ड को सलाह देना होगा। इसके चेयरमैन केन्द्रीय मंत्री होंगे। इस काउंसिल में महिलाओं और गैर मुस्लिमों की नियुक्ति का भी रास्ता निकाला गया है। इसके अलावा इस बिल में वक्फ से सम्बन्धित विवादों को निपटाने के लिए ट्रिब्यूनल की व्यवस्था भी की गई है। इस व्यवस्था के अंतर्गत एक क्लास-1 का अधिकारी ट्रिब्यूनल का प्रमुख होगा।

नए बिल में एक बड़ा बदलाव वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले के विरुद्ध अपील को लेकर है। पहले की व्यवस्था में वक्फ ट्रिब्यूनल का फैसला ही अंतिम था और इसके विरुद्ध सामान्य कोर्ट में अपील नहीं हो सकती थी। नए बिल में यह व्यवस्था कर दी गई है। वक्फ बोर्ड की जवाबदेही का प्रावधान भी इस बिल में किया गया है। इस बिल के रूप लेने के बाद CAG वक्फ बोर्ड का ऑडिट करेगा। इसके अलावा शिया-सुन्नी के साथ ही आगाखानी और बोरा मुस्लिमों के लिए भी अलग वक्फ बोर्ड बनाने का प्रावधान किया है।

वक्फ बिल के लिए 9 सुझाव

वक्फ बोर्ड में अलग-अलग भागीदारों ने कई सुझाव दिए हैं। यह 9 सुझाव इस बिल को और मजबूत कर सकते हैं।

1. वक्फ बोर्ड में हो विविधता

भारत मुस्लिम आबादी 14% है। वक्फ बोर्ड भारत में जमीनों का तीसरा सबसे बड़ा मालिक है। लेकिन इस जमीन का पूरा प्रबन्धन केवल मुस्लिमों की निगरानी है। सरकार को अलग-अलग राज्यों में वक्फ के सलाहकार बोर्ड में हिंदू, सिख, जैन, ईसाई और अन्य समुदायों से कम से कम 40% गैर-मुस्लिमों की भागीदारों पर विचार करना चाहिए। इसके अलावा, 60% मुस्लिमों में भी में सुन्नी, शिया, बरेलवी, देवबंदी और अन्य सभी मुस्लिम संप्रदायों के प्रतिनिधि शामिल किए जाने चाहिए।

2. मंत्रालय से हो निगरानी

वक्फ अधिनियम में सबसे महत्वपूर्ण संशोधनों में से एक सलाहकार बोर्ड की जवाबदेही है। उन्हें सीधे एक मंत्रालय को रिपोर्ट करना चाहिए। यदि इस पर निगरानी रखी जाएगी तो इससे किसी भी समुदाय के किसी भी व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुँचेगा। हाँ इससे उन लोगों को

3. न्यायिक निगरानी

वक्फ ट्रिब्यूनल को अलग एक स्वतंत्र निकाय बनाने की जगह उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में रखा जाना चाहिए। यह तब और जरूरी हो जाता है जब कई मामले दूसरे धर्म के लोगों से जुड़े हुए हों। इससे एक समानांतर न्यायिक व्यवस्था पर भी रोक लगेगी।

4. टैक्स और सब्सिडी में ना मिले स्पेशल ट्रीटमेंट

वक्फ पर भी उसी तरह के टैक्स लगाए जाने चाहिए जिस तरह के टैक्स बाकी धार्मिक संस्थाओं पर लगाए जाते हैं। इसके साथ ही वक्फ बोर्ड को उसी हिसाब से सब्सिडी, टैक्स में छूट और लोन में सुविधाएँ दी जानी चाहिए, जैसी बाकी धार्मिक संस्थाएँ पाती हैं। इस मामले में स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं होना चाहिए।

5. डिजिटलीकरण

वक्फ की संपत्तियों का जल्द से जल्द डिजिटलीकरण प्राथमिकता के तौर पर किया जाना चाहिए। यह डाटा जनता को भी उपलब्ध करवाया जाना चाहिए। इसके अलावा यदि कोई सामान्य सम्पत्ति वक्फ बनती है, तो इसकी जानकारी भी तुरंत आनी चाहिए उर इनका रिकॉर्ड बाकी स्मप्त्तियों की तरह रखा जाना चाहिए। इसमें पारदर्शिता भी होनी चाहिए।

6. समय से निपटें कानूनी विवाद

वक्फ में सबसे बड़ी समस्या है कि बड़ी तादाद में इसकी संपतियां कानूनी पचड़ों में फंसी हुई हैं। किसी भी कानूनी मामले को एक निश्चित समय के भीतर सुलझाया जाना चाहिए, जो तीन महीने से ज़्यादा नहीं होना चाहिए। वक्फ संपत्तियों से जुड़े मामलों को तीन महीने से ज्यादा खींचने की कोई जरूरत नहीं है।

7. कठोर ऑडिट

सभी वक्फ बोर्डों को CAG या किसी ऐसी ही संस्था के ऑडिट से गुजारा जाना चाहिए। अगर बाकी सभी संस्थाओं को ऑडिट से गुजरना पड़ता है, तो वक्फ के लिए नियम अलग नहीं होने चाहिए। इससे पारदर्शिता भी आएगी और जिम्मेदारी तय करने में भी आसानी रहेगी।

8. विदेशी फंडिंग की करें जाँच

सरकार की अनुमति के बिना कोई भी व्यक्ति वक्फ बोर्ड को दान देने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इसके अलावा उन NGO या विदेशी संस्थाओं के दान देने पर भी रोक लगाई जानी चाहिए जो अपने हित पूरे करने के लिए पैसा भेजती हैं।

9. अब जमीन पर कब्जा करने की कोई गुंजाइश नहीं

सार्वजनिक, सांस्कृतिक, निजी और सरकारी संपत्तियों को वक्फ बता देने की शक्ति को तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए। अगर किसी संपत्ति को वक्फ घोषित करना ही है, तो उसे एक कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना चाहिए, जिसमें हर कदम पर अलग-अलग विभागों द्वारा कड़ी निगरानी की जानी चाहिए। इससे जमीन पर अवैध कब्जे की संभावना कम हो सकेगी। किसी भी सम्पत्ति को वक्फ घोषित करना मात्र एक चेक भरने जैसा नहीं होना चाहिए।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर आप विस्तार से इसे पढ़ सकते हैं)