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उल्टा ‘तिरंगा’ पकड़ महबूबा मुफ्ती ने किया अनुच्छेद 370 का विरोध, पहले भी ‘जय हिंद’ बोलने पर दिखा चुकीं घृणा: जानिए राष्ट्रध्वज के अपमान पर क्या है सजा?

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और PDP प्रमुख महबूबा मुफ्ती का भारत विरोधी और राष्ट्र विरोधी रवैया किसी से छिपा नहीं है। वे अक्सर ऐसे कृत्यों में लिप्त नजर आती हैं जिससे देश की भावनाओं को ठेस पहुँचे। 5 अगस्त के दिन को वे हमेशा से ‘काला दिवस’ के रूप में मनाती आई हैं और अनुच्छेद 370 को वापस लिए जाने के विरोध में प्रदर्शन करती रही हैं।

लेकिन इस बार उन्होंने विरोध के नाम पर जो हरकत की, उसने देशवासियों का खून खौला दिया। श्रीनगर में अपनी पार्टी ऑफिस के बाहर प्रदर्शन के दौरान महबूबा मुफ्ती ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को उल्टा पकड़ रखा था। उनके इस शर्मनाक कृत्य का Video सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया और उनकी मानसिकता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।

महबूबा मुफ्ती के इस कृत्य को महज एक गलती नहीं माना जा सकता है क्योंकि उनका पुराना ट्रैक रिकॉर्ड हमेशा से भारत विरोधी बयानों से भरा रहा है। चाहे भारतीय वायु सेना की एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाना हो, एयर इंडिया के ‘जय हिंद‘ बोलने वाले सर्कुलर पर तंज कसना हो या फिर देश के राष्ट्रीय प्रतीकों का अनादर करना हो, उन्होंने हर मौके पर अपनी ओछी मानसिकता का परिचय दिया है।

आपको बता दें कि आज ही के दिन 5 अगस्त को मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 को हटाया था और ये देश के लिए एक इतिहास रचने जैसा था, जिससे करोड़ों देशवासियों को इस काले कानून से राहत मिली थी। लेकिन कुछ वामपंथी और कट्टरपंथी विचारधारा के लोगों को ये बात हजम नहीं हुई थी, उन्होंने बड़े लेवल पर इसका विरोध किया था। कश्मीर में महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला आदि पार्टी के लोगों ने जमकर बवाल मचाया था। लेकिन कश्मीर की जमीन पर कितने नागरिकों को 370 हटाए जाने से खुशी मिली थी, उससे महबूबा मुफ्ता को कोई लेना-देना नहीं था।

आज भी वहीं रवैया देखने को मिल रहा है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर महबूबा मुफ्ती इसे काला कानून बताती है। इसके अलावा, महबूबा मुफ्ती का एक वीडियो भी आपको देखने को मिलेगा, जिसमें वे तिरंगे को उल्टा पकड़कर विरोध प्रदर्शन करती नजर आ रही है। इससे यह साफ साबित करता है कि उनके दिल में देश के सम्मान के प्रति कितनी नफरत और लापरवाही भरी पड़ी है।

तिरंगे का अपमान करने पर क्या सजा मिलती है?

हमारे देश के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का अपमान करना एक बेहद गंभीर और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आता है। भारत के संविधान और कानूनों के तहत राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान को बनाए रखने के लिए बेहद सख्त नियम तय किए गए हैं। राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत कोई भी व्यक्ति यदि राष्ट्रीय ध्वज या संविधान का अपमान करता है, उसे विकृत करता है, जलाता है या जानबूझकर उसका अनादर करता है, तो उसे सख्त सजा दी जाती है। इस कानून की धारा 2 के तहत दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की कैद या भारी जुर्माना अथवा दोनों से दंडित किए जाने का प्रावधान है।

भारतीय ध्वज संहिता, 2002 के अनुसार भी तिरंगे को फहराने, इस्तेमाल करने और इसके आकार-प्रकार को लेकर कड़े नियम बनाए गए हैं। इसके मुताबिक तिरंगे का आकार हमेशा आयताकार होना चाहिए और इसकी लंबाई-चौड़ाई का अनुपात 3:2 होना चाहिए। तिरंगे को कभी भी कटा-फटा, गंदा या उल्टा नहीं फहराया जा सकता है। इसके अलावा ध्वज पर कुछ भी लिखना, इसे जमीन पर छूने देना या इसे किसी अन्य रूप में इस्तेमाल करना भी कानूनी अपराध है। महबूबा मुफ्ती ने जो तिरंगे को उल्टा पकड़ा है, वे सीधे तौर पर राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम के नियमों का खुला उल्लंघन है और इस पर कानूनी कार्रवाई की माँग सोशल मीडिया पर लगातार जोर पकड़ रही है।

सोशल मीडिया पर महबूबा मुफ्ती के खिलाफ जनता का गुस्सा

इस पूरी घटना के सामने आने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जनता का गुस्सा फूट पड़ा है और लोग महबूबा मुफ्ती को जमकर खरी-खोटा सुना रहे हैं। कुछ लोग महबूबा मुफ्ती को तिरंगा पकड़ना सीखा रहे हैं, तो कुछ लोग इसे भारत विरोधी कारनामा बता रहे हैं। इसके अलावा, अन्य लोगों ने महबूबा मुफ्ती को ‘सजा होनी चाहिए’ जैसी माँग उठाई है।

यूजर सुरभि तिवारी ने तीखा तंज कसते हुए लिखा, “मैडम महबूबा मुफ्ती (@MehboobaMufti) पहले झंडा सीधा तो पकड़ना सीख लीजिए…”

अन्य यूजर पॉलिटिकल कीड़ा ने लिखा, “एक बार जो राष्ट्रविरोधी होता है, वह हमेशा राष्ट्रविरोधी ही रहता है। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती को भारतीय झंडा उल्टा पकड़े हुए देखा गया है। भारत के खिलाफ जहर उगलने के उनके पुराने ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, यह कोई गलती नहीं बल्कि भारत का मजाक उड़ाने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास है।”

इसके अलावा, एक यूजर शोभित अग्रवाल ने लिखा, “ध्यान से देखिए ये वो ही महबूबा मुफ्ती है जो कुछ दिन पहले जंतर मंतर पर छात्रों के आंदोलन के नाम पर कश्मीर में धारा 370 हटने का विरोध कर रही थी। ये वो ही महबूबा मुफ्ती है जिनको भारत के राष्ट्रीय ध्वज तक का ज्ञान नहीं। राष्ट्रीय ध्वज का अपमान कर महबूबा मुफ्ती ने फिर साबित किया है कि मानसिकता सदैव भारत विरोधी थी, भारत विरोधी है और हमेशा रहेगी भी।”

यूजर स्मृति शर्मा ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “लोगों को तिरंगे को अत्यधिक सम्मान के साथ पकड़ना सीखना चाहिए और भारत के ध्वज संहिता का कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिए। महबूबा मुफ्ती जैसी वरिष्ठ राजनीतिक नेता को राष्ट्रीय ध्वज उल्टा पकड़े हुए देखना बेहद निराशाजनक है। सार्वजनिक हस्तियों की जिम्मेदारी होती है कि वे सही उदाहरण पेश करें।”

5 अगस्त का ऐतिहासिक दिन और मोदी सरकार द्वारा आर्टिकल 370 की समाप्ति

अब जान लेते है कि जिस 5 अगस्त को महबूबा मुफ्ती ‘काला दिन’ बताती है, उस दिन क्या हुआ था। दरअसल, केंद्र की मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को एक बेहद ऐतिहासिक और साहसिक कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 और 35A को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया था। आर्टिकल 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर पूरी तरह भारत के बाकी राज्यों की तरह संविधान के दायरे में आ गया था। दशकों से जिस स्पेशल स्टेटस की आड़ में कुछ राजनीतिक दल अपनी रोटियाँ सेकते रहे थे और अलगाववाद को बढ़ावा देते रहे थे, मोदी सरकार ने उस दीवार को हमेशा के लिए गिरा दिया था। इस ऐतिहासिक फैसले को लिए अब पूरे 7 साल हो चुके हैं और यह निर्णय देश की अखंडता और संप्रभुता के लिए मील का पत्थर साबित हुआ है।

आर्टिकल 370 हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर की तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है। जिस घाटी में कभी आतंकवाद और अलगाववाद का बोलबाला था, आज वहाँ शांति और विकास की बयार बह रही है। लेकिन ये सब महबूबा मुफ्ती को क्यों ही पसंद आएगी। मोदी सरकार के इस मास्टरस्ट्रोक ने यह साबित कर दिया कि देशहित में कड़े फैसले कैसे लिए जाते हैं। महबूबा मुफ्ती जैसे नेता जो इस ऐतिहासिक बदलाव को पचा नहीं पा रहे हैं, वे आज भी ओछी राजनीति करने पर आमादा हैं, जबकि आम कश्मीरी जनता विकास के रास्ते पर आगे बढ़ चुकी है।

आर्टिकल 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में आए बड़े बदलाव

अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद से जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बहुत अच्छी हो गई है। घाटी में पत्थरबाजी, हड़ताल और आतंकी घटनाएं अब ना के बराबर होती हैं। इससे आम लोगों का जीवन पूरी तरह से सुरक्षित और सामान्य हो गया है।

इलाके में विकास की रफ्तार तेज हुई है। उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक और दुनिया के सबसे ऊँचे चिनाव रेल पुल जैसी बड़ी परियोजनाओं से यहाँ की कनेक्टिविटी मजबूत हुई है। साथ ही, दूर-दराज के गाँवों को भी पक्की सड़कों के जरिए मुख्य शहरों से जोड़ा जा रहा है।

अब देश के सारे कानून सीधे तौर पर जम्मू-कश्मीर में भी लागू होते हैं। इससे महिलाओं, दलितों, एससी और एसटी वर्गों को उनके हक और आरक्षण का पूरा लाभ मिलने लगा है। समाज के हर वर्ग को आगे बढ़ने का बराबर मौका मिल रहा है।

घाटी में देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। इससे होटल, टैक्सी और हस्तशिल्प (हैंडीक्राफ्ट) जैसे स्थानीय कारोबारों को नई ताकत मिली है। इन सभी बदलावों से आम लोगों की कमाई और प्रति व्यक्ति आय में भी अच्छी खासी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

सूरज पर अध्ययन करते देखना चाहती थीं माँ, बेटी ने तारों के रहस्य सुलझाए: जानिए कौन हैं डॉ अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम, ‘COSPAR विक्रम साराभाई मेडल’ पाने वाली बनीं पहली भारतीय महिला

इटली के फ्लोरेंस शहर में आयोजित 46वीं COSPAR (अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति) की साइंटिफिक असेंबली में 3 अगस्त 2026 को भारत के लिए गौरवान्वित करने वाला क्षण आया जब हमारे देश की जानी-मानी खगोल वैज्ञानिक (Astrophysicist) प्रोफेसर अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम को वैश्विक मंच पर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

उन्हें विकासशील देशों में अंतरिक्ष विज्ञान को बढ़ावा देने और शानदार काम करने के लिए ‘विक्रम साराभाई मेडल 2026’ दिया गया। यह सम्मान पाकर उन्होंने अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में भारत का नाम एक बार फिर रौशन किया।

अपने ट्वीट में उन्होंने इस सम्मान को पाने की खुशी भी जाहिर की और तस्वीरें भी साझा की।

ISRO और COSPAR द्वारा संयुक्त रूप से दिया जाने वाला यह पदक हासिल करने वाली वह पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक और दुनिया की केवल तीसरी महिला वैज्ञानिक बनी हैं।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि उन्हें स्टेलर फिजिक्स, ब्लू स्ट्रैगलर स्टार्स, एस्ट्रोसैट मिशन और खगोलीय उपकरणों के विकास में योगदान देने के कारण वैश्विक मंच पर यह सम्मान मिला।

भारत में किन लोगों को मिला है ये सम्मान

भारत में अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम के अलावा अब तक यह सम्मान तीन ही लोगों को मिला है। इनमें सबसे पहला नाम प्रोफेसर यूआर राव (1996) का है। 1990 में इस मेडल की स्थापना के बाद इसरो के पूर्व अध्यक्ष और प्रख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक प्रोफेसर पहले भारतीय थे जिन्हें ये मेडल मिला।

इसके बाद 2014 में गुरबक्ष सिंह लखीना को ये सम्मान स्पेस प्लाज्मा और स्पेस वेदर फिजिक्स के क्षेत्र में योगदान के लिए यह मेडल मिला था। साल 2024 में यह सम्मान डॉक्टर अनिल भारद्वाज को उन्हें अंतरिक्ष विज्ञान और ग्रह अन्वेषण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए दिया गया था।

डॉ अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम का परिचय

डॉ अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम का जन्म केरल के पलक्कड़ जिले के एक सुसंस्कृत परिवार में हुआ था। विज्ञान के प्रति गहरे आकर्षण के कारण उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज, पलक्कड़ से फिजिक्स में स्नातक की पढ़ाई पूरी की।

इसके बाद उन्होंने भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA), बेंगलुरु का रुख किया, जहाँ से 1996 में ‘स्टार क्लस्टर और तारकीय विकास’ विषय पर अपनी पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

विज्ञान के प्रति उनकी लगन जितनी गहरी है, उतनी ही रुचि उनकी कला में भी है। वह स्वयं एक अत्यंत कुशल कर्नाटक संगीत वायलिन वादक हैं। इसके अलावा उनकी व्यावसायिक और वैज्ञानिक यात्रा अत्यंत प्रेरणादायक रही है।

1990 के दशक में IIA में एक रिसर्च फेलो के रूप में प्रवेश करने वाली अन्नपूर्णी ने अपनी प्रतिभा के बल पर प्रोफेसर और अंततः संस्थान के 50 से अधिक वर्षों के इतिहास में पहली महिला निदेशक बनने का गौरव प्राप्त किया।

प्रोफेसर सुब्रमण्यम की उपलब्धियाँ

अपने शोध में उन्होंने मुख्य रूप से तारागुच्छों, मैगेलैनिक क्लाउड्स और हमारी आकाशगंगा की जटिल संरचनाओं का अध्ययन किया।

पुराने तारा समूहों में पाए जाने वाले असामान्य रूप से गर्म और युवा दिखाई देने वाले ‘ब्लू स्ट्रैगलर स्टार्स’ के रहस्य को सुलझाने में उनके शोध पत्रों ने वैश्विक स्तर पर नया दृष्टिकोण दिया।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष मिशनों में भी उनकी भूमिका निर्णायक रही। भारत की पहली समर्पित अंतरिक्ष वेधशाला AstroSat (2015) के मुख्य पेलोड ‘अल्ट्रावॉयलेट इमेजिंग टेलीस्कोप’ (UVIT) को सटीक बनाने में उन्होंने बतौर ‘कैलिब्रेशन वैज्ञानिक’ केंद्रीय भूमिका निभाई, जिसके कारण बाद में वैज्ञानिकों को तारों की उत्पत्ति को पराबैंगनी प्रकाश में समझने में सफलता मिली।

इसके अतिरिक्त, वह बहु-अरब डॉलर की अंतर्राष्ट्रीय ‘थर्टी मीटर टेलीस्कोप’ (TMT) परियोजना में भारत के वैज्ञानिक दल का नेतृत्व कर रही हैं।

वर्ष 2024 में भारत सरकार द्वारा उन्हें अंतरिक्ष विज्ञान में असाधारण योगदान के लिए सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मानों में से एक ‘विज्ञान श्री’ से सम्मानित किया गया था।

वह ‘इण्डियन एकेडमी ऑफ साइंसेज’ (IAS) की फेलो और ‘इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन’ (IAU) की सक्रिय सदस्य हैं।

‘माँ ने कहा था सूरज पर करूँ अध्य्यन’

साल 2024 में एक इंटरव्यू में एक बार उन्होंने बचपन का किस्सा सुनाते हुए बताया था कि कैसे बचपन से ही तारों से भरे आसमान के प्रति उनके आकर्षण ने उन्हें खगोल वैज्ञानिक बनने की प्रेरणा दी।

शुरुआत में उनके माता-पिता दूरदराज की प्रयोगशालाओं में अकेले काम करने को लेकर चिंतित थे, यहाँ तक कि उनकी माँ ने मजाकिया अंदाज में उनसे सूरज का अध्ययन करने को कहा था ताकि उन्हें रात में काम न करना पड़े।

हालाँकि अन्नपूर्णी तारों का रहस्य खोजने में खुद को समर्पित कर चुकी थीं। उनके लिए खगोल विज्ञान केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के अनोखे रहस्यों का जवाब तलाशने का जरिया बन गया था।

क्यों भारत के लिए खास है ये सम्मान

गौरतलब हो कि एक भारतीय महिला होने के नाते डॉ अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम की यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलताओं का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित के क्षेत्रों में बनी लैंगिक रूढ़िवादिता को चकनाचूर करने वाली मिसाल है।

केरल के एक छोटे शहर से शुरू होकर दुनिया के सबसे बड़े खगोलीय मंचों और वेधशालाओं तक पहुँचने का उनका यह सफर भारत की लाखों युवा बेटियों को यह विश्वास दिलाता है कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो पलक्कड़ से निकलकर इटली में वैश्विक सम्मान पाने की यात्रा असंभव नहीं है।

COSPAR क्या है?

COSPAR का पूरा नाम ‘कमेटी ऑन स्पेस रिसर्च’ (Committee on Space Research) है। यह दुनिया भर के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है, जिसकी स्थापना 1958 में अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान परिषद (ISC) द्वारा की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया में शांतिपूर्ण अंतरिक्ष अनुसंधान और वैज्ञानिक जानकारियों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है।

संगठन हर दो साल में अपने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान दुनिया भर के उन वैज्ञानिकों को सम्मानित करता है, जिन्होंने अंतरिक्ष तकनीक, नई खगोलीय खोजों और विभिन्न देशों के बीच वैज्ञानिक सहयोग में असाधारण योगदान दिया हो।

इसी कॉस्पर सम्मानों की श्रृंखला में ‘विक्रम साराभाई मेडल’ एक प्रमुख और बेहद खास अंतरराष्ट्रीय पदक है। यह सम्मान कॉस्पर और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO द्वारा संयुक्त रूप से प्रदान किया जाता है।

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ विक्रम साराभाई की याद में शुरू किया गया यह पदक विशेष रूप से उन वैज्ञानिकों को दिया जाता है, जिन्होंने विकासशील देशों में अंतरिक्ष विज्ञान और अनुसंधान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई हो।

‘गाय काटेंगे और बस स्टैंड पर ही बीफ बेचेंगे’: SDPI के रियाज फरंगीपेट को अदालत ने सुनाई कारावास, जानिए कट्टरपंथी नेता से जुड़े हैं कौन-कौन से विवाद

कर्नाटक की बेल्थांगडी (Belthangady) की एक अदालत ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के राष्ट्रीय महासचिव रियाज फरंगीपेट (Riyaz Farangipete) को जेल की सजा सुनाई है।

कोर्ट ने यह फैसला जुलाई 2015 के एक भड़काऊ भाषण के मामले में रियाज को दोषी करार देते हुए दिया। हेट स्पीच मामले में उसे 6 महीने के कारावास और 10,000 रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई गई है।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि रियाज का वह भाषण दो समुदायों के बीच शांति भंग करने की क्षमता रखता था और ऐसे कृत्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इसके बाद मजिस्ट्रेट रामलिंगप्पा ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A के तहत दोषी पाए जाने पर सजा का आदेश सुनाया और फिर जेल की काटने के लिए फरंगीपेट को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

गाय काटने पर दिया था विवादित बयान

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस की चार्जशीट में बताया गया है कि जुलाई 2015 में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के एक विरोध प्रदर्शन के दौरान रियाज ने भड़काऊ बयान देते हुए कहा था कि यदि गाय के नाम पर मुसलमानों पर हमले बंद नहीं हुए, तो PFI कार्यकर्ता सार्वजनिक रूप से गाय काटेंगे और बीफ बेचेंगे।

उसने चुनौती देते हुए कहा था कि आगामी बकरीद पर बेल्थांगडी बस स्टैंड के सामने बीफ बेचा जाएगा और इसे रोकने जो भी आएगा, कार्यकर्ताओं द्वारा उसे करारा जवाब दिया जाएगा।

पुलिस ने इसी भाषण को धार्मिक भावनाओं भड़काने और दो समुदायों के बीच शत्रुता पैदा करने वाला मानते हुए आईपीसी की धारा 153A और 295A के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।

कौन है रियाज फरंगीपेट (Riyaz Farangipete)

बता दें कि रियाज कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में अपने आपको राजनेता बताते हुए सक्रिय है। उसे सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) में राष्ट्रीय महासचिव का पद मिला हुआ है। वही SDPI जिसको व्यापक रूप से भारत में प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की राजनीतिक शाखा माना जाता रहा है।

सरकार ने सितंबर 2022 में गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत पीएफआई पर 5 साल का बैन लगाया था। मगर, SDPI के राजनैतिक पार्टी होने के मुखौटे के कारण ये प्रतिबंध से अलग रहा।

आज SDPI खुद को एक स्वतंत्र राजनीतिक दल बताता है, लेकिन जाँच एजेंसियों के अनुसार पूर्व PFI कैडर गतिविधियाँ चलाने के लिए SDPI में शामिल होते रहे हैं।

CAA-NRC विरोध प्रदर्शनों में लोगों को भड़काने में था रियाज का हाथ

दिसंबर 2019 में मेंगलुरु में जब नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए थे, उस समय रियाज फरंगीपेट और एक अन्य SDPI नेता पर धारा 144 लागू होने के बावजूद व्हाट्सएप संदेशों के जरिए लोगों को भड़काने का आरोप लगा था।

बाद में पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत देशद्रोह (धारा 124A) और धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने का मामला दर्ज किया गया था।

प्रधानमंत्री की रैली से पहले रची साजिश

सितंबर 2022 में, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने मेंगलुरु के बाहरी इलाके बीसी रोड स्थित रियाज के आवास पर छापा मारा था। यह छापेमारी जुलाई 2022 में बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक रैली के बीच गड़बड़ी पैदा करने की साजिश से जुड़े एक मामले में की गई थी।

चूँकि रियाज उस समय SDPI का बिहार प्रभारी था, इसलिए NIA ने उससे घंटों पूछताछ की और कुछ दस्तावेज व मोबाइल फोन जब्त किए थे। रियाज ने बाद में इस मामले को भाजपा सरकार के इशारे पर दर्ज किया गया ‘फर्जी मामला’ बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की थी।

पाकिस्तानी नारे लगाने वालों का करता है बचाव

जनवरी 2021 में, दक्षिण कन्नड़ में पंचायत चुनावों की मतगणना के दौरान कुछ SDPI सदस्यों पर पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने का आरोप लगा था। रियाज ने उस समय इन सदस्यों बचाव करते हुए पुलिस को चेतावनी दी थी कि अगर गिरफ्तार सदस्यों को नहीं छोड़ा गया तो वे लोग हंगामा करेंगे। बाद में जब कार्रवाई नहीं रुकी तो पार्टी सदस्यों ने दावा किया था कि वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई थी और यह मुसलमानों को फँसाने के लिए ‘संघ परिवार’ की साजिश थी।

SIR पर फैलाता है भ्रम

18 जुलाई 2026 को SDPI अकॉउंट से साझा वीडियो में रियाज, SIR की प्रक्रिया पर भ्रम फैलाता भी देखा गया। वीडियो में उसने बताया कि इस प्रक्रिया पर ज्यादा विश्वास नहीं करना है क्योंकि भाजपा इसका इस्तेमाल चुनाव जीतने के लिए कर रही है। उसने वीडियो में ये फैलाया कि बिहार से लेकर बंगाल तक में वोटर्स के नाम को काटा गया है और भाजपा वाले लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव नहीं जीत रहे।

SDPI से जुड़े लोगों के कारनामे

बता दें कि रियाज का मामला अकेला नहीं है, SDPI और उससे कट्टरपंथी लगातार कई गंभीर कानूनी विवादों, सांप्रदायिक तनाव भड़काने और देश विरोधी गतिविधियों के आरोपों में घिरे रहे हैं।

SDPI को प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की राजनीतिक शाखा माना जाता है, जिसके कैडरों पर असम सहित देश भर में देशविरोधी गतिविधियों के तहत पुलिस और NIA की कार्रवाइयाँ होती रही हैं। 2023 में असम पुलिस ने 2 संदिग्धों को गिरफ्तार किया था। बाद में पता चला कि ये पीएफआई बैन होने के बाद SDPI से जुड़े थे।

पार्टी पर हिंसा और गंभीर अपराधों के आरोपितों को राजनीतिक संरक्षण देने का आरोप है। इसका उदाहरण कर्नाटक में BJYM नेता प्रवीण नेट्टारू की निर्मम हत्या के आरोपित शफी बेल्लारे को जेल में रहने के बावजूद विधानसभा चुनाव का टिकट देना है।

इसके अतिरिक्त, तमिलनाडु के प्रसिद्ध मुरुगन मंदिर परिसर के पास कुर्बानी की कोशिश कर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की साजिश में भी SDPI का नाम आया था। बाद में हिंदू संगठनों के विरोध के बाद पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और इसे धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने और उकसावे की साजिश माना गया।

इसी तरह हिंदू माँ-बेटी के धर्मांतरण के मामलों में पूर्व SDPI सदस्यों पर FIR, और ज्ञानवापी फैसले पर वाराणसी के जज के खिलाफ कर्नाटक में अपमानजनक पोस्ट करने जैसे मामले SDPI की करतूतों को नमूना हैं।

जयललिता से तृषा कृष्णन तक: कैसे तमिलनाडु की राजनीति में बार-बार निशाने पर आईं महिलाएँ

तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से बहुत तीखी और खतरनाक लड़ाइयों के लिए जानी जाती रही है। यहाँ पार्टियों के बीच का झगड़ा कई बार सारी हदें पार कर जाता है। राजनीति का यह गंदा रूप कई बार महिलाओं को सीधे तौर पर निशाना बना चुका है। करीब 36 साल पहले, 25 मार्च 1989 को तमिलनाडु विधानसभा में एक ऐसी घटना हुई थी, जिसे आज भी राज्य के राजनीतिक इतिहास के सबसे बड़े विवादों में गिना जाता है। उस दिन तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष जे जयललिता फटी हुई साड़ी, बिखरे बाल और चोट के निशानों के साथ विधानसभा से बाहर निकली थीं।

अब एक बार फिर तमिलनाडु की राजनीति में एक महिला का नाम चर्चा में है। इस बार विवाद अभिनेत्री तृषा कृष्णन से जुड़ा है। डीएमके के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन के एक कथित दोहरे अर्थ वाले बयान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह टिप्पणी तृषा कृष्णन को निशाना बनाकर की गई थी।

दोनों घटनाएँ पूरी तरह अलग हैं। एक मामला विधानसभा के अंदर कथित शारीरिक हमले से जुड़ा था, जबकि दूसरा एक राजनीतिक मंच से दिए गए बयान को लेकर है। लेकिन दोनों मामलों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि तमिलनाडु की राजनीति में महिलाओं का नाम बार-बार विवादों में क्यों आता है।

वह काला दिन जिसने बदल दिया जयललिता का जीवन

यह कहानी 25 मार्च 1989 की है जो विधानसभा के इतिहास का सबसे काला दिन माना जाता है। उस समय जे जयललिता की उम्र 41 साल थी और वह विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थीं। बजट सत्र के दौरान उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की सरकार पर जमकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।

इन आरोपों के बाद सदन के भीतर अचानक भयंकर हंगामा शुरू हो गया। एआईएडीएमके (AIADMK) और डीएमके विधायकों के बीच हाथापाई और तीखी झड़प होने लगी। इस पूरी अराजकता के दौरान जयललिता पर गंभीर शारीरिक हमले किए गए।

जयललिता ने बाद में खुद यह आरोप लगाया कि उन पर सदन के अंदर हमले किए गए थे। उनके अनुसार, विधायकों ने उनकी तरफ चीजें फेंकी थीं। जब पार्टी के दूसरे विधायक उन्हें सुरक्षित बाहर ले जा रहे थे, तब एक DMK मंत्री ने उनकी साड़ी खींच दी थी।

घटना के बाद जब जयललिता विधानसभा के मुख्य दरवाजे से बाहर आईं, तो उनका हाल बहुत बुरा था। उनकी साड़ी जगह-जगह से फटी हुई थी और उनके बाल पूरी तरह बिखरे हुए थे। उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे और शरीर पर चोट के निशान साफ दिख रहे थे।

यह दिल दहला देने वाला दृश्य पूरे देश की मीडिया की बड़ी सुर्खियाँ बन गया। तमिलनाडु की राजनीति में यह तस्वीर आज भी सबसे बड़ी और यादगार तस्वीरों में गिनी जाती है। इस अपमान के बाद जयललिता ने वहीं सबके सामने एक बहुत बड़ी कसम खाई थी।

उन्होंने गुस्से में ऐलान किया था कि वह विधानसभा के अंदर अब दोबारा कभी कदम नहीं रखेंगी। उन्होंने कहा था कि वह सदन में तभी लौटेंगी जब वह खुद इस राज्य की मुख्यमंत्री बनेंगी। अपनी इस जिद को उन्होंने सच करके भी दिखाया।

सिर्फ दो साल में पूरा किया अपना संकल्प

जयललिता ने हार नहीं मानी और जनता के बीच जाकर इस अपमान का बदला लेने की ठानी। जनता का भारी समर्थन उनके साथ आ खड़ा हुआ। इसका नतीजा यह हुआ कि सिर्फ दो साल बाद यानी 1991 में चुनाव हुए।

उन्होंने अपनी पार्टी एआईएडीएमके (AIADMK) को बहुत बड़ी और प्रचंड जीत दिलाई। इसके बाद उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालकर अपना संकल्प पूरा कर लिया। वह दिन उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़ साबित हुआ था।

1989 की घटना पर दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे

उस ऐतिहासिक दिन क्या हुआ था, इसको लेकर दोनों पार्टियों के अपने-अपने दावे रहे हैं। जयललिता जिंदगी भर यही कहती रहीं कि उनके साथ विधानसभा के अंदर बहुत बड़ी बदसलूकी और मारपीट की गई थी।

दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री एम करुणानिधि और उनकी पार्टी ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था। उनका कहना था कि उनके विधायक पूरी तरह शांत बैठे थे। उन्होंने उल्टा विरोधी पार्टी के विधायक केए सेंगोट्टैयन पर गंभीर आरोप लगाए थे।

करुणानिधि का दावा था कि एआईएडीएमके विधायक ने ही उन पर हमला किया था और उनका चश्मा तोड़ दिया था। चाहे जो भी सच रहा हो, लेकिन उस दिन की घटना ने हमेशा के लिए इतिहास में अपनी एक अलग और डरावनी जगह बना ली है।

तृषा कृष्णन और उदयनिधि स्टालिन का नया विवाद

अब आते हैं आज के समय के ताजा विवाद पर जो कावेरी नदी के पानी के बँटवारे को लेकर शुरू हुआ था। डीएमके पार्टी ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन रखा था, जिसमें पार्टी के बड़े नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन भी शामिल थे।

इस रैली के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने सरकार पर निशाना साधते हुए कुछ ऐसा कहा जिससे नया बवंडर खड़ा हो गया। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि भीड़ में मौजूद कुछ लोग लगातार मशहूर अभिनेत्री तृषा कृष्णन का नाम ले रहे हैं।

राजनीतिक विरोधियों और सोशल मीडिया के लोगों ने इस बात को तुरंत पकड़ लिया। लोगों का मानना था कि यह बयान मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय और अभिनेत्री तृषा के बीच चल रही पर्सनल चर्चाओं पर एक गंदा तंज था।

सफाई के बाद भी नहीं थमा विवाद

जब इस बयान पर चारों तरफ हंगामा मचने लगा, तो उदयनिधि स्टालिन ने तुरंत अपनी सफाई पेश की। उन्होंने कहा कि उनका मतलब कावेरी नदी से था, किसी और चीज से नहीं। लेकिन उनकी यह सफाई आग को बुझा नहीं पाई।

उनकी इस टिप्पणी की राजनीतिक गलियारों में बहुत तीखी आलोचना हुई। सत्तारूढ़ TVK पार्टी ने इसे महिलाओं का खुला अपमान बताया और नेशनल कमीशन फॉर वुमन यानी राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) में इसकी लिखित शिकायत दर्ज कराई।

तमिलनाडु की भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी इस बयान को बेहद अश्लील और घटिया बताया। उन्होंने माँग की कि इस तरह की भाषा बोलने वाले नेता के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

महिलाओं को लेकर पहले भी विवादों में रहे हैं उदयनिधि

तृषा कृष्णन को लेकर हुआ यह विवाद कोई पहला मौका नहीं है जब उदयनिधि स्टालिन महिलाओं पर दिए गए बयानों से फंसे हों। इससे पहले भी वह कई बार ऐसे बयानों के कारण आलोचना झेल चुके हैं।

कुछ समय पहले जब वह मुख्यमंत्री जोसेफ विजय पर हमला बोल रहे थे, तब उन्होंने विजय की पत्नी संगीता सोर्नालिंगम का नाम भी बीच में घसीट लिया था। उन्होंने उनके निजी जीवन से जुड़ी खबरों को अपने राजनीतिक भाषण का मुख्य हिस्सा बनाया था।

उस समय भी विपक्ष ने उन पर यह गंभीर आरोप लगाया था कि वह अपनी राजनीतिक लड़ाई जीतने के लिए परिवार की महिलाओं को बीच में लेकर आते हैं। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी ऐसा ही देखने को मिला था।

शशिकला का नाम लेकर भी उठाए थे सवाल

2021 के चुनाव प्रचार के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने तत्कालीन मुख्यमंत्री एडप्पडी के पलानीस्वामी पर जमकर निशाना साधा था। उस भाषण में उन्होंने वी के शशिकला का नाम जबरदस्ती बीच में घसीट लिया था।

उन्होंने शशिकला का नाम लेकर उनकी राजनीतिक साख और विश्वसनीयता पर कई तरह के सवाल खड़े किए थे। इन सभी पुराने मामलों को देखकर विपक्ष हमेशा यही कहता आया है कि डीएमके नेता राजनीति में महिलाओं का इस्तेमाल सिर्फ अपनी दुश्मनी निकालने के लिए करते हैं।

विपक्षी पार्टियों का साफ आरोप है कि राजनीतिक विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए उनके घरों की महिलाओं को निशाना बनाना इस पार्टी की पुरानी आदत बन चुकी है।

अतीत और वर्तमान: परिस्थितियों में अंतर लेकिन सोच वही

अगर हम 1989 की जयललिता वाली घटना और आज के तृषा कृष्णन विवाद को देखें, तो दोनों की परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं। एक मामला सीधे तौर पर विधानसभा के अंदर हुए शारीरिक हमले और बदसलूकी से जुड़ा हुआ था।

जबकि दूसरा मामला किसी राजनीतिक मंच से सार्वजनिक रूप से दिए गए विवादित बयान और छींटाकशी का है। दोनों घटनाओं के तरीके भले ही अलग हों, लेकिन इन दोनों ने एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

यह सवाल यह है कि तमिलनाडु की राजनीति में हमेशा महिलाओं को ही क्यों निशाना बनाया जाता है? राजनीति के इस गंदे खेल में महिलाओं को बार-बार बीच में क्यों घसीटा जाता है?

जयललिता के लिए 25 मार्च 1989 का वह दिन बहुत बड़ा झटका था, लेकिन वही उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट भी बन गया था। फटी साड़ी में बाहर आती उनकी तस्वीरों ने उन्हें एक कमज़ोर महिला की जगह एक बहुत बड़ी आयरन लेडी बना दिया था।

आज का तृषा कृष्णन विवाद भी राजनीतिक भाषा और जनप्रतिनिधियों की मर्यादा पर एक गहरी चोट है। नेता अपनी कुर्सी और फायदे के लिए यह भूल जाते हैं कि सार्वजनिक मंचों से महिलाओं के खिलाफ कैसी भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है।

यह वक्त ही बताएगा कि तृषा कृष्णन से जुड़ा यह विवाद आने वाले समय में पूरी तरह खत्म होगा या यह भी राज्य की राजनीति का एक नया और बड़ा अध्याय बनकर रह जाएगा। लेकिन इस पूरे मामले से एक बात बहुत साफ हो जाती है कि 1989 की उस खौफनाक घटना के लगभग चार दशक बीत जाने के बाद भी हालात में कोई सुधार नहीं हुआ है। आज भी तमिलनाडु की राजनीति में महिलाओं को राजनीतिक हमलों का आसान शिकार बनाया जा रहा है।

जब तक नेता अपनी घटिया राजनीति से बाहर आकर महिलाओं का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, तब तक ऐसे विवाद बार-बार उठते रहेंगे। जनता अब इन सब चीजों को बहुत गौर से देख रही है और आने वाले चुनावों में इसका जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार बैठी है।

इजरायल को 99% हथियार देने वाले पश्चिमी देशों को छोड़ भारत के खिलाफ प्रोपेगैंडा फैला रहा एमनेस्टी, समझिए गाजा की आड़ में किस खेल में जुटा Amnesty International

दुनिया के नक्शे पर युद्ध और कूटनीति के समीकरण बेहद उलझे हुए हैं। इस बीच मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) ने गुरुवार (30 जुलाई 2026) को एक रिपोर्ट जारी कर दावा किया कि भारत में बने रक्षा उपकरणों और सैन्य घटकों (Defense Components) का इस्तेमाल इजराइल द्वारा गाजा में जारी सैन्य कार्रवाइयों में किया जा रहा है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट की हेडलाइन है- MADE IN INDIA: THE SUPPLY OF WEAPONS AND AMMUNITION TO ISRAEL (मेड इन इंडिया: इजरायल को हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति)।

इस रिपोर्ट में एमनेस्टी ने आरोप लगाया है कि 7 अक्टूबर 2023 को गाजा में संघर्ष शुरू होने के बाद से लेकर अब तक भारत की कई सरकारी और निजी कंपनियों ने इजरायल को बड़े पैमाने पर सैन्य सामग्री, गोला-बारूद, ड्रोन के पुर्जे और छोटे हथियारों के कलपुर्जे निर्यात किए हैं। एमनेस्टी का कहना है कि यह आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय कानून और जेनोसाइड कन्वेंशन (Genocide Convention) का उल्लंघन कर सकती है।  

एमनेस्टी ने तर्क दिया है कि भारत द्वारा की जा रही यह आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और 1948 के जेनोसाइड कन्वेंशन (नरसंहार रोकथाम समझौते) के तहत भारत के अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों के विपरीत हो सकती है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की महासचिव एग्नेस कैलामार्ड ने कहा, “हमारी जाँच से पता चलता है कि गाजा में कथित जनसंहार को लेकर दुनिया भर में लगातार सामने आ रही तस्वीरों के बावजूद भारत ने इजरायली सेना और रक्षा क्षेत्र का समर्थन जारी रखा।”

कैलामार्ड ने कहा, “अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की ओर से जारी अंतरिम आदेशों में गजा में फिलिस्तीनियों के खिलाफ संभावित जनसंहार के जोखिम को स्वीकार किया गया है। ऐसे में भारतीय अधिकारी यकीन के साथ यह नहीं कह सकते कि उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि इजरायल को हथियारों के हस्तांतरण की अनुमति देना और उसे आसान बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून के गंभीर उल्लंघनों में योगदान का बड़ा जोखिम पैदा करता है।”

अपने ट्वीट में अन्य जानकारियाँ देते हुए उन्होंने लिखा, “हम भारत सरकार से इजरायल को हथियारों, गोला-बारूद और पुर्जों के निर्यात को तुरंत रोकने का आह्वान करते हैं। इसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इसके अधिकार क्षेत्र में कार्यरत कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपराधों में योगदान न दें।”

हालाँकि जब इस पूरी रिपोर्ट का गहराई से अध्ययन किया जाता है, तो इसके पीछे मानवाधिकारों की वास्तविक चिंता से अधिक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ इकोसिस्टम का राजनीतिक एजेंडा और रणनीतिक पूर्वाग्रह दिखाई देता है।

भारत सरकार और स्वतंत्र सामरिक विश्लेषकों का हमेशा से यह स्पष्ट और व्यावहारिक दृष्टिकोण रहा है कि संप्रभु राष्ट्रों के बीच होने वाला रक्षा व्यापार अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और राष्ट्रीय कानूनों के कड़े ढाँचे में संचालित होता है। किसी भी निर्यातक देश का नियंत्रण केवल सामग्री की सुपुर्दगी और अनुबंध की शर्तों तक ही सीमित रह सकता है, कोई भी विक्रेता देश यह तय नहीं कर सकता कि खरीदार देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और आपातकालीन परिस्थितियों के अनुसार उन उपकरणों का प्रयोग कब, कहाँ और किस प्रकार करेगा। देश के जाने-माने रक्षा विशेषज्ञों ने भी एमनेस्टी की रिपोर्ट को खारिज किया है और कहा है कि ये भारत के मामले में सही रिपोर्ट नहीं है, क्योंकि ये पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है।

इस रिपोर्ट में हम एमनेस्टी के दावों, भारत सरकार और भारतीय डिफेंस सेक्टर के व्यावहारिक पक्ष, विशेषज्ञों की राय, भारत-इजरायल के गहरे और ऐतिहासिक संबंधों, भारत की बढ़ती ‘आत्मनिर्भरता’ से पश्चिमी देशों और एनजीओ की घबराहट, विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर द्वारा यूरोप में पश्चिमी मीडिया के सामने ही पश्चिमी देशों के डबल स्टैंडर्ड की पोल खोलने और अंतरराष्ट्रीय संस्था सिपरी (SIPRI) की हथियारों पर जारी होने वाली रिपोर्ट का भी विश्लेषण करेंगे।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट: क्यों इसके विश्लेषण की जरूरत?

एमनेस्टी इंटरनेशनल की इस रिपोर्ट में 7 अक्टूबर 2023 से 30 नवंबर 2025 के बीच भारत से इजरायल भेजे गए कुल 2,596 शिपमेंट्स (कंसाइनमेंट) के डेटा का विश्लेषण किया गया है। एमनेस्टी का दावा है कि भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की उपक्रमों (DPSUs) और निजी कंपनियों ने इजरायल की रक्षा कंपनियों (जैसे एलबिट सिस्टम्स, इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज और आईडब्ल्यूआई) को सैन्य पुर्जों की सप्लाई जारी रखी है।  

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट मुख्य रूप से भारत से इजरायल भेजे गए शिपमेंट्स के कस्टम डेटा और सीमा शुल्क दस्तावेजों के विश्लेषण पर आधारित होने का दावा करती है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट(फोटो साभार: amnesty. org)

एमनेस्टी के आँकड़ों के मुताबिक, भारत की निजी कंपनी ‘कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स’ (जो भारत फोर्ज की सहायक इकाई है) ने इजरायल मिलिट्री इंडस्ट्रीज को 155 मिलीमीटर आर्टिलरी शेल्स (तोप के गोलों) के लिए लगभग 9,600 बॉडी और केसिंग की आपूर्ति की है। इसके साथ ही, भारत सरकार के स्वामित्व वाली रक्षा उपक्रम ‘म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड’ (MIL) पर 1,000 पूरी तरह से तैयार 155MM के हाई-एक्सप्लोसिव तोप के गोलों को एलबिट सिस्टम्स के जरिए इजरायल भेजने का आरोप लगाया गया है।

छोटे हथियारों के क्षेत्र में रिपोर्ट यह आरोप लगाती है कि अडानी समूह और इजरायल वेपन इंडस्ट्रीज (IWI) के बीच ग्वालियर में स्थापित संयुक्त उद्यम ‘पीएलआर सिस्टम्स’ ने नेगेव लाइट मशीन गन और तवोर असॉल्ट राइफलों के लिए 33,000 से अधिक बोल्ट कैरियर्स और 10,000 से अधिक मैगजीन फीडिंग ट्रे निर्यात किए हैं। इसके अलावा बेंगलुरु स्थित निजी कंपनी ‘इंडो-एमआईएम’ पर इजरायली कंपनी आईडब्ल्यूआई को छोटे हथियारों के 59,000 से अधिक ऑटोमैटिक सीयर्स और ट्रिगर मैकेनिज्म घटकों की आपूर्ति का दावा किया गया है।  

एमनेस्टी का कहना है कि इसके अतिरिक्त हैदराबाद स्थित ‘अल्फा एल्सैक’ (जो एलबिट सिस्टम्स के साथ संयुक्त उद्यम है) ने ड्रोन के लिए मिसाइल वारहेड्स और ऑप्टिकल सेंसर्स की आपूर्ति की है, जबकि ‘प्रीमियर एक्सप्लोसिव्स’ ने रॉकेट मोटर्स और सॉलिड प्रोपेलेंट घटकों को निर्यात किया है। सरकारी कंपनी ‘इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड’ पर नाइट-विजन और सेमीकंडक्टर पार्ट्स भेजने का आरोप लगाया गया है।  

इस तरह से उसका कहना है कि भारतीय कंपनियों ने सैन्य-ग्रेड हथियारों के लिए 3,90,516 से अधिक कलपुर्जे (जैसे राइफल के बोल्ट कैरियर्स, ऑटोमैटिक सीयर्स, ट्रिगर मैकेनिज्म, मैगजीन फीडिंग ट्रे आदि) इजरायल की आईडब्ल्यूआई (IWI) कंपनी को भेजे।

साभार: Amnesty International Report

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस रिपोर्ट में इस बात पर फोकस किया है कि भारत से इजरायल भेजे गए सामान का इस्तेमाल गाजा में इजरायली सैन्य अभियानों में हो रहा है, इसलिए भारत अंतरराष्ट्रीय जेनेवा कन्वेंशन के कॉमन आर्टिकल 1 और जेनोसाइड कन्वेंशन के तहत अपनी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता।  

एमनेस्टी के कानूनी और मानवाधिकार तर्क

जेनोसाइड कन्वेंशन (Genocide Convention): एमनेस्टी का कहना है कि 1948 के नरसंहार रोकथाम समझौते के तहत भारत का यह कानूनी कर्तव्य है कि वह किसी भी ऐसे देश को हथियार न दे जहाँ उनका इस्तेमाल संभावित नरसंहार में हो सकता हो। इसकी आड़ में वो भारत से इजरायल से सभी डिफेंस लिंक तोड़ने के लिए कहा है।

जेनेवा कन्वेंशन (Geneva Conventions): कॉमन आर्टिकल 1 के तहत राज्यों की जिम्मेदारी है कि वे अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का सम्मान करवाएँ।

आर्म्स ट्रेड ट्रीटी (ATT): एमनेस्टी ने इस बात पर जोर दिया कि भारत ने आर्म्स ट्रेड ट्रीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए उसे तुरंत इसमें शामिल होना चाहिए। इस ट्रीटी पर दुनिया के 118 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं, 25 देशों ने हस्ताक्षर तो किए हैं, लेकिन अभी तक शामिल नहीं हुए हैं। इसमें अमेरिका, UAE, इजरायल, तुर्की, यूक्रेन जैसे देश हैं। वहीं भारत समेत 52 देशों ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत के अलावा इस लिस्ट में पाकिस्तान, रूस, कुवैत, आर्मीनिया, अजरबैजान, ईरान, इराक जैसे देश हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल को भारत से इतनी परेशानी क्यों है?

एमनेस्टी इंटरनेशनल का भारत की सुरक्षा नीति या अंदरूनी मामलों पर सवाल उठाना कोई नई बात नहीं है। भारत सरकार और इस संगठन के बीच यह तनातनी सालों पुरानी है। इसकी मुख्य वजह भारत के कड़े कानून और विदेशी एनजीओ (NGOs) की भारत के मामलों में दखल देने की आदत है।

विदेशी पैसों के गोलमाल पर कानूनी शिकंजा: सितंबर 2020 में भारत के गृह मंत्रालय और ईडी (ED) ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के बैंक खाते बंद (सीज) कर दिए थे। जाँच में पता चला कि विदेशी फंडिंग से जुड़े नियमों (FCRA) से बचने के लिए एमनेस्टी ने गलत रास्ता अपनाया था। उन्होंने ब्रिटेन से ‘बिजनेस में निवेश’ (FDI) के नाम पर करोड़ों रुपए भारत मंगवाए। बाद में इस पैसे का इस्तेमाल एनजीओ के कामों और राजनीतिक अभियानों में किया गया।

जब सरकार ने इस धोखाधड़ी पर कानूनी कार्रवाई की, तो एमनेस्टी ने भारत में अपना काम बंद कर दिया और उल्टा खुद को ही पीड़ित बताने लगा। यही नहीं, वो अब भी कोशिश कर रहा है कि FRCA कानून के तहत NGO लॉबी को छूट मिले।

पश्चिमी देशों की सोच और भारत की आत्मनिर्भरता: पश्चिमी देशों के पैसों से चलने वाले ये अंतरराष्ट्रीय एनजीओ अक्सर भारत जैसे विकासशील देशों की तरक्की और सुरक्षा को गलत नजरिए से देखते हैं।

जब पश्चिमी देश (जैसे अमेरिका, ब्रिटेन या जर्मनी) इजरायल या अन्य युद्धग्रस्त क्षेत्रों को खरबों डॉलर के भारी हथियार, लड़ाकू विमान और बम भेजते हैं, तब एमनेस्टी की रिपोर्टों पर पश्चिमी सरकारें बहुत ध्यान नहीं देतीं।  लेकिन जैसे ही भारत जैसा विकासशील देश अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाता है और वैश्विक रक्षा बाजार में एक बड़े निर्यातक के रूप में उभरता है, ये संस्थाएँ भारत की संप्रभुता और व्यापार पर सवाल खड़ा करना शुरू कर देती हैं। हालाँकि भारत ने भी बाकी देशों जैसा ही रूख अपनाया है और एमनेस्टी की रिपोर्ट पर अपना साफ जवाब दे दिया है।

भारत के फैसलों का लगातार विरोध: एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हमेशा भारत के अहम फैसलों पर एकतरफा रुख अपनाया है, चाहे वो जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाना हो, नागरिकता कानून (CAA) हो या नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की कार्रवाई। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हमेशा भारत विरोधी रुख अपनाया है।

इसलिए जब एमनेस्टी भारत के रक्षा निर्यात (हथियारो के व्यापार) पर सवाल उठाता है, तो यह सिर्फ किसी युद्ध की चिंता नहीं है। यह भारत को आर्थिक और सामरिक रूप से आगे बढ़ने से रोकने की एक सोची-समझी कोशिश लगती है।

यह रिपोर्ट भारत सरकार और PM मोदी की छवि खराब करने की नाकाम कोशिश: मेजर जनरल (रि) आरपीएस भदौरिया

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज (CLAWS) के एडीजी (ADG) मेजर जनरल (रिटायर्ड) आरपीएस भदौरिया (VSM) ने इसे भारत को बदनाम करने की एक और साज़िश (conspiracy) करार दिया है। ऑपइंडिया के साथ बातचीत में उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पूरी रिपोर्ट वस्तुनिष्ठ विश्लेषण से परे है और इसका मुख्य उद्देश्य भारत सरकार तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करना है।

मेजर जनरल भदौरिया ने कहा, “यह रिपोर्ट भारत सरकार को बदनाम करने और पीएम मोदी की छवि को नुकसान पहुँचाने का एक प्रयास है। हालाँकि यह भारत विरोधी नैरेटिव (Narrative) भी पहले की तरह पूरी तरह से विफल होगा, क्योंकि भारत की जनता अब इन दुर्भावनापूर्ण मंसूबों को अच्छी तरह समझ चुकी है।” उन्होंने कहा कि एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएँ लंबे समय से भारत के सुरक्षा मामलों और रक्षा नीति पर इस तरह की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग करती आई हैं। ये भी उसी कड़ी का एक हिस्सा भर है।

एमनेस्टी की रिपोर्ट पर भारत ने क्या जवाब दिया, ये काफी अहम

इसराइल को हथियारों के एक्सपोर्ट पर  एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट को लेकर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से अगले ही दिन यानी 31 जुलाई 2026 को नियमित प्रेस ब्रीफिंग में सवाल पूछा गया। उन्होंने भारत सरकार की तरफ से आधिकारिक प्रतिक्रिया दी। रणधीर जायसवाल ने कहा, “भारत के पास स्ट्रेटेजिक ट्रेड कंट्रोल पर एक मजबूत कानूनी और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क है और वह अपने राष्ट्रीय क़ानूनों और अपनी अंतरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारियों के मुताबिक़ अलग-अलग देशों को डुअल-यूज़ आइटम और टेक्नोलॉजी का एक्सपोर्ट करता है।”

इस पूरे मुद्दे पर भारत का आधिकारिक दृष्टिकोण और अंतरराष्ट्रीय रक्षा व्यापार के जमीनी नियम बिल्कुल स्पष्ट हैं।

सामान की खरीद और बिक्री की सीमाएँ: रक्षा व्यापार का सबसे बुनियादी और स्थापित अंतरराष्ट्रीय नियम यह है कि हथियार बेचने वाला देश (Seller) केवल समझौते के तहत माल की आपूर्ति करता है। वह खरीदार देश (Buyer) की अपनी सेना या युद्ध नीतियों पर दबाव नहीं बना सकता, अलबत्ता वो अमेरिका जैसा देश न हो और पाकिस्तान जैसा खरीददार न हो।

दरअसल, जब दो संप्रभु देश रक्षा सामग्री या कलपुर्जों का व्यापार करते हैं, तो उस सामग्री का अंतिम उपयोग (End Use) खरीदार देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरतों, रक्षा रणनीतियों और युद्ध परिस्थितियों के अनुसार तय करता है। भारत किसी देश के आंतरिक सैन्य अभियानों का माइक्रो मैनेजमेंट नहीं कर सकता यानि अगर दुनिया का कोई भी देश दूसरे देश से कोई रक्षा उपकरण खरीदता है, तो बेचने वाला देश उसके बाद यह तय नहीं कर सकता कि उस हथियार का ट्रिगर कहाँ दबेगा। व्यापार की सीमाएँ खरीद, गुणवत्ता और डिलीवरी तक ही सीमित होती हैं।  

भारत-इजरायल के संबंध: जहाँ तक भारत और इजरायल के संबंधों का प्रश्न है, दोनों देशों के बीच 1992 से पूर्ण राजनयिक संबंध हैं और दोनों के संबंध किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं बल्कि पारस्परिक सुरक्षा आवश्यकताओं पर आधारित हैं।

दुनिया को ये नहीं भूलना चाहिए कि जब साल 1999 के कारगिल युद्ध के कठिन समय में जब भारतीय सेना को द्रास और बटालिक की चोटियों पर छिपे घुसपैठियों को हटाने के लिए लेजर-गाइडेड बमों, सटीक मोर्टार और गोला-बारूद की सख्त जरूरत थी, तब कई पश्चिमी देशों ने भारत को आपूर्ति देने से मना कर दिया था। उस समय इजरायल ने भारत को तत्काल आवश्यक रक्षा सामग्री उपलब्ध कराई थी।  

आज भारत और इजरायल केवल खरीदार और विक्रेता नहीं हैं। दोनों देश बराक-8 वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली, हर्मीस 900 मध्यम-ऊँचाई वाले ड्रोन और एडवांस्ड रडार प्रणालियों का सह-विकास और संयुक्त विनिर्माण करते हैं। इन संयुक्त उपक्रमों के तहत भारतीय कारखानों में बनने वाले कलपुर्जे इजरायली प्रणालियों में असेंबल होने के लिए जाते हैं, जो सालों पुराने वैध द्विपक्षीय समझौतों का परिणाम हैं। किसी चालू युद्ध के कारण भारत अपने लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक और औद्योगिक समझौतों को अचानक नहीं तोड़ सकता। ऐसा भारत ही नहीं, दुनिया का कोई भी देश नहीं कर सकता, जबकि वो अभी अपने पैरों पर खड़ा हो रहा हो।

‘आत्मनिर्भर भारत’ से पश्चिमी इकोसिस्टम और एनजीओ को चिंता क्यों?

भारत ने पिछले एक दशक में रक्षा क्षेत्र में जो बदलाव देखे हैं, वे अभूतपूर्व हैं। कभी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक (Importer) रहने वाला भारत आज एक प्रमुख रक्षा निर्यातक (Exporter) बनने की राह पर है।

भारत का रक्षा निर्यात का रिकॉर्ड: वित्तीय वर्ष 2024-2025 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट ₹23,622 करोड़ (लगभग 2.84 बिलियन डॉलर) के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँचा तो वहीं 2025-2026 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट 62.66% बढ़कर ₹38,424 करोड़ तक पहुँच गया है।

इस एक साल में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट ₹14,802 करोड़ तक बढ़ा, जबकि 2021-22 ये कुल आँकड़ा ही महज ₹12814 करोड़ ही था। यानी भारत ने एक साल में जितनी बढ़त हासिल की, 5 साल पहले उससे भी कम हथियार वो बेचता था। ये भारत सरकार की आत्मनिर्भरता बड़ी मिशाल है।

बीते एक दशक में भारत सरकार ने रक्षा क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियानों के तहत व्यापक संरचनात्मक सुधार किए हैं। कभी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश भारत आज अपनी जरूरतों को खुद पूरा करने के साथ-साथ डिफेंस सेक्टर में निर्यात कर रहा है।

भारत आज सिर्फ हथियारों के कलपुर्जे ही नहीं, बल्कि पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें, तेजस लड़ाकू विमान के पार्ट्स, 155 मिलीमीटर एडवांस्ड टौड आर्टिलरी गन (ATAGS), डोर्नियर विमान और आधुनिक गश्ती पोत निर्यात कर रहा है।

पश्चिमी एनजीओ और इकोसिस्टम को चिंता क्यों है?

पश्चिमी रक्षा उद्योग के एकाधिकार को चुनौती: वैश्विक रक्षा बाजार में हमेशा से अमेरिका, फ्रांस, रूस और यूरोपीय देशों का दबदबा रहा है। भारत का एक बड़े रक्षा विनिर्माता के रूप में उभरना पश्चिमी रक्षा लॉबी और उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए आर्थिक खतरा है।

ग्लोबल साउथ (Global South) के लिए नया विकल्प: अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका के देश अब महँगे पश्चिमी हथियारों के बजाय भारत से सस्ते, टिकाऊ और उच्च गुणवत्ता वाले हथियार खरीद रहे हैं।

रणनीतिक ब्लैकमेलिंग का अंत: जब भारत पूरी तरह आयात पर निर्भर था, तब पश्चिमी देश मानवाधिकारों या नीतियों का हवाला देकर भारत को हथियार देने या पुर्जे भेजने से रोक देते थे। अब जब ‘आत्मनिर्भर भारत’ के अपने कारखाने घरेलू और वैश्विक माँग को पूरा करने में सक्षम हो गए हैं, तो पश्चिमी शक्तियों का वह पुराना दबावकारी तंत्र बेकार साबित हो रहा है यानी भारत ने इस रणनीतिक ब्लैकमेलिंग को खत्म कर दिया है।

इसीलिए एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाएँ भारत की इस बढ़ती ‘आत्मनिर्भरता’ को एक ‘चिंताजनक स्थिति’ या ‘अंतरराष्ट्रीय अपराधों में संलिप्तता’ के रूप में दिखाना चाहती हैं, ताकि भारतीय रक्षा कंपनियों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का दबाव बनाया जा सके।

एस. जयशंकर खोल चुके हैं पश्चिमी देशों के दोहरे रवैये की पोल

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भी पश्चिमी देशों या उनके इकोसिस्टम ने भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रक्षा-ऊर्जा प्राथमिकताओं पर उंगली उठाई है, भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने उसका करारा जवाब दिया।

यूरोप दौरे के दौरान जब पश्चिमी मीडिया और राजनेताओं ने रूस से तेल और हथियार खरीदने पर भारत को घेरने की कोशिश की, तो जयशंकर ने पश्चिमी दोहरे मापदंडों (Double Standards) को बेनकाब करते हुए ऐतिहासिक बयान दिया, “यूरोप की यह मानसिकता रही है कि यूरोप की समस्याएँ दुनिया की समस्याएँ हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएँ यूरोप की समस्याएँ नहीं हैं। यूरोप खुद रूस से भारी मात्रा में ऊर्जा, गैस और उर्वरक खरीद रहा है, लेकिन जब भारत अपनी 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से रियायती दर पर तेल खरीदता है, तो हमें उपदेश दिए जाते हैं। यूरोप को अपने यह दोहरे मापदंड तुरंत बंद करने चाहिए।”

विदेश मंत्री का यह बयान रक्षा व्यापार के क्षेत्र में भी उतना ही सटीक बैठता है। जो यूरोपीय देश और पश्चिमी मानवाधिकार संगठन भारत पर इजरायल को कलपुर्जे बेचने के लिए सवाल उठा रहे हैं, वे इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं कि खुद पश्चिमी देश इजरायल के सैन्य तंत्र की रीढ़ बने हुए हैं। इसके बावजूद वो भारत जैसे विकासशील देशों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे अपने राष्ट्रीय हितों और वैध द्विपक्षीय समझौतों को उनके निर्देशों पर कुर्बान कर दें।

डॉ. जयशंकर के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत का हर कदम ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) और अपने राष्ट्रीय हितों से संचालित होगा, न कि किसी पश्चिमी देश या एनजीओ की दी गई सीख से।

हालाँकि एमनेस्टी ने गाजा युद्ध और इजरायल से जुड़ी ऐसी ही रिपोर्ट्स अमेरिका (अप्रैल 2024), स्लोवेनिया (अगस्त 2025), जर्मनी (नवंबर 2025) और फ्रांस (अक्टूबर 2025) पर भी जारी की थी।

इजरायल को हथियार देने वाले प्रमुख देशों में भारत बहुत पीछे

एमनेस्टी की रिपोर्ट भारत पर ध्यान केंद्रित करती है, लेकिन असली आँकड़ों को देखने पर सच्चाई कुछ और ही निकलकर सामने आती है। इजरायल के कुल हथियार आयात में भारत का हिस्सा 1% से भी कम है। इजरायल को रक्षा सामग्री और भारी हथियारों की आपूर्ति करने वाले असली और बड़े खिलाड़ियों के बारे में तो पूरी दुनिया को पता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): इजरायल के कुल प्रमुख हथियार आयात का लगभग 69% हिस्सा अकेले अमेरिका से आता है। अमेरिका इजरायल को F-35 लाइटनिंग II स्टेल्थ लड़ाकू विमान, F-15I और F-16I स्ट्राइक फाइटर जेट्स, गाइडेड मिसाइलें, MK-84 2,000-पाउंड भारी विनाशकारी बम, और जेडीएएम (JDAM) प्रिसिजन किट्स की आपूर्ति करता है। इसके अलावा, अमेरिका हर साल इजरायल को लगभग 3.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर की सीधी विदेशी सैन्य सहायता (FMF) प्रदान करता है।

जर्मनी (Germany): इजरायल के प्रमुख हथियारों के कुल आयात में जर्मनी की हिस्सेदारी लगभग 30% है। जर्मनी इजरायल की नौसेना को अत्याधुनिक ‘डॉल्फ़िन’ श्रेणी की डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां (जो परमाणु मिसाइलें ले जाने में सक्षम हैं), Saar 6-श्रेणी के कोरवेट युद्धपोत, और इजरायल के मुख्य युद्धक टैंक ‘मरकावा’ के लिए शक्तिशाली डीजल इंजन और ट्रांसमिशन सिस्टम की आपूर्ति करता है।

इटली, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देश: इजरायल के शेष 1% हथियार आयात में इटली (जो नौसैनिक तोपों और प्रशिक्षण विमानों के पुर्जे देता है), ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। ब्रिटेन F-35 लड़ाकू विमानों के कलपुर्जों, रडार और एवियोनिक्स सिस्टम के निर्माण में सीधे शामिल है।

सिपरी के डाटा पर आधारित (फोटो साभार : AI ChatGPT)

इन आँकड़ों को देखने के बाद ये साफ हो जाता है कि जो पश्चिमी देश 99% भारी और विनाशकारी हथियार इजरायल को भेज रहे हैं, उनके ही एनजीओ भारत द्वारा भेजे जा रहे कुछ हजार बोल्ट कैरियर्स, केसिंग और अन्य कलपुर्जों को बड़ा मुद्दा बनाकर वैश्विक मंच पर भारत की घेराबंदी करने की कोशिश कर रहे हैं।

सिपरी (SIPRI) की रिपोर्ट पर भी ध्यान देना जरूरी

स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में स्थित ‘स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (SIPRI) दुनिया भर में हथियारों के हस्तांतरण, सैन्य खर्च और निरस्त्रीकरण का सबसे विश्वसनीय और वैज्ञानिक डेटा एकत्र करने वाली संस्था मानी जाती है।  सिपरी की लेटेस्ट सालाना रिपोर्ट ‘ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स‘ का गहरा विश्लेषण कर वैश्विक रक्षा व्यापार के असली आँकड़ों और भारत की स्थिति को निष्पक्ष रहकर समझा जा सकता है-

ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स के आँकड़े: सिपरी के आँकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में होने वाले कुल हथियार निर्यात का 75% से अधिक हिस्सा केवल 5 प्रमुख देशों के नियंत्रण में है। अमेरिका 42% वैश्विक शेयर के साथ शीर्ष पर है, जिसके बाद फ्रांस (11%), रूस (11%), चीन (5.8%) और जर्मनी (5.6%) का स्थान है।

सिपरी के डाटा पर आधारित (फोटो साभार : AI ChatGPT)

इजरायल के हथियारों की खरीद पर सिपरी का डेटा: सिपरी के डेटाबेस के अनुसार, इजरायल द्वारा खरीदे जाने वाले ‘प्रमुख पारंपरिक हथियारों’ (Major Conventional Weapons) जैसे लड़ाकू विमान, नौसैनिक जहाज, टैंक, वायु रक्षा प्रणालियाँ और भारी तोपखाने में भारत की हिस्सेदारी नगण्य यानी शून्य दर्ज की गई है। सिपरी स्पष्ट रूप से दर्ज करता है कि इजरायल के 99% बड़े हथियार अमेरिका (69%) और जर्मनी (30%) से आते हैं। इसका ग्राफ ऊपर दिया जा चुका है।

इसके अलावा भारत द्वारा किए जाने वाले रक्षा निर्यात को सिपरी की परिभाषा के तहत मुख्य हथियारों की श्रेणी में नहीं रखा जाता, क्योंकि भारत प्राथमिक रूप से कंपोनेंट, सब-असेंबली, और कच्ची सामग्री (Raw Material Casings) की आपूर्ति करता है, जो द्विपक्षीय औद्योगिक समझौतों का हिस्सा हैं।

सिपरी रिपोर्ट से क्या पता चलता है?: सिपरी के आँकड़े साबित करते हैं कि वैश्विक हथियार व्यापार कुछ चुनिंदा शक्तिशाली देशों के हाथों में केंद्रित है। युद्ध और संघर्ष के क्षेत्रों में सबसे ज्यादा हथियार पश्चिमी देशों से आते हैं। भारत अभी इस बाजार में एक नया और तेजी से उभरता हुआ खिलाड़ी है, जिसकी प्राथमिकता अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करना और मित्र देशों को सुरक्षा उपकरण मुहैया कराना है।

रक्षा विशेषक्ष मे.ज.(रि) दुष्यंत सिंह ने एमनेस्टी की रिपोर्ट को किया खारिज, बताया पूर्वाग्रह से ग्रसित

सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज (CLAWS) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) दुष्यंत सिंह (PVSM, AVSM) ने एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए इसे संगठन के पुराने पूर्वाग्रह का हिस्सा करार दिया है। ऑपइंडिया के एसोसिएट एडिटर श्रवण शुक्ला से विशेष बातचीत में उन्होंने स्पष्ट किया कि एमनेस्टी हमेशा से भारत-विरोधी रुख अपनाता रहा है। चाहे जम्मू-कश्मीर की स्थिति हो या पूर्वोत्तर का क्षेत्र, संगठन सुरक्षा बलों पर होने वाले हमलों और उनके सामने मौजूद चुनौतियों को नजरअंदाज कर केवल एकतरफा रिपोर्टिंग करता आया है।

लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) दुष्यंत सिंह (पीवीएसएम, एवीएसएम)

इजरायल के साथ भारत के रक्षा संबंधों पर बात करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने कहा कि साल 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों के लिए रक्षा उपकरण प्राप्त करता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नियमों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि रक्षा व्यापार पूर्णतः वैध समझौतों के तहत होता है। किसी भी उपकरण या पार्ट का ‘एंड यूज़’ (अंतिम उपयोग) क्या और कैसे होगा, इसकी जिम्मेदारी खरीदने वाले देश की होती है, न कि निर्यात करने वाले देश की। भारत में निर्मित या निर्यात होने वाले कलपुर्जे और डुअल-यूज़ (दोहरे उपयोग वाली) तकनीक अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में ही स्थानांतरित होती है।

गाजा युद्ध के संदर्भ में भारत पर उठ रहे सवालों को खारिज करते हुए उन्होंने अमेरिका और पश्चिमी देशों के आँकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि इजरायल को सैन्य सहायता देने में मुख्य भूमिका अमेरिका की है। अमेरिका अभी के समय में इजरायल को $6.6 अरब डॉलर का सैन्य पैकेज दे रहा है, जिसमें $3.8 अरब डॉलर के 30 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर, F-15 लड़ाकू विमान, असॉल्ट वाहन और अन्य आधुनिक हथियार शामिल हैं। इसके अलावा अरबों डॉलर की विदेशी सैन्य बिक्री (FMS) और सैन्य सहायता ग्रान्ट अमेरिका द्वारा दी जाती है।

इसके विपरीत इजरायल को होने वाली कुल रक्षा आपूर्ति में भारत की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है और वह मुख्य रूप से कंपोनेंट तथा डुअल-यूज इलेक्ट्रॉनिक्स तक सीमित है।

लेफ्टिनेंट जनरल (रि) दुष्यंत सिंह ने कहा कि भारत की विदेश नीति पूरी तरह स्वतंत्र और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है। भारत के संबंध इजरायल, फिलिस्तीन, अमेरिका, रूस और ईरान सभी के साथ स्वतंत्र औरअपने राष्ट्रीय हितों के अनुकूल हैं। भारत हमेशा से वैश्विक शांति और संवाद के जरिए विवादों के समाधान का समर्थक रहा है। ऐसे में एमनेस्टी की रिपोर्ट वस्तुनिष्ठ विश्लेषण न होकर महज एक पूर्वनिर्धारित नैरेटिव गढ़ने का प्रयास है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट सिर्फ नरेटिव वॉर का हिस्सा

एमनेस्टी की रिपोर्ट को अगर तटस्थ नजरिए से देखें, तो मानवाधिकारों की चिंता करना किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था का काम हो सकता है। लेकिन जब यह चिंता चुनिंदा (selective) हो जाती है, तो उस संगठन की साख पर सवाल उठना लाजमी है।

चूँकि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और अपने रणनीतिक हितों के आधार पर किसी भी देश के साथ रक्षा व्यापार करने के लिए स्वतंत्र है, जब तक कि वह संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक प्रतिबंधों का उल्लंघन न कर रहा हो (और इजराइल पर यूएन का कोई हथियार प्रतिबंध नहीं है)।

ऐसे में पक्षपात भरे निगेटिव नैरेटिव से सिर्फ भारत के छोटे से एक्सपोर्ट हिस्से को लेकर बड़ा विवाद खड़ा करना और उन देशों पर नरमी बरतना जो इजराइल को 95% से ज्यादा आक्रामक हथियार दे रहे हैं, एमनेस्टी के पूर्वाग्रह को दर्शाता है।

बहरहाल, भारत की स्पष्ट नीति रही है कि भारत ने न तो कभी युद्ध का समर्थन किया है और न ही वह किसी मानवीय त्रासदी का पक्षधर है। भारत अपनी रक्षा कूटनीति, राष्ट्रीय हित और मानवाधिकार सहायता के बीच संतुलन बनाना अच्छी तरह जानता है।

यहाँ ये भी बताना अहम है कि वैश्विक राजनीति में जब कोई देश ‘आत्मनिर्भर’ और मजबूत बनता है, तो उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और नैरेटिव वॉर (Narrative War) के हमले बढ़ते हैं। ऐसे में एमनेस्टी की यह रिपोर्ट भी उसी भू-राजनीतिक (Geopolitics) खींचतान का एक हिस्सा नजर आती है।

JNU की जिस वामपंथन को ‘मुस्लिम मर्द’ लगते हैं अट्रैक्टिव, वो भारत को कह रही ‘मनहूस देश’: इन बयानों से जानिए JNU की निवेदिता मेनन का चिट्ठा

हाल ही में पत्रकार मंदीप पुनिया के यूट्यूब चैनल पर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय (JNU) की पूर्व प्रोफेसर निवेदिता मेनन का एक इंटरव्यू आया है। इस इंटरव्यू में निवेदिता ने छात्र आंदोलनों और शिक्षा के मुद्दों की आड़ लेकर भारत राष्ट्र, देश की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था पर सीधे हमले करते हुए भारत को ‘मनहूस’ देश बताया है।

JNU जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में बैठकर लंबे समय तक पठन-पाठन से जुड़ी रहीं एक प्रोफेसर द्वारा सार्वजनिक मंचों से इस तरह के वक्तव्य देना केवल असहमति व्यक्त करना नहीं है, बल्कि देश की संप्रभुता और सामाजिक ताने-बाने पर किया गया एक सोची-समझी रणनीति का प्रहार है।

पूरे साक्षात्कार के दौरान बोले गए उनके शब्द यह साफ उजागर करते हैं कि वामपंथी-कट्टरपंथी इकोसिस्टम किस हद तक भारत के प्रति द्वेष और घृणा से भरा हुआ है।

भारत को ‘मनहूस’ बताकर किया देश का अनादर, हिंदुओं पर भी की घटिया टिप्पणी

निवेदिता मेनन ने अपने इस इंरव्यू में देश में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन, विभिन्न छात्र आंदोलनों और अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चर्चा करते हुए भारत राष्ट्र के प्रति अपनी अंतर्निहित घृणा को जगजाहिर कर दिया। उन्होंने भारत जैसे महान, सहिष्णु और लोकतांत्रिक देश के लिए ‘मनहूस’ जैसे अपमानजनक शब्द का प्रयोग किया।

देश के भीतर चल रहे CJP के अभियानों पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “जब जुनैद जैसे बच्चे को ट्रेन में मार के फेंक दिया जाता है और पूरा देश सन्नाटे में रहता है, मुझे लगता है कि पिछले 12 साल में ऐसे उनको मतलब बार-बार एहसास दिलाया जा रहा है कि तुम यहाँ के नहीं हो। तुम्हें बुलडोज करेंगे हम, तुम्हें हम कुछ भी करेंगे और तुम चू तक नहीं कर सकते। CJP का प्रोटेस्ट जो है वह थोड़ा साँस लेने की जगह दी और मुसलमानों को शायद लगने लगा कि शायद इस मनहूस देश में हमारे लिए भी कोई जगह है।”

भारत जैसे महान राष्ट्र, जहाँ करोड़ों नागरिक अपनी सांस्कृतिक धरोहर और संप्रभुता पर गर्व करते हैं, उसी राष्ट्र को एक ‘मनहूस’ ढाँचा बताकर पेश करना यह साबित करता है कि तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों के पास रचनात्मक आलोचना के नाम पर केवल राष्ट्र-विरोधी जहर उगलने का काम बचा है।

इस प्रकार की भ्रामक भाषा का प्रयोग करके वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि को एक अत्याचारी राष्ट्र के रूप में चित्रित करने का प्रयास करती हैं।

CJP और अराजक आंदोलनों का महिमामंडन: संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करने की साजिश

निवेदिता का पूरा जोर कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शनों को सही ठहराने और उनका महिमामंडन करने पर रहा। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के भेष में तमाम उपद्रवियों के संसद में घुसने की साजिशों और उपद्रव में शामिल वामंपथी और कट्टरपंथी संगठनों व पुलिस पर हमले करने वाले गुंडो को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।

मेनन ने इन आंदोलनों को ‘लोकतांत्रिक जीत’ का नाम दिया। उन्होंने कह, “यह अकाउंटेबिलिटी शब्द जो CJP के प्रोटेस्ट ने इतना आम बनाया कि हर कोई अकाउंटेबिलिटी और जवाबदेही की बात कर रहे हैं। एक स्टूडेंट ने आपको याद होगा एनसीआरटी की टेक्स्ट बुक से डेमोक्रेसी का वर्णन पढ़ते हुए बताया कि अकाउंटेबिलिटी है डेमोक्रेसी का फीचर। तो यह इस मूवमेंट का सबसे बड़ा की सबसे बड़ी बड़ी जीत यह है कि अकाउंटेबिलिटी शब्द हमारे शब्दकोश में हमारे आम बोलचाल में यह शब्द आ गया है।”

आंदोलन के नेतृत्व और उसके स्वरूप पर बात करते हुए उन्होंने आगे कहा, “CJP के कॉल पे जिस तरह के लोग निकल के आए तो एक तरह से मैं सुन रही हूँ यह शब्द ऑर्गेनिक बहुत ज्यादा कि यह ऑर्गेनिक हो गया। अब ऑर्गेनिक तो हो गया लेकिन ऑर्गेनिक अपने आप में उभर के नहीं आता है। कहीं न कहीं एक कॉल देने वाला एक केंद्र होना चाहिए और इसमें अभिजीत दीपके का नाम और अभिजीत दीपके की भूमिका जो है हम कभी नहीं भूल सकते। उनको रिड्यूस नहीं कर सकते।”

उन्होंने यह दावा भी किया कि इस तरह के आंदोलनों ने पिछले 12 वर्षों के सन्नाटे को तोड़ा है और विभिन्न वामपंथी समूहों को एक मंच पर लाया है। उन्होंने कहा, “लेकिन वह जो बिल्कुल एक 12 साल से घना सन्नाटा छाया हुआ था, इन 12 सालों में जो कुछ भी हुआ है, एक तरह से अभिजीत ने इसीलिए लेफ्ट ग्रुप्स उनके साथ जुड़ सके। इसीलिए इतने सारे लोग दुनिया देश भर में, दुनिया भर में एक्चुअली दुनिया भर में भी सपोर्ट हुआ है।”

RSS, केंद्र सरकार और शैक्षणिक व्यवस्था पर जहरीले प्रहार

इंटरव्यू के दौरान केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रति निवेदिता मेनन का राजनीतिक विद्वेष स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। उन्होंने देश के नए शिक्षा मंत्री, नवगठित टास्क फोर्स और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) पर तीखी और अमर्यादित टिप्पणियाँ कीं। साथ ही आरोप लगाया कि इनकी मानसिकता महिलाओं को लेकर भी बहुत घटिया है।

उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा, “धर्मेंद्र प्रधान निकल गए लेकिन जो एजुकेशन मिनिस्टर बन के आए वह उनसे भी कट्टर संघी हैं और भी कट्टर RSS के मतलब प्रचारक हैं। उन्होंने बिलकिस बानो के बलात्कारियों के बारे में बहुत ही सपोर्टिवली बात की। तो ऐसे शख्स को एजुकेशन मिनिस्टर बनाया है जो हमने सोचा होगा कि धर्मेंद्र प्रधान से खराब कोई नहीं होगा, लो उन्होंने एक और अपने बट से निकाला।” मेनन ने नए शिक्षा मंत्री पर कई तरह के अन्य घटिया आरोप लगाए और हिंदू समाज पर अभद्र टिप्पणी की।

सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए बनाई गई टास्क फोर्स के गठन और उसमें शामिल सदस्यों का मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा, “उन्होंने जो सो कॉल्ड हाई पावर टास्क फोर्स बनाया है उसमें देख लीजिए किस तरह के लोग हैं। उसमें IAS के ब्यूरोक्रेट्स हैं, उसमें इंफोसिस के चीफ हैं और इंफोसिस एजुकेशन के बारे में क्या बताएगा हमको? फिर एक और हैं जिन्होंने गोमूत्र के बारे में बहुत प्रशंसा की है कि गोमूत्र के जरिए बहुत सारी बीमारियाँ ठीक होती हैं। तो इस तरह का एक टास्क फोर्स बनाया है जिससे हमें मतलब कोई उम्मीद ही नहीं।”

देश के राजनीतिक ढाँचे और लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूरी तरह से नकारते हुए उन्होंने आरोप लगाया, “12 साल से हिंदू राष्ट्र ही रहा है हमारे यहाँ, हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश की गई है और एक तरह से हिंदू राष्ट्र बन भी गया है। हम सब हिंदू राष्ट्र की छाया में रह रहे हैं।”

CAA विरोधी प्रदर्शनों, उमर खालिद और अलगाववादी निरंतरता का समर्थन

इंटरव्यू में निवेदिता मेनन ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों और दिल्ली दंगों के संदिग्धों का खुलकर बचाव किया। उन्होंने उमर खालिद जैसे जेल में बंद आरोपितों द्वारा फैलाए गए आख्यानों का महिमामंडन किया और इसे एक बड़े क्रांतिकारी सफर के रूप में प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा, “जो बीज बोए गए एंटी-सीएए और फार्मर्स प्रोटेस्ट में जो बीज बोए गए और उनको दबाया गया एक तरह से, लेकिन उसमें से जो वो सीड्स उमर खालिद जैसे नौजवानों ने जो बीज बोए थे, वो पौधे बनकर उभरे। और अब तो वो एक कंटिन्यूटी है, एक कंटिन्यूटी है एंटी-सीएए से लेके यहाँ तक।”

इसके अलावा उन्होंने देश की चुनावी प्रक्रिया, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर पूर्ण अविश्वास व्यक्त करते हुए कहा, “इस तरह का जो व्यवहार है किसी सरकार का दिखाता है हमें कि उनका कोई इरादा नहीं है एक चुनाव जीतने का, इसका मतलब यह है ना कि उनको चुनाव से डर नहीं है क्योंकि हर लेवल पर उन्होंने EVM, ECI, SIR, डीलिमिटेशन ये सारी चीजों को लेके अब उनको लगता है कि चुनाव हमें जीतने की जरूरत ही नहीं है।”

PM मोदी को दी गई गालियों को बताया ‘प्रतिरोध’, ‘एंटी-पेट्रियारकल’ और ‘फूलों का गुलदस्ता’

छात्र आंदोलनों के दौरान प्रधानमंत्री और देश की संवैधानिक हस्तियों को दी जाने वाली अभद्र और अमर्यादित गालियों को सही ठहराने के लिए निवेदिता मेनन और मंदीप पुनिया ने फेमिनिस्ट और ‘क्वीर’ थ्योरी का सहारा लिया। उन्होंने इसे युवाओं का ‘क्रांतिकारी प्रतिरोध’ करार देते हुए कहा, “जब कोई भी ग्रुप पे एक गाली बार-बार मारी जाती है, उस गाली को उठा के एक फूलों का गुलदस्ता बनाना और बैज ऑफ ऑनर बनाना, यह भी ऐतिहासिक प्रोसेस है।”

उन्होंने आगे गालियों का बचाव करते हुए कहा, “ज्यादातर जो गालियाँ हैं वो एक्चुअली एंटी-पेट्रियारकल हैं, मुझे गालियाँ सुनके लगा कि यह भी वो जो रेजिस्टेंस का एक पोक, दिस इज अ काइंड ऑफ रेजिस्टेंस जो व्हिच आवर जनरेशन, तो मुझे लगता है गालियाँ सुनके लगा कि यह भी रेजिस्टेंस का हिस्सा है।”

एक पूर्व विश्वविद्यालय प्रोफेसर द्वारा युवाओं की अशिष्टता, अमर्यादित भाषा और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के प्रति गालियों को ‘बैज ऑफ ऑनर’ और ‘फूलों का गुलदस्ता’ बताकर बढ़ावा देना वामपंथी बौद्धिक वर्ग के नैतिक पतन की चरम सीमा को दर्शाता है।

JNU के मंच का दुरुपयोग और युवाओं के मन में जहर घोलने का प्रयास

इंटरव्यू के अंत में निवेदिता मेनन ने यह खुलकर स्वीकार किया कि वे किस प्रकार युवाओं की इन अराजक कार्यशैली से सीख रही हैं और इसे बढ़ावा देना चाहती हैं।

उन्होंने कहा, “यह RSS और BJP वाले जब प्रोपेगेंडा करते हैं, उनसे सीखूँगी मैं, उनसे सीखूँगी कैसे जब कीचड़ उछाला जाता है आप कीचड़ को उठा के उनके ऊपर नहीं, उसको एक तरह से गुब्बारा या गुलदस्ता बना के वापस उछाल रहे हैं।”

एक प्रोफेसर का यह दायित्व होता है कि वह छात्रों को अध्ययन, अनुशासित बहस, राष्ट्रनिर्माण और संवैधानिक मर्यादाओं के प्रति जागरूक करे। लेकिन इसके विपरीत, निवेदिता मेनन जैसे वामपंथी विचारक युवाओं के मन में देश की राज्य व्यवस्था, न्यायपालिका और सीमाओं के प्रति आक्रोश और अलगाववाद की भावना को भड़काने में लगे रहते हैं।

निवेदिता मेनन का पुराना ‘कच्चा-चिट्ठा’: विवादित बयानों की पूरी लिस्ट

भारत को ‘मनहूस देश’ बताना या भारतीय सेना व संवैधानिक व्यवस्था पर हमले करना निवेदिता मेनन की किसी नई सोच का नतीजा नहीं है। अगर उनके पिछले करियर और रिकॉर्ड की समीक्षा की जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि उनका पूरा इतिहास ही भारत विरोधी बयानों, सेना के अपमान, अलगाववादियों के समर्थन और हिंदू विरोधी एजेंडे से भरा पड़ा है।

भारत ने कश्मीर पर अवैध रूप से कब्जा कर रखा है: निवेदिता का विवादित बयान

मार्च 2016 में, JNU परिसर में ‘आजादी’ के नारों को लेकर जारी विवाद के दौरान निवेदिता मेनन ने ‘व्हाट नेशनहुड मीन्स टू मी’ (मेरे लिए राष्ट्रवाद का क्या अर्थ है) विषय पर एक सार्वजनिक व्याख्यान दिया था। इस भाषण में उन्होंने खुले तौर पर कहा था, “हम सभी जानते हैं कि कश्मीर पर भारत का कब्जा अवैध है। दुनिया भर में यह माना जाता है कि भारत ने कश्मीर पर गैर-कानूनी तरीके से कब्जा कर रखा है (India is illegally occupying Kashmir)।”

उन्होंने टाइम और न्यूजवीक जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के विवादित नक्शों का संदर्भ देकर यह तर्क दिया था कि यदि पूरा विश्व भारत को कश्मीर में एक आक्रामक शक्ति मानता है, तो घाटी में ‘आजादी’ के नारे लगना पूरी तरह से जायज और प्राकृतिक है। उनके इस वक्तव्य से देश भर में भारी आक्रोश पैदा हुआ था।

भारतीय सैनिकों का अपमान और ‘रोजी-रोटी के लिए काम करने’ का आरोप

फरवरी 2017 में जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय (JNVU), जोधपुर में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में निवेदिता मेनन मुख्य वक्ता थीं। वहाँ उन्होंने न केवल भारत का विवादित नक्शा प्रदर्शित किया, बल्कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले भारतीय सेना के जवानों का घोर अपमान किया।

उन्होंने कहा था, “सैनिक देश की रक्षा या देशभक्ति के लिए सीमाओं पर नहीं खड़े हैं, बल्कि वे केवल अपनी आजीविका (रोजगार) चलाने और अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए सेना में काम करते हैं।” उन्होंने आगे यह भी कहा था कि भारत को सियाचिन जैसे क्षेत्रों से अपनी सेना हटा लेनी चाहिए और उस पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए।

इस राष्ट्र-विरोधी बयान के बाद जोधपुर में विश्वविद्यालय परिसर से लेकर सड़कों तक विरोध प्रदर्शन हुए थे, मेनन के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी और संगोष्ठी की आयोजक प्रोफेसर को निलंबित कर दिया गया था।

भारत के आधिकारिक मानचित्र और अखंडता पर सवाल उठाना

निवेदिता मेनन ने अपने कई व्याख्यानों और लेखों में भारत के भौगोलिक मानचित्र की वैधता को खारिज किया है। ‘हिमालयन मैगजीन’ और विदेशी प्रकाशनों के विवादित नक्शों का हवाला देकर उन्होंने बार-बार यह तर्क दिया है कि भारत एक ‘कृत्रिम राष्ट्र-राज्य’ है।

वे उत्तर-पूर्व भारत और कश्मीर के भारत में विलय को एक ‘सैनिक जबर्दस्ती’ के रूप में पेश करती हैं, जो सीधे तौर पर भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने वाला रुख है।

‘लव जिहाद’ पर वामपंथी-इस्लामी साँठगाँठ: आरफा खानम और निवेदिता मेनन द्वारा पीड़ित हिंदुओं का मजाक

निवेदिता मेनन और ‘द वायर’ की प्रोपेगैंडिस्ट आरफा खानम शेरवानी की एक पुरानी बातचीत का विश्लेषण यह साफ उजागर करता है कि किस तरह वामपंथी और इस्लामी मिलकर हिंदू समाज की सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दों का मजाक उड़ाते हैं।

अपने एक पॉडकास्ट में आरफा खानम और निवेदिता मेनन ने ‘लव जिहाद’ जैसे संगठित सामाजिक अपराध को वामपंथी चालाकी से न केवल पूरी तरह खारिज किया, बल्कि पीड़ित हिंदू परिवारों और हिंदू पुरुषों पर बेहद शर्मनाक टिप्पणियां कीं।

जब आरफा खानम ने अपना एजेंडा आगे बढ़ाते हुए सवाल पूछा कि ‘हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़के ही क्यों पसंद आते हैं?’, तो निवेदिता मेनन ने ठहाके लगाते हुए बेहद गैर-जिम्मेदाराना जवाब देते हुए कहा, “मुस्लिम मर्द होंगे इतने अट्रैक्टिव और उनको अपने ही धर्म में वो नहीं मिलता होगा।”

आरफा और निवेदिता की इस जोड़ी ने लव जिहाद के पीछे की उस गहरी कड़वी सच्चाई को छिपाने की कोशिश की, जहाँ मुस्लिम युवक अपनी मजहबी पहचान छिपाकर हाथ में कलावा बाँधते हैं, फर्जी हिंदू नाम रखकर हिंदू लड़कियों को अपने जाल में फंसाते हैं और बाद में यौन शोषण व धर्मांतरण का दबाव बनाते हैं।

आरफा खानम द्वारा पूछे गए इस दुर्भावनापूर्ण सवाल पर निवेदिता का ठहाके लगाना यह साबित करता है कि तथाकथित लिबरल-फेमिनिस्ट चोला ओढ़ने वाली ये महिलाएँ कट्टरपंथियों को बौद्धिक संरक्षण देने के लिए हिंदू समाज को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़तीं।

भारतीय संविधान, हिंदू धर्म और हिंदुत्व पर अनर्गल टिप्पणियाँ

प्रोफेसर मेनन अपने भाषणों में लगातार हिंदू समाज की सांस्कृतिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और हिंदुत्व की अवधारणा पर तीखे हमले करती रही हैं। वे हिंदुत्व को एक उग्र, हिंसक और महिला-विरोधी विचारधारा के रूप में चित्रित करती हैं, जबकि अन्य धर्मों में मौजूद कड़े कट्टरपंथ और कुरीतियों पर वे पूरी तरह मौन धारण कर लेती हैं।

हिंदू धर्म की मान्यताओं को निशाना बनाकर बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ असंतोष फैलाना उनकी रणनीतिक बयानबाजी का मुख्य हिस्सा रहा है।

देश की न्यायपालिका, पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की साख पर प्रहार

मेनन का यह रिकॉर्ड रहा है कि वे भारत की किसी भी संवैधानिक संस्था पर भरोसा नहीं करतीं। कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए अलगाववादियों या आतंकवादियों के समर्थकों के मामले में वे हमेशा न्यायपालिका के फैसलों पर सवाल उठाती हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए जाँच के आदेशों को वे ‘राज्य का दमन’ बताती हैं और पुलिस द्वारा की जाने वाली कानूनी कार्रवाइयों को ‘राजनीतिक उत्पीड़न’ का नाम देती हैं। इस प्रकार वे युवाओं के मन में भारतीय राज्य व्यवस्था के प्रति पूर्ण अविश्वास पैदा करने का काम करती हैं।

वैचारिक अराजकता और राष्ट्र-विरोधी आख्यान का वास्तविक आईना

निवेदिता मेनन के इस हालिया इंटरव्यू और उनका पुराना विवादित इतिहास यह साफ उजागर करता है कि उनका पूरा आख्यान केवल किसी राजनीतिक दल या सरकार का विरोध नहीं है, बल्कि भारत के राष्ट्र-राज्य, उसकी संप्रभुता और संवैधानिक ढाँचे पर किया गया एक गहरा प्रहार है।

भारत जैसे विविध और सहिष्णु देश को ‘मनहूस’ बताना, देश की रक्षा करने वाली भारतीय सेना के शौर्य को मात्र ‘रोजी-रोटी का जरिया’ करार देना, कश्मीर पर भारत के संप्रभु अधिकारों को अवैध बताना और देशविरोधी गतिविधियों में शामिल आरोपितों को ‘क्रांति का बीज’ कहना- यह सब एक सुनियोजित वामपंथी-अलगाववादी सोच का हिस्सा है।

JNU जैसे देश के प्रतिष्ठित और जन-साधारण के करदाताओं के पैसों से चलने वाले शिक्षण संस्थानों के मंचों का उपयोग यदि युवाओं में राष्ट्र, सीमाओं, पुलिस और न्यायपालिका के प्रति नफरत भरने के लिए किया जाएगा, तो यह देश की जड़ों को कमजोर करेगा।

लोकतंत्र में असहमति और वैचारिक आलोचना का हमेशा स्वागत है, लेकिन जब असहमति के नाम पर राष्ट्र के अस्तित्व को नकारा जाने लगे, गालियों को ‘सम्मान का पदक’ (Badge of Honor) बनाकर पेश किया जाने लगे और अराजकता को बढ़ावा दिया जाए, तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं बल्कि ‘वैचारिक आतंकवाद’ कहा जाएगा।

निवेदिता मेनन का यह पूरा कच्चा-चिट्ठा देश के जागरूक समाज और युवाओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि बौद्धिक आवरण में छिपे इस राष्ट्र-विरोधी एजेंडे को पहचानना और इसका तार्किक रूप से खंडन करना अत्यंत आवश्यक है।

कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन पर गला फाड़ने वाले रवीश कुमार झारखंड पेपर लीक पर क्यों हैं खामोश?

रवीश कुमार… यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। खुद को निष्पक्ष पत्रकार कहने वाले रवीश कुमार असल में प्रोपोगेंडा की दुकान चलाने वाले पत्रकार हैं। ये अपनी छवि चमकाने और मोटी कमाई करने के लिए सिर्फ वही मुद्दे उठाते हैं जिससे इनका एजेंडा पूरा हो सके। जब बात इनके आकाओं को खुश करने की हो, तो यह अपनी कलम और माइक का पूरा इस्तेमाल करते हैं। लेकिन जहाँ इनके मालिकों को गुस्सा आने का डर होता है, वहाँ इनकी बोलती बंद हो जाती है। दिल्ली में हुए हालिया कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन और झारखंड के पेपर लीक मामले पर इनकी चुप्पी इस दोमुँही पत्रकारिता का सबसे बड़ा सबूत है।

कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन पर खूब बहाए थे आँसू

दिल्ली में हुए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के प्रदर्शन के दौरान रवीश कुमार का असली रंग पूरी तरह से सामने आ गया था। इस प्रदर्शन को हवा देने के लिए उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स का जमकर इस्तेमाल किया। उनके यूट्यूब चैनल पर सीजेपी के प्रदर्शन से जुड़े 15 से ज्यादा वीडियो भरे पड़े हैं। इतना ही नहीं, इंस्टाग्राम पर अलग से Reels शेयर की गईं और X पर लगातार भ्रामक पोस्ट किए गए।

इन वीडियोज के जरिए आम जनता को भड़काने की पूरी कोशिश की गई। प्रधानमंत्री को निशाना बनाया गया और विरोध प्रदर्शन के नाम पर उत्पात मचाने वाले दंगाइयों का खुला समर्थन किया गया। हद तो तब हो गई जब दिल्ली पुलिस पर जानलेवा हमला करने वाले उपद्रवियों को रवीश कुमार ने बेचारा और लाचार साबित करते हुए बचाने की पूरी कोशिश की। सच्चाई से कोसो दूर रहकर उन्होंने इस पूरे ड्रामे को ऐसे दिखाया जैसे वे कोई बहुत बड़े क्रांतिकारी हों। हाथों में पत्थर-लाठी लिए और मुँह में भरी गाली-गलौज के साथ उत्पात मचाने वालों को ये छात्र कहते नजर आए थे।

इसके अलावा, रवीश कुमार ने सुरक्षा में तैनात दिल्ली पुलिस को ही कठघरे में खड़ा कर दिया था। संसद की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों और जवानों पर पथराव करने वाले, मॉब लिंचिंग करने वाले, सड़क पर घेरकर मारपीट करने वाले और तो और हथियार लहराकर धमकी देने वाले उपद्रवियों को प्रोपेगेंडाई रवीश कुमार छात्र कहते रहे। रवीश कुमार ने एक X पर पोस्ट, Video या अपनी Reel में दिल्ली पुलिस का कहीं बचाव या उनके काम की सराहना नहीं की थी। उल्टा देश की सुरक्षा करने वालों को ही अपराधी कहकर लोगों को घुमराह करते रहे।

झारखंड पेपर लीक पर अचानक क्यों सूंघ गया साँप?

रवीश कुमार का एक नजरिया यहाँ भी देख लेते हैं। जैसे ही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन खत्म हुआ, धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया, दिल्ली का माहौल जमकर खराब किया, उसके बाद इन भाईसाहब को साँप सूंघ गया। और अब देश में युवाओं के भविष्य से जुड़ा झारखंड पेपर लीक का गंभीर मुद्दा सामने आया, रवीश कुमार की सारी पत्रकारिता हवा हो गई। इनके किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर झारखंड से जुड़ा एक भी शब्द लिखा नहीं मिलेगा।

हमने रवीश कुमार के यूट्यूब चैनल को खंगालकर देखा। उनके पिछले कुछ दिनों के वीडियोज की लिस्ट देखी। पिछले 8 दिनों में उनके चैनल पर अपलोड किए गए आखिरी 9 वीडियोज के टॉपिक आपको इन मुद्दों पर मिलेंगे, जिनमें उनकी पत्रकारिता चमकेगी। इसमें प्रशांत किशोर की बड़ी जीत, संसद से क्यों गायब रहे अमित शाह?, क्यों डूब रहा असम?, अमित शाह इस्तीफा दें- राहुल गाँधी, यही हैं हमारे नए शिक्षा मंत्री, संसद में पेपर लीक पर बहस, पुलिस हिंसा पर नई रिपोर्ट, जेनरेशन गटर!? यह क्या कंगना?, झुक गई बिहार सरकार, जेन जी होंगे रिहा और भगवा भरोसे बीजेपी…

रवीश कुमार के यूट्यूब चैनल पर डाले गए आखिरी के 9 Videos

इन सभी वीडियोज में आपको सरकार को घेरने वाले तमाम मसाले मिल जाएँगे, लेकिन झारखंड के छात्रों के दर्द पर एक भी वीडियो नहीं मिलेगा। बता दें कि फिल्हाल रवीश कुमार के यूट्यूब चैनल पर 14.8 मिलियन सब्सक्राइबर है और कुल वीडियो 1.6K डाली गई है। बात करें इंस्टाग्राम की तो रवीश कुमार के इंस्टाग्राम पर फॉलोवर्स 4.9 मिलियन है और कुल पोस्ट 2900 से ज्यादा है। इसके अलावा, रवीश कुमार के X हैंडल (पहले ट्विटर) पर फॉलोवर्स की संख्या 4.2 मिलियन है और 49.2K पोस्ट है।

फायदे की पत्रकारिता और आकाओं को खुश करने की मजबूरी

सवाल यह उठता है कि आखिर झारखंड पेपर लीक पर रवीश कुमार ने पूरी तरह चुप्पी क्यों साध रखी है? इसका सीधा सा जवाब है कि इस मुद्दे से उन्हें या उनके आकाओं को कोई राजनीतिक फायदा नहीं मिलने वाला है। अगर वे इस पर बोलेंगे, तो शायद उनके अपने लोग ही नाराज हो जाएँगे।

रवीश कुमार केवल उन्हीं मुद्दों पर अपना गला फाड़ते है जहाँ उन्हें लगता है कि इससे बीजेपी को बदनाम किया जा सकता है। जहाँ हिंसा करने वालों या हंगामा मचाने वालों को हीरो बनाया जा सकता है, वहाँ ये सबसे आगे रहते हैं। लेकिन जहाँ सचमुच देश के युवाओं का नुकसान हो रहा हो, वहाँ ये अपनी आँखें मूँद लेते हैं।

इस पूरी स्थिति से यह साफ हो जाता है कि रवीश कुमार जैसे लोग पत्रकारिता के नाम पर सिर्फ अपना दुकान चला रहे हैं। दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना, दंगाइयों के सिर पर हाथ रखना और पुलिस का अपमान करना इनके एजेंडे का हिस्सा था। लेकिन झारखंड के युवाओं के भविष्य की जब बात आई, तो इनका मौन इनकी असलियत बयाँ कर रहा है। जनता अब बहुत समझदार हो चुकी है और ऐसे चेहरों के दोगलेपन को अच्छी तरह पहचानती है।

तृषा कृष्णन और CM विजय पर अभद्र टिप्पणी करने के मामले में उदयनिधि स्टालिन गिरफ्तार, पहले भी महिलाओं पर दे चुके हैं विवादित बयान: सनातन को खत्म करने का भी देखते हैं सपना

तमिलनाडु की राजनीति में विरोधी दलों से जुड़ी महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करने के कई मामले सामने आ चुके हैं। इसी सिलसिले में DMK के नेता और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने 3 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय की आलोचना करते हुए अभिनेत्री तृषा कृष्णन को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की।

तृषा कृष्णन को निशाना बनाकर की गई इस मानहानिकारक टिप्पणी के मामले में मंगलवार (4 अगस्त 2026) को पुलिस ने उदयनिधि स्टालिन को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया।

3 अगस्त को कर्नाटक के साथ कावेरी जल बंटवारे के मुद्दे पर तंजावुर में आयोजित एक विरोध रैली को संबोधित करते हुए उदयनिधि स्टालिन ने आरोप लगाया कि सीएम विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) सरकार कावेरी का पानी नहीं मिलने के मुद्दे पर चुप है और उसका पूरा ध्यान DMK नेताओं के खिलाफ कथित तौर पर झूठे मामले दर्ज कराने पर है।

इसी दौरान रैली में मौजूद DMK कार्यकर्ताओं ने ‘तृषा, तृषा’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। इस पर उदयनिधि स्टालिन कुछ पल रुके, मुस्कुराए और एक ऐसी टिप्पणी की, जिसे कई लोगों ने आपत्तिजनक और दोहरे अर्थ वाली टिप्पणी के तौर पर देखा।

तृषा कृष्णन का नाम लिए बिना उदयनिधि स्टालिन ने कहा, “हमारे यहाँ पानी आए या न आए, वहाँ पानी जरूर पहुँचना चाहिए। उन्हें बस इसी की चिंता है।” इसके बाद उन्होंने सफाई देते हुए कहा, “मेरा मतलब कावेरी के पानी से था।”

सोशल मीडिया पर यह वीडियो तेजी से वायरल हो गया है, जिस पर अलग-अलग राजनीतिक दलों और वैचारिक पृष्ठभूमि के लोगों ने प्रतिक्रिया दी है। कई लोगों ने अभिनेत्री त्रिशा कृष्णन को लेकर उदयनिधि स्टालिन की कथित दोहरे अर्थ वाली टिप्पणी की आलोचना की है।

तृषा इन दिनों अभिनेता से राजनेता बने और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के साथ अपने कथित निजी संबंधों को लेकर भी चर्चा में हैं। उदयनिधि स्टालिन की टिप्पणी को लेकर तमिलनाडु की राजनीति भी गरमा गई है।

TVK विधायक रेवन्थ चरण ने इसे ‘घृणित और अस्वीकार्य’ बताते हुए कहा, “इसी वजह से तमिलनाडु की जनता ने आपको नकार दिया और आज आप जिस स्थिति में हैं, वहीं सीमित कर दिया। अरिवालयम के पहले से ही बेहद निम्न स्तर के बावजूद यह उससे भी नीचे की बात है।”

तमिलनाडु भाजपा ने भी विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन की कथित टिप्पणी की कड़ी निंदा की। पार्टी ने इसे ‘घृणित, अश्लील, अभद्र और शर्मनाक’ करार देते हुए उनके बयान पर सवाल उठाए।

तमिलनाडु भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए पूछा कि वह अपने बेटे उदयनिधि स्टालिन की एक महिला के खिलाफ अभद्र टिप्पणी पर मौन क्यों हैं। उन्होंने उदयनिधि स्टालिन की गिरफ्तारी की भी माँग की थाी।

इधर सत्तारूढ़ TVK ने इस मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) को पत्र लिखकर उदयनिधि स्टालिन के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है। पार्टी का कहना है कि उनकी भाषा सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं को वस्तु समझने और मौखिक उत्पीड़न (Verbal harassment) को सामान्य बनाती है तथा सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों से अपेक्षित मर्यादा को गंभीर रूप से ठेस पहुँचाती है।

TVK ने यह भी कहा कि इस तरह का आचरण सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के प्रति व्यवहार को लेकर एक ‘खतरनाक मिसाल’ कायम करता है। TVK ने राष्ट्रीय महिला आयोग से आग्रह किया है कि वह उदयनिधि स्टालिन से इस मामले में स्पष्टीकरण माँगे और उन्हें बिना शर्त सार्वजनिक माफी जारी करने का निर्देश दे।

साथ ही पार्टी ने माँग की है कि उनके खिलाफ सार्वजनिक अश्लीलता फैलाने और महिला की मर्यादा का कथित रूप से अपमान करने से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जाए।

राजनीतिक विरोधियों पर निशाना साधने के लिए महिलाओं को घसीटने के आरोपों को लेकर पहले भी विवादों में रहे हैं उदयनिधि स्टालिन

अभिनेत्री तृषा कृष्णन पर कथित तौर पर निशाना साधते हुए की गई दोहरे अर्थ वाली टिप्पणी को लेकर उदयनिधि स्टालिन को भारी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। हालाँकि, राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से जुड़ी महिलाओं को निशाना बनाते हुए लैंगिक (सेक्सिस्ट) टिप्पणियाँ करने के आरोप पहले भी उन पर लग चुके हैं।

2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों से पहले, प्रचार के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने कहा था, “जब भी मैं अपने चुनावी भाषण में एडप्पडी सरकार का जिक्र करता हूँ, लोग मुझसे एडप्पडी नहीं, बल्कि ‘एडुपुडी’ (किसी के इशारों पर चलने वाला) कहने को कहते हैं। मैं पूछता हूँ कि एडुपुडी कौन है, तो लोग कहते हैं, मोदी का एडुपुडी। मेरी हाल की एक रैली में भीड़ से किसी ने कहा कि वह एडुपुडी नहीं, बल्कि ‘डेड बॉडी’ है, क्योंकि वह शशिकला के पैरों में गिर चुका है।”

इसी वर्ष जब TVK ने सरकार बनाई, तब उदयनिधि स्टालिन ने TVK प्रमुख जोसेफ विजय पर अपने राजनीतिक हमलों में उनकी पत्नी संगीता सोर्नालिंगम को भी घसीटा था। उन्होंने कहा था, “उनका (विजय का) ‘कुट्टी स्टोरी’ सुनाने वाला भाषण विधानसभा की गरिमा के पूरी तरह खिलाफ है। चेंगलपट्टू कोर्ट में अपने पति को तलाशती पत्नी की कहानी पूरे तमिलनाडु को पता है।”

मुख्यमंत्री विजय और उनकी पत्नी के बीच निजी विवाद को अपने राजनीतिक हमलों में घसीटने को लेकर उदयनिधि स्टालिन की उस समय कड़ी आलोचना हुई थी। और अब एक बार फिर उदयनिधि स्टालिन ने छोटे राजनीतिक लाभ के लिए तृषा कृष्णन और सीएम विजय के कथित निजी संबंधों को अपने राजनीतिक हमले का हिस्सा बनाया है।

उदयनिधि स्टालिन पिछले कई वर्षों में अलग-अलग कारणों से विवादों में रहे हैं। वर्ष 2023 में उन्होंने सनातन धर्म की तुलना ‘डेंगू, मलेरिया’ से करते हुए इसके ‘उन्मूलन’ का आह्वान किया था। उस समय देशभर में उनके खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी डीएमके नेता को फटकार लगाई थी।

अभिनव पांडे से मिलिए: जंतर-मंतर आंदोलन का मुखर ‘एक्टिविस्ट’, जिसने झारखंड पेपर लीक मामले पर साधी चुप्पी

झारखंड पेपर लीक मामले में हेमंत सोरेन सरकार का बचाव करने की कोशिश कर रहे न्यूज पिंच के संस्थापक अभिनव पांडे इन दिनों चर्चा में हैं। दरअसल राँची में हजारों छात्र JPSC सिविल सर्विसेज और JSSC-CGL परीक्षाओं के दौरान धांधली, पेपर लीक और प्रश्नपत्रों के छेड़छाड़ के साथ-साथ OMR शीट के खिलाफ जवाबदेही की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के पूरे समय कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कार्यकर्ताओं की भाषा बोलने वाले अभिनव, झारखंड के छात्र प्रदर्शन के मामले में आक्रमक नहीं दिखे। पेपर लीक जैसे मुद्दे यहाँ भी हैं और विरोध करने वाले छात्र ही हैं। लेकिन हेमंत सरकार से सवाल पूछने के बजाए अभिनव पांडे परीक्षा में हुई गड़बड़ियों पर सोरेन सरकार के रुख और उसकी कार्रवाइयों की जानकारी देने लगे।

CJP के प्रदर्शनों के दौरान NEET पेपर लीक को हथियार बनाया गया, भले ही मोदी सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए दोषियों को गिरफ्तार किया, एनटीए के पदाधिकारियों को निलंबित किया और शिक्षा मंत्री ने भी इस्तीफा दिया। इतना ही नहीं दोबारा परीक्षा आयोजित किया गया। उसके रिजल्ट आए यानी NEET यूजी 2026 को फिर से आयोजित कराने और समय पर परिणाम सुनिश्चित करने तक, सरकार ने छात्रों के भविष्य को जोखिम में न डालने के लिए हर संभव प्रयास किया।

एक रील के कैप्शन में लिखा था, “जनता सरकार के नाक तक पहुँची…लाठीचार्ज के बाद से ही Dharmendra Pradhan के इस्तीफे की उल्टी गिनती शुरू हो गई थी…”

मोदी सरकार ने जो त्वरित कदम उठाए और दोबारा सफलतापूर्व परीक्षा करवाए, उसकी जानकारी देना तो दूर अभिनव पांडे ने ‘पत्रकार’ होने का ढोंग भी छोड़ दिया। वह जंतर-मंतर पर पूर्णकालिक ‘कार्यकर्ता’ बन गए (बेशक, छात्रों की भलाई के नाम पर) और उतने ही उकसाने वाले कैप्शन के साथ भड़काऊ वीडियो पोस्ट करने लगे। एक समय पर, वह विपक्षी दलों के प्रवक्ता की तरह बोलने लगे थे।

अपने सोशल मीडिया प्रभाव का उपयोग करते हुए अभिनव पांडे ने कॉकरोच जनता पार्टी के एजेंडे को अंजाम तक पहुँचाने में मदद की। एक अन्य रील का कैप्शन था, “Gen-G छात्र जीत गए, हमने कहा था Modi सरकार को झुकना पड़ेगा।”

यह ‘पत्रकारिता’ नहीं, बल्कि सीधी राजनीतिक तरफदारी है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि CJP समर्थकों ने सच के उनके संस्करण को रिपोर्ट करने के लिए उनकी सराहना की।

एक अन्य रील के कैप्शन में कहा गया, “इस्तीफा दिया नहीं, छात्रों ने कलेजे पर चढ़कर लिया…Dharmendra Pradhan के इस्तीफे के बाद Jantar Mantar पर क्या माहौल?।”

अपने नैरेटिव को और आगे बढ़ाने के लिए, न्यूज़ पिंच द्वारा एक प्रदर्शनकारी को मंच दिया गया, जिसने दावा किया, “‘इस्तीफा छीना गया, वो लड़ाई हारे हैं'”

लेकिन अभिनव पांडे की यह नौटंकी यहीं खत्म नहीं हुई। उन्होंने वामपंथी-इस्लामवादी बयानबाज़ी को भुनाया कि किसी न किसी तरह भारत के विचार में सभी का योगदान है और यह किसी के बाप का नहीं है। एक और रील का कैप्शन था, “CJP Protest में Gen Z ने तय कर दिया है कि देश किसी पार्टी की जागीर नहीं, सरकार युवाओं की है।”

न्यूज पिंच को कॉकरोच जनता पार्टी से अलग करना व्यावहारिक रूप से असंभव हो गया। दोनों ने मिलकर एक दुर्भावनापूर्ण नैरेटिव फैलाने और युवाओं को गुमराह करने का काम किया। इस ‘न्यूज आउटलेट’ ने पार्टी के प्रचार अंग के रूप में काम किया।

इस सब के बावजूद, न्यूज पिंच के सह-संस्थापक सौरभ त्रिपाठी में अन्य पत्रकारों को ‘गोदी मीडिया’ कहकर नीचा दिखाने की कोशिश की थी।

अभिनव पांडे और झारखंड पेपर लीक संकट

लेकिन स्थिति की विडंबना यहीं खत्म नहीं हुई। रविवार (2 अगस्त) को, अभिनव पांडे ने एक ट्वीट किया जिसमें बताया गया कि झारखंड सरकार चल रहे पेपर लीक संकट से निपटने के लिए किस तरह सक्रिय रूप से कदम उठा रही है।

वर्तमान मुख्यमंत्री की तारीफ के पुल बाँधते हुए उन्होंने कहा, “जंतर मंतर से सबक ले रही हेमंत सोरेन सरकार। अब तक किसी तरह के बल प्रयोग को मना किया है। छात्रों के धरने के बीच कई एक्शन हुए हैं।”

अभिनव ने आगे दावा किया, “भर्ती गड़बड़ी में शामिल 11 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। JPSC अध्यक्ष का इस्तीफा हो चुका है। JPSC अध्यक्ष से लगातार 3 दिन से 8-8 घंटे की पूछताछ। 14वीं JPSC की परीक्षा टल गई है। मेंस रद्द…JPSC अध्यक्ष और पूर्व चीफ सेक्रेटरी ख्यांगते की गिरफ्तारी संभव…”

जब इस ‘निष्पक्ष पत्रकार’ का हेमंत सोरेन सरकार का पीआर (PR) काम पूरा हो गया, तो उसने दावा किया, “जिस छात्र का ORM लीक हुआ, उसकी गिरफ़्तारी हुई। वो आजसू नेता का बेटा है। NDA का घटक दल है आजसू”।”

संतुलन बनाने की कोशिश करते हुए अभिनव पांडे ने लिखा, “अब छात्रों की माँग है कि पूरे मसले की CBI जाँच हो, फिलहाल CID जाँच कर रही है। ध्वस्त भर्ती प्रणाली में विश्वास की बहाली के लिए @HemantSorenJMM जी जाँच क्यों अनुशंसित नहीं कर रहे हैं? और सवाल ये भी कोई भी भर्ती आपके राज्य में बिना विवाद के पूरी क्यों नहीं हो पाती?”

जब नेटिज़न्स ने ध्यान दिलाया कि अभिनव पांडे का ‘एक्टिविस्ट मोड’ नदारद है, तो वह जल्द ही अपने सह-संस्थापक सौरभ त्रिपाठी के साथ स्थिति को संभालने (फायरफाइटिंग) के मोड में आ गए।

लेकिन यह अंतर साफ और बेशर्म करने वाला था। हालाँकि न्यूज पिंच के संस्थापकों ने झारखंड छात्र विरोध प्रदर्शन के बारे में बात जरूर की (गैर-भाजपा शासित राज्य में छात्रों की दुर्दशा के प्रति उदासीन होने के आरोप से बचने के लिए), लेकिन उनके तेवर और तीव्रता में भारी बदलाव आया था।

हेमंत सोरेन सरकार पर अपने शिक्षा मंत्री को हटाने के लिए दबाव बनाने या इस्तीफे की माँग करने वाला कोई अभियान नहीं चलाया गया। यह कवरेज और जवाबदेही की माँग न केवल ढीली थी, बल्कि नाममात्र के बराबर थी।

दरअसल ‘जंतर-मंतर का एक्टिविस्ट’ न केवल राँची में शारीरिक रूप से अनुपस्थित था, बल्कि सोशल मीडिया पर भी थोड़ा नरम रुख अख्तियार किए हुए था।

यह एजेंडा-संचालित पत्रकारिता का एक सटीक उदाहरण है जहाँ सहूलियत के हिसाब से चुनिंदा गुस्सा, अपनी पसंद की चीजें चुनना (cherry-picking) और अतिशयोक्ति का इस्तेमाल किया जाता है।

दूसरी तरफ ‘निष्पक्ष’ दिखने और पार्टी या विचारधारा के समर्थकों को नाराज न करने की उम्मीद में इस मुद्दे पर चालाकी भरी चुप्पी, दूरी और ठंडा रवैया अपनाया जाता है।

मुझे स्वीकार करना होगा कि न्यूज पिंच के अभिनव पांडे ने वास्तव में इस कला में महारत हासिल कर ली है। वैसे भी वे अपनी अहसानफरामोशी और दिमागी कसरत (mental gymnastics) के लिए जाने जाते हैं।

काँवड़ियों ने न पुलिस को पीटा, न वर्दी फाड़ी: मेरठ की घटना पर झूठ फैला रहे वामपंथी-कट्टरपंथी

सावन के महीने में वामपंथियों की आँखों में काँवड़िए सबसे ज़्यादा खटकते हैं, इसलिए इस दौरान वे हर संभव तरीके से काँवड़ियों की छवि धूमिल करने का प्रयास करते हैं। हाल ही में ऐसी ही एक कोशिश मेरठ की एक घटना को लेकर की गई, जहाँ सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल करके यह अफवाह फैलाई गई कि काँवड़ियों ने पुलिस के साथ मारपीट की है। हालाँकि, जब इस मामले पर पुलिस का आधिकारिक बयान आया, तो सच्चाई कुछ और ही निकली।

वीडियो में था क्या?

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में एक जीप के बाहर कुछ काँवड़िए खड़े दिखते हैं और वह जीप में बैठे लोगों को- इसे बाहर निकालो, बाहर निकल जैसी बातें कह रहे हैं। उन्होंने पुलिस जीप को घेरा हुआ है और लगातार किसी को बाहर निकालने की कोशिश हो रही है। अब इसी वीडियो को कई वामपंथी और कट्टरपंथियो ने अपने हैंडल पर साझा किया है।

काँवड़ियों पर लगाया गया पुलिस को पीटने का इल्जाम

मुस्लिम वॉयस सेल का ट्वीट देखिए। इस ट्वीट में उन्होंने काँवड़ियों को निशाना बनाते हुए कहा यूपी में कानून व्यवस्था का हाल देखिए। मेरठ के दौराना में बाइक सवार की टक्कर के बाद पहुँचे सादा कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मियों को काँवड़ियों ने जीप से बाहर निकालकर पीटा।

पीयूष राय ने भी इस वीडियो को साझा करते हुए ऐसा ही दावा किया, जिसे बकायदा फैक्टचेकर मोहम्मद जुबैर ने तक ने रिपोस्ट किया।

सचिन गुप्ता ने भी अपने ट्वीट में कहा चूँकि एक बाइक सवर ने काँवड़ियों को टक्कर मार दी थी। जब पुलिस वहाँ पहुँची तो काँवड़िए पुलिस को ही पीटने लगे जबकि टक्कर मारने वाला भाग गया।

जाकिर त्यागी ने भी इस खबर को इसी प्रकार फैलाया जैसे काँवड़ियों ने पुलिस को इतनी बेरहमी से पीट दिया है कि उन्हें जान बचाकर भागना पड़ा।

पुलिस का बयान

अब मेरठ पुलिस का इस पर बयान आया है, जिनका कहना है कि सोशल मीडिया पर जो वीडियो इस दावे के साथ वायरल हो रही है कि काँवड़ियों ने पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की है। उनकी वर्दी को फाड़ा है, वो एकदम गलत है।

पुलिस के अनुसार जाँच के बाद यह सामने आया है कि 3 अगस्त की रात जब दो काँवड़ियों का ग्रुप आमने सामने आए तो, गाड़ी में बैठे व्यक्ति जिनका नाम सोनू है। जब ये अपने साथी गुड्डू के साथ हरिद्वार जा रहे थे तभी दूसरी ओर से आने वाले अन्य काँवड़ियों के साथ इनका टकराव हुआ और मारपीट हुई।

ऐसी स्थिति में थाना दौराला पुलिस ने मौके पर पहुँचकर सूझबूझ से दोनों पक्षों को रोकने का प्रयास किया। इस दौरान सोनू और गुड्डू को गाड़ी में बिठाया गया। तभी दूसरा पक्ष उग्र होकर इन्हीं दो लोगों को गाड़ी से निकालते हुए दिखाई दे रहा है। पुलिस अधिकारी ने बताया कि इस घटना के बाद वो दोनों पक्षों को लेकर जाकर उनका मेडिकल करवाया था और अब आगे की कार्रवाई की जा रही है।

बता दें कि केवल सोशल मीडिया पर ही नहीं मेनस्ट्रीम मीडिया में भी इस पूरी घटना को गलत तरीके से पेश करने का काम हुआ है। बिना पुलिस के पक्ष को जाने शुरू में यही फैलाया गया कि काँवड़ियों ने पुलिस को पीटा है। हालाँकि बाद में पुलिस के बयान के साथ खबरों को अपडेट किया गया। ऊपर टीवी9 भारतवर्ष पर चली खबर में देख सकते हैं- साफ-साफ ये लिखा गया कि ‘2 पुलिसकर्मियों की पिटाई की गई’ लाइन से पूरी खबर को दिखाया गया था।