दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शनों के स्थल के रूप में जारी रखने पर गंभीर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से पूछा कि आखिर इस स्थान को बंद करने पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी विरोध-प्रदर्शन के कारण पूरे शहर को अनावश्यक रूप से बंधक नहीं बनाया जाना चाहिए।
यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी ने जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देने के लिए दिल्ली पुलिस को निर्देश देने की माँग की थी। इसी मुद्दे से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट भी सुनवाई कर रहा है, जिसमें जंतर-मंतर के बजाय विरोध-प्रदर्शनों के लिए वैकल्पिक स्थल तय करने की माँग की गई है।
जंतर-मंतर बंद क्यों नहीं कर देते?: हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा सवाल
मामले की सुनवाई जस्टिस अमित महाजन की एकल पीठ ने की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के कारण शहर के आम लोगों को परेशानी उठानी पड़ती है और सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। जस्टिस महाजन ने कहा कि इस तरह के प्रदर्शन शहर के बीचों-बीच नहीं होने चाहिए, हालाँकि अंतिम फैसला सरकार का है।
उन्होंने सवाल किया कि आखिर पूरे शहर को अनावश्यक रूप से बंधक क्यों बनाया जाए और सरकार जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में बंद क्यों नहीं कर देती। यह मामला ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी की ओर से दायर याचिका से जुड़ा था।
समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय घोष ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने जुलाई में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति के लिए आवेदन दिया था, लेकिन दिल्ली पुलिस ने अब तक न तो उसे मंजूर किया है और न ही खारिज किया है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन में अधिकतम 75 लोगों के शामिल होने की बात आवेदन में स्पष्ट रूप से कही गई थी।
इसके बावजूद पुलिस आवेदन पर निर्णय नहीं ले रही है। इस पर कोर्ट ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा से पूछा कि सरकार इस स्थल को बंद करने पर विचार क्यों नहीं करती। जस्टिस महाजन ने दोहराया कि उनकी व्यक्तिगत राय में इस तरह के प्रदर्शन दिल्ली शहर के भीतर नहीं होने चाहिए।
पुलिस, केंद्र और याचिकाकर्ता के तर्क: कोर्ट ने कहा- शहर को बंधक नहीं बनाया जा सकता
ASG चेतन शर्मा ने कोर्ट को बताया कि यही मुद्दा पहले से सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है, जहाँ यह तय होना है कि क्या जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए नामित स्थल बने रहना चाहिए। इस पर जस्टिस महाजन ने कहा कि उनकी राय में ऐसा नहीं होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता संजय घोष ने सवाल उठाया कि क्या केंद्र सरकार का यह रुख है कि दिल्ली में कहीं भी विरोध-प्रदर्शन नहीं हो सकते। इस पर जस्टिस महाजन ने कहा कि यह निर्णय पुलिस को लेना है कि वह शहर के भीतर प्रदर्शन की अनुमति दे सकती है या नहीं।
जवाब में घोष ने कहा कि यदि सरकार यह स्पष्ट कह दे कि दिल्ली में लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण प्रदर्शन नहीं होंगे तो वे उसे स्वीकार कर लेंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह यह नहीं कह रही कि प्रदर्शन लोकतांत्रिक हैं या अलोकतांत्रिक, बल्कि उसका सवाल केवल इतना है कि ऐसे आयोजनों से पूरे शहर को परेशानी क्यों झेलनी पड़े।
इस पर संजय घोष ने सुप्रीम कोर्ट के शाहीन बाग फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। जस्टिस महाजन ने इसका जवाब देते हुए कहा कि अधिकार अपनी जगह हैं, लेकिन शहर को बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता।
सुनवाई के दौरान ASG चेतन शर्मा ने यह भी बताया कि जंतर-मंतर क्षेत्र में फिलहाल दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC) की धारा 144 लागू है और 15 अगस्त नजदीक होने के कारण सुरक्षा व्यवस्था और अधिक कड़ी कर दी गई है।
उन्होंने कहा कि कई बार 75 लोगों का प्रदर्शन देखते-देखते 75 हजार लोगों की भीड़ में बदल जाता है और ऐसी स्थिति में सुरक्षा एजेंसियों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो जाती है। इस पर जस्टिस महाजन ने फिर कहा कि उनकी व्यक्तिगत राय में शहर के भीतर ऐसे प्रदर्शन नहीं होने चाहिए क्योंकि इससे एंबुलेंस सहित आम लोगों की आवाजाही प्रभावित होती है।
इसके बाद ASG शर्मा ने कहा कि कई बार प्रदर्शनकारियों के अनुच्छेद 19(1)(a) के अधिकारों को अन्य नागरिकों के अधिकारों से ऊपर मान लिया जाता है, जिससे आम जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
अंत में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वह ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी के आवेदन पर 8 अगस्त तक निर्णय ले और इसी निर्देश के साथ याचिका का निस्तारण कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में भी जंतर-मंतर के खिलाफ याचिका, वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल की माँग
जंतर-मंतर को लेकर विवाद केवल दिल्ली हाई कोर्ट तक सीमित नहीं है। इससे पहले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया था।
यह याचिका सतीश चंद कौशिक ने दायर की है, जिसमें कहा गया है कि जंतर-मंतर अब विरोध-प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं रह गया है और इसके स्थान पर कोई वैकल्पिक स्थल तय किया जाना चाहिए। याचिका में तर्क दिया गया है कि जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों से स्थानीय निवासियों को लगातार असुविधा होती है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि क्षेत्र में आने-जाने के रास्ते बाधित हो जाते हैं, आवश्यक वस्तुओं और दवाइयों की आपूर्ति प्रभावित होती है तथा मेडिकल सेवाओं और एंबुलेंस की आवाजाही में भी रुकावट आती है। इसलिए विरोध-प्रदर्शनों के लिए किसी ऐसे स्थान की व्यवस्था की जानी चाहिए जहाँ नागरिकों को कम से कम असुविधा हो।
सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य जज की अध्यक्षता वाली पीठ ने भी माना कि याचिका में उठाए गए मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिका में यह बताया गया है कि जंतर-मंतर अब प्रदर्शन के लिए उपयुक्त स्थल नहीं रह गया है क्योंकि वहाँ आने-जाने में गंभीर दिक्कतें होती हैं और चिकित्सा संबंधी आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति भी प्रभावित होती है।
मुख्य जज ने इसे महत्वपूर्ण चिंता का विषय बताया। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री आवास तक प्रस्तावित एक राजनीतिक मार्च के मद्देनजर पहले जैसी अप्रिय घटनाओं से बचना जरूरी है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावित कार्यक्रम पर कोई टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों से निपटना संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों का दायित्व है। इसके बाद कोर्ट ने मामले को अलग से सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
कॉकरोचों ने की संसद में घुसने की कोशिश
गौरतलब है कि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान संसद में घुसने की भी कोशिश हुई थी, जो कि जंतर-मंतर से करीब 3 से 4 किलोमीटर की दूरी पर है। दिल्ली पुलिस ने अपने बयान में कहा था कि प्रदर्शन के लिए केवल जंतर-मंतर पर धरना देने की अनुमति दी गई थी। संसद की ओर मार्च निकालने या तय प्रदर्शन स्थल से आगे बढ़ने की इजाजत नहीं थी।
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, कई हफ्तों तक प्रदर्शन शांतिपूर्वक चलता रहा और इस दौरान प्रदर्शन स्थल को जबरन खाली नहीं कराया गया। हालात तब बिगड़े, जब प्रदर्शनकारियों का एक समूह संसद का सत्र चलने के दौरान संसद की ओर बढ़ने लगा और रास्ते में लगाए गए सुरक्षा बैरिकेड्स को पार करने की कोशिश की।
पुलिस ने कहा कि प्रदर्शनकारियों से कई बार घोषणा करके तय जगह पर ही रहने की अपील की गई। इसके बावजूद कुछ लोग आगे बढ़ते रहे। इस दौरान बैरिकेड्स को नुकसान पहुँचाया गया, पुलिस को निशाना बनाया गया और कई पुलिसकर्मियों, जिनमें वरिष्ठ और बुजुर्ग अधिकारी भी शामिल थे, को घरेकर धक्का-मुक्की और बदसलूकी की गई।
सोशल मीडिया ऐप्स का असर आज के बच्चों और युवाओं के दिमाग पर बहुत गहरा पड़ रहा है। मेटा, जो फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसी बड़ी ऐप्स चलाती है, इस समय दुनिया भर में कानूनी मामलों और सरकारी जाँच का सामना कर रही है।
अमेरिका की अदालतों से लेकर यूरोप की एजेंसियों और भारत में बच्चों की सुरक्षा के मुद्दों तक, मेटा पर आरोप है कि उसने अपने फायदे और कमाई के लिए बच्चों की सुरक्षा और सेहत को नुकसान पहुँचाया। हाल ही में न्यू मेक्सिको की एक अदालत ने मेटा पर 567 मिलियन डॉलर (करीब 4,700 करोड़ रुपए) का भारी जुर्माना लगाया है।
यह फैसला टेक कंपनियों के काम करने के तरीके, उनके एल्गोरिदम, AI चैटबॉट्स और बच्चों के यौन शोषण को रोकने में उनकी नाकामी पर एक बड़ा सबक है। ऐप्स के अंदर जानबूझकर ऐसे फीचर्स डाले जाते हैं जो बच्चों को घंटों फोन से चिपकाए रखते हैं। इससे बच्चों में तनाव, नींद न आना, डिप्रेशन और आत्महत्या जैसे मामले सामने आ रहे हैं।
न्यू मेक्सिको की अदालत ने मेटा को ‘पब्लिक न्यूसेंस’ (सार्वजनिक उपद्रव) फैलाने का दोषी माना है, जिसका मतलब है कि सोशल मीडिया की ये कमियाँ अब सिर्फ किसी एक इंसान की दिक्कत नहीं हैं, बल्कि पूरे समाज के लिए खतरा बन चुकी हैं।
इसके साथ ही भारत जैसे देश में भी, जहाँ करोड़ों बच्चे इंटरनेट चलाते हैं, ऑनलाइन बाल यौन शोषण और सुरक्षा का मुद्दा बहुत गंभीर रूप ले चुका है। इन सभी मामलों और अदालती फैसलों से यह साफ हो गया है कि अब दुनिया भर की सरकारें और अदालतें टेक कंपनियों की मनमानी को चुपचाप बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं।
न्यू मेक्सिको के कोर्ट का ऑर्डर और 567 मिलियन डॉलर की पेनाल्टी
अमेरिका के न्यू मेक्सिको स्थित सांता फे की एक कोर्ट ने मेटा के खिलाफ कड़ा फैसला सुनाते हुए कंपनी को 567 मिलियन डॉलर (4,700 करोड़ रुपए से अधिक) की भारी राशि किशोर मानसिक स्वास्थ्य कोष (Teen Mental Health Fund) में जमा करने का आदेश दिया है।
इसके साथ ही जज ब्रायन बीडशेड ने मेटा को अपने प्लेटफॉर्म्स के काम करने के बुनियादी तरीकों में बदलाव करने का निर्देश दिया है ताकि कम उम्र के यूजर्स को सुरक्षा दी जा सके। कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में साफ कहा कि मेटा अपने प्लेटफॉर्म्स के जरिए बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य और जीवन की सुरक्षा को नुकसान पहुँचाने के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है।
यह पूरी कानूनी कार्रवाई न्यू मेक्सिको के अटॉर्नी जनरल रॉल टॉरेज द्वारा शुरू की गई थी, जिन्होंने आरोप लगाया था कि उसने अपने प्रोडक्ट्स को इस तरह डिजाइन किया कि युवाओं को उनकी लत लग जाए। साथ ही कंपनी अपने प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों को यौन उत्पीड़न, ऑनलाइन ग्रूमिंग और शोषण से बचाने के बुनियादी तंत्र को लागू करने में भी पूरी तरह नाकाम रही।
कोर्ट का यह 567 मिलियन डॉलर का फैसला इस पूरे केस के दूसरे चरण की सुनवाई के बाद सामने आया है। इससे ठीक पाँच महीने पहले इसी मुकदमे के प्रथम चरण में न्यू मेक्सिको की एक जूरी ने मेटा को 375 मिलियन डॉलर का भुगतान करने का आदेश दिया था।
जूरी ने अपने जाँच निष्कर्षों में माना था कि मेटा ने फेसबुक और इंस्टाग्राम की सुरक्षा के बारे में झूठे और भ्रामक दावे करके उपभोक्ता संरक्षण कानूनों का सीधा और गंभीर उल्लंघन किया है। कोर्ट ने अपने फैसले के तहत पाँच वर्षों के लिए लागू रहने वाली एक बेहद सख्त डिक्री भी जारी की है।
इसके तहत मेटा को न्यू मेक्सिको में किशोरों द्वारा फेसबुक और इंस्टाग्राम के उपयोग की एक निश्चित मासिक समय-सीमा तय करनी होगी, बार-बार भेजे जाने वाले नोटिफिकेशंस पर कड़े प्रतिबंध लगाने होंगे, अनजान वयस्कों द्वारा नाबालिगों से सीधे संपर्क साधने के रास्तों को ब्लॉक करना होगा, AI चैटबॉट्स पर कड़े सुरक्षा नियम लागू करने होंगे और बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़ी रिपोर्टों की बहुत ही गहनता से समीक्षा करनी होगी।
क्या है पब्लिक न्यूसेंस लॉ और मेटा ने अपने बचाव में क्या दलीलें दी?
न्यू मेक्सिको की इस कोर्ट में चली तीन हफ्ते की बिना जूरी वाली सुनवाई का मुख्य केंद्र यह तय करना था कि क्या मेटा के प्लेटफॉर्म्स ने राज्य के कानून के तहत एक पब्लिक न्यूसेंस की स्थिति पैदा की है।
अमेरिकी न्याय प्रणाली में सार्वजनिक उपद्रव का कानून ऐतिहासिक रूप से उन गतिविधियों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता रहा है जो आम जनता के स्वास्थ्य, सुरक्षा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाती हैं, जैसे कि मुख्य रास्तों को अवरुद्ध करना या नदियों और हवा में जहरीला कचरा फैलाना।
हालाँकि हाल के वर्षों में अमेरिकी राज्यों ने तंबाकू कंपनियों, ओपिओइड दवा निर्माताओं, जलवायु परिवर्तन के मामलों, ई-सिगरेट कंपनियों और अब AI व सोशल मीडिया दिग्गजों को कटघरे में खड़ा करने के लिए इस कानून का व्यापक उपयोग शुरू कर दिया है।
जज ब्रायन बीडशेड ने अपने लिखित फैसले में एक बहुत ही प्रभावी तुलना करते हुए लिखा कि जिस प्रकार किसी कारखाने से निकलने वाला जहरीला धुआँ आसपास के वातावरण और स्वच्छ हवा के सार्वजनिक अधिकार को दूषित करता है, ठीक उसी प्रकार मेटा के प्लेटफॉर्म्स के हानिकारक प्रभाव केवल फोन की स्क्रीन या इंटरनेट तक सीमित नहीं रहते।
ये हानिकारक प्रभाव डिजिटल दुनिया से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया में फैलते हैं और प्रभावित बच्चों, उनके परिवारों, स्कूलों, अस्पतालों और पूरी कानून प्रवर्तन प्रणाली पर एक बहुत बड़ा सामाजिक बोझ और संकट खड़ा करते हैं।
दूसरी ओर मेटा ने मुकदमे की सुनवाई के दौरान अपना बचाव करते हुए दलील दी कि उसने ऐसा कोई पब्लिक न्यूसेंस पैदा नहीं किया है क्योंकि उसने हवा या पानी जैसी किसी सार्वजनिक संपत्ति में सीधे तौर पर कोई रुकावट नहीं डाली है।
मेटा के वकीलों का यह भी कहना था कि न्यू मेक्सिको के युवा केवल उनकी ऐप्स का उपयोग नहीं करते हैं, बल्कि वे अन्य कंपनियों के डिजिटल ऐप्स भी चलाते हैं, इसलिए केवल मेटा को इस स्थिति के लिए दोषी ठहराना गलत है।
कंपनी ने कोर्ट से माँगी गई पाबंदियों और सुरक्षात्मक उपायों का विरोध करते हुए कोर्ट फाइलिंग्स में कहा कि इनमें से कई बदलाव तकनीकी रूप से असंभव या बेहद कठिन हैं और इन नियमों के कारण कंपनी को मजबूरन उस पूरे राज्य से ही अपनी सेवाएँ समेटनी पड़ सकती हैं।
इसके अतिरिक्त मेटा ने अमेरिकी कानून ‘कम्युनिकेशंस डिसेंसी एक्ट’ की धारा 230 के तहत कानूनी छूट का दावा किया, जो सामान्य तौर पर इंटरनेट प्लेटफॉर्म्स को उनके यूजर्स द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के दायित्व से सुरक्षा देती है।
हालाँकि जज बीडशेड ने धारा 230 के इस बचाव को पूरी तरह से खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य यहाँ किसी तीसरे पक्ष द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए मेटा को दोषी नहीं ठहरा रहा है, बल्कि वह कंपनी द्वारा खुद डिजाइन किए गए प्लेटफॉर्म फीचर्स, लत लगाने वाले तंत्र और उसकी अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली को चुनौती दे रहा है।
AI चैटबॉट्स की अश्लील बातचीत और चाइल्ड सेफ्टी से जुड़ा गंभीर खतरा
मुकदमे के दौरान कोर्ट के सामने पेश की गई इंटरनल रिपोर्ट्स ने यह खुलासा किया कि मेटा के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चैटबॉट्स बच्चों की सुरक्षा के लिए एक नया और बेहद गंभीर खतरा बन रहे थे। रिपोर्ट्स में यह बात साबित हुई कि कंपनी के AI चैटबॉट्स कम उम्र के बच्चों के साथ रोमांटिक, कामुक और अश्लील बातचीत कर सकते थे।
प्लेटफॉर्म पर विज्ञापनों के जरिए धोखाधड़ी और प्रतिबंधित सामान बेचे जाने से होने वाली कमाई की जाँच के बीच इस AI फीचर के दुरुपयोग ने कोर्ट की चिंता को और बढ़ा दिया।
जज बीडशेड ने अपने आदेश में मेटा को निर्देश दिया कि वह न्यू मेक्सिको के किसी भी बच्चे को मेटा के AI चैटबॉट्स के साथ किसी भी प्रकार की रोमांटिक, कामुक या यौन बातचीत में शामिल होने से रोकने के लिए पुख्ता तकनीकी दीवारें खड़ी करे।
कोर्ट ने यह भी तय करने का आदेश दिया कि कोई भी वयस्क यूजर किसी बच्चे के साथ अश्लील बातचीत का करने के लिए मेटा के चैटबॉट्स का इस्तेमाल न कर सके। यह मामला केवल AI चैटबॉट्स तक ही सीमित नहीं है, बल्कि प्लेटफॉर्म पर फैलने वाले बाल यौन शोषण सामग्री और बच्चों को निशाना बनाने वाले पीडोफाइल्स से भी सीधे जुड़ा हुआ है।
राज्य के अटॉर्नी जनरल ने पुख्ता सबूतों के साथ आरोप लगाया कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर सुरक्षा की इतनी भयंकर कमियाँ थीं कि गलत नीयत रखने वाले वयस्कों को नाबालिग बच्चों तक पहुँचने और उनका शोषण करने का खुला अवसर मिल रहा था।
कोर्ट ने अपने आदेश में मेटा को निर्देश दिया है कि वह अपने प्लेटफॉर्म्स पर बाल यौन शोषण से जुड़ी शिकायतों और रिपोर्टों की समीक्षा प्रक्रिया को मजबूत और तेज करे। हालाँकि मेटा ने इस फैसले के बाद जारी अपने आधिकारिक बयान में कहा कि वह इस निर्णय के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील दायर करेगी।
मेटा का दावा है कि वह अपने प्लेटफॉर्म्स को सुरक्षित बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। कंपनी का कहना है कि वह किशोरों की सुरक्षा से जुड़े अपने रिकॉर्ड को लेकर आश्वस्त है और कोर्ट में अपने तथ्यों का बचाव करती रहेगी, लेकिन कोर्ट के फैसले में सामने आए तथ्य उसके इन दावों की पोल खोलते हैं।
यूरोपीय आयोग की कड़ी जाँच और दुनियाभर की सरकारी एजेंसियों का बढ़ता दबाव
अमेरिका में चल रहे इन मुकदमों के अलावा, यूरोपीय संघ (EU) में भी मेटा के खिलाफ नियमों की घेराबंदी लगातार सख्त होती जा रही है। यूरोपीय आयोग ने औपचारिक रूप से घोषणा की है कि वह मेटा के दो बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम के खिलाफ अपने नए और बेहद सख्त ‘डिजिटल सर्विसेज एक्ट’ (DSA) के तहत जाँच शुरू कर रहा है।
यह जाँच मुख्य रूप से बाल सुरक्षा से जुड़े गंभीर जोखिमों और कंपनी द्वारा अपने वैधानिक दायित्वों की अनदेखी करने पर केंद्रित है। यूरोपीय संघ का यह लैंडमार्क कानून यह अनिवार्य बनाता है कि टेक कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म्स से गैर-कानूनी, अश्लील और नुकसानदेह सामग्री को हटाने के लिए तुरंत और ठोस कदम उठाने होंगे।
साथ ही नाबालिगों की प्राइवेसी और सुरक्षा का उच्चतम स्तर सुनिश्चित करना होगा। यदि कोई कंपनी इन नियमों का उल्लंघन करती पाई जाती है, तो उस पर उसकी वैश्विक कुल कमाई के 6 प्रतिशत तक का वित्तीय जुर्माना लगाया जा सकता है।
यूरोपीय संघ के नियामकों का मानना है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम के कई फीचर्स इस तरह डिजाइन किए गए हैं जो बच्चों में ऐप की लत और अवांछनीय व्यवहार को बढ़ावा देते हैं, जिससे उनके मानसिक विकास और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा नकारात्मक असर पड़ रहा है।
इसके अतिरिक्त यूरोपीय आयोग इस बात की भी जाँच कर रहा है कि क्या मेटा के पास उपयोगकर्ताओं की सही उम्र का सत्यापन करने के लिए कोई विश्वसनीय तंत्र मौजूद है या नहीं, और क्या उसके एल्गोरिदम कम उम्र के बच्चों को उनकी इच्छा के बिना भी खतरनाक या अनुचित कंटेंट की ओर धकेल रहे हैं।
लगातार बढ़ते इस वैश्विक दबाव का असर मेटा के व्यावसायिक भविष्य पर भी साफ दिखाई दे रहा है। कंपनी ने अपने शेयरधारकों और निवेशकों को औपचारिक रूप से चेतावनी दी है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ में युवाओं के सोशल मीडिया उपयोग और बाल सुरक्षा से जुड़े ये कानूनी मामले और नियामक प्रतिबंध उसके व्यवसाय को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर असर और टीनएजर्स की मौतों पर लीगल एक्शन
सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा अपने वित्तीय लाभ के लिए युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को दाँव पर लगाने का यह मुद्दा अब सिर्फ सरकारी एजेंसियों या राज्य के मुकदमों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका सबसे भयानक पहलू उन आम परिवारों की कहानियों में दिखता है जिन्होंने अपने बच्चों को खो दिया है।
हाल ही में अमेरिका की डेलावेयर सुपीरियर कोर्ट में चार नाबालिग बच्चों के परिवारों ने एक बड़ा केस दर्ज कराया है। यह मुकदमा मेटा, टिकटॉक, स्नैपचैट और यूट्यूब की मूल कंपनी गूगल के खिलाफ एक साथ दायर किया गया है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन प्लेटफॉर्म्स के वर्षों के रेग्युलर और अत्यधिक इस्तेमाल से पैदा हुए गंभीर मानसिक खतरों के कारण उन चारों बच्चों ने आत्महत्या जैसा खौफनाक कदम उठा लिया।
यह मुकदमा जुलाई 2024 से सितंबर 2025 के बीच केवल 14 महीनों की अवधि के भीतर अपनी जान गँवाने वाले चार अलग-अलग राज्यों के बच्चों- लीवी कास्त्रो (13 वर्ष), रिव केलेहर (14 वर्ष), नथैनिएल चैम्बर्स (17 वर्ष) और डॉसन होल्डन (18 वर्ष) के परिवारों की तरफ से दाखिल किया गया है।
पीड़ित परिवारों का प्रतिनिधित्व कर रहे ‘सोशल मीडिया विक्टिम्स लॉ सेंटर’ के संस्थापक वकील मैथ्यू बर्गमैन ने स्पष्ट रूप से कहा कि कंपनियों के बड़े अधिकारियों के तमाम खोखले दावों और झूठे आश्वासनों के बावजूद ये ऐप्स बच्चों की जिंदगी छीन रहे हैं।
कोर्ट में दाखिल शिकायत के अनुसार, इन चारों टीनएजर्स ने सोशल मीडिया की भयंकर लत, नींद की गंभीर कमी, गहरा अवसाद, चिंता और आत्महत्या के विचारों जैसी भयानक मानसिक स्थितियों का सामना किया। अमेरिका के 33 से अधिक राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने मिलकर कैलिफोर्निया की संघीय कोर्ट में मेटा के खिलाफ एक साझा मुकदमा दर्ज कराया हुआ है।
इसमें 33 राज्यों का एक समूह शामिल है जिसने आरोप लगाया कि मेटा जानती थी कि उसके प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद लाइक्स का सिस्टम और लगातार स्क्रॉल होने वाला डिजाइन किशोरों के दिमाग को आकर्षित करके उन्हें नियंत्रित कर लेता है।
साल 2021 में कंपनी की ही एक पूर्व कर्मचारी फ्रांसिस हॉगेन द्वारा लीक किए गए अंदरूनी गुप्त दस्तावेजों ने संसद और पूरी दुनिया के सामने यह उजागर कर दिया था कि इंस्टाग्राम किशोरियों के मन में अपने शरीर को लेकर हीन भावना पैदा कर रहा है और कंपनी को इसकी पूरी जानकारी होने के बावजूद उसने मुनाफे के लिए इसे छिपाए रखा।
भारत में बाल यौन शोषण, कानूनी ढाँचा और डिजिटल सुरक्षा की स्थिति
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बाल सुरक्षा और यौन शोषण का यह संकट केवल अमेरिका या यूरोप के विकसित देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत जैसे विशाल डिजिटल बाजार वाले देश के लिए यह एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करता है।
भारत में आज करोड़ों छोटे बच्चे और किशोर रोजाना इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सएप का सक्रियता से इस्तेमाल करते हैं। डिजिटल साक्षरता की कमी और पर्याप्त निगरानी के अभाव के कारण भारतीय बच्चे ऑनलाइन साइबर बुलिंग, ऑनलाइन ग्रूमिंग और बाल यौन शोषण सामग्री के आसान शिकार बन जाते हैं।
हालाँकि भारत में इस प्रकार के अपराधों से निपटने के लिए एक सख्त कानूनी ढाँचा मौजूद है, जिसमें मुख्य रूप से ‘प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस’ यानी पॉक्सो एक्ट (POCSO Act, 2012) और ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट’ (IT Act, 2000) शामिल हैं।
भारतीय कानून के तहत ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) को देखना, खोजना, डाउनलोड करना, अपने फोन या कंप्यूटर में स्टोर करना, या किसी अन्य को भेजना एक गैर-जमानती गंभीर अपराध है। ऐसी सामग्री का केवल स्टोरेज या कंजप्शन भी पॉक्सो कानून की धारा 15 और आईटी एक्ट की धारा 67B के तहत दंडनीय अपराध है।
इसके अलावा भारत सरकार के ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइन्स एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021’ के तहत मेटा जैसी टेक कंपनियों (इंटरमीडियरीज) पर यह सख्त कानूनी दायित्व डाला गया है कि किसी भी शिकायत या सरकारी निर्देश के मिलने के 24 घंटे के भीतर वे बाल यौन शोषण से जुड़ी किसी भी सामग्री को अपने प्लेटफॉर्म से तुरंत हटाएँ और उसकी पहुँच को ब्लॉक करें।
जाँच एजेंसी CBI ने भी देशभर में ऑनलाइन फैल रहे बाल यौन शोषण रैकेट्स का पर्दाफाश करने के लिए ‘ऑपरेशन मेघ चक्र’ जैसे अभियान चलाकर बड़े पैमाने पर छापेमारी की है।
विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर ताजा जानकारी संसद में दी है। इसके बाद सोशल मीडिया पर एक बार फिर इन यात्राओं पर हुए खर्च को लेकर बहस शुरू हो गई। जानकारी सामने आने के कुछ ही घंटों में विपक्षी नेताओं और मोदी विरोधी लोगों ने अलग-अलग खर्च के आँकड़े साझा करने शुरू कर दिए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर जनता के टैक्स का बहुत पैसा खर्च हो रहा है।
लेकिन पूरी जानकारी देखने पर तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। सिर्फ कुछ आँकड़ों को अलग से देखने के बजाय अगर पूरी जानकारी देखी जाए तो पता चलता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पिछले प्रधानमंत्री की तुलना में ज्यादा विदेश यात्राएँ की हैं लेकिन इन यात्राओं पर कुल खर्च लगभग उसी स्तर पर रहा है। कुछ मामलों में खर्च पहले से कम भी रहा है।
यह जानकारी राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह और CPI(M) सांसद डॉ. वी. शिवदासन के सवालों के जवाब में दी गई। दोनों सांसदों ने 2021 से अब तक प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं, हर यात्रा पर हुए खर्च, दूसरे देशों के साथ हुए समझौतों और इस दौरान भारत में आए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की जानकारी माँगी थी।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, जुलाई 2026 तक प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर लगभग ₹74.5 करोड़ खर्च हुए। इन छह महीनों में ही उन्होंने मलेशिया, इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, इटली, फ्रांस, स्लोवाकिया, सेशेल्स, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड सहित 13 देशों की यात्रा की।
Total expenditure incurred on PM Modi's foreign visits this year
जाहिर तौर पर, आलोचकों ने पूरी तस्वीर देखने के बजाय अलग-अलग विदेश यात्राओं पर हुए खर्च को ही मुद्दा बनाया। कुछ आलोचकों ने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री की यूरोप यात्रा के दौरान सिर्फ नॉर्वे जाने पर 17 करोड़ रुपए से ज्यादा कैसे खर्च हो गए। उन्होंने इस आँकड़े को ज्यादा खर्च और फिजूलखर्ची साबित करने की कोशिश की।
Modi was in Norway for just one day. It cost taxpayers ₹17 crore. Aisa kya hua wahan par? 😲😲😲 pic.twitter.com/m35xjZM0Eu
यह आलोचना प्रधानमंत्री की आधिकारिक विदेश यात्राओं की असली प्रकृति को नजरअंदाज करती है।
आँकड़ों के अंदर की बात
सरकार की ओर से बताए गए खर्च में सिर्फ प्रधानमंत्री को एक देश से दूसरे देश ले जाने वाली फ्लाइट का खर्च शामिल नहीं है। इसमें चार्टर्ड विमान, सुरक्षा व्यवस्था, पहले से भेजी जाने वाली टीमें, सरकारी प्रतिनिधिमंडल, संचार व्यवस्था, आने-जाने और रहने से जुड़ी व्यवस्थाएँ, प्रोटोकॉल और विदेश दौरों से जुड़े कई दूसरे खर्च भी शामिल होते हैं। कई देशों की यात्रा वाले दौरों में प्रधानमंत्री कई देशों के नेताओं से मुलाकात करते हैं और इसलिए ऐसे दौरों का खर्च सामान्य यात्रा से ज्यादा होना स्वाभाविक है।
अगर किसी एक देश की यात्रा पर हुए खर्च को अलग से देखा जाए और पूरे दौरे को नजरअंदाज कर दिया जाए, तो इससे खर्च की एक गलत तस्वीर बनती है। सबसे अहम बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल से खर्च की तुलना करने पर यह आलोचना कमजोर पड़ जाती है।
संसद में उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक, डॉ. मनमोहन सिंह ने 2004 से 2014 के बीच 10 साल में 73 विदेश यात्राएँ की थीं। इन यात्राओं के दौरान केवल हवाई यात्रा पर करीब 795.18 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। यहाँ ‘केवल हवाई यात्रा’ शब्द बेहद महत्वपूर्ण हैं।
तुलना, जो आलोचक नहीं कर पाते
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं के लिए जारी किए गए आंकड़ों में चार्टर्ड फ्लाइट, सुरक्षा व्यवस्था, सरकारी प्रतिनिधिमंडल और यात्रा से जुड़ी दूसरी व्यवस्थाओं का खर्च भी शामिल है। इसके उलट, डॉ. मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओं पर खर्च हुए 795.18 करोड़ रुपए का आँकड़ा सिर्फ हवाई यात्रा का खर्च बताता है।
इसमें सुरक्षा व्यवस्था, रहने का खर्च, आने-जाने की व्यवस्था, संचार सुविधाएँ, पहले से भेजी जाने वाली टीमें, प्रोटोकॉल और प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के साथ होने वाले कई दूसरे खर्च शामिल नहीं हैं। इसलिए, डॉ. मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओं पर हुआ वास्तविक कुल खर्च उपलब्ध 795.18 करोड़ रुपए से काफी ज्यादा रहा होगा।
डॉ. सिंह की कई व्यक्तिगत यात्राओं का खर्च प्रधानमंत्री मोदी की हालिया यात्राओं से भी अधिक रहा है
व्यक्तिगत दौरों की जाँच करने पर यह तुलना और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। डॉ. सिंह की जून 2012 में मैक्सिको और ब्राजील की यात्रा पर अकेले हवाई यात्रा पर लगभग ₹26.94 करोड़ का खर्च आया। उनकी 2010 में वाशिंगटन डीसी और ब्राजील की यात्रा पर विमान संचालन पर लगभग ₹22.70 करोड़ खर्च हुए जबकि उनकी नवंबर 2009 में अमेरिका और त्रिनिदाद और टोबैगो की यात्रा पर लगभग ₹21.27 करोड़ का खर्च आया।
2013 में अमेरिका की एक अन्य यात्रा में हवाई यात्रा पर लगभग ₹23.30 करोड़ का खर्च आया। इनमें से प्रत्येक आँकड़ा केवल विमान की लागत से संबंधित है।
इसके विपरीत, प्रधानमंत्री मोदी की हाल की कई बहु-देशीय यात्राओं का खर्च जिसमें सुरक्षा, रसद और आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल के खर्च शामिल हैं पिछली सरकार के हवाई यात्रा बिलों से कम या लगभग बराबर रहा है। इससे ही यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यय के अलग-अलग आँकड़ों से सनसनीखेज निष्कर्ष निकालना बौद्धिक रूप से बेईमानी है। व्यापक तुलना भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अधिक कूटनीति, लगभग उतना ही खर्च
2015 से 2025 के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 100 से ज्यादा विदेश यात्राएँ कीं। यह संख्या डॉ. मनमोहन सिंह की 10 साल में की गई 73 विदेश यात्राओं से काफी ज्यादा है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर कुल खर्च करीब 800 करोड़ रुपए रहने का अनुमान है।
दूसरे शब्दों में, प्रधानमंत्री मोदी ने ज्यादा बार विदेश यात्रा की, ज्यादा देशों का दौरा किया और कई देशों के नेताओं के साथ मुलाकात की लेकिन उनकी विदेश यात्राओं पर हुआ कुल खर्च उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सिर्फ हवाई यात्रा पर हुए 795.18 करोड़ रुपए के खर्च से भी कम है।
यह मानना मुश्किल है कि डॉ. मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओं के दौरान सुरक्षा व्यवस्था, होटल, आने-जाने की व्यवस्था, सरकारी प्रतिनिधिमंडल और स्थानीय परिवहन पर कोई खर्च नहीं हुआ होगा। इसलिए साफ है कि UPA सरकार के दौरान प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर हुआ कुल खर्च सिर्फ हवाई यात्रा के उपलब्ध आँकड़े से काफी ज्यादा रहा होगा।
PM मोदी ने एक बड़ा खर्च खत्म किया: पत्रकारों के ‘सरकारी खर्च पर विदेश दौरों’ पर लगी रोक
प्रधानमंत्री मोदी के आलोचक अक्सर एक अहम अंतर का जिक्र नहीं करते। यह अंतर विदेश यात्राओं के दौरान प्रधानमंत्री के साथ जाने वाले आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल से जुड़ा है।
UPA सरकार के दौरान बड़े मीडिया संस्थानों के पत्रकारों का प्रधानमंत्री के साथ विदेश दौरों पर जाना आम बात थी। वे आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा होते थे। ऐसे में उनके लिए विशेष विमान में सीट और यात्रा से जुड़ी दूसरी व्यवस्थाएँ करनी पड़ती थीं।
2014 में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने इस व्यवस्था को खत्म कर दिया। अब पत्रकार आम तौर पर प्रधानमंत्री के साथ सरकारी विमान में विदेश यात्रा नहीं करते। अगर मीडिया संस्थान प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा को कवर करना चाहते हैं तो उन्हें अपनी तरफ से यात्रा और दूसरी व्यवस्थाएँ करनी होती हैं।
इस बदलाव से विदेश यात्राओं के खर्च का एक हिस्सा अपने आप कम हो गया, जो पिछली सरकारों के दौरान होता था। लेकिन दोनों सरकारों के बीच विदेश यात्रा के खर्च की तुलना करते समय आलोचक अक्सर इस अंतर का जिक्र नहीं करते।
इसके बजाय, वे प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर हुए खर्च के चुनिंदा आँकड़ों को सामने रखते हैं और उनके बड़े कूटनीतिक एजेंडे के साथ-साथ आज विदेश यात्राओं के आयोजन के तरीके में आए बदलाव को नजरअंदाज कर देते हैं।
कूटनीतिक महत्व को सिर्फ खर्च से नहीं मापा जा सकता
आलोचना में मोदी सरकार के दौरान भारत की बढ़ी हुई अंतरराष्ट्रीय सक्रियता को भी नजरअंदाज किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राएँ सिर्फ दो देशों के बीच संबंधों तक सीमित नहीं रही हैं। इनमें G20, क्वाड, BRICS, SCO, ASEAN, COP और कई दूसरे बहुपक्षीय सम्मेलनों में भारत की भागीदारी भी शामिल है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक पहुँच उन क्षेत्रों तक भी बढ़ी है, जिन्हें पहले के दशकों में प्रधानमंत्रियों की ओर से अपेक्षाकृत कम ध्यान मिला था।
विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अप्रैल 2021 से दिसंबर 2025 के बीच भारत को करीब 381.8 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) मिला। यह कहना सही नहीं होगा कि पूरा निवेश सीधे प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं की वजह से आया। लेकिन अलग-अलग सरकारें हमेशा से मानती रही हैं कि बड़े स्तर की कूटनीति निवेश लाने, व्यापारिक रिश्ते मजबूत करने और भारत के रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है।
प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के दौरान रक्षा सहयोग, नई तकनीक, सेमीकंडक्टर निर्माण, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा सुरक्षा, लोगों की आवाजाही से जुड़े समझौते, सप्लाई चेन और निवेश साझेदारी जैसे कई अहम मुद्दों पर बातचीत होती है। भू-राजनीतिक तनाव के दौर में दुनिया के दूसरे नेताओं के साथ सीधे बातचीत का मौका भी इन यात्राओं से मिलता है।
यह उस समय और महत्वपूर्ण हो जाता है जब भारत ग्लोबल साउथ की एक प्रमुख आवाज के तौर पर अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है और साथ ही विकसित देशों के साथ अपने संबंध भी लगातार गहरे कर रहा है।
सार्वजनिक पैसे के इस्तेमाल पर सवाल उठाना लोकतंत्र में पूरी तरह जायज है। आखिर संसद का एक बड़ा काम सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करना ही है। लेकिन किसी भी खर्च की जाँच पूरी और एक जैसी जानकारी के आधार पर होनी चाहिए, न कि संदर्भ से अलग किए गए कुछ आँकड़ों के आधार पर।
विदेश मंत्रालय की ताजा जानकारी यह साबित नहीं करती कि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं पर लापरवाही से बहुत ज्यादा पैसा खर्च किया गया। इसके उलट, आँकड़े बताते हैं कि भारत ने पहले की तुलना में ज्यादा सक्रिय विदेश नीति अपनाई है लेकिन खर्च मोटे तौर पर उसी स्तर पर रहा है और संभव है कि पिछली सरकार के मुकाबले कम भी रहा हो जबकि विदेश यात्राओं की संख्या काफी ज्यादा रही है।
दिलचस्प बात यह है कि संसद में सामने आए आँकड़े उन्हीं दावों को कमजोर करते नजर आते हैं, जिन्हें मोदी विरोधियों ने उठाया था। ये आँकड़े यह साबित करने के बजाय कि प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राएँ फिजूलखर्ची वाली हैं, यह दिखाते हैं कि उन्होंने ज्यादा देशों की यात्रा की, भारत की कूटनीतिक पहुँच बढ़ाई, सरकारी विमान में मीडिया प्रतिनिधिमंडल ले जाने जैसी अतिरिक्त लागत वाली पुरानी व्यवस्था को खत्म किया और इसके बावजूद सरकारी खर्च में कोई असामान्य बढ़ोतरी नहीं हुई।
जब इन आँकड़ों को चुनिंदा सुर्खियों के बजाय पूरी तस्वीर के साथ देखा जाता है, तो कहानी फिजूलखर्ची की नहीं बल्कि ज्यादा सक्रिय विदेश नीति और आधिकारिक यात्रा पर खर्च को अपेक्षाकृत नियंत्रित रखने की दिखाई देती है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों और वैश्विक सुरक्षा के इतिहास में आज हम एक बहुत ही निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं। दशकों तक द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था का यह अटूट नियम माना जाता था कि जब भी दुनिया के किसी कोने में लड़ाई होगी या दो देशों के बीच भीषण हिंसा भड़केगी या कोई मानवीय संकट पैदा होगा, तो वहाँ कानून-व्यवस्था कायम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) की नीली टोपी वाली सेना (UN Blue Helmets) ही भेजी जाएगी। लेकिन आज 21वीं सदी के तीसरे दशक में यह ढाँचा पूरी तरह से चरमराता हुआ दिखाई दे रहा है।
गाजा पट्टी में महीनों तक चले भीषण संघर्ष के बाद जब युद्ध के अंत और उसके बाद की सुरक्षा व्यवस्था (Post-War Security Setup) को लेकर विचार-विमर्श शुरू हुआ, तो संयुक्त राष्ट्र को लगभग दरकिनार कर दिया गया। गाजा में सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण की कमान अब अमेरिका की अगुवाई में एक विशेष प्रशासनिक संरचना (Special Administrative Structure) ‘बोर्ड ऑफ पीस‘ (Board of Peace) बनाई गई है, जो ‘अंतरराष्ट्रीय स्टेबलाइजेशन फोर्स’ (ISF – International Stabilization Force) के जरिए ये काम करेगी। हालाँकि UNSC के रिजोल्यूशन 2803 के जरिए इस इंटरनेशनल फोर्स को वैश्विक कानूनी वैधता प्रदान की गई है।
पारंपरिक रूप से ऐसे मामलों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का रुख किया जाता था और यूएन पीसकीपिंग फोर्स भेजी जाती थी। लेकिन गाजा के मामले में स्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं। जैसे-
इजरायल का अविश्वास: इजरायल लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और उसकी एजेंसियों (जैसे UNRWA) पर पक्षपात का आरोप लगाता रहा है। वह अपनी सीमाओं के पास यूएन सेना की मौजूदगी को पर्याप्त सुरक्षा गारंटी नहीं मानता।
वीटो पावर की रुकावट: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के बीच मतभेद के कारण किसी सर्वसम्मत यूएन मिशन पर सहमति बनना लगभग असंभव हो जाता है।
‘बोर्ड ऑफ पीस’ और बहुराष्ट्रीय बल: इसी गतिरोध के हल के रूप में अमेरिका और उसके सहयोगी अरब देशों के साथ मिलकर एक ऐसी व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं जहाँ एक नागरिक-सुरक्षा बोर्ड बनाया जाए। इसमें अमेरिका, मित्र अरब देश (जैसे मिस्र, यूएई, कतर) और कुछ अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ शामिल हों, जो गाजा में कानून-व्यवस्था, राहत सामग्री के वितरण और सुरक्षा की निगरानी करें।
यह स्पष्ट संकेत है कि जब यूएन किसी स्थिति में सर्वसम्मति नहीं बना पाता, तो क्षेत्रीय व वैश्विक शक्तियाँ अपना खुद का ‘थर्ड पार्टी’ ढाँचा तैयार कर लेती हैं और जरूरत के हिसाब से उसे UN का कानूनी ढाँचा भी पहना दिया जाता है।
बहरहाल, इन सबके बीच ये जानना अहम है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में ये बोर्ड ऑफ पीस क्यों बनाया गया? इसकी जरूरत क्यों पड़ी? क्यों यहाँ पर सीधे UN ने हस्तक्षेप करने से कदम पीछे खींच लिए? क्या ऐसी व्यवस्थाएँ अतीत में हुई हैं और अगर हुई हैं तो कहाँ-कहाँ हुई हैं, ये भी जानना जरूरी हो जाता है। इस आर्टिकल में हम इस पूरे मुद्दे को विस्तार से समझेंगे।
बोर्ड ऑफ पीस के बारे में जानिए
दरअसल, गाजा पट्टी में इजरायल और हमास के बीच लंबे समय तक चले भीषण संघर्ष के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठकर आया कि युद्ध रुकने के बाद वहाँ सुरक्षा कौन संभालेगा? ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में बोर्ड ऑफ पीस (Board of Peace – BoP) का गठन किया गया। यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों और खासकर गाजा पट्टी (Gaza Strip) में शांति बहाल करना, बुनियादी ढाँचे का पुनर्निर्माण करना और स्थिरता लाना है।
बोर्ड ऑफ पीस पर डोनाल्ड ट्रंप का बयान (फोटो साभार: boardofpeace . org)
सितंबर 2025 में बोर्ड ऑफ पीस नाम के संगठन का प्रस्ताव रखा गया था। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council Resolution 2803) ने गाजा शांति योजना की निगरानी और वहाँ सुरक्षा बल तैनात करने के लिए इस बोर्ड को अपनी स्वीकृति दी। और फिर 22 जनवरी 2026 को स्विट्जरलैंड के दावोस में ‘विश्व आर्थिक मंच’ (World Economic Forum) के दौरान 20 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने इसके संस्थापक चार्टर (Charter) पर हस्ताक्षर किए। इस समय अमेरिका के अलावा 27 देश इसके चार्टर पर हस्ताक्षर कर चुके हैं।
इसमें कौन-कौन से देश शामिल हैं?
बोर्ड ऑफ पीस में 27 से अधिक देश संस्थापक/पूर्ण सदस्य के रूप में जुड़े हैं, जिनमें शामिल हैं- अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, तुर्की, इजरायल, मिस्र, अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे देश। स्थायी सदस्यता बनाए रखने के लिए सदस्य देशों से 1 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान देने की अपेक्षा रखी गई है, या फिर हर तीन साल में उनकी सदस्यता का रिन्युअल होगा।
बोर्ड ऑफ पीस के फाउंडिंग मेंबर
इसका नेतृत्व और सांगठनिक ढाँचा कैसा है?
बोर्ड ऑफ पीस के चार्टर के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप को जीवनभर के लिए इसका अध्यक्ष (Chairman for life) नामित किया गया है। नए सदस्यों को आमंत्रित करने या संगठन के नियमों में बदलाव करने का सर्वाधिकार उनके पास है। इसका मुख्यालय वाशिंगटन डी.सी. (अमेरिका) में स्थित है। संगठन में नीतिगत और कूटनीतिक फैसले लेने के लिए एक एग्जीक्यूटिव बोर्ड बनाया गया है। इसमें पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, पूर्व संयुक्त राष्ट्र दूत निकोले म्लादेनोव, जेरेड कुश्नर और स्टीव विटकॉफ जैसे प्रमुख चेहरे शामिल हैं।
इस संगठन के मुख्य कार्य और इसकी जिम्मेदारियाँ क्या हैं?
युद्ध से प्रभावित गाजा इलाके का पुनर्निर्माण करना: इजरायल-हमास युद्ध के बाद गाजा को चलाने और स्थानीय सेवाओं को बहाल करने के लिए नेशनल कमेटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाजा (NCAG) का गठन किया गया है। NCAG में गैर-राजनीतिक और तकनीकी विशेषज्ञ (Technocrats) शामिल हैं, जो गाजा में रोजमर्रा के काम संभालते हैं। वहीं, बोर्ड ऑफ पीस NCAG के ऊपर मुख्य सुपरवाइजरी बॉडी (निगरानी संस्था) के रूप में काम करता है। बोर्ड ऑफ पीस के तहत नियुक्त हाई रिप्रेजेंटेटिव (जैसे निकोले म्लादेनोव) इस प्रशासनिक समिति के कामकाज को निर्देशित और नियंत्रित करते हैं। इसी के जरिए गाजा में इमारतों, सड़कों और बुनियादी सुविधाओं के पुनर्निमाण का काम किया जाएगा।
सुरक्षा और शांति स्थापना: गाजा में शांति बनाए रखने के लिए बोर्ड ऑफ पीस के पास सुरक्षा संबंधी कई अधिकार हैं। इसके तहत बोर्ड ऑफ पीस को गाजा में लगभग 20,000 सैनिकों का एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल यानी अंतरराष्ट्रीय शांति सेना (ISF) को तैनात करने का जिम्मा मिला है, जिसमें अल्बानिया, इंडोनेशिया, कजाकिस्तान, कोसोवो और मोरक्को जैसे देश सैनिक भेज रहे हैं।
इंटरनेशनल फोर्स के डिप्लॉयमेंट का ब्लू प्रिंट
इसके अलावा स्थानीय पुलिस को भी प्रशिक्षित किया जाएगा, जिसमें मिस्र और जोर्डन जैसे देश लगभग 12,000 गाजा पुलिस कर्मियों को प्रशिक्षित करने पर सहमत हुए हैं।
गाजा में हमास और अन्य सशस्त्र गुटों के सैन्य ढाँचे को पूरी तरह से समाप्त करना और हथियार आत्मसमर्पण कराना भी बोर्ड ऑफ पीस के प्रमुख लक्ष्यों में शामिल है। जिसमें अंतरराष्ट्रीय शांति सेना (ISF) मदद करेगी।
मानवीय सहायता पहुँचाने का जिम्मा: युद्ध में तबाह हुए गाजा के भौतिक और आर्थिक पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी भी इसी बोर्ड के पास है। इसके तहत गाजा के पुनर्निर्माण के लिए अरब देशों और अन्य सदस्य देशों से अरबों डॉलर की फंडिंग जुटाने की योजना बनाई गई है। इस फंडिंग के जरिए बिजली, पानी, अस्पताल, स्कूल, सड़कें और आवासीय भवनों का नए सिरे से निर्माण किया जाएगा। इसके साथ ही गाजा के प्रभावित नागरिकों तक भोजन, दवाइयाँ और जरूरी सामान सुचारू रूप से पहुँचाने के लिए बॉर्डर क्रॉसिंग (जैसे रफाह बॉर्डर) एक्टिविटी को भी नियंत्रित करना इसका लक्ष्य है।
कम शब्दों में कहें तो बोर्ड ऑफ पीस गाजा में ‘निरीक्षक, सुरक्षा प्रदाता और फंड मैनेजर’ तीनों भूमिकाएँ एक साथ निभा रहा है। इसका उद्देश्य गाजा में राजनीतिक शून्यता (Governance Vacuum) को भरना, हमास के नियंत्रण को समाप्त करना और एक अंतरराष्ट्रीय मॉडल के तहत गाजा का पुनर्विकास करना है।
A Roadmap for Completing the Implementation of President Trump’s Comprehensive Peace Plan in Gaza + Explanatory Document: Key Elements of the Arrangement and the Meaning of Its Provisionshttps://t.co/lDdzDKMDFR
हालाँकि इससे जुड़े कई सवाल भी हैं, क्योंकि आलोचकों का मानना है कि संगठन की अधिकांश शक्तियाँ सिर्फ अध्यक्ष (डोनाल्ड ट्रंप) के पास केंद्रित हैं। वहीं, इस संगठन पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और महत्व को कम करने की कोशिश का भी आरोप है। इसके अलावा इस संगठन के फंड प्रबंधन और पारदर्शिता को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विशेषज्ञों द्वारा सवाल उठाए गए हैं।
बोर्ड ऑफ पीस ने किया साफ, पीली रेखा से सबसे आखिर में पीछे हटेगा इजरायल
बोर्ड ऑफ पीस (Board of Peace) के ऑफिसियल एक्स हैंडल पर बताया गया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री और अन्य अहम लोगों के बीच सोमवार (3 जुलाई 2026) को अहम बैठक हुई। इस बैठक में उच्च प्रतिनिधि निकोले म्लादेनोव और बोर्ड ऑफ पीस की टीम ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी टीम के साथ गंभीरता से चर्चा की, जिसके बाद उसके (बोर्ड ऑफ पीस) और मध्यस्थ देशों (अमेरिका, मिस्र, कतर और तुर्की) के प्रयासों से हमास और गाजा के सभी सशस्त्र समूहों के पूर्ण निशस्त्रीकरण (हथियार डालने) पर बड़ा समझौता हुई है।
इस बैठक के बाद साफ कर दिया गया है कि गाजा पट्टी में हथियारों को पूरी तरह खत्म करना और बंदूक के साये वाले शासन से हटाकर आम नागरिक प्रशासन की ओर बढ़ना ही इसका लक्ष्य है। इस लक्ष्य तक पहुँचना एक प्रक्रिया होगी और उस प्रक्रिया का पूरा ढाँचा काम के अगले चरण में तय किया जाएगा।
इसके साथ ही ये साफ कर दिया गया कि इजराइली सेना (IDF) की येलो लाइन के पार वापसी केवल तभी होगी जब हथियारों को हटाने की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, जैसा कि हमास ने मध्यस्थों से वादा किया था। यह नियम छोटे हथियारों, भारी हथियारों और सुरंगों सभी पर समान रूप से लागू होता है।
As part of the process of decommissioning weapons in Gaza and enabling the transition to civilian governance, and creating a safer future in the region for both Israelis and Palestinians in Gaza, a meeting was held earlier today (Monday) between High Representative Nickolay…
इस पूरे समझौते को लागू करने की निगरानी ‘अंतरराष्ट्रीय स्टेबलाइजेशन फोर्स’ (ISF) और ‘इम्प्लीमेंटेशन वेरिफिकेशन कमेटी’ द्वारा की जाएगी, जिसमें अमेरिका और बोर्ड ऑफ पीस दोनों शामिल हैं। इसे पूरी तरह से लागू करने की दिशा में आगे की प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष सहमत हुए तंत्र के तहत अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करें।
क्यों पड़ी बोर्ड ऑफ पीस की जरूरत?
गाजा को लेकर चल रहे इस पूरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में एक पुरानी लेकिन बेहद गंभीर बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्र की शांति सेनाओं (UN Peacekeeping Operations) का दौर अब हमेशा के लिए धीमा पड़ चुका है? गाजा से लेकर काकेशस के बर्फीले पहाड़ों तक, कैरिबियाई सागर के द्वीपों से लेकर अफ्रीका के जंगलों और मध्य पूर्व के तपते रेगिस्तानों तक, आज संयुक्त राष्ट्र की औपचारिक शांति सेनाओं के बजाय ‘थर्ड पार्टी Force’ (तीसरे पक्ष के सुरक्षा बल) या शक्तिशाली देशों की अगुवाई वाले बहुराष्ट्रीय गठबंधनों का दबदबा बढ़ता जा रहा है।
फोटो साभार: यूएन पीसकीपिग मिशन वेबसाइट
यह सिर्फ सैनिकों की अदला-बदली का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के शक्ति-संतुलन (Power Dynamics), क्षेत्रीय प्रभुत्व, स्वायत्तता (Autonomy) और संप्रभुता के खेल का एक नया अध्याय है।
इसे समझने के लिए हमें उस मूलभूत तंत्र को देखना होगा जिसने लगभग सात दशकों तक दुनिया को संभाला। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत सुरक्षा परिषद (UN Security Council) को यह अधिकार दिया गया था कि वह वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सदस्य देशों के सैनिकों को मिलाकर एक निष्पक्ष शांति सेना का गठन करे। इन शांति सैनिकों की मुख्य पहचान उनकी नीली टोपियाँ और निष्पक्षता का वादा हुआ करता था। लेकिन आज का कड़वा सच यह है कि संयुक्त राष्ट्र की यह निष्पक्षता और इसकी निर्णय लेने की क्षमता, महाशक्तियों की अपनी आपसी गुटबाजी और वीटो (Veto) पावर के अंधाधुंध इस्तेमाल की बलि चढ़ चुकी है।
दरअसल, जब भी दुनिया में कोई बड़ा संकट खड़ा होता है, तो सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस) आपस में ही उलझ जाते हैं। एक देश प्रस्ताव लाता है और दूसरा उस पर वीटो लगा देता है। इस राजनीतिक गतिरोध (Veto Gridlock) के कारण जब संकटग्रस्त क्षेत्रों में निर्दोष लोग मारे जा रहे होते हैं, तब यूएन का तंत्र कागजी प्रक्रियाओं और अंतहीन बहसों में फंसा रह जाता है। इसी लाचारी ने दुनिया के अलग-अलग देशों और क्षेत्रीय संगठनों को यूएन के बाहर जाकर अपने विकल्प ढूँढने के लिए मजबूर किया है।
गाजा पट्टी में बन रहा नया ढाँचा इस बात का साफ संदेश है कि जब वैश्विक संस्थान काम करने में नाकाम साबित होते हैं, तो क्षेत्रीय शक्तियाँ और वैश्विक महाशक्तियाँ अपना खुद का ‘थर्ड पार्टी’ तंत्र विकसित कर लेती हैं। यह मॉडल त्वरित फैसले लेने और कड़े कदम उठाने में बेहद सक्षम माना जा रहा है, हालाँकि इसके साथ ही इस पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि यह अमेरिका और उसके करीबियों के कूटनीतिक और भू-राजनीतिक हितों को साधने का एक जरिया मात्र है। जैसा पहले भी होता रहा है।
रूस का ‘पीसकीपिंग’ मॉडल
गाजा में अमेरिका और उसके सहयोगियों की यह पहल कोई अनोखी या पहली घटना नहीं है। अगर हम वैश्विक नक्शे पर थोड़ा पूर्व की ओर नजर दौड़ाएँ और पूर्वोत्तर यूरोप तथा पूर्व सोवियत संघ (Post-Soviet Space) के देशों को देखें, तो रूस पिछले तीन दशकों से बिना किसी संयुक्त राष्ट्र जनादेश के अपना एक अलग ही ‘पीसकीपिंग’ मॉडल चला रहा है।
रूस का यह मॉडल सुरक्षा देने से ज्यादा उस इलाके पर अपना राजनीतिक और सैन्य दबदबा (Sphere of Influence) बनाए रखने का एक कारगर औजार रहा है। रूस जिन भी क्षेत्रों में अपनी शांति सेनाएँ भेजता है, वहाँ न तो यूएन का कोई नियंत्रण होता है और न ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सीधी दखलंदाजी। इन सभी मामलों में एक बात समान है वहाँ या तो दो देशों के बीच जमीन को लेकर पुराना विवाद है, या फिर किसी देश के भीतर का कोई हिस्सा खुद को आजाद घोषित करके स्वायत्तता (Autonomy) की माँग कर रहा है।
रूस के शांति सैनिक किन महत्वपूर्ण जगहों पर हैं तैनात, स्रोत-IISS, EPRC, CRISIS Group (ये ग्राफ ओपन सोर्स रिपोर्टिंग के आधार पर AI ChatGPT से बनाया गया है)
1-नागोर्नो-काराबाख (आर्मेनिया और अजरबैजान)
रूस के इस स्वतंत्र पीसकीपिंग मॉडल का सबसे प्रमुख उदाहरण नागोर्नो-काराबाख (Nagorno-Kara-bakh) का इलाका रहा है। यह क्षेत्र दक्षिण काकेशस के पहाड़ों में स्थित है और इसको लेकर दो पड़ोसी देशों आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच दशकों से खूनी जंग चलती आ रही है।
1990 के दशक में सोवियत संघ के पतन के बाद से ही यह क्षेत्र आर्मेनियाई मूल के लोगों के नियंत्रण में था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से इसे अजरबैजान का हिस्सा माना जाता था। 2020 में जब दोनों देशों के बीच फिर से भीषण युद्ध भड़का, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सिर्फ बयानबाजी करती रह गई। तब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने व्यक्तिगत रूप से दखल दिया और दोनों पक्षों को मेज पर लाकर एक युद्धविराम समझौते पर दस्तखत करवाए।
इस समझौते के तहत रूस ने बिना किसी यूएन मंजूरी के तुरंत अपने 2,000 से ज्यादा सशस्त्र सैनिकों और बख्तरबंद गाड़ियों को नागोर्नो-काराबाख में ‘शांति सैनिक’ बनाकर तैनात कर दिया। रूस ने आर्मेनिया और नागोर्नो-काराबाख को जोड़ने वाले लाचिन कॉरिडोर (Lachin Corridor) का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। यह पूरी तरह से 2022 तक रूस का एकतरफा और क्षेत्रीय अभियान था, जहाँ रूसी सेना ही कानून, सुरक्षा और सीमा की अंतिम फैसलेदार बन गई। हालाँकि साल 2024 में अजरबैजान के इस पूरे इलाके पर कब्जे के बाद रूस ने अपनी सेना पूरी तरह से वापस बुला ली और इस पर पूरी तरह से अजरबैजानी सैनिकों का कब्जा हो गया। ये इलाका आधिकारिक तौर पर अजरबैजान का ही है।
2- ट्रांसनिस्ट्रिया (मॉल्डोवा)
इसी तरह का एक और दिलचस्प और उलझा हुआ मामला पूर्वी यूरोप के छोटे से देश मॉल्डोवा का है, जहाँ ‘ट्रांसनिस्ट्रिया’ (Transnistria) नाम का एक संकरा भूभाग स्थित है। मॉल्डोवा से अलग होकर अपनी आजादी का दावा करने वाला क्षेत्र ‘ट्रांसनिस्ट्रिया’ रूस समर्थक माना जाता है। यहाँ 1990 के दशक से ही रूस ने अपने ‘शांति सैनिक‘ तैनात कर रखे हैं।
दरअसल, 1990 के दशक की शुरुआत में जब मॉल्डोवा सोवियत संघ से अलग हुआ, तो डैन्यूब नदी के किनारे बसे ट्रांसनिस्ट्रिया क्षेत्र ने रूस के समर्थन से खुद को मॉल्डोवा से आजाद घोषित कर दिया। वहाँ एक छोटा सा सशस्त्र संघर्ष हुआ, जिसके बाद रूस ने तुरंत वहाँ अपने ‘शांति सैनिकों’ (Peacekeepers) की तैनाती कर दी। आज तीन दशक बीत जाने के बाद भी लगभग 1,500 रूसी सैनिक शांति बनाए रखने के नाम पर ट्रांसनिस्ट्रिया में डटे हुए हैं।
मॉल्डोवा की चुनी हुई सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे मॉल्डोवा की संप्रभुता (Sovereignty) पर सीधा कब्जा मानते हैं और बार-बार रूसी सैनिकों को हटाने की माँग करते रहे हैं। लेकिन रूस ‘थर्ड पार्टी फोर्स’ की आड़ में इस इलाके का इस्तेमाल मॉल्डोवा को पश्चिमी देशों और यूरोपीय संघ (EU) के करीब जाने से रोकने के लिए एक कूटनीतिक मोहरे के रूप में करता आ रहा है।
3- अबखाजिया और साउथ ओसेशिया (जॉर्जिया)
रूस के इस मॉडल का तीसरा बड़ा उदाहरण जॉर्जिया के दो क्षेत्रों अबखाजिया (Abkhazia) और साउथ ओसेशिया (South Ossetia) में देखने को मिलता है। 1990 के दशक के शुरुआती संघर्षों के बाद रूस ने खुद को इन दोनों अलगाववादी क्षेत्रों में शांति का मुख्य संरक्षक घोषित कर दिया था।
साल 2008 में जब जॉर्जिया की सरकार ने साउथ ओसेशिया पर फिर से अपना नियंत्रण कायम करने की कोशिश की, तो रूस ने अपने ‘शांति सैनिकों पर हमले’ को बहाना बनाकर जॉर्जिया पर हमला कर दिया और सिर्फ पाँच दिनों में जॉर्जियाई सेना को खदेड़ दिया। इसके तुरंत बाद रूस ने इन दोनों क्षेत्रों को स्वतंत्र देशों के रूप में मान्यता दे दी और वहाँ अपने स्थायी सैन्य अड्डे और सुरक्षा बल तैनात कर दिए।
इन तीनों ही मामलों से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि रूस के लिए ‘शांति सेना’ का मतलब वैश्विक शांति नहीं, बल्कि अपने पड़ोस में अपनी सामरिक मौजूदगी को कानूनी और नैतिक जामा पहनाना है। हम इसमें क्रीमिया और यूक्रेन से जुड़ा मामला जोड़ सकते हैं, लेकिन वो सीधे युद्ध और कब्जे का मामला बन चुका है। हालाँकि क्रीमिया में रूसी हस्तक्षेप शांति स्थापना के नाम पर ही शुरू हुआ था।
दुनिया में अन्य प्रमुख ‘गैर-यूएन’ (Non-UN) सुरक्षा बल
दुनिया भर के नक्शे पर नजर डालें तो हमें यह समझ में आएगा कि संयुक्त राष्ट्र के बाहर सुरक्षा व्यवस्था चलाने का यह चलन सिर्फ अमेरिका या रूस तक ही सीमित नहीं है। दुनिया के हर महाद्वीप में संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्रों में क्षेत्रीय संगठनों, विशेष गठबंधनों या बहुराष्ट्रीय टास्क फोर्स ने यूएन की जगह ले ली है।
नीचे दिए गए टेबल के आधार पर यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि दुनिया के किन-किन हिस्सों में गैर-यूएन बल अपनी सेवाएँ दे रहे हैं और उनके पीछे कौन से संगठन या देश खड़े हैं-
सिनाई प्रायद्वीप में MFO की तैनाती
इनमें से सबसे पुराने और सफल गैर-यूएन मिशनों में से एक सिनाई प्रायद्वीप में स्थित MFO (Multinational Force and Observers) है। 1979 में जब अमेरिका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर की मध्यस्थता में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात और इजरायल के प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन ने ऐतिहासिक ‘कैम्प डेविड समझौते’ पर दस्तखत किए, तो शर्त यह थी कि इजरायल सिनाई प्रायद्वीप से अपनी सेना हटा लेगा और वहाँ एक निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय बल तैनात किया जाएगा जो दोनों देशों के बीच सीमा पर नजर रखेगा।
शुरुआती योजना के अनुसार यह काम यूएन शांति सेना को सौंपा जाना था। लेकिन उस दौर में शीत युद्ध (Cold War) चरम पर था और सोवियत संघ ने यह साफ कर दिया कि वह सुरक्षा परिषद में ऐसे किसी भी प्रस्ताव पर वीटो लगा देगा जो अमेरिका की मध्यस्थता से हुए समझौते को मान्यता देता हो।
यूएन के इस राजनीतिक गतिरोध को देखते हुए अमेरिका, मिस्र और इजरायल ने एक अभूतपूर्व रास्ता निकाला। उन्होंने यूएन की लालफीताशाही से हटकर एक स्वतंत्र, गैर-यूएन अंतरराष्ट्रीय बल का गठन किया, जिसे MFO का नाम दिया गया। इसका मुख्यालय रोम में बनाया गया और इसकी कमान अमेरिकी नागरिक और सैन्य अधिकारियों को सौंपी गई।
आज भी चार दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद, सिनाई के रेगिस्तान में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस और न्यूजीलैंड जैसे दर्जनों देशों के सैनिक तैनात हैं। MFO ने बिना किसी यूएन हस्तक्षेप के मिस्र और इजरायल जैसी दो पारंपरिक विरोधी ताकतों के बीच शांति को आज तक सफलतापूर्वक बनाए रखा है, जो यह साबित करता है कि गैर-यूएन मॉडल बेहद प्रभावी हो सकते हैं।
कोसोवा में नाटो की तैनाती
दूसरा बड़ा उदाहरण यूरोप के बालकन क्षेत्र में स्थित कोसोवो का है। 1990 के दशक के अंत में जब सर्बिया की सेना और कोसोवो के अल्बानियाई मूल के अलगाववादियों के बीच भीषण जातीय हिंसा और नरसंहार शुरू हुआ, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद रूस के रुख के कारण कोई सख्त फैसला नहीं ले सकी।
इसके जवाब में नाटो (NATO) ने यूएन की औपचारिक मंजूरी का इंतजार किए बिना सर्बियाई ठिकानों पर व्यापक हवाई हमले शुरू कर दिए। सर्बियाई सेना को पीछे हटने पर मजबूर करने के बाद नाटो ने जून 1999 में कोसोवो में अपनी शांति सेना तैनात कर दी, जिसे KFOR (Kosovo Force) के नाम से जाना जाता है।
कोसोवो में नाटो के सैनिक (फोटो साभार: KFOR Offical Website)
हालाँकि बाद में यूएन ने इसे एक प्रस्ताव के जरिए काम करने की अनुमति दी, लेकिन KFOR की पूरी सैन्य कमान, रणनीति और सैनिकों की तैनाती पूरी तरह से नाटो के जनरलों के हाथ में रही है। KFOR आज भी कोसोवो में शांति बनाए रखने और सर्बिया के साथ उसकी विवादित सीमाओं पर तनाव को नियंत्रित करने का काम कर रही है।
कैरिबियाई देश हैती का अनोखा उदाहरण
कैरिबियाई देश हैती (Haiti) की स्थिति और भी ज्यादा अनोखी है। 2021 में हैती के राष्ट्रपति जोवेनेल मोइस की हत्या के बाद देश में पूरी तरह से अराजकता फैल गई। राजधानी पोर्ट-ओ-प्रिंस के 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर हिंसक आपराधिक गिरोहों (Gangs) का कब्जा हो गया और सरकार लगभग ढह गई।
हैती के अंतरिम नेतृत्व ने बार-बार अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की गुहार लगाई। लेकिन अतीत में हैती में चलाए गए यूएन शांति अभियानों (MINUSTAH) का अनुभव बहुत खराब रहा था, जहाँ यूएन सैनिकों पर हैजा बीमारी फैलाने और मानवाधिकारों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे थे। इस वजह से न तो यूएन एक और पारंपरिक शांति मिशन भेजना चाहता था और न ही कोई पश्चिमी देश अपने सैनिक भेजने को तैयार था।
ऐसी स्थिति में एक नया प्रयोग किया गया। सुरक्षा परिषद ने एक प्रस्ताव पारित करके एक ‘थर्ड पार्टी’ सुरक्षा मिशन को मंजूरी दी, लेकिन कमान खुद के हाथ में लेने के बजाय इसे केन्या की अगुवाई में एक बहुराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता मिशन (MSS – Multinational Security Support Mission) का रूप दे दिया।
केन्या ने इस मिशन का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी उठाई और अपनी सशस्त्र पुलिस टुकड़ियों को हैती भेजा, जिसमें बहामास, जमैका, बारबाडोस और बांग्लादेश जैसे अन्य देशों ने भी अपने सुरक्षाकर्मी जोड़े। यह मॉडल दर्शाता है कि यूएन अब सीधे मोर्चे पर उतरने के बजाय क्षेत्रीय या इच्छुक देशों को ‘आउटसोर्स’ (Outsource) करके सुरक्षा अभियानों की कमान सौंप रहा है।
गैर UN फोर्स की तैनाती, डाटा-NARO, UNSC, IISS etc (ये ग्राफ ओपन सोर्स रिपोर्टिंग के आधार पर AI ChatGPT से बनाया गया है)
अफ्रीका में अफ्रीकी यूनियन ने उठाए गंभीर कदम, सोमालिया में कई देशों की फौज रही तैनात
अफ्रीका महाद्वीप में अफ्रीकी संघ (African Union – AU) ने अपनी सुरक्षा चिंताओं को खुद संभालने की दिशा में बड़े कदम उठाए हैं। सोमालिया में कट्टरपंथी इस्लामी आतंकी गुट अल-शबाब (Al-Shabaab) के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए यूएन सेना के बजाय अफ्रीकी संघ का मिशन ATMIS (African Union Transition Mission in Somalia) तैनात किया गया है। इसे UNSC ने रिजोल्यूशन 2767 के जरिए मान्यता दी है।
इस मिशन में युगांडा, केन्या, बुरुंडी, इथियोपिया और जिबूती जैसे अफ्रीकी पड़ोसी देशों के सैनिक शामिल हैं। अफ्रीकी देशों का मानना है कि बाहरी पश्चिमी या यूएन सैनिक स्थानीय भाषा, संस्कृति और भूगोल को नहीं समझते, इसलिए स्थानीय और क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान क्षेत्रीय ताकतों के पास ही होना चाहिए।
दुनिया भर में ‘थर्ड पार्टी Force’ और ‘मिक्स्ड Force’ की उपस्थिति पहले से
जब हम ‘थर्ड पार्टी Force’ की बात करते हैं, तो इसमें सिर्फ बहुराष्ट्रीय संगठन या रूस-अमेरिका जैसी महाशक्तियाँ ही शामिल नहीं हैं। आज दुनिया में ऐसे दर्जनों संवेदनशील इलाके हैं जहां ‘मिक्स्ड फोर्स’ (Mixed Forces) या ‘द्विपक्षीय/त्रिस्तरीय सुरक्षा बल’ (Bilateral & Tripartite Forces) तैनात हैं।
इसका मतलब यह है कि दो या तीन देश आपस में एक विशेष सुरक्षा समझौता करते हैं और किसी तीसरे देश के क्षेत्र में या अपनी साझी विवादित सीमाओं पर संयुक्त रूप से सेनाएँ या पुलिस तैनात कर देते हैं। इसमें यूएन का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता।
दुनिया भर में इस प्रकार की ‘थर्ड पार्टी’ तथा ‘मिक्स्ड/द्विपक्षीय’ सैन्य तैनाती के कुछ मामलों के बारे में हम आपको बता रहे हैं।
सीरिया में ‘थर्ड पार्टी’ ताकत का खेल: US, रूस, तुर्की और ईरान का अखाड़ा
सीरिया का संकट इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि जब किसी देश में गृहयुद्ध भड़कता है और संयुक्त राष्ट्र (UN) मूकदर्शक बन जाता है, तो वहाँ ‘थर्ड पार्टी’ सैन्य शक्तियाँ किस तरह अपना कब्जा और वर्चस्व कायम कर लेती हैं।
दिसंबर 2024 में बशर अल-असद के दशकों पुराने शासन के पतन के बाद सीरिया एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव से गुजरा है। असद के जाने के बाद अहमद अल-शरा (पूर्व एचटीएस प्रमुख) के नेतृत्व में एक संक्रमणकालीन सरकार (Transitional Government) का गठन तो हुआ, लेकिन सीरिया में शांति अभी भी बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है।
आज सीरिया की स्थिति 3 मुख्य मोर्चों पर बंटी हुई है-
सत्ता और अन्य विरोधी गुटों में टकराव: नए संक्रमणकालीन प्रशासन ने सीरियाई सेना में विद्रोही गुटों को विलय करने का प्रयास किया है, लेकिन कुर्द-नेतृत्व वाली ‘सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्सेस’ (SDF) और दमिश्क सरकार के बीच अक्सर हिंसक झड़पें और स्वायत्तता की लड़ाई जारी है।
सीरिया में असद शासन के पतन के बाद भी रूस के पास ‘हमीमिम’ एयरबेस और ‘तारतूस’ नौसैनिक अड्डे की रणनीतिक मौजूदगी का आधार है, जिन्हें वह अपने भू-राजनीतिक हितों के लिए खाली नहीं करना चाहता। वहीं सीरिया की असद सरकार के गिरने के बाद से यहाँ ईरान को बहुत बड़ा झटका लगा और उसे लगातार बैकफुट पर आना पड़ा।
इसी तरह से तुर्की भी है। पूर्वोत्तर सीरिया में अमेरिका और उत्तर में तुर्की की सेनाएँ अपने-अपने ‘थर्ड पार्टी’ सुरक्षा हितों और आतंकवाद-विरोधी अभियानों के नाम पर लगातार सक्रिय हैं। इसमें उत्तर-पश्चिम सीरिया (इदलिब और उत्तरी अलेप्पो) में तुर्की की सेना ने अपने सुरक्षा क्षेत्र (Safe Zone) बनाए हुए हैं। यहाँ तुर्की की सेना ने स्थानीय ‘सीरियन नेशनल आर्मी’ (SNA) के साथ मिलकर एक मिक्स्ड पुलिसिंग और सैन्य ढाँचा तैयार किया है ताकि कुर्द लड़ाकों को अपनी सीमाओं से दूर रखा जा सके और सीरियाई शरणार्थियों को वापस बसाया जा सके।
वहीं, उत्तर-पूर्वी सीरिया के तेल समृद्ध इलाकों और अल-तन्फ (Al-Tanf) बेस पर लगभग 900 से अधिक अमेरिकी सैनिक तैनात रहे हैं। ये सैनिक सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेस (SDF – जो मुख्य रूप से कुर्द लड़ाके हैं) के साथ मिलकर ‘मिक्स्ड फोर्स‘ के रूप में ISIS के खिलाफ अभियान चलाते रहे हैं और सीरियाई सरकार के प्रभाव को रोकते हैं। हालाँकि अब अमेरिका ने अपनी उपस्थिति सीमित की है, तो कुर्दों को भी तुर्की के हाथों मरने के लिए छोड़ दिया है। यहाँ अमेरिकी ढाँचा विफल नजर आ रहा है, क्योंकि सीरिया में पूर्व आतंकी ही आज राष्ट्रप्रमुख की हैसियत में है।
हालाँकि सीरिया में शासन बदलने के बावजूद अलवी, द्रूज और ईसाई अल्पसंख्यकों के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा घटी नहीं है। वहीं आईएसआईएस (ISIS) के स्लीपर सेल अभी भी छिटपुट हमलों की फिराक में रहते हैं।
सीरिया आज किसी पारंपरिक यूएन मिशन के तहत शांत नहीं हो रहा है, बल्कि यह तुर्की, रूस, अमेरिका और स्थानीय स्वायत्त गुटों की शक्ति-संतुलन (Power Dynamics) पर टिका हुआ है। यह दिखाता है कि एक बार जब यूएन निष्प्रभावी हो जाता है, तो किसी देश की स्वायत्तता और सुरक्षा पर ‘थर्ड पार्टी फोर्स’ ही हावी हो जाती हैं।
कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC): SAMIDRC और EACRF का क्षेत्रीय मिक्स्ड फोर्स मॉडल
पूर्वी कांगो (DR Congo) दशकों से दर्जनों विद्रोही गुटों (जैसे M23) की हिंसा से जूझ रहा है। यहाँ यूएन का सबसे बड़ा और महंगा शांति मिशन MONUSCO दशकों से तैनात था, लेकिन स्थानीय जनता और सरकार यूएन की नाकामी से बेहद नाराज हो गई। इसके परिणामस्वरूप यूएन को हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई और उसकी जगह क्षेत्रीय ‘मिक्स्ड फोर्स’ तैनात की गईं-
SAMIDRC (SADC Mission in the DRC): दक्षिणी अफ्रीकी विकास समुदाय (SADC) के देशों दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया और मलावी ने मिलकर पूर्वी कांगो में अपनी एक सशक्त ‘मिक्स्ड कॉम्बैट फोर्स’ भेजी है, जो सीधे विद्रोहियों के खिलाफ आक्रामक सैन्य कार्रवाई करती है।
EACRF (East African Community Regional Force): इससे पहले पूर्वी अफ्रीकी समुदाय (केन्या, युगांडा, बुरुंडी, दक्षिण सूडान) के सैनिकों को मिलाकर एक क्षेत्रीय मिक्स्ड बल बनाया गया था जिसने कांगो के हिंसाग्रस्त इलाकों में गश्त और सुरक्षा की कमान संभाली थी।
अफ्रीकन यूनियन की फोर्स तैनाती, सोर्स-AUPSD, AU Press Release, IISS Military Balance 2024 (ये ग्राफ ओपन सोर्स रिपोर्टिंग के आधार पर AI ChatGPT से बनाया गया है)
मोजाम्बिक (काबो डेलगाडो)
कांगो की तरह ही मोजांबिक में SAMIM और रवांडा की द्विपक्षीय ‘थर्ड पार्टी Force’ की मौजूदगी बनी हुई है दरअसल, मोजाम्बिक के उत्तरी प्रांत काबो डेलगाडो (Cabo Delgado) में जब ISIS से जुड़े आतंकवादी गुटों ने कब्जा कर लिया और प्राकृतिक गैस परियोजनाओं को ठप कर दिया, तो मोजाम्बिक सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के पास जाने के बजाय द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मदद माँगी। इसमें-
रवांडा सुरक्षा बल (RDF – Rwanda Defence Force): मोजाम्बिक और रवांडा की सरकारों के बीच एक सीधा द्विपक्षीय समझौता हुआ। रवांडा ने अपने 2,000 से अधिक उच्च प्रशिक्षित सैनिकों और पुलिसकर्मियों को काबो डेलगाडो भेजा। रवांडा की सेना और मोजाम्बिक की सेना ने एक ‘मिक्स्ड फोर्स’ के रूप में काम करते हुए कुछ ही महीनों में आतंकियों को प्रमुख शहरों से खदेड़ दिया।
SAMIM (SADC Mission in Mozambique): इसके साथ ही दक्षिणी अफ्रीकी देशों के गठबंधन ने अपनी संयुक्त सेना भी वहाँ भेजी। इस मॉडल को वैश्विक कूटनीति में अत्यंत सफल द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग (Bilateral Security Intervention) माना जाता है।
साहेल क्षेत्र (पश्चिम अफ्रीका): गफाइव साहेल (G5 Sahel) और बहुराष्ट्रीय टास्क फोर्स
पश्चिम अफ्रीका के सहारा मरुस्थल से सटे साहेल क्षेत्र (माली, नाइजर, बुर्किना फासो, चाड) में जिहादी आतंकवाद से निपटने के लिए विभिन्न प्रकार की मिक्स्ड और थर्ड पार्टी फोर्सेज तैनात रही हैं-
MNJTF (Multinational Joint Task Force): नाइजीरिया, चाड, कैमरून, नाइजर और बेनिन देशों ने मिलकर लेक चाड बेसिन (Lake Chad Basin) में ‘बोको हरम’ और ‘ISWAP‘ के खिलाफ एक बहुराष्ट्रीय संयुक्त बल (MNJTF) का गठन किया है। इसमें पाँचों देशों के सैनिक और कमांडर एक ही एकीकृत कमान के तहत काम करते हैं और सीमाओं के पार जाकर आतंकवादियों का पीछा करते हैं।
ऑपरेशन बरखाने और टाकुबा टास्क फोर्स (पूर्व में): फ्रांस ने इस इलाके में अपने हजारों सैनिक तैनात किए थे और यूरोपीय देशों (स्वीडन, एस्टोनिया, चेक गणराज्य) की विशेष सेनाओं के साथ मिलकर एक ‘मिक्स्ड यूरोपियन फोर्स’ (Takuba Task Force) बनाई थी। हालाँकिसैन्य तख्तापलटों के बाद रूस के समर्थन वाली फ्रांस विरोधी तख्तापलट सरकारों ने फ्रांसीसी बलों को निकालकर रूसी वैगनर (अब अफ्रीका कोर) को थर्ड पार्टी फोर्स के रूप में आमंत्रित किया है।
सोलोमन द्वीप और दक्षिण प्रशांत: ऑस्ट्रेलिया और चीन की द्विपक्षीय तैनाती
दक्षिण प्रशांत महासागर के छोटे से द्वीप देश सोलोमन आइलैंड्स (Solomon Islands) में जब 2021 में भीषण दंगे और राजनीतिक अस्थिरता भड़की, तो सुरक्षा के लिए द्विपक्षीय ‘थर्ड पार्टी फोर्स’ की मदद ली गई-
SIAF (Solomon International Assistance Force): ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिजी और पापुआ न्यू गिनी की पुलिस और सेनाओं ने मिलकर एक त्वरित प्रतिक्रिया बल सोलोमन द्वीप भेजा जिसने वहाँ की सड़कों पर व्यवस्था कायम की।
चीन-सोलोमन द्वीप सुरक्षा समझौता: इसके तुरंत बाद सोलोमन द्वीप की सरकार ने चीन के साथ एक द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते पर दस्तखत किए, जिसके तहत चीनी पुलिस और सुरक्षा बल वहां की पुलिस को प्रशिक्षण देने और आवश्यकता पड़ने पर देश में सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए तैनात किए गए हैं। यह प्रशांत क्षेत्र में महाशक्ति स्पर्धा का एक नया मिक्स्ड/थर्ड पार्टी मॉडल है। हालाँकि अब सोलोमन के भीतर चीन के साथ हुई इस व्यवस्था का विरोध भी शुरू हो गया है।
गैर-यूएन फोर्स की सफल तैनाती, सोर्स-AU, NARO, SADC, UN Documents(ये ग्राफ ओपन सोर्स रिपोर्टिंग के आधार पर AI ChatGPT से बनाया गया है)
जिबूती: दुनिया का सबसे बड़ा ‘मिक्स्ड फॉरेन मिलिट्री हब’
लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित अफ्रीका का छोटा सा देश जिबूती (Djibouti) दुनिया का सबसे अनोखा सुरक्षा केंद्र है। जिबूती में कोई संयुक्त राष्ट्र बल नहीं है, लेकिन यहाँ दुनिया की सबसे प्रतिद्वंद्वी महाशक्तियों के सैन्य अड्डे एक-दूसरे से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं-
अमेरिका (Camp Lemonnier): अफ्रीका में अमेरिका का एकमात्र स्थायी सैन्य अड्डा, जहाँ हजारों अमेरिकी सैनिक और ड्रोन तैनात हैं।
चीन (PLA Support Base): चीन का विदेश में पहला और सबसे बड़ा नौसैन्य अड्डा।
इसके अलावा फ्रांस, जापान और इटली जैसे देशों के भी अपने-अपने स्वतंत्र सैन्य अड्डे जिबूती में मौजूद हैं।
यह पूरा देश एक प्रकार से अंतरराष्ट्रीय बहु-पक्षीय ‘थर्ड पार्टी सैन्य केंद्र‘ के रूप में काम करता है, जहाँ से ये सभी देश हिंद महासागर और लाल सागर में समुद्री लुटेरों, आतंकवाद और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा की निगरानी करते हैं।
संयुक्त राष्ट्र पीसकीपिंग का पतन और ‘थर्ड पार्टी Force’ के उभार की 5 बड़ी वजहें
आखिर ऐसा क्या हुआ कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाया गया संयुक्त राष्ट्र का बहुपक्षीय शांति ढाँचा आज इतना कमजोर पड़ गया है और दुनिया भर के देश गैर-यूएन, क्षेत्रीय या द्विपक्षीय ‘थर्ड पार्टी फोर्सेज’ का रुख करने के लिए मजबूर हो रहे हैं? इसके पीछे 5 कड़वे और व्यावहारिक कारण हैं-
1- सुरक्षा परिषद की राजनीतिक लाचारी (Veto Gridlock & Polarization)
संयुक्त राष्ट्र का पूरा ढाँचा इस बात पर टिका था कि सुरक्षा परिषद के पाँचों स्थायी सदस्य (P5) दुनिया के बड़े संकटों पर एकमत होंगे। लेकिन आज का दौर एक नए शीत युद्ध (New Cold War) का दौर है। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस एक तरफ हैं, जबकि रूस और चीन दूसरी तरफ।
यूक्रेन युद्ध, सीरिया संकट, इजरायल-गाजा संघर्ष या नागोर्नो-काराबाख जैसे मामलों में सुरक्षा परिषद पूरी तरह से लकवाग्रस्त (Paralyzed) हो चुकी है।
जब भी कोई देश शांति सेना भेजने का प्रस्ताव लाता है, दूसरी महाशक्ति तुरंत अपने वीटो का इस्तेमाल कर देती है।
परिणाम स्वरूप पीड़ित देशों या क्षेत्रीय शक्तियों के पास यूएन के बाहर जाकर ‘थर्ड पार्टी गठबंधन’ या द्विपक्षीय मिक्स्ड फोर्स बनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।
2- ‘पीसकीपिंग’ बनाम ‘पीस एनफोर्समेंट’ की वैधानिक सीमाएँ
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय 6 (Chapter VI) के तहत भेजी जाने वाली पारंपरिक यूएन शांति सेनाओं के नियम बहुत सख्त और सीमित होते हैं।
आत्मरक्षा का नियम: यूएन शांति सैनिक केवल तभी गोली चला सकते हैं जब उन पर सीधा हमला हो। वे किसी युद्ध को रोकने, हमलावरों को खत्म करने या जबरन शांति स्थापित करने (Peace Enforcement) के लिए ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
गाजा या हैती जैसे हालात: गाजा या हैती जैसी जगहों पर, जहाँ कोई शांति समझौता लागू ही नहीं है और हथियारबंद आतंकवादी या आपराधिक गिरोह खुलेआम सड़कों पर घूम रहे हैं, वहाँ यूएन के नीली टोपी वाले सैनिक पूरी तरह से अप्रभावी साबित होते हैं।
ऐसी जगहों पर ऐसी ‘थर्ड पार्टी Forces’ की जरूरत होती है जो बिना किसी हिचकिचाहट के आक्रामक सैन्य कार्रवाई कर सकें और कानून तोड़ने वालों का खात्मा कर सकें।
3- यूएन मिशनों की धीमी, नौकरशाही और जटिल प्रक्रिया
संयुक्त राष्ट्र का नौकरशाही ढाँचा दुनिया भर में अपनी सुस्ती के लिए जाना जाता है। जब दुनिया के किसी हिस्से में कोई नया संकट खड़ा होता है, तो यूएन सुरक्षा परिषद में बहस होने, प्रस्ताव पास होने, बजट मंजूर होने और फिर 193 सदस्य देशों से सैनिकों की माँग करके उन्हें तैयार करने और तैनात करने में अक्सर 6 महीने से लेकर 2 साल तक का समय लग जाता है।
इतनी देर में संकटग्रस्त इलाके में हजारों निर्दोष लोग मारे जाते हैं या पूरा देश तबाह हो जाता है।
इसके विपरीत, नाटो, अफ्रीकी संघ, रूस या अमेरिकी अगुवाई वाले क्षेत्रीय बल या द्विपक्षीय मिक्स्ड फोर्सेज महज कुछ दिनों या हफ्तों के भीतर अपनी पूरी सैन्य टुकड़ियों को युद्ध क्षेत्र में उतारने में सक्षम होते हैं।
4- संप्रभुता का हनन, कब्जा और भू-राजनीतिक हित (Sphere of Influence)
कई मामलों में शक्तिशाली देश जानबूझकर संयुक्त राष्ट्र को किसी क्षेत्र से बाहर रखते हैं ताकि वे उस इलाके पर अपना एकतरफा कूटनीतिक, रणनीतिक और सैन्य प्रभाव बनाए रख सकें।
रूस का पूर्व-सोवियत देशों (जैसे मॉल्डोवा, जॉर्जिया, आर्मेनिया) में अपनी शांति सेनाएं तैनात करना इसी रणनीति का हिस्सा है ताकि इन देशों को पश्चिमी सैन्य गठबंधन नाटो या यूरोपीय संघ में शामिल होने से रोका जा सके।
इसी तरह अमेरिका भी मध्य पूर्व के तेल समृद्ध क्षेत्रों और रणनीतिक समुद्री मार्गों पर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए यूएन के बजाय अपनी अगुवाई वाले स्वतंत्र गठबंधनों (जैसे MFO या बहुराष्ट्रीय टास्क फोर्स) को प्राथमिकता देता है।
‘थर्ड पार्टी Force’ की तैनाती महाशक्तियों को उस क्षेत्र के राजनीतिक भविष्य को अपने हिसाब से मोड़ने का अधिकार देती है।
मेजबान देशों का यूएन पर से टूटता भरोसा और बदनामी
अतीत के कई यूएन शांति मिशनों के खराब रिकॉर्ड ने भी उनकी साख को भारी नुकसान पहुँचाया है।
रवांडा नरसंहार (1994): यूएन शांति सैनिक वहाँ मौजूद थे, फिर भी उनकी आँखों के सामने 8 लाख से ज्यादा लोग मार दिए गए क्योंकि उनके पास हथियार चलाने का आदेश नहीं था।
स्रेब्रेनित्सा नरसंहार (1995): बोस्निया में यूएन द्वारा घोषित ‘सुरक्षित क्षेत्र’ में डच यूएन सैनिकों के सामने हजारों बोस्नियाई मुस्लिमों का कत्लेआम कर दिया गया।
हैती में हैजा महामारी: यूएन शांति सैनिकों की लापरवाही के कारण हैती में हैजा फैल गया जिससे 10,000 से ज्यादा स्थानीय लोग मारे गए।
इन्हीं खराब अनुभवों के कारण आज कांगो, माली, सूडान और हैती जैसे देशों की सरकारें और जनता यूएन मिशनों को अपने देश से बाहर निकाल रही हैं और उनकी जगह रवांडा, केन्या या अन्य क्षेत्रीय देशों की मिक्स्ड सुरक्षा ताकतों पर भरोसा जता रही हैं।
क्या बदल रहा है दुनिया का सुरक्षा ढाँचा?
गाजा में अमेरिका की ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पहल हो, काकेशस और पूर्वी यूरोप में रूस की एकतरफा सैन्य उपस्थिति हो, या अफ्रीका और प्रशांत महासागर के द्वीपों में क्षेत्रीय मिक्स्ड बलों का उभार हो यह सब इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि वैश्विक सुरक्षा का ताना-बाना अब पूरी तरह से ‘बहुध्रुवीय’ (Multipolar) और व्यावहारिक (Pragmatic) होता जा रहा है।
बोर्ड ऑफ पीस के हवाले गाजा, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)
संयुक्त राष्ट्र अब दुनिया का एकमात्र ‘ग्लोबल दरोगा’ नहीं रहा। बल्कि क्षेत्रीय ताकतों का उभार हुआ है। ऐसे में क्षेत्रीय संगठन (जैसे नाटो, अफ्रीकी संघ, CSTO) और शक्तिशाली देश अपने-अपने क्षेत्रों में ‘थर्ड पार्टी फोर्स’ के जरिए नियंत्रण स्थापित कर रहे हैं।
ये तरह की चुनौती भी और समाधान भी। क्योंकि जहाँ एक तरफ थर्ड पार्टी फोर्स त्वरित कार्रवाई करने में सक्षम होती हैं, वहीं दूसरी तरफ इनमें निष्पक्षता की कमी हो सकती है, क्योंकि इन बलों के पीछे अक्सर नेतृत्व करने वाले देश के अपने राजनीतिक व कूटनीतिक हित छुपे होते हैं।
गाजा की स्थिति आज पूरी दुनिया के सामने एक नया नजीर पेश कर रही है। अगर ‘बोर्ड ऑफ पीस’ या अमेरिका के नेतृत्व वाली बहुराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था गाजा में सफल होती है, तो यह भविष्य के अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने के लिए यूएन के बजाय ‘थर्ड पार्टी कोऑलिशन’ के मॉडल को और अधिक मजबूती देगा।
UNSC में बदलाव की बेहद जरूरत, सदस्यों की संख्या बढ़े और वीटो सिस्टम हटे
बहरहाल, इन घटनाक्रमों के बीच सबसे ज्यादा जरूरत फिलहाल संयुक्त राष्ट्र के ढाँचे खासकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बदलाव लाने की है। आज UNSC की स्थाई सीटों में बढ़ोतरी कर भारत, अफ्रीकन यूनियन और लातिन अमेरिकी देशों को भी जगह मिलनी चाहिए, जिसके लिए भारत लगातार कोशिश भी कर रहा है। भारत की दावेदारी को भारी बहुमत से समर्थन भी मिल रहा है, लेकिन वीटो पॉवर के दम पर इसमें लगातार अडंगा लगाया जा रहा है। ऐसे में UNSC के वीटो पॉवर वाले हिस्से पर भी फिर से बहस की जरूरत है।
इन सबसे एक अच्छा तरीका तो यही लगता है कि वीटो पॉवर वाले सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए और किसी भी प्रस्ताव के पास होने के लिए 2 तिहाई या 3 चौथाई जैसे कड़े बहुमत की व्यवस्था की जाए। वर्ना धीरे-धीरे UNSC सिर्फ थर्ड पार्टी फोर्स के लिए कानूनी रास्ते बनाने तक ही जाएगा, जिसकी दुनिया में वैसे भी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि ये काम सिर्फ रबर स्टैंप के तौर पर हो रहा है। वैसे भी ताकतवर देश अपने फायदे लिए संयुक्त राष्ट्र की अनदेखी कर ही रहे हैं।
अमेरिकी रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने मंगलवार (4 अगस्त 2026) को भारत के विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill) को लेकर घबराहट और डर फैलाने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि मोदी सरकार चर्चों और धार्मिक चैरिटी को अपने नियंत्रण में लेकर ईसाइयों को प्रताड़ित करने की कोशिश में है।
इस MAGA ईसाई राष्ट्रवादी ने कहा, “भारत की संसद विदेशी अंशदान नियमन संशोधन (FCRA) नियमों में संशोधन करने पर विचार कर रही है ताकि सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी पर कब्जा करने की अनुमति मिल सके।” उन्होंने आगे कहा, “यह ईसाइयों के खिलाफ एक सीधा हमला है। यदि यह विधेयक इसी दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह भारत के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंधों में एक बड़ी चिंता का विषय होगा।”
Christians have been in India since St. Thomas the Apostle traveled to the Malabar Coast just decades after the resurrection of our Lord Jesus Christ.
But despite this long Christian history, India’s Parliament is considering amending Foreign Contribution Regulation Amendment…
हालाँकि, यह साफ था कि सोशल मीडिया पर किया गया यह दिखावा नाराज MAGA वोटर बेस को शांत करने के लिए था, खासकर अमेरिका की मौजूदा स्थिति और ईरान के साथ जारी युद्ध को देखते हुए, लेकिन उनका डर फैलाने वाला यह बयान भारत में अराजकता पैदा कर सकता है।
उनके बयान इस कानून के मूल प्रावधानों और भारत के विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक के व्यापक नियामक उद्देश्य, दोनों को गलत तरीके से पेश करते हैं। वास्तव में, यह कानून धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता। इसका उद्देश्य देश में काम कर रहे सभी गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) में जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता बढ़ाना तथा फंड के गलत इस्तेमाल या उसकी हेरा-फेरी से रोकना है।
ईसाई विरोधी झूठ का पर्दाफाश
FCRA संशोधन विधेयक को लेकर फैलाई जा रही अफवाह यह है कि यह भारत सरकार को मनमाने ढंग से चर्चों और धार्मिक संस्थानों को अपने नियंत्रण में लेने का अधिकार देता है। कानून के वैधानिक पाठ को सीधे पढ़ने से ही पता चलता है कि यह नैरेटिव तथ्यात्मक रूप से गलत है।
प्रस्तावित कानून [pdf] स्पष्ट रूप से सभी पूजा स्थलों (Places of Worship) को सरकारी परिवर्तन, धर्मनिरपेक्षीकरण या पुनरुद्देश्य (दूसरे काम में इस्तेमाल) से बचाता है।
“उप-धारा (6) में किसी भी बात के बावजूद, नामित प्राधिकरण, जहाँ उसके पास स्थायी रूप से निहित कोई संपत्ति या उसका कोई हिस्सा पूजा स्थल हो, ऐसी संपत्ति या उसके हिस्से के प्रबंधन या संचालन की जिम्मेदारी निर्धारित व्यक्ति को, निर्धारित तरीके और नियमों एवं शर्तों के अनुसार सौंपेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे पूजा स्थल का धार्मिक स्वरूप बरकरार रहे।”
(PRS इंडिया के माध्यम से 2026 के FCRA संशोधन विधेयक के एक अंश का स्क्रीनग्रैब)
यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि यदि किसी चर्च का विदेशी अंशदान लाइसेंस भी रद्द हो जाता है, तब भी उसके पूजा स्थल को न तो तोड़ा जा सकता है और न ही बंद किया जा सकता है। धार्मिक गतिविधियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।
नामित प्राधिकरण की भूमिका केवल उन व्यावसायिक या विकास से जुड़ी संपत्तियों के प्रबंधन तक सीमित है, जिन्हें विदेशी फंड से बनाया गया है और जिनका FCRA पंजीकरण रद्द, सरेंडर या समाप्त हो गया है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करना है।
इसके अलावा, नामित प्राधिकरण द्वारा जारी किसी भी आदेश के खिलाफ प्रशासनिक समीक्षा और जिला न्यायाधीश के समक्ष न्यायिक अपील की जा सकती है।
साथ ही, राज्य स्तर की एजेंसियों को केंद्र की पूर्व मंजूरी के बिना स्थानीय स्तर पर मुकदमा शुरू करने से रोक दिया गया है। यह मनमाने ढंग से स्थानीय कार्रवाई के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है।
जान लीजिए पूरा सच
प्रस्तावित कानून को पढ़ने से यह स्पष्ट है कि इसमें ईसाई मजहब समेत किसी के लिए भी विदेशी फंडिंग पर रोक नहीं लगाई गई है। ऐसे में चर्च और मंदिर, मस्जिद तथा गुरुद्वारे जैसे अन्य पूजा स्थल भी वास्तविक धार्मिक कार्यों के लिए विदेशी चंदा प्राप्त करना जारी रख सकते हैं।
सिर्फ तब कोई संगठन अपना FCRA पंजीकरण खो सकता है, जब विदेश से प्राप्त धन का इस्तेमाल उस उद्देश्य के अनुसार नहीं किया जाता, जिसके लिए उसे मूल रूप से घोषित किया गया था। लेकिन ऐसी स्थिति में भी संगठन के पूजा स्थल पर कब्जा नहीं किया जा सकता और न ही उसका इस्तेमाल किसी दूसरे उद्देश्य के लिए किया जा सकता है।
कानून में अदालत जाने का रास्ता भी उपलब्ध है। जिस संगठन का FCRA लाइसेंस रद्द किया जाता है, वह केंद्र सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती दे सकता है। यह प्रावधान धार्मिक और धर्मार्थ कार्यों से जुड़े संगठनों पर भी लागू होता है।
यहाँ तक कि यदि किसी चर्च का संचालन करने वाला संगठन अपना लाइसेंस खो देता है, तब भी स्थानीय लोग बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के उस चर्च में प्रार्थना करना जारी रख सकते हैं। यह बात FCRA संशोधन विधेयक को अल्पसंख्यक विरोधी बताए जाने वाले दावों की पोल खोलती है।
मोदी सरकार का आश्वासन
मोदी सरकार ने सभी हितधारकों (stakeholders) के साथ सक्रिय रूप से जुड़कर चिंताओं को दूर किया है और दोहराया है कि यह विधेयक बिना किसी धार्मिक पूर्वाग्रह के समान रूप से लागू होता है।
इस साल जुलाई में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा और वरिष्ठ चर्च प्रतिनिधियों के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की, जिसमें प्रेसबिटेरियन चर्च ऑफ इंडिया, गारो बैपटिस्ट कन्वेंशन और रोमन कैथोलिक चर्च शामिल थे।
उसी महीने में, केंद्रीय गृह मंत्री ने कैथोलिक विशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) के प्रतिनिधियों से मुलाकात की और उन्हें सूचित किया कि FCRA संशोधन विधेयक विदेशी धन प्राप्त करने वाले कानून का पालन करने वाले ईसाई संगठनों के कामकाज को प्रभावित नहीं करेगा।
(अमित शाह कॉनराड के. संगमा और ईसाई प्रतिनिधिमंडल से मिले, एएनआई के माध्यम से छवि)
यह आश्वासन भी दिया गया कि प्रस्तावित कानून प्रकृति में गैर-भेदभावपूर्ण है और इसे पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता है। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस साल मार्च में साफ किया था कि FCRA संशोधन विधेयक किसी भी धार्मिक संगठन को प्रभावित नहीं करेगा।
उन्होंने कहा था, “कॉन्ग्रेस पार्टी और केरल में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा यह अफवाहें फैलाई जा रही हैं कि भारत सरकार विभिन्न धार्मिक संगठनों की गतिविधियों को रोकने के लिए FCRA में बदलाव ला रही है। यह पूरी तरह से झूठा, मनगढ़ंत और भ्रामक है।”
रिजिजू ने आगे कहा, “कुछ फंड अवैध रूप से देश में प्रवेश करते हैं और राष्ट्रीय हित के खिलाफ इस्तेमाल किए जाते हैं। इसलिए, इस कानून का उद्देश्य विदेशी फंड के उचित नियमन को सुनिश्चित करके राष्ट्रीय हित और सुरक्षा की रक्षा करना है।”
कांग्रेस ने पहले FCRA का समर्थन किया था
यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि यूपीए (UPA) शासन के दौरान कांग्रेस पार्टी ने FCRA के कार्यान्वयन का समर्थन किया था। 2012 में, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने कहा था, “ऐसे NGO भी हैं, जिन्हें अक्सर अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से फंडिंग मिलती है, लेकिन वे हमारे देश के सामने मौजूद विकास की चुनौतियों को पूरी तरह नहीं समझते हैं…”
उन्होंने आगे कहा था, “परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम मुश्किलों में पड़ गया है क्योंकि ये गैर-सरकारी संगठन… हमारे देश के लिए ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाने की आवश्यकता को नहीं समझते हैं।”
यहाँ तक कि पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कुडनकुलम परमाणु विरोधी प्रदर्शनों के दौरान इसी तरह के बयान दिए थे: “जाँच से पता चलता है कि धन की हेराफेरी हुई है। इसलिए, विदेशी अंशदान अधिनियम के तहत, हमने मामले दर्ज करने का फैसला किया है।” दिलचस्प बात यह है कि यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान 4,000 गैर-सरकारी संगठनों के लाइसेंस रद्द किए थे।
निष्कर्ष
जब अमेरिका भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश कर रहा है और भारतीय ईसाइयों की स्थिति को लेकर डर का माहौल बना रहा है, तब यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह उत्तरी अमेरिकी देश भी पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करता है। अमेरिका में फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA) लागू है, जिसके तहत विदेशी हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों और संगठनों को अपनी राजनीतिक गतिविधियों और फंडिंग के स्रोतों का खुलासा करना पड़ता है।
FCRA संशोधन विधेयक भारत की संप्रभुता और अखंडता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। इसमें पूजा स्थलों के संरक्षण को अनिवार्य किया गया है, आपराधिक सजा के प्रावधानों को कम किया गया है, न्याय पाने के लिए स्पष्ट कानूनी रास्ता तय किया गया है और सभी गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए एक समान पारदर्शिता सुनिश्चित की गई है।
आज देश की शांति और सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। कुछ खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकार’ कहने वाले वामपंथी विचारधारा के लोग देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं। 2 अगस्त को आरफा खानुम और श्याम मीरा सिंह अपने-अपने यूट्यूब चैनल पर एक कोलैबोरेशन (Collaboration) वीडियो अपलोड करते हैं। यह वीडियो 1 घंटे 4 मिनट का है। इसमें आरफा खानुम, श्याम मीरा सिंह, तनुश्री पांडे और अनमोल आपस में चर्चा करते हुए नजर आते है। चर्चा किस बात पर… केवल और केवल मोदी सरकार को कैसे कोसा जाए, सीजेपी के उग्र प्रदर्शन की बिगड़ी छवि कैसे बचाई जाए और लोगों को सत्ता पलटने के लिए कैसे उकसाया जाए। इस गोलमेज (राउंड टेबल) चर्चा का मकसद केवल और केवल देश में आग लगाना है। ये वामपंथी विचारधारा के लोग युवाओं को हिंसा के लिए उकसा रहे हैं।
इन तथाकथित पत्रकारों ने दिल्ली की सड़कों पर हुड़दंग मचाने वालों का साथ दिया है। इन उपद्रवियों ने देश के प्रधानमंत्री को गालियां दीं। इन्होंने सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया। इन्होंने दिल्ली पुलिस और जवानों पर जानलेवा हमले किए। हद तो तब हो गई जब इन देश-विरोधी लोगों ने इन गुंडों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बता दिया। इन्होंने चुनी हुई सरकार की तुलना क्रूर ब्रिटिश राज से की।
हैरान करने वाली बात ये है कि सीजेपी का प्रदर्शन खत्म हो चुका है तब भी ये लोग इसी मुद्दे को लेकर बैठे है लेकिन झारखंड में नीट (NEET) पेपर लीक को लेकर जो वास्तविक छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं, उस पर इन वामपंथियों को उस चर्चा नहीं करनी है। ये वामपंथी झारखंड वाले पर चर्चा इसलिए नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि वहाँ इनके अपने राजनीतिक आका फँसे (कॉन्ग्रेस) हैं। जब आरफा खानुम ईरान गई थीं, तब डर के मारे उन्होंने बुर्का और हिजाब पहन लिया था। वहाँ वे एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थीं। लेकिन आज वे देश में बैठकर जहर उगल रही हैं।
गालियों और उपद्रवियों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बताने वाले इन वामपंथियों का काला सच
राउंड टेबल में बातचीत के दौरान तनुश्री, आरफा, अनमोल और श्याम ने अपने फाल्तु और दो कोड़ी के विचार रखें। इन लोगों ने दिल्ली की सड़कों पर पत्थरबाजी करने वालों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ तक बता दिया है। ये वही लोग हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री को गालियाँ दीं। यह हमारे देश के महान स्वतंत्रता सेनानियों का सीधा अपमान है। हमारे असली सेनानियों ने देश की आजादी के लिए जान दी थी। वे अंग्रेजों की गोलियाँ खाते थे। वे देश की एकता के लिए हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़े थे। वे चौराहों पर बैठकर ना तो पिज्जा-बर्गर खाते थे, ना ही देश का माहौल खराब करते थे। इसके अलावा, वे न तो देश विरोधी नारे लगाते थे और न ही किसी की माँ-बहन को गाली देते थे।
भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद और सरदार पटेल ने देश को एक किया था। लेकिन यह वामपंथी गैंग देश को तोड़ने में लगी है। जो लोग पुलिस पर पत्थर फेंकते हैं, वे कभी स्वतंत्रता सेनानी नहीं हो सकते। ऐसा कहना हमारे शहीदों के साथ बहुत बड़ा धोखा है। श्याम मीरा सिंह ने तो खुलेआम धमकी दी है। उसने वीडियो में कहा कि अगर 26 मार्च वाला आंदोलन सफल हो जाता, तो पीएम मोदी 26 अगस्त नहीं देख पाते। यह सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री को रास्ते से हटाने की साजिश है। यह लोग देश के युवा के शुभचिंतक नहीं हैं। ये सिर्फ अपने आकाओं को खुश करना चाहते हैं। ये मासूम छात्रों को मोहरा बना रहे हैं। ये अपनी गंदी राजनीति चमकाने के लिए देश में आग लगाना चाहते हैं।
जानें असल में स्वतंत्रता सेनानी कौन थे?
शहीद भगत सिंह (1907-1931): शहीद भगत सिंह भारत के इतिहास के एक ऐसे महान क्रांतिकारी हैं, जिनका नाम लेते ही हर देशवासी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। उनका जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के बंगा में एक देशभक्त परिवार में हुआ था। भगत सिंह ने कम उम्र में ही समझ लिया था कि देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए वैचारिक और सशस्त्र दोनों लड़ाइयों की जरूरत है। लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज से हुई मृत्यु का बदला लेने के लिए उन्होंने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी सॉन्डर्स का वध किया था। इसके बाद देश की सोई हुई सरकार और बहरी अंग्रेज हुकूमत को जगाने के लिए उन्होंने और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंका। उनका उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि पर्चे फेंककर अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाना था। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने जेल में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की और भारतीय राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। मात्र 23 साल की कम उम्र में 23 मार्च 1931 को हँसते-हँसते फाँसी के फँदे को चूमने वाले भगत सिंह आज भी देश के युवाओं के प्रेरणास्रोत और अमर नायक हैं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस (1897-1945): ‘नेताजी’ के नाम से संपूर्ण विश्व में विख्यात सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक (उड़ीसा) में हुआ था। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे आक्रामक और रणनीतिक रूप से निपुण नेताओं में से एक थे। उनका मानना था कि अंग्रेजों से भीख माँगकर नहीं, बल्कि सशस्त्र संघर्ष और बल प्रयोग करके ही पूर्ण स्वतंत्रता हासिल की जा सकती है। उन्होंने कॉन्ग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेदों के बाद ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना की और अंग्रेजों द्वारा नजरबंद किए जाने के बावजूद अद्भुत साहस दिखाते हुए देश से बाहर निकल गए। नेताजी ने जर्मनी और जापान की सहायता से सुदूर पूर्व में ‘आज़ाद हिंद फ़ौज’ (Indian National Army) का पुनर्गठन किया और सिंगापुर में भारत की अस्थायी सरकार ‘अर्ह सरकार’ की स्थापना की। उन्होंने देशवासियों को ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा!’ और ‘दिल्ली चलो!’ जैसे ओजस्वी नारे दिए। उनकी यह सेना अंग्रेजों के खिलाफ सीधे युद्ध के मैदान में उतरी और अंडमान-निकोबार को अंग्रेजों से मुक्त कराकर वहाँ तिरंगा फहराया। भारत की आजादी में नेताजी का योगदान और उनका पराक्रम इतिहास का सबसे स्वर्णिम अध्याय है।
चंद्रशेखर आज़ाद (1906-1931): चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा गाँव में हुआ था। वे बचपन से ही देश की आजादी के प्रति असीम जुनून रखते थे। जब वे मात्र 15 वर्ष के थे, तब उन्होंने महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और ब्रिटिश पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए। अदालत में जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने गर्व से अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वातंत्र्य’ (स्वतंत्रता) और पता ‘जेलखाना’ बताया था। तभी से उनके नाम के साथ ‘आजाद’ शब्द हमेशा के लिए जुड़ गया। रामप्रसाद बिस्मिल्लाह और अन्य महान क्रांतिकारियों के बलिदान के बाद, चंद्रशेखर आजाद ने ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HRA) की कमान संभाली और इसका नाम बदलकर ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) किया। वे काकोरी ट्रेन एक्शन जैसे कई साहसिक क्रांतिकारी अभियानों के मुख्य योजनाकारों में शामिल थे। अंग्रेजों की नींद उड़ा देने वाले आजाद ने आजीवन कसम खाई थी कि पुलिस की गोलियाँ उन्हें कभी जिंदा नहीं पकड़ सकेंगी। आखिरकार, 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क (इलाहाबाद) में अंग्रेजों से हुई अंतिम मुठभेड़ में उन्होंने अपनी पिस्तौल की आखिरी गोली खुद को मारकर मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन अंग्रेजों के सामने कभी घुटने नहीं टेके।
मोदी सरकार की ब्रिटिश राज से तुलना
आरफा खानुम और उनके साथियों ने अपनी चर्चा में मोदी सरकार की तुलना भारत पर कब्जा करने वाले ब्रिटिश राज से कर डाली। इन लोगों ने बार-बार यह साबित करने की कोशिश की है कि आज की चुनी हुई सरकार बिल्कुल ब्रिटिश हुकूमत की तरह काम कर रही है। यह इन वामपंथियों की गहरी राजनीतिक कुंठा को साफ-साफ दिखाता है। देश की जनता इन्हें बार-बार चुनावों में धूल चटा चुकी है। जनता ने इन्हें पूरी तरह नकार दिया है। अब इन लोगों से अपनी हार बर्दाश्त नहीं हो रही है। इसलिए ये बौखलाकर देश के लोकतंत्र और संविधान पर ही सवाल उठाने लगे हैं।
हमारा भारतीय संविधान देश के हर एक नागरिक को खुलकर जीने और अधिकार देता है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि कोई भी उपद्रवी भीड़ सड़क पर उतर आए। इसका मतलब यह नहीं है कि भीड़ कानून को अपने हाथ में ले ले। यह हक किसी को नहीं है कि वह सरेआम पुलिसकर्मियों के सिर फोड़ दे और दंगा फैलाए। अंग्रेजों के शासनकाल में देशवासियों पर बेइंतहा जुल्म और अत्याचार किए जाते थे। तब भारत का नागरिक अपने ही देश में गुलाम था। लेकिन आज देश का हर नागरिक पूरी तरह स्वतंत्र है और आजाद हवा में सांस ले रहा है। आज देश में जनता के वोटों से चुनी हुई अपनी सरकार है, जिसको आरफा, तनुश्री जैसे वामपंथी पचा नहीं पा रहे हैं।
इन वामपंथियों और कट्टरपंथियों को सबसे बड़ी तकलीफ इस बात की है कि देश की जनता इनके चहेते राजनीतिक दलों को वोट नहीं देती है। जनता इन्हें देखना तक पसंद नहीं करती है। इसीलिए ये अपनी हार का बदला लेना चाहते हैं। ये सीधे रास्ते से सत्ता में नहीं आ पा रहे हैं। इसलिए अब ये सीधे-सीधे मासूम युवाओं को भड़का रहे हैं। ये युवाओं का इस्तेमाल करके देश में आग लगाना चाहते हैं। ये हर हाल में देश की सत्ता को पलटने की खतरनाक साजिश रच रहे हैं।
आरफा खानुम का पाखंड, महिलाओं की सुरक्षा का झूठा डर
आरफा खानुम ने चर्चा में दिल्ली को एक ऐसा “बदनाम शहर” बताया जहां महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं और सरकार पर डर का माहौल बनाने का आरोप लगाया। लेकिन सवाल यह है कि क्या आरफा खानुम कभी अपने ही मजहब और समाज के भीतर मुस्लिम महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर बोलती हैं? तीन तलाक और पर्दे की आड़ में महिलाओं के हकों पर डाका डालने वालों पर उनका मुँह क्यों सिल जाता है? देश में हिंदू लड़कियों को लव जिहाद के जाल में फँसाकर धर्मांतरण और उत्पीड़न की घटनाओं पर आरफा पूरी तरह मौन रहती हैं। और ये कहती हुई नजर आती है कि हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़की ही क्यों पसंद आते हैं।
हाथरस से लेकर हिंदू विरोधी एजेंडे तक के कारनामे: तनुश्री पांडे का काला चिट्ठा
इस राउंडटेबल चर्चा में शामिल तनुश्री पांडे का पुराना रिकॉर्ड बहुत ही दागदार रहा है, जिसको वो शायद भूल चुकी है। इनका पूरा इतिहास देश और समाज के खिलाफ साजिश रचने का रहा है। इनके कारनामे बताते हैं कि ये किस खतरनाक और नफरती एजेंडे पर काम करती रही हैं।
हाथरस कांड के संवेदनशील समय में इन मोहतरमा तनुश्री ने अपनी हदें पार कर दी थीं। इन्होंने हाथरस की पीड़ित के परिवार को बार-बार फोन किया था। इन्होंने परिवार के लोगों को लगातार उकसाने का काम किया था। मृतका के भाई पर दबाव बना रही थी, कि जैसे वो कहे वैसा ही कहे। इसका एकमात्र मकसद इस गंभीर मामले को सांप्रदायिक रंग देना था। ये चाहती थीं कि देश में समाज के बीच नफरत की आग भड़क उठे।
तनुश्री पांडे पर हिंदू आस्था पर चोट करने के भी आरोप हैं। इन पर हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कहने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। ये लोग हमेशा से बहुसंख्यक समाज की आस्था को ठेस पहुँचाने का काम करते आए हैं। इन्हें देश की संस्कृति और परंपराओं से हमेशा से नफरत रही है।
तनुश्री का एक और पुराना और काला सच जगजाहिर है। इनका जेएनयू के वामपंथियों के साथ पुराना और गहरा नाता रहा है। एक बार वे जेएनयू के वामपंथी उपद्रवियों को यह सिखाते हुए पकड़ी गई थीं कि कैमरे के सामने क्या बोलना है और कैसे झूठ फैलाना है।
तनुश्री ये भी कहती नजर आती है कि भारत में सवाल पूछे जाने पर आपको सजा मिलती है और अलग नजरिए से देखा जाता है। एक दो उदारहण भी ये बताती है। ये देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झूठा ढिंढोरा पीटते हैं। लेकिन जब पाकिस्तान जैसे देश की बात आती है, तो ये एकदम गूंगे हो जाते हैं। पाकिस्तान में पत्रकारों की सरेआम हत्याएँ होती हैं। वहाँ विदेशी मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा हुआ है। लेकिन पाकिस्तान के इन जुल्मों पर तनुश्री और इनके साथियों का मुँह कभी नहीं खुलता है।
कंगना रनौत के सांसद रहने पर तनुश्री और आरफा को हो रही खुजली
आरफा खानुम और तनुश्री पांडे जैसी वामपंथी महिला पत्रकारों ने अपनी इस राउंडटेबल चर्चा में कंगना रनौत को लेकर भी बातचीत की। इन दोनों ने देश की जानी-मानी अभिनेत्री और मंडी से लोकसभा सांसद कंगना रनौत को लेकर बेहद अशोभनीय और अपमानजनक टिप्पणियाँ की हैं। इन्होंने खुलेआम कंगना के सांसद के पद और उनके राजनीतिक रसूख पर सवालिया निशान खड़े किए हैं। इन तथाकथित पत्रकारों की मानसिकता इतनी गिरी हुई है कि ये एक राष्ट्रवादी और बेबाक महिला नेता को देखकर हमेशा बौखलाई रहती हैं।
आरफा खानुम ने वीडियो में कहा कि एक 15 साल की बच्ची को डरा-धमकाकर माफी मँगवाई गई है। तनुश्री ने तंज कसते हुए यहाँ तक कह दिया कि अगर कंगना रनौत उस बच्ची के साथ बैठकर बात कर लें, तभी वह मानेंगी कि कंगना सचमुच एक सांसद हैं। इन दोनों वामपंथी चेहरों को यह बात अच्छी तरह याद रखनी चाहिए कि वे सच्चाई को छिपा नहीं सकतीं। उस नाबालिग बच्ची ने खुद दुनिया के सामने यह स्वीकार किया था कि उसे कुछ राजनीतिक तत्वों और उपद्रवियों द्वारा बहला-फुसलाकर और उकसाया गया था। उस मासूम बच्ची से गलत हरकतें करवाई गई थीं ताकि देश का माहौल खराब किया जा सके।
कंगना रनौत ने उसी गंदी राजनीति का पुरजोर विरोध किया था जिसके तहत इन मासूम बच्चियों का ब्रेनवॉश किया जाता है। कंगना ने उस साजिश के खिलाफ आवाज उठाई थी जिसमें बच्चों को ढाल बनाकर अराजकता फैलाई जाती है। लेकिन इन वामपंथी महिला पत्रकारों को यह बात बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होती है। इन्हें यह पचता ही नहीं है कि संसद में बैठी एक मजबूत और राष्ट्रवादी महिला सांसद खुलकर इनके पूरे प्रोपेगेंडा और एजेंडे की पोल खोल रही है। जब भी कोई महिला इनकी पोल खोलती है, तो ये अपनी बौखलाहट में व्यक्तिगत हमलों पर उतर आती हैं। यह इनकी दोहरी मानसिकता का सबसे बड़ा और जीता-जागता सबूत है।
वामपंथी इकोसिस्टम का एकमात्र काम
यह पूरा वीडियो इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि भारत में एक ऐसा इकोसिस्टम सक्रिय है जो देश की प्रगति को पचा नहीं पा रहा है। आरफा खानुम, श्याम मीरा सिंह, तनुश्री पांडे और अनमोल जैसे चेहरे पत्रकारिता की आड़ में देश के युवाओं में जहर घोलने का काम कर रहे हैं। इनका उद्देश्य केवल देश में अराजकता फैलाना और अपने वैचारिक आकाओं को खुश करना है। झारखंड पेपर लीक मामले में इनका मुँह बंद था और बंद हो चुके सीजेपी प्रदर्शन पर अभी भी अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं और पैसा कमा रहे हैं। इनके पास विषय केवल ‘विष’ (जहर) फैलाने का रह गया है और मोदी सरकार को कोसने का रह गया है। जब तक ये पूरे दिन में केंद्र सरकार की खामियाँ नहीं गिना देते, तब तक इनके अंदर की खुजली खत्म नहीं होती है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन के दौरान 26 दिनों की भूख हड़ताल करके राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरने वाले सोनम वांगचुक ने कहा है कि वे चाहते थे कि विपक्ष के नेता राहुल गाँधी उनकी भूख हड़ताल तुड़वाएँ। वांगचुक ने बताया कि उनकी पत्नी गीतांजलि अंगमो ने राहुल गाँधी से अनशन तुड़वाने को लेकर बातचीत की थी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस नेता ने कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी।
‘इंडिया टुडे’ से बात करते हुए सोनम वांगचुक ने कहा, “दरअसल, हम विपक्ष के नेता राहुल गाँधी के माध्यम से अपना अनशन तुड़वाने पर विचार कर रहे थे और गीतांजलि इस पर काम कर रही थीं। वह राहुल गाँधी के खिलाफ नहीं थीं। वह इस पर कड़ी मेहनत कर रही थीं कि क्या राहुल गाँधी मेरा अनशन तुड़वा सकते हैं। हालाँकि, उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली।”
BIG REVEAL BY SONAM WANGCHUK
Sonam Wangchuk says he wanted Rahul Gandhi to personally end his hunger strike. His wife, Gitanjali, also tried to make it happen, but they received no positive response.
लद्दाख के एक्टिविस्ट वांगचुक ने कहा कि राहुल गाँधी को अपना अनशन खत्म करने के लिए मनाने की कोशिशों को लेकर उनकी बेरुखी का यह किस्सा बताना जरूरी है। और ऐसा इसलिए क्योंकि बाद में कॉन्ग्रेस नेतृत्व की आलोचना करने पर गीतांजलि आंगमो को कॉन्ग्रेस समर्थकों ने जमकर ट्रोल किया था।
सोनम वांगचुक ने 24 जुलाई 2026 को मेदांता अस्पताल में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की उपस्थिति में अपनी भूख हड़ताल समाप्त की थी।
क्या वांगचुक चाहते थे कि उनके आंदोलन का सियासी फायदा राहुल गाँधी को मिले?
सोनम वांगचुक लगातार कहते रहे हैं कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है और सरकार से जवाबदेही तय करने की माँग को लेकर किया गया उनका अनशन केवल जिम्मेदारी निभाने का एक प्रयास था। हालाँकि, वांगचुक इस बात को लेकर भी चिंतित थे और काफी दिलचस्पी ले रहे थे कि उनका अनशन किस तरह खत्म हो और इसे राजनीतिक तौर पर किस नजरिए से देखा जाए।
वांगचुक ने कहा था कि वह चाहते थे कि उनके अनशन की समाप्ति को सत्ता पक्ष, विपक्ष और छात्र नेताओं से जुड़े लोगों की संयुक्त कोशिश के तौर पर पेश किया जाए।
यह साफ है कि सोनम वांगचुक की उठाई गई माँगों को राहुल गाँधी पूरा नहीं कर सकते थे। तर्क यही कहता है कि वांगचुक का अनशन तभी खत्म हो सकता था जब वह खुद इसे खत्म करने का फैसला लेते, उन्हें जबरन खाना-पानी दिया जाता या सरकार उनकी माँगों पर विचार करने के लिए तैयार होती। न तो कोई छात्र नेता और न ही लोकसभा में विपक्ष के नेता ऐसा कर सकते थे।
सोनम वांगचुक अब जिस ‘संयुक्त प्रयास’ के तौर पर अनशन खत्म होने की बात कर रहे हैं, उससे आगे एक सवाल उठता है कि क्या सोनम वांगचुक CJP-वांगचुक आंदोलन का सियासी फायदा राहुल गाँधी को सौंपना चाहते थे और खुद के लिए एक ऐसी सम्मानजनक विदाई का रास्ता बनाना चाहते थे, जिसमें वह नायक की तरह बाहर निकलते?
सोनम वांगचुक ने एक लद्दाखी परंपरा का भी जिक्र किया था। इसके मुताबिक, जो व्यक्ति किसी को पानी, जूस या सूप देता है या औपचारिक तौर पर अनशन तुड़वाता है, वह उस फैसले की स्वीकृति, नैतिक समर्थन या उसके नतीजे की साझा जिम्मेदारी का संकेत देता है।
सोनम वांगचुक के साथ क्रेडिट बाँटने के बजाय आंदोलन की राजनीतिक बढ़त हथियाने की कोशिश में रहे राहुल
सोनम वांगचुक शायद अपने अनशन को खत्म करने के लिए ऐसा रास्ता चाहते थे, जिसमें सरकार, विपक्ष और दूसरे पक्षों की साझा सहमति दिखे। लेकिन राहुल गाँधी जैसे नेता के लिए यह तस्वीर बहुत फायदेमंद नहीं होती क्योंकि उनकी राजनीतिक पहचान मुख्य विपक्षी चेहरे के तौर पर बनी हुई है।
शायद यही वजह है कि राहुल गाँधी ने गीतांजलि आंगमो की उस कोशिश पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी जिसमें वह उनसे सोनम वांगचुक का अनशन खत्म करवाने की अपील कर रही थीं। इसके बजाय राहुल गाँधी ने सही समय देखकर अलग से एक और आंदोलन का रास्ता चुना।
सोनम वांगचुक ने 28 जून 2026 को NEET पेपर लीक के मुद्दे पर भूख हड़ताल शुरू की थी। कई दिन बीत गए लेकिन ऑनलाइन बयानबाजी के अलावा उन्हें किसी बड़े राजनीतिक दल का खास समर्थन नहीं मिला। संसद का मानसून सत्र करीब आने के बाद ही विपक्ष के प्रमुख नेताओं का जंतर-मंतर पहुँचना शुरु हुआ। इनमें सपा की डिंपल यादव, आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद और AAP के अरविंद केजरीवाल शामिल थे।
राहुल गाँधी का चुनावी प्रदर्शन लगातार निराशाजनक रहा है। इसके बावजूद वह और उनकी पार्टी ऐसे मुद्दों की तलाश करते रहते हैं जिनके सहारे कोई चमत्कार हो और राहुल गाँधी केवल सोशल मीडिया के अभियानों में नहीं बल्कि वास्तव में एक ‘जननायक’ के रूप में स्थापित हो सकें।
हालाँकि, राहुल गाँधी पूरे CJP आंदोलन से दूरी बनाए रहे और उनका समर्थन केवल दिखावे तक सीमित रहा। चल रहे CJP आंदोलन में शामिल होने या उसे खुलकर मजबूत करने के बजाय राहुल गाँधी ने जानबूझकर अलग रास्ता अपनाया। कॉन्ग्रेस ने ‘छात्रों की गूंज’ नाम से छात्र संपर्क अभियान शुरू किया और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की वही माँग अपने मंच से उठाई, जो CJP भी कर रहा था।
CJP के आंदोलन में पूरी तरह शामिल होने के बजाय उससे दूरी बनाए रखने के फैसले को लेकर कॉन्ग्रेस को बीजेपी विरोधी खेमे से भी आलोचना झेलनी पड़ी। 20 जुलाई को जब CJP ने संसद की ओर अपना घोषित ‘चलो संसद’ मार्च शुरू किया, उसी दिन राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस नेताओं ने CJP की माँगों को लेकर अलग से प्रदर्शन किया।
राहुल गाँधी के इस प्रदर्शन का समय भी काफी दिलचस्प था। कॉन्ग्रेस समर्थकों का कहना है कि गाँधी ने संसद का सत्र शुरू होने का इंतजार किया ताकि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को और तेज किया जा सके। लेकिन कॉन्ग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर प्रदर्शन किया।
अगर कॉन्ग्रेस को सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी के घर के बाहर प्रदर्शन करना था, तो वह यह बहुत पहले भी कर सकती थी। लेकिन ऐसा लगता है कि कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी ने पहले CJP के आंदोलन के जोर पकड़ने, मोदी सरकार के खिलाफ उसे व्यापक जनसमर्थन मिलने और फिर 20 जुलाई को आंदोलन के चरम पर पहुँचने का इंतजार किया। इसके बाद राजनीतिक बढ़त अपने हाथ में लेने की कोशिश की गई।
प्रदर्शन की जगह का चुनाव भी सोच-समझकर किया गया था। कॉन्ग्रेस CJP के आंदोलन में सहयोगी की भूमिका नहीं निभाना चाहती थी जिसमें समाजवादी पार्टी और बीजेपी विरोधी दूसरे दलों के कार्यकर्ता भी साफ तौर पर शामिल थे।
सोनम वांगचुक के इस खुलासे के बाद कि वह चाहते थे कि राहुल गाँधी उनका अनशन तुड़वाएँ और कॉन्ग्रेस नेता ने कथित तौर पर ऐसा करने से इनकार कर दिया, कई लोगों ने कहा कि गाँधी ने एक बड़ा मौका गँवा दिया। उनके पास CJP-वांगचुक के नेतृत्व वाले उस आंदोलन का स्वाभाविक राजनीतिक चेहरा बनने का मौका था, जिसे युवाओं के बीच व्यापक ध्यान मिल रहा था।
हालाँकि, राहुल गाँधी इस तरह काम नहीं करते। अपने राजनीतिक करियर में राहुल गाँधी कई बार खुद को नए तरीके से पेश करने की कोशिश कर चुके हैं लेकिन इनमें से किसी भी कोशिश में उन्होंने बाहरी ताकतों के सहारे आगे बढ़ना या किसी और के मोदी सरकार विरोधी आंदोलन में सहयोगी की भूमिका निभाना पसंद नहीं किया।
CJP के आंदोलन की राजनीतिक बढ़त अपने हाथ में लेने की राहुल गाँधी की पूरी कोशिश के पीछे मकसद श्रेय बाँटने से बचना था। ऐसा इसलिए क्योंकि आंदोलन इतना बड़ा हो चुका था कि केंद्र सरकार को रियायतें देनी पड़ सकती थीं, भले ही वह CJP के हिंसक सड़क आंदोलन के दबाव के आगे पूरी तरह न झुके।
कॉन्ग्रेस लंबे समय से भारत में नेपाल जैसी हिंसक सत्ता परिवर्तन की स्थिति की इच्छा रखती रही है। शायद यही वजह थी कि जब उसे लगा कि ऐसा सपना सच होने की संभावना बन सकती है, तब वह इस पूरे घटनाक्रम से पूरी तरह बाहर नहीं रहना चाहती थी।
इसे छोटा राजनीतिक अहंकार कहें या राजनीतिक स्वार्थ, कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी अक्सर किसी सरकार विरोधी आंदोलन के बड़ा होने का इंतजार करना और फिर उसकी राजनीतिक बढ़त अपने हाथ में लेना पसंद करते हैं। कॉन्ग्रेस के लिए CJP जैसे संगठन जिसे आम आदमी पार्टी की ‘B-टीम’ बताया गया है द्वारा खड़े किए गए आंदोलन में सहयोगी की भूमिका निभाने का मतलब यह स्वीकार करना होता कि वह युवाओं से जुड़े इस मुद्दे को खुद प्रभावी तरीके से नहीं उठा पाई और अब केवल राजनीतिक फायदा लेने के लिए उसका समर्थन कर रही है।
कॉन्ग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है और लगातार तीन लोकसभा चुनावों में झटके लगने के बावजूद खुद को BJP के मुख्य विपक्ष के तौर पर पेश करती रही है। ऐसे में उसके लिए यह ‘मुख्य विपक्ष’ का दर्जा खोना बड़ा नुकसान होगा क्योंकि इसके बाद पार्टी के पूरी तरह राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक होने का खतरा बढ़ जाएगा।
भारत अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के साथ-साथ उन हिस्सों में सीमा तय करने का काम भी आगे बढ़ा रहा है, जो कई दशकों से लंबित हैं। इसी कड़ी में केंद्र सरकार मणिपुर से लगी भारत-म्यांमार सीमा के एक छोटे से हिस्से को लेकर जमीन की अदला-बदली के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। इसमें करीब 1.4 वर्ग मील यानी लगभग 3.6 वर्ग किलोमीटर जमीन शामिल है।
विदेश मंत्रालय ने भी माना है कि भारत-म्यांमार सीमा के कुछ हिस्सों को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही है। ऐसे में जमीन की संभावित अदला-बदली को सीमा से जुड़े पुराने विवादों और अस्पष्टता को खत्म करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
आखिर क्या है भारत-म्यांमार सीमा पर जमीन की अदला-बदली का प्रस्ताव?
भारत और म्यांमार के बीच लगभग 1643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है। दोनों देशों के बीच आज भी करीब 171 किलोमीटर क्षेत्र ऐसा है जिसका फाइनल सीमांकन नहीं हो सका है।
यही वजह है कि कुछ स्थानों पर बाउंड्री पिलर्स और वास्तविक सीमा रेखा को लेकर तकनीकी विवाद बने हुए हैं। The Diplomat की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत सरकार मणिपुर के चंदेल जिले में सीमा स्तंभ संख्या 65 से 68 के बीच स्थित लगभग 1.4 वर्ग मील क्षेत्र के आदान-प्रदान के प्रस्ताव पर विचार कर रही है।
सरकार का यह भी कहना है कि भारत और म्यांमार के बीच कोई व्यापक सीमा विवाद नहीं है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय सीमा 1967 के द्विपक्षीय समझौते पर आधारित है। केवल कुछ सीमा स्तंभ और सीमांकन वाले हिस्से ऐसे हैं जिनका अंतिम निर्धारण अभी होना बाकी है। इन्हें द्विपक्षीय तंत्र के माध्यम से सुलझाया जा रहा है।
सीमा निर्धारण से जुड़े जिन क्षेत्रों को सबसे अधिक संवेदनशील माना जाता है उनमें मोलचाम सेक्टर (सीमा स्तंभ 64-68), मोरेह सेक्टर (75-79) और चोरो खुनौ सेक्टर (88-95) शामिल हैं। प्रस्तावित भूमि अदला-बदली भी इन्हीं संवेदनशील इलाकों में से एक मोलचाम-चंदेल क्षेत्र से जुड़ी बताई जा रही है।
भारत इस प्रस्ताव पर विचार क्यों कर रहा है?
भारत-म्यांमार सीमा देश की सबसे संवेदनशील सीमाओं में से एक है। इसका बड़ा हिस्सा घने जंगलों, पहाड़ों और दूर-दराज के इलाकों से गुजरता है। सीमा के दोनों तरफ एक ही जनजातीय समुदाय के लोग रहते हैं और इसलिए लंबे समय तक यहाँ लोगों की आवाजाही आम बात रही।
लेकिन 2021 में म्यांमार में सैन्य तख्तापलट और उसके बाद शुरू हुए गृहयुद्ध ने भारत के लिए सुरक्षा की नई चुनौतियाँ खड़ी कर दीं। बड़ी संख्या में घुसपैठिए भारत आए। इसके साथ ही अवैध घुसपैठ, हथियारों और ड्रग्स की तस्करी और उग्रवादी संगठनों की आवाजाही को लेकर भी चिंता बढ़ी हैं।
इसी को देखते हुए केंद्र सरकार ने 1,643 किलोमीटर लंबी भारत-म्यांमार सीमा पर फेंसिंग करने का फैसला किया। फरवरी 2024 में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि सीमा पर बाड़ के साथ पेट्रोलिंग ट्रैक भी बनाया जाएगा।
सरकार ने फ्री मूवमेंट रेजीम (FMR) भी खत्म कर दिया। इसके तहत सीमा के दोनों तरफ रहने वाले जनजातीय लोग बिना वीजा 16 किलोमीटर तक आ-जा सकते थे।
हालाँकि, सीमा पर फेंसिंग का काम आसान नहीं रहा। कई जगह बाड़ को नुकसान पहुँचाने, सामग्री चोरी होने और दूसरी बाधाओं की घटनाएँ सामने आई हैं। ऐसे में सरकार सीमा के बचे हुए हिस्सों का स्थायी समाधान चाहती है ताकि फेंसिंग और निगरानी का काम पूरा किया जा सके।
मणिपुर में क्यों शुरू हुआ विरोध और सरकार का आधिकारिक रुख क्या है?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत-म्यांमार सीमा पर संभावित भूमि अदला-बदली की खबर सामने आने के बाद मणिपुर में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर विरोध भी देखने को मिला।
राज्य की प्रमुख सामाजिक संस्था कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी (COCOMI) ने इस प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि मणिपुर की भौगोलिक अखंडता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
COCOMI का तर्क है कि मणिपुर की वर्तमान सीमाएँ वर्षों के ऐतिहासिक और प्रशासनिक विकास का परिणाम हैं। संगठन ने दावा किया कि राज्य पहले भी अपने ऐतिहासिक भूभाग का कुछ हिस्सा खो चुका है और अब किसी भी नए सीमा परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया जाएगा। संस्था ने केंद्र सरकार से अपील की कि राज्य की जनता की सहमति के बिना ऐसा कोई निर्णय न लिया जाए।
हालाँकि, विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत और म्यांमार के बीच कोई व्यापक सीमा विवाद नहीं है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, सीमा के कुछ हिस्सों का सीमांकन अभी बाकी है और उन्हीं क्षेत्रों को लेकर बातचीत चल रही है। सरकार का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य वर्षों से लंबित सीमा निर्धारण को पूरा करना है ताकि भविष्य में सीमा प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को और प्रभावी बनाया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच पेंडिंग डिमार्केशन का समाधान हो जाता है तो भारत के लिए पूरे सीमा क्षेत्र में फेंसिंग, निगरानी और गश्त का काम काफी आसान हो जाएगा।
इससे अवैध घुसपैठ, हथियारों की तस्करी, मादक पदार्थों के कारोबार और सीमा पार सक्रिय उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों पर भी अधिक प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा। यही कारण है कि केंद्र सरकार सीमा सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक दृष्टिकोण से देख रही है।
2015 में भारत और बांग्लादेश के बीच भी हुआ था भूमि सीमा समझौता
यदि भविष्य में भारत और म्यांमार के बीच किसी प्रकार का भूमि सीमा समझौता होता है, तो यह भारत के लिए कोई नया अनुभव नहीं होगा। इससे पहले वर्ष 2015 में भारत और बांग्लादेश ने दशकों पुराने सीमा विवाद को समाप्त करते हुए ऐतिहासिक Land Boundary Agreement (LBA) लागू किया था।
इस समझौते के तहत भारत ने बांग्लादेश में स्थित अपने 111 एन्क्लेव, जबकि बांग्लादेश ने भारत के भीतर मौजूद 51 एन्क्लेव भारत को सौंपे। कुल 162 एन्क्लेव के आदान-प्रदान के साथ दोनों देशों ने चार दशक से अधिक समय से चले आ रहे सीमा विवाद का अंत किया।
क्षेत्रफल के लिहाज से भारत के लगभग 17160 एकड़ क्षेत्र वाले 111 एन्क्लेव बांग्लादेश में शामिल हुए, जबकि बांग्लादेश के करीब 7110 एकड़ क्षेत्र वाले 51 एन्क्लेव भारत का हिस्सा बने।
इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ उन हजारों लोगों को मिला जो सालों तक एन्क्लेव में रहते हुए भी बुनियादी सरकारी सुविधाओं से वंचित थे। समझौते के बाद लोगों को भारत या बांग्लादेश की नागरिकता चुनने का अधिकार दिया गया।
उस समय उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश में स्थित भारतीय एन्क्लेव में लगभग 37 हजार लोग जबकि भारत में स्थित बांग्लादेशी एन्क्लेव में करीब 14 हजार लोग रह रहे थे। प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए भारत सरकार ने 3048 करोड़ रुपए का विशेष पैकेज भी स्वीकृत किया था।
हालाँकि भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौते और भारत-म्यांमार से जुड़ी मौजूदा चर्चाओं में एक महत्वपूर्ण अंतर भी है। बांग्लादेश के साथ समझौता वर्षों से अस्तित्व में रहे एन्क्लेव और नागरिकों की प्रशासनिक समस्याओं के समाधान के लिए किया गया था जबकि म्यांमार से जुड़ी मौजूदा चर्चा का मुख्य उद्देश्य सीमा के लंबित हिस्सों का सीमांकन, प्रभावी फेंसिंग और राष्ट्रीय सुरक्षा को और मजबूत करना बताया जा रहा है।
चीन में दुनिया का सबसे पुराना एम्बर मिला है जो अनुमान से 385 मिलियन साल पुराना है। इससे पहले 320 साल पुराना जीवाश्म कैप्सूल सबसे पुराना माना जाता था। नया कैप्सूल 65 मिलियन साल यानी 6.5 करोड़ वर्ष से ज्यादा पुराना है। एम्बर को अक्सर प्रकृति का ‘टाइम कैप्सूल’ कहा जाता है। दरअसल इसमें करोड़ों साल पहले के पेड़-पौधों, कीड़ों, परागकणों, फंगस, बैक्टीरिया और कभी-कभी छोटे जीवों के अवशेष लगभग उसी रूप में सुरक्षित रह जाते हैं। वैज्ञानिक इनका अध्ययन करके यह समझते हैं कि करोड़ों साल पहले पृथ्वी का वातावरण कैसा था, कौन कौन से जीव-जन्तु थे, कैसे थे। जंगल-जमीन और जलवायु कैसे थे।
क्या होता है एम्बर
दरअसल एम्बर वास्तव में जीवाश्म युक्त पेड़ की रेजिन (Resin) है। यह एक तरह से पेड़ का सुरक्षा कवच है यानी जब पेड़ की छाल निकल जाती है या उस पर कीड़े हमला करते हैं, तब पेड़ चिपचिपा रेजिन निकालता है। इससे फूलों के परागकण से लेकर छोटे छोटे कीड़े मकोड़े तक फँस जाते हैं। जब यह जमीन पर गिरता है, तो साल दर साल उस पर आवरण जमने लगता है।
लाखों सालों तक जमीन के नीचे दबने और रासायनिक बदलाव के बाद यह कठोर होकर एम्बर बन जाता है। दरअसल रेजिन पेड़ों के रस से अलग होता है क्योंकि रस पेड़ को पोषण देता है जबकि रेजिन पेड़ की रक्षा करता है। यह पुराने पेड़ों में चिपचिपा पदार्थ के रूप में पेड़ को चोट लगने पर बाहर निकलता है। चिपचिपा होने की वजह से ही इसमें परागकण, कीड़े, बीज आदि फँसते हैं। चूकिं इसके अंदर ऑक्सीजन नहीं पहुँचता, हवा-पानी नहीं लगता और किसी तरह का परिवर्तन नहीं होता है, तो वह जीवों के अवशेष के रूप में पूरी तरह सुरक्षित रहता है।
एम्बर को ‘टाइम कैप्सूल’ क्यों कहते हैं?
लाखों साल बाद भी कीड़ों-मकोड़ों, पेड़-पौधों के अवशेष अपने वास्तविक रूप में जब वैज्ञानिकों को मिलते हैं तो उन पर रिसर्च में कई बातों का पता चलता है। चूकि ये मानव निर्मित न होकर पूरी तरह प्राकृतिक तौर पर बनते हैं। मान लीजिए 5 करोड़ साल पहले कोई मच्छर किसी पेड़ के रेजिन में फँस गया।
रेजिन इतना चिपचिपा होता है कि मच्छर बाहर नहीं निकल पाया। वह वही जम कर मर गया। धीरे धीरे रेजिन कड़ा होकर जमीन पर गिर गया। चूकि वहाँ ऑक्सीजन नहीं पहुँच पा रहा है। फंग्स या बैक्टीरिया भी उसका नुकसान नहीं कर पा रहा। लाखों साल बाद यह मच्छर का अवशेष बता देंगा कि उसकी प्रजाति क्या थी, किस पेड़ का रेजिन है। उस वक्त जलवायु कैसी थी। उसके साथ अगर पराणकण भी मौजूद है तो ये भी पता चल जाएगा कि किस तरह के पौधे उस वक्त होते थे और सबसे अहम की ये कितना साल पुराना है। इसलिए एम्बर को प्राकृतिक ‘टाइम कैप्सूल’ कहा जाता है।
वैज्ञानिकों को इसी तरह के टाइम कैप्सूल से डायनासोर का भी पता चला। वैज्ञानिकों को एम्बर में डायनासोर के पंख, छिपकली की पूंछ, छोटे मेंढक, मकड़ियाँ, चींटियाँ, मधुमक्खियाँ, फूलों के बीज और परागकण, फूलों के पंखुड़ी, फलों के बीज आदि मिलते रहे हैं। इससे लाखों साल पुरानी पृथ्वी की पारिस्थितिकी तंत्र को समझने में बड़ी मदद मिली है।
चीन में मिला 385 मिलियन साल पुराना एम्बर
अब तक पेड़ों के रेजिन के बने कैप्सूल से एम्बर मिले थे, लेकिन साइंस एडवासेंज में प्रकाशित नए रिसर्च में पता चला है कि चीन में 385 मिलियन साल पुराने चट्टानों के अंदर से जीवाश्म युक्त रेजिन मिले हैं। ‘द अर्लियेस्ट एम्बर फ्रॉम द मिडिल देवोनियन ऑप चीन’ शीर्षक से छपे इस रिसर्च में बताया गया है कि पृथ्वी के शुरुआत में कुछ पौधों ने रेजिन उत्पादन करने वाला सिस्टम विकसित कर लिया था जिससे पौधों को लेकर नया दृष्टिकोण मिलता है कि पृथ्वी पर पौधों का विकास किस तरह हुआ है। यह एम्बर अब तक खोजा गया सबसे पुराना एम्बर है। वैज्ञानिकों को अब लगता है कि पृथ्वी पर रेज़िन बनाने वाले पेड़ पहले सोचे गए समय से भी बहुत पहले मौजूद थे। यह बदलाव पृथ्वी के जंगलों के विकास का इतिहास बदल सकता है।
हाल ही में चीन के शिनजियांग में मध्य देवोनियन काल के सैकड़ों एम्बर कोयले के खदानों में मिले। अधिकांश का आकार 0.1-0.5 मिलीमीटर के बीच था, लेकिन इसका सबसे बड़ा एम्बर 1.5 मिलीमीटर का था, हालाँकि ये अब तक मिले एम्बर की तुलना में काफी छोटा था।
हाल के कुछ शोधों में वैज्ञानिकों ने पाया कि रेजिन बनाने वाले जंगलों (Amber forests) का इतिहास पहले की तुलना में कहीं अधिक पुराना है। पहले माना जाता था कि बड़े पैमाने पर एम्बर बनने की शुरुआत लगभग 320–300 मिलियन वर्ष पहले (Late Carboniferous) हुई। नई खोजों से पता चलता है कि रेजिन उत्पादन और एम्बर बनने की शुरुआत का समय पहले की सोच से लगभग 65 मिलियन वर्ष पहले होता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, देवोनियन चट्टानों से पहले जो रेजिन मिले थे, उस सेंपल में यह पुष्टि नहीं हो पाई थी ये वास्तविक एम्बर थे। लेकिन अब चट्टानों में मिले एम्बर से पता चला है कि ये वास्तविक एम्बर हैं यानी जितना सोचा था उससे करीब 65 मिलियन साल पुराना। इसलिए कहा जा रहा है कि एम्बर का 65 मिलियन साल टाइमलाइन शिफ्ट हो गया है।
लेट कार्बोनिफेरस पीरियड क्या है?
पृथ्वी पर लगभग 323 से 299 मिलियन साल पहले (Late Carboniferous Period) इतिहास का वह दौर था जब दलदली जंगल हुआ करते थे। पेड़ 30–40 मीटर तक ऊँचे होते थे। ऑक्सीजन की प्रचूरता ज्यादा थी। आज से करीब 30-35 फीसदी ज्यादा ऑक्सीजन धरती पर मौजूद थी। इसलिए कीड़े मकोड़े भी बड़े बड़े मिलते थे। घने और ऊँचे जंगलों के जमीन में दबने और हजारों सालों बाद कोयले में परिवर्तित होने की वजह से इस वक्त को कार्बोनिफेरस पीरियड कहा गया। इस वक्त दलदली जंगलों की वजह से सरीसृप प्राणी ज्यादा मिलते थे।
डेवोनियन पीरियड क्या है?
आज से लगभग 419 से 359 मिलियन वर्ष पहले (Devonian Period) पृथ्वी पर पेड़ विकसित हुए और घने जंगल बने। सामान्य बीज वाले पौधे आए और कुछ जीव पहली बार जमीन पर रहने लगे। यानी समुद्र से निकलकर दलदली इलाकों में रहने वाले एम्फीबियन यानी उभयचर विकसित हुए। इस वक्त समुद्रों में मछलियों की बहुत अधिक विविधता थी। इसलिए इसे अक्सर ‘Age of Fishes’ कहा जाता है। ये वह वक्त था जब बड़े बड़े पेड़ों की अधिकता से घने जंगलों का बड़े पैमाने पर विकास हुआ।
उस वक्त बार बार लगने वाले जंगलों की आग भी अहम थी। ऐसे में पारिस्थितकी तंत्र पर दबाव बना और इसमे बदलाव आए। माना जाता है कि इस वक्त ही पौधों में रेजिन जैसे पदार्थ का विकास हुआ जो उन्हें लगने वाले घावों से बचा सकें। आग में पौधों को क्षतिग्रस्त होने के बाद बनने वाले घावों को भरने में मदद मिली क्योंकि इस पर कीटों का वार होता था और वह पेड़ सड़ जाते थे। रेजिन इन सब से पेड़ों को बचाता था।
रेजिन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
रेज़िन केवल पेड़ के लिए ही सुरक्षा कवच नहीं है, बल्कि यह वैज्ञानिकों के लिए भी अनमोल धरोहर की तरह है। पेड़ की सुरक्षा करना, चोट लगने पर घाव भरना, कीड़ों को चोट वाले स्थान से दूर रखना, वायरस-बेक्टिरिया से बचाना इसका काम तो है ही। ये जीवाश्म संरक्षण में अहम योगदान देता है। अगर रेजिन नहीं हो, तो बड़े बड़े पेड़ सड़ जाएँगे। उनमें जरा सी खरोंच आने पर उनका बचना मुश्किल हो जाता।
वैज्ञानिकों को एम्बर नहीं मिल पाता क्योंकि कीड़े सड़ जाते, पराणकण और फूलों के हिस्से सड़ जाते, छोटे जीव के अवशेष नहीं बचते। रेजिन के कारण ही लाखों-करोड़ों साल पुराने छोटे जीव जन्तुओं और पौधों के अंश सुरक्षित रहते हैं। इससे पृथ्वी पर हुए विकासवाद (Evolution) को समझना आसान हो जाता है। एम्बर में सुरक्षित जीव बताते हैं कि कौन-सी प्रजातियाँ कब विकसित हुईं, उनका रूप समय के साथ कैसे बदला, किन पौधों और कीड़ों के बीच सह-विकास (co-evolution) हुआ।
एम्बर केवल एक सुंदर पीला अनमोल रत्न नहीं है, बल्कि पृथ्वी के करोड़ों वर्षों के इतिहास का प्राकृतिक अभिलेख है। पेड़ इसे अपनी सुरक्षा के लिए निकालते हैं और यह पारिस्थिति तंत्र को संरक्षित कर लेता है क्योंकि रेजिन समय के साथ जीवाश्म युक्त एम्बर बनता है और अपने भीतर उस वक्त के कीट, पौधे, परागकण, सूक्ष्मजीव और पर्यावरण की जानकारी सुरक्षित रह जाती है। इसी वजह से इसे ‘प्राकृतिक टाइम कैप्सूल’ कहा जाता है।
‘आपकी फ्लाइट का इंजन हवा में ही बंद हो सकता है।’… इस तरह की बातें सुनना कितना भयावह लग लग सकता है? लेकिन सोचिए भारत की जनता को यह डर राजनीति के नाम पर बेचा जा रहा है और ऐसा कर रहे हैं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (AAP) के मुखिया अरविंद केजरीवाल। इतना ही नहीं, वो लोगों से यहाँ तक अपील कर रहे हैं कि पेट्रोल और डीजल की नई गाड़ियाँ ना खरीदें। ऐसा होने पर ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का क्या होगा, इसका आप अनुमान लगा लीजिए।
केजरीवाल ने गुरुवार (6 अगस्त 2026) सुबह X पर एक पोस्ट में लिखा, “सूत्रों के मुताबिक, मोदी सरकार एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी ATF में एथेनॉल मिलाने की योजना बना रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे उड़ानों की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।”
Sources indicate that Modi govt plans to mix ethanol in Aviation Turbine Fuel (ATF). Experts say that this cud seriously compromise the safety of flights
बस कुछ ही देर में केजरीवाल ने अपने इस प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाते हुए X पर एक आर्टिकल शेयर करते हुए लिखा, “यह आर्टिकल पढ़ें। आपकी फ्लाइट का इंजन हवा में ही बंद हो सकता है। क्या आप मिलावटी एविएशन फ्यूल से चलने वाले एयरक्राफ्ट में उड़ने का रिस्क लेंगे? एक पढ़ी-लिखी और काबिल सरकार का समय आ गया है भारत ने एविएशन फ्यूल में एथेनॉल मिलाने की इजाजत दी।”
Read this article. The engine of ur flight just might stop in the air. Will u risk flying in an aircraft running on adulterated aviation fuel?
हालाँकि, अगर अरविंद केजरीवाल ने शेयर करने से पहले अगर 23 अप्रैल 2026 का यह आर्टिकल खुद पढ़ लिया होता तो वह यह सब लिखने का जोखिम ना उठाते। खैर, हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्या सचमुच विमान के टैंक में एथेनॉल मिलाकर यात्रियों की जान जोखिम में डालने की तैयारी हो रही है? जवाब जानने के लिए हमें राजनीति के शोर से थोड़ा बाहर निकलकर एविएशन फ्यूल को समझना होगा।
क्या है सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल?
भारत में जिस बदलाव की बात हो रही है, उसका संबंध सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (Sustainable Aviation Fuel – SAF) से है। SAF कोई ऐसा ‘मिलावटी तेल’ नहीं है जिसे बिना जाँचे विमान में डाल दिया जाए। यह aviation-grade fuel है, जिसे निर्धारित तकनीकी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप इस्तेमाल किया जाता है और इसे ATF के साथ ब्लेंडिंग के लिए विकसित किया गया है।
अमेरिकी ऊर्जा विभाग की एक रिपोर्ट बताती है कि SAF से हवाई जहाजों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने में मदद मिलती है। SAF को सामान्य विमान ईंधन के साथ अलग-अलग मात्रा में मिलाया जा सकता है। इसे आम तौर पर 10% से 50% तक मिलाने की सीमा होती है। यह सीमा इस बात पर निर्भर करती है कि SAF किस चीज से बनाया गया है और इसे बनाने का तरीका क्या है। अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के अनुसार, अब तक 46 अलग-अलग हवाई अड्डों से 3 लाख 60 हजार से ज्यादा व्यावसायिक उड़ानों में SAF का इस्तेमाल किया जा चुका है। इनमें ज्यादातर हवाई अड्डे अमेरिका और यूरोप में हैं।
केजरीवाल तो केवल एथेनॉल का रोना रो रहे हैं लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि SAF को पेट्रोलियम के बजाय दूसरे नवीकरणीय स्रोतों से बनाया जा सकता है। इसके लिए नगरों से निकलने वाला ठोस कचरा, जिसमें खाने और बगीचे का कचरा शामिल है, लकड़ी से मिलने वाला जैविक पदार्थ, पशु वसा, चिकनाई, तेल और ऐसे ही दूसरे स्रोतों का इस्तेमाल किया जा सकता है। SAF का उत्पादन अभी शुरुआती दौर में है।
कैसे होगा एथेनॉल का इस्तेमाल?
कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या एथेनॉल को सीधे हवाई जहाज के ईंधन टैंक में मिलाया जा सकता है? इसका सीधा जवाब है- नहीं। एथेनॉल में पानी को सोखने की प्रवृत्ति होती है, जिससे अत्यधिक ऊँचाई और कम तापमान पर विमान के ईंधन सिस्टम में ‘फेज सेपरेशन’ (ईंधन और पानी का अलग होना) या माइक्रोबियल ग्रोथ का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, कच्चे एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पारंपरिक जेट ईंधन से लगभग 34% तक कम होती है।
इसीलिए, एथेनॉल को अल्कोहल-टू-जेट (Alcohol-to-Jet या AtJ) तकनीक के माध्यम से चरणबद्ध तरीके से परिष्कृत (Refine) किया जाता है :-
डीहाइड्रेशन: एथेनॉल से पानी के कणों को पूरी तरह निकाल दिया जाता है। ओलिगोमेराइजेशन: इसके कार्बन मॉलिक्यूल्स को जोड़कर लंबी हाइड्रोकार्बन चेन बनाई जाती है। हाइड्रोजनेशन: अंत में हाइड्रोजन जोड़कर एक ऐसा ‘सिंथेटिक केरोसिन’ तैयार होता है जो रासायनिक संरचना में हुबहू पारंपरिक एटीएफ जैसा होता है।
इस प्रक्रिया के बाद तैयार ईंधन को मौजूदा विमान इंजनों या हवाई अड्डे के बुनियादी ढांचे में बिना किसी बदलाव के 50% तक सुरक्षित रूप से मिश्रित (Blend) किया जा सकता है।
भारत ने SAF पर क्या कहा था?
दुनिया भर में हो रहे बदलावों को देखते हुए ही भारत ने भी अप्रैल 2026 में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए विमान ईंधन में एथेनॉल और सिंथेटिक हाइड्रोकार्बन के मिश्रण को कानूनी मंजूरी दे दी थी। यह जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों के बीच विमानन उद्योग में हो रहे वैश्विक बदलाव का ही एक हिस्सा था।
PIB द्वारा 23 अप्रैल 2026 को बताया गया था कि एविएशन टरबाइन फ्यूल (विपणन का विनियमन) आदेश 2001 में संशोधन कर SAF के साथ मिश्रित ATF को एटीएफ नियंत्रण आदेश के दायरे में लाया गया है।
केजरीवाल जो डर आज फैला रहें हैं उस पर तब ही PIB ने साफ कर दिया था कि SAF खास तौर से प्रसंस्कृत विमानन-ग्रेड हाइड्रोकार्बनों से बना होता है जो रासायनिक रूप से ATF के समान होते हैं और विमान इंजनों के साथ पूरी तरह अनुकूल होते हैं। SAF विमानन ईंधन की मूल स्वरूप, सुरक्षा या कार्य में कोई बदलाव नहीं करता है।
विमानन उपयोग के लिए SAF को शामिल करने से पहले, ICAO द्वारा मान्यता प्राप्त, ASTM इंटरनेशनल मानकों के अनुसार विमान इंजनों को कठोर परीक्षण प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके बाद SAF को विमानन में उपयोग के लिए स्वीकार किया जाता है।
ICAO CORSIA यानी अंतरराष्ट्रीय विमानन के लिए कार्बन उत्सर्जन की भरपाई और कमी की योजना लागू कर रहा है। CORSIA का अनिवार्य चरण 2027 से शुरू होगा। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को एक तय आधार स्तर से अधिक हुए उत्सर्जन की भरपाई करनी होगी। SAF के इस्तेमाल से इस भरपाई की जरूरत को कम किया जा सकता है।
इसी वैश्विक जरूरत को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में इस्तेमाल होने वाले ATF में SAF मिलाने के लिए शुरुआती लक्ष्य तय किए हैं। 2027 में 1%, 2028 में 2% और 2030 में 5% SAF मिलाने का लक्ष्य रखा गया है।
भारत में उड़ाई जा चुकी है SAF वाली फ्लाइट
यह कोई आसमानी ख्वाब नहीं है। भारत की पहली व्यावसायिक यात्री उड़ान देश में तैयार किए गए सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल यानी SAF के मिश्रण से 2023 में ही सफलतापूर्वक उड़ाई जा चुकी है। 19 मई 2023 की TOI की रिपोर्ट बताती है कि एयरएशिया इंडिया की फ्लाइट i5-767 ने पुणे से नई दिल्ली के लिए उड़ान भरी थी। इस विमान में देश में तैयार SAF और सामान्य विमान ईंधन का मिश्रण इस्तेमाल किया गया था।
दुनियाभर में उठाए जा रहे इस तरह के कदम
दुनिया के दूसरे देश भी इसी दिशा में कदम उठा रहे हैं। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन ने SAF मिलाने की अनिवार्य व्यवस्था शुरू की है। यूरोपीय संघ में 2025 में SAF मिलाने का लक्ष्य 2%, 2030 में 6% और 2050 तक 70% तक पहुँचने का लक्ष्य है। ब्रिटेन में यह लक्ष्य 2025 में 2%, 2030 में 10% और 2040 में 22% है।
अमेरिका SAF के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दे रहा है। जापान ने भी 2030 तक 10% SAF इस्तेमाल करने का लक्ष्य रखा है। सिंगापुर में 2026 से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए 1% SAF का इस्तेमाल जरूरी होगा और 2030 तक इस लक्ष्य को बढ़ाकर 3 से 5% किया जाएगा।
कुछ वर्ष आप पेट्रोल और डीजल की नई गाड़ियाँ ना खरीदें: केजरीवाल बेच रहे एक और डर
केजरीवाल ने केवल SAF को लेकर ही छूट नहीं बोला बल्कि लोगों ने नई गाड़ियाँ ना खरीदने की अपील कर कर दी। उन्होंने X पर एक पोस्ट में लिखा, “मोदी सरकार का क्या प्लान है? पता चल रहा है कि पेट्रोल में 50% से अधिक की मिलावट करेंगे। अभी बस माहौल शांत होने का इंतजार कर रहे हैं। पहले आपकी E0 और E10 गाड़ियों में जबरदस्ती E20 पेट्रोल डालकर कबाड़ा किया।”
उन्होंने आगे लिखा, “आज अगर आप E20 नई गाड़ी खरीदते हैं तो सरकार कुछ दिन बाद उसमे जबरदस्ती E50 पेट्रोल डालकर उसका कबाड़ा कर देगी। सरकार जल्द ही डीजल में भी मिलावट करने वाली है। इसलिए अभी कुछ वर्ष आप पेट्रोल और डीजल की नई गाड़ियाँ खरीदने से बचें।”
मोदी सरकार का क्या प्लान है? पता चल रहा है कि पेट्रोल में 50% से ज़्यादा की मिलावट करेंगे। अभी बस माहौल शांत होने का इंतज़ार कर रहे हैं। पहले आपकी E0 और E10 गाड़ियों में ज़बरदस्ती E20 पेट्रोल डालकर कबाड़ा किया। आज अगर आप E20 नई गाड़ी खरीदते हैं तो सरकार कुछ दिन बाद उसमे ज़बरदस्ती… https://t.co/UsYfMxVn4I
केजरीवाल के इस दावे पर बीजेपी की IT सेल के मुखिया अमित मालवीया ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने लिखा, “फेक न्यूज़ फैलाना और बेवजह डर पैदा करना अरविंद केजरीवाल की पुरानी आदत है। अब नया झूठ यह फैलाया जा रहा है कि सरकार चुपके से पेट्रोल में 50% से अधिक एथेनॉल मिला देगी और लोगों की गाड़ियाँ कबाड़ हो जाएँगी।”
BJP नेता ने आगे लिखा, “भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि E20 से आगे पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने का अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है। भविष्य में यदि कभी ऐसा प्रस्ताव आता भी है, तो वह व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन, तकनीकी परीक्षण और वाहन निर्माताओं, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों तथा अन्य हितधारकों से परामर्श के बाद ही होगा।”
फेक न्यूज़ फैलाना और बेवजह डर पैदा करना अरविंद केजरीवाल की पुरानी आदत है।
अब नया झूठ यह फैलाया जा रहा है कि सरकार चुपके से पेट्रोल में 50% से अधिक एथेनॉल मिला देगी और लोगों की गाड़ियाँ कबाड़ हो जाएँगी।
केजरीवाल की यह अपील कितनी खतरनाक हो सकती है, यह देखना भी जरूरी है। सवालों के नाम पर जो सनसनी फैलानी की कोशिश अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं उससे बड़ा आर्थिक नुकसान भी हो सकता है। केजरीवाल ने जो 50% से ज्यादा एथनॉल वाली बात कही है उसके पीछे कोई तर्क नहीं है बस अपना मनगढ़ंत दावे हैं।
केजरीवाल राजनीति के नाम पर एक बेहद खतरनाक फॉर्मूला इस्तेमाल कर रहे हैं। पहले आशंका पैदा करो, फिर आशंका को संभावना बताओ और आखिर में संभावना को लगभग तय सरकारी योजना की तरह जनता के सामने रख दो। और इसका नुकसान सिर्फ राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहता।
सोचिए, कोई मध्यमवर्गीय परिवार महीनों की बचत के बाद कार खरीदने की योजना बना रहा है। कोई व्यक्ति रोजी-रोटी के लिए बाइक खरीदना चाहता है। कोई छोटा कारोबारी नई गाड़ी से अपना काम बढ़ाना चाहता है। ऐसे में एक बड़ा राजनीतिक चेहरा सार्वजनिक रूप से कहता है कि अभी गाड़ी मत खरीदिए, आगे पेट्रोल ही बदलने वाला है। स्वाभाविक है कि आम आदमी के मन में डर पैदा होगा।
E20 को लेकर वास्तविक बहस हो सकती है। पुराने वाहनों पर प्रभाव, माइलेज, रखरखाव, ईंधन की गुणवत्ता और उपभोक्ताओं को मिलने वाले विकल्प जैसे सवाल बिल्कुल जायज हैं। सरकार से जवाब माँगना भी जायज है। लेकिन इन सवालों को उठाने और यह कह देने में जमीन-आसमान का अंतर है कि 50% से ज्यादा एथनॉल आने वाला है, इसलिए नई गाड़ी मत खरीदो।
अगर करोड़ों लोगों के मन में यह धारणा बैठा दी जाए कि आने वाले वर्षों में पेट्रोल गाड़ियाँ ही भरोसे लायक नहीं रहेंगी, तो इसका सीधा झटका भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर को लग सकता है। ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री केवल कार बनाने वाली कंपनियों का नाम नहीं है।
इसके पीछे हजारों कंपनियों की सप्लाई चेन, ऑटो पार्ट्स बनाने वाली यूनिट, डीलरशिप, सर्विस सेंटर, बीमा, फाइनेंस और लाखों प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार जुड़े हैं। एक कार की बिक्री कम होती है तो असर सिर्फ कार कंपनी के शोरूम तक नहीं रुकता।
और यह असर उस समय और गंभीर हो सकता है जब भारत का ऑटो सेक्टर एक बड़े तकनीकी बदलाव से गुजर रहा है और पेट्रोल-डीजल, हाइब्रिड, इलेक्ट्रिक और वैकल्पिक ईंधन वाली गाड़ियों के बीच बाजार अपना भविष्य तय कर रहा है। ऐसे वक्त में जब नेताओं को जनता को और भरोसा देने की जरूरत है केजरीवाल जैसे नेता केवल वोट बैंक के नाम पर फर्जी सनसनी फैला रहे हैं।