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लव और लैंड जिहाद पर उत्तराखंड के CM धामी का ऐक्शन: डेमोग्राफी बदलाव को लेकर पुलिस ने राज्य भर में शुरू किया वेरिफिकेशन अभियान

उत्तराखंड के विभिन्न इलाकों में डेमोग्राफिक बदलाव की खबरों के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने ऐक्शन शुरू कर दिया है। लोगों के सत्यापन के लिए पुलिस ने ‘वेरिफिकेशन अभियान’ शुरू किया है। इससे पहले सीएम धामी ने डीजीपी अभिनव कुमार एवं अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से मिलकर उन्हें जनसांख्यिकी परिवर्तन, धर्मांतरण और लव जिहाद के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश दिया था। 

सत्यापन अभियान को लेकर DGP अभिनव कुमार ने शनिवार (7 सितंबर 2024) को कहा कि साल 2011 के बाद जनसंख्या की जानकारी के लिए कोई जनगणना नहीं हुई है, लेकिन कुछ लोगों के बीच, खासकर पहाड़ी जिलों में यह धारणा है कि पिछले कुछ वर्षों में बाहर से लोगों के बसने के कारण वहाँ की डेमोग्राफी बदल गई है। इसलिए यह महीने भर का अभियान शुरू किया गया है।

TOI की रिपोर्ट के मुताबिक, डीजीपी ने कहा कि राज्य में बसे असामाजिक तत्वों की जाँच के लिए कुछ क्षेत्रों में एक महीने का वेरिफिकेशन अभियान शुरू किया गया है। इसके पूरा होने के बाद डेमोग्राफी बदलाव के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। अगर इस प्रकार का कोई मामला है तो इस अभियान से इसकी जानकारी मिलेगी।

दरअसल, अंतिम बार साल 2011 में हुई जनगणना के दौरान उत्तराखंड की कुल जनसंख्या लगभग 1.10 करोड़ थी। इसमें लगभग 84 लाख आबादी हिंदू थी, जो कुल जनसंख्या का 83% थी। वहीं, मुस्लिमों की आबादी 14.06 लाख यानी 13.9% और सिख 2.34% थे। वहीं, 2001 की जनगणना में राज्य में मुस्लिम आबादी 10.12 लाख थी।

लव जिहाद के मामलों को लेकर DGP ने कहा कि दो व्यस्क अपना जीवनसाथी चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन, अगर कोई दूसरे के धर्म को बदलने के इरादे से रिश्ता बनाता है तो पुलिस मौजूदा कानूनों के तहत कार्रवाई करेगी। अगर ऐसा कोई मकसद नहीं है तो पुलिस किसी को परेशान नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि दोनों मुद्दे राज्य पुलिस के लिए प्राथमिकता है।

हाल ही में कुछ हिंदूवादी संगठनों ने आरोप लगाया था कि देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल, पौड़ी गढ़वाल एवं टिहरी गढ़वाल जैसे कुछ पहाड़ी जिलों में मुस्लिमों की आबादी में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। उनका आरोप है कि यह देवभूमि की डेमोग्राफी को बदलने की व्यापक साजिश का हिस्सा है और इसे सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया जा रहा है।

दरअसल, उत्तरकाशी के पुरोला कस्बे, धारचूला और चमोली के नंदानगर इलाके जैसे कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में हाल ही में सांप्रदायिक तनाव हुए थे। इसमें लव जिहाद की बड़ी भूमिका थी। इसको लेकर हिंदू कार्यकर्ताओं ने राज्य में बाहरी लोगों की मौजूदगी बढ़ने का सवाल भी उठाया है। इसके बाद सीएम धामी ने कार्रवाई का आदेश दिया।

रतलाम में भगवान गणेश की प्रतिमा पर पथराव, विरोध में सैकड़ों हिंदुओं ने किया घेराव: MP पुलिस ने दर्ज की FIR

देश भर में मनाए जा रहे गणेशोत्सव के दौरान मध्य प्रदेश के रतलाम के मोचीपुरा में गणेश प्रतिमा पर किसी ने पत्थर फेंक दिया। इसको लेकर बवाल हो गया है। शनिवार (7 सितंबर) की रात 500 से ज्यादा लोगों ने स्टेशन रोड थाने का घेराव कर दिया और जमकर नारेबाजी की। पुलिस ने पहले उन्हें समझाया और बाद में अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली।

एफआईआर दर्ज करने के बाद पुलिस जाँच के लिए घटनास्थल पर गई। पीछे-पीछे भीड़ भी वहाँ पहुँच गई। एसपी राहुल कुमार लोढ़ा भीड़ को समझा रहे थे और लोगों को वापस लौटने के लिए बोल रहे थे। लोगों ने वापस लौटना भी शुरू कर दिया। इसी बीच किसी ने फिर पत्थर फेंक दिया। जवाब में लोगों ने भी पत्थर फेंके गए।

एक पत्थर पुलिस की गाड़ी पर भी लगा, जिससे उसका शीशा टूट गया। हालात को बिगड़ने से रोकने के लिए पुलिस एक्शन में आई। उसने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए हल्का बल प्रयोग किया। फिलहाल, किसी अप्रिय घटना को रोकने के लिए शहर में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। सुरक्षाबलों की दो टुकड़ियाँ बुलाई गई हैं।

एफआईआर में कहा गया है कि शनिवार रात करीब 8.30 बजे पूजा समिति के लोगों के साथ गणेश जी की स्थापना के लिए खेतलपुर से मूर्ति लेकर मेहंदीकुई बालाजी से हाथीखाना मोचीपुरा होते हुए जा रहे थे। इस जुलूस में महिलाएँ, बच्चे भी साथ थे। जैसे ही वे लोग हाथीखाना रोड पर मोचीपुरा पहुँचा, किसी ने मूर्ति पर पत्थर फेंक दिया।

सिटी एसपी अभिनव बारंगे ने बताया, ‘जुलूस में शामिल लोगों में से कुछ का यह भी कहना है कि उनके ऊपर पत्थर फेंके गए। इसकी तस्दीक के लिए सीसीटीवी कंट्रोल रूम में उस व्यक्ति को भेजा गया, जिसने पत्थर फेंके जाने के आरोप लगाए। फिलहाल, केस दर्ज कर लिया गया है। स्थिति नियंत्रण में है।’

विरोध प्रदर्शन में शामिल विश्व हिंदू परिषद (VHP) का कहना है कि त्योहार आने के पहले ही इस तरह का षड्यंत्र रचा गया। मुस्लिम क्षेत्रों में हिंदू समाज के कार्यक्रमों को रोकने का प्रयास किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि मोचीपुरा में कुछ कट्‌टरपंथियों ने पत्थरबाजी की है। अब प्रश्न ये है कि किसी न किसी ने तो पत्थर मारा ही है।

असम के मुस्लिम बहुल इलाकों में जनसंख्या से अधिक आधार कार्ड: CM सरमा का ऐलान- जिसका NRC का आवेदन नहीं, उसे AADHAAR नहीं

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने शनिवार (7 सितंबर 2024) को एक बेहद महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने कहा कि सरकार उन लोगों को आधार कार्ड जारी नहीं करेगी, जिन्होंने साल 2015 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का हिस्सा बनने के लिए आवेदन नहीं किया था। उन्होंने कहा कि यह निर्णय असम सरकार द्वारा चलाए जा रहे एक बड़े अभियान का हिस्सा है।

सीएम सरमा ने धुबरी, बारपेटा और मोरीगाँव का उदाहरण दिया, जहाँ अनुमानित जनसंख्या से अधिक आधार कार्ड जारी किए गए हैं। ये तीनों जिले मुस्लिम बहुल हैं। अनुमानित जनसंख्या के अनुपात में धुबरी में 103%, बारपेटा में 103% और मोरीगाँव में 101% आधार कार्ड जारी किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इससे लगता है कि इन जिलों में संदिग्ध विदेशियों ने भी आधार कार्ड हासिल किए हैं।

असम के मुख्यमंत्री सरमा कहा कि इसके कारण राज्य सरकार ने भविष्य में आधार कार्ड जारी करने के लिए एक मानक संचालन प्रोटोकॉल जारी करने का निर्णय लिया है। इसके तहत एनआरसी आवेदन संख्या प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा, जो उन्हें साल 2015 में आवेदन करते समय प्रदान की गई थी। बता दें कि हाल की रिपोर्ट में कहा गया है कि असम में घुसपैठियों की संख्या में वृद्धि हुई है। 

एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया साल 2015 में शुरू हुई थी। हालाँकि, साल 2019 में ‘अंतिम एनआरसी’ के प्रकाशन के बाद फिलहाल यह अधर में लटकी हुई है। इस प्रक्रिया में जो आवेदक 24 मार्च 1971 से पहले राज्य में आ चुके थे, उन्हें एनआरसी में शामिल किया जाना था और उन्हें नागरिक के रूप में मान्यता दी जानी थी।

जिन लोगों को एनआरसी से बाहर रखा गया था, उन्हें राज्य की विदेशी न्यायाधिकरण प्रणाली में मुकदमे का सामना करना था। इसके लिए आवेदन मार्च से अगस्त 2015 के बीच किए गए थे। इसमें 3,30,27,661 लोगों ने आवेदन किया था। अगस्त 2019 में प्रकाशित अंतिम एनआरसी में इनमें से 19 लाख आवेदकों को बाहर कर दिया गया था।

हालाँकि, उस एनआरसी को अभी तक अधिसूचित नहीं किया गया है। मुख्यमंत्री सरमा ने सुझाव दिया कि जो लोग एनआरसी के लिए आवेदन करने वाले 3.3 करोड़ लोगों में शामिल नहीं हैं, उन्हें आधार कार्ड जारी नहीं किए जाएँगे।

उन्होंने कहा, “किसी व्यक्ति का नाम एनआरसी में शामिल किया गया या नहीं, यह अलग बात है, लेकिन उसे आवेदक होना चाहिए। अगर आपने आवेदन ही नहीं किया है तो इसका मतलब है कि आप असम में थे ही नहीं। इससे प्रथम दृष्टया यह माना जा सकता है कि व्यक्ति 2014 के बाद असम में आया था।”

उन्होंने आगे कहा, “1 अक्टूबर से असम में आधार कार्ड की उपलब्धता एक कठिन परीक्षा होगी। हम अगले 10-15 दिनों में एक सख्त एसओपी जारी करेंगे।” उन्होंने कहा कि चाय बागान समुदाय को इस प्रक्रिया में कठिनाइयों से छूट दी जाएगी, क्योंकि राज्य सरकार अभी भी समुदाय के एक बड़े हिस्से के लोगों के आधार कार्ड वितरित नहीं कर पाई है।

ग्रामीण और रिश्तेदार कहते थे – अनाथालय में छोड़ आओ; आज उसी लड़की ने माँ-बाप की बेची हुई जमीन वापस खरीद कर लौटाई, पेरिस में लहराया परचम

दीप्ति जीवनजी एक प्रेरणादायक पैरा एथलीट हैं जिन्होंने पेरिस पैरालंपिक्स 2024 में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया है। उन्होंने मंगलवार (3 सितंबर 2024) को पैरालंपिक्स में ब्रॉन्ज मेडल जीत लिया। मूल रूप से तेलंगाना की निवासी, दीप्ति ने शुरुआत में कई कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उनकी मेहनत और आत्मविश्वास ने उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुँचाया।

दीप्ति महिलाओं के 400 मीटर T20 वर्ग में कांस्य के साथ पैरालंपिक पदक जीतने वाली पहली बौद्धिक रूप से कमजोर भारतीय एथलीट बन गईं। 20 वर्षीय भारतीय पैरा-एथलीट ने 55.82 सेकेंड में रेस को समाप्त किया। वह यूक्रेन की यूलिया शुलियार और तुर्की की आयसर ओन्डर से पीछे रहीं, जिन्होंने क्रमशः 55.16 और 55.23 सेकेंड में फिनिश लाइन को पार किया। T20 वर्ग बौद्धिक अक्षमता वाले एथलीटों के लिए आरक्षित है।

पैरालंपिक खेलों में प्रतिस्पर्धा करने वाली इस श्रेणी में भारत की पहली एथलीट दीप्ति को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जो उनके संचार और समझ कौशल को प्रभावित करती हैं। तेलंगाना के एक छोटे से गाँव में जन्मी दीप्ति को शुरुआती जीवन में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उनके माता-पिता को कहा गया कि बच्ची मानसिक रूप से अक्षम है, इसलिए उसे छोड़ देना चाहिए। हालाँकि माता-पिता ने उन्हें छोड़ने की जगह पूरी ताकत से उनका साथ दिया।

दीप्ति की प्रतिभा का पता कोच एन. रमेश को तब चला जब वह 15 वर्ष की थीं और उसके बाद से उन्होंने लगातार खुद को बेहतर ही किया है। वह मौजूदा पैरा वर्ल्ड चैंपियन और 2023 एशियन पैरा गेम्स की स्वर्ण पदक विजेता हैं। वर्ल्ड चैंपियनशिप में, उन्होंने 55.07 सेकेंड का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था, जिसे ओन्डर ने सोमवार को तोड़ दिया, जब उन्होंने हीट में 54.96 सेकेंड का समय दर्ज किया। हालाँकि पैरालंपिक्स में वो अपना बेस्ट प्रदर्शन करने से थोड़ा पीछे रही, लेकिन वो बेस्ट प्रदर्शन दोहरा पाती, तो गोल्ड मेडल जीत जाती।

दीप्ति जीवनजी का यह मेडल सिर्फ उनके लिए ही नहीं, बल्कि देशभर के उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है जो शारीरिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। यह जीत उनके संघर्ष और दृढ़ संकल्प की कहानी बताती है, जो उन्हें सफलता तक ले गया। उनकी सफलता के पीछे उनके कोच और परिवार का भी अहम योगदान है, जिन्होंने हमेशा उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। दीप्ति का मानना है कि आत्मविश्वास और कठिन परिश्रम से कोई भी चुनौती कठिन नहीं रहती।

पत्रकार शिव अरूर ने उनके बारे में प्रेरणादाई तथ्यों की तरफ ध्यान आकर्षित किया है। शिव अरूर के मुताबिक-

  • दीप्ति जीवनजी का जन्म साल 2003 में हुआ, वो मानसिक रूप से दिव्यांग पैदा हुई। उनके माता-पिता को उन्हें ‘छोड़ने’ की सलाह दी गई।
  • साल 2016 में माता-पिता ने उनके एथलेटिक्स के लिए ज़मीन बेची और ट्रेनिंग से पीछे नहीं हटे।
  • साल 2022 में दीप्ति जीवनजी ने एशियाई पैरा गेम्स में गोल्ड मेडल जीता।
  • इसी साल मई 2024 में दीप्ति विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने में सफल रही और मौजूदा विश्व चैंपियन हैं।
  • जून 2024 में दीप्ति ने अपने माता-पिता की वो जमीन वापस खरीद ली, जो उनके लिए माता-पिता ने साल 2016 में बेच दी थी।
  • और अब सितंबर 2024 में वो पेरिस पैरालंपिक्स में बॉन्ज मेडलिस्ट बन गई हैं। मानसिक दिव्यांगों वाली श्रेणी में मेडल जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनने का गौरव

इस जीत के बाद दीप्ति ने कहा कि वह आने वाले पैरालंपिक्स और अन्य अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में और भी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश के लिए और अधिक पदक लाना और अन्य विकलांग खिलाड़ियों को प्रेरित करना है। दीप्ति जीवन जी की यह यात्रा न केवल खेल प्रेमियों के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि यह संदेश देती है कि किसी भी प्रकार की शारीरिक चुनौती आपकी सफलता की राह में रुकावट नहीं बन सकती।

शेख हसीना का घर अब बनेगा ‘जुलाई क्रांति’ का स्मारक: उपद्रव के संग्रहण में क्या ब्रा-ब्लाउज लहराने वाली तस्वीरें भी लगेंगी?

बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के पूर्व आधिकारिक निवास ‘गोनो भवन’ (गण भवन) को संग्रहालय में बदलने का निर्णय लिया गया है। यूनुस की अगुवाई में 5 सितंबर 2024 को सलाहकार परिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि इसे “जुलाई क्रांति स्मारक संग्रहालय” के रूप में परिवर्तित किया जाएगा।

इस संग्रहालय का उद्देश्य शेख हसीना सरकार के पतन के समय हुई “जुलाई क्रांति” को यादगार बनाना है। इसके लिए 8 सितंबर तक एक समिति गठित की जाएगी, जिसमें वास्तुकला विशेषज्ञ और संग्रहालय अधिकारी शामिल होंगे, जो इस काम को आगे बढ़ाएँगे। डाक और दूरसंचार सलाहकार नाहिद इस्लाम ने गोनो भवन का दौरा करते हुए बताया कि समिति जल्द से जल्द काम शुरू करेगी, और सरकार संग्रहालय का उद्घाटन जल्दी करना चाहती है।

बता दें कि यह वही स्थान है जहाँ जुलाई 2024 में व्यापक हिंसक दंगे हुए थे। कट्टरपंथियों ने शेख हसीना के घर में लूटपाट की थी और सामान लूट-कर ले जाते दिखे थे। खुद को कथित छात्र आंदोलनकारी कहने वाले लुटेरों के हाथों में ब्लाउज और ब्रा देखे गए थे। इसके बाद से ही यह निवास सरकारी सुरक्षा के तहत बंद कर दिया गया था।

नाहिद इस्लाम ने कहा कि गोनो भवन में जो संरचनाएं और नुक़सान हैं, उन्हें ठीक करने के बजाय वैसा ही रखा जाएगा, ताकि क्रांति के दौरान जनता के गुस्से की छवि बरकरार रहे।

खेल और युवा सलाहकार आसिफ महमूद साजिब भुइयाँ ने कहा कि गोनो भवन में हुए नुकसान को ठीक नहीं किया जाएगा बल्कि इसे स्मारक के रूप में संरक्षित किया जाएगा। भवन को उसी स्थिति में संग्रहालय में बदला जाएगा, जैसा कि वह वर्तमान में है। संग्रहालय में प्रदर्शनकारियों की घटनाओं, क्रांति के शहीदों और घायलों की सूची भी होगी। इसके साथ ही, पिछले 16 वर्षों में अवामी लीग सरकार के दौरान हुईं कथित हत्याओं, जबरन गायब किए जाने और अन्य अत्याचारों को भी संग्रहालय में प्रदर्शित किया जाएगा।

जानकारी के मुताबिक, गोनो भवन 1975 में बनकर तैयार हुआ था, लेकिन शेख हसीना इसके एकमात्र निवासी प्रधानमंत्री थीं। इस भवन का निर्माण शेख मुजीबुर रहमान ने अपने सरकारी निवास के रूप में करवाया था, लेकिन उनके जीवनकाल में इसका उपयोग नहीं हुआ। 1975 के तख्तापलट के बाद इसे सैन्य कोर्ट में बदल दिया गया। 1985 में इस भवन का पुनर्निर्माण हुआ और इसे राज्य अतिथि गृह बना दिया गया। बाद में, शेख हसीना ने अपने पहले कार्यकाल में इसे कैबिनेट की बैठकें आयोजित करने के लिए पट्टे पर लिया।

जब बेगम खालिदा जिया 1991 में पहली बार प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने राष्ट्रपति कार्यालय को प्रधानमंत्री कार्यालय में बदल दिया और वे स्वयं आर्मी कैंट में ही रहती रहीं। साल 2009 में जब हसीना सत्ता में लौटीं, तो संसद ने मुजीबुर रहमान के परिवार को राज्य सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक कानून पारित किया और गोनो भवन को शेख हसीना का आधिकारिक निवास बना दिया या। वो साल 2010 से वह इस घर में रहने लगीं।

महाराष्ट्र से भी पहले बिहार के कोसी अंचल में मनाया जाता था भव्य गणेश उत्सव: एक तरफ तिलक ने जगाई सांस्कृतिक चेतना, दूसरी तरफ राजनीतिक उपेक्षा का बना शिकार

पूरे देश में हर वर्ष गणेश चतुर्थी का त्योहार धूम-धाम से मनाया जाता है, ख़ासकर महाराष्ट्र में तो घर-घर में गणपति बप्पा विराजते हैं और हर गली-मोहल्ले में एक पंडाल तना हुआ दिख जाता है। महाराष्ट्र में गणपति पूजा के प्रति उत्साह को फिर से जीवित करने का श्रेय महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक को जाता है। लेकिन, क्या आपको पता है कि बिहार के मधेपुरा में उससे पहले गणेश पूजा भव्य तरीके से आयोजित की जाती थी। हालाँकि, कुछ कारणों से ये आयोजन थम गया था।

बिहार के मधेपुरा में महाराष्ट्र से भी पहले भव्य गणेश पूजा मनाए जाने का जिक्र महामहोपाध्याय सर गंगानाथ झा की आत्मकथा में मिलता है। दिसंबर 1872 में मधुबनी के सरिसब पाही में जन्मे गंगानाथ झा के बारे में बता दें कि वो संस्कृत के अलावा भारतीय व बौद्ध दर्शन के जानकार थे। उन्होंने कई संस्कृत पुस्तकों का अनुवाद किया। वो दरभंगा के राजपरिवार से ताल्लुक रखते थे। वो दरभंगा राजपरिवार के लाइब्रेरियन और इलाहाबाद के मुइर कॉलेज में संस्कृत के प्राध्यापक रहे थे।

उन्होंने अपनी पुस्तक में बताया है कि भाद्रपद के महीने में हर वर्ष गणेश पूजा का आयोजन किया जाता था। उन्होंने बताया है कि महाराजा के भाई श्रीनंदनजी इसे भव्य स्तर पर आयोजित कराया करते थे और ये पूरे एक सप्ताह तक चलता था। खुद गंगानाथ झा इसमें बड़े उत्साह से हिस्सा लेते थे। इस दौरान उनका मन करता था कि वो भी इस पूजा में इस पूजा को करने की तीव्र इच्छा रखते थे। उन्होंने श्रीनंदनजी को बताया तो उन्होंने भी इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।

मधेपुरा के शंकरपुर में भव्य गणेश पूजा

श्रीनंदनजी ने सुझाव दिया कि उनके ही स्थान पर दोनों मिल कर गणपति पूजा करें और एक की जगह 2 मूर्तियाँ स्थापित की जाएँ। गंगानाथ झा को भी ये पसंद आया। हालाँकि, उस दौरान महाराजा और श्रीनंदनजी के बीच कुछ विवाद भी चल रहे थे और गंगानाथ झा श्रीनंदनजी के करीबी थे। महाराजा ने खुद दरभंगा में गणेश पूजा की शुरुआत कर दी। उन्होंने अगले ही साल गणेश पूजा के आयोजन की घोषणा की और गंगानाथ झा को इसे संपन्न कराने का पूरा प्रभार सौंपा।

हालाँकि, गंगानाथ झा ने उन्हें पत्र में लिखा कि उन्होंने श्रीनंदनजी के साथ मधेपुरा स्थित शंकरपुर में ये पूजा करने की शपथ ली है, ऐसे में वो उनके आग्रह को स्वीकार नहीं कर पाएँगे। पत्र पढ़ कर महाराजा नाराज़ हुए। जब गणेश पूजा आई तो महाराजा राजनगर चले गए और राज की अनुमति से गंगानाथ झा ने भी शंकरपुर जाकर पूजा आरंभ कर दी। श्रीनंदनजी ने दरभंगा महाराज से 1 सप्ताह के लिए उनके राजपंडित की सेवाएँ माँगी और इसे भी उन्होंने स्वीकार कर लिया था।

हालाँकि,. इस घटना से काफी पहले महराजा रूद्र सिंह के पोते और महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह के भाई और आप्त सचिव बाबू जनेश्वर सिंह ने 1886 के आसपास ही वर्तमान मधेपुरा जिले के शंकरपुर में सार्वजनिक रूप से गणेश पूजा की शुरुआत की थी, यानी महाराष्ट्र से लगभग 7 वर्ष पहले। उस समय कोसी क्षेत्र में शंकरपुर रियासत का बड़ा प्रभाव था। 19वीं शताब्दी के आखिर में गंगानाथ झा को दरभंगा राजपरिवार की नौकरी से निकाल दिया गया था, क्योंकि उन्होंने उनकी बात न मान कर शंकरपुर में गणेश पूजा करने का अपना वादा निभाया था।

राजपंडित ने पूजा के दौरान उन्हें ये जानकारी दी थी और इसके अगले ही दिन डाक से इसका आधिकारिक आदेश आ गया। इसमें लिखा था कि चूँकि गंगानाथ झा ने तब मुख्यालय छोड़ा है जब उनकी ज़रूरत थी, इसीलिए उन्हें नौकरी से निकाला जाता है। उन्होंने इस बात से भी नाराज़गी जताई कि श्रीनंदनजी ने उनकी सेवाएँ लेने के लिए महाराजा की अनुमति नहीं ली थी। इसके बाद गंगानाथ झा इलाहाबाद की तरफ रवाना हो गए थे और वहाँ प्रोफेसर बने। 1923 में उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के कुलपति का पद सँभाला। वहाँ उनके नाम पर हॉस्टल भी है।

उस समय दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह हुआ करते थे, जबकि उनके भाई जनेश्वर सिंह शंकरपुर में शासन करते थे। दोनों ही महाराजा रूद्र सिंह के पोते थे। जनेश्वर सिंह ने शंकरपुर में पुस्तकालय, संस्कृत पाठशाला, लक्ष्मीवती एकेडमी, और धर्मशाला का निर्माण कराया। आज भी मधेपुरा में गणेश पूजा धूमधाम से मनाई जाती है। महाराष्ट्र में इस उत्सव ने ऐसा रूप लिया कि इसका राष्ट्रीयकरण हो गया और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में ये भारतीयों की एकता का भी प्रतीक बना।

महाराष्ट्र की तरह बिहार में गणेश पूजा को राजनीतिक संरक्षण नहीं मिल पाया, राजपरिवारों से सहयोग न मिलने के कारण ये सरकारी उपेक्षा का भी शिकार हुआ और इसे बंद करना पड़ा। शंकरपुर अब मधेपुरा का एक प्रखंड है और एक महत्वपूर्ण स्थल है, लेकिन यहाँ की गणेश पूजा की परंपरा पर सरकारों ने ध्यान नहीं दिया। दरभंगा राजपरिवार के आप्त सचिव जनेश्वर सिंह को भी धीरे-धीरे लोग भूल गए। अब कोसी और सीमांचल को मिथिला से अलग प्रदेश माना जाता है।

महाराष्ट्र में तिलक ने गणेश उत्सव को किया जीवित

ये बात है महाराष्ट्र के उस दौर की जब कट्टरपंथी मुस्लिमों ने हिन्दुओं की नाक में दम कर रखा था और एक तरफ अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरें तो थीं ही। सन् 1894 में उन्होंने अपने समाचार-पत्र ‘केसरी’ में लोगों को गणेश उत्सव मनाने की सलाह दी। बाल गंगाधर तिलक का मानना था कि प्राचीन काल में मेले आदि देश की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के सूचक थे। उन्होंने बताया था कि कैसे प्रबुद्ध लोगों का साथ मिल जाए तो ऐसे आयोजन देश के बड़े काम आ सकते हैं, लोगों को इनके माध्यम से शिक्षित कर राजनीतिक आंदोलन को विस्तार दिया जा सकता है।

बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रीयता को मजबूत करने के लिए धर्मबुद्धि को जागृत करने का रास्ता सुझाया। गणेश उत्सव पहले भी मनाया जाता रहा था, लेकिन घरों में ही। सार्वजनिक रूप से इसे नहीं मनाते थे। पुणे (तब पूना) में इसकी शुरुआत हुई। मंदिरों और चौराहों पर गणेश जी की मूर्तियाँ स्थापित होने लगीं। इस दौरान भजन-कीर्तन भी होता था। दारुवाला पुल के पास इस उत्सव के दौरान हिन्दुओं और मुस्लिमों में झड़प भी हुई। हालाँकि, गणेश उत्सव के दौरान इसका ध्यान रखा जाता था कि किसी की सांप्रदायिक भावनाएँ आहत न हों।

इसी तरह सन् 1895 में धूलिया में दंगे हो गए थे। मुस्लिम भीड़ इतनी उग्र हो गई थी कि कलक्टर की हत्या को ही उतारू हो गई। पुलिस को गोली चलानी पड़ी। मुस्लिम भीड़ की तब वही माँग थी, जो आज है। उनकी सोच थी कि वो भले 5 बार दिन भर में मस्जिदों से चिल्लाएँ, लेकिन कोई हिन्दू अपने उत्सव पर बाजा न बजाए। तिलक ने इसे निरर्थक और तर्कहीन बताया। इस तरह गणेश उत्सव भारत की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण के साथ-साथ राजनीतिक शिक्षा का भी माध्यम बना, यहाँ जात-पात का भी कोई भेद नहीं था।

तब मुस्लिमों को प्रशासन मुहर्रम को लेकर विशेष सुविधाएँ देता था, प्रत्युत्तर में गणेश उत्सव में भी हिन्दुओं ने वही सुविधाएँ माँगी। वर्ग भेद को मिटा कर हर साल हजारों गणपति प्रतिमाएँ स्थापित और विसर्जित की जाने लगीं। तिलक ने इस दौरान नरम दल और कॉन्ग्रेस की आपत्तियों को दरकिनार किया। इसी तरह सन् 1895 में रायगढ़ में पहला शिवाजी उत्सव प्रारंभ हुआ, उससे पहले छत्रपति शिवाजी महाराज की समाधि उपेक्षित अवस्था में थी। बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रीय व सांस्कृतिक एकता के लिए 2 महँ उत्सवों को जीवित किया।

रात को सड़क पर अर्धनग्न हालत में बेहोश मिली नाबालिग लड़की, ट्यूशन पढ़ने गई थी: पश्चिम बंगाल में फिर से दरिंदगी

कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में डॉक्टर की रेप के बाद हत्या के बाद फैले आक्रोश के बीच पश्चिम बंगाल से एक और जघन्य वारदात की जानकारी सामने आई है। अब हुगली जिले के हरिपाल में एक 15 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ दरिंदगी का मामला सामने आया है। पीड़िता, जो ट्यूशन के लिए घर से निकली थी, अर्धनग्न और बेहोशी की हालत में सड़क पर पड़ी मिली।

ये वारदात शुक्रवार (6 सितंबर 2024) की है। इस मामले में बंगाल पुलिस ने पीड़ित परिवार की शिकायत के आधार पर POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस ने नाबालिग पीड़िता को अर्धनग्न अवस्था में पाया।

रिपोर्ट के अनुसार, नाबालिग पीड़िता 15 वर्षीय लड़की है, जो ट्यूशन से घर लौट रही थी। स्थानीय लोगों और उसके परिवार के सदस्यों के अनुसार, अज्ञात व्यक्तियों ने उसे चार पहिया वाहन में खींच लिया और उसका अपहरण कर लिया। फिर वे उसे एक सुनसान जगह पर ले गए जहाँ उन्होंने नाबालिग लड़की रेप किया।

स्थानीय लोगों ने हुगली जिले के हरिपाल में नाबालिग को बेहोशी की हालत में उसके फटे कपड़ों के साथ पाया। उन्होंने पुलिस को सूचित किया, जिसके बाद कई पुलिसकर्मी मौके पर पहुँचे। पुलिस ने नाबालिग पीड़िता को इलाज के लिए स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया और बाद में पूछताछ के लिए थाने ले गई। परिवार की शिकायत के आधार पर पश्चिम बंगाल पुलिस ने यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है। हालाँकि हुगली (ग्रामीण) के पुलिस अधीक्षक कामनाशीष सेन ने कहा कि बलात्कार का कोई सबूत नहीं मिला है और लड़की के साथ छेड़छाड़ की गई है। उन्होंने कहा कि एक महिला अधिकारी जाँच टीम का नेतृत्व कर रही हैं।

पश्चिम बंगाल पुलिस ने बताया कि अब तक की जाँच में किसी संदिग्ध की पहचान नहीं हुई है। पुलिस ने कहा है कि बच्ची और परिवार की सीक्रेसी का सम्मान किया जाए और किसी तरह की अफवाह न फैलाई जाए। पुलिस ने अफवाह फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई की भी चेतावनी दी है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब राज्य में महिलाओं की सुरक्षा की चिंताओं को लेकर विरोध प्रदर्शन और आक्रोश भड़क उठा है, खास तौर पर जब डॉक्टर की रेप और हत्या का मामला सामने आया।

15 साल की किशोरी के साथ घटे मामले में बीजेपी ने ममता सरकार पर तीखा हमला बोला है। बीजेपी पश्चिम बंगाल को महिलाओं के लिए असुरक्षित स्थान कहा है। बीजेपी ने पुलिस पर वारदात को छिपाने की कोशिश का भी आरोप लगाया है। बीजेपी नेताओं ने कहा है कि पुलिस ने अस्पताल की घेरेबंदी कर दी है और मीडिया को अंदर जाने से रोक दिया गया है।

बीजेपी के सोशल मीडिया के हेड अमित मालवीय ने लिखा, “ममता बनर्जी की पुलिस ने अस्पताल को घेर लिया है, मीडिया को अंदर जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है और स्थानीय टीएमसी नेता यह सुनिश्चित करने के लिए इधर-उधर घूम रहे हैं कि घटना की रिपोर्ट न हो।”

मालवीय ने पश्चिम बंगाल को महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित जगह बताते हुए मालवीय ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इस्तीफे की भी माँग की। उन्होंने आगे कहा, “ममता बनर्जी विफल हो गई हैं। उन्हें तुरंत पद छोड़ देना चाहिए। बहुत हो गया। उन्होंने बलात्कार और POCSO मामलों को निपटाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट भी नहीं बनाए हैं।”

कारगिल में मुजाहिद्दीनों के वेश में लड़ी थी पाकिस्तानी फ़ौज: 25 साल बाद इस्लामी मुल्क ने कबूला, बोला जनरल – हजारों हुए शहीद

कारगिल युद्ध (1999) के 25 साल बाद पाकिस्तान सेना ने पहली बार इस संघर्ष में अपनी भूमिका को स्वीकार किया है। यह स्वीकारोक्ति पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर द्वारा शुक्रवार (6 सितंबर 2024) को रावलपिंडी में आयोजित रक्षा दिवस पर दिए गए भाषण के दौरान सामने आई।

पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने कहा, “पाकिस्तानी बहादुरों का समूह है जो आजादी के महत्व करता है और आजादी के लिए कुछ भी करने को तैयार है।” मुनीर ने आगे कहा, “चाहे 1948 हो, 1965 हो, 1971 हो या 1999 का कारगिल युद्ध हो, हजारों सैनिकों ने देश और इस्लाम के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी है।” मुनीर के इस बयान को पहले के आधिकारिक रुख से अलग माना जा रहा है, क्योंकि पाकिस्तान लंबे समय से इस युद्ध में अपनी सीधी भागीदारी को नकारता रहा है।

कारगिल युद्ध मई और जुलाई 1999 के बीच लड़ा गया था, जब पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय नियंत्रण रेखा (LoC) को पार करके जम्मू-कश्मीर के कारगिल में घुसपैठ की। पाकिस्तान ने शुरू में इन घुसपैठियों को “कश्मीर की आजादी के लड़ाके” या “मुजाहिदीन” के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि भारत ने इसे पाकिस्तानी सेना की साजिश बताया। भारत ने ‘ऑपरेशन विजय’ के तहत घुसपैठियों को वापस खदेड़ने के लिए सैन्य कार्रवाई की, जो अंततः सफल रही।

इस युद्ध में पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भारी आलोचना का सामना करना पड़ा, जबकि भारत ने अपनी सैन्य प्रतिष्ठा को मजबूत किया। पाकिस्तान ने तब तक अपनी सेना की भागीदारी को अस्वीकार किया था, और यहाँ तक कि मारे गए सैनिकों के शवों को स्वीकार करने से भी इंकार कर दिया था।

रावलपिंडी में पाकिस्तान के जनरल असीम मुनीर का बयान, जिसमें उन्होंने कारगिल युद्ध का उल्लेख किया, इसे पाकिस्तान की ओर से उस युद्ध में अपनी भूमिका को स्वीकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सोशल मीडिया पर उनके इस बयान की बड़े पैमाने पर चर्चा हो रही है। इससे पहले, पाकिस्तान हमेशा यह दावा करता रहा कि कारगिल में लड़ रहे लोग स्थानीय कश्मीरी विद्रोही थे, न कि पाकिस्तानी सैनिक।

जनरल मुनीर के इस बयान ने पाकिस्तान के पूर्व रुख पर सवाल उठाए हैं और इसके बाद पाकिस्तान के कुछ पत्रकारों और विश्लेषकों ने भी इस बयान के महत्व को रेखांकित किया है। कई दशकों तक पाकिस्तान ने यह दावा किया कि कारगिल में लड़ाई स्थानीय विद्रोहियों और कबीलाई नेताओं द्वारा लड़ी जा रही थी, जबकि भारतीय पक्ष से कई बार यह दावा किया गया कि ये पाकिस्तानी सेना के सैनिक थे जो कारगिल की ऊँचाइयों पर तैनात थे।

बता दें कि कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ थे, जिन्होंने उस समय भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ लाहौर घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इस घोषणा का उद्देश्य दोनों देशों के बीच तनाव को कम करना और शांति स्थापित करना था। हालाँकि, इस हस्ताक्षर के कुछ ही महीनों बाद कारगिल युद्ध छिड़ गया। नवाज़ शरीफ ने तब से इस सैन्य अभियान की आलोचना की है और इसे “रणनीतिक गलती” के रूप में दर्शाया।

नवाज शरीफ ने सार्वजनिक रूप से इस अभियान से दूरी बनाते हुए इसका दोष सेना, विशेषकर उस समय के सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ पर मढ़ा है। मुशर्रफ, जो बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने, को कारगिल युद्ध के मुख्य योजनाकारों में से एक माना जाता है।

पूर्व पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी, लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) शाहिद अज़ीज़ ने भी इस युद्ध के बारे में खुलकर बात की। अज़ीज़, जिन्होंने कारगिल में अहम भूमिका निभाई थी, ने यह खुलासा किया कि इस योजना की जानकारी केवल मुशर्रफ और उनके कुछ शीर्ष कमांडरों को ही थी। उन्होंने इस ऑपरेशन को “चार लोगों की योजना” बताते हुए कहा था कि कारगिल युद्ध को लेकर पाकिस्तान की तरफ से न तो अच्छी तरह से योजना बनाई गई थी और न ही इसके लिए कोई राजनीतिक समर्थन था।

भारत-पाकिस्तान संबंधों पर प्रभाव

कारगिल युद्ध का भारत-पाकिस्तान संबंधों पर गहरा प्रभाव पड़ा, जिसने दोनों देशों को एक और पूर्ण युद्ध के कगार पर ला दिया। इस युद्ध ने लाहौर घोषणा पत्र के माध्यम से बनाए गए विश्वास को खत्म कर दिया और कश्मीर विवाद के शांतिपूर्ण समाधान की संभावनाओं को धूमिल कर दिया। पाकिस्तान की हरकतों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा की गई और अमेरिका ने पाकिस्तान को अपनी सेना वापस बुलाने के लिए मजबूर किया।

भारत के लिए, कारगिल में जीत ने उसकी सैन्य प्रतिष्ठा को और बढ़ावा दिया, जबकि पाकिस्तान को अपनी विफलताओं के लिए आंतरिक आलोचना का सामना करना पड़ा। यह युद्ध पाकिस्तान में राजनीतिक उथल-पुथल का कारण भी बना, जिसके परिणामस्वरूप नवाज़ शरीफ को उसी साल एक सैन्य तख्तापलट के बाद सत्ता से बेदखल कर दिया गया।

जनरल मुनीर का हालिया बयान पाकिस्तान की सेना और राजनीतिक प्रतिष्ठान के भीतर लंबे समय से चल रहे अलग-अलग नजरियों को उजागर करता है। यह बयान भले ही संक्षिप्त और अस्पष्ट हो, लेकिन इसने कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान सेना की भूमिका पर फिर से चर्चा शुरू कर दी है। इस युद्ध की विरासत आज भी दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को प्रभावित करती है, और दोनों देश शांति की ओर बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। फिलहाल भारत और पाकिस्तान के बीच नाममात्र के ही संबंध हैं।

‘पढ़ाई, कमाई और दवाई’ – विक्टिम कार्ड का खोल पहनने के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों के 3 हथियार: विदेशी में मौजूद बैठे संगठन भी लुटा रहे पैसे, देवबंद से कनेक्शन

कभी पूर्वी पाकिस्तान रहे बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ एक ऐसी समस्या है जो एक लाइलाज बीमारी की तरह लगभग 50 वर्षों ज्यों की त्यों बनी हुई है। इस घुसपैठ की वजह से न सिर्फ कई प्रदेशों में जनसंख्या का भारी असंतुलन हुआ है बल्कि तमाम जगहों पर अपराध और आतंकवाद ने खूब फला-फूला। घुसपैठ की इसी दीर्घकालिक समस्या पर ऑपइंडिया ने ज़मीनी पड़ताल की। हमें पता चला कि बांग्लादेशी घुसपैठ भले ही अपने मूल देश में एक दूसरे के इतने शुभचिंतक न हों, पर भारत में आते ही वो एक संगठित गिरोह के तौर पर काम करने लगते हैं। इस घुसपैठ को विदेशी मदद भी मिलने के प्रमाण सामने आए हैं।

ऑपइंडिया ने सुरक्षा एजेंसियों में अपने सूत्रों से घुसपैठ पर लम्बे समय तक चर्चा की। उन्होंने बताया कि बांग्लादेशी अपना मुल्क छोड़ कर किसी भी देश में अवैध तौर पर घुसने के लिए बदनाम हैं। हमें बताया गया कि यूरोप और अमेरिका में भी हजारों की तादाद में बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं लेकिन सीमाओं से सटा होने की वजह से उन्हें सबसे मुफीद भारत ही लगता है। चीन, म्यांमार, रूस और जैसे देश भी पड़ोस में हैं लेकिन वहाँ किसी प्रकार का राजनैतिक और मज़हबी समर्थन न मिलने की वजह से ये बांग्लादेशी खुद को सुरक्षित नहीं महसूस करते।

पढ़ाई, दवाई और कमाई का बहाना

घुसपैठ पर हमारे द्वारा जुटाई गई जानकारी के मुताबिक, बांग्लादेशी मुस्लिम भारत में घुसने के बाद पढ़ाई, दवाई और कमाई जैसे चेहरों को सबसे आगे रखते हैं। ये तीनों ऐसे विषय हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संवेदना से जुड़े माने जाते हैं। छात्र, गरीब और मरीज के नाम पर घुसपैठ की कोशिशों में अगर वो पकड़े भी जाते हैं जो उन्हें विक्टिम कार्ड खेलने में आसानी होती है। इसी वजह से इन पर कोई तंत्र बेहद कड़ा एक्शन नहीं ले पाता क्योंकि तब तक मानवाधिकार के नाम पर बने तमाम संगठन इनके समर्थन में कूद जाते हैं।

अधिकतर का टारगेट भारतीय पासपोर्ट

सुरक्षा एजेंसियों द्वारा गिरफ्तार किए गए अधिकतर बांग्लादेशी फर्जी भारतीय पहचान पत्रों के साथ पकड़े गए हैं। इनके द्वारा पैन और आधार कार्ड के अलावा तमाम अन्य भारतीय पहचान पत्र बेहद सधे ढंग से बनवाए जाते हैं। इसकी मूल वजह घुसपैठियों का भारतीय पासपोर्ट हासिल करने का प्रयास होता है। हमें बताया गया कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय पासपोर्ट कई ऐसे देशों में भी सम्मानीय और मान्य है जहाँ बांग्लादेशियों की इंट्री बैन है। इस तरफ से घर के कुछ सदस्य विदेशों में बस कर पैसे भेजते रहते हैं। हालाँकि उनका परिवार भारत में ही बसा रहता है।

देवबंद से तमिलनाडु, आपस में सब कनेक्टेड

अपने मूल देश में रहने के दौरान भले ही बांग्लादेशी घुसपैठियों की आपस में कोई जान-पहचान न हो पर भारत में इंट्री करते ही उनमे से अधिकतर एक दूसरे से कनेक्टेड हो जाते हैं। तब छात्र मेडिकल वाले से और कमाई वाला कथित गरीब व्यापर वाले से घुल-मिल जाते हैं। ये कनेक्शन सिर्फ आसपास का ही नहीं रहता बल्कि इनके तार विदेशों से भी जुड़ जाते हैं। इसको बेहतर ढंग से UP ATS द्वारा मार्च 2024 में दबोचे गए कफीलुद्दीन के घटनाक्रम से समझा जा सकता है।

उत्तर प्रदेश के आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने मार्च 2024 में कफीलुद्दीन नामक घुसपैठिए को तमिलनाडु के वेल्लोर शहर से पकड़ा था। लम्बे समय से भारत में अवैध तौर पर रह रहा कफीलुद्दीन अपने तमाम भारतीय पहचान पत्र बनवा चुका था। कफीलुद्दीन दशकों पहले इलाज के नाम पर भारत में घुसा था। हिंदी भाषी राज्यों को पार कर के उसने अपना छोटा-मोटा इलाज वेल्लोर के CMC अस्पताल में करवाया था। बेहद कम समय में ठीक हो कर कफीलुद्दीन वापस बांग्लादेश नहीं लौटा।

बताया जा रहा है कि कफीलुद्दीन उसी अस्पताल में लोगों को भर्ती करवाने के नाम पर दलाली का काम करने लगा था जहाँ खुद उसका इलाज हुआ था। इसी जगह पर रह कर उसने CMC कॉलेज में कई अन्य घुसपैठियों का भी इलाज करवाया। लेकिन इन सबमें सबसे खास बात ये निकली कि कफीलुद्दीन वेल्लोर से लगभग 2400 किलोमीटर दूर देवबंद में दारुल उलूम के आगे इस्लामी टोपी बेचने वाले नजीबुल से कनेक्टेड था। कफीलुद्दीन और नजीबुल ढाई हजार किलोमीटर दूर रहने के बावजूद मिल कर एक टीम की तरह काम कर रहे थे।

ATS ने अपनी जाँच में पाया था कि कफीलुद्दीन ने नजीबुल के साथ मिल कर कई बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत के अलग-अलग शहरों में भी शिफ्ट करवाया था। इन घुसपैठियों में से कथित छात्र, मरीज और गरीब सब शामिल थे। इसकी एवज में कफीलुद्दीन को काफी पैसे भी मिले थे। इन सभी का वो रैकेट भी ध्वस्त हुआ था जिस से ये पैन कार्ड से ले कर पासपोर्ट भी जाली पहचान पत्र पर बना दिया करते थे।

घुसपैठ में मदद के लिए विदेशी आतंकी संस्थाएँ भी तैयार

बांग्लादेशी मुस्लिमों की भारत में घुसपैठ कितनी बड़ी साजिश हो सकती है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके लिए विदेश में बैठे आतंकी संगठन भी पैसे देने के लिए तैयार हैं। जनवरी 2024 में UP ATS ने पश्चिम बंगाल में मदरसा चलाने वाले अबू सालेह को गिरफ्तार किया था। अबू सालेह का मदरसा दारुल उलूम से संबद्ध था। इस मदरसे में ब्रिटेन की उस उम्माह वेलफेयर ट्रस्ट से करोड़ों रुपए भेजे गए थे जिसे अमेरिका ने आतंकी समूह की लिस्ट में डाला था।

अबू सालेह के मदरसे से नजीबुल पढ़ कर निकला था जो पश्चिम बंगाल से सीधे देवबंद में शिफ्ट होता है। यहाँ वो दारुल उलूम के सामने सेंट और टोपी की दुकान खोल लेता है। इसी दुकान की आड़ में नजीबुल शेख हवाला का कारोबार करता है। इस काले कारोबार से मिले पैसे से नजीबुल बांग्लादेश के घुसपैठियों को भारत में शिफ्ट कर रहा था। उसने तमाम बांग्लादेशियों के पासपोर्ट और अन्य भारतीय पहचान पत्र बनवाए थे।

मदद के बदले आतंकवाद की माँग

विदेशी ताकतों के इशारे और मदद से बसाए गए बांग्लादेशी घुसपैठियों को कई बार भारत के खिलाफ आतंकी या आपराधिक घटनाओं में प्रयोग किया जाता है। मदद के बदले उनको अपनी सुविधा और इच्छा के अनुसार प्रयोग में लाया जाता है। कुछ घुसपैठी पहले से ही बांग्लादेशी गिरोहों के कनेक्शन में रह कर एक सोच के साथ भारत में आते हैं। यहाँ वो बांग्लादेश में सक्रिय आतंकी संगठनों की जड़ें भारत में जमाने का प्रयास करते रहते हैं। आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने के बाद कई बार इनको बॉर्डर पार करवा दिया जाता है जिस से एजेंसियों को गिरफ्तारी में दिक्कत आती है।

हेयर ड्रेसर से लेकर जूनियर आर्टिस्ट तक, मलयालम इंडस्ट्री में लड़के भी शिकार… अभिनेत्री ने बताया – 11वीं में थी जब अकेले कमरे में ले गया था डायरेक्टर

अगस्त 2024 में हेमा कमेटी की रिपोर्ट सामने आई, जिसके बाद पूरी मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में हंगामा मच गया। केरल की फिल्मी दुनिया से जुड़े कलाकारों के यौन शोषण, उत्पीड़न, छेड़छाड़, कास्टिंग काउच के मामले निकलकर सामने आने लगे। अब तक करीब 2 दर्जन मामले सामने आ चुके हैं, तो हेमा कमेटी की रिपोर्ट में कई कलाकारों ने अपनी उत्पीड़न को साझा किया है।

इस रिपोर्ट के जारी होने के बाद कुछ कलाकार खुलकर सामने आए और आरोपितों को सार्वजनिक रूप से कटघरे में खड़ा कर दिया। फिल्मी दुनिया के ऐसे कलाकारों, डायरेक्टरों पर आरोप लगे, जो अब तक उस दुनिया के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर जाने जाते थे। इनमें रंजीत जैसे निर्देशक, वीनू जैसे प्रोड्यूसर, जयसूर्या और सिद्दीकी जैसे बड़े एक्टर का नाम सामने आया।

इस बीच, भास्कर की पत्रकार शिवांगी सक्सेना ने केरल की यात्रा की और कई पीड़ितों की आपबीती अपनी रिपोर्ट के माध्यम से साझा की। पीड़ितों ने बताया है कि कैसे उत्पीड़कों के सामने न झुकने और उनके साथ न सोने पर उन्हें फिल्म इंडस्ट्री से ही बैन कर दिया गया। चूँकि ये मामले यौन उत्पीड़न के हैं, इसलिए पीड़ितों के नाम बदल दिए गए हैं। ऑपइंडिया उनमें से कुछ पीड़ितों की आपबीती साझा कर रहा है।

आपबीती नंबर-1: 11वीं की छात्रा से प्रोड्यूसर ने माँगा सेक्सुअल फेवर

मलयालम फिल्म एक्ट्रेस और स्क्रीन राइटर वेदिका (बदला हुआ नाम) ने बताया कि साल 2004 में, जब वो सातवीं कक्षा में थी, तो चाइल्ड एक्ट्रेस के रोल के लिए अपने पिता के साथ एक ऑडिशन में हिस्सा लेने पहुँची थी। वहाँ एक असिस्टेंट डायरेक्टर ने उन्हें फुसलाने और फिर उनके रेप की कोशिश की। किसी तरह से वो बचकर भागी और पिता को बताया, जिसके बाद से उनके घर वालों ने एक्टिंग से दूर रहने की हिदायत दे दी। लेकिन जब वो 11वीं कक्षा में थी, तो जाने माने फिल्म प्रोड्यूसर वीनू के बारे में सुना। वो एक फिल्म के लिए नए चेहरों की तलाश कर रहे थे। किसी संपर्क के जरिए वीनू से संपर्क किया गया, तो वो सीधे एक्ट्रेस के घर ही पहुँच गए। कुछ सीन की एक्टिंग के ट्रायल के बाद प्रोड्यूसर वीनू उन्हें उनके ही मम्मी-पापा के सामने दूसरे कमरे में लेकर गए और फिर फिल्म में काम देने के बदले सीधे सेक्सुअल फेवर माँग लिया।

एक्ट्रेस ने अपनी आपबीती हेमा कमेटी के सामने भी बयाँ की है। एक्ट्रेस ने बताया, ‘वीनू की सेक्सुअल डिमांड के बारे में माता-पिता को बताया तो उन्हें अपनी ही बेटी पर यकीन नहीं हुआ। वहीं, वीनू मेरे पिता पर दबाव डालते रहे, लेकिन मैंने मना कर दिया।’ इसके बाद इंडस्ट्री में करीब 9 फिल्मों में काम करने के बाद एक्ट्रेस ने इंडस्ट्री ही छोड़ दी। पढ़ाई की और शादी भी हो गई। कई सालों के बाद वो डिप्रेशन में जाने लगीं, तो डॉक्टरों की सलाह पर एक बार फिर से साल 2018 में इंडस्ट्री में वापसी की, लेकिन स्क्रीन राइटर के तौर पर। उन्होंने अपने एक्टिंग के सपनों को ही मार दिया।

एक्ट्रेस वेदिका ने कहा, “अब कास्टिंग काउच का तरीका बदल रहा है। पहले वो आपकी तारीफ करेंगे और बड़े-बड़े सपने दिखाएँगे, और जब आप बड़े सपनों में खोने लगेंगे, तो उन्हें पूरा करने के लिए आपसे सेक्सुअल फेवर माँगा जाएगा।” उन्होंने कहा कि मतलब निकल जाने (संबंध बन जाने) के बाद कोई एक्टर-डायरेक्टर पलटकर देखता तक नहीं और न ही फोन उठाता है।

वेदिका अब केरल की फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था वूमेन कलेक्टिव इन सिनेमा (CWW) से जुड़ी हैं। इसका गठन साल 2017 में मलयालम फिल्मों में सुपरस्टार की हैसियत रखने वाले दिलीप द्वारा बड़ी एक्टर भावना पर हमला करवाने के मामले के सामने आने के बाद हुआ था। ये संस्था महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाती रही है। इसी संस्था की माँग पर केरल की सरकार ने हेमा कमेटी गठन किया था, जिसकी रिपोर्ट सालों तक दबी रही और जब अब सामने आई है, तो मलयालम फिल्म इंडस्ट्री के स्याह पक्ष को सामने रख रही है। हालाँकि वेदिका ने ये भी कहा कि उन्होंने जब वूमेन कलेक्टिव इन सिनेमा नाम की इस महिलावादी संस्था के साथ अपना नाता जोड़ा, तो इंडस्ट्री से उनका लगभग बहिष्कार ही कर दिया गया।

हैरानी की बात ये है कि एक्टर दिलीप ने जिस एक्ट्रेस भावना पर हमला कराया, उस पीड़ित एक्ट्रेस को मलयालम फिल्म इंडस्ट्री से ही 5 सालों तक दूर रहना पड़ा, वहीं जेल में रहकर लौटा दिलीप एक से बढ़कर एक बड़ी फिल्में कर रहा है। जेल में कुछ दिन बिताने के अलावा उसका कुछ नहीं बिगड़ा, भले ही उसे इंडस्ट्री में ब्लैकलिस्टेड करने जैसी बातें हुई हो, लेकिन दिलीप इंडस्ट्री में फिर से उसी ताकत के साथ काम कर रहा है, जबकि करीब 5 साल बाद मलयालय सिनेमा में लौटी भावना महज 2 ही फिल्में कर सकीं।

आपबीती नंबर 2: जयसूर्या ने अपनी ओर खींचा, मना करने पर इंडस्ट्री से हुई बैन

जूनियर आर्टिस्ट संजना ने हेमा कमेटी की रिपोर्ट सामने आकर खुल कर अपनी आपबीती मीडिया के सामने रखी है। उन्होंने बड़े एक्टरों में गिने जाने वाले जयसूर्या की सच्चाई बयाँ की। संजना डेढ़ दशक से इंडस्ट्री में हैं। साल 2012 में उनकी पहली फिल्म रिलीज हुई थी। अगले साल यानी 2013 में वो डायरेक्टर अविरा रिबेका की फिल्म पिगमैन की शूटिंग कर रही थी, तभी डायरेक्टर ने उन्हें एक्टर जयसूर्या और एक्ट्रेस राम्या नसीबन से मिलवाया था। पिगमैन फिल्म में ये दोनों लीड रोल में थे। यहाँ से संजना के साथ जो-कुछ भी बीता, वो बेहद परेशान करने वाला रहा।

संजना ने कहा, “एक बाद मैं मेकअप के बाद सेट पर जा रही थी, तभी जयसूर्या ने मुझे अपनी ओर खींच लिया। मैं रोने लगी और धक्का दी, तब जयसूर्या ने मुझे छोड़ा। लेकिन जयसूर्या मेरी तारीफ करके मुझे फाँसने की कोशिश करता रहा। उसने मुझे कहा कि वो मुझे पसंद करता है, साथ ही ‘आई लव यू’ भी कहा, जबकि वो शादीशुदा था।” संजना ने कहा कि उन्होंने अपने पति से भी ये बात बताई थी, जिसके बाद पति ने कहा था कि जयसूर्या बड़ा आदमी है, हम उसका कुछ नहीं कर सकते।

इस घटनाक्रम के बाद संजना को काम मिलना बंद हो गया। यहाँ तक कि साल 2018 में उन्हें जब एक फिल्म ‘वासवदता’ के लिए चुना गया और पोस्टर तक जारी हो गए, तब उस फिल्म के एक प्रोड्यूसर ने मेरे साथ ‘एडजस्टमेंट’ की बात की। संजना ने कहा, “इंडस्ट्री में 2013 की घटना के बाद काम मिलना बंद हो गया। पति की 2015 में मौत हो गई। मुझे ज्यादा उम्र का बोलकर फिल्मों से निकाल दिया गया, लेकिन वासवदता फिल्म के प्रोड्यूसर ने मुझे अपने साथ सोने का ऑफर दिया। मैंने मना कर दिया। मुझे बाद में ये कहकर निकाल दिया गया, कि मैं रोल के लिए फिट ही नहीं हूँ।”

संजना ने सुपरस्टार ममूटी की फिल्म से जुड़ा किस्सा बताया। संजना ने कहा, “साल 2019 में डायरेक्टर बलसि थॉमस ममूटी के साथ फिल्म बना रहे थे। ममूटी के साथ काम करने का मेरा सपना था। मुझे फिल्म में कैंसर के मरीज का रोल करना था। मुझे कहा गया कि मेरा वजन ज्यादा है। 1 महीने में 10 किलो वजन करने का टारगेट दिया गया। मैंने खूब मेहनत की, लेकिन वजन कम नहीं हुआ। जिसके बाद मैंने 2-3 सर्जरी कराई। पेट से फैट निकाला गया, ब्रेस्ट की भी सर्जरी हुई, इसके बावजूद मेरे हाथ से रोल निकल गया, जबकि सर्जरी के साइड इफेक्ट्स मैं आज तक झेल रही हूँ।”

आपबीती नंबर 3: डायरेक्टर रंजीत ने की ‘कुकर्म’ की कोशिश

मलयालम इंडस्ट्री में स्ट्रगल कर रहे एक्टर्स के साथ और भी बुरा व्यवहार होता है। आसिफ नाम के एक्टर ने बताया कि वो सिनेमा लाइन में आने से पहले ही कास्टिंग काउच का शिकार हो गए थे और उनका शिकार करने वाला कोई और नहीं, बल्कि मलयालम इंडस्ट्री के सबसे बड़े डायरेक्टर में से एक रंजीत ही थे। बता दें कि रंजीत कुछ दिन पहले तक मलयालम सिनेमा से जुड़ी सरकारी संस्थान चित्रलेखा के अध्यक्ष थे, लेकिन यौन शोषण के आरोपों के बाद उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा।

आसिफ नाम के एक्टर ने बताया, “साल 2012 में रंजीत की फिल्म की शूटिंग देखने गया था। भीड़ में कहीं से रंजीत की नजर मुझपर पड़ गई। एक क्रू मेंबर के सहारे रंजीत ने मुझे बुलाया और फिल्म में रोल देने की पेशकश की। उसी क्रू मेंबर ने मुझे ऑडिशन के लिए रंजीत के होटल में छोड़ दिया। वहाँ रंजीत ने अपना नंबर टिश्यू पेपर पर लिखकर दिया और हिदायत दी कि सिर्फ मैसेज करना है, कॉल नहीं। इसके बाद रंजीत ने मुझे बेंगलुरु बुलाया और होटल में गलत तरीके से सीढ़ियों के रास्ते चौथे फ्लोर पर एंट्री दिलाई, क्योंकि होटल स्टाफ ने सामने से एंट्री देने से मना कर दिया।” इसके बाद आसिफ ने जो कुछ कहा, वो हैरान करने वाला है।

आसिफ ने कहा, “रंजीत ने मुझसे कपड़े उतारने को कहा और कहा कि वो रंजीत की बॉडी देखना चाहते ङैं। रंजीत ने मेरी तारीफ की और मुझे गलत तरीके से छूने लगे। उन्होंने जबरदस्ती मेरे कपड़े उतरवाए और तस्वीर खींचकर एक एक्ट्रेस को भेजी।” आसिफ ने कहा कि “मैंने साल 2015 में मलयालम मूवी आर्टिस्ट एसोसिएशन (AMMA) में रंजीत की शिकायत के लिए संपर्क किया। वहाँ AMMA के जनरल सेक्रेटरी एडवेला बाबू मिले। उन्होंने मदद का भरोसा दिया। कुछ समय बाद उन्होंने मेरी तस्वीरें माँगी और काम दिलाने का भी भरोसा दिया। उन्होंने मुझे कोच्चि बुलाया, लेकिन मैं समझ गया था कि वो भी रंजीत की तरह मुझे इस्तेमाल करना चाहते थे। मैं नहीं गया। हेमा कमेटी की रिपोर्ट सामने आने के बाद मैंने बड़ी हिम्मत करके अपनी आपबीती सार्वजनिक की है।”

भास्कर की रिपोर्ट में मेकअप आर्टिस्ट को इंडस्ट्री से बैन करने वाली आपबीती भी साझा की गई है। वहीं, विद्या नाम की एक्ट्रेस ने बताया कि कैसे सेक्सुअल फेवर के लिए कलाकारों को अप्रोच किया जाता है। विद्या ने एक्टर एलिन्सिएर लोपेज पर यौन हमले का आरोप लगाया है। उन्होंने एलिन्सिएर लोपेज के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई है। विद्या ने बताया कि लोपेज साल 2018 में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान रात के समय मेरे कमरे में घुस आया और मेरे साथ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की। मैंने विरोध किया, तो मुझे काम मिलना ही बंद हो गया। पीड़ित ने बताया कि जब उसने एफआईआर दर्ज कराई, तो उसे सोशल मीडिया पर निशाना बनाया गया।

कई पीड़ितों ने बताया है कि उनका सड़कों पर पीछा किया जाता है। वो किससे मिलते हैं, क्यों मिलते हैं, इस पर नजर रखी जाती है। इंडस्ट्री में एजेंट्स की भरमार है। वो मौका ढूँढते हैं कि कब उनके चंगुल में नया शिकार फंसे।

आपबीती नंबर 4: बेटी बोलकर डायरेक्टर ने बनाया सेक्स स्लेव

एक इंटरव्यू में मलयालम एक्ट्रेस सौम्या ने बचपन में अपने साथ हुए यौन और मानसिक शोषण का खुलासा किया था। एक्ट्रेस ने बताया कि 18 साल की उम्र में एक डायरेक्टर ने उन्हें अपनी फिल्म में काम दिया था। उस डायरेक्टर और उसकी पत्नी ने सौम्या के पेरेंट्स के साथ उन्हें फिल्मों में जाने देने को लेकर जबरदस्ती की। डायरेक्टर सौम्या को अपनी बेटी कहता था, लेकिन अकेले में उनके साथ ऐसी हैवानों वाली हरकतें करता था, जिससे उबरने में एक्ट्रेस को 30 साल लग गए।

एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में सौम्या ने बताया, ‘मैं 18 साल की थी। मेरा कॉलेज का पहला साल था। मेरे पेरेंट्स को फिल्मों के बारे में नहीं पता था। मुझे ये मौका (तमिल फिल्म में काम करने का) कॉलेज के थिएटर कॉन्टैक्ट से आया था।’ एक्ट्रेस ने बताया कि उन्हें लेने के लिए डायरेक्टर अपनी पत्नी के साथ आया था। पहले ही दिन से सौम्या उस शख्स के साथ सहज नहीं थीं। एक्ट्रेस ने कहा कि वक्त के साथ उन्हें समझ आया कि डायरेक्टर उन्हें अपने ‘सेक्स स्लेव’ के रूप में तैयार कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ वो उन्हें ‘अपनी बेटी’ भी कहता था।

सौम्या ने बताया कि डायरेक्टर ने मेरे साथ जबरदस्ती की और मेरा रेप किया। उन्होंने बताया, “ये सब एक साल तक चला जब मैं कॉलेज में थी।” सौम्या का कहना ये भी है कि डायरेक्टर ने उनके प्राइवेट पार्ट में रॉड डाली थी। इतना ही नहीं, डायरेक्टर सौम्या को बार-बार ‘बेटी’ कहता था और ये भी कहता था कि वो उनके साथ बच्चा करना चाहता है। सौम्या ने कहा, “ये सब सहने के बाद मुझे ‘शर्म’ की भावना से उबरने में 30 सालों का वक्त लगा। मैं सभी पीड़िताओं से कहती हूँ कि अपने साथ हो रही चीजों की शिकायत करें।” एक्ट्रेस सौम्या ने इंटरव्यू के दौरान डायरेक्टर के नाम का खुलासा नहीं किया। उनका कहना है कि वो जल्द केरल सरकार की बनाई स्पेशल पुलिस टीम के सामने उस शख्स की पहचान का खुलासा करेंगी।

गौरतलब है कि फरवरी, 2017 में मलयालम सिनेमा की मशहूर एक्ट्रेस भावना पर हमला हुआ था। हमले का आरोप एक्टर दिलीप पर लगा था, जो मलयालम सिनेमा के बड़े सुपरस्टार में से एक हैं। भावना की अगले महीने सगाई होने वाली थी, लेकिन दिलीप ऐसा नहीं चाहता था। इस मामले में जुलाई में दिलीप को गिरफ्तार किया गया था। उसके कुछ ही महीनों बाद उसे जमानत मिल गई थी।

भावना मलयालम सिनेमा से 5 साल तक गायब हो गई थी, जबकि दिलीप जेल से छूटने के बाद भी बड़ी फिल्में करता रहा। इसी घटना के बाद CWW नाम का संगठन बनाया गया था। सरकार ने फिर हेमा कमेटी का गठन किया था। हेमा कमेटी ने 2019 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी, लेकिन करीब 5 साल के बाद काफी नामों को छिपाने के बाद ये रिपोर्ट बाहर आई और फिर मलयालम इंडस्ट्री से जुड़े काले पन्ने एक के बाद एक खुलते गए।