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एयर होस्टेस से छेड़खानी करने लगा मोहम्मद अदनान, विमान से उतार कर किया गया गिरफ्तार: ‘एयर इंडिया’ की उड़ान में भी हो गई देरी

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में एयरपोर्ट पर एक एयर होस्टेस से छेड़खानी का मामला सामने आया है। आरोपित का नाम मोहम्मद अदनान है जो वाराणसी से हैदराबाद जाने के लिए फ्लाइट पकड़ने आया था। पुलिस ने मामला दर्ज कर के आरोपित को हिरासत में ले लिया है। अदनान की करतूत से विमान लगभग सवा घंटे देर से उड़ा। एयर इंडिया के सुरक्षा अधिकारी की तहरीर पर केस दर्ज कर के घटना की जाँच की जा रही है। घटना शुक्रवार (30 अगस्त, 2024) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला वाराणसी के थाना क्षेत्र फूलपुर का है। यहाँ लाल बहादुर शास्त्री अंतराष्ट्रीय एयरपोर्ट है। शुक्रवार को यहाँ हैदराबाद का रहने वाला मोहम्मद अदनान पहुँचा। वह आज़मगढ़ कुछ काम से गया था। अदनान को सुबह 7:30 वाली फ्लाइट पकड़ कर एयर इंडिया एक्सप्रेस के विमान से हैदराबाद जाना था। आरोप है कि मोहम्मद अदनान ने एयर इंडिया के फ्लाइट संख्या IX 1171 की चालक दल की एक महिला सदस्या से छेड़खानी शुरू कर दी।

पहले तो पीड़िता ने अदनान की करतूतों को अनदेखा किया लेकिन जब वो नहीं माना तो मामले की शिकायत सुरक्षा अधिकारी से की गई। पीड़िता की शिकायत पर दुर्व्यवहार कर रहे मोहम्मद अदनान को जहाज से उतार दिया गया। इस हंगामे की वजह से 7:30 पर जाने वाली फ्लाइट लगभग 1 घंटे 20 मिनट लेट हो कर 8:50 पर टेकऑफ़ कर पाई। एयर इंडिया एक्सप्रेस के सुरक्षा अधिकारी शशिकांत ने अदनान की हरकतों की शिकायत पुलिस में की। पुलिस टीम फ़ौरन मौके पर पहुँची और आरोपित को हिरासत में ले लिया। अदनान के खिलाफ FIR दर्ज कर ली गई।

यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 79 के तहत दर्ज हुई है। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है। पुलिस ने आरोपित को कोर्ट में पेश किया है। शनिवार (31 अगस्त) को DCP गोमती जोन ने बताया कि मामले की जाँच और अन्य जरूरी कार्रवाई अमल में लाई जा रही है।

दलितों को बना रहे थे ईसाई, हिन्दुओं ने किया विरोध तो नेपाल पुलिस ने चर्च पर जड़ दिया ताला: पादरी भरत महतो पर कार्रवाई के लिए शिकायत

नेपाल के धनुषा जिले में ईसाई धर्मांतरण का मामला सामने आया है। यहाँ हिन्दू संगठन के सदस्यों ने शनिवार (31 अगस्त, 2024) को एक चर्च के आगे प्रदर्शन किया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि चर्च द्वारा गरीब हिन्दुओं को लालच दे कर ईसाई बनाया जा रहा है। हालत तनावपूर्ण होते देख कर पुलिस बल मौके पर पहुँचा। दोनों तरफ से हुई बहस के बाद आखिरकार चर्च पर ताला लगा दिया गया है। मुख्य आरोपित का नाम भरत महतो है। भरत महतो पहले हिन्दू था लेकिन बाद में धर्मांतरित हो कर ईसाई बन गया था।

यह मामला नेपाल के धनुषा जिले के शहीद नगर नगरपालिका, वार्ड नंबर 3 का है। यहाँ गरीब और मध्यमवर्गीय लोग ज्यादातर संख्या में रहते हैं। इन हिन्दुओं में दलित समुदाय के लोग बहुतायत हैं। आरोप है कि इस वार्ड में लगभग 5 साल पहले एक चर्च बनवा दिया गया था। कुछ ही दिनों के अंदर आसपास के गरीब लोगों का इस चर्च में आना-जाना शुरू हो गया। चर्च का संचालन भरत महतो नाम का व्यक्ति करता था। भरत महतो पहले हिंदू था लेकिन बाद में धर्मांतरित हो कर ईसाई बन गया।

नेपाल की हिन्दू सम्राट सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश यादव ने ऑपइंडिया से बात की। राजेश यादव ने हमें बताया कि उनके संगठन को काफी समय से चर्च के अंदर हो रही कारस्तानी की सूचना मिल रही थी। यहाँ ज्यादातर दलित वर्ग के भोले-भाले हिन्दुओं को प्रार्थना के नाम पर बुलाया जाता था और बाद में उन्हें ईसाई सहित दे कर धर्मांतरित करने की कोशिश की जाती थी। जब ‘हिन्दू सम्राट सेना’ के सदस्यों को इस करतूत की भनक लगी तो उन्होंने अपने स्तर पर इसकी जाँच पड़ताल शुरू की।

राजेश यादव ने हमें आगे बताया कि उनके कार्यकर्ताओं ने चर्च पर नजर रखी। कुछ लोगों को प्रार्थना के भीतर भेजा गया। वहाँ पता चला कि बाइबिल बाँटी जा रही है और लोगों को हिन्दू धर्म छोड़ कर ईसाई बनने के लिए प्रेरित किया जा रहा। जब तमाम वीडियो और सबूत मिल गए तो ‘हिन्दू सम्राट सेना’ द्वारा लगभग 15 दिन पहले स्थानीय प्रशासन को ज्ञापन दे कर इसे बंद करवाने की माँग की। हालाँकि इस ज्ञापन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और चर्च की गतिविधियाँ जारी रहीं। हिन्दू सम्राट सेना ने ऑपइंडिया को वो तमाम वीडियो और तस्वीरों को भेजा है।

आखिरकार शनिवार (31 अगस्त) को लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। दर्जनों की तादाद में स्थानीय लोग हिन्दू सम्राट सेना के सदस्यों संग एक कच्चे मकान में बने चर्च में पहुँच गए। यहाँ उन्होंने देखा कि छोटे-छोटे बच्चे और बच्चियाँ भी प्रार्थना के नाम पर हो रही धर्मांतरित की साजिश के शिकार हो रहे हैं। चर्च के बाहर ‘जय श्री राम’ के नारे लगे। कुछ ही देर में पुलिस और अन्य प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुँच गए। इन सभी ने चर्च के कागजातों की जाँच की।

आखिरकार चर्च बिना किस वैध कागज के चलता मिला जिसे सील कर दिया गया है। हिन्दू सम्राट सेना ने पास्टर भरत महतो पर भी कार्रवाई की माँग को ले कर प्रशासन को ज्ञापन दिया है। चर्च के अंदर से बाइबिल व अन्य ईसाई साहित्य बरामद हुए हैं।

मुस्लिम बलात्कारी को सज़ा दिलाने के लिए उतरे जो लोग, उन पर गुजरात पुलिस ने बरसाई लाठियाँ: FIR दर्ज कर 30 को गिरफ्तार किया, कहा – माहौल खराब किया

गुजरात के वलसाड जिले में मंगलवर (27 अगस्त, 2024) को एक मुस्लिम युवक द्वारा 3 साल की हिन्दू बच्ची से रेप का मामला सामने आया था। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है। तब गुस्साए लोगों ने थाने के बाहर प्रदर्शन किया था और आरोपित को कड़ी सजा देने की माँग उठाई थी। घटना के अगले दिन रैली निकाल कर विरोध प्रदर्शन किया गया था। इस रैली पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया है। अब पुलिस प्रदर्शनकारियों पर FIR दर्ज कर के लगभग 30 लोगों को गिरफ्तार किया है।

मिल रही जानकारी के मुताबिक उमरगाम पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अलग-अलग FIR दर्ज की है। इन FIR में महिलाएँ भी नामजद हैं। पहली FIR कुल 30 लोगों के खिलाफ दर्ज की गई है। आरोपितों में 18 पुरुष और 12 महिलाएँ शामिल हैं। यह FIR वलसाड सिटी थाने में दर्ज हुई है। शिकायतकर्ता इसी थाने में तैनात एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर हैं। आरोपितों पर तमाम धाराओं के साथ सार्वजनिक सम्पत्ति क्षति निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि आरोपितों ने एक अवैध भी जुटा कर पुलिस स्टेशन पर हमला किया। इस हमले से सरकारी काम में बाधा आई। भीड़ में मौजूद लोगों पर सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाने और भड़काऊ नारे लगाने के भी आरोप हैं। बताते चलें कि मंगलवार को जुटी यह भीड़ आरोपित को फाँसी की सजा देने की माँग कर रही थी। फिलहाल इस मामले में पुलिस जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई कर रही है।

रैली को शहर का माहौल खराब करने की साजिश बताया

दूसरी FIR में कुल 13 लोग आरोपित किए गए हैं। इसमें 11 महिलाएँ व 2 पुरुष शामिल हैं। यह FIR उमरगाम पुलिस स्टेशन के पीआई शैलेश चौधरी की शिकायत पर दर्ज। हुई है। इन सभी आरोपितों पर भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है। बताते चलें कि मंगलवार को हुई घटना के अगले दिन बुधवार को उमरगाम में रैली निकाली गई थी। इस रैली में रेप के आरोपित को कड़ी सजा दिलाने व बेटियों की सुरक्षा की माँग उठाई गई थी। हालाँकि पुलिस ने इसे लॉ एन्ड ऑर्डर खराब करने की साजिश माना और FIR दर्ज कर ली है।

पुलिस ने अपनी FIR में बताया है कि नामजद आरोपितों ने रैली निकालने की कोई आधिकारिक परमिशन नहीं ली थी। इस रैली में कई लोग आरोपितों को खुद के हवाले करने की माँग उठा रहे थे। बकौल शिकायतकर्ता ऐसी नारेबाजी से समाज का माहौल खराब हुआ और कानून व्यवस्था की स्थिति खराब होने की आशंका हो गई थी। उमरगाम कस्बा बंद करने की घोषणा को भी पुलिस ने सार्वजनिक हंगामा पैदा करने की साजिश करार दिया।

नामजद आरोपितों में अधिकतर रैली के आयोजक है। बताते चलें कि इस रैली पर पुलिस ने लाठीचार्ज भी किया था जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। जबकि प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने रैली में शामिल महिलाओं को भी निशाना बनाया था। हालाँकि, पुलिस का दावा है कि लाठीचार्ज में कोई भी गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ है।

तीसरी FIR में 12 नामजद

इस मामले में तीसरी FIR 12 नामजदों सहित 300 से 400 अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज हुई है। पुलिस ने आरोपितों द्वारा खुद पर पथराव करने का आरोप लगाया है। इसी के साथ FIR में सरकारी काम में बाधा डालने की भी धारा लगाई है है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

पुलिस ने क्या कहा ?

ऑपइंडिया ने उमरगाम पुलिस संपर्क किया। पुलिस स्टेशन पीआई एस. डी चौधरी ने बातचीत में कहा कि कानून को हाथ में लेने वाली भीड़ के खिलाफ अलग-अलग एफआईआर दर्ज कर के जाँच की जा रही है। बकौल PSI अब तक कुल तीस से बत्तीस लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

13 छात्राओं को मिली TMC की रैली में न जाने की ‘सज़ा’, घंटों टॉयलेट में लॉक कर के रखा: साँस की तकलीफ के कारण अस्पताल में भर्ती

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता स्थित RG Kar मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में महिला डॉक्टर के बलात्कार एवं हत्या के बाद पूरा राज्य उबल रहा है। डॉक्टरों के बाद युवाओं और छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया, फिर भाजपा ने विरोध प्रदर्शन किया, कॉन्ग्रेस ने भी विरोध प्रदर्शन किया। अब तृणमूल कॉन्ग्रेस की युवा यूनिट TNCP (तृणमूल स्टूडेंट्स कॉन्ग्रेस) की 13 छात्राओं को टॉयलेट में कैद किए जाने का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि इन छात्रों ने संगठन के कार्यक्रम में जाने से इनकार कर दिया था।

शुक्रवार (30 अगस्त, 2024) को संगठन ने एक मार्च का आयोजन किया था, जिसमें ये छात्राएँ नहीं गईं। इसके बाद उन्हें कॉमन रूम के टॉयलेट में लॉक कर दिया गया। कई घंटों तक बाथरूम में कैद रहने के कारण इन महिलाओं की तबीयत भी खराब हो गई। इन्हें सब-डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। उधर TMCP नेताओं ने इन आरोपों से इनकार किया है। नॉर्थ बंगाल डेवलपमेंट मिनिस्टर उदयन गुहा भी उक्त कॉलेज की प्रशासक समिति में शामिल हैं।

वो उदयन गुहा ही हैं जिन्होंने विरोध प्रदर्शनों को लेकर कहा था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तरफ उठने वाली उँगलियों को तोड़ डाला जाएगा। कॉलेज के प्रधानाध्यापक अब्दुल अवल ने इस घटना पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है। दिनहाटा पुलिस थाने ने बताया है कि उन्हें घटना की सूचना मिली है, लेकिन लड़कियों के परिजनों ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई है। RG Kar मामले में तृणमूल कॉन्ग्रेस की छात्र यूनिट ने राज्य भर में मार्च बुलाया था। इसमें जाने से इनकार करने पर इन छात्राओं को लॉक कर दिया गया।

इसके बाद इन छात्राओं ने पड़ोस में रहने वाले एक शख्स को बुलाया, जिसके आकर दरवाजा खोला। इसके बाद पीड़ित छात्राओं को अस्पताल में भर्ती कराया गया। इन्होंने डर के कारण मीडिया के सामने कुछ नहीं कहा। एक लड़की के पिता ने बताया कि उनकी बेटी को पहले से ही साँस लेने में तकलीफ थी। लंबे समय तक खाना न खाने के कारण भी छात्राओं की तबीयत बिगड़ी। TMCP नेता आमिर आलम ने कहा कि छात्राएँ खुद ही बीमार पड़ी हैं। वहीं ABVP ने जाँच में कोताही का आरोप लगाया है।

रद्द हो कॉन्ग्रेस MLA मामन खान की जमानत, हाईकोर्ट में याचिका: राज्य सरकार ने बताया – यही है नूहं हिंसा का सरगना, गैर-कानूनी सभा में हिन्दू यात्रा हमले के लिए उकसाया

साल 2023 में मेवात के नूहं इलाके में बृजमंडल यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं पर हुए हमले के मुख्य आरोपित कॉन्ग्रेस विधायक मामन खान की जमानत को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल हुई है। हरियाणा सरकार द्वारा दायर इस याचिका में मामन खान को हिंसक भीड़ का सरगना बताया गया है। चंडीगढ़ स्थित पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इस याचिका पर मामन खान को नोटिस जारी करते हुए 26 नवंबर तक जवाब माँगा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हरियाणा राज्य सरकार ने कॉन्ग्रेस MLA मामन खान को निचली अदालत से मिली जमानत ख़ारिज करने की अपील हाईकोर्ट में की है। इस अपील में राज्य सरकार की तरफ से मामन को नूहं हिंसा का कर्ताधर्ता बताया गया है। याचिका में बताया गया है कि इस हिंसा में कई लोगों की जान चली गई थी जबकि 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। याचिका में उस गैर-कानूनी सभा का भी जिक्र हुआ है जिसमें बृजमंडल यात्रा पर हमले के लिए उकसाया गया था। आरोप है कि साजिशन हुई इस सभा का नेतृत्व मामन खान ने किया था।

याचिका में आगे बताया गया है कि नूहं के सत्र न्यायाधीश ने मामन को जमानत देने से पहले कई गंभीर बिंदुओं पर गौर नहीं किया था। हाईकोर्ट में इस याचिका की सुनवाई जस्टिस महावीर सिंह संधू की अदालत में होनी है। न्यायाधीश ने मामन खान को नोटिस जारी करते हुए 26 नवंबर तक जवाब माँगा है। मामन द्वारा जवाब दाखिल करने के बाद मामले में अगली सुनवाई होगी। मामन खान पहले ही लगे आरोपों को राजनीति से प्रेरित और खुद को फँसाने की साजिश करार देते आ रहे हैं।

बताते चलें कि जुलाई 2023 के अंतिम सप्ताह में हुई बृजमंडल यात्रा पर कट्टरपंथियों ने नूहं के कई हिस्सों में हमला किया था। हमलावर भीड़ ने अलग-अलग गुट बना कर न सिर्फ श्रद्धालुओं बल्कि पुलिसवालों के साथ आम नागरिकों की भी हत्या कर दी थी। उपद्रवियों ने बमों और लाठी डंडों गोलियों का इस्तेमाल करने के साथ गोलियाँ भी बरसाईं थीं। इस मामले में पुलिस ने कुल 61 FIR दर्ज कर के कई उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है।

लम्बे समय तक फरार रहने के बाद 14 सितंबर, 2023 को पुलिस ने मामन को गिरफ्तार कर लिया था। 18 अक्टूबर, 2023 को मामन को जिला अदालत से जमानत मिल गई थी।

‘तू हिन्दू लड़के से क्यों बात कर रही थी’: मुस्लिम लड़की को गंदी-गंदी गालियाँ देते हुए बुर्का फाड़ने का प्रयास, पीड़िता का आरोप- नाज़िम और वसीम नाम ले रहे थे लोग

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में हिन्दू लड़के से बात करने का आरोप लगा कर एक मुस्लिम लड़की से गाली-गलौज किए जाने का मामला सामने आया है। गंदी-गंदी गालियाँ देते हुए पीड़िता का बुर्का भी खींचा गया। लड़की की तहरीर पर अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। हालाँकि पीड़िता का आरोप है कि आसपास जुटे लोग आरोपितों को नाज़िम और वसीम कह कर बुला रहे थे। घटना गुरुवार (29 अगस्त 2024) की है। आरोपितों की तलाश की जा रही है।

यह घटना मुरादाबाद के थानाक्षेत्र कटघर की है। यहाँ 30 अगस्त (शुक्रवार) को पीड़िता ने थाने में शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत के मुताबिक मुस्लिम समुदाय की पीड़िता मुरादाबाद में कहीं जॉब करती है। गुरुवार की शाम लगभग 7:20 पर वह अपने घर लौट रही थी। इसी दौरान उसे एक युवक ने रोका और कहा, “तू हिन्दू लड़के से बात क्यों कर रही है।” इसके बाद आरोपित पीड़िता को गंदी-गंदी गालियाँ देने लगा। पीड़िता का बुर्का भी खींचने की कोशिश की गई।

इस दौरान पीड़िता आरोपितों को बताती रही कि वो जिस से बात कर रही है, वह उसके भाई जैसा है। हालाँकि इस दलील का आरोपितों पर कोई फर्क नहीं पड़ा और उनकी बदतमीजी जारी रही। अपने वीडियो बयान में पीड़िता ने बताया है कि आरोपित उनके ही मोहल्ले के हैं। जब दोनों आरोपित पीड़िता से बदतमीजी कर रहे थे, तब आसपास के लोग उन्हें वसीम और नाज़िम कह कर बुला रहे थे। बकौल पीड़िता अगर बीच बचाव करने वाले लोग न आए होते तो उनको शायद आरोपित मार ही डालते।

पुलिस ने इस शिकायत का संज्ञान लेते हुए अज्ञात आरोपित पर FIR दर्ज कर ली है। यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 126 (2), 74 और 352 के तहत दर्ज हुई है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। मुरादाबाद के एसपी सिटी के मुताबिक लड़की से बात कर रहे युवक के साथ भी अभद्रता की गई थी। मामले में आरोपित की पहचान के प्रयासों के साथ अन्य जरूरी कार्रवाई और जाँच की जा रही है।

आपको बता दें कि इसी सप्ताह बरेली में भी ऐसी ही घटना हुई है। वहाँ भी बुर्का पहनी एक लड़की को जब एक लड़के के साथ बैठे देखा गया तो इस्लामी कट्टरपंथी भड़क गए। इसके बाद कट्टरपंथियों ने पहले लड़के को थप्पड़ मारा। जब लड़की ने उन लोगों को रोकना चाहा तो कट्टरपंथियों ने उस लड़की को भी थप्पड़ मारा।

नाना ने जमीन दी, माँ ने आपातकाल में रिपोर्टिंग के लिए बेदखली का भेजा नोटिस, राजीव गाँधी ने भी जारी रखी प्रताड़ना: 37 साल बाद IndianExpress को कोर्ट से मिली राहत

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार (30 अगस्त 2024) को केंद्र सरकार द्वारा इंडियन एक्सप्रेस अखबार को जारी किए गए 37 साल पुराने बेदखली नोटिस को खारिज कर दिया। इस नोटिस में अखबार को दिल्ली के बहादुर शाह जफर रोड स्थित बिल्डिंग खाली करने की माँग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार का नोटिस प्रेस की स्वतंत्र को दबाने तथा उसके आय के स्रोत को समाप्त करने के लिए था।

दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस प्रतिभा एम सिंह ने कहा कि जिस नोटिस के जरिए सरकार ने अखबार के भवन की लीज समाप्त की थी, वह इंडियन एक्सप्रेस को कभी दिया ही नहीं गया। न्यायमूर्ति प्रतिभा सिंह ने कहा कि अखबार के दफ्तर को उस भवन से निकालने के लिए तत्कालीन सरकार द्वारा नोटिस एवं प्रयास किए गए। यह सब प्रेस की स्वतंत्रता को खत्म करने के लिए था।

अदालत ने कहा, “किराएदारों को नोटिस जारी करके उन्हें एल एंड डीओ के पास किराया जमा करने का निर्देश देना तत्कालीन सरकार की ओर से पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण कार्य है। इसका उद्देश्य केवल एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स को चुप कराना और इसके आय के स्रोतों को खत्म करना था। इससे अधिक कुछ नहीं। इस प्रकार, उक्त नोटिस मनमाने और दुर्भावनापूर्ण माने जाते हैं।”

अदालत ने आगे कहा, “वास्तव में 2 नवंबर 1987 का वह नोटिस, जिसके द्वारा लीज समाप्त की गई थी, एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स को कभी नहीं दिया गया और उसके बाद एक प्रति खरीदी गई। एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स को 15 नवंबर 1987 के टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर से इस बारे में पता चला। उस समय की सरकार का ऐसा आचरण कम से कम कहने के लिए कुछ और नहीं बल्कि दुर्भावना से प्रेरित है।”

चूँकि, सरकार का कार्य अवैध था और मुकदमा लगभग पाँच दशकों तक चला, इसलिए न्यायालय ने कहा कि एक्सप्रेस को 5 लाख रुपए का जुर्माना अदा किया जाना चाहिए। दरअसल, जिस जमीन पर एक्सप्रेस बिल्डिंग बनी हुई है, उसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस पेपर के मालिक रामनाथ गोयनका को 1950 के दशक में दिया गया था।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, इंडियन एक्सप्रेस को शुरुआत में यह जमीन तिलक ब्रिज के पास आवंटित की गई थी, लेकिन पंडित नेहरू के आग्रह पर गोयनका ने इसे वापस लौटा दिया। इसके बदले में रामनाथ गोयनका ने बहादुर शाह जफर मार्ग पर जमीन लेने के लिए राजी हो गए थे। मार्च 1980 में कॉन्ग्रेस की केन्द्र सरकार ने एक्सप्रेस को फिर से एंट्री करने और ध्वस्तीकरण का नोटिस जारी किया।

सरकार की इस नोटिस को पर अखबार ने कहा कि यह सब इंदिरा गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान सरकार द्वारा की गई ज्यादतियों की रिपोर्टिंग का प्रतिशोध था। इसके बाद वह इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में लेकर गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की 3 सदस्यीय बेंच ने साल 1986 में सरकार द्वारा जारी नोटिस को खारिज कर दिया। कोर्ट ने नोटिस को मौलिक अधिकारों का हनन बताया था।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद कॉन्ग्रेस की सरकार ने अखबार को फिर से नोटिस भेजना शुरू कर दिया। उस समय केंद्र में राजीव गाँधी की सरकार थी। इसके बाद इस मामले को टाइम्स ऑफ इंडिया ने 15 नवंबर 1984 को अपने अखबार में उठाया। इसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार ने नोटिस जारी करने के बाद एक्सप्रेस बिल्डिंग पर नियंत्रण कर लिया है।

हालाँकि, अखबार ने कहा कि उसे कोई भी नोटिस नहीं मिला है। इस विषय में उसने केंद्र सरकार को भी लिखा। इसको लेकर सरकार ने अदालत का रूख किया। वहीं, अखबार ने भी कोर्ट में मामला दर्ज किया। कई आरोपों के बीच सरकार ने कहा कि एक्सप्रेस ने समाचार पत्र के अलावा अन्य व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए परिसर का उपयोग किया है तथा वहाँ अनाधिकृत निर्माण हुआ है।

जब हाई कोर्ट ने एक्सप्रेस पर बकाया राशि की गणना करने के लिए कहा तो सरकार का जवाब में 17,684 करोड़ रुपए बताया था। कोर्ट के बार-बार पूछने और कई वकीलों के बदलने के बाद केंद्र सरकार ने यह राशि घटाकर 765 करोड़ रुपए कर दी। अब इस मामले में जस्टिस प्रतिभा सिंह ने फैसला सुनाया है कि केंद्र सरकार द्वारा गणना की गई राशि ‘अविश्वसनीय, अनुचित और अत्यधिक’ है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने पाया कि सरकार द्वारा जारी किया गया लीज समाप्ति का नया नोटिस 1986 में ‘सर्वोच्च न्यायालय के श्रमसाध्य निर्णय की पूर्ण अवहेलना’ है। इसमें यह भी कहा गया कि अखबार ने पट्टे की शर्तों का उल्लंघन नहीं किया है। हाई कोर्ट ने कहा कि अखबार को केवल रूपांतरण शुल्क और अतिरिक्त भूमि किराया देना होगा, जो लगभग 64 लाख रुपए है।

‘कॉन्ग्रेस का शफी नमाजी, वामपंथी शैलजा काफिर’: केरल चुनाव वाले स्क्रीनशॉट को लेकर CPM के शिक्षक नेता के खिलाफ विभागीय जाँच, होगी कार्रवाई

केरल में ‘काफिर’ वाला एक स्क्रीनशॉट खासा चर्चा का विषय बन रहा है। अब राज्य के जनरल एजुकेशन डिपार्टमेंट ने शुक्रवार (30 अगस्त, 2024) को CPM नेता रिबेश रामाकृष्णन के खिलाफ विभागीय जाँच का आदेश दिया है। वो एक प्राथमिक विद्यालय का शिक्षक है। साथ ही वो कोझीकोड के वटकरा तालुका में DYFI (डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया) का प्रखंड अध्यक्ष भी है। बता दें कि DYFI वामपंथी संगठन CPM की ही युवा यूनिट है। केरल के नेता AA रहीम इसके अध्यक्ष हैं।

अरंगोट MLP स्कूल का शिक्षा रिबेश रामाकृष्णन CPM से संबद्ध शिक्षक संगठन का भी नेता है। अब थोडनूर के ‘असिस्टेंट एजुकेशनल ऑफिसर’ (AEO) को जनरल एजुकेशन विभाग के डायरेक्टर ने जाँच कर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने को कहा है। इसके बाद रिबेश रामाकृष्णन के खिलाफ ज़रूरी कार्रवाई की जाएगी। यूथ कॉन्ग्रेस के स्टेट जनरल सेक्रेटरी VP डुल्किफल ने इसकी शिकायत की थी। 25 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के मतदान की पूर्व संध्या पर वटकरा के WhatsApp व अन्य मैसेजिंग एप्स पर ‘काफिर’ वाले स्क्रीनशॉट्स वायरल हुए थे।

इसमें CPM नेता व LDP की उम्मीदवार KK शैलजा को ‘काफिर’ बताया गया था। साथ ही कॉन्ग्रेस के शफी परम्बिल को वोट देने की अपील की गई थी, वो जीत कर सांसद भी बन गए। इस मामले में MSF का एक नेता मुहम्मद कासिम भी आरोपित है। रिबेश रामाकृष्णन के बारे में बताया जा रहा है कि सबसे पहले उसने ही स्क्रीनशॉट डाला था। कासिम ने पुलिस पर रिबेश को बचाने का आरोप लगाया है। पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया है कि ‘रेड एनकाउंटर्स’ नामक व्हाट्सएप्प ग्रुप से ये स्क्रीनशॉट वायरल हुआ था और रिबेश ने वहीं डाला था।

वो इस स्क्रीनशॉट के स्रोत के बारे में कुछ नहीं बता पाया, जिस कारण उसका फोन जाँच के लिए जब्त कर लिया गया है। वायरल पोस्ट में लिखा था– “शफी एक मुस्लिम है जो दिन में 5 बार नमाज पढ़ता है और दूसरी महिला काफिर है। वोट देने से पहले ज़रूर सोचना कि किसे वोट देना चाहिए। वोट हमारे अपनों के लिए करिए।” रिबेश ने इस स्क्रीनशॉट को डालते हुए दिखाया कि मजहब के नाम पर वोट माँगा जा रहा है। कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया कि सीपीएम ने खुद ध्रुवीकरण के लिए ऐसा किया था।

उर्स में शामिल होने आए मुस्लिम सड़कों पर पढ़ने लगे नमाज, UP पुलिस ने खदेड़ा: चादर जुलूस का हिंदुओं ने किया विरोध- गाँव में नई प्रथा शुरू नहीं करने देंगे

उत्तर प्रदेश के बरेली स्थित आला हजरत के उर्स में आए कुछ मुस्लिमों ने खलील चौराहे की सड़क पर नमाज पढ़ने लगे। जब पुलिस ने उन्हें देखा तो उन्हें वहाँ से हटा दिया। इसको लेकर पुलिस ने उनकी नोंक-झोंक भी हुई। पुलिस का कहना था कि पास में ही उर्स स्थल है, वहाँ नमाज पढ़ी जाए। सड़कों पर नमाज पढ़ने से जाम लग रहा था। वहीं, एक मौलाना ने इसको लेकर पुलिस पर आरोप लगाया है।

ऑल इंडिया रजा एक्शन कमेटी के युवा इकाई के अध्यक्ष मौलाना अब्दुल्लाह रजा कादरी ने नमाजियों को सड़क पर से हटाने पर रोष व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि कोतवाली पुलिस ने नमाजियों के साथ अभद्रता की। इसलिए आरोपित पुलिसकर्मियों को निलंबित किया जाए। उन्होंने कहा कि गुरुवार रात को कुछ लोगों ने पोस्टर फाड़े थे। उनकी भी पहचान करके जल्द से जल्द कार्रवाई हो।

दैनिक जागरण के मुताबिक, उर्स के दौरान इलाके के खजुरिया जुल्फिकार में मुस्लिमों ने नई प्रथा शुरू की कोशिश की। इसको लेकर गाँव के हिंदू पक्ष के साथ उनकी तानातनी हो गई। शुक्रवार (30 अगस्त 2024) को चादरों का जुलूस निकाला जा रहा है। उसी दौरान गाँव में रहने वाले हिंदू पक्ष ने इसका विरोध किया और कहा कि मुस्लिमों द्वारा यह एक नई परंपरा डालने की कोशिश की जा रही है।

इज्जतनगर थाने के इंस्पेक्टर क्राइम यशपाल सिंह ने बताया कि गाँव से चादरों का जुलूस नहीं निकलता था। इस बार कुछ लोगों ने इसे निकालने का प्रयास किया था। इसलिए विरोध हुआ। बाद में दोनों पक्षों में सहमति बनी कि गाँव के 300 मीटर दूर तक कोई भी जुलूस के तौर पर नहीं निकलेगा। इस दायरे के बाद सड़क पर मुस्लिम पक्ष जुलूस निकाले तो हिंदू पक्ष आपत्ति नहीं करेगा।

वो मुख्यमंत्री जिसने खालिस्तान के हाथों मरना चुना, झुकना नहीं: बेअंत सिंह हैं सिखों के रोल मॉडल, नए बने खालिस्तानी सांसद बस दिवा-स्वप्न

31 अगस्त, 1995 – ये वो तारीख़ है जब पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या कर दी गई थी। एक सिख नेता की हत्या करने वाले भी सिख आतंकवादी ही थे। कॉन्ग्रेस नेता बेअंत सिंह फरवरी 1992 में पंजाब के मुख़्यमंत्री बने थे। उनका मुख्यमंत्री बनना पंजाब के इतिहास में एक बड़ी घटना थी, क्योंकि 5 वर्षों के राष्ट्रपति शासन के पश्चात राज्य में विधानसभा चुनाव हो पाए थे। पंजाब में अराजकता का माहौल था, जरनैल सिंह भिंडराँवाले के मारे जाने के बावजूद अगले एक दशक से भी अधिक समय तक खालिस्तानी आतंकी राज्य को अशांत बनाए रहे थे।

शाकाहारी नेता बेअंत सिंह, धर्मनिष्ठ नामधारी सिख

सबसे पहले बेअंत सिंह के व्यक्तिगत व राजनीतिक जीवन के बारे में संक्षेप में बता देते हैं। उनका जन्म लुधियाना जिले के दोहरा प्रखंड स्थित बिलासपुर गाँव में हुआ था। लाहौर स्थित गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। 23 वर्ष की उम्र में वो भारतीय सेना में शामिल हुए, लेकिन 2 वर्षों बाद ही राजनीति का रुख किया। 1960 में उन्होंने प्रखंड समिति का सदस्य चुना गया। वो लुधियाना स्थित ‘सेन्ट्रल कोऑपरेटिव’ बैंक के डायरेक्टर रहे, फिर 1969 में निर्दलीय जीत कर पंजाब विधानसभा पहुँचे।

बेअंत सिंह सिखों के नामधारी पंथ के अनुयायी थे और सफ़ेद रंग की पगड़ी पहनते थे। इस कारण वो मांस या शराब का सेवन नहीं करते थे, शाकाहारी थे। उन्होंने सतगुरु प्रताप सिंह से आशीर्वाद लिया था और सुरिंदर सिंह नामधारी के साथ मिल कर उन्होंने इस संप्रदाय की भलाई के लिए कार्य किया। 1993 में एक कारोबारी जब लालरु में मांस की फैक्ट्री लगाना चाहता था तो CM रहते बेअंत सिंह ने नामधारियों की माँग के कारण उसे इसकी अनुमति नहीं प्रदान की थी।

अमृतसर, लुधियाना और मालेरकोटला में उन्होंने नामधारी सिख संप्रदाय को 500 एकड़ जमीन दान दी थी। बेअंत सिंह की मौत दुःखद रूप में हुई थी। खालिस्तानियों ने उनकी हत्या कर दी थी। एक कार बम धमाके में तत्कालीन मुख्यमंत्री समेत 17 लोग मारे गए थे जिनमें 3 कमांडो जवान भी शामिल थे। ‘बब्बर खालसा इंटरनेशनल’ और ‘खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स’ का इस हत्याकांड में नाम आया। बेअंत सिंह हत्याकांड को समझने के लिए हमें उस वक्त की राजनीतिक परिस्थितियाँ देखनी पड़ेंगी।

पंजाब का CM रहते बेअंत सिंह की हत्या

जब बेअंत सिंह की हत्या हुई, उस समय वो कुछ कागज़ात पर हस्ताक्षर करने जा रहे थे। जैसे ही वो अपनी सफ़ेद रंग की एम्बेस्डर कार में बैठे, पंजाब के एक पुलिसकर्मी दिलावर सिंह बब्बर ने अपने शरीर पर लपेटे हुए बम को विस्फोट कर दिया। इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद 1984 में सिखों का नरसंहार हुआ था। सरकारी आँकड़े कहते हैं कि इसमें 3340 सिख मारे गए। इसमें कमलनाथ, जगदीश टाइटलर और सज्जन सिंह जैसे कॉन्ग्रेस नेताओं का नाम आया जो राजीव गाँधी के करीबी रहे।

इंदिरा गाँधी की हत्या ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ का बदला लेने के लिए की गई थी। कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम द्वारा ही पैदा किया गया आतंकी जरनैल सिंह भिंडराँवाले अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में छिप कर बैठा हुआ था, जिसे मारने के लिए भारतीय सेना को अंदर घुसना पड़ा। इंदिरा गाँधी के इस आदेश के कारण सिख उनके खिलाफ हो गए थे। सतवंत सिंह और बेअंत सिंह नामक उनके बॉडीगार्ड्स ने ही उन पर ताबड़तोड़ गोलियाँ बरसा दीं। इसके बाद सिख नरसंहार हुआ तो राजीव गाँधी ने कहा कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।

पंजाब में उग्रवाद तब भी अपने चरम पर रहा। वहाँ जून 1987 में राष्ट्रपति शासन की घोषणा करनी पड़ी जो फरवरी 1992 तक रहा। 1990 के दशक में सिख आतंकवादियों ने पुलिसकर्मियों और नेताओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया। 1992 में चुनाव तो हुए लेकिन भय का ऐसा वातावरण था कि मतदान प्रतिशत सिर्फ 24% रहा। KPS गिल पुलिस महानिदेशक थे और उन्हें राज्य में अपने हिसाब से काम करने की छूट मिली। कई आतंकी इसके बाद कनाडा और UK जैसे देशों में भाग खड़े हुए।

इसके बाद इंग्लैंड में वधावा सिंह के नेतृत्व में ‘बब्बर खालसा इंटरनेशनल’ ने उनकी हत्या की साजिश रची। BKI ने युवाओं के समूह को सीएम की हत्या के लिए उकसाया। पंजाब सेक्रेटेरिएट के बाहर हुए इस बम धमाके में जगतार सिंह हवारा और बलवंत सिंह राजोआना को सज़ा-ए-मौत सुनाई गई। गुरमीत सिंह, लखविंदर सिंह और शमशेर सिंह को उम्रकैद मिली, वहीं नवजोत सिंह और नसीब सिंह को रिहा कर दिया गया। क्या आपको पता है कि बेअंत सिंह के हत्यारों को आज भी सिख कट्टरवादियों द्वारा नायक बताया जाता है?

सिखों ने चंडीगढ़ में ‘कौमी इंसाफ मोर्चा’ के बैनर तले 1 वर्ष से भी अधिक समय तक इनकी रिहाई के लिए विरोध प्रदर्शन किया। राजोआना भी पुलिस कॉन्स्टेबल था और उसे बैकअप के रूप में रखा गया था। अगर दिलावर सिंह बब्बर विफल होता तो वो खुद को उड़ा लेता। राजीव गाँधी के हत्यारों की रिहाई के बाद ‘शिरोमणि अकाली दल’ (SAD) ने उसकी रिहाई के लिए भी अभियान चलाया। वो लगभग 27 वर्षों से जेल में है, 2007 में CBI कोर्ट ने उसे मौत की सज़ा सुनाई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया।

हत्यारों का महिमामंडन: SGPC और SAD ने रिहाई के लिए चलाया अभियान

इसके बाद इस मामले में पड़ता है ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी’ (SGPC), अमृतसर स्थित दरबार साहिब से लेकर पंजाब के सभी गुरुद्वारों के मामले में अंतिम निर्णय इसका ही होता है। तब पंजाब के मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल ने मार्च 2012 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मुलाकात की थी, साथ में उनके बेटे और तत्कालीन डिप्टी CM सुखबीर सिंह बादल भी थे। 31 मार्च, 2012 में बलवंत सिंह राजोआना को फाँसी दी जानी थी, लेकिन गृह मंत्रालय ने उसकी सज़ा रोक दी।

उस समय UPA-II की सरकार थी, मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और P चिदंबरम गृह मंत्री हुआ करते थे। दिसंबर 2019 में वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह ने साफ़ किया कि बलवंत सिंह राजोआना की मौत की सज़ा कम नहीं की गई है। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर स्थित सेन्ट्रल सिख म्यूजियम में SGPC द्वारा बेअंत सिंह के हत्यारे दिलावर सिंह बब्बर की तस्वीर भी स्थापित की गई। जून 2022 में SGPC के अध्यक्ष अधिवक्ता हरजिंदर सिंह ने इस तस्वीर को इंस्टॉल करते हुए उसे ‘शहीद’ बताया था।

उन्होंने कहा था कि दिलावर सिंह बब्बर ने खुद को ‘बलिदान’ कर के सिखों के खिलाफ हो रहे अत्याचार और मानवाधिकार के घोर उल्लंघनों पर लगाम लगाई। SGPC ने ये भी कहा था कि गुरु के आशीर्वाद के बिना ‘बलिदान’ संभव नहीं है। याद दिलाते चलें कि बेअंत सिंह हत्याकांड के 3 आरोपित जून 2004 में चंडीगढ़ स्थित जेल से भाग निकले थे, बाकी भागते हुए पकड़े गए थे। एक आरोपित इंटरपोल की मदद से जनवरी 2014 में थाईलैंड से भी पकड़ा गया था।

आज जब अमृतपाल सिंह जैसे खालिस्तानी समर्थक सांसद बन रहे हैं, बेअंत सिंह जैसे नेताओं का अभाव है जो कट्टरपंथियों के सामने झुके बिना इससे उपजे आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई कर सकें। बेअंत सिंह की गलती इतनी थी कि वो एक धर्मनिष्ठ नामधारी सिख थे, देश को खंडित करने की सोच रखने वाले कट्टरपंथी नहीं। आज अमृतपाल सिंह जैसे नेता देश के टुकड़े करने की माँग करते हैं और जेल से ही लोकसभा का चुनाव लड़ कर सांसद बन जाते हैं।