उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी के बीच बिजली को लेकर एक बार फिर सियासत तेज है। विपक्षी दल राज्य में बिजली संकट होने का दावा कर रहे हैं और कह रहे हैं कि लोग नाराज हैं। समाजवादी पार्टी प्रमुख और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी कथित बिजली संकट को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की। साथ ही, उन्होंने यह दावा भी किया कि उनके शासनकाल में बिजली व्यवस्था कहीं बेहतर थी।
लेकिन क्या वास्तव में ऐसा था? क्या उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था कभी इतनी सुचारु थी कि आज की परिस्थितियों की तुलना उससे की जा सके? इन सवालों के जवाब तलाशने पर एक ऐसी तस्वीर सामने आती है जिसमें बिजली संकट, बिजली चोरी, ट्रांसफॉर्मर फुंकने, घंटों की कटौती, VIP जिलों को विशेष सप्लाई और बिजली विभाग की बदहाल आर्थिक स्थिति जैसे कई पहलू शामिल हैं। इसी बहस के बीच अचानक साल 2013 में आई एक चर्चित डॉक्यूमेंट्री की याद भी ताजा हो जाती है- कटियाबाज।
कानपुर के बिजली संकट पर बनी थी ‘कटियाबाज’
साल 2013 में रिलीज हुई डॉक्यूमेंट्री ‘कटियाबाज’ का निर्देशन फहद मुस्तफा और दीप्ति कक्कड़ ने किया था। यह फिल्म कानपुर के बिजली संकट, बिजली चोरी और उससे जुड़े सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों पर आधारित थी। कहानी कानपुर को बिजली देने वाली सरकारी कंपनी KESCO और उसकी तत्कालीन प्रबंध निदेशक ऋतु माहेश्वरी के इर्द-गिर्द भी घूमती है।
इस डॉक्यूमेंट्री में सिर्फ बिजली चोरी नहीं दिखाई गई थी बल्कि बिजली विभाग पर भ्रष्टाचार के आरोप, भीषण गर्मी में परेशान जनता का गुस्सा, बिजली न आने की स्थिति और पूरे सिस्टम की अक्षमता को भी विस्तार से दिखाया गया था। ‘कटियाबाज’ को 2013 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ इन्वेस्टिगेटिव फिल्म का पुरस्कार भी मिला था।
क्या अखिलेश यादव के दौर में सचमुच बेहतर थी बिजली व्यवस्था?
उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दावों की पड़ताल करने पर सबसे पहले सवाल बिजली आपूर्ति के घंटों पर उठता है। अगर आप उत्तर प्रदेश से आते हैं, तो संभव है कि आपको वह दौर याद हो जब इटावा, मैनपुरी, अमेठी और रायबरेली जैसे जिलों को ‘VIP जिला’ कहा जाता था। आरोप लगते थे कि इन इलाकों में अधिक बिजली दी जाती थी जबकि बाकी प्रदेश घंटों अंधेरे में रहता था।
उत्तर प्रदेश सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे श्रीकांत शर्मा ने साल 2021 में दावा किया था कि अखिलेश यादव सरकार के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में औसतन 12 घंटे बिजली आपूर्ति होती थी। हालाँकि, यह आँकड़ा भी स्थिर नहीं था क्योंकि कई जगह ट्रांसफॉर्मर फुंक जाने, लाइन टूटने या स्थानीय तकनीकी खराबियों के चलते बिजली सप्लाई और भी कम हो जाती थी।
अगर कोई यह तर्क दे कि श्रीकांत शर्मा भाजपा के विधायक थे और इसलिए विपक्षी सरकार की आलोचना स्वाभाविक थी, तो इस दावे को परखने के लिए स्वतंत्र रिपोर्टों की ओर देखना जरूरी हो जाता है।
देश में ऊर्जा और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था Council on Energy, Environment and Water (CEEW) की State of Electricity Access in India रिपोर्ट बताती है कि साल 2015 में उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में औसतन सिर्फ 9 घंटे बिजली आपूर्ति हो रही थी। यानी प्रदेश के बड़े हिस्से में दिन का आधा समय बिजली के बिना गुजरता था।
इसका अर्थ सिर्फ इतना नहीं था कि लोग एसी या कूलर नहीं चला पा रहे थे। साल 2015 का ग्रामीण उत्तर प्रदेश आज की तुलना में कहीं कम बिजली-निर्भर था। उस दौर में एसी और फ्रिज ग्रामीण इलाकों में आम नहीं थे बल्कि कई घरों में पंखा और बल्ब चलना ही पर्याप्त माना जाता था। लेकिन स्थिति ऐसी थी कि बुनियादी बिजली जरूरतें भी नियमित रूप से पूरी नहीं हो रही थीं।
यानी आज बिजली कटौती पर जो शोर सुनाई देता है, वैसी व्यापक प्रतिक्रिया उस दौर में शायद इसलिए कम दिखती थी क्योंकि बहुत से क्षेत्रों में बिजली का लंबे समय तक न आना ही सामान्य स्थिति बन चुका था।
पीक पावर डिमांड में सपा के काल में पिछड़ता रहा उत्तर प्रदेश
आजकल ट्विटर पर हर दूसरे-तीसरे दिन ऊर्जा मंत्रालय का एक ना एक ट्वीट वायरल हो जाता है, इसमें बताया जाता है कि आज देश में बिजली की माँग नया रिकॉर्ड बना गई और उसे सप्लाई भी कर दिया गया। अब मई का महीना उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भीषण गर्मी लेकर आता है, इसके चलते बिजली की माँग बेतहाशा बढ़ती है।
इसे पीक पॉवर डिमांड कहते हैं। अगर किसी राज्य का अपना बिजली ढाँचा ठीक होता है और उसके पास बिजली सप्लाई के साधन मौजूद होते हैं तो वो ये बिजली आपूर्ति कर ले जाता है। लेकिन इस मामले में अखिलेश यादव की सरकार एकदम फिसड्डी थी।
केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करने वाले थिंक टैंक पालिसी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के डेटा के अनुसार, 12 जुलाई 2012 को उत्तर प्रदेश में 13,900 मेगावाट की पीक बिजली माँग दर्ज हुई थी। लेकिन राज्य सरकार केवल लगभग 12,000 मेगावाट बिजली ही उपलब्ध करा सकी। यानी करीब 14.11 प्रतिशत बिजली की कमी रही।
स्थिति अगले वर्षों में सुधरने के बजाय और गंभीर होती दिखाई दी। साल 2013 में बिजली सप्लाई का शॉर्टफॉल करीब 1,500 मेगावाट या लगभग 11 प्रतिशत तक दर्ज किया गया। लेकिन सबसे गंभीर संकट साल 2014 में देखने को मिला जब 14 जून 2014 को बिजली की कमी 26.9 प्रतिशत तक पहुँच गई।
यानी जिस समय गर्मी अपने चरम पर थी, उसी समय राज्य की बिजली व्यवस्था माँग के अनुरूप सप्लाई करने में लगभग एक-चौथाई तक पिछड़ रही थी।
2014 में क्यों बिगड़ी थी स्थिति? जब पावर प्लांट ठप पड़ने लगे और पूरे प्रदेश में बढ़ी कटौती
बिजली संकट के इन आँकड़ों को अगर जमीनी कारणों से जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर और साफ होती है। साल 2014 उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था के लिए सबसे मुश्किल वर्षों में गिना गया। उस समय प्रदेश के कई बिजली उत्पादन संयंत्र एक के बाद एक प्रभावित होने लगे थे। नतीजा यह हुआ कि राज्य सरकार को शहरों और गाँवों में बड़े पैमाने पर बिजली कटौती करनी पड़ी।
उस दौर की मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि हालत सिर्फ सामान्य जिलों तक सीमित नहीं थी, बल्कि कथित तौर पर VIP माने जाने वाले क्षेत्रों में भी बिजली कटौती शुरू हो गई थी। यानी वह व्यवस्था, जिस पर विपक्ष आज “बेहतर बिजली सप्लाई” का दावा करता है, गर्मियों के चरम समय में माँग के सामने लड़खड़ाती दिख रही थी।
उस समय हालात कितने खराब थे, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि इन्वर्टर बाजार अचानक तेजी से बढ़ गया था। एक रिपोर्ट में एक छोटे दुकानदार के हवाले से बताया गया था कि उसने महज कुछ महीनों में हजारों इन्वर्टर बेच दिए। यह सिर्फ कारोबार नहीं था, बल्कि उस दौर के बिजली संकट की सामाजिक तस्वीर भी थी।
उत्तर प्रदेश के शहरों और कस्बों में तब इन्वर्टर-बैटरी की दुकानें तेजी से बढ़ीं। ग्रामीण इलाकों में लोग ट्रांसफॉर्मर फुँकने के बाद प्रदर्शन करते दिखाई देते थे। कई जगहों पर रातें छतों पर गुजरती थीं क्योंकि बिजली का कोई निश्चित शेड्यूल नहीं था। तेज हवा चलना भी लोगों के लिए संकेत बन जाता था कि अब बिजली कभी भी जा सकती है।
सिर्फ बिजली की कमी नहीं, पूरा विभाग में आर्थिक संकट
बिजली आपूर्ति की समस्या एक हिस्सा थी लेकिन असली संकट वितरण व्यवस्था के भीतर भी था। उत्तर प्रदेश का बिजली तंत्र आर्थिक रूप से भी भारी दबाव में था। इसे समझने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले एक महत्वपूर्ण शब्द AT&C लॉसेस (Aggregate Technical & Commercial Losses) को समझना जरूरी है।
सरल भाषा में कहें तो इसका मतलब यह होता है कि जितनी बिजली सप्लाई की गई, उसमें से कितने का भुगतान वापस आया। अगर बिजली सप्लाई तो हो रही है लेकिन उसका पैसा नहीं लौट रहा, तो वितरण कंपनी लगातार घाटे में जाएगी।
नीति आयोग के ICED डैशबोर्ड के अनुसार, साल 2016-17 के आसपास उत्तर प्रदेश में बिजली सप्लाई की गई रकम का लगभग 40 प्रतिशत राजस्व वापस नहीं आ रहा था। इस घाटे का कुछ हिस्सा तकनीकी कारणों जैसे लाइन लॉस और ट्रांसमिशन लॉस से जुड़ा था लेकिन बड़ा कारण बिजली चोरी था।
नीति आयोग के आँकड़े बताते हैं कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) के अंतर्गत आने वाले जिलों में AT&C लॉसेस करीब 53 प्रतिशत तक पहुँच गए थे। यानी आधी से ज्यादा बिजली का भुगतान वापस नहीं मिल रहा था।
बिजली चोरी को सपा का समर्थन
सत्ता में रहते हुए अखिलेश यादव स्वयं ही इसे प्रोत्साहित कर रहे थे। मुजफ्फरनगर में एक रैली में खुद अखिलेश यादव ने कहा था कि उन्हें कटिया से कोई समस्या नहीं है। और उन्हें समस्या होती भी क्यों? अमर उजाला की ही रिपोर्ट कहती है कि उनके खुद के ही जिले में सबसे ज्यादा बिजली चोरी होती थी।
अमर उजाला की रिपोर्ट कहती है कि इटावा में 73% बिजली चोरी हो जाती थी। वैसे इस बिजली चोरी पर अकेले अखिलेश यादव का संरक्षण नहीं था बल्कि उनकी पूरी पार्टी ही इस मॉडल को अपना रही थी। आज जुल्म जुल्म चिल्लाने वाले आजम खान के रामपुर में 50% से ज्यादा बिजली चोरी होती थी।
आजम खान का कहना था कि कोई भी ठेकेदार, बिजली विभाग का कर्मचारी छापा मारने नहीं आ सकता। यहाँ तक कि बिजली चोरी में खलल ना पड़े इसके लिए आजम खान ने रामपुर में बिजली के तार अंडरग्राउंड करने से रुकवा दिए थे और बाकायदा इसका ऐलान भी कर रहे थे।
आजमगढ़, मैनपुरी, संभल और कन्नौज जैसे जिले जहाँ जहाँ भी समाजवादी पार्टी की पकड़ मजबूत थी, सब जगह बिजली चोरी पूरा कारोबार था। यहाँ 60% तक बिजली चोरी हो रही थी। और बिजली चोरी करने वालों को पकड़ने की किसी की हिम्मत नहीं थी क्योंकि उन्हें सीधा संरक्षण समाजवादी पार्टी से मिल रहा था।
ऐसा भी नहीं है कि ये बिजली चोरी गाँव के इलाके में होती हो, यहाँ तक कि समाजवादी पार्टी की सरकार जाने के बाद भी आजम खान और शफीकुर्रहमान बर्क के घर में बिजली चोरी हो रही थी। और ये सिलसिला उनकी सत्ता जाने के सालों बाद तक जारी है।
शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव ने बदायूँ में खुले तौर पर कहा था कि सपा सरकार में तो कटिया पर भी एक्शन नहीं हुआ। समाजवादी पार्टी में बिजली चोरी का सिस्टम सिस्टेम्टिक तरीके से चलता था, संभल में साल 2026 में मुस्लिम इलाकों में हुई छापेमारी में मस्जिद से लेकर घरों तक करोड़ों की बिजली चोरी पकड़ी गई थी। संभल का ही पूर्व सपा जिलाध्यक्ष भी बिजली चोरी में पकड़ा गया था।
योगी सरकार में कितनी बदली तस्वीर?
यह बात बिल्कुल सही है कि भीषण गर्मी के बीच उत्तर प्रदेश के कई हिस्से पॉवर कट्स का सामना कर रहे हैं। लेकिन आपको आज की स्थिति और पहले की स्थिति में अन्तर समझना होगा। आज जहाँ लोड बढ़ने के चलते लोड शेडिंग हो रही है या फिर ट्रिपिंग हो रही है तो वहीं पहले घुप्प अँधेरे की स्थिति थी।
पहले कुछ जिले VIP थे, जिनकी बिजली सप्लाई कैसे भी इंश्योर की जाती थी और बाकी को अनाथ छोड़ दिया जाता था। योगी सरकार आने के बाद ये भेदभाव खत्म हुआ है और साथ ही बिजली का इंफ्रा भी सुधरा है। रिपोर्ट्स कहती हैं कि योगी सरकार आने के पहले उत्तर प्रदेश में 1.21 लाख बस्तियों में ही बिजली पहुँचती थी।
अब ये आँकड़ा बढ़ चुका है और 2023 तक ही सरकार इस नंबर में 1.2 लाख बस्तियों का एडिशन कर चुकी थी। और सिर्फ ऐसा नहीं है कि बिजली के खंभे लग गए हैं बल्कि घरों तक भी बिजली पहुँची है। साल 2017 में 1 करोड़ 80 लाख घरों में ही बिजली पहुँच रही थी, ये नंबर भी अब बढ़ कर 3 करोड़ 63 लाख हो चुका है।
कनेक्शन देने के साथ ही योगी सरकार ने बिजली का इंफ्रा सुधारने पर भी जोर लगाया है। यूपी में बिजली की जनरेशन कैपैप्सिटी भी 5600 मेगावॉट से 8600 मेगावॉट हुई है। और जो पॉवर सब स्टेशंस इस बिजली की रीढ़ है, वो भी 700 से अधिक योगी सरकार ने बनाए हैं ।
अब यूपी में बिजली चोरी पर कंट्रोल हुआ है तभी संभल में सपा के बिजली चोर भी पकड़े जा रहे हैं और इसका सीधा असर AT&C लॉसेस में इंप्रूवमेंट से दिख रहा है। अखिलश के राज में जहाँ 100 रुपए की बिजली बिकने के बाद जहाँ केवल 60 रुपए ही रेवेन्यू में वापस आ रहे थे तो वहीं अब योगी सरकार में साल 2024-25 में आँकड़ा 80 रुपए पर पहुँच गया है।



















