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RSS का रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं और कैसे चलती है उसकी फंडिंग? विवाद के बीच समझिए पूरी व्यवस्था

ये वो सुझाव थे जो RSS के शुरुआती दिनों में संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को संघ के काम के लिए पैसा जुटाने के लिए दिए जा रहे थे। उस समय तक हेडगेवार अक्सर अपनी जेब से पैसा खर्च करते या अपने मित्रों से सहयोग जुटा लेते। लेकिन जल्द ही उन्हें संघ की स्थायी व्यवस्था की जरूरत महसूस हुई और एक बैठक बुलाई गई। उसी बैठक में ये सुझाव दिए जा रहे थे।

तब एक विचार आया कि यदि संघ स्वयंसेवकों का संगठन है, तो उसकी जरूरतों की पूर्ति भी स्वयंसेवक खुद ही करें। पर सवाल था कि योगदान किसे दिया जाए और कितना दिया जाए? काफी विचार के बाद निर्णय हुआ कि हर स्वयंसेवक अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार योगदान देगा और वह योगदान किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि संघ के आदर्श प्रतीक ‘भगवा ध्वज’ को समर्पित किया जाएगा।

केआर मलकानी अपनी किताब ‘The RSS Story’ में लिखते हैं कि इसी सोच से संघ में ‘गुरु दक्षिणा’ की परंपरा की शुरुआत हुई। 1928 में पहला गुरु दक्षिणा कार्यक्रम आयोजित हुआ। उस दिन कुल 84 रुपए इकट्ठा हुए। राशि भले ही छोटी थी लेकिन इसी ने उस परंपरा की नींव रखी जो आज भी संघ की आर्थिक व्यवस्था का आधार है।

केआर मलकानी की किताब

आज के संदर्भ में RSS की गुरु दक्षिणा की चर्चा इसलिए क्योंकि बीते कुछ दिनों से संघ के पंजीकरण और इसकी फंडिंग को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। इस हालिया विवाद की शुरुआत कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे और कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खरगे के एक पत्र के बाद हुई।

प्रियांक खरगे ने RSS के रजिस्ट्रेशन और फंडिंग पर पूछे सवाल

प्रियांक ने 13 जून 2026 को संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के नाम एक पत्र लिखा। यह पत्र 15 जून 2026 को अपने X हैंडल पर भी शेयर किया। उन्होंने ‘X’ पर लिखा, “सबसे पहले RSS को 100 साल पूरे होने पर बधाई। एक ऐसा संगठन जो 60,000 से ज्यादा शाखाओं और करोड़ों स्वयंसेवकों का दावा करता है, उसे पारदर्शिता और संवैधानिक जवाबदेही का भी पालन करना चाहिए।”

प्रियांक ने लिखा, “RSS को अपनी कानूनी स्थिति, रजिस्ट्रेशन, पदाधिकारियों, फंडिंग, खर्च, टैक्स और सार्वजनिक गतिविधियों के लिए जरूरी मंजूरियों के बारे में साफ-साफ बताना चाहिए। अगर नागरिकों, मजदूरों, NGO, ट्रस्ट, मंदिरों और कंपनियों से रजिस्ट्रेशन कराने, जानकारी देने और कानून का पालन करने की उम्मीद की जाती है, तो RSS को इससे छूट क्यों मिलनी चाहिए?”

पत्र में प्रियांक ने मोहन भागवत से 8 सवाल पूछे हैं। पत्र में RSS की कानूनी स्थिति और संगठनात्मक ढाँचे, उसके पदाधिकारियों और अधिकृत प्रतिनिधियों के विवरण, दान, चंदे और अन्य आय के स्रोतों, खर्च और संपत्तियों के ब्योरे के अलावा यह जानकारी माँगी गई है कि वह कानून के अनुसार लागू करों का भुगतान करता है या नहीं।

क्यों नहीं पंजीकृत है RSS?

यह पहली बार नहीं है जब संघ के पंजीकरण को लेकर सवाल पूछा गया हो, RSS के बारे में अक्सर एक प्रश्न पूछा जाता है कि देश के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में शामिल होने के बावजूद इसका पंजीकरण क्यों नहीं है। इस सवाल का जवाब आज में नहीं बल्कि लगभग 100 वर्ष पुराने इतिहास में छिपा है। संघ की शुरुआत किसी कंपनी, ट्रस्ट, सोसायटी या औपचारिक संस्था की तरह नहीं हुई थी। वह मूल रूप से एक सामाजिक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था, जिसका उद्देश्य समाज का संगठन और चरित्र निर्माण था।

27 सितंबर 1925 को नागपुर के महल क्षेत्र के ‘सुक्रवारी’ स्थित अपने घर में दशहरे के दिन हेडगेवार ने कुछ युवाओं और वरिष्ठ साथियों की बैठक बुलाई। इसी बैठक में उन्होंने घोषणा की ‘हम आज संघ का उद्घाटन कर रहे हैं’। इसके साथ ही उस संगठन की शुरुआत हुई जिसे आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम से जाना गया।

नागपुर में हेडगेवार की याद में बना भव्य स्मृति मंदिर

दिलचस्प बात यह है कि उस समय न तो कोई संविधान था, न सदस्यता फॉर्म, न पंजीकरण और न ही संगठन का कोई तय नाम। डॉ. हेडगेवार ने उस दिन उपस्थित लोगों से कहा था कि सभी को शारीरिक, बौद्धिक और हर प्रकार से स्वयं को प्रशिक्षित करना होगा ताकि वे अपने लक्ष्य प्राप्त करने में सक्षम बन सकें। शुरुआती दिनों में रविवार को ड्रिल, मार्च और अन्य शारीरिक गतिविधियाँ होती थीं जबकि गुरुवार और रविवार को राष्ट्रीय विषयों पर बौद्धिक चर्चा आयोजित की जाती थी।

संघ की शुरुआत इतनी स्वाभाविक और ऑर्गेनिक थी कि कई महीनों तक उसका कोई नाम तक नहीं था। संगठन पहले अस्तित्व में आया, नाम बाद में रखा गया। लगभग सात महीने बाद 17 अप्रैल 1926 को डॉ. हेडगेवार के घर पर एक बैठक हुई, जिसमें संगठन के नाम पर चर्चा की गई। उस बैठक में चार नाम प्रस्तावित किए गए थे- जरीपटका मंडल, भारत उद्धारक मंडल, हिंदू स्वयंसेवक संघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। अंततः ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम को स्वीकार किया गया।

यही तथ्य संघ की प्रकृति को समझने की कुंजी है। RSS की परिकल्पना एक पारंपरिक संस्था के रूप में नहीं की गई थी। वह लोगों के चरित्र निर्माण, अनुशासन, संगठन और समाज सेवा के लिए चलाया जाने वाला एक स्वयंसेवी आंदोलन था। सदस्यता फॉर्म भरकर कोई औपचारिक सदस्य नहीं बनता था, न ही नियमित शुल्क देकर सदस्यता ली जाती थी। स्वयंसेवक शाखा में आते थे, प्रशिक्षण लेते थे और सामाजिक कार्यों में भागीदारी करते थे। इसीलिए संघ की संरचना आरंभ से ही एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की रही, न कि किसी पंजीकृत संस्था की।

सीधे-सीधे कहें तो RSS का जन्म किसी कानूनी इकाई (Legal Entity) के रूप में नहीं हुआ था बल्कि समाज के भीतर एक विचार और संगठनात्मक प्रक्रिया के रूप में हुआ था। बाद के दशकों में संघ ने विभिन्न क्षेत्रों में काम करने के लिए अनेक स्वतंत्र संस्थाएँ, ट्रस्ट और संगठन विकसित किए जिनमें से कई अलग-अलग कानूनों के तहत पंजीकृत हैं। लेकिन मूल RSS स्वयं को एक स्वयंसेवी सामाजिक आंदोलन के रूप में देखता रहा।

हेडगेवार, अनुशीलन समिति और कॉन्ग्रेस से जुड़े रहे थे और अंग्रेजों की नजर उन पर रहती थी। ऐसे में आजादी से पहले से ही हेडगेवार ने संघ को 1860 के सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत कराने से परहेज किया। ये अंग्रेजों की नजरों से बचकर एक सामाजिक संगठन खड़ा करने की एक सोची-समझी रणनीति थी। इससे संघ को स्थानीय शाखाओं, स्कूलों और स्वयंसेवकों के नेटवर्क के माध्यम से स्वाभाविक रूप से फैलने का अवसर मिला।

जिस कर्नाटक से आज यह विवाद फिर उठा है, उसी की राजधानी बेंगलुरु में 8-9 नवंबर 2025 को आयोजित RSS के एक कार्यक्र में मोहन भागवत ने पंजीकरण से जुड़े सवाल का जवाब दिया था।

भागवत ने कहा था, “आप जानते हैं कि RSS की स्थापना 1925 में हुई थी। तो क्या आप उम्मीद करते हैं कि उस समय हम उस ब्रिटिश सरकार के पास जाकर अपना पंजीकरण कराते, जिसके खिलाफ RSS संघर्ष कर रहा था? फिर स्वतंत्रता के बाद भी भारत के कानूनों ने पंजीकरण को अनिवार्य नहीं बनाया। हमारे देश के कानून अपंजीकृत व्यक्तियों के समूह (Body of Individuals) को भी कानूनी मान्यता देते हैं। इसी श्रेणी में हमें रखा गया है और हम एक मान्यता प्राप्त संगठन हैं।”

उन्होंने कहा, “आयकर विभाग ने एक समय हमसे आयकर देने को कहा था जिस पर कानूनी विवाद हुआ। उस मामले में अदालत ने माना कि RSS ‘बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स’ है। इसके बाद हमारे ‘गुरु दक्षिणा’ जैसे कार्यक्रम को आयकर से छूट मिलने का आधार भी स्पष्ट हुआ।”

भागवत ने कहा, “हम पर तीन बार प्रतिबंध लगाया गया। यदि हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं होता तो सरकार किस पर प्रतिबंध लगाती? हर बार अदालतों और सरकारों ने मामले की समीक्षा की। प्रतिबंध हटाए गए और RSS को एक वैध संगठन के रूप में स्वीकार किया गया।”

जब आयकर विभाग और RSS का विवाद अदालत पहुँचा

RSS से जुड़े इस मामले में विवाद यह था कि संघ को उसके स्वयंसेवकों और अन्य लोगों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा पर आयकर लगाया जा सकता है या नहीं। आयकर विभाग का कहना था कि यह राशि संघ की आय है और इस पर टैक्स लगना चाहिए। दूसरी ओर RSS का तर्क था कि स्वयंसेवकों द्वारा दी जाने वाली गुरु दक्षिणा संगठन के सदस्यों का स्वैच्छिक योगदान है और इसे सामान्य आय नहीं माना जा सकता।

मामला आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) से होते हुए पटना हाई कोर्ट तक पहुँचा। अदालत के सामने यह भी रखा गया कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने 19 दिसंबर 1978 के एक पत्र में स्पष्ट किया था कि RSS को उसके सदस्यों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा को ‘म्युचुअलिटी’ (पारस्परिकता) के सिद्धांत के आधार पर कर-मुक्त माना जाएगा।

पटना हाई कोर्ट ने फरवरी 1994 में RSS के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि संगठन के सदस्यों से प्राप्त गुरु दक्षिणा वास्तव में म्युचुअलिटी के सिद्धांत के अंतर्गत आती है और उस पर आयकर नहीं लगाया जा सकता। अदालत ने माना कि जब स्वयंसेवक ही संगठन को योगदान देते हैं और संगठन उन्हीं के लिए कार्य करता है, तो ऐसी राशि को सामान्य व्यापारिक या व्यावसायिक आय नहीं माना जा सकता।

हालाँकि अदालत ने अपने फैसले को केवल सदस्यों से प्राप्त गुरु दक्षिणा तक सीमित रखा और प्रश्न में से ‘भक्तों’ (devotees) शब्द हटाकर स्पष्ट किया कि उसका निर्णय केवल RSS के सदस्यों द्वारा दिए गए योगदान के संबंध में है। इस प्रकार अदालत ने आयकर विभाग की आपत्ति खारिज करते हुए RSS को राहत दी।

क्या होता है ‘बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स’?

‘बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स’ (BOI) क्या है, इसे समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि भारतीय कानून में हर संगठित समूह का कंपनी, ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में पंजीकृत होना जरूरी नहीं है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 2(31) में ‘Person’ (व्यक्ति) की परिभाषा के भीतर न केवल व्यक्ति, कंपनी और फर्म को बल्कि ‘Association of Persons (AOP)’ और ‘Body of Individuals (BOI)’ को भी शामिल किया गया है। इसका अर्थ है कि कानून कुछ परिस्थितियों में ऐसे समूहों को भी एक मान्यता प्राप्त इकाई के रूप में स्वीकार करता है, जो किसी साझा उद्देश्य से कार्य कर रहे हों, भले ही वे किसी अलग कानूनी संस्था के रूप में पंजीकृत न हों।’

BOI मूल रूप से ऐसे व्यक्तियों के समूह को कहा जाता है जो किसी साझा उद्देश्य, गतिविधि या कार्य के लिए संगठित रूप से कार्य कर रहे हों। यह जरूरी नहीं कि उनका उद्देश्य लाभ कमाना ही हो। धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या सामुदायिक गतिविधियों के लिए भी लोगों का समूह BOI की श्रेणी में आ सकता है। कोर्ट्स ने विभिन्न मामलों में कहा है कि BOI की पहचान उसके सदस्यों के साझा उद्देश्य और सामूहिक कार्य से होती है, न कि केवल उसके पंजीकरण से।

इस पूरी बहस को समझें तो एक बात साफ हो जाती है कि भारतीय कानून RSS को सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत होने के लिए बाध्य नहीं करता। संविधान संगठन बनाने का अधिकार देता है, आयकर कानून BOI जैसी श्रेणियों को मान्यता देता है और लगभग एक सदी से सरकारी तथा न्यायिक संस्थाओं ने RSS के अस्तित्व को स्वीकार किया है। इस तरह का वितंडा खड़ा करने की कोशिश केवल बेजा भ्रम पैदा करने के लिए ही है।

RSS और उसकी फंडिंग

जैसे हमने इस लेख की शुरुआत में ही बताया था कि संघ ने स्वयंसेवकों से ही दक्षिणा लेकर अपने आर्थिक लक्ष्यों की पूर्ति का लक्ष्य रखा था। संघ में वर्ष में एक बार गुरु पूर्णिमा के दिन स्वयंसेवक भगवा ध्वज को गुरु मानकर दक्षिणा देते हैं।

वाल्टर के एंडरसन और श्रीधर डी. दामले ने अपनी किताब ‘The Brotherhood in Saffron: The Rashtriya Swayamsevak Sangh and Hindu Revivalism’ में गुरु दक्षिणा को लेकर लिखा है।

उन्होंने लिखा, “गुरु दक्षिणा के अवसर पर स्वयंसेवक अपने ‘गुरु’ यानी भगवा ध्वज को दक्षिणा अर्पित करते हैं। संघ के अधिकांश फंड इसी दौरान एकत्र होते हैं। प्रत्येक स्वयंसेवक ध्वज के सामने जाकर प्रणाम करता है और ध्वज-दंड के आधार पर फूल अर्पित करता है। ध्वज के दोनों ओर हिंदू समाज के प्रेरणास्रोत महापुरुषों के चित्र लगाए जाते हैं।”

पुस्तक में लिखा है, “इसके बाद स्वयंसेवक अपनी दक्षिणा एक बंद और बिना नाम वाले लिफाफे में रखकर, फूलों के साथ एक थाली में अर्पित करता है और उसे भगवा ध्वज के समक्ष समर्पित करता है।”

वाल्टर के एंडरसन और श्रीधर डी. दामले की किताब

RSS के विचारक और राज्यसभा के सांसद रहे राकेश सिन्हा ने अपनी किताब ‘Builders of Modern India: Dr Keshav Baliram Hedgewar’ में संघ की वित्तीय आत्मनिर्भरता को महत्वपूर्ण बताया है।

उन्होंने लिखा, “गुरु दक्षिणा संघ में 1928 से चली आ रही है। संघ का मानना है कि किसी भी संगठन के स्वतंत्र और निष्पक्ष संचालन के लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसे बाहरी प्रभावों पर निर्भर न हो, जो उसके कार्यकर्ताओं या नेतृत्व की सोच और निर्णयों को प्रभावित कर सकें। इसी कारण संघ ने अपनी आर्थिक व्यवस्था को स्वयंसेवकों के सहयोग पर आधारित रखा है, ताकि उसकी कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की स्वतंत्रता बनी रहे।”

राकेश सिन्हा की किताब

संघ के विचारक रतन शारदा का मानना है कि गुरु दक्षिणा से संघ को नैतिक शक्ति मिलती है। अपनी किताब ‘RSS 360°- Demystifying Rashtriya Swayamsevak Sangh’ में रतन शारदा लिखते हैं, “यह शायद ऐसा संगठन है जहाँ सदस्य किसी गतिविधि में भाग लेने, प्रशिक्षण शिविरों, शीतकालीन शिविरों या सामाजिक कार्यों में शामिल होने का खर्च स्वयं अपनी जेब से उठाते हैं। किसी भी कार्यक्रम या गतिविधि के लिए स्वयंसेवक अपना खर्च खुद वहन करते हैं।”

वह लिखते हैं, “यदि कोई स्वयंसेवक किसी शिविर की फीस देने में सक्षम नहीं होता, तो दूसरा स्वयंसेवक उसकी सहायता कर देता है। कई बार यह सहायता इतनी सहजता से की जाती है कि समूह के अन्य लोगों को इसकी जानकारी भी नहीं होती।”

रतन शारदा ने लिखा, “गुरु दक्षिणा के बाद इस बात पर कोई चर्चा नहीं होती कि किसने कितना धन दिया। संगठन में अमीर और गरीब स्वयंसेवक के बीच इस आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। न ही संगठन के पद किसी व्यक्ति की आर्थिक क्षमता या उसके द्वारा दी गई गुरु दक्षिणा के आधार पर दिए जाते हैं। इस प्रकार प्राप्त धनराशि स्थानीय शाखा के पास जमा की जाती है और उसका उपयोग विभिन्न गतिविधियों में किया जाता है। यह राशि अन्य सामाजिक कार्यों में भी लगाई जाती है। इसी धन से उस क्षेत्र में कार्य करने वाले प्रचारकों के खर्चों की व्यवस्था भी की जाती है।”

उन्होंने लिखा है, “इस प्रकार संघ स्वयं को पूरी तरह स्व-वित्तपोषित (Self-financed) संगठन मानता है। संघ का कहना है कि बाहरी आर्थिक सहायता या किसी प्रकार के उपकार पर निर्भर न रहने के कारण उसे स्वतंत्र रूप से कार्य करने की नैतिक शक्ति मिलती है और वह किसी दबाव या प्रताड़ना के सामने झुकने के लिए बाध्य नहीं होता।”

रतन शारदा की किताब

संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने फरवरी 2026 में मुंबई में आयोजित व्याख्यानमाला के दौरान RSS की फंडिंग को लेकर भी बात की थी। उन्होंने कहा था, “संघ चलाने के लिए स्वयंसेवक गुरु दक्षिणा करते हैं। सेवा चलाने के लिए समाज से सहयोग लेते हैं। लोगों को विश्वास नहीं होता कि इतने बड़े-बड़े कार्यक्रम संघ करता है। लेकिन हमको व्यय बहुत कम आता है क्योंकि जितना बचा सकते हैं उतना बचाने का हमारा रवैया रहता है।”

उन्होंने आगे कहा, “तो जैसे हम प्रवास करते हैं तो प्रवास में भोजन खरीदते नहीं है। घरों से मँगाते हैं। रुकेंगे, तो हम होटलों में नहीं रुकेंगे। कार्यालय है तो वहाँ रुकेंगे नहीं तो घरों में रुकेंगे। तो जो नॉर्मल बजट है सोसाइटी का उससे हमारा बजट बहुत कम रहता है।”

संघ के पदाधिकारी लगातार इस बात को कहते रहे हैं कि फंडिंग को लेकर या रजिस्ट्रेशन को लेकर किसी से कुछ छिपा नहीं है। संघ से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि प्रियांक खरगे इस विवाद के जरिए केवल संघ के शताब्दी वर्ष के आयोजनों को डिरेल करने की कोशिश कर रहे हैं। संघ अपनी शुरुआत के बाद से ही खुले में रहकर काम कर रहा है, लाखों सेवा कार्य किया जा चुके हैं और चल रहे हैं।

संघ के समर्थक और आलोचक, दोनों अपनी-अपनी दृष्टि से RSS को देखते हैं। इस पूरे विवाद के बीच कुछ तथ्य ऐसे हैं जिन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल है। RSS एक सदी से खुले तौर पर काम कर रहा है। उस पर 3 बार प्रतिबंध लगाए गए, उसकी गतिविधियों की जाँच हुई, उसके खिलाफ कानूनी चुनौतियाँ आईं लेकिन हर बार वह न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं से होकर सामने आया। संघ की शाखाएँ, कार्यक्रम, पथ संचलन और सेवा गतिविधियाँ किसी गुप्त तरीके से नहीं बल्कि सार्वजनिक रूप से आयोजित होती हैं।

संघ के पंजीकरण और फंडिंग को लेकर सवाल उठाना गलत नहीं है। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि उन सवालों का जवाब तथ्यों, कानून और इतिहास के आधार पर खोजा जाए। भारतीय कानून हर सामाजिक संगठन को सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत होने के लिए बाध्य नहीं करता। इसी तरह अदालतें भी RSS के अस्तित्व, उसकी संरचना और उसकी गुरु दक्षिणा व्यवस्था पर पहले ही बात कर चुकी हैं।

ऐसे में बार-बार संघ पर सवाल उठाना और उसे रोकने की कोशिश करना बेकार का तर्क लगता है। अगर कोई कानूनी समस्या है तो उसके लिए कानूनी उपाय हैं वो कॉन्ग्रेस या अन्य विरोधी अपनाएँ लेकिन इस तरह के बेजा विवाद संघ की छवि पर प्रश्न खड़े करने से ज्यादा इन विवादों को जन्म देने वालों पर ही सवाल उठाते हैं।

‘फाइलों का पुलिंदा लेकर बैठा हूँ, कांप क्यों रहे हो?’: ओम प्रकाश राजभर का अखिलेश यादव पर सीधा प्रहार, खनन और रिवर फ्रंट घोटाले पर घेरा

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख और उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी (सपा) और अखिलेश यादव के राम मंदिर को लेकर दिए गए बयानों पर निशाना साधा है। बीते कई दिनों से अखिलेश यादव राम मंदिर में चढ़ावे की रकम को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार पर हमला बोल रहे हैं।

उनके बयानों पर सच्चाई सामने लाने के लिए कैबिनेट मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर अखिलेश को उनके कार्यकाल में किए गए खनन घोटाले और गोमती रिवरफ्रंट घोटाले को लेकर धागे खोल दिए।

सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव को सीधे टैग करते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा की है, जिसमें उन्होंने सपा के शीर्ष नेतृत्व पर गंभीर घोटालों के पैसों को खपाने का आरोप लगाया है। राजभर ने लिखा, “खनन और गोमती रिवर फ्रंट का पैसा कहां खपा रहे हैं ये बात डिंपल, राम गोपाल यादव और अखिलेश यादव के अलावा ओम प्रकाश राजभर को भी पता है।”

राजभर यहीं नहीं रुके, उन्होंने अखिलेश यादव की राजनीतिक घबराहट पर तंज कसते हुए आगे लिखा, “एक खुलासे से आपकी ये हालत हो गई। फाइलों का पूरा पुलिंदा लेकर बैठा हूं। कांप क्यों रहे हो अखिलेश? आँख खोलते ही बलिया फोन मिला दिए न?”

असल में बलिया लोकसभा सीट समाजवादी पार्टी के मजबूत नेता सनातन पांडेय का गढ़ मानी जाती है। राजभर का यह तंज इस बात की ओर इशारा कर रहा था कि उनके खुलासे या दावों के बाद अखिलेश यादव को यह डर सताने लगा है कि सुभासपा उनके नेताओं को तोड़ रही है, या बलिया के सपा नेता राजभर/भाजपा के संपर्क में हैं।

‘लंका में राजनीतिक शॉर्ट सर्किट’ का दावा कर चुके हैं राजभर

राजभर का यह तीखा हमला उनके उस पिछले बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने दावा किया था कि सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर एक गोपनीय पत्र सौंपा है।

राजभर के मुताबिक, उस पत्र में सपा के कई बड़े नेताओं के नाम शामिल हैं जो जल्द ही भाजपा में शामिल हो सकते हैं। राजभर ने आगाह किया कि सपा बहुत जल्द महाराष्ट्र की शिवसेना-NCP और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की तर्ज पर एक बड़ी टूट का गवाह बनने वाली है और अखिलेश यादव की ‘लंका में राजनीतिक शॉर्ट सर्किट’ होने वाला है।

जब समाजवादी पार्टी ने राजभर के बयानों को मनगढ़ंत बताया गया तो राजभर ने सीधे पुराने कार्यकाल के विवादित मुद्दों को हवा दे दी। उन्होंने सपा सरकार के दौरान हुए कथित खनन घोटाले और गोमती रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट को सामने लाकर अखिलेश यादव, डिंपल यादव और रामगोपाल यादव को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

राजभर का इशारा साफ है कि यदि उन्होंने इन फाइलों को सार्वजनिक किया, तो सपा के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी।

सपा की सफाई- मुद्दों से ध्यान भटकाने की हो रही साजिश

राजभर के इस सीधे और आक्रामक हमले पर समाजवादी पार्टी तोड़ निकालने का हरसंभव प्रयास कर रही है। सपा प्रवक्ताओं का कहना है कि ओम प्रकाश राजभर केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए इस तरह की अनर्गल और आधारहीन बयानबाजी कर रहे हैं।

सपा का आरोप है कि राजभर बेरोजगारी, कानून व्यवस्था और पेपर लीक जैसे जनता से जुड़े असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए भाजपा के इशारे पर ‘माउथपीस’ की तरह काम कर रहे हैं। अखिलेश यादव ने भी पहले राजभर के दावों को खारिज करते हुए इसे केवल ‘टीआरपी और मनोरंजन’ की राजनीति करार दिया था।

उत्तर प्रदेश में आगामी राजनीतिक समीकरणों और उप-चुनावों की आहट के बीच राजभर का यह आक्रामक रूप बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब देखना यह होगा कि अखिलेश यादव इस सीधे हमले का जवाब किस तरह देते हैं।

‘अब तेरी बारी… कन्हैयालाल जैसा हाल करेंगे’: उज्जैन के महामंडलेश्वर सुमनानंद गिरी के पीछे पड़ी इस्लामी जमात, जानिए कैसे कट्टरपंथियों ने पाकिस्तान के नारे को बना ली है अपनी पहचान

उज्जैन के मौन तीर्थ पीठ के पीठाधीश्वर और निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि महाराज को इस्लामी कट्टरपंथियों ने जान से मारने की धमकी दी है। डॉ. सुमनानंद महाराज को भेजे गए धमकी भरे पत्र में उदयपुर के चर्चित कन्हैया लाल हत्याकांड और हाल ही में दिल्ली में बकरीद पर ‘सूर्या की कुर्बानी’ जैसा अंजाम भुगतने की चेतावनी दी गई है। इन्हें भी ‘सर तन से जुदा’ कर मारा गया था। धमकी मिलने के बाद उज्जैन नगरी के संत समाज में नाराजगी है, वहीं पुलिस और सुरक्षा एजेंसियाँ मामले की जाँच में जुट गई हैं।

धमकी भरे पत्र में क्या लिखा?

महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि को यह धमकी भरा पत्र मंगलवार (16 जून 2026) को डाक के माध्यम से मिला। पत्र प्रयागराज से भेजा गया बताया जा रहा है। पत्र में बेहद आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए लिखा गया है, “तू अपनी आदत से बाज नहीं आ रहा, तूने नबी की शान में गुस्ताखी की है।”

धमकी भरा पत्र (फोटो साभार: NDTV)

पत्र में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा ‘सर तन से जुदा’ की चर्चित घटनाओं का हवाला देते हुए लिखा, “कन्हैया लाल दर्जी के कत्ल का वीडियो देखा। दिल्ली के बकरीद पर काफिर पिल्ले की कुर्बानी का वीडियो देख। अब तेरी बारी है। जहन्नुम में जाएगा तू।”

धमकी देने वाले ने पत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का भी जिक्र किया है। पत्र में लिखा गया है, “मोदी और मोहन, कोई बचा नहीं पाएगा। इंशाल्लाह। बच सको तो बचो।”

धमकी मिलने के बाद महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद ने पुलिस प्रशासन को सूचना दी है। मामले की शिकायत दर्ज कर जाँच शुरू कर दी गई है। पुलिस पत्र भेजने वाले की पहचान करने और उसके नेटवर्क का पता लगाने का प्रयास कर रही है।

कई बार महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि को मिली धमकियाँ, हुए हमले

यह पहला मौका नहीं है जब डॉ. सुमनानंद गिरि को निशाना बनाया गया हो। डॉ. सुमनानंद का कहना है कि यह हरकत पहली बार नहीं हुई है, इससे पहले भी चार बार धमकी भरे पत्र भेजे जा चुके है और यह पाँचवीं घटना है। उन्होंने बताया कि साल 2023 से उन्हें जान से मारने धमकियाँ मिल रही हैं। हिंसक मजहबी विचारधारा जैसे लव जिहाद, शरिया कानून और अन्य मुद्दों पर खुलकर बोलने के कारण वे कट्टरपंथी तत्वों के निशाने पर रहते हैं।

इससे पहले दिसंबर 2025 में एक उर्दू में लिखा धमकी भरा पत्र मिला था, जो उत्तर प्रदेश के प्रयागराज निवासी सगीर अहमद पिता रिजवान के पते से भेजा गया था। इस पत्र में लिखा था, “काफिर सुमन आनंद, तू बार-बार नबी की तौहीन करता है। नामुराद, तुम अच्छी तरह जानते हो कि गुस्ताख-ए-रसूल की एक सजा जिस्म से जिस्म को जुदा करना है। तुम बहुत मुनाफिक (पाखंडी) और बदतमीज आदमी हो। तुम्हारी जिंदगी हमारे रहम-ओ-करम पर है। खामोश सफर में तुम हमारी जमात को मुसलसल गुमराह कर रहे हो। हम तुम्हारे लिए कयामत का इंतजार नहीं करेंगे।” धमकी भरे पत्र में यह भी लिखा था कि राम मंदिर में एक दिन अजान गूँजेगी।

साल 2023 में भी ऐसी ही जान से मारने की धमकी डॉ. सुमनानंद गिरि महाराज को मिली थी। तब भी उर्दू में लिखे पत्र में महामंडलेश्वर का ‘सर तन से जुदा’ करने के बात कही गई थी। इसके अलावा फोन कॉल, सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से भी धमकियाँ मिल चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पूर्व में भी उन पर उज्जैन और वडोदरा में हमले हो चुके हैं, लेकिन अब तक स्थायी सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध नहीं कराई गई है।

कैसे महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि महाराज बने इस्लामी कट्टरपंथियों का निशाना?

दरअसल, महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि अकसर मुस्लिम धर्म परिवर्तन, लव जिहाद, मजहबी कट्टरपंथ विरोधी और हिंदू-मुस्लिम से जुड़े मुद्दों पर खुलकर विचार रखते हैं। उज्जैन में अपने आश्रम में महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि महाराज ने मुस्लिम लड़कियों को सनातन धर्म में घर वापसी कराई है। साथ ही, एक महीने पहले ही एक मुस्लिम लड़के को विधि-विधान से हिंदू धर्म में शामिल किया था।

2024 में मुस्लिम महिला फरहा ने अनिकेत चौबे से विवाह कर सनातन धर्म अपनाया था। इसके बाद फरहा की बेटी जारा ने भी घर वापसी कर ली थी। इसे भी विधि-विधान से महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि महाराज के आश्रम में ही संपन्न कराया था। पिछले महीने मुस्लिम युवक सलमान खान ने स्वेच्छा से सनातन धर्म में घर वापसी की और अपना हिंदू नाम ‘शांतनु’ रख लिया। शांतनु को भी महामंडलेश्र के आश्रम से ही दीक्षा प्राप्त हुई। वह कई सालों से सनातन धर्म में घर वापसी की दीक्षा दे रहे हैं।

उनके कई बयान भी सामने आए, जिनको लेकर विवाद छिड़ा। 2024 में महामंडलेश्वर सुमनानंद गिरि ने प्रयागराज के महाकुंभ में मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक लगाने की माँग की थी। उन्होंने कहा ता कि जब मुस्लिमों के हज में हिंदुओं को प्रवेश नहीं मिलता, तो कुंभ जैसे हिंदू धार्मिक आयोजनों में मुस्लिमों को भी नहीं आना चाहिए।

यही वजह है कि इस्लामी कट्टरपंथी उनसे चिढ़े रहते हैं और उन्हें आए दिन ‘सर तन से जुदा’ की धमकी देते रहते हैं।

भारत में आम बन चुकीं ‘सर तन से जुदा’ की धमकियाँ

डॉ. सुमनानंद गिरि को मिली ताजा धमकी कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश में ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे और धमकियाँ बार-बार सामने आई हैं। इसकी जड़ें पाकिस्तान में देखी जाती हैं, जहाँ 2011 में पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की उनके ही अंगरक्षक और आतंकी मुमताज कादरी ने हत्या कर दी थी। तासीर पर ईशनिंदा कानून की आलोचना करने का आरोप लगाया गया था। तब मुमताज कादरी को पाकिस्तान के एक मौलाना खादिम हुसैन रिजवी ने ‘शहीद’ और ‘गाजी’ की तरह पेश किया।

इसके बाद इस्लामी कट्टरपंथी समूहों द्वारा मजहबी अपमान आरोपों पर हिंसा और हत्या को उचित ठहराने के लिए ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा’ जैसे नारे बुलंद किए जाने लगे। धीरे-धीरे यह नारा पाकिस्तान से निकलकर दक्षिण एशिया के अन्य हिस्सों तक पहुँचा और भारत में भी कई मामलों में धमकियों, उकसावे और हिंसक घटनाओं के संदर्भ में सुनाई देने लगा।

भारत में पिछले कुछ वर्षों में ऐसी घटनाएँ लगातार सामने आई हैं। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को भी ‘सर तन से जुदा’ की धमकियाँ मिल चुकी हैं। जब उत्तर प्रदेश के बरेली के फैज रजा और सलमान ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर सर तन से जुदा की धमकी दी। इस मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया था।

इसके अलावा उज्जैन में एक कथावाचक को लव जिहाद पर बोलने के लिए सोशल मीडिया पर ‘सर तन से जुदा’ की धमकी दी गई। मामला पुलिस तक पहुँचा और साइबर माध्यम से धमकी देने वालों की तलाश शुरू की गई। मध्य प्रदेश के इंदौर में विश्व हिंदू परिषद के नेता संतोष शर्मा को भी इसी तरह की धमकी मिली।

मध्य प्रदेश के इंदौर में विश्व हिंदू परिषद के नेता संतोष शर्मा को भी इसी तरह की धमकी मिली। आरोप था कि सोशल मीडिया पर उन्हें निशाना बनाते हुए सिर कलम करने की चेतावनी दी गई। मामला सामने आने के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई।

राजस्थान के कोटा में भाजपा कार्यकर्ता को धमकी भरा पत्र मिला था। पत्र में ‘सर तन से जुदा’ की धमकी दी गई थी और गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई थी। अजमेर दरगाह से जुड़े एक मामले ने भी देशभर में सुर्खियाँ बटोरी थीं। दरगाह के सामने कुछ लोगों ने ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाने लगाए थे। यह मामला लंबे समय तक चर्चा में रहा और बाद में अदालत की कार्यवाही का विषय भी बना।

इन सभी घटनाओं के बीच सबसे भयावह और चर्चित मामला उदयपुर के कन्हैया लाल साहू की हत्या का रहा। 28 जून 2022 को राजस्थान के उदयपुर में दो इस्लामी कट्टरपंथी रफीक मोहम्मद और अब्दुल जफ्फार ने उन्हें उनकी दुकान में घुसकर धारदार हथियार से गला काटकर मार डाला था। हत्या के बाद आरोपितों ने हँसते हुए वीडियो जारी कर कहा था कि कन्हैयाय लाल को ‘गुस्ताख ए नबी की सजा में सर तन से जुदा’ की सजा मिली है।

यही कारण है कि जब डॉ. सुमनानंद गिरि जैसे संतों को कन्हैया लाल का उदाहरण देकर धमकी दी जाती है, तो उसे केवल एक सामान्य चेतावनी नहीं माना जाता। पिछले वर्षों की घटनाएँ बताती हैं कि मजहब के नाम पर हत्या करने से इस्लामी कट्टरपंथी बिल्कुल नहीं कतराते हैं। उनके लिए ऐसी धमकियों आम बन चुकी हैं, जो भारत को अगला पाकिस्तान समझ बैठे हैं।

कभी ईशनिंदा तो कभी बलात्कार, कभी धर्मांतरण तो कभी नरसंहार: पाकिस्तान में नहीं थम रहे हिंदू-सिखों पर अत्याचार, भारत में मुँह सिलकर बैठे हैं CAA का विरोध करने वाले वामपंथी

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के मर्दान शहर के एक गुरुद्वारे में घुस कर सिख दंपति जगन्नाथ और उनकी पत्नी अस्मा वंती की गोली मारकर हत्या कर दी गई। 17 जून 2026 को हुए इस हत्या ने एक बार फिर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के हालत को बयाँ करता है। लेकिन इस हत्याकांड पर वामपंथी लिबरल ग्रुप मौन है। देश में सीएए के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले इस प्रोपेगेंडाबाजों के मुँह में अब जुबान नहीं है। ये तो ईरान- अमेरिका डील को ‘ईरान की जीत’ बताते नहीं थक रहे हैं।

पेशावर के नजदीक गुरुद्वारे के सेवादार दंपति की हत्या

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में दो हमलावरों ने एक गुरुद्वारे में घुसकर वहाँ की देखभाल करने वाले सिख दंपति की गोली मारकर हत्या कर दी। पति-पत्नी दोनों गुरुद्वारे की सेवा और देखरेख से जुड़े हुए थे। हत्या के बाद से गुरुद्वारे में लगा सीसीटीवी का फुटेज गायब है। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, हमलावर अज्ञात थे।

पुलिस मामले की जाँच की बात कर रही है, लेकिन घटना ने एक बार फिर पाकिस्तान में सिखों और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।घटना की शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने निंदा करते हुए हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने और सजा देने की माँग की है। यह हमला पेशावर से लगभग 60 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित मर्दाना के बाबू मोहल्ला इलाके में हुआ।

मर्दाना के जिला पुलिस अधिकारी मसूद अहमद ने बताया कि पुलिस हमले के मकसद का पता लगाने और इसमें शामिल लोगों को खोजने के लिए काम कर रही है, लेकिन सीसीटीवी फुटेज गायब होने के बाद टारगेट किलिंग का अंदेशा जताया जा रहा है।

दरअसल हत्यारे किसी लूटपाट के लिए नहीं आए थे। ये लोग गुरुद्वारे में घुसकर दंपति पर ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई और फिर फरार हो गए। इसको लेकर स्थानीय अल्पसंख्यक समुदाय में डर का माहौल है। स्थानीय सिख समुदाय के लोगों का कहना है कि यह सिखों में डर का माहौल पैदा करने की एक और कोशिश है। इसलिए सुराग मिटाने की कोशिश की गई और डिजिटल सबूत मिटा दिए गए।

अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रहे हमले

यह कोई पहली घटना नहीं है, जिसमें सिख दंपति को मारा गया है। पेशावर और खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में सिख व्यापारियों और गुरुद्वारा सेवकों के टारगेट मर्डर का दौर काफी पुराना है। 2023 में पेशावर में एक सिख व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। ऐसी घटनाओं की वजह से यहाँ सिखों की संख्या काफी कम हो गई है।

दरअसल पाकिस्तान में हिंदू, सिख, ईसाई जैसे अल्पसंख्यकों के साथ हिंसा, भेदभाव, जबरन धर्मांतरण और झूठे ईशनिंदा मामलों में फँसाना आम बात है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक सुरक्षित ही नहीं हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल 1200 से लेकर 5,000 तक हिंदू धार्मिक उत्पीड़न की वजह से पाकिस्तान छोड़ देते हैं, जिनमें से ज्यादातर सिंध के होते हैं।

2023 की जनगणना के अनुसार, पाकिस्तान में हिंदू आबादी करीब 3.9 मिलियन यानी 39 लाख बच गई है, जो कुल आबादी का करीब 1.61 प्रतिशत है। इनमें से ज्यादातर सिंध के ग्रामीण इलाकों में रहती है।

जून 2025 में सिंध प्रांत में ही एक हिन्दू परिवार पर अत्याचार के मामले ने सुर्खियाँ बटोरी। परिवार में चार हिंदू भाई-बहनों जिया बाई (22 साल), दिया बाई (20 साल), दिशा बाई (16 साल) और उनके चचेरे भाई हरजीत कुमार (13 साल) का अपहरण कर लिया गया। इन मासूम बच्चों को जबरन इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया। काफी विरोध प्रदर्शन के बाद प्रशासन ने चारों बच्चों को बरामद कर लिया। हालाँकि उनका अपहरण करने वाले आरोपितों को कोर्ट ने बरी कर दिया।

यही नहीं, कोर्ट ने 2 बालिग लड़कियों को सेफ हाउस भिजवा दिया, तो 2 नाबालिग बच्चों की कस्टडी के लिए माँ-बाप से ही 10-10 मिलियन पाकिस्तानी रूपए यानी 1-1 करोड़ पाकिस्तानी रुपए का बॉन्ड भरवाया, ताकि दोनों बच्चों की घर वापसी न कराई जा सके और वो इस्लाम की प्रैक्टिस करते रहें यानी हिंदू माँ-बाप अपने ही जबरन मुस्लिम बनाए गए बच्चों को इस्लामी तरीके से पालते रहें और इसकी गारंटी भी दें कि वो हिंदू नहीं बनेंगे। एक दूसरे मामले में एक हिन्दू व्यक्ति की इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि उसने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया।

यहाँ अल्पसंख्यक महिलाओं की हालत तो और भी ज्यादा खराब है। जबरन धर्मांतरण कर निकाह का दबाव झेलने के साथ साथ हत्या के कई मामले सामने आए हैं। मानवाधिकारों की निगरानी करने वाली स्वतंत्र संस्था, पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (HRCP) के अनुसार, जनवरी और मई 2025 के बीच ‘सम्मान’ के नाम पर कम से कम 268 लोगों की हत्या कर दी गई, जिनमें 155 महिलाएँ थीं।

एक सवाल के जवाब में भारत सरकार ने भी संसद में बताया था कि पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र से हिंदू समुदाय के लोगों का पलायन हिंसा और भेदभाव के कारण जारी है। यहाँ अल्पसंख्यक समुदायों के विरुद्ध अत्याचार उत्पीड़न, धमकी, जबरन विवाह, जबरन धर्मांतरण, धार्मिक स्थलों पर तोड़फोड़ आदि के रूप में किए जाते हैं।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों के विरुद्ध हो रहे अत्याचारों की रिपोर्टों के आधार पर, भारत सरकार राजनयिक चैनलों के माध्यम से पाकिस्तान सरकार के समक्ष उठाती है। पाकिस्तान सरकार से आग्रह किया जाता है कि वह अल्पसंख्यक समुदायों सहित अपने नागरिकों के प्रति अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करे और सांप्रदायिक हिंसा और धार्मिक असहिष्णुता को खत्म करे। केंद्र सरकार ने बताया कि भारत ने 2021 से पाकिस्तान सरकार के सामने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के 334 बड़े मामलों को उठाया है।

इस्लाम कबूल करा जबरदस्ती किया जाता है निकाह

हिंदू और दूसरे अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्मांतरण और कम उम्र में निकाह के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी इस पर चिंता जताई है। पाकिस्तान के मानवाधिकार संगठनों ने 2025 में चेतावनी दी कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, जबरन धर्मांतरण और नाबालिग लड़कियों के जबरन निकाह के मामलों में वृद्धि देखी गई है। इसको लेकर एक बुजुर्ग हिन्दू का वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें उन्होंने कहा था कि हमारे हजारों बहू-बेटियों को कट्टरपंथियों ने जबरन बना दिया मुस्लिम।

पाकिस्तान में हर साल करीब 1000 अल्पसंख्यक लड़कियों का अपहरण किया जाता है और उनका जबरन धर्मांतरण कराया जाता है। मूवमेंट फॉर सॉलिडैरिटी एंड पीस ने इसकी जानकारी देते हुए कहा है कि इन लड़कियों की उम्र करीब 12 से 25 साल के बीच होती है। स्थिति ये है कि पुलिस ऐसा मामलों में कार्रवाई नहीं करती।

एक दूसरे मानवाधिकार संस्था जुबली कैंपेन और ओपन डोर्स ने दावा किया है कि अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण और धर्मांतरण के मामले दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। 2024 में 10 साल और उससे ऊपर की कई लड़कियाँ का अपहरण किया गया था। IANS की रिपोर्ट के मुताबिक कई लड़कियाँ ऐसी त्रासदी झेलने के बाद मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार हो गईं। कोर्ट अक्सर ऐसे मामले में आरोपित की ये दलीलें मान लेती है कि लड़की ने अपनी मर्जी से धर्मपरिवर्तन’ कर निकाह किया था।

सेंटर फॉर सोशल जस्टिस के अनुसार, अकेले 2024 में 47 हिंदू लड़कियों और महिलाओं का अपहरण किया गया और जबरदस्ती उनका धर्म परिवर्तन कराया गया। मानवाधिकार रिपोर्टों के अनुसार जबरन धर्मांतरण की शिकार महिलाओं और लड़कियों में लगभग 75 प्रतिशत हिंदू और 25 प्रतिशत ईसाई थीं। अधिकांश मामले सिंध प्रांत में दर्ज हुए।

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमान के मुताबिक, पाकिस्तान की 1.89 करोड़ महिलाओं और लड़कियों का निकाह 18 साल से पहले हुई थी, जिनमें से 46 लाख 15 साल से कम उम्र की थी। इनलोगों को प्रेगेंट होने के लिए मजबूर किया गया। धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं को जबरन निकाह करने और धर्मांतरण के मामले यहाँ सबसे ज्यादा हैं।

ईशनिंदा के नाम पर अत्याचार

पाकिस्तान के सेंटर फॉर सोशल जस्टिस (CSJ) के अनुसार 2024 में कम से कम 344 लोगों पर ईशनिंदा के आरोप लगाए गए। इनमें अहमदी, हिंदू और ईसाई समुदाय के लोग ज्यादा हैं। ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान (HRCP) की हालिया रिपोर्ट ‘Streets of Fear: Freedom of Religion or Belief in 2024/25’ के मुताबिक, पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता का स्तर अब तक के सबसे निचले पायदान पर है।

वर्ष 2024 और 2025 के दौरान 450 से अधिक लोगों को झूठे ईशनिंदा के मामलों में फँसाया गया। इस दौरान भीड़ ने उन्हें मार डाला। कई मामलों में जेलों में बंद किए जाने पर पुलिस की मिलीभगत से कई आरोपितों की हत्या कर दी गईं।

जुलाई 2016 में सिंध के घोटकी में एक हिंदू व्यक्ति पर ईशनिंदा का आरोप लगने से तनाव बढ़ गया और अगले ही दिन दो हिंदुओं को गोली मार दी गई।

दुनिया भर में आलोचना, लेकिन फर्क नहीं पड़ता

संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ, अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF), अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और पाकिस्तान का अपना मानवाधिकार आयोग बार-बार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, जबरन धर्मांतरण, ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग और सांप्रदायिक हिंसा को लेकर चिंता जताते हैं।

हर बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की आलोचना होती है, रिपोर्टें जारी होती हैं, जाँच की माँग उठती है और सरकार निष्पक्ष जाँच का भरोसा देती है, लेकिन यहाँ न तो सरकार, न ही पुलिस और यहाँ तक कि कोर्ट पर भी भरोसा करना मुश्किल है। पुलिस मुस्लिम भीड़ के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेती।

कट्टरपंथियों के धर्मांतरण कराने और अल्पसंख्यकों की बेटियों को उठा ले जाने का अंदरखाने समर्थन करती है। यही वजह है कि अल्पसंख्यकों की हत्या, हिंदू लड़कियों के अपहरण, ईसाइयों पर हमले के साथ-साथ शिया और अहमदियों के खिलाफ कार्रवाई जैसी घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं।

वामपंथी-लिबरल ग्रुप का दोगलापन

मर्दान के गुरुद्वारे में सिख दंपति की हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं है। यह उस व्यापक संकट की याद दिलाती है जिसमें पाकिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यक वर्षों से जी रहे हैं। कभी किसी हिंदू लड़की के अपहरण और धर्मांतरण की खबर आती है, कभी किसी सिख की हत्या।

इन घटनाओं को लेकर भारत में भी चयनात्मक रवैया अपनाया जाता है। फिलिस्तीन और गाजा हमला हो या ईरान युद्ध- इन पर मुखर रहने वाला वामपंथी लेबरल ग्रुप पाकिस्तान का नाम आते ही चुप्पी साध लेता है। हिन्दुओं पर बर्बरता हो या सिखों की हत्या इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता और जब बात पाकिस्तान की आती है तो कुछ कहना ही नहीं है।

अरे पाकिस्तान क्या इन्हें तो बांग्लादेश में हो रहे हिन्दुओं की हत्याओं पर भी बोलना गँवारा नहीं हुआ। शेख हसीना के हटने के बाद जिस तरह से हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों पर हमले हुए, उनके घरों में आग लगा दिए गए, महिलाओं के साथ रेप हुए, वामपंथियों ने कोई विरोध नहीं जताया। फिलिस्तीन के पक्ष में विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन पाकिस्तान-बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार का विरोध नहीं कर सकते।

अब तक के इतिहास में काफी कम मामले सामने आए होंगे जब वामपंथी- लिबरल ग्रुप ने पाकिस्तान में हिंदू, सिख, ईसाई या अहमदी समुदायों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर अपना मुँह खोला हो। भारत में CAA का विरोध करने वाला राजनीतिक और सामाजिक ग्रुप भी पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की दुर्दशा पर उतनी मुखरता नहीं दिखाते, जितना दूसरे मुद्दों पर दिखाते हैं।

CAA के खिलाफ शाहीन बाग में डेरा जमाए कट्टरपंथी-वामपंथी-लिबरल की जमात के लिए फ्री में लंगर लगाने वाले डीएस बिंद्रा को ही देख लीजिए। खुद सिख हैं, लेकिन पाकिस्तान में गुरुद्वारा सेवादार दंपति की हत्या पर जुबान नहीं खुली। डीएस बिंद्रा जैसे लोग जिनकी चिंता ये रहती है कि शाहीन बाग से लेकर हज पर गए मुस्लिमों के साथ क्या हो रहा है। इतना ही नहीं भारत के वामपंथी जो फिलीस्तीन की चिंता में सूऱ रहे हैं, ईरान के लिए रोने रोते हैं उन्हें भी इससे लेना-देना नहीं है कि पड़ोसी मुल्कों में कैसे अल्पसंख्यकों को, उनके धार्मिक स्थलों, उनके बच्चों को निशाना बनाया जाता है।

कुछ ऐसा ही हालत दूसरे वामपंथी- लिबरल गैंग के लोगों की है। यह ‘गैंग’ मानवाधिकारों के मुद्दे पर दोहरा मापदंड अपनाता है। जब पाकिस्तान या बांग्लादेश में हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार होते हैं, या कश्मीर में बहुसंख्यक भीड़ जब हिन्दू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हैं, तो यह धड़ा चुप रहता है, लेकिन भारत में किसी अल्पसंख्यक के साथ कोई सामान्य आपराधिक घटना भी हो जाए, तो ये उसे ‘अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संकट’ बना देते हैं। वामपंथी-लिबरल फिलीस्तीन या ईरान के मुद्दों पर तो बहुत मुखर रहता है, लेकिन CAA के तहत आने वाले पीड़ित शरणार्थियों का दर्द इन्हें नहीं दिखता।

क्या है राम मंदिर दान का पूरा विवाद: जानिए कैसे हुआ था उस ट्रस्ट का निर्माण जिसपर उठ रहे सवाल, किसके हाथ में है इसे संभालने की कमान

अयोध्या का राम मंदिर महज एक मंदिर नहीं है, बल्कि दुनियाभर के करोड़ों हिंदुओं के आस्था का केन्द्र भी है। यह सदियों पुराने संघर्ष, कानूनी लड़ाई और सामाजिक आंदोलन और हजारों हिन्दुओं के बलिदान का प्रतीक है। जनवरी 2024 में राम लला की प्रतिमा की स्थापना के बाद से ही लाखों लोग यहाँ दर्शन पूजन के लिए हर दिन आते हैं।

प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद से मंदिर को भक्तों से जबरदस्त दान मिला है। लाखों लोग नकद, सोना, चाँदी, आभूषण और अन्य कीमती उपहार रामलला को चढ़ाते हैं। इसलिए रामलला के चढ़ावे में हेराफेरी, कीमती सामानों का गायब होना, अभिलेखों में कथित तौर पर हेराफेरी के दावे ने इसे राष्ट्रीय विवाद का विषय बना दिया।

हालाँकि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और सनसनीखेज दावों के बीच यह भी सच्चाई है कि इसे यूपी सरकार नहीं चलाती और न ही वित्तीय मदद करती है। बल्कि यह श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा चलाया जाता है, जो एक स्वायत्त निकाय है।

राम मंदिर के दान विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में राम मंदिर को मिले दान में कथित अनियमितताओं को उजागर किया। यह मुद्दा 7 जून को तब राजनीतिक बन गया, जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि करोड़ों रुपये के चढ़ावे का हिसाब नहीं मिल पा रहा है।

करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा मुद्दा बताते हुए अखिलेश यादव ने इस मामले पर चुप्पी साधे रहने पर सवाल उठाया और न्यायिक हस्तक्षेप की माँग की। अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल न होने वाले अखिलेश यादव के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार पर निशाना साधने के लिए यह एक राजनीतिक हथियार था।

आरोपों का सिलसिला बढ़ता चला गया

शुरुआत में खबर आई थी कि 5 करोड़ से 75 करोड़ रुपए तक की दान राशि का हिसाब नहीं मिल रहा है। बाद में कुछ खबरों में दावा किया गया कि कथित गड़बड़ी की रकम कहीं अधिक हो सकती है।

कई रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि गायब रकम 200 करोड़ रुपए से भी अधिक हो सकती है। इन आरोपों के कारण व्यापक जाँच की माँग उठी।

आरोपों की सच्चाई क्या है?

यह विवाद दान के प्रबंधन से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ कैश काउंटिंग स्टाफ ने कथित तौर पर वाउचर में दान पेटियों से जमा की गई नकदी को कम करके बताया। श्रद्धालुओं द्वारा दान किए गए सोने, चाँदी और आभूषणों के प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

कई महीनों तक नकदी गिनने वाले क्षेत्रों से सीसीटीवी फुटेज कथित तौर पर हटाए जाने के आरोपों के बाद संदेह और भी बढ़ गया। इसके अलावा यह भी आरोप है कि अनियमितताओं से संबंधित शिकायतों को या तो नजरअंदाज कर दिया गया या उन पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं की गई।

इन सभी दावों से इसका अंदाजा लगाया जा रहा है कि प्रबंधन से जुड़ा एक हिस्सा जरूर ‘गलत हाथों’ में था, इसलिए चिंता बढ़ गई है।

लीपापोती के आरोप लगे

इस विवाद के केंद्र में मौजूद व्यक्तियों में से एक महिपाल सिंह हैं, जिनकी पहचान मीडिया रिपोर्टों में मंदिर संचालन से जुड़े पूर्व लेखा प्रभारी के रूप में की गई है।

सिंह ने आरोप लगाया कि दान की चोरी काफी समय से हो रही थी और दावा किया कि इस संबंध में अंदरूनी स्तर पर चिंता जताई गई थीं।

उनके बयान के अनुसार, उन्होंने कथित अनियमितताओं के बारे में वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया था, लेकिन इसके तुरंत बाद उन्हें उनके पद से हटा दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई महीनों की सीसीटीवी फुटेज डिलीट कर दी गई है।

ये आरोप अभी तक साबित नहीं हुए हैं, लेकिन चंदा चोरी की आम धारणा को काफी हद तक मजबूत किया है, इसलिए गहन जाँच की जरूरत है।

लापता रामशिलाएँ और दशकों पुराने आरोप

यह विवाद तब और सुर्खियों में आ गया, जब धर्मसेना के संस्थापक संतोष दुबे ने बहुमूल्य रामशिलाओं के संबंध में सनसनीखेज आरोप लगाए।

दुबे के अनुसार, सोने, चाँदी, हीरे, माणिक और अन्य कीमती धातुओं से बनी लगभग 1250 रामशिलाएँ गायब हैं। इन्हें कथित तौर पर भारत और विदेशों में पूजा-अर्चना के बाद अयोध्या लाया गया था।

उन्होंने दावा किया कि राम मंदिर आंदोलन से जुड़े मूल्यवान दान और कीमती वस्तुओं के बारे में चिंताएं कई दशकों पुरानी हैं। दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि राम मंदिर से जुड़ी कीमती वस्तुओं की चोरी 1989 से हो रही है। ये आरोप हैं और इसकी पुष्टि नहीं हुई है। इसकी जाँच की आवश्यकता है।

राम मंदिर में दान कैसे एकत्र किया जाता है

आरोपों को समझने के लिए वसूली प्रक्रिया को समझना महत्वपूर्ण है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने दर्शन मार्ग के आसपास कई दान पेटियाँ या हुंडियाँ लगाई गई हैं। हर दिन हजारों श्रद्धालु इन बक्सों में नकद दान जमा करते हैं।

ट्रस्ट ने दान में दिए गए नकद को गिनने की प्रक्रिया में भारतीय स्टेट बैंक को शामिल किया। बाद में बैंक ने यह काम एक निजी एजेंसी को आउटसोर्स कर दिया।

इसका असर यह हुआ कि दान की पूरी प्रक्रिया में मंदिर के कर्मचारी, आउटसोर्स किए गए कैश काउंटर, पर्यवेक्षक, बैंकिंग टीमें शामिल हो गए।

फिलहाल आरोप इस बात पर केंद्रित हैं कि दान एकत्र होने के बाद क्या हुआ होगा, न कि इस बात पर कि दान की वस्तुएँ सीधे दान पेटियों से गायब हो गईं।

कई कर्मचारियों की संपत्ति अचानक बढ़ी

राम मंदिर चंदा चोरी विवाद का शायद सबसे अहम पहलू इससे जुड़े कई कर्मचारियों की संपत्ति में बेहिसाब इजाफा है।

खबरों के मुताबिक, दान प्रबंधन में शामिल कई कर्मचारी जाँच के दायरे में आ गए, जब जाँचकर्ताओं ने कथित तौर पर उनकी अपार संपत्ति का पता चला। यह उनके बताए गए आय के स्रोतों से कहीं ज्यादा थे।

रिपोर्ट्स से पता चलता है कि लगभग 18000 रुपए से 20000 रुपए प्रति माह कमाने वाले कर्मचारियों के पास आलीशान घर- कार हैं और उसने बिजनेस में निवेश किया है। खबरों के मुताबिक, दो कर्मचारियों ने 1.5 करोड़ रुपए और 40 लाख रुपए की जमीनें खरीदीं थी।

जाहिर है इन घटनाक्रमों ने इस संदेह को और मजबूत कर दिया कि कुछ व्यक्तियों को दान प्रबंधन में अनियमितताओं से फायदा मिला।

लवकुश मिश्रा की गिरफ्तारी और पैसों की बरामदगी

कैश गिनने वाले कर्मचारी लवकुश मिश्रा की गिरफ्तारी के बाद जाँच में तेजी आई। खबरों के मुताबिक, जाँचकर्ताओं ने उसके घर से करीब 10 लाख रुपए बरामद किए हैं।

मीडिया रिपोर्टों में आगे बताया गया कि कुछ नकदी कथित तौर पर गोबर के नीचे छिपाई गई थी। बताया जाता है कि आंतरिक ऑडिट और सीसीटीवी फुटेज की समीक्षा में मिश्रा के आचरण पर सवाल उठे थे। इसके बाद अधिकारियों ने उनकी जाँच शुरू की।

चंपत राय ने चंदे के गायब होने के आरोपों को खारिज किया

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने करोड़ों रुपए गायब होने के आरोपों का पुरजोर खंडन किया है। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने कहा है कि इंटरनल ऑडिट में कोई वित्तीय अनियमितता नहीं पाई गई है।

ट्रस्ट ने लगातार यह दावा किया है कि उसका ऑडिट सिस्टम पारदर्शी है और इसमें कही घपला नहीं मिला है। इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रस्ट ने जाँच का विरोध नहीं किया, बल्कि ट्रस्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिल कर आरोपों की स्वतंत्र जाँच की माँग की।

आधिकारिक बयानों के अनुसार, ट्रस्ट ने तर्क दिया कि तथ्यों को स्थापित करने और राम मंदिर की छवि को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से फैलाई जा रही गलत सूचनाओं का खंडन करने के लिए एक औपचारिक जाँच आवश्यक थी।

राम मंदिर चंदा विवाद को सीधे उत्तर प्रदेश सरकार से जोड़ना भ्रामक क्यों है?

जैसे-जैसे विवाद बढ़ता गया, विपक्षी नेताओं ने इसे उत्तर प्रदेश सरकार की विफलता के रूप में दिखाने का प्रयास किया जबकि राम मंदिर ट्रस्ट की कानूनी और संस्थागत संरचना से योगी सरकार का कोई लेना-देना नहीं है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नहीं किया गया था। इसकी स्थापना फरवरी 2020 में सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या फैसले के बाद केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के माध्यम से की गई थी। अधिग्रहित भूमि का स्वामित्व उस कानूनी ढाँचे के तहत सीधे ट्रस्ट को हस्तांतरित कर दिया गया था।

यह ट्रस्ट स्वतंत्र रूप से कार्य करता है और अपने मामलों का प्रबंधन खुद करता है। अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष का चुनाव ट्रस्ट खुद करता है और वे लोग मंदिर प्रशासन, वित्त और दान पर नियंत्रण रखते हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की भूमिका मुख्य रूप से कानून व्यवस्था, सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और प्रशासनिक समन्वय तक ही सीमित है। ट्रस्ट बोर्ड में राज्य के मनोनीत सदस्यों को मतदान का अधिकार नहीं है और वे वित्तीय निर्णयों को नियंत्रित नहीं करते हैं।

अयोध्या के जिला मजिस्ट्रेट भी प्रशासनिक मामलों में समन्वय का काम करते हैं। उनका दान का प्रबंधन करने या मंदिर के खातों की देखरेख करने से कोई मतलब नहीं है।

इसलिए चंदा चोरी भी साबित होने पर जवाबदेही राज्यसरकार पर नहीं आएगी। यह मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों, खासकर दान संग्रह, गिनती, ऑडिट और निगरानी में शामिल लोगों पर होगी।

ट्रस्ट की जाँच की माँग के बाद एसआईटी गठित

ट्रस्ट के सदस्यों से मुलाकात और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एसआईटी का गठन किया। तीन सदस्यीय विशेष जाँच दल में प्रशासन, पुलिस और वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।

गौरतलब है कि यह निर्णय ट्रस्ट के अनुरोध के बाद लिया गया, जिसमें आरोपों के पीछे की सच्चाई का पता लगाने के लिए एक स्वतंत्र जाँच की माँग की थी।

एसआईटी को वित्तीय अनियमितताओं के दावों की जाँच करने, उपलब्ध साक्ष्यों की जाँच करने और गलत काम के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं।

इसके निष्कर्षों से यह पता चलने की उम्मीद है कि सचमुच गबन किया गया, कुछ लोग इसमें शामिल हैं या ट्रस्ट का बड़ा भाग इसमें लगा हुआ था। अभिलेखों की चोरी कैसे हुई और कौन-कौन इसके लिए जिम्मेदार् है अथवा पूरा मामला सिर्फ राजनीतिक है और कोई चोरी नहीं हुई।

जनहित याचिकाएँ, राजनीतिक दबाव और अधिक पारदर्शिता की माँग

यह विवाद कोर्ट तक भी पहुँच गया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच के समक्ष दायर एक जनहित याचिका में मंदिर दान से संबंधित कथित अनियमितताओं की अदालत की निगरानी में सीबीआई जाँच की माँग की गई है।

इसी बीच, भाजपा नेताओं और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों ने दान का दुरुपयोग करने के दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने पर जोर दिया है। इस मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए दान, खर्च, संपत्ति और अभिलेखों के संबंध में सार्वजनिक जानकारी देने की भी माँग की है।

करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा मुद्दा

करोड़ों हिंदुओं के लिए यह मुद्दा ऑडिट और दान चोरी से जुड़ी अनियमितता से कहीं ज्यादा व्यापक है। राम मंदिर में किया गया हर दान भक्ति का प्रतीक है, करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा हुआ है।

यह मंदिर पीढ़ियों की आस्था, त्याग और संघर्ष का परिणाम है। भगवान राम के नाम पर चढ़ाए गए दान का दुरुपयोग सिर्फ आर्थिक कदाचार नहीं है। यह देश-विदेश से आने वाले करोड़ों भक्तों की भावना से खिलवाड़ है। उनके साथ विश्वासघात है। इसलिए आरोपों में भी दम होना चाहिए, इसके सबूत होना भी उतना ही जरूरी है।

राम मंदिर के चंदे को लेकर हुए विवाद ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब जरूरी है। लापता धनराशि, गायब कीमती सामान और हटाए गए सीसीटीवी फुटेज से जुड़े आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

एसआईटी की जाँच, गिरफ्तारियाँ और चल रही छानबीन से संकेत मिलता है कि अधिकारी इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं। हालाँकि, तथ्यों को राजनीतिक बयानबाजी से अलग करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट एक स्वायत्त संस्था है, जो अपने वित्त, दान और प्रशासन का प्रबंधन करती है। उत्तर प्रदेश सरकार की भूमिका मुख्य रूप से सुरक्षा और प्रशासनिक समन्वय तक सीमित है और मंदिर के खातों को नियंत्रित करने या दान के प्रबंधन से सरकार का लेना-देना नहीं है।

यदि आर्थिक गड़बड़ियाँ हुई है, तो दोषियों की पहचान करके उन्हें दंडित किया जाना चाहिए। यदि आरोप बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं, तो सबूतों के माध्यम से यह भी स्पष्ट होना चाहिए।

राम मंदिर से जुड़े संवेदनशील मुद्दे पर काफी सावधानी बरतने की जरूरत है। यह हिंदू सभ्यता के सबसे महत्वपूर्ण पवित्र स्थलों में से एक है। यहाँ करोड़ों भक्तों के दान की पवित्रता और उनकी आस्था को बचाए रखने की जरूरत है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

4500 साल पुरानी है मोहनजोदड़ो की ‘डांसिंग गर्ल’, जानिए- इसकी पूरी कहानी: ‘कपड़े’ पहनाने पर विवाद के बाद NCERT ने वापस लिया फैसला

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 9 की नई किताब ‘मधुरिमा’ में सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा ‘डांसिंग गर्ल’ की तस्वीर में बदलाव किए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। किताब के पहले अध्याय ‘कला का इतिहास’ में इस प्रतिमा की ऐसी तस्वीर प्रकाशित की गई थी, जिसमें उसके नग्न धड़ को ढक दिया गया था।

तस्वीर में प्रतिमा के कंधों से नीचे के हिस्से को छिपाकर ऐसा दिखाया गया था कि मानो उसे कपड़े पहनाए गए हों। इससे प्रतिमा की मूल शारीरिक विशेषताएँ नहीं दिखाई दे रही थीं। दुनिया भर में इतिहास और पुरातत्व की किताबों में यह प्रतिमा अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई जाती है, इसलिए इस बदलाव की काफी आलोचना हुई।

NCERT will replace the modified "Dancing Girl" image in the class 9 textbook with the original version.
मूल तस्वीर (बाएँ) और NCERT की किताब में छपी एडिटेड तस्वीर (दाएँ) (फोटो साभार: Deccan Herald)

आलोचना और विरोध के बाद NCERT ने तुरंत फैसला लिया कि प्रतिमा की मूल तस्वीर को फिर से वापस लाया जाएगा। यह बदलाव वेबसाइट पर उपलब्ध डिजिटल संस्करण और अभी तक ना छपी किताबों में किया जाएगा। एक अधिकारी ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि अगले साल से छपने वाली हार्ड कॉपी में भी सही तस्वीर ही दिखाई देगी।

शिक्षा मंत्रालय ने भी सोमवार (15 जून 2026) को NCERT से इस मामले में स्पष्टीकरण माँगा था। एक सूत्र ने कहा, “जब यही तस्वीर कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान की किताब में पहले से मौजूद है, तो फिर कक्षा 9 की किताब में इसे बदलने का कोई मतलब नहीं बनता।” गौरतलब है कि पिछले लगभग 25 वर्षों से NCERT की किताबों में ‘डांसिंग गर्ल’ की मूल तस्वीर प्रकाशित होती रही है।

हड़प्पा सभ्यता का एक प्रमुख प्रतीक

करीब 4,500 साल पुरानी यह कांस्य प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख नगर मोहनजोदड़ो से मिली थी। इसकी ऊँचाई लगभग 10.5 सेंटीमीटर (4.1 इंच) है। मोहनजोदड़ो हड़प्पा सभ्यता का एक महत्वपूर्ण शहर था, जो अपनी सुनियोजित नगर व्यवस्था, विशाल इमारतों और दुनिया की शुरुआती शहरी स्वच्छता प्रणालियों के लिए जाना जाता है।

माना जाता है कि यह प्रतिमा लगभग 2500 ईसा पूर्व की है। इसमें एक युवा लड़की को दिखाया गया है जिसने कई चूड़ियाँ, एक कंगन और तीन लटकनों वाला हार पहन रखा है। उसके बाल सजे हुए हैं और एक कंधे पर बंधे हुए दिखाई देते हैं। उसका एक हाथ कमर पर टिकी हुआ है, जबकि दूसरा नीचे की ओर है। उसकी मुद्रा आत्मविश्वास से भरी नजर आती है।

इस प्रतिमा की खोज 1926 में ब्रिटिश पुरातत्वविद् अर्नेस्ट मैके ने वर्तमान पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में की थी। उन्होंने ही इसे ‘डांसिंग गर्ल’ नाम दिया था। मैके का मानना था कि यह प्रतिमा उन्हें उस दौर की नृत्यांगनाओं जैसी लगी जो औपनिवेशिक भारत में राजदरबारों में नृत्य प्रस्तुत करती थीं।

प्रतिमा का शरीर पतला है और उसके हाथ-पैर लंबे दिखाई देते हैं। उसका माथा ऊँचा, आँखें बड़ी, नाक चौड़ी और होंठ भरे हुए हैं। उसके दाहिने हाथ में चार चूड़ियाँ और बाएँ हाथ में लगभग 24-25 चूड़ियाँ दिखाई देती हैं। वह अपने दाहिने पैर पर हल्का झुककर खड़ी है और उसका सिर थोड़ा पीछे की ओर झुका हुआ है। उसका दाहिना हाथ कमर के पीछे मुट्ठी बनाकर रखा गया है जबकि बाएँ हाथ में ऐसा लगता है जैसे वह कोई पात्र पकड़े हुए हो।

ब्रिटिश पुरातत्वविद् मॉर्टिमर व्हीलर ने इस प्रतिमा के बारे में कहा था कि यह लगभग 15 साल की लड़की जैसी दिखती है, जो पूरी तरह आत्मविश्वास से भरी हुई है। उनके अनुसार दुनिया में उसके जैसी दूसरी कोई प्रतिमा नहीं है।

कला और तकनीक का अद्भुत नमूना

यह प्रतिमा सिर्फ एक कलाकृति नहीं बल्कि उस समय की तकनीकी प्रगति का भी प्रमाण मानी जाती है। सिंधु घाटी सभ्यता में अधिकतर मूर्तियाँ मिट्टी (टेराकोटा) से बनाई जाती थीं। कांस्य की ऐसी मूर्तियाँ बहुत कम मिली हैं।

हड़प्पा सभ्यता से मिली महिलाओं की अधिकांश मिट्टी की मूर्तियों में कमर के नीचे कोई वस्त्र या बेल्ट दिखाई देती है लेकिन ‘डांसिंग गर्ल’ पूरी तरह नग्न दिखाई देती है। यही बात इसे अन्य मूर्तियों से अलग बनाती है।

यह प्रतिमा कांस्य (ब्रॉन्ज) से बनी है जो ताँबा और टिन को मिलाकर तैयार किया जाता है। इससे पता चलता है कि उस समय के कारीगर धातुओं को मिलाकर मजबूत मिश्रधातु बनाने की तकनीक जानते थे। कई पुरातात्विक खोजों से यह भी पता चला है कि वे ताँबे में आर्सेनिक मिलाकर उसे और मजबूत बनाते थे।

सिंधु घाटी सभ्यता में तांबे और कांस्य का इस्तेमाल औजार, हथियार, गहने, घरेलू सामान और धार्मिक वस्तुएँ बनाने में किया जाता था। ‘डांसिंग गर्ल’ को बनाने के लिए ‘लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग तकनीक’ का उपयोग किया गया था। यह आज भी इस्तेमाल की जाने वाली एक बेहद मुश्किल धातु ढलाई तकनीक है।

इस प्रक्रिया में पहले मोम से प्रतिमा का मॉडल बनाया जाता है। फिर उसे मिट्टी से ढक दिया जाता है और छोटे-छोटे छेद छोड़े जाते हैं। बाद में गर्म करने पर मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है और उसकी जगह बने खाली हिस्से में पिघला हुआ कांस्य डाला जाता है। धातु ठंडी होने के बाद मिट्टी हटाई जाती है और अंतिम रूप दिया जाता है।

भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय के अनुसार, “यह प्रतिमा दो महत्वपूर्ण बातों का प्रमाण है। पहली, सिंधु सभ्यता के लोग धातु मिश्रण और ढलाई जैसी उन्नत तकनीक जानते थे। दूसरी, उनके समाज में नृत्य और प्रदर्शन कला जैसी मनोरंजन की विकसित परंपराएँ मौजूद थीं।”

सभ्यता की विरासत को दिखाने वाली प्रतिमा

‘डांसिंग गर्ल’ को हड़प्पा सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण कलाकृतियों में गिना जाता है। पुरातत्वविदों के अनुसार यह उस दौर के लोगों की धातु विज्ञान, कला और शिल्प कौशल की उत्कृष्ट समझ को दर्शाती है।

प्रतिमा में दिखाई देने वाले गहने बताते हैं कि उस समय आभूषण निर्माण एक विकसित कला और उद्योग था। हड़प्पा सभ्यता के कई स्थलों से हजारों गहने, निर्माण उपकरण, अधूरे आभूषण और उनसे जुड़ा अन्य सामान मिला है। इससे पता चलता है कि गहना बनाना केवल घरेलू काम नहीं बल्कि एक बड़ा पेशा था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह प्रतिमा मोहनजोदड़ो के एक घर के अंदर मिली थी। इससे माना जाता है कि इसे पूजा के लिए नहीं बनाया गया था बल्कि यह किसी परिवार या व्यक्ति के उपयोग की वस्तु रही होगी। यह उस समय के लोगों की कलात्मक अभिव्यक्ति, सामाजिक पहचान और व्यक्तित्व को दर्शाती है।

दिलचस्प बात यह भी है कि कंधे से कलाई तक चूड़ियाँ पहनने की परंपरा आज भी उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ इलाकों में देखने को मिलती है। इससे संकेत मिलता है कि कुछ सांस्कृतिक परंपराएँ हजारों वर्षों से चली आ रही हैं।

भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान ने ‘डांसिंग गर्ल’ और ‘प्रिस्ट किंग’ नामक दूसरी प्रसिद्ध हड़प्पा कलाकृति दोनों पर दावा जताया था। लेकिन भारत केवल एक कलाकृति देने के लिए तैयार था।

बताया जाता है कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने ‘प्रिस्ट किंग’ को चुना। इतिहासकार आशीष कुमार के अनुसार, पाकिस्तान में धार्मिक समूहों की प्रतिक्रिया के डर से नग्न किशोरी की प्रतिमा को लेने से परहेज किया गया था। उनके मुताबिक उस समय भी प्रतिमा की नग्नता को कुछ लोग अपनी नैतिक मान्यताओं के खिलाफ मानते थे।

आज ‘डांसिंग गर्ल’ भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है। यह प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता की उत्कृष्ट कला, फैशन, शिल्प कौशल और रचनात्मक प्रतिभा का एक महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

2.5 लाख रेप पीड़िता, 87% आरोपित मुस्लिम और 149+ शहरों में फैला नेटवर्क: 219 पन्नों की ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट’ में सामने आई UK में दशकों से चल रही बर्बरता

ब्रिटेन (UK) में बरसों से ग्रूमिंग गैंग की समस्या पर रिपोर्ट जारी की गई है। यह 219 पन्नों की ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट’ एक ऐसी कहानी बताती है जिसे पढ़ना भी आसान नहीं है। रिपोर्ट का दावा है कि दशकों तक देश के अलग-अलग शहरों में संगठित गिरोह कमजोर और नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाते रहे। रिपोर्ट के अनुसार, इन गिरोहों में 87 प्रतिशत मुस्लिम आदमी शामिल थे और उनका शिकार ज्यादातर ‘श्वेत’ ब्रिटिश लड़कियाँ थीं। जाँच में कहा गया कि यह कोई इक्का-दुक्का अपराध नहीं था, बल्कि पूरे देश में फैला हुआ एक संगठित नेटवर्क था जो वर्षों तक चलता रहा।

रिपोर्ट के मुताबिक लड़कियों को पहले दोस्ती, प्यार, उपहार, शराब, सिगरेट और नशे के जरिए फँसाया जाता था। कई गवाहियों में बताया गया कि 11 से 13 साल तक की बच्चियों को स्कूल के बाहर, देखभाल गृहों और सड़कों से टैक्सियों में ले जाया जाता था। इसके बाद उन्हें घरों, फ्लैटों, होटलों और रेस्टोरेंट तक पहुँचाया जाता था, जहाँ कई आदमी मिलकर बार-बार उनका बलात्कार करते थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई पीड़िताओं को अलग अलग शहरों में ले जाकर बेचा गया, उनकी वीडियो बनाई गईं, ब्लैकमेल किया गया और उन्हें लगातार डर के माहौल में रखा गया।

सबसे चौंकाने वाला दावा पीड़िताओं की संख्या को लेकर है। रिपोर्ट के अनुसार कम से कम 2.5 लाख श्वेत लड़कियाँ इस तरह के अपराधों का शिकार हुईं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन मामलों में बार बार बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, तस्करी, यातना, गर्भावस्था, जबरन गर्भपात, जबरन इस्लामी धर्मांतरण और जीवनरभर का मानसिक आघात शामिल था।

रिपोर्ट में कई पीड़िताओं ने बताया कि उन्हें ‘व्हाइट ट्रैश’ और ‘काफिर’ कहकर अपमानित किया जाता था। जाँच के अनुसार अपराधियों ने गैर मुस्लिम और खासकर गरीब श्वेत लड़कियों को शिकार बनाया। कुछ गवाहियों में यह भी आरोप लगाया गया कि लड़कियों पर इस्लाम कबूलने का दबाव बनाया गया, उन्हें मजहबी तौर-तरीकों का पालन करने के लिए मजबूर किया गया और कुछ मामलों में विदेश में ले जाकर बेच दिया गया।

लेकिन रिपोर्ट सिर्फ अपराधियों पर सवाल नहीं उठाती। उसका सबसे बड़ा आरोप उन संस्थाओं पर है जिनका काम बच्चों की सुरक्षा करना था। रिपोर्ट के अनुसार पुलिस, सामाजिक सेवाएँ, स्कूल, अस्पताल और स्थानीय प्रशासन के पास बार-बार चेतावनी के संकेत पहुँचे। कई मामलों में बच्चियों के साथ हुए अत्याचार के सबूत मौजूद थे, फिर भी कार्रवाई नहीं हुई। जाँच का निष्कर्ष है कि नस्लवाद के आरोप लगने के डर, राजनीतिक दबाव और संस्थागत विफलताओं ने अपराधियों को वर्षों तक खुला छोड़ दिया, जबकि हजारों बच्चियाँ लगातार शोषण का शिकार होती रहीं।

रिपोर्ट क्या है और इसे किसने तैयार किया

यह ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट‘ ब्रिटेन के ग्रेट यारमाउथ से सांसद रुपर्ट लोव के नेतृत्व में गठित स्वतंत्र जाँच समिति द्वारा तैयार की गई है। जाँच का मकसद ब्रिटेन में दशकों से सामने आ रहे ग्रूमिंग गैग्स और बाल यौन शोषण के मामलों की वास्तविक तस्वीर सामने लाना था।

रिपोर्ट तैयार करने के दौरान अदालतों के रिकॉर्ड, आधिकारिक और गैर-आधिकारिक जाँच रिपोर्टों, पीड़ितों की गवाही, विशेषज्ञों के बयान और विभिन्न शहरों से मिले साक्ष्यों का अध्ययन किया गया। जाँच समिति का दावा है कि उसने देशभर से बड़ी संख्या में पीड़ितों, गवाहों और संबंधित लोगों की गवाही दर्ज की।

219 पन्नों की इस रिपोर्ट में ग्रूमिंग गैंग्स के काम करने के तरीके, अपराधियों की पृष्ठभूमि, पीड़ितों के अनुभव, संस्थागत विफलताओं और राजनीतिक प्रतिक्रिया जैसे मुद्दों को विस्तार से शामिल किया गया है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यह केवल कुछ स्थानीय मामलों की कहानी नहीं, बल्कि पूरे ब्रिटेन में फैला एक संगठित और लंबे समय तक चलने वाला संकट था।

कैसे लड़कियों को जाल में फँसाया जाता था?

रिपोर्ट के अनुसार ज्यादात मामलों में अपराध की शुरुआत किसी सुनसान जगह या हिंसा से नहीं, बल्कि दोस्ती से होती थी। गिरोह पहले ऐसी लड़कियों की तलाश करते थे जो भावनात्मक रूप से कमजोर हो, परिवार से दूर हों या किसी तरह की परेशानी से गुजर रही हों। उन्हें उपहार, पैसे, मोबाइल फोन, सिगरेट, शराब और नशीले पदार्थ देकर अपने करीब लाया जाता था।

जाँच में कहा गया है कि कई पीड़िताओं को यह विश्वास दिलाया गया कि अपराधी उनसे प्यार करते हैं और उनकी परवाह करते हैं। लेकिन एक बार भरोसा बन जाने के बाद हालात तेजी से बदल जाते थे। रिपोर्ट में दर्ज गवाहियों के मुताबिक लड़कियों को घरों, फ्लैटों, होटों, रेस्टोरेंट और टैक्सियों के जरिए अलग-अलग जगहों पर ले जाया जाता था, जहाँ उनका रेप किया जाता था।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

रिपोर्ट में एक जगह कहा गया है कि लड़कियों को अकसर ‘passed between multiple adult men’ यानी कई वयस्क पुरुषों के बीच घुमाया जाता था। कई पीड़िताओं ने बताया कि एक बार गिरोह के कब्जे में आने के बाद उनके साथ बार-बार और कई लोगों द्वारा बलात्कार किया गया। जाँच के अनुसार विरोध करने पर मारपीट, धमकी, ब्लैकमेल और परिवार को नुकसान पहुँचाने की चेतावनी दी जाती थी।

ढाई लाख से ज्यादा लड़कियाँ बनीं शिकार, जुर्म करने वालों में अधिकतर पाकिस्तानी मुस्लिम

रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में कम से कम 2.5 लाख श्वेत ब्रिटिश लड़कियाँ ग्रूमिंग गैंग का शिकार बनीं। जाँच में कहा गया है कि इन पीड़िताओं के साथ बार-बार बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, तस्करी, यातना, जबरन गर्भधारण, जबरन इस्लामी धर्मांतरण और गंभीर मानिक शोषण हुआ। रिपोर्ट का दावा है कि वास्तविक संख्या इससे भी कहीं अधिक हो सकती है।

अदालत के रिकॉर्ड और आधिकारिक जाँचों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि ग्रूमिंग गैंग के मामलों में दोषी ठहराए गए लोगों में करीब 87 प्रतिशत के नाम मुस्लिम हैं। हालाँकि जाँच यह भी कहती है कि गिरोहों में शामिल अधिकांष लोग कभी दोषी ठहराए ही नहीं गए।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

रिपोर्ट के मुताबिक इन नेटवर्कों में सबसे बड़ी संख्या पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम आदमियों की थी। इसके अलावा कुछ मामलों में सोमाली, सीरियाई, ईरानी और तुर्की मूल के मुस्लिम आदमियों के नाम भी सामने आए। ऑक्सफोर्ड इस्लामी कांग्रेगेशन के इमाम डॉ. ताज हार्गे का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि ग्रूमिंग गैंग में शामिल मुस्लिम आदमियों की वास्तविक संख्या 95 प्रतिशत हो सकती है।

पूरे ब्रिटेन में फैला था ग्रूमिंग गैंग नेटवर्क

रिपोर्ट के अनुसार ग्रूमिंग गैंग्स का एक जैसा मॉडल ब्रिटेन के दर्जनों शहरों और कस्बों में देखने को मिला। सांसद रूपर्ट लोव के नेतृत्व में हुई इस जाँच में ऐसे सबूत मिलने का दावा किया गया है, जिनसे पता चलता है कि यह नेटवर्क देश के लगभग हर हिस्से तक फैला हुआ था।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

जाँच के मुताबिक कम से कम 149 स्थानीय प्रशासनिक क्षेत्रों में ऐसे मामलों के सबूत मिले हैं। रिपोर्ट का कहना है कि यह आँकड़ा दिखाता है कि समस्या किसी एक शहर या कुछ इलाकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर फैली हुई थी।

रिपोर्ट में कहा गया कि अदालतों के रिकॉर्ड, विभिन्न जाँच रिपोर्टों और गवाहों की गवाही से एक समान पैटर्न सामने आया। जाँच का निष्कर्ष है कि यह अलग-अलग स्थानीय विफलताओं की कहानी नहीं, बल्कि संगठित बाल यौन शोषण का ऐसा नेटवर्क था जो उत्तर से लेकर दक्षिणी तट तक बार-बार एक जैसे तरीके से संचालित होता रहा।

पीड़िताओं की प्रमुख गवाहियाँ

  • हर दिन यौन शोषण: कई महिलाओं ने बताया कि उनके साथ महीनों और वर्षों तक लगातार बलात्कार हुआ। एक पीड़िता ने कहा, “मेरे साथ हर दिन रेप हुआ, कभी-कभी तो दिन में कई बार भी।”
  • एक से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाया जाता था: गवाहियों के अनुसार लड़कियों को अलग-अलग घरों, होटलों, फ्लैटों और कारों में ले जाया जाता था। रिपोर्ट में कहा गया कि कई पीड़िताओं को वयस्क पुरुषों के बीच इधर से उधर किया जाता था।
  • नस्लीय और मजहबी गालियाँ: कई महिलाओं ने बताया कि उन्हें ‘व्हाइट ट्रैश’ और ‘काफिर’ कहकर तक अपमानित किया जाता था। गवाहियों में बताया गया कि गैर-मुस्लिम होने के कारण उन्हें नीचा दिखाया जाता था। कुछ गवाहियों में कहा गया कि गैर-मुस्लिम होने के कारण उन्हें नीचा दिखाया जाता था।
  • धर्म बदलने का दबाव: कई महिलाओं ने बताया कि उनकी तस्वीरें और वीडियो बनाकर उन्हें चुप रहने के लिए मजबूर किया गया। कुछ को परिवार को नुकसान पहुँचाने और जान से मारने तक की धमकियाँ दी गईं।
  • धमकी और ब्लैकमेल: कई महिलाओं ने बताया कि उनकी तस्वीरें और वीडियो बनाकर उन्हें चुप रहने के लिए मजबूर किया गया। कुछ को परिवार को नुकसान पहुँचाने और जान से मारने तक की धमकियाँ दी गईं।
  • शराब और नशे के जरिए नियंत्रण: पीड़िताओं के अनुसार उन्हें शराब, ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थ दिए जाते थे ताकि वे विरोध न कर सकें और अपराधियों के नियंत्रण में रहें।
  • मदद माँगने पर भी नहीं सुनी गई बात: कई महिलाओं ने कहा कि उन्होंने पुलिस, स्कूलों और सामाजिक सेवाओं से मदद माँगने की कोशिश की, लेकिन उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। कुछ मामलों में उन्हें ही दोषी मान लिया गया।
  • जिंदगी भर का मानसिक आघात: गवाहियों में अवसाद, डर, आत्महत्या के विचार, रिश्तों में समस्याएँ और जीवनभर बने रहने वाले मानसिक घावों का बार-बार जिक्र मिलता है। रिपोर्ट में बताया गया कि इन अपराधों का असर पीड़िताओं पर आज भी बना हुआ है।

पुलिस, स्कूल और सामाजिक सेवाओं की विफलता

रिपोर्ट का कहना है कि यह सिर्फ अपराधियों की कहानी नहीं है, बल्कि उन संस्थाओं की विफलता की भी कहानी है जिनका काम बच्चों की सुरक्षा करना था। जाँच रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस और अन्य सरकारी संस्थाएँ वर्षों तक यह जानती थीं कि बच्चियों के साथ क्या हो रहा है, लेकिन फिर भी समय रहते कार्रवाई नहीं की गई।

पुलिस को बार-बार शिकायतें मिलती रहीं, लेकिन कई मामलों में पीड़िताओं की बातों को नजरअंदाज कर दिया गया। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि कुछ मामलों में अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित लड़कियों को ही अपराधी की तरह देखा गया, सबूत नष्ट हुए और कई ज्ञात बलात्कार आरोपित जमानत पर बाहर घूमते रहे।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

सामाजिक सेवाओं को लेकर रिपोर्ट और भी गंभीर आरोप लगाती है। जाँच के मुताबिक कई बच्चियों को ऐसे बाल संरक्षण गृहों में रखा गया, जो बाद में शोषण और तस्करी के केंद्र बन गए। रिपोर्ट कहती है कि साफ संकेत मिलने के बावजूद कई मामलों को बंद कर दिया गया और उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई जिन्होंने इस समस्या को उजागर करने की कोशिश की।

स्वास्थ्य सेवाओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार अस्पतालों और डॉक्टरों के पास 13 साल तक की बच्चियों में यौन हिंसा के संकेत, यौन संक्रमण, बलात्कार के कारण हुई गर्भावस्था और आत्महत्या के प्रयासों के रिकॉर्ड मौजूद थे। इसके बावजूद कई पीड़िताओं को बिना उचित सुरक्षा व्यवस्था, परामर्श या विशेष देखभाल के वापस उसी माहौल में भेज दिया गया, जहाँ उनका शोषण हो रहा था।

स्कूलों को भी चेतावनी के संकेत दिखाई दे रहे थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई शिक्षकों ने स्कूल के बाहर बड़ी उम्र के पुरुषों को लड़कियों का इंतजार करते देखा, कुछ मामलों में स्कूल परिसर के अंदर ही बलात्कार की शिकायतें सामने आईं। लेकिन जाँच के अनुसार कई बार पीड़िताओं को सुरक्षा देने के बजाय उन्हें ही स्कूल से निकाल दिया गया या अनुशासनहीन छात्रा मान लिया गया।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

रिपोर्ट में बताया गया कि राजनीतिक शुद्धता, नस्लवाद का आरोप लगने का डर और कुछ समुदायों का समर्थन खोने की आशंका ने बच्चों की सुरक्षा को पीछे धकेल दिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई संस्थाओं ने समस्या का सामना करने के बजाय उससे बचने का रास्ता चुना, जिसका खामियाजा हजारों बच्चियों को भुगतना पड़ा।

रिपोर्ट की सिफारिशें और आगे क्या होगा?

रिपोर्ट का कहना है कि अब केवल पुरानी घटनाओं की जाँच करना पर्याप्त नहीं है। जाँच समिति ने पूरे देश में एक नई राष्ट्रीय सार्वजनिक जाँच शुरू करने की माँग की है, ताकि दशकों से चले आ रहे इस घोटाले की पूरी सच्चाई सामने आ सके और जिम्मेदार लोगों की पहचान की जा सके।

रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि ग्रूमिंग गैंग्स से जुड़े सभी मामलों की दोबारा समीक्षा की जाए और उन अपराधियों की फिर से जाँच हो जो कभी अदालत तक नहीं पहुँचे। इसके अलावा पुलिस, सामाजिक सेवाओं, स्कूलों और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका की भी स्वतंत्र जाँच कराने की माँग की गई है, ताकि यह पता चल सके कि चेतावनियों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

(फोटो साभार: Rape Gang Inquiry Report)

जाँच समिति ने पीड़िताओं के लिए विशेष सहायता कार्यक्रम शुरू करने की भी सिफारिश की है। रिपोर्ट के अनुसार हजारों महिलाएँ आज भी मानसिक आघात, अवसाद और अन्य समस्याओं से जूझ रही हैं। इसलिए उन्हें लंबे समय तक मनोवैज्ञानिक, कानूनी और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

रिपोर्ट यह भी कहती है कि अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं को अपराधियों की जातीय या धार्मिक पृष्ठभूमि से जुड़े तथ्यों को छिपाने के बजाय खुलकर सामने रखना चाहिए। जाँच के अनुसार समस्या की सही पहचान किए बिना उसे रोकना संभव नहीं होगा।

आगे क्या होगा, यह काफी हद तक ब्रिटिश सरकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यदि इसकी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया, तो हजारों पीड़िताओं को न्याय मिलने की संभावना और कमजोर हो सकती है। समिति का कहना है कि अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि क्या हुआ था, बल्कि यह है कि इतने वर्षों तक ऐसा होने क्यों दिया गया और भविष्य में इसे कैसे रोका जाएगा।

दशकों से ब्रिटेन में खतरा है ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल

ब्रिटेन में 2002 के आसपास पहली बार ग्रूमिंग गैंग से जुड़े मामले उजागर हुए थे, जहाँ पाकिस्तानी मूल के पुरुषों पर इन नाबालिगों के शोषण के आरोप लगे थे। 2010 में यह ग्रूमिंग गैंग स्कैंडर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना, जब ब्रिटिश अखबार ‘द टाइम्स’ ने जाँच के बाद अपनी रिपोर्ट में इन बाल यौन शोषण के मामलों का खुलासा किया। उस रिपोर्ट में भी यह सामने आया कि अधिकतर आरोपित मुस्लिम थे और वे कमजोर एवं असुरक्षित परिस्थितियों में रहने वाली लड़िकयों को अपना शिकार बना रहे थे।

हाल ही में जून 2026 की शुरुआत में ब्रिटेन की संसद में भी दोबारा से यह मुद्दा उठा था। जब सांसद रुपर्ट लोव ने संसद में ग्रूमिं गैंग की कई पीड़ित महिलाओं और लड़कियों की गवाहियाँ पढ़कर सुनाईं। इन गवाहियों में भी 600-700 आदिमयों ने किया रेप, टूटी बोतलों के टुकड़ों से रेप, पुलिस ऑफिसर द्वारा रेप, नस्लीय आधार पर ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाने जैसी बेहद दर्दनाक घटनाओं का जिक्र था।

बच्चों के लिए बंद करो सोशल मीडिया… दुनियाभर से उठ रही माँग, पर टेलीग्राम फाउंडर बैन को बता रहे खतरनाक: जानिए- VPN से परिवार तक, उनके तर्क में कितना दम

दुनिया भर में बच्चों और किशोरों का बचपन मोबाइल, टैब और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक सीमित होता जा रहा है। उन्हें पढ़ने-लिखने से लेकर खेलने-कूदने तक पर सोशल मीडिया का असर है। इसको देखते हुए कई देशों ने बच्चों को सोशल मीडिया से दूर करने के लिए उम्र सीमा तय की है।

ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस समेत कई देश मानते हैं कि सोशल मीडिया बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, लत, साइबर बुलिंग और यौन शोषण के खतरे को बढ़ाता है, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के बाद ‘खतरा’ और भी बड़ा दिख रहा है। आलोचकों का कहना है कि बच्चे और किशोर VPN की ओर चले जाते हैं।

VPN की ओर जाना ज्यादा खतरनाक क्यों है?

वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क यानी वीपीएन एक ऐसा असुरक्षित प्राइवेट इंटरनेट है, जो बगैर डेटा प्रोवाइडर के सीधे वीपीएन सर्वर से जुड़ जाता है। इसके जरिए बच्चे सरकारी प्रतिबंधों और पेरेंटल कंट्रोल को दरकिनार करते हुए डार्क वेब और असीमित, असुरक्षित कंटेंट, जैसे- पॉर्नोग्राफी और बेहद हिंसा तक पहुँच जाते हैं। इसके माध्यम से बच्चे उन देशों के सर्वर से जुड़ जाते हैं, जहाँ ऑनलाइन प्रतिबंध नहीं है। इससे आसानी से उनकी पहुँच पोनोग्राफी और हिंसक कंटेंट तक हो जाती है।

वीपीएन लोकेशन और आईपी (IP) एड्रेस को छिपा देता है। इससे पता नहीं चलता है कि बच्चा विश्व के किस कोने में मौजूद है। सबसे अहम बात है कि इसकी वजह से माता-पिता या स्कूल का नेटवर्क यह नहीं ट्रैक कर पाता कि बच्चा क्या देख रहा है। वीपीएन के इस्तेमाल के दौरान अक्सर बच्चे बिना सुरक्षा के अवैध वेबसाइटों और स्कैमर्स के संपर्क में आ जाते हैं। यह उसकी सुरक्षा के लिए भी खतरनाक है।

जब लोकप्रिय सोशल मीडिया जैसे-एक्स, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, फेसबुक, मेटा आदि से बच्चे जुड़ते हैं, तो उनके आयु की पुष्टि की जाती है। लेकिन वीपीएन में ऐसा कुछ नहीं है। बच्चे के न तो उम्र का पता है, न देश का पता है, न भाषा-संस्कृति की पहचान की जा सकती है, लेकिन बच्चा वीपीएन के माध्यम से इंटरनेट पर सारे कंटेंट देख लेता है।

समस्या यह है कि VPN केवल सोशल मीडिया ही उपलब्ध नहीं कराता, बल्कि पूरे इंटरनेट की सारी सीमाओं को खत्म कर देता है। इससे बच्चे उन वेबसाइटों, और प्लेटफॉर्मों तक पहुँच सकते हैं, जहाँ किसी तरह का नियंत्रण या मॉडरेशन नहीं होता।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि VPN फ्री होते हैं और ज्यादातर यूजर्स का डेटा जमा करते हैं। ब्राउजिंग एक्टिविटी रिकॉर्ड करते हैं और ये आपत्तिजनक एड नेटवर्क से भी जुड़े होते हैं। यदि कोई 13-15 साल का बच्चा बिना समझे ऐसे ऐप डाउनलोड करता है तो उसकी गोपनीयता और सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

माता-पिता के ‘कंट्रोल से बाहर’ हो रहे बच्चे

कई VPN बच्चों के स्कूल नेटवर्क फिल्टर, पैरेंटल कंट्रोल और कंटेंट फिल्टरिंग को दरकिनार कर देते हैं। UK के एक अध्ययन में VPN इस्तेमाल करने वाले कुछ बच्चों ने माना कि वे इसका उपयोग स्कूल प्रतिबंधों या पैरेंटल कंट्रोल्स से बाहर जाने के लिए करते हैं। इससे बच्चों में ‘छिपकर इंटरनेट इस्तेमाल’ करने की प्रवृति विकसित होने लगती है।

ऑस्ट्रेलिया पर हुए एक हालिया शोध में पाया गया कि किशोर प्रतिबंधों को चुनौती के रूप में देखने लगे और वे यह सीखने लगे कि सिस्टम को कैसे चकमा दिया जाए। शोधकर्ताओं ने इसे तकनीकी नियंत्रणों की एक बड़ी कमजोरी बताया।

Telegram फाउंडर पावेल दुरोव ने क्या कहा

ब्रिटेन में 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन किए जाने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टेलीग्राम के फाउंडर Pavel Durov की प्रतिक्रिया सामने आयी। उन्होंने कहा कि ‘कोई कानून अच्छी परवरिश की जगह नहीं ले सकता।’

उन्होंने कहा कि यदि बच्चों को सोशल मीडिया से पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाएगा तो वे VPN का उपयोग शुरू कर देंगे और इससे वे अवैध या अधिक खतरनाक कंटेंट देखेंगे। उनके मुताबिक, माता-पिता के पास पहले से स्क्रीन-टाइम लिमिट, पैरेंटल कंट्रोल और डिवाइस नियंत्रण जैसे तरीके मौजूद हैं। इसका इस्तेमाल कर बच्चों को नियंत्रित किया जा सकता है। दुरोव ने रूस का उदाहरण देते हुए बताया कि जब रूसी सरकार ने टेलीग्राम को बैन किया था, तो 95% युवा वीपीएन का उपयोग करके प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते रहे।

भारत में Telegram पर NEET को लेकर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध के बाद भी Durov ने कहा कि किसी प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करने से समस्या की जड़ खत्म नहीं होती, बल्कि यूजर्स दूसरे प्लेटफॉर्मों पर चले जाते हैं। उन्होंने कहा कि यह 150 करोड़ लोगों को ‘सजा’ देने जैसा है।

VPN का चलन दुनिया भर में बढ़ा

UK Online Safety Act लागू होने के बाद एक VPN को ब्रिटेन में डाउनलोड करने वालों की संख्या 1800% तक बढ़ गई। देश में VPN को लेकर सर्च और चर्चा में जबरदस्त उछाल आया है। गुगल पर वीपीएन को लेकर सर्च करीब 89% बढ़ी। सरकार भी मान रही है कि वीपीएन नियमों से बच निकलने का आसान रास्ता है। हालाँकि बच्चों में वीपीएन को जानने की दिलचस्पी बढ़ी है इसका कोई प्रमाण सामने नहीं आया है।

UK की संस्था Internet Matters के अनुसार, केवल 8% बच्चों ने पिछले 12 महीनों में वीपीएन के उपयोग की बात कही और नियमों उम्र को लेकर पाबंदी के बाद बच्चों के VPN उपयोग में कोई बड़ी उछाल नहीं दिखी। इसका मतलब है कि वीपीएन डाउनलोड करने वालों की संख्या जरूर बढ़ी है, लेकिन हर वृद्धि का मतलब यह नहीं कि सभी यूजर्स बच्चे ही हैं।

पूरी दुनिया की बात करें, तो हाल के वर्षों में वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क मार्केट का साइज तेज़ी से बढ़ा है। 2025 में $71.25 बिलियन यानी लगभग ₹6.76 लाख करोड़ था, जो 2026 में बढ़कर $86.02 बिलियन यानी ₹7.18 लाख करोड़ से ज्यादा हो जाएगा। इसका सालाना ग्रोथ रेट 20.7% है। 2030 तक यह बढ़कर $182.00 बिलियन यानी ₹17.29 लाख करोड़ रुपए हो जाएगा।

ऐसे में सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध और खुली आजादी के बीच का रास्ता अख्तियार करना जरूरी है। बच्चों की उम्र सीमा तय करना अच्छा कदम है। लेकिन ऐसे प्लेटफॉर्मों को भी उम्र के वेरिफिकेशन को सख्त करना चाहिए। जिन देशों में अभी उम्र संबंधी नियम नहीं बने हैं, उन्हें प्लेटफॉर्म को मजबूर करना चाहिए कि अनजान मैसेज पर प्रतिबंध लगे, खासकर तब जब यूजर बच्चा हो।

लोकल शेयरिंग की लिमिट होनी चाहिए। स्क्रॉलिंग की लिमिट होनी चाहिए। सबसे अहम है ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर एल्गोरिथम अनुशंसा पर नियंत्रण अर्थात यूजर तय करे कि उसे क्या देखना है, न की प्लेटफॉर्म का एग्लोरिथम। इस दिशा में कई प्लेटफॉर्म आगे बढ़े हैं, लेकिन बच्चों को लेकर इसका सख्ती से पालन होना जरूरी है।

‘पोर्टल में गंभीर खामियाँ, दिख रही गोपनीय जानकारी’: री-एग्जाम से पहले सवालों में NEET, दुबई के छात्र के सुझावों को NTA-IIT ने माना; पढ़ें- मध्यम वर्ग के लिए क्यों चुनौती है ये सिस्टम

NEET, JEE जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएँ केवल एक परीक्षा नहीं होतीं, बल्कि लाखों छात्र-छात्राओं और उनके परिवारों के सपनों, संघर्षों और वर्षों की मेहनत का परिणाम होती हैं। ये दोनों परीक्षाएँ भारत में मेडिकल और इंजीनियरिंग में एडमिशन तय करती हैं।

मध्यमवर्गीय परिवार में परीक्षा सिर्फ छात्र नहीं दे रहा होता, पूरा परिवार देता है। ऐसे में जब दुबई के छात्र रेनेल अनिल ने परीक्षा व्यवस्था में खामियों और छात्रों से जुड़े मुद्दों की ओर राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी यानी NTA का ध्यान खींचा और बताया कि क्या-क्या परीक्षा प्रणाली में दिक्कतें हैं, तो उनकी बातों को गंभीरता से लिया गया। इतना ही नहीं एनटीए के साथ साथ आईआईटी संस्थानों ने भी उनके सहयोग के लिए आभार जताया।

क्या किया 12वीं में पढ़ने वाले अनिल ने

दुबई में रहने वाले 12वीं क्लास के CBSE स्टूडेंट अनिल ने JEE एडवांस्ड और NEET के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की जाँच की। दोनों पोर्टल्स में गंभीर कमियाँ मिलने के बाद उसने अपनी जानकारी भारत की नेशनल साइबरसिक्योरिटी रिस्पॉन्स टीम यानी CERT-In को दी और फिर जो कुछ भी पता चला था, उसे X पर शेयर किया।

गल्फ न्यूज के मुताबिक उसने बताया, “दोनों प्लेटफॉर्म्स में घुसने में मुझे लगभग तीन से चार घंटे लगे। ऐसा करने के बाद, मैंने CERT-In को कमियों के बारे में बताया और फिर X (ट्विटर) पर इसके बारे में पोस्ट किया। इसी तरह लोगों को इसके बारे में पता चला।”

अनिल ने कहा कि उसने माता-पिता को भी कोई बात नहीं बताई थी। उन्हें भी हैकर की हेडलाइन से पता चला। उसके मुताबिक, पिता का बैकग्राउंड टेक का है, इसलिए उन्हें सब समझ आ गया और उन्हें काफी गर्व हुआ।

अनिल को क्या पता चला?

अनिल ने दो अलग-अलग तरह की कमियाँ पाई। JEE एडवांस्ड 2026 के मामले में समस्या पब्लिकली एक्सेस किए जा सकने वाले क्लाउड स्टोरेज के गलत कॉन्फ़िगरेशन की थी। बिना किसी ऑथेंटिकेशन के, बड़ी संख्या में उम्मीदवारों का डेटा ओपन था। इसमें 179600 रिजल्ट रिकॉर्ड और 187300 एडमिट-कार्ड PDF शामिल थे, जिनमें उम्मीदवारों के नाम, जन्म तिथि और मोबाइल नंबर मौजूद थे।

अनिल ने बताया, ” उन्होंने सभी रिजल्ट और एडमिट कार्ड एक ही सर्वर पर स्टोर किए थे, और उस सर्वर के सेटअप में ही गड़बड़ी थी। उसी गड़बड़ी का फायदा उठाकर वह सारा डेटा एक्सेस और हासिल कर पाया।”

NEET सिस्टम में एक अलग की समस्या थी। इसके सुपर-एडमिन पोर्टल पर बहुत कमजोर क्रेडेंशियल (लॉगिन जानकारी) का इस्तेमाल किया गया था। अनिल के मुताबिक, इन कमियों का फायदा उठाकर वह न सिर्फ छात्रों की गोपनीय जानकारी देख सकता था, बल्कि उनके माता-पिता के बारे में जानकारी ले सकता था।

अनिल ने अपनी खोज की जानकारी देते समय काफी सावधानी बरती। उन्होंने सार्वजनिक पोस्ट में निजी जानकारी और तस्वीरों को हटा दिया और बताया कि JEE के किसी भी उम्मीदवार का पूरा डेटा लीक नहीं हुआ था। उन्होंने केवल पुष्टि करने के मकसद से कुछ फाइलें डाउनलोड कीं और बाद में उन्हें डिलीट कर दिया।

CBSE की खामी को भी उजागर किया

अनिल ने न सिर्फ NEET और JEE को कमियों की जानकारी दी, बल्कि सीबीएसई का ऑनमार्क मूल्यांकन पॉर्टल की कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया। निसर्गा नाम के एक दूसरे एथिकल हैकर के साथ काम करते हुए, उन्होंने सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली और ऑनमार्क मूल्यांकन पोर्टल में खामी की पहचान की।

ये खामी बोर्ड परीक्षा के प्रश्न पत्रों को जाँचने से जुड़ा है। उन्होंने पाया कि कॉपी चेक करने वाले जाँचकर्ताओं के ईमेल, यूजर्स नाम, पासवर्ड, फोन नंबर, संस्थान विवरण और विषय आवंटन सभी अंदर घुसते ही मिल गए। अपने एक्सेस की वजह से वे इवैल्यूएटर अकाउंट्स तक पहुँच पाए, जहाँ स्कैन की गई आंसर स्क्रिप्ट और लाइव मार्किंग इंटरफेस उपलब्ध थे। उन्होंने इसकी जानकारी तुरंत CERT-In को दी। इसके बाद पोर्टल को ठीक करके ऑफलाइन कर दिया गया।

IITs, NTA ने तुरंत लिया संज्ञान

पोर्टल में कमियाँ उजागर होने के बाद अधिकारियों ने तुरंत प्रतिक्रिया दी, जिसकी अनिल ने तारीफ की। उनका कहना है कि IITs और NTA के आईटी स्टाफ ने अनिल से संपर्क करके उन्हें धन्यवाद दिया, और तकनीकी जानकारी माँगी। उन्होंने खामियों को दुरुस्त करने के लिए कदम उठाए। IIT रुड़की ने X पर सार्वजनिक रूप से इस खामी को स्वीकार किया।

अनिल ने कहा, “अब तक प्रतिक्रिया तारीफ़ करने वाली रही है। वे अब समस्याओं को हल करने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है कि वे बात सुनने के लिए तैयार हैं और समस्याओं को तेजी से हल भी कर रहे हैं।”

इसके बाद कई IITs (इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी) ने X पर आधिकारिक बयान जारी किए, जिनमें कहा गया कि उन्होंने उन उम्मीदवारों की मदद के लिए आपातकालीन तकनीकी सुधार किए जो अपने एडमिट कार्ड तक नहीं पहुँच पा रहे थे। इन सुधारों के कारण क्लाउड स्टोरेज सिस्टम में थोड़ी देर के लिए मामूली मिसकॉन्फिगरेशन हो गया था।

इसकी जानकारी भी अनिल ने ही दी। उन्होंने गलत कॉन्फिगरेशन की पहचान की और बताया कि वे संबंधित डेटाबेस को एक्सेस कर सकते हैं। इस समस्या को तुरंत ठीक कर दिया गया और डेटा तक एक्सेस को सीमित कर दिया गया।

अनिल अकेले ऐसे हैकर नहीं हैं। वह भारत में युवा एथिकल हैकर्स के एक छोटे लेकिन बढ़ते हुए नेटवर्क का हिस्सा हैं, जो देश के एजुकेशन टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर पर बारीक नजर रखे हुए हैं। अनिल का कहना है कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन और मेटा जैसी बड़ी कंपनियाँ कमियों का पहले से पता लगाने के लिए एथिकल हैकर्स को काम पर रखती हैं, उसी तरह भारत सरकार को चाहिए कि गलत हैकर्स के वहाँ तक पहुँचने से पहले बड़े प्लेटफॉर्म्स की कमियों को दूर करने के लिए वे एथिकल हैकर्स की मदद लें, ताकि सभी परीक्षाएँ निष्पक्ष और त्रुटिहीन हो सके।

इसमें कोई बदमाश हैकर सेंध लगा कर नुकसान न पहुँचा सके। पेपर लीक जैसी घटनाएँ न हो और रिएक्जाम का दंश छात्रों को न सहना पड़े।

NEET परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के विवाद के बाद NTA ने NEET UG 2026 परीक्षा रद्द की। इसके प्रश्न पत्र बनाने वाले कथित शिक्षकों से पूछताछ हो रही है। कई शहरों के तार इससे जुड़े हैं। ऐसा भी कहा जा रहा है कि 2025 में भी पेपर लीक हुए थे, इसकी जाँच भी की जा रही है। 2024 में पेपर लीक को लेकर काफी हँगामा हुआ था यानी यह एक बार की बात नहीं है। इससे परीक्षा की विश्वसनीयता खतरे में है। अब पोर्टल की ये कमी सामने आई है। एनटीए को ऐसी डिजिटल कमियों से भी जल्द से जल्द निपटना होगा।

अभी तक एनटीए ने क्या-क्या कदम उठाए हैं

NEET UG 2026 के रिएक्जाम को लेकर NTA ने इस बार परीक्षा की सुरक्षा, पारदर्शिता और छात्र-छात्राओं की सुविधाओं को लेकर कई बड़े कदम उठाए हैं। इनमें से अधिकांश कदम पेपर लीक विवाद और छात्रों की शिकायतों के बाद लागू किए गए हैं। 21 जून को होने वाली NEET UG 2026 की परीक्षा अवधि बढ़ाकर 195 मिनट (3 घंटे 15 मिनट) कर दी है। इससे छात्रों को प्रश्न हल करने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा।

क्वेश्चन पेपर को दोबारा डिजाइन किया गया है ताकि पढ़ने और उत्तर देने में आसानी हो। साथ ही रफ वर्क के लिए अधिक जगह भी दी गई है। फर्जी अभ्यर्थियों और डुप्लीकेट आवेदन रोकने के लिए आवेदन प्रक्रिया में Aadhaar e-KYC और Live Photo Capture अनिवार्य किया गया है। परीक्षा केंद्रों पर कई स्तर की सुरक्षा लागू की है, जिसमें बायोमेट्रिक सत्यापन, कड़ी जाँच, CCTV निगरानी और दूसरे सुरक्षा प्रोटोकॉल शामिल हैं। CCTV फुटेज को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाएगा।

देशभर में परीक्षा कर्मियों और केंद्र कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया, ताकि किसी भी स्तर पर लापरवाही न हो। सोशल मीडिया पर निगरानी रखी जा रही है। Telegram पर पेपर लीक की खबरों को देखते हुए इसपर अस्थायी प्रतिबंध 22 जून 2026 तक लगाया गया है। इसके अलावा Telegram के मैसेज-एडिटिंग फीचर को 30 जून 2026 तक बंद करने का निर्देश दिया गया है। NTA का कहना है कि पहले इस फीचर का इस्तेमाल कथित पेपर लीक के फर्जी सबूत बनाने और छात्रों को गुमराह करने के लिए किया गया था।

इस सब कवायद के बीच अहमदाबाद में बिहार के एक 19 साल के युवक को गिरफ्तार किया गया है। उस पर NEET पोर्टल पर लगभग 150 NEET उम्मीदवारों के अकाउंट्स को गैर-कानूनी तरीके से एक्सेस करके, उन्हें मिलने वाला रिफंड का पैसा अपने बैंक अकाउंट में ट्रांसफर करने का आरोप है। उसने बताया है कि NEET-UG उम्मीदवारों के अकाउंट्स का अनधिकृत एक्सेस पाने के लिए सिक्योरिटी की कमियों और कमजोर पासवर्ड्स का फायदा उठाया।

अब सरकार और परीक्षा करवाने वाली NTA और IITs को इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। JEE की परीक्षाओं में नकल भी एक बड़ी समस्या माना जा रही है। JEE Advance 2026 के रिजल्ट में छात्रों के दोनों पाली के नंबरों में बड़े अंतर पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

मध्यम वर्ग की उम्मीदें और NEET-JEE का दबाव

ये परीक्षाएँ सिर्फ एक बच्चे के सपनों को उड़ान नहीं देता, बल्कि पूरा परिवार गर्व से सीना ऊँचा कर घूमता है। यही वजह है कि परीक्षा में अच्छा परफॉर्म नहीं करने पर कई छात्र-छात्राएँ डिप्रेशन में भी चले जाते हैं। ऐसी स्थिति भी समाज के लिए ठीक नहीं है। इसलिए छात्रों को विश्वास होना चाहिए कि उनके साथ ‘न्याय’ होगा। ऐसे न्याय के लिए तकनीकी खामियों को ठीक करना बेहद जरूरी है। सार्थक सुझाव और तथ्य आधारित संवाद व्यवस्था में सुधार ला सकते हैं। छात्रों को केवल परीक्षार्थी के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।

भारत में NEET-JEE की तैयारी करने वाले अधिकांश छात्र मध्यम वर्गीय या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं। लाखों परिवार अपने बच्चों के डॉक्टर बनने के सपने को पूरा करने के लिए बचत करते हैं। उससे कोचिंग, स्टडी मटेरियल्स, हॉस्टल, आने-जाने का खर्चा समेत दूसरे खर्चों की तैयारी वर्षों से करते हैं। माता-पिता अपनी निजी जरूरतों की बातें नहीं करते, उन्हें तो बस बच्चों के सपने को उड़ान देनी होती है, वे अपने अहम खर्चों में भी कटौती करने से नहीं हिचकते।

ऐसी परिस्थितियों में छात्रों को बेहतर परीक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता और सुरक्षित परीक्षा केंद्र, समय पर जानकारी और मानसिक रूप से अनुकूल माहौल मिलना उनका अधिकार है। यदि परीक्षा प्रणाली में कोई कमी या अव्यवस्था होती है, तो उसका सबसे बड़ा बोझ उन्हीं छात्रों और परिवारों पर पड़ता है जिन्होंने वर्षों तक काफी मेहनत की है।

NEET जैसी परीक्षाओं की विश्वसनीयता केवल प्रश्नपत्र की गोपनीयता से तय नहीं होता, बल्कि छात्रों के अनुभव से तय होते हैं। इसलिए परीक्षा प्रक्रिया में की पारदर्शिता, सुरक्षित और सुविधाजनक परीक्षा केंद्र, शिकायतों का तुरंत समाधान करने की व्यवस्था जरूरी है।

अनिल जैसे छात्रों की कोशिश यह याद दिलाती है कि शिक्षा व्यवस्था तब बेहतर बनती है, जब छात्रों की आवाज को सम्मान दिया जाता है। आखिरकार जिन युवाओं के कंधों पर देश का भविष्य टिका हुआ है, उन्हें निष्पक्ष, पारदर्शी और छात्र-केंद्रित परीक्षा प्रणाली मिलनी ही चाहिए। NTA और IITs ने जिस तरह से अनिल की बातों को गंभीरता से लिया और सकारात्मक जवाब दिया, इससे पता चलता है कि ये संस्थाएँ अपने काम को लेकर बेहद संजीदा हैं और अपनी कमियों को सुनने के लिए भी तैयार हैं।

38 की उम्र में भी समय से आगे चल रहा है एक आदमी, जिसका नाम है- लियोनेल मेसी: FIFA World Cup 2026

कैनसस सिटी की उस रात, लगभग 69 हजार दर्शकों से भरे एरोहेड स्टेडियम में एक विश्व चैंपियन अपना अभियान शुरू करने उतरा था। लेकिन मैच खत्म होने तक चर्चा अर्जेंटीना की जीत की नहीं, उस आदमी की थी, जिसने दो दशकों से फुटबॉल को अपनी निजी कहानी बना रखा है।

16 जून 2026 की रात, जब अर्जेंटीना ने अल्जीरिया को 3-0 से हराया, तब स्कोरबोर्ड पर सिर्फ तीन गोल दर्ज हुए। इतिहास की किताबों में शायद इससे कहीं ज्यादा लिखा जाएगा। क्योंकि यह रात फिर एक बार लियोनेल मेसी (Lionel Messi) की थी।

एक स्टेडियम, जो अर्जेंटीना बन गया

अमेरिका के मिसौरी राज्य में स्थित एरोहेड स्टेडियम उस शाम किसी विदेशी मैदान की तरह नहीं लग रहा था। नीले-सफेद रंग की लहरें स्टैंड्स में इस तरह फैली थीं, मानो ब्यूनस आयर्स का कोई हिस्सा अटलांटिक पार कर यहाँ आ पहुँचा हो।

अल्जीरिया ने गेंद पर 52 प्रतिशत कब्जा रखा। आंकड़ों में देखने पर यह मुकाबला संतुलित लग सकता है। लेकिन फुटबॉल में कुछ आँकड़े झूठ बोलते हैं।

अल्जीरिया के शॉट्स ऑन टार्गेट: शून्य।
अर्जेंटीना के गोल: तीन।
और तीनों पर एक ही हस्ताक्षर: मेसी।

पहला गोल: जब समय पीछे लौट गया

17वें मिनट में रोड्रिगो डी पॉल ने लंबा पास डाला।

मेसी ने गेंद को नियंत्रित किया। तीन स्पर्श। एक नज़र। और फिर बॉक्स के बाहर से बाएँ पैर का ऐसा शॉट, जिसने हवा को चीरते हुए गोलपोस्ट का रास्ता चुना।

गोलकीपर लुका जिदान ने हाथ लगाया, लेकिन सिर्फ इतना कि गेंद की दिशा बदलने के बजाय उसकी सुंदरता बढ़ जाए। उस पल स्टेडियम में बैठे हजारों दर्शकों ने शायद एक साथ सोचा होगा: यह 2026 नहीं, 2012 का मेसी है। या शायद 2015 का।

या शायद वह मेसी, जो किसी कैलेंडर का मोहताज ही नहीं।

दूसरा गोल: महान खिलाड़ी सिर्फ सुंदर गोल नहीं करते

60वें मिनट में एलेक्सिस मैक एलिस्टर का शॉट आया। लुका जिदान ने बचाव किया। लेकिन महान खिलाड़ी वहीं होते हैं, जहाँ गेंद गिरती है।

रिबाउंड सीधे मेसी के पास पहुँचा और उन्होंने बिना किसी नाटक के गेंद को जाल में डाल दिया। यह वह गोल था, जो बताता है कि प्रतिभा सिर्फ कला नहीं, आदत भी होती है.. परफ़ेक्शन भी आदत होती है।

तीसरा गोल: और फिर कहानी पूरी हो गई

76वाँ मिनट। निकोलस गोंजालेज़ ने गेंद पीछे छोड़ी। बॉक्स के किनारे खड़े मेसी ने एक बार देखा और फिर बाएँ पैर से गेंद को डिफेंडरों के बीच से ऐसे निकाला, जैसे सुई धागे के बीच रास्ता बनाती है।

गेंद निचले कोने में गई। गोलकीपर स्थिर। डिफेंडर स्थिर। स्टेडियम विस्फोटित। हैट्रिक पूरी। और शायद फुटबॉल का सबसे पुराना सवाल भी; कि आखिर यह आदमी कब रुकेगा?

जिदान का बेटा और मेसी की कहानी

फुटबॉल कभी-कभी लेखकों से बेहतर पटकथाएँ लिखता है। अल्जीरिया के गोलपोस्ट के सामने खड़े थे Luca Zidane। उनके पिता Zinedine Zidane उस पीढ़ी के नायक थे, जिसने विश्व फुटबॉल पर राज किया। वहीं सामने खड़े थे मेसी।

दो युग एक ही फ्रेम में थे। और अंत में कहानी फिर उसी आदमी के नाम रही, जिसने लगभग हर युग को पार कर लिया है।

सिर्फ हैट्रिक नहीं, इतिहास भी

इस रात की सबसे बड़ी बात सिर्फ तीन गोल नहीं थे। यह मेसी का पहला विश्व कप हैट्रिक था।
यह उनका छठा विश्व कप है: पुरुष फुटबॉल के इतिहास में ऐसा करने वाले पहले खिलाड़ी।

उन्होंने विश्व कप में अपने गोलों की संख्या 16 तक पहुँचा दी और महान जर्मन स्ट्राइकर Miroslav Klose की बराबरी कर ली। 38 वर्ष की उम्र में विश्व कप हैट्रिक करने वाले सबसे उम्रदराज खिलाड़ी भी बन गए।

2006 में विश्व कप में पहला गोल।
2026 में विश्व कप में हैट्रिक।
बीच में 20 साल।
फुटबॉल के अधिकांश करियर शुरू होकर खत्म हो जाते हैं। लेकिन मेसी का अभी भी चल रहा है।

मगर अर्जेंटीना के लिए इसका क्या मतलब?

स्कोरलाइन कहती है कि अर्जेंटीना ने आसान जीत हासिल की। मैदान कहता है कि अर्जेंटीना अभी भी विश्व चैंपियन जैसी दिखती है। एनजो फर्नांडीज़, मैक एलिस्टर और डी पॉल के मिडफील्ड ने खेल को नियंत्रित रखा। अल्जीरिया ने बहादुरी दिखाई, लेकिन महरेज की टीम कोई वास्तविक खतरा पैदा नहीं कर सकी। और जब आपके पास मेसी जैसा खिलाड़ी हो, तो अकसर इतना ही काफी होता है।

आखिरी दृश्य

80वें मिनट में मेसी को मैदान से बाहर बुलाया गया। पूरा स्टेडियम खड़ा हो गया। तालियाँ गूँजती रहीं। कुछ खिलाड़ी करियर बनाते हैं। कुछ ट्रॉफियाँ जीतते हैं। कुछ रिकॉर्ड तोड़ते हैं।

और फिर कुछ दुर्लभ लोग होते हैं, जिनके लिए स्टेडियम खड़ा हो जाता है, क्योंकि दर्शकों को एहसास होता है कि वे सिर्फ मैच नहीं देख रहे। वे इतिहास को गुजरते हुए देख रहे हैं। 16 जून 2026 की रात, कैनसस सिटी में, फुटबॉल ने फिर याद दिलाया:

विश्व कप बदलते रहते हैं।
महान टीमें आती-जाती रहती हैं।
लेकिन मेसी की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है।