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कहाँ है बलिराजगढ़, जो ASI की खुदाई में उगल रहा मिथिला की प्राचीन सभ्यता और वैभव के अवशेष; राजा बलि से लेकर विदेह तक से है कनेक्शन

बिहार के मधुबनी जिले में स्थित ऐतिहासिक बलिराजगढ़ इन दिनों पुरातात्विक दुनिया में कौतूहल और गौरव का केंद्र बना हुआ है। हाल ही में इस प्राचीन स्थल से मिले असाधारण पुरातात्विक साक्ष्यों ने न केवल इतिहासकारों को चौंकाया है, बल्कि मिथिलांचल के गौरवशाली अतीत को एक नया आयाम भी दिया है।

जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष और संसदीय समिति के अध्यक्ष संजय कुमार झा के अनुसार, यहाँ चल रही वैज्ञानिक खुदाई में एक अत्यंत समृद्ध और उन्नत सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस स्थल की महत्ता को देखते हुए यहाँ अगले 10 वर्षों तक खुदाई जारी रखने का एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है।

इसके साथ ही इस सुदूर इलाके में ASI का एक नया दफ्तर खोलने और एक बड़ा संग्रहालय (म्यूजियम) बनाने की तैयारी भी चल रही है। रामायण काल से इसका जुड़ाव, राजा बलि से जुड़ी पुरानी लोककथाएँ और मौर्य व शुंग साम्राज्य की मजबूत दीवारें बलिराजगढ़ को भारत की प्राचीन सभ्यता का एक सबसे अनोखा केंद्र बनाती है।

(फोटो साभार: The Print)

पुरातत्वविदों का कहना है कि स्थल पर मौजूद टीम एक ऐसी सभ्यता की खोज कर रही है, जो लौह युग के विदेह साम्राज्य की समझ को पूरी तरह से बदल सकती है, जिसका संबंध राजा जनक और रामायण से है। यह नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा भारत की प्राचीन जड़ों की गहराई में जाकर रामायण और महाभारत काल के ठोस प्रमाण खोजने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।

खास खाइयों से मिले अनोखे सबूत: खुदाई में मिलीं पत्थर की गेंदें, दुर्लभ सिक्के और मिट्टी के खिलौने

बलिराजगढ़ में इस समय जो खुदाई चल रही है, उसमें पुरानी गलतियों से सीखकर बिल्कुल नए और आधुनिक वैज्ञानिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। पहले की खुदाइयों में जो सबसे बड़ी दिक्कत पानी भरने और मैपिंग की आती थी, उसे इस बार सैटेलाइट इमेजिंग, आधुनिक वैज्ञानिक ट्रेंचिंग और जीपीएस मैपिंग जैसी तकनीकों के जरिए दूर कर लिया गया है।

इस समय वैज्ञानिकों की टीम पूरी तरह से छह विशेष खाइयों (यानी ट्रेंच) पर काम कर रही है। इन्हें बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से दो मुख्य हिस्सों में बाँटा गया है-एक है किले की मुख्य दीवार का क्षेत्र (Fortification Area) और दूसरा है आम नागरिकों के रहन-सहन वाला दक्षिणी क्षेत्र (Southern Area)।

अगर हम इन खाइयों से मिली चीजों को देखें, तो किले वाले हिस्से की खाइयों (जैसे YC-30, YC-31 और YD-31) की खुदाई पूरी हो चुकी है, जहाँ से प्राचीन सुरक्षा दीवारें और दुश्मनों को रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली पत्थर की भारी गेंदें मिली हैं। वहीं दूसरी तरफ इसका दक्षिणी हिस्सा प्राचीन लोगों के रोजमर्रा के जीवन के सबसे बड़े राज खोल रहा है।

यहाँ की एक खाई (YD-12) की गहराई तो 5.40 मीटर तक नीचे चली गई है, जहाँ से 13 परतों वाला मिट्टी के छल्लों से बना एक शानदार कुआँ (रिंग-वेल) मिला है। जानकारों का कहना है कि इसका इस्तेमाल पानी या फिर अनाज को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता होगा।

इसी तरह एक और खाई (ZD-16) से पानी निकालने की आधुनिक नाली और सोख्ता गड्डा मिला है, जबकि खाई YL-14 से सात परतों वाली ईंटों का एक बहुत बड़ा ढाँचा सामने आया है। यह गहरी खुदाई हमें वक्त के पहिए में सदियों पीछे ले जा रही है।

प्राचीन नगर नियोजन और मिट्टी से निकला पुरावशेषों का खजाना

बलिराजगढ़ की मिट्टी से इस समय जो भी ढाँचे और पुरानी वस्तुएँ बाहर आ रही हैं, वे उस जमाने के एक बेहद उन्नत और योजनाबद्ध शहर की कहानी सुनाती हैं। खुदाई में मिलीं सात परतों वाली ईंटों की दीवारें, घरों के आँगन और पक्के फर्श यह साबित करते हैं कि यहाँ के लोग मकान बनाने की कला (इंजीनियरिंग) में बहुत माहिर थे।

उनके घरों का लेआउट दिखाता है कि यह शहर अचानक या बेतरतीब नहीं बसा था, बल्कि इसे पूरी प्लानिंग के साथ बनाया गया था। गंदे पानी को निकालने के लिए बनाई गई नालियों की व्यवस्था और सोख्ता गड्ढे यह साफ करते हैं कि उस दौर के लोग साफ-सफाई और सेहत को लेकर कितने जागरूक थे।

इसके अलावा यहाँ की मिट्टी से रोजमर्रा की जिंदगी, खेल-कूद और व्यापार से जुड़ी ढेरों प्राचीन वस्तुएँ मिली हैं। खुदाई में उस दौर के सबसे कीमती और शाही माने जाने वाले ‘उत्तरी काली पॉलिश वाले बर्तन’ (NBPW) के टुकड़े मिले हैं, जो आमतौर पर मौर्य और शुंग काल के अमीर और संपन्न परिवारों की पहचान होते थे।

इनके साथ ही लाल, काले और धूसर (ग्रे) रंग के चमकीले बर्तनों की मौजूदगी यह बताती है कि यहाँ मिट्टी के बर्तन बनाने की तकनीक कितनी लाजवाब थी।

बच्चों के खेलने के लिए मिट्टी की छोटी-छोटी खिलौना गाड़ियाँ, पासे, सुंदर मनके (बीट्स) और शिकार या सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाली पत्थर की छोटी गेंदें यह साबित करती हैं कि यहाँ का सामाजिक जीवन बहुत खुशहाल और आर्थिक रूप से मजबूत था।

पुरानी खुदाइयों का इतिहासः 1962 से शुरू हुई खोज

बलिराजगढ़ की अहमियत को बेहतर तरीके से समझने के लिए हमें इसके पुराने इतिहास और पहले हुई खुदाइयों पर एक नजर डालनी होगी। यह पहली बार नहीं है जब यहाँ जमीन को खोदा जा रहा है, बल्कि मौजूदा खुदाई इस जगह को समझने का चौथा बड़ा वैज्ञानिक प्रयास है।

इस टीले के नीचे छिपे इतिहास को सबसे पहले साल 1962-63 में पहचाना गया था, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने यहाँ पहली बार शुरुआती खुदाई का काम शुरू किया था। उस समय मिले चंद अवशेषों ने ही यह इशारा कर दिया था कि इसके नीचे कुछ बहुत बड़ा और ऐतिहासिक छिपा हुआ है।

इसके बाद, साल 1972-75 के दौरान यहाँ दूसरे दौर की और ज्यादा व्यवस्थित खुदाई की गई, जिसने यहाँ की ऐतिहासिक कड़ियों को और मजबूत किया।

फिर तीसरे दौर की खुदाई वर्ष 1998-99 के आसपास हुई। इन शुरुआती तीनों खुदाइयों में पुरातत्वविदों को मौर्य साम्राज्य (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) और शुंग राजवंश के समय की विशाल ईंटों से बनी सुरक्षा दीवारें, दुर्लभ मुहरें, पुराने सिक्के और खास तरह के मिट्टी के बर्तन मिले थे।

हालाँकि उस समय तकनीकी कमियों, संसाधनों की किल्लत और सबसे बढ़कर बारिश के दिनों में जमीन के नीचे का पानी (भूजल स्तर) अचानक ऊपर आ जाने की वजह से काम को बीच में ही रोकना पड़ा था। लेकिन आज आधुनिक तकनीकों के साथ यहाँ चौथे दौर की सबसे बड़ी खुदाई शुरू की गई है, ताकि अधूरे रह गए इतिहास को पूरा किया जा सके।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बारिश की वजह से काम को फिलहाल के लिए रोक दिया गया है। बारिश थमने के बाद दोबारा खुदाई शुरू होने की संभावना है।

राजा बलि की कहानी और इस जगह के नाम का पुराना रहस्य

बलिराजगढ़ के नाम और इसकी पहचान के पीछे सदियों पुरानी लोककथाएँ और मान्यताएँ छिपी हुई हैं। यहाँ के स्थानीय लोग और बुजुर्ग हमेशा से यह मानते आए हैं कि इस विशाल मिट्टी के टीले और ऊँची दीवारों का संबंध पौराणिक काल के महाप्रतापी और दानी राजा बलि से है।

लोक-परंपराओं में कहा जाता है कि यह स्थान कभी राजा बलि की राजधानी या उनका ऐसा किला था जिसे कोई जीत नहीं सकता था। यह कहानी यहाँ के लोगों के दिलों में इस कदर रची-बसी है कि जब भी इस टीले के पास खुदाई की बात होती है, तो लोगों के मन में सबसे पहला कौतूहल राजा बलि के उसी प्राचीन महल और नगरी को देखने का जाग उठता है।

राजा बलि वही राजा हैं, जिनका जिक्र हिंदू पुराणों में भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा में आता है। हालाँकि आज के पुरातत्वविदों और वैज्ञानिकों के लिए यह जगह किसी एक राजा की कहानी से कहीं आगे बढ़कर, समय की कई परतों को अपने अंदर समेटे हुए एक प्राचीन शहरी सभ्यता का जीता-जागता सबूत है।

रामायण काल से सीधा जुड़ाव और मिथिला का पुराना गौरव

बलिराजगढ़ का नाता सिर्फ पौराणिक कहानियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका बहुत गहरा और सीधा संबंध रामायण काल और माता सीता की जन्मस्थली मिथिला से है। अगर नक्शे के हिसाब से देखें, तो यह जगह प्राचीन मिथिलांचल के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित है।

यह वही महान भूमि है जो राजा जनक के ज्ञान, महर्षि याज्ञवल्क्य की विद्वता और भगवान राम-सीता के विवाह के इतिहास से महकती है। रामायण काल के रास्तों और जगहों पर शोध करने वाले जानकारों का मानना है कि प्राचीन समय में यह किला एक बहुत बड़ा प्रशासनिक या सुरक्षा केंद्र रहा होगा।

इस जगह की सबसे खास बात यह है कि यह माता सीता की जन्मस्थली पुनौराधाम (सीतामढ़ी) और नेपाल के जनकपुर के बीच एक बेहद मजबूत कल्पित सुरक्षा गढ़ या किले के रूप में दिखाई देता है। यही वजह है कि केंद्र सरकार की मौजूदा सांस्कृतिक योजनाओं में बलिराजगढ़ को ‘रामायण सर्किट’ का एक बेहद जरूरी हिस्सा माना जा रहा है।

मोदी सरकार की कोशिश है कि भगवान राम और माता सीता के जीवन से जुड़ी जितनी भी ऐतिहासिक जगहें हैं, उन्हें एक साथ जोड़कर विकसित किया जाए। बलिराजगढ़ की इस नई खुदाई से मिथिलांचल के उस दौर के पक्के भौतिक सबूत सामने आ रहे हैं, जो अब तक सिर्फ धार्मिक किताबों और कहानियों में सुने जाते थे।

इससे स्पष्ट है कि रामायण काल की मिथिला सिर्फ विचारों या ज्ञान की नगरी नहीं थी, बल्कि उसके पास एक बहुत ही मजबूत, सुरक्षित और वैज्ञानिक रूप से बसाया गया शहर भी था।

केंद्र सरकार के प्रयास और इस खोज से भविष्य में होने वाले बड़े बदलाव

बलिराजगढ़ से मिल रहे इन अनमोल और ऐतिहासिक सबूतों को देखते हुए केंद्र सरकार ने इस पूरे इलाके की तस्वीर बदलने के लिए एक बहुत बड़ा और लंबा प्लान तैयार किया है। सरकार की तरफ से यह ऐतिहासिक फैसला लिया गया है कि यहाँ अगले 10 सालों तक लगातार वैज्ञानिक खुदाई का काम जारी रहेगा।

इतने लंबे समय तक चलने वाली खुदाई से यह फायदा होगा कि इतिहास का कोई भी पन्ना अछूता नहीं रहेगा और इस प्राचीन सभ्यता की पूरी कहानी दुनिया के सामने आ सकेगी। इस बड़े अभियान को अच्छे से चलाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का एक परमानेंट दफ्तर इसी ग्रामीण इलाके में खोला जा रहा है।

खुदाई से निकलने वाली हर छोटी-बड़ी चीज जैसे मूर्तियों, सिक्कों और बर्तनों को सुरक्षित रखने के लिए यहाँ एक भव्य और आधुनिक म्यूजियम (संग्रहालय) बनाया जाएगा। यह म्यूजियम न केवल बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा, बल्कि देश-विदेश के इतिहासकारों और शोध करने वाले छात्रों के लिए पढ़ाई का एक बहुत बड़ा जरिया बनेगा।

इस पूरी खोज और विकास का सबसे बड़ा और सीधा फायदा आने वाले समय में पूरे मिथिलांचल और उत्तर बिहार के लोगों को मिलने वाला है। जब यह जगह रामायण सर्किट से पूरी तरह जुड़ जाएगी और यहाँ एक बड़ा म्यूजियम बन जाएगा, तो यहाँ देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी।

पर्यटन के इस विकास से इस सुदूर ग्रामीण इलाके में बेहतरीन सड़कें, होटल, गाड़ियाँ और संचार जैसी आधुनिक सुविधाएँ तेजी से पहुँचेंगी।

सबसे अच्छी बात यह होगी कि स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, होटल, हस्तशिल्प और छोटे-मोटे व्यापार के रूप में रोजगार के हजारों नए मौके पैदा होंगे, जिससे इलाके के लोगों का आर्थिक जीवन सुधरेगा। यह खोज आने वाली पीढ़ियों को उनकी समृद्ध विरासत और मिथिला के गौरवशाली अतीत से रूबरू कराएगी, जिससे हर किसी को अपनी संस्कृति पर गर्व होगा।

पाकिस्तान की Cream, भारत में महिलाओं को फैला रही किडनी की गंभीर बीमारी: जानें- क्या है महाराष्ट्र का ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ विवाद और किन देशों में लग चुका है बैन

हर कोई खूबसूरत और गोरा दिखना चाहता है। इसी चाहत में लोग अक्सर बिना सोचे-समझे बाजार में मिलने वाली कोई भी ब्यूटी क्रीम चेहरे पर लगाने लगते हैं। लेकिन कभी-कभी गोरा होने का यही शौक जिंदगी पर भारी पड़ जाता है। हाल ही में भारत में एक ऐसा ही हैरान करने वाला मामला सामने आया। पाकिस्तान में बनी एक मशहूर ब्यूटी क्रीम को लगाने से भारत की कई महिलाओं की सेहत पूरी तरह बिगड़ गई। इस क्रीम ने न सिर्फ महिलाओं के चेहरे को खराब किया, बल्कि सीधे उनकी किडनी पर इतना बुरा असर डाला कि वे गंभीर रूप से बीमार हो गईं।

इस पूरे हंगामे की वजह पाकिस्तान की ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ (Goree Beauty Cream) है। इस क्रीम को लेकर दावा किया जाता था कि इसे लगाने से चेहरा तुरंत गोरा हो जाता है, लेकिन अब इसके पीछे का जहरीला सच सबके सामने आ चुका है। महाराष्ट्र के नागपुर में जब कई महिलाओं ने इस क्रीम को लगाया, तो उन्हें सेहत से जुड़ी गंभीर समस्याएँ होने लगीं। जब इसकी शिकायतें डॉक्टरों और सरकार तक पहुँचीं, तो जाँच टीमें तुरंत अलर्ट हो गईं। लैब में इस क्रीम की बारीकी से जाँच की गई, जिसमें खतरनाक केमिकल मिले। इसके बाद भारत सरकार और महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने सच का पता लगाकर इस क्रीम को भारत में पूरी तरह बैन कर दिया है।

नागपुर से हुई जहरीले सच की शुरुआत

यह मामला तब सामने आया जब महाराष्ट्र के नागपुर में कई महिलाओं की तबीयत अचानक खराब होने लगी। जब वे डॉक्टरों के पास पहुँचे, तो पता चला कि ये सभी महिलाएँ पिछले दो साल से गोरा होने के लिए एक ही ब्रांड की क्रीम लगा रही थीं। जाँच में सामने आया कि इस क्रीम की वजह से उनकी किडनी खराब हो चुकी थी और उनके शरीर में खतरनाक जहर फैल गया था।

डॉक्टरों ने जब गहराई से जाँच की, तो मालूम पड़ा कि ये सभी 18 महिलाएँ इंटरनेट और सोशल मीडिया से खरीदकर ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ (जो पाकिस्तान की है) इस्तेमाल कर रही थीं। यह बात पता चलते ही डॉक्टरों ने तुरंत इसकी जानकारी स्वास्थ्य अधिकारियों और प्रशासन को दी। इसके बाद सरकार ने कड़ा एक्शन लेते हुए बाजार से इस क्रीम को जब्त कर लिया और जांच के लिए लैब में भेज दिया ताकि पता चल सके कि इसमें कौन से खतरनाक केमिकल मिलाए गए हैं।

प्रयोगशाला की जाँच में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

जब महाराष्ट्र के सरकारी विभाग (FDA) ने इस ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ की लैब में जाँच की, तो नतीजे बहुत डराने वाले थे। जाँच में पता चला कि इस क्रीम में पारा (Mercury) और शीशा (Lead) जैसे बेहद खतरनाक और जहरीले केमिकल मिले हुए थे। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इसमें पारे (Mercury) की मात्रा तय कानूनी सीमा से 752 गुना ज्यादा थी।

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के मुताबिक, कंपनियाँ इस पारे का इस्तेमाल इसलिए करती हैं ताकि त्वचा का रंग बहुत जल्दी गोरा और साफ दिखने लगे। लेकिन यह गोरापन कोई असली निखार नहीं होता, बल्कि केमिकल्स के कारण त्वचा को पहुँचने वाला नुकसान होता है। यह खतरनाक पारा स्किन के छोटे-छोटे छेदों (रोमछिद्रों) के रास्ते बहुत आसानी से शरीर के अंदर चला जाता है और धीरे-धीरे अंदरूनी अंगों को खराब करने लगता है।

किडनी पर सीधा हमला और ‘मेम्ब्रेनस नेफ्रोपैथी’ का खतरा

रोज इस प्रतिबंधित (बैन) क्रीम को लगाने की वजह से महिलाओं के शरीर में यह खतरनाक पारा जमा होता गया, जिसने सीधे उनकी किडनी को नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि त्वचा के रास्ते शरीर में पहुँचा यह जहर अंदरूनी अंगों को खराब करता है और शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताकत (इम्यून सिस्टम) को बिगाड़ देता है। इससे किडनी पूरी तरह काम करना बंद कर सकती है, जिसका इलाज बहुत मुश्किल और महँगा होता है।

मेडिकल रिसर्च के मुताबिक, ऐसे ज्यादा पारे वाले ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने से किडनी की एक गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। इस बीमारी में किडनी का फिल्टर करने वाला हिस्सा खराब हो जाता है, जिससे शरीर का जरूरी प्रोटीन पेशाब के रास्ते बाहर बहने लगता है। नागपुर की पीड़ित महिलाओं में भी ठीक यही बीमारी और लक्षण पाए गए, जो लंबे समय तक इस जहरीली क्रीम को लगाने की वजह से हुए थे।

भारतीय प्रशासनिक तंत्र और सरकार का कड़ा एक्शन

इस बड़े खतरे को देखते हुए भारत सरकार और महाराष्ट्र के विभाग (FDA) ने तुरंत कड़ा एक्शन लिया है। प्रशासन ने ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ के साथ दो और खराब ब्यूटी प्रोडक्ट्स- ‘फेस फ्रेश गोल्ड’ (क्रीम और सीरम) और ‘कॉस्मेटिक गोल्डन स्टार ब्यूटी क्रीम’ को पूरी तरह असुरक्षित घोषित कर दिया है। अब इन पर पूरी तरह बैन लगा दी गई है और लोगों से अपील की गई है कि वे इन्हें भूलकर भी न खरीदें।

इसके साथ ही, पूरे महाराष्ट्र में नकली और खराब कॉस्मेटिक्स बेचने वालों के खिलाफ एक बड़ा अभियान शुरू कर दिया गया है। FDA कमिश्नर तुकाराम मुंडे की देखरेख में सिर्फ जून के महीने में ही 34 जगहों पर छापे मारे गए। इस कार्रवाई में 4 करोड़ रुपए से ज्यादा की नकली दवाएँ और खतरनाक ब्यूटी प्रोडक्ट्स जब्त किए गए हैं। साथ ही, नियम तोड़ने वाले दुकानदारों के खिलाफ 9 FIR दर्ज की गई हैं और दो लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।

नियमों का सरेआम उल्लंघन और मुंबई में क्रिमिनल केस

जाँच करने वाले अधिकारियों को पता चला कि इन पाकिस्तानी क्रीमों के पैकेट पर कानून के मुताबिक कोई भी जरूरी जानकारी नहीं लिखी थी। पैकेट पर न तो बनाने वाली कंपनी का नाम-पता था, और न ही यह लिखा था कि क्रीम कब बनी है और कब खराब (Expire) होगी। यह पूरी तरह से कानून का उल्लंघन था, जिससे ग्राहकों को धोखे में रखकर उनकी जान से खिलवाड़ किया जा रहा था।

इसी बीच, मुंबई पुलिस ने चेंबूर इलाके के एक दुकानदार पर केस दर्ज किया है। इस दुकानदार पर आरोप है कि पाकिस्तान से सामान मँगाने पर रोक होने के बावजूद, वह छिपकर यह खतरनाक ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ बेच रहा था। अब पुलिस और एजेंसियाँ इस बात की गहराई से जाँच कर रही हैं कि रोक होने के बाद भी यह प्रतिबंधित क्रीम भारतीय बाजारों और दुकानों तक किस रास्ते से पहुँच रही थी।

ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया के जरिए भारत में एंट्री

इस मामले में एक और बड़ी चिंता की बात यह है कि रोक होने के बाद भी यह पाकिस्तानी क्रीम लोगों के घरों तक कैसे पहुँची। जाँच में पता चला कि इसे बेचने के लिए इंस्टाग्राम पेजों, रील्स और इंटरनेट का इस्तेमाल किया जा रहा था। यहाँ तक कि मीशो (Meesho) जैसी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स पर भी कुछ बाहरी दुकानदारों (थर्ड-पार्टी सेलर्स) द्वारा यह खतरनाक क्रीम धड़ल्ले से बेची जा रही थी, जहाँ से आम महिलाओं ने इसे आसानी से ऑनलाइन ऑर्डर कर दिया।

सोशल मीडिया पर इसके विज्ञापनों और झूठे दावों को देखकर सीधी-सादी महिलाएँ इसके जाल में फँस गईं और इसे चेहरे के लिए बहुत अच्छा मान बैठीं। इंटरनेट पर इस क्रीम से बहुत जल्दी गोरा होने का झूठा प्रचार किया गया था, जिसे देखकर लोगों ने इसे खरीदा। अब सरकार ने सभी ऑनलाइन वेबसाइटों और छोटे-बड़े दुकानदारों को सख्त चेतावनी दी है कि वे इस क्रीम को तुरंत बेचना बंद कर दें, वरना उनके खिलाफ भी कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लग चुके हैं इस क्रीम पर प्रतिबंध

इस पाकिस्तानी क्रीम का यह सच सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सामने आ चुका है। यह ब्रांड विदेशों में भी अपनी बदनामी के लिए जाना जाता है। साल 2021 में न्यूजीलैंड की सरकारी दवा संस्था ने अपने लोगों को चेतावनी देते हुए इस क्रीम को लगाने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी, क्योंकि वहाँ की लैब जाँच में भी इसमें बहुत ज्यादा मात्रा में जहरीला पारा और शीशा पाया गया था।

इसके बाद, साल 2025 में फिलीपींस सरकार ने भी इस क्रीम के सभी प्रोडक्ट्स को सेहत के लिए खतरनाक बताते हुए चेतावनी जारी की थी। फिलीपींस सरकार का कहना था कि इस क्रीम को देश में बेचने की कोई कानूनी मंजूरी नहीं थी। दुनिया भर में बार-बार बैन होने के बाद भी, यह पाकिस्तानी ब्रांड तस्करी और इंटरनेट के गलत रास्तों के जरिए दुनिया के बाजारों में छिपकर बिकने की कोशिश कर रहा है।

सोशल मीडिया पर दिखा भारी आक्रोश और जनता का रिएक्शन

इस खुलासे के बाद इंटरनेट और सोशल मीडिया पर लोग बहुत गुस्से में हैं और इस पर बड़ी बहस छिड़ गई है। इस मामले को सबसे पहले ‘X’ (ट्विटर) पर चिराग बरजात्या नाम के एक व्यक्ति ने पोस्ट शेयर करके सामने लाया था, जिसके बाद यह खबर तेजी से फैल गई। इस पोस्ट को देखकर हजारों लोगों ने गुस्सा जताया और इसे भारतीयों के खिलाफ एक तरह का ‘केमिकल हमला’ (केमिकल टेररिज्म) कहा।

लोग न सिर्फ इस पाकिस्तानी क्रीम को कोस रहे हैं, बल्कि भारत की ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स पर भी सवाल उठा रहे हैं कि उन्होंने बिना जाँच-पड़ताल के इसे अपनी साइट पर कैसे बिकने दिया। लोगों का कहना है कि ऑनलाइन वेबसाइट्स को कोई भी विदेशी सामान बेचने से पहले उसकी सरकारी मंजूरी और लैब रिपोर्ट जरूर चेक करनी चाहिए। इसके साथ ही, लोग इंटरनेट पर अभियान चलाकर अपील कर रहे हैं कि अपने रिश्तेदारों और घर के काम करने वाले सहायकों को इसके बारे में सावधान करें, और अगर किसी के पास भी यह क्रीम दिखे, तो उसे तुरंत कचरे के डिब्बे में फेंक दें।

गोरेपन का जानलेवा भ्रम और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

पाकिस्तानी क्रीम का यह मामला दिखाता है कि गोरा होने की चाहत, टीवी-इंटरनेट के झूठे विज्ञापन और हमारी आज की आदतें कितनी खतरनाक हो सकती हैं। कुछ ही दिनों में गोरा करने का दावा करने वाली ये क्रीम असल में खूबसूरती बढ़ाने की चीज नहीं, बल्कि बोतलों में बंद धीमा जहर हैं, जो धीरे-धीरे हमारे शरीर के अंगों को खराब कर रही हैं। इस घटना से साफ है कि बिना डॉक्टर की सलाह या बिना सरकारी मंजूरी के इंटरनेट से कोई भी क्रीम या कॉस्मेटिक खरीदना जानलेवा हो सकता है।

अब समय आ गया है कि हम सिर्फ सरकार या पुलिस के भरोसे न बैठें, बल्कि खुद भी सोचें। हमें यह समझना होगा कि जैसा हमारा प्राकृतिक रंग है, वही सबसे अच्छा और सेहतमंद है। गोरा होने की अंधी दौड़ में पड़कर अपनी जान जोखिम में डालना बहुत बड़ी बेवकूफी है। सरकार का इस क्रीम को बैन करना और छापे मारना बहुत अच्छा कदम है, लेकिन यह समस्या तभी पूरी तरह खत्म होगी जब हम खुद समझदार बनेंगे, झूठे विज्ञापनों के बहकावे में नहीं आएँगे और चोरी-छिपे आने वाले ऐसे जहरीले विदेशी सामानों को पूरी तरह ना कह देंगे।

‘आधी रात को निकाले हजारों प्रवासी’: बांग्लादेशी घुसपैठियों पर भारत की सख्त पुश-बैक नीति के खिलाफ Financial Times का विलाप, बंगाल सरकार पर बेबुनियाद हमला

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व सफलता मिली। पार्टी ने पूर्व सीएम ममता बनर्जी की अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस (एआईटीसी या टीएमसी) को सत्ता से बेदखल करते हुए 200 सीटों का आँकड़ा पार किया। यह राज्य में ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव का प्रतीक था और इसने शासन में एक नए युग की शुरुआत की।

नई शुभेंदु सरकार ने भारत-बांग्लादेश की सीमा को सुरक्षित करना और अवैध माइग्रेशन के खिलाफ एक मजबूत नीति लागू करना जैसे महत्वपूर्ण कार्य शुरू किए, जिन्हें पिछली सरकार ने नजरअंदाज कर दिया था।

दरअसल, टीएमसी ने राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों की एंट्री को बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार के साथ लगातार लड़ती रही, यहाँ तक ​​कि उसके नेताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों को नुकसान पहुँचाते हुए इस तरह के घुसपैठियों को बढ़ावा देने का दावा भी किया। हालाँकि, वोट बैंक की राजनीति के लिए अपनाई गई इस खतरनाक रणनीति को शुभेंदु अधिकारी सरकार ने रोक दिया।

घुसपैठियों का बचाव करने में जुटा गुट

1 जुलाई 2026 को फाइनेंशियल टाइम्स ने ‘भारत ने रात के अंधेरे में हजारों प्रवासियों को निष्कासित किया’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया इसके लेखक एंड्रेस शिपानी थे। यह लेख एक संप्रभु राष्ट्र की निर्वाचित राज्य सरकार के फैसलों के विरोध में था, जिसने अपने मतदाताओं के व्यापक हित में पड़ोसी देश से अवैध घुसपैठ पर रोक लगाने का प्रयास करते हुए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।

लेख में पाठकों को उकसाने के लिए सनसनीखेज शीर्षक का भी इस्तेमाल किया गया। जिसमें आरोप लगाया गया कि भारत में कानून का उल्लंघन करके प्रवेश करने वालों के बजाय वैध नागरिकों को निष्कासित किया जा रहा है।

कथित सरकारी क्रूरता और अन्याय की एक सनसनीखेज कहानी गढ़ते हुए लेख में दावा किया गया, “बांग्लादेशी सीमा रक्षक लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करके अपने भारतीय समकक्षों को लोगों को सीमा पार धकेलने से रोकते हैं।”

इसने बांग्लादेशी अधिकारियों के हवाले से कहा कि भारतीय पक्ष अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अंधेरे का इस्तेमाल ढाल के रूप में करता है, जो मई में पश्चिम बंगाल में भगवा पार्टी के सत्ता में आने के बाद से और भी बढ़ गया है।

लेख में लांस कॉर्पोरल महमूद मसूद के हवाले से लिखा गया है कि उसने बताया, “वे अंधेरा होने का इंतजार करते हैं, फिर स्पॉटलाइट बंद कर देते हैं और सही मौके की तलाश करते हैं।” बांग्लादेश सीमा सुरक्षा के महानिदेशक मोहम्मद अशरफुज्जमान सिद्दीकी ने जोर देकर कहा, “वे भारतीय बाड़ के फाटक खोल देते हैं और लोगों को अँधेरे में धकेल देते हैं। वहाँ महिलाएँ होती हैं, बच्चे होते हैं और ये बेचारे लोग बीच में फँस जाते हैं।”

आर्टिकल में बताया गया है कि भारतीय और बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, राज्य ने हजारों लोगों को, जिनमें अधिकतर बंगाली मूल के मुस्लिम हैं, बांग्लादेश भेज दिया है। इसमें दावा किया गया है कि बांग्लादेशी अधिकारियों ने ‘भारत और बांग्लादेश की सीमा में मौजूद एक पतली बंजर भूमि जीरो लाइन में फँसे दर्जनों लोगों’ के बारे में बताया।

इसमें कहीं भी बांग्लादेश की आलोचना नहीं की गई है कि वह अपने नागरिकों को अपने यहाँ लाना क्यों नहीं चाहता? बल्कि बड़ी चालाकी से भारत को ‘खलनायक’ के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। लेखक कहता है, “निर्वासन अभियान ने दोनों देशों के बीच नाजुक संबंधों को और खराब कर दिया है, हिंदू राष्ट्रवाद के बारे में आशंकाओं को रेखांकित किया है और पश्चिम बंगाल और दूसरे सीमावर्ती राज्यों में लाखों मुसलमानों के लिए असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है।”

बेशक फाइनेंशियल टाइम्स ने तुरंत ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का सहारा लिया। ज्यादातर लिबरल गैंग इस मूलभूत सिद्धांत का ही सहारा लेते हैं मोदी सरकार पर हमला करने के लिए। लेकिन यह हिन्दू राष्ट्रवाद का नहीं, बल्कि घुसपैठियों को पीड़ित के रूप में पेश करने के दुष्प्रचार का एक हिस्सा है।

धार्मिक रंग देने की कोशिश

लेख में भारत-बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक संबंधों और पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की भाषा में समानता का हवाला देते हुए तर्क दिया कि सरकार को देश में अवैध बांग्लादेशियों को शरण देना चाहिए था। इसमें बांग्लादेश को बस शांत रहने की सलाह दी गई है. क्योंकि उसके लोग पड़ोस में बेलगाम भाग रहे हैं।

असम जैसे राज्यों में बांग्लादेशियों के अनियंत्रित और बड़े पैमाने पर हो रहे प्रवाह को एक भावुक ‘माइग्रेशन का इतिहास’ के रूप में चित्रित किया गया है। इसका इतिहास या वास्तविकता में कोई लेना-देना नहीं है। इसके बाद लेख में पश्चिम बंगाल सरकार पर अवैध बांग्लादेशी या रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर नाराजगी जताई गई।

आर्टिकल में इस बात पर जोर दिया गया कि राज्य में 30% मुस्लिम आबादी है, जिसका मतलब यह था कि इन कार्रवाइयों से उन पर असर पड़ने की संभावना है। यह बात नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी आंदोलन के दौरान फैलाई गई साजिश की याद दिलाती है, जिसमें कहा गया था कि इस कानून का इस्तेमाल दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ हथियार के तौर पर किया जाएगा। हालाँकि इसके लागू होने के बाद ऐसी कोई बात सामने नहीं आई।

संविधान में भारतीय नागरिकों को उनके धर्म की परवाह किए बिना देश के किसी भी हिस्से में रहने और बसने की छूट है, लेकिन सरकार की विश्वसनीयता को कम करने और संदेह और विभाजन को बढ़ावा देने के लिए इस तरह की बयानबाजी से सच्चाई को दबाने और हिंसा के लिए भड़काने का प्रयास किया गया।

फाइनेंशियल टाइम्स ने जोर देते हुए कहा, “आलोचकों का कहना है कि निर्वासन की यह मुहिम भाजपा की भारत को मुस्लिम अल्पसंख्यकों की कीमत पर एक हिंदू राष्ट्र बनाने की इच्छा को दर्शाती है।” इसके बाद उसने ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उप प्रमुख मीनाक्षी गाँगुली के हवाले से कहा कि भारतीय अधिकारी ज्यादातर मुस्लिम परिवारों को बेरहमी से बांग्लादेश में धकेलने या उन्हें सीमा पर छोड़ रहे हैं। साथ ही ‘मुस्लिम के प्रति इस निंदनीय शत्रुता को समाप्त करने’ की अपील की।

अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले तत्वों से निपटने के लिए सरकार की रणनीति को फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश करार दिया गया। एक तरह से मीडिया संस्थान यह संकेत देता है कि भारत को चुपचाप देखते रहना चाहिए। जबकि भारत के नागरिक अच्छी तरह जानते हैं कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या न केवल देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ डाल रहे हैं, बल्कि मुस्लिम सहित सही नागरिकों के अधिकारों का भी उल्लंघन कर रहे हैं।

बांग्लादेश न केवल अपने नागरिकों को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है, बल्कि अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ दमन का एक शर्मनाक इतिहास भी रखता है। लेकिन इस गुट की विकृत विचारधारा उन अत्याचारों को सिर्फ देखती है जो नहीं हो रहा है। ये बांग्लादेश में हो रहे हिंदुओं पर अत्याचार को नजरअंदाज कर देती है।

न्यायिक आदेशों का सम्मान करने के लिए भाजपा सरकारों पर हमले

शिपानी ने पश्चिम बंगाल सरकार के ‘पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए बताया कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने खुद की कहा था, “उनके पदभार संभालने के बाद से लगभग 10000 अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को निष्कासित किया जा चुका है, जबकि 1800 अन्य निर्वासन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस मंच ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के इस मुद्दे पर अडिग रुख की भी आलोचना की। मंच ने उनके उन बयानों का जिक्र किया, जिनमें उन्होंने भारत में डेमोग्राफी बदलाव ला सकने वाले घुसपैठियों से निपटने के लिए अपनी सरकार की नीतियों पर प्रकाश डाला था और इसलिए उन्हें उनके वतन वापस भेजने का इरादा जताया था।

गौरतलब है कि अवैध घुसपैठियों की भारी संख्या के कारण जनसांख्यिकीय बदलाव की नाजुक स्थिति को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक ने माना था। 2025 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कहा कि असम एक ‘मूक और दुर्भावनापूर्ण जनसांख्यिकीय आक्रमण’ का सामना कर रहा है और यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के पास ‘भारतीय क्षेत्र से विदेशियों को निष्कासित करने का पूर्ण और असीमित अधिकार’ हैं। कोर्ट ने कहा, “राज्य के पास घोषित विदेशी नागरिक को निष्कासित करने की शक्ति है।”

असम में घुसपैठियों को शरण न देने में सीएम सरमा की अहम भूमिका रही है और उन्होंने घुसपैठियों के निर्वासन के लिए कठोर नीति अपनाई है। यह मुद्दा राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले जारी किए गए पार्टी के घोषणापत्र का अभिन्न अंग रहा है। इसमें ‘विदेशी’ घोषित किए गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का वादा किया गया था। उन्होंने वन और कृषि भूमि सहित कई एकड़ सार्वजनिक संपत्तियों को भी घुसपैठियों के कब्जे से मुक्त कराया है।

दोहरी मानसिकता का खुला प्रदर्शन

अदालत के आदेशों का पालन करने वाली सरकार से फाइनेंशियल टाइम्स को निश्चित रूप से चिढ़ होगी, क्योंकि यह उसके एजेंडे के खिलाफ था। हाल ही में भारत में हो रहे घटनाक्रमों पर बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान के बयान से भी इसका पता चलता है। बांग्लादेशी अधिकारियों ने अपने नागरिकों को स्वीकार करने में कोताही की है, जबकि पहले से ही करीब ’10 लाख रोहिंग्या’ शरणार्थी बने हुए हैं।

स्पष्ट रूप से बांग्लादेश के पास संकट को कम करने के लिए अपने ही नागरिकों को अस्वीकार करने का अधिकार है, लेकिन भारत, जो विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, उसे खुद पर अतिरिक्त बोझ डालना होगा। इतना ही नहीं अपने संसाधनों के दुरुपयोग की अनुमति भी देनी होगी।

लेख में बताया गया है कि विदेश मामलों के राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने चेतावनी दी है कि अगर भारत अपना रुख नहीं बदलता है तो संबंध ‘तनावपूर्ण’ बने रहेंगे, जबकि उनके देश ने घोषणा की है कि वह एक भी रोहिंग्या का स्वागत नहीं करेगा।

दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत में अवैध प्रवासियों के साथ कानूनी रूप से व्यवहार किया जाएगा। भारत ने राष्ट्रीयता सत्यापन के लिए बांग्लादेशी अधिकारियों को 2680 से अधिक मामले भेजे हैं, लेकिन ये अभी भी लंबित हैं। कई मामलों में तो 5 साल की दूरी हो गई है।

एफटी ने एक भारतीय अधिकारी के हवाले से कहा है कि देश निकाला एक तरह से तत्काल निष्कासन है, लेकिन इसके लिए उस देश का सहयोग आवश्यक है, जहाँ हम निर्वासित कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, बांग्लादेश में ऐसा सहयोग कभी नहीं मिल रहा। उन्होंने कहा कि भारत के पास अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

लेख को भावनात्मक मूल्य बनाने के लिए एक ऐसे घुसपैठिए की कहानी भी बताई, जिसे देश में एक दशक से अधिक समय तक रहने के बाद आत्मसमर्पण करना पड़ा।

फाइनेंशियल टाइम्स के इस आर्टिकल में सच्चाई की कोई परवाह नहीं की गई और इसका मकसद एक दुर्भावनापूर्ण एजेंडा को बढ़ावा देना था। बांग्लादेश ने भारतीय अधिकारियों के साथ सहयोग करने में अनिच्छा दिखाई है। ऐसे में भारतीय अधिकारियों के पास क्या विकल्प बचते हैं? एफटी हमेशा की तरह निष्क्रियता का समर्थन करेगा।

कोई भी समझदार सरकार अपने देश में किसी को भी प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकती और न ही ऐसा करना चाहिए। खुली सीमाएँ किसी भी राष्ट्र के लिए अव्यावहारिक हैं, जिनमें भारत और बांग्लादेश भी शामिल हैं। यही कारण है कि मिस्र और जॉर्डन जैसे राष्ट्र विस्थापित फिलिस्तीनियों को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, जबकि वे उनका भरपूर समर्थन करते हैं।

यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई विकसित पश्चिमी शक्तियाँ भी इस तरह के अनियंत्रित आप्रवासन का विरोध करती हैं, क्योंकि वे अपने हितों को प्राथमिकता देती हैं। हालाँकि फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, भारत को इस संप्रभु अधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उसकी स्थिरता और सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ सकती हैं।

हमें याद रखना चाहिए कि भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप पड़ोसी इस्लामी देशों में हिंदू समुदाय को अपने धर्म के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़े जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के परिणाम कश्मीर से लेकर मुर्शिदाबाद तक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।

हालाँकि एफटी जैसे संगठनों के लिए, हिंदुओं को अपनी संस्कृति और भविष्य की रक्षा करने के अधिकारों से वंचित कर देना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे भारत को अपनी नीतियाँ तय करने की स्वायत्तता नहीं होनी चाहिए। ये आजादी केवल उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जिन्हें इस्लामी-वामपंथी गुट उपयुक्त समझते हैं।

(यह लेख मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

Insta से चाइल्ड पोर्न हटाने के आदेश को ‘ब्लूमबर्ग’ बता रहा META के लिए ‘सिरदर्द’, पड़ी गालियाँ: जानिए कैसे विदेशी मीडिया के लिए बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा भारत का विरोध है जरूरी

भारत को अक्सर मानवाधिकारों, संवेदनशीलता, न्याय, बाल संरक्षण और न जाने किस-किस पर ज्ञान देने वाला पश्चिमी मीडिया अपनी बारी आते ही सारी नैतिकता को भूल जाता है। कुछ दिन पहले जब भारत सरकार ने इंस्टाग्राम से चाइल्ड पोर्नोग्राफी हटाने के लिए अमेरिकी टेक कंपनी मेटा को एक नोटिस जारी किया तो ब्लूमबर्ग ने इस एक्शन की सराहना करने की जगह, इसे अपनी रिपोर्ट में Regulatory Headache बताया, जिसकी वजह से अब उन्हें गाली पड़ रही है।

मामला यह था कि भारत के आईटी मंत्रालय ने मेटा कंपनी को एक नोटिस भेजा था। इसमें इंस्टाग्राम पर बच्चों से जुड़ी अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री (Child Pornography) वाले विज्ञापनों को तुरंत हटाने और 7 दिनों के भीतर जवाब देने को कहा गया था।

इस सीधी और संक्षिप्त खबर को ब्लूमबर्ग ने ‘कानूनी सिरदर्द’ करार दिया और लिखा- “भारत ने मेटा कंपनी को इंस्टाग्राम से बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री हटाने को कहा है, जो इस अमेरिकी कंपनी के लिए एक नया नियामकीय सिरदर्द है।”

गौरतलब हो कि बच्चों का शोषण और उनसे जुड़ी अश्लील सामग्री कोई छोटा-मोटा कॉरपोरेट मसला नहीं है, बल्कि यह एक बेहद गंभीर और घिनौना अपराध है। ब्लूमबर्ग ने संवेदनहीनता दिखाते हुए इस गंभीर अपराध को ऐसे पेश किया जैसे ये कोई सामान्य बात है और भारत सरकार मेटा कंपनी को कोई बेवजह का काम देकर टेक कंपनी को परेशान कर रही हो।

उनकी इस करतूत ने जाने-अनजाने में बच्चों के साथ होने वाले अपराध से ध्यान भटकाकर पूरा फोकस इस बात पर डाल दिया कि मेटा कंपनी को कितनी ‘असुविधा’ हो रही है, जबकि हकीकत तो यह है कि कंपनी ऐसे घटिया विज्ञापनों से पैसे कमा रही थी।

ब्लूमबर्ग और खबर लिखने वाले पत्रकार ‘संकल्प भरतियाल’ को यह समझने की ज़रूरत है कि बाल यौन शोषण कल्पना से सबसे गंभीर अपराधों में से एक है। इस खबर से ब्लूमबर्ग की संपादकीय नीति और उनकी नैतिकता पर सीधे सवाल खड़े हुए हैं, जिसकी वजह से उन्हें लोगों का गुस्सा झेलना पड़ रहा है।

ब्लूमबर्ग की ऐसी असंवेदनशीलता पर सवाल उठाते हुए, एक भारतीय एक्स यूज़र ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए लिखा- “सिरदर्द? बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री को हटाना कहना आपके लिए एक सिरदर्द है?”

एक अन्य यूज़र ने सवाल किया, “सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से बाल यौन सामग्री को हटाना किसी अमेरिकी टेक दिग्गज के लिए रेगुलेटरी सिरदर्द क्यों होगा? क्या अमेरिका मेटा प्लेटफॉर्म्स पर बाल यौन सामग्री की अनुमति देता है?”

एक और एक्स यूज़र ने लिखा, “ब्लूमबर्ग की समस्या यह नहीं है कि मेटा के प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री मौजूद है- उनकी समस्या यह है कि भारत मेटा को इसे हटाने के लिए मजबूर कर रहा है। वे इस नैतिक जिम्मेदारी को ‘रेगुलेटरी हेडएक’ कहते हैं।

ब्लूमबर्ग का मानसिक स्तर गिर चुका है और वे अब ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे पीडोफिलिया कोई मुद्दा ही न हो।”

गौरतलब है कि ब्लूमबर्ग की यह हरकत देखकर ऐसा लगता है कि ने यह संवेदनहीनता उन्होंने सिर्फ इसलिए दिखाई क्योंकि यह मामला भारत के आदेश से जुड़ा था। और चूँकि ब्लूमबर्ग अक्सर अपने ओपिनियन वाले आर्टिकल के जरिए भारत विरोधी नैरेटिव चलाने के लिए पहले से ही बदनाम रहा है इसलिए इस बार भी हैरानी की बात नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया। मगर, दुखद यह है कि ब्लूमबर्ग पर ऐसी हरकतें अक्सर भारतीय मूल के लेखकों द्वारा करवाई जाती है।

FIFA World Cup: फुटबॉल की सबसे लंबी रात; नेमार की विदाई, हालांड का इतिहास और रोनाल्डो का इम्तिहान

आर्थर जी. लेविस ने अपने काव्य-संग्रह ‘Stub Ends of Thoughts and Verse’ में लिखा था, “It’s not the size of the dog in the fight, but the size of the fight in the dog.” अर्थात, जीत हमेशा आकार नहीं, बल्कि भीतर धधकते साहस और संघर्ष की भूख तय करती है।

बीते दिन खेले गए दो मुकाबलों ने इस विचार को मानो हरे मैदान पर सजीव कर दिया।

न्यू जर्सी स्टेडियम की रोशनी में एक ओर पाँच बार की विश्वविजेता ब्राज़ील थी, तो दूसरी ओर वाइकिंग्स की अदम्य विरासत अपने कंधों पर लिए नॉर्वे। कागज़ पर ब्राज़ील कहीं अधिक शक्तिशाली दिख रही थी, लेकिन फुटबॉल का इतिहास बार-बार याद दिलाता है कि मैदान पर प्रतिष्ठा नहीं, प्रदर्शन बोलता है।

कोच कार्लो एन्सेलोटी ने अपनी टीम को 4-2-3-1 की पारंपरिक संरचना में उतारा। मिडफ़ील्ड की धुरी पर अनुभवी कैसेमीरो के साथ ब्रूनो गुइमाराएज़ थे। उनके आगे विनीसियस जूनियर, गेब्रियल मार्टिनेली और रायान की तेज़तर्रार तिकड़ी विपक्षी रक्षा-पंक्ति को भेदने के लिए तैयार थी, जबकि आक्रमण की अगुवाई शानदार फॉर्म में चल रहे माथियूस कुन्हा कर रहे थे। लाखों प्रशंसकों की निगाहें एक बार फिर नेमार जूनियर को खोज रही थीं, लेकिन वह लगातार दूसरी बार शुरुआती एकादश का हिस्सा नहीं थे।

रेफ़री इस्माइल एलफ़ात की पहली सीटी के साथ ही मुकाबले का आगाज़ होता है। शुरुआती क्षणों से ही नॉर्वे ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह केवल बचाव करने नहीं आई है। मानो किसी मतवाले हाथी की ऊर्जा उनके पैरों में उतर आई हो। तीसरे ही मिनट में नॉर्वे ने एक खतरनाक आक्रमण रचा, लेकिन एलेक्सांडर सोरलोथ ऑफ़साइड करार दिए गए। उधर ब्राज़ील ने भी कुछ ही मिनटों में अपनी लय पकड़ ली। गेंद पर नियंत्रण बढ़ा, पासिंग की गति तेज़ हुई और रायान ने एक शानदार अवसर भी बनाया, मगर अंतिम स्पर्श उन्हें गोल का सुख नहीं दे सका।

बारहवें मिनट में मुकाबले का पहला बड़ा मोड़ आता है। नॉर्वे के पेनाल्टी बॉक्स में ब्राज़ील के एक खिलाड़ी को गलत टैकल से गिरा दिया जाता है और रेफ़री बिना देर किए पेनाल्टी स्पॉट की ओर इशारा कर देते हैं।

विनीसियस जूनियर गेंद उठाकर आगे बढ़ते हैं। पूरा स्टेडियम मानो उनकी ओर देख रहा था। तभी डगआउट से निर्देश आता है और पेनाल्टी लेने की ज़िम्मेदारी ब्रूनो गुइमाराएज़ संभाल लेते हैं।

लेकिन अगले ही पल न्यू जर्सी स्टेडियम गूँज उठता है।

पिछले मुकाबले के नायक ओर्हान नायलांड अपनी दाईं ओर बिजली-सी फुर्ती के साथ डाइव लगाते हैं और शानदार बचाव करते हुए ब्राज़ील की पेनाल्टी को गोल में बदलने से रोक देते हैं। यह केवल एक सेव नहीं थी; यह पूरे मुकाबले की मानसिक दिशा बदल देने वाला क्षण था। नॉर्वे का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ चुका था और ब्राज़ील पहली बार दबाव महसूस करती दिखाई दी।

इसके बाद खेल लगातार एक छोर से दूसरे छोर तक बहता रहा। ब्राज़ील की ओर से रायान और विनीसियस जूनियर लगातार नॉर्वे की रक्षापंक्ति को परखते रहे, जबकि दूसरी ओर अर्लिंग हालांड और कप्तान मार्टिन ओडेगार्द भी गोल की दिशा में कई प्रयास करते रहे। दोनों टीमें आक्रमण कर रही थीं, दोनों अवसर बना रही थीं, लेकिन गोल जैसे दोनों गोलपोस्टों से रूठ गया था।

पहले हाफ़ की समाप्ति पर स्कोरबोर्ड अब भी 0-0 ही दिखा रहा था।

दूसरे हाफ़ की शुरुआत के साथ ही नॉर्वे ने अपनी रणनीति में बदलाव किया। कोच सोलबाक्केन ने एंटोनियो नूसा और एलेक्सांडर सोरलोथ को बाहर बुलाकर आंद्रेस शेल्डेरुप और ऑस्कर बॉब को मैदान पर उतारा। जवाब में ब्राज़ील ने भी माथियूस कुन्हा की जगह युवा एंड्रिक को मौका दिया।

समय आगे बढ़ता गया और मुकाबला पहले से कहीं अधिक खुलने लगा। दोनों टीमें जीत की तलाश में लगातार जोखिम उठा रही थीं। ब्राज़ील गेंद पर अधिक नियंत्रण रख रही थी, जबकि नॉर्वे हर जवाबी हमले में खतरनाक दिख रही थी।
फिर भी घड़ी जब पैंसठवें मिनट तक पहुँची, स्कोर अब भी शून्य पर अटका हुआ था।

मैदान पर ऐसे खिलाड़ी मौजूद थे जो एक स्पर्श, एक दौड़ या एक शॉट से पूरे मुकाबले की कहानी बदल सकते थे। लेकिन फुटबॉल कभी-कभी धैर्य की भी परीक्षा लेता है; और इस रात, गोल अब भी दोनों टीमों की पहुँच से दूर था।

मुकाबले का अड़सठवाँ मिनट।

अचानक पूरा न्यू जर्सी स्टेडियम शोर से भर उठता है।

टचलाइन के पास एक परिचित चेहरा वार्म-अप समाप्त कर चौथे अधिकारी के साथ खड़ा था। वह खिलाड़ी, जिसे देखने के लिए करोड़ों लोग अब भी हर बार टीवी स्क्रीन के सामने बैठ जाते हैं।

एक गोल की तलाश में कोच कार्लो एन्सेलोटी आखिरकार अपना सबसे बड़ा दाँव चलते हैं।

गेब्रियल मार्टिनेली की जगह नेमार जूनियर मैदान पर उतरते हैं।

जैसे ही वह हरी घास पर कदम रखते हैं, स्टेडियम तालियों और नारों से गूँज उठता है। यह केवल एक बदलाव नहीं था; यह ब्राज़ील की आख़िरी उम्मीद थी।

लेकिन समय किसी का इंतज़ार नहीं करता।

पचहत्तरवें मिनट तक स्कोरबोर्ड अब भी 0-0 पर स्थिर था। हर बीतता सेकंड दोनों देशों के समर्थकों की धड़कनें और तेज़ कर रहा था। अब किसी भी टीम के लिए सबसे बड़ा भय एक लेट गोल था, वह गोल जो पूरे अभियान की दिशा बदल देता है।

और फिर…

उन्नासीवें मिनट में वही हुआ जिसकी कल्पना बहुत कम लोगों ने की थी।

बाएँ फ्लैंक पर स्थानापन्न खिलाड़ी आंद्रेस शेल्डेरुप गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं। बॉक्स के किनारे पहुँचकर वह एक सटीक पास अर्लिंग हालांड की ओर बढ़ाते हैं। हालांड अपने सामने खड़े ब्राज़ीली डिफेंडर को एक झटके में छकाते हैं, संतुलन बनाते हैं और अगले ही पल दाएँ पैर से गोल की दिशा में विस्फोटक प्रहार करते हैं।

एलिसन बेकर पूरी ताकत से डाइव लगाते हैं। लेकिन इस बार उनकी उँगलियाँ गेंद तक नहीं पहुँच पातीं।

गेंद जाल से टकराती है।

गोल।

नॉर्वे 1, ब्राज़ील 0।

कुछ क्षण पहले तक पीले रंग में डूबा न्यू जर्सी स्टेडियम अचानक मौन हो चुका था। यह केवल एक गोल नहीं था; यह उस आत्मविश्वास पर पहला गहरा प्रहार था जिसके सहारे ब्राज़ील मैदान में उतरी थी।

ब्राज़ील संभल भी नहीं पाई थी कि दस मिनट बाद नॉर्वे ने दूसरी चोट कर दी।

एक बार फिर बाएँ किनारे से आंद्रेस शेल्डेरुप ने शानदार क्रॉस उठाया। एक बार फिर गेंद अर्लिंग हालांड तक पहुँची। और एक बार फिर विश्व फुटबॉल के इस घातक स्ट्राइकर ने एलिसन बेकर को छकाते हुए गेंद को गोलपोस्ट के भीतर पहुँचा दिया।

नॉर्वे 2, ब्राज़ील 0।

ब्राज़ील के खिलाड़ियों के कंधे झुक चुके थे।

दर्शक-दीर्घा में बैठे लाखों समर्थकों के चेहरों से रंग उतर चुका था। दस मिनट पहले तक जो मुकाबला बराबरी पर था, वह अचानक ब्राज़ील की पकड़ से फिसल चुका था। निगाहें बार-बार डगआउट की ओर उठ रही थीं, लेकिन कार्लो एन्सेलोटी के पास भी इस तूफ़ान का कोई तत्काल उत्तर नहीं था।

फिर भी ब्राज़ील ने हार स्वीकार नहीं की।

हर आक्रमण के साथ वह वापसी की उम्मीद तलाशती रही। दूसरी ओर नॉर्वे अब अपने प्रत्येक खिलाड़ी के साथ केवल एक लक्ष्य लेकर खेल रही थी; किसी भी कीमत पर यह बढ़त बचानी है।

इंजरी टाइम चल रहा था।

90+8वें मिनट में नॉर्वे से एक चूक हो जाती है। अपने ही पेनाल्टी बॉक्स में किया गया फाउल रेफ़री इस्माइल एलफ़ात की नज़र से नहीं बचता और ब्राज़ील को पेनाल्टी मिल जाती है।

अब गेंद के पीछे खड़े थे नेमार जूनियर।

कंधों पर करोड़ों उम्मीदों का भार था, लेकिन यह भार उनके लिए नया नहीं था।

नेमार लंबी साँस लेते हैं।

दौड़ते हैं।

और सटीक प्रहार के साथ गेंद को गोलपोस्ट के भीतर पहुँचा देते हैं।

स्कोर अब 2-1 था।

उम्मीद अभी पूरी तरह मरी नहीं थी।

लेकिन फुटबॉल कभी-कभी आशा को केवल कुछ क्षणों का ही समय देता है।

दो मिनट बाद रेफ़री इस्माइल एलफ़ात अंतिम सीटी बजा देते हैं।

और उसी सीटी के साथ केवल ब्राज़ील का विश्व कप अभियान समाप्त नहीं होता।

उसके साथ समाप्त होता है एक ऐसे राजकुमार का अंतरराष्ट्रीय अध्याय भी, जो अपार प्रतिभा के बावजूद कभी विश्व फुटबॉल का ताज अपने सिर पर नहीं सजा सका।

कई प्रशंसकों को यह एहसास था कि शायद वे नेमार को आख़िरी बार विश्व कप में देख रहे हैं।

उनकी आँखें नम थीं।

ब्राज़ील के खिलाड़ी रो रहे थे।

दर्शक-दीर्घा में बैठे हज़ारों समर्थकों की आँखें भीग चुकी थीं।

उधर दूसरी ओर नॉर्वे इतिहास रच रही थी।

खिलाड़ी अपने समर्थकों के साथ विजय का उत्सव मना रहे थे। स्टेडियम में मौजूद अल्फ-इंगे हालांड अपने पुत्र को निहार रहे थे। जो सपना उनकी पीढ़ी पूरा नहीं कर सकी थी, उसे आज अर्लिंग हालांड ने साकार कर दिया था।

नॉर्वे ने पाँच बार की विश्व चैंपियन ब्राज़ील को पराजित कर क्वार्टर फ़ाइनल में प्रवेश कर लिया था।

यह केवल एक जीत नहीं थी; यह नॉर्वेजियन फुटबॉल के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखी जाने वाली रात थी।

ओस्लो की सड़कों पर उत्सव शुरू हो चुका था।

स्टेडियम में वाइकिंग क्लैप्स की गूँज दूर तक सुनाई दे रही थी।

मैच के बाद कोच स्टाले सोलबाक्केन ने कहा; यह नॉर्वेजियन फुटबॉल के इतिहास की सबसे महान रात है।

उधर अर्लिंग हालांड इस टूर्नामेंट में अपने सातवें गोल के साथ अब गोल्डन बूट की दौड़ में सबसे आगे निकल चुके थे।

मैच से पहले अधिकांश विशेषज्ञों ने ब्राज़ील की सहज जीत की भविष्यवाणी की थी। किसी ने 2-1 कहा, किसी ने 3-0।

लेकिन फुटबॉल भविष्यवाणियों से नहीं, मैदान पर लिखी गई कहानियों से याद रखा जाता है।

अपने सबसे घातक योद्धा अर्लिंग हालांड के दो गोल, ओर्हान नायलांड के अद्भुत बचाव और अंतिम क्षण तक अडिग रहे सामूहिक जज़्बे के दम पर नॉर्वे ने न केवल ब्राज़ील को पराजित किया, बल्कि विश्व फुटबॉल को यह भी याद दिला दिया कि साहस, अनुशासन और विश्वास जब एक साथ मैदान पर उतरते हैं, तब दिग्गज भी धराशायी हो जाते हैं।

लेकिन यह दिन अभी समाप्त नहीं हुआ था।

कुछ ही घंटों बाद, भारतीय समयानुसार सुबह साढ़े छह बजे, विश्व फुटबॉल की निगाहें मेक्सिको सिटी के ऐतिहासिक ऐज़्टेका स्टेडियम पर टिक गईं।

यहाँ मेज़बान मेक्सिको के सामने थी यूरोप की सबसे प्रबल दावेदारों में गिनी जाने वाली इंग्लैंड।

दर्शक-दीर्घा गहरे हरे रंग की जर्सियों से पट चुकी थी। हजारों मेक्सिकन समर्थक अपने पारंपरिक गीतों और नारों के साथ अपनी टीम का उत्साह बढ़ा रहे थे।

ऐज़्टेका; वह दुर्ग जिसने दशकों तक मेक्सिकन फुटबॉल की सबसे बड़ी जीतों का साक्षी बनकर इतिहास रचा है, आज एक और अविस्मरणीय अध्याय अपने भीतर दर्ज करने के लिए तैयार खड़ा था।

अब बारी थी दिन के दूसरे महासंग्राम की।

ऐज़्टेका स्टेडियम में अपनी पारंपरिक गहरे हरे रंग की जर्सी पहने मेक्सिको मैदान पर उतरती है। दूसरी ओर कप्तान हैरी केन के नेतृत्व में इंग्लैंड की ‘थ्री लायन्स’ पूरे आत्मविश्वास के साथ इतिहास की एक और सीढ़ी चढ़ने को तैयार थी।

रेफ़री की पहली सीटी बजती है।

और मुकाबला शुरू होते ही तनाव अपने चरम पर पहुँच जाता है।

पहले ही मिनट में इंग्लैंड के मिडफ़ील्डर डेक्लन राइस को पीला कार्ड दिखा दिया जाता है। तीसरे मिनट में राउल जिमिनेज़ इंग्लैंड के गोल पर पहला गंभीर हमला बोल देते हैं।

शुरुआती क्षणों से ही मेक्सिको ने इंग्लैंड की कमर कस दी थी।

गेंद पर नियंत्रण, तेज़ पासिंग और आक्रामक प्रेसिंग; हर विभाग में मेक्सिको इंग्लैंड से एक कदम आगे दिखाई दे रही थी। इंग्लिश खिलाड़ियों के पास गेंद पहुँचती भी तो अगले ही क्षण हरे रंग की जर्सियाँ उन्हें चारों ओर से घेर लेतीं और गेंद वापस अपने कब्ज़े में ले लेतीं।

ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा मुकाबला इंग्लैंड के आधे हिस्से में सिमट गया हो।

राउल जिमिनेज़ ने एक और शानदार अवसर बनाया, लेकिन इंग्लिश डिफेंस ने समय रहते ख़तरा टाल दिया। कुछ ही देर बाद गिल्बर्टो मोरा ने भी गोल की दिशा में दमदार प्रयास किया। पहले हाइड्रेशन ब्रेक तक इंग्लैंड किसी तरह स्कोरलाइन को 0-0 पर रोकने में सफल रही।

ब्रेक के बाद इंग्लैंड ने अपनी रणनीति बदली।

अब उनका लक्ष्य गेंद पर नियंत्रण नहीं, बल्कि जवाबी हमले थे। वे धैर्य के साथ मेक्सिको को आगे आने दे रहे थे ताकि गेंद छीनते ही बिजली की गति से पलटवार किया जा सके।

यही बदलाव आगे चलकर निर्णायक साबित होने वाला था।

एंथनी गॉर्डन ने एक तेज़ आक्रमण रचा, लेकिन उनका प्रयास लक्ष्य से बाहर चला गया। दूसरी ओर मेक्सिको भी बिना किसी भय के लगातार हमले करती रही।

फिर अचानक…

छत्तीसवें मिनट में बुकायो साका के सटीक पास पर ज्यूड बेलिंघम बॉक्स के भीतर पहुँचते हैं और गेंद को गोल में बदल देते हैं।

इंग्लैंड 1, मेक्सिको 0।

मेक्सिको अभी इस झटके से उबर भी नहीं पाई थी कि दो मिनट बाद बेलिंघम ने फिर वही कहानी दोहरा दी।

एक और शानदार मूव।

एक और सटीक फ़िनिश।

और देखते ही देखते स्कोर 2-0 हो चुका था।

जो टीम कुछ क्षण पहले तक पूरे मैच पर हावी थी, वह अचानक बैकफुट पर पहुँच गई थी। ऐज़्टेका की गूँज कुछ पल के लिए थम-सी गई।

लेकिन मेक्सिको ने हार मानना नहीं सीखा था।

सिर्फ पाँच मिनट बाद हूलियान क्विन्योनेस ने हवा में उछलती गेंद पर अद्भुत वॉली लगाई और इंग्लैंड की बढ़त आधी कर दी।

स्कोर 2-1।

ऐज़्टेका एक बार फिर जीवित हो उठा।

45+1वें मिनट में राउल जिमिनेज़ ने दूर से जोरदार प्रहार किया, लेकिन गेंद लक्ष्य से भटक गई। कुछ ही देर बाद उनका हेडर भी गोल में तब्दील नहीं हो सका। फिर एक कॉर्नर मिला, फिर एक अवसर बना, लेकिन बराबरी का गोल नहीं आया।

पहला हाफ़ इंग्लैंड की 2-1 की बढ़त के साथ समाप्त हुआ, मगर स्कोरलाइन यह नहीं बता पा रही थी कि मेक्सिको ने इस मुकाबले में कितनी ऊर्जा और साहस झोंक दिया था।

दूसरे हाफ़ का आगाज़ हुआ।

मेक्सिको ने फिर वही आक्रामक लय पकड़ ली।

और चौवनवें मिनट में मुकाबले का सबसे बड़ा मोड़ सामने आया।

एक ख़तरनाक टैकल के लिए जारेल क्वान्सा को सीधा रेड कार्ड दिखा दिया गया।

अब इंग्लैंड को शेष मुकाबला केवल दस खिलाड़ियों के साथ खेलना था।

मौका देखकर मेक्सिको ने दबाव और बढ़ा दिया। हूलियान क्विन्योनेस ने फिर गोल की ओर हमला बोला, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। उधर इंग्लैंड के कोच ने तुरंत सामरिक बदलाव करते हुए एक आक्रमणकारी खिलाड़ी को बाहर बुलाकर अतिरिक्त डिफेंडर मैदान पर उतार दिया।

लेकिन ठीक उसी समय मेक्सिको से एक ऐसी भूल हुई जिसकी कीमत उन्हें बहुत भारी पड़ने वाली थी।

सत्तावनवें मिनट में अपने ही पेनाल्टी बॉक्स के भीतर किया गया अनावश्यक फाउल इंग्लैंड के पक्ष में पेनाल्टी में बदल गया।

कप्तान हैरी केन गेंद के पीछे खड़े थे।

उन्होंने बिना कोई गलती किए गेंद को गोल में पहुँचा दिया।

इंग्लैंड 3, मेक्सिको 1।

जो संख्यात्मक बढ़त रेड कार्ड के कारण मेक्सिको को मिली थी, वह एक पल की असावधानी में लगभग निष्प्रभावी हो चुकी थी।

फिर भी मेक्सिको झुकी नहीं।

साठ मिनट के बाद एक बार फिर उसने लगातार आक्रमणों की झड़ी लगा दी।

और अड़सठवें मिनट में इस बार इंग्लैंड से चूक हुई।

हैरी केन अपने ही पेनाल्टी बॉक्स में मेक्सिको के खिलाड़ी को गिरा बैठते हैं और रेफ़री बिना हिचकिचाहट पेनाल्टी स्पॉट की ओर इशारा कर देते हैं।

राउल जिमिनेज़ आगे बढ़ते हैं।

एक शांत, सटीक और आत्मविश्वास से भरा प्रहार।

गेंद जाल में समा जाती है।

स्कोर अब 3-2 था।

ऐज़्टेका फिर गरज उठा।

अब दबाव पूरी तरह इंग्लैंड के कंधों पर था।

अगले बीस मिनट विश्व कप फुटबॉल के सबसे रोमांचक क्षणों में बदल गए।

मेक्सिको लगातार आक्रमण करती रही। हर पास, हर क्रॉस और हर शॉट के साथ स्टेडियम साँसें रोक लेता।

लेकिन दूसरी ओर जॉर्डन पिकफ़र्ड मानो दीवार बनकर खड़े थे।

उन्होंने एक के बाद एक कई ऐसे बचाव किए जो लगभग असंभव प्रतीत हो रहे थे।

दस खिलाड़ियों के साथ खेल रही इंग्लैंड ने अंतिम सीटी तक अनुशासन नहीं छोड़ा।

और अंततः वही अनुशासन उन्हें क्वार्टर फ़ाइनल का टिकट दिला गया।

इंग्लैंड 3, मेक्सिको 2।

मेक्सिको हार चुकी थी।

लेकिन यह उन हारों में से नहीं थी जिनमें सम्मान छिन जाता है।

वे लड़कर गिरे थे।

और शायद इसी कारण पूरे ऐज़्टेका ने अंतिम सीटी के बाद भी अपने खिलाड़ियों का सिर झुकने नहीं दिया।

विश्व कप के इतिहास में कुछ मुकाबले केवल परिणामों से नहीं, बल्कि अपने साहस, गति और भावनाओं से अमर हो जाते हैं।

यह भी उन्हीं में से एक था।

ज्यूड बेलिंघम के दो मिनट में आए दो गोल निर्णायक साबित हुए और ‘थ्री लायन्स’ क्वार्टर फ़ाइनल में पहुँच गई।

अब निगाहें अगले महासंग्राम पर टिक चुकी हैं।

आज रात डलास स्टेडियम में यूरोपीय फुटबॉल की दो महाशक्तियाँ; पुर्तगाल और स्पेन आमने-सामने होंगी।

यदि स्पेन विजयी होती है, तो संभव है कि फुटबॉल प्रेमी ठीक वैसे ही एक युग का अंत देखें, जैसा उन्होंने ब्राज़ील की हार के साथ नेमार के विदाई क्षणों में देखा।

क्या आज क्रिस्टियानो रोनाल्डो भी राष्ट्रीय टीम की जर्सी में अपना अंतिम मुकाबला खेलेंगे?

या फिर जीत के लिए सदैव भूखे रहने वाले रोनाल्डो एक बार फिर स्पेन जैसी दिग्गज टीम को टूर्नामेंट से बाहर का रास्ता दिखाकर अपने सफ़र को आगे बढ़ाएँगे?

याद रहे, स्पेन मौजूदा यूरोपीय चैंपियन है, लेकिन पुर्तगाल ने इसी स्पेन को यूईएफ़ए नेशन्स लीग के फ़ाइनल में पेनाल्टी शूटआउट में हराकर ट्रॉफी अपने नाम की थी।

इतिहास, प्रतिद्वंद्विता और दिग्गजों का यह टकराव; हर मायने में एक फ़ाइनल जैसा होने वाला है।

इसके बाद कल सुबह साढ़े पाँच बजे सिएटल में मेज़बान अमेरिका का सामना शानदार लय में चल रही बेल्जियम से होगा।

लेकिन उससे पहले…

पूरी दुनिया की निगाहें आज रात साढ़े बारह बजे डलास पर टिकी होंगी।

क्या यह क्रिस्टियानो रोनाल्डो की आख़िरी रात होगी?

या फिर एक बार फिर इतिहास उनके पक्ष में झुक जाएगा?

इस प्रश्न का उत्तर देगा केवल मैदान। यही रात अंतिम। यही रात भारी।

दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’ पर फैलाया जा रहा ‘अर्धसत्य’: इसे कानूनी वजहों से ZEE5 ने हटाया, सरकार ने नहीं लगाया कोई बैन; जानिए पूरा मामला

करीब चार साल की देरी और तीन बार नाम बदलने के बाद हनी त्रेहान की मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी फिल्म रिलीज हुई। पहले इस फिल्म का नाम घल्लूघारा था, फिर इसे पंजाब ’95 और औखिर में सतलुज नाम दिया गया। दिलजीत दोसांझ इस फिल्म में मुख्य किरदार निभा रहे हैं।

फिल्म को ZEE5 पर भारत और दुनिया के दूसरे देशों में एक साथ रिलीज किया गया। लेकिन रिलीज होने के सिर्फ दो दिन बाद ही इसे भारत में ZEE5 से हटा दिया गया, जबकि दूसरे देशों में यह फिल्म पहले की तरह उपलब्ध रही। ZEE5 ने फिल्म हटाने की वजह बताते हुए सिर्फ इतना कहा कि यह फैसला ‘मौजूदा परिस्थितियों’ को देखते हुए लिया गया है।

आम धारणा के उलट, यह फिल्म किसी सरकारी बैन या आधिकारिक रोक की वजह से नहीं हटाई गई। इसकी असली वजह भारत के इंटरनेट नियमों का एक कम चर्चित प्रावधान है। इस नियम पर फिलहाल अदालत के आदेशों के कारण पूरी तरह अमल नहीं हो रहा है। ऐसे में जब किसी तरह का कानूनी सवाल उठता है, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म अक्सर सावधानी बरतते हुए कंटेन्ट को हटा देते हैं।

ZEE5 ने साफ कहा कि वह इस फिल्म का समर्थन करता है और इसे दोबारा प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए सभी जरूरी कानूनी और दूसरे विकल्पों पर काम कर रहा है। इससे यह साफ होता है कि यह मामला सीधे तौर पर सेंसरशिप का नहीं, बल्कि डिजिटल कंटेन्ट से जुड़े कानूनी नियमों की जटिल प्रक्रिया का है।

यानी जिस फिल्म को कई साल इंतजार के बाद आखिरकार दर्शक मिले थे, वह एक बार फिर लोगों की नजरों से ओझ हो गई। लेकिन इसकी वजब किसी सरकार की रोक नहीं, बल्कि अधूरे और उलझे हुए कानूनी नियम बने।

तीन साल और 127 बदलाव

फिल्म की मुश्किलें 2022 के आखिर में ही शुरू हो गई थीं, जब RSVP ने इसे केंद्रीय फिल्म प्रमाण बोर्ड (CBFC) के पास सर्टिफिकेट के लिए भेजा। करीब 6 महीने चली प्रक्रिया के बाद बोर्ड ने 21 बदलाव (कट) औऱ फिल्म का नाम बदलने की शर्त पर इसे मंजूरी दी। बोर्ड का कहना था कि फिल्म के कुछ दृश्य हिंसा को बढ़ावा दे सकते हैं या सिख युवाओं पर गलत असर डाल सकते हैं।

इसके बाद RSVP ने इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद माँगे गए बदलावों की संख्या बढ़कर 127 तक पहुँच गई। फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान ने बाद में यह जानकारी साझा की।

बोर्ड ने फिल्म के नाम से ‘पंजाब’ शब्द हटाने की भी माँग की, जबकि पूरी कहानी पंजाब में ही दिखाई गई है। इसके अलावा पंजाब पुलिस का जिक्र हटाने और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का नाम न लेने की भी बात कही गई। हनी त्रेहान ने इन माँगों को इतिहास के कुछ हिस्सों को मिटाने की कोशिश बताया।

इसी लंबे विवाद के बीच 2023 में फिल्म का टोरोंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में होने वाला वर्ल्ड प्रीमियर भी रद्द हो गया। मीडिया रिपोर्ट्स में इसके पीछे राजनीतिक कारणों को जिम्मेदार बताया गया।

असल सवाल: IT नियम 2021 का नियम 9 क्या कहता है और यह अब तक लागू क्यों नहीं हो पाया?

सतलुज फिल्म के रिलीज और हटने की कहानी सीधे सेंसरशिप से ज्यादा भारत के डिजिटल कंटेन्ट से जुड़े नियमों को समझने की कहानी है। भारत में किसी फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज करने से पहले CBFC से सर्टिफिकेट लेना जरूरी होता है। यह नियम सिनेमैटोग्राफ नियम, 1952 के तहत लागू है। लेकिन OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने वाली फिल्मों और वेब सीरीज के लिए CBFC का सर्टिफिकेट जरूरी नहीं है।

दिसंबर 2025 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने लोकसभा में भी साफ किया था कि CBFC की जिम्मेदारी केवल सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली फिल्मों तक सीमित है। OTT प्लेटफॉर्म पर आने वाले कंटेन्ट पर CBFC नियम लागू नहीं होते।

OTT प्लेटफॉर्म पर आने वाले कंटेन्ट के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 लागू होते हैं। इनमें सबसे अहम नियम 9 है। नियम 9 के तहत OTT प्लेटफॉर्म को तय की गई आचार संहिता का पालन करना होता है। वहीं नियम 9(3) यह बताता है कि इन नियमों का पालन कैसे कराया जाएगा। इसके लिए तीन स्तर की स्व-नियमन (Self-Regulation) व्यवस्था बनाई गई है।

पहला स्तर: OTT प्लेटफॉर्म खुद शिकायतों की सुनवाई करता है। इसके लिए हर प्लेटफॉर्म को अपना शिकायत निवारण अधिकारी (Grievance Officer) नियुक्त करना होता है।
दूसरा स्तर: अगर मामला वहीं नहीं सुलझता, तो उसे उद्योग के स्व-नियामक संगठन (Self-Regulating Body) के पास भेजा जाता है।
तीसरा स्तर: इसके बाद भी जरूरत पड़ने पर मामला सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की अंतर-विभागीय निगरानी समिति के पास जाता है।

यह तीन स्तरीय व्यवस्था तय करती है कि OTT प्लेटफॉर्म अपने कंटेन्ट को कैसे जारी करेंगे और जरूरत पड़ने पर उसे हटाने या उस पर कार्रवाई करने का फैसला कैसे लिया जाएगा।

लेकिन सबसे अहम बात यह है कि IT नियम 2021 का नियम 9 लागू होने के कुछ ही दिनों बाद अदालत ने उस पर अंतरिम रोक लगा दी थी। 14 अगस्त 2021 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने नियम 9(1) और 9(3) पर रोक लगा दी। यह मामला पत्रकार निखिल वागले और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘द लीफलेट’ की ओर से दायर किया गया था। अदालत ने शुरुआती सुनवाई में माना कि इन नियमों में शामिल आचार संहिता संविधान के खिलाफ हो सकती है और केंद्र सरकार को IT कानून के तहत ऐसे नियम बनाने का अधिकार भी नहीं हो सकता।

इसके कुछ हफ्तों बाद मद्रास हाई कोर्ट ने भी इसी तरह की रोक लगाई और कहा कि बॉम्बे हाई कोर्ट का आदेश पूरे देश में लागू माना जाएगा।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2024 में इस नियम से जुड़े सभी मामलों को एक साथ सुनवाई के लिए दिल्ली हाई कोर्ट भेज दिया। वहाँ नवंबर 2024 से सुनवाई शुरू हुई, लेकिन अब तक इस मामले में अंतिम फैसला नहीं आया है। यानी नियम 9 को बने हुए लगभग पूरा समय बीत चुका है, लेकिन उस पर लगी अदालत की रोक अभी भी जारी है। इसके बावजूद केंद्र सरकार संसद में अब भी इन्हीं नियमों को भारत में OTT प्लेटफॉर्म के लिए लागू व्यवस्था बताती रही है।

सीधे शब्दों में कहें तो जिस नियम 9 के तहत OTT प्लेटफॉर्म अपने कंटेन्ट का खुद वर्गीकरण (Self-Certification) करते हैं और शिकायत मिलने पर उसे हटाने जैसी कार्रवाई कर सकते हैं, वही नियम कई वर्षों से अदालत में चुनौती के दायरे में है और उस पर अंतरिम रोक लगी हुई है।

यानी सतलुज जिस कानूनी व्यवस्था के तहत OTT पर रिलीज हुई थी, उसी व्यवस्था के तहत बाद में उसे प्लेटफॉर्म से हटा भी दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया ऐसे नियमों के आधार पर हुई, जिनकी वैधता पर पिछले करीब पाँच साल से अदालतों में सुनवाई चल रही है और जिन पर अब तक अंतिम फैसला नहीं आया है।

फिल्म हटाने का फैसला ZEE5 का था, सरकार का नहीं

सतलुज के निर्माताओं ने फिल्म का पूरा और बिना किसी कट वाला संस्करण पहले ही दिन दुनिया भर में ZEE5 पर रिलीज करने का फैसला किया। उन्होंने फिल्म में और बदलाव करने के बजाए इसे उसी रूप में दर्शकों तक पहुँचाया, जैसा इसे पहले अलग-अलग फिल्म समारोहों में दिखाया गया था।

निर्माताओं का मकसद साफ था। वे चाहते थे कि दुनिया भर के दर्शक फिल्म को बिना किसी बदलाव के देख सकें, इससे पहले कि किसी तरह के नए दबाव के कारण इसमें और कट लगाने पड़ें। यह इसलिए भी अहम था क्योंकि फिल्म के आखिर में जसवंत सिंह खालड़ा की पुलिस हिरासत में हत्या को दिखाया गया है। अगर इस हिस्से में बदलाव किया जाता, तो फिल्म का मुख्य संदेश कमजोर पड़ जाता।

हालाँकि, रिलीज के सिर्फ दो दिन बाद ZEE5 ने फिल्म को भारत में अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया। प्लेटफॉर्म ने हटाने की कोई साफ वजह नहीं बताई, लेकिन कहा कि वह तय कानूनी प्रक्रिया के तहत फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहा है।

अब तक इस मामले में सरकार की ओर से फिल्म हटाने का कोई आधिकारिक आदेश सामने नहीं आया है। यानी फिल्म को हटाने का फैसला ZEE5 ने अपनी आतंरिक शिकायत और स्व-नियमन प्रक्रिया के तहत लिया। यही वह कानूनी व्यवस्था है, जिस पर कई वर्षों से अदालत में सुनवाई चल रही है और जिस पर अभी भी अंतरिम रोक लगी हुई है।

रिकॉर्ड क्या कहते हैं?

फिल्म जिस मुद्दे को उठाती है, उसका सबसे बड़ा सवाल यह है कि पंजाब में लापता हुए लोगों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन था? इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है। उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि इस कहानी के दो पहलू हैं और दोनों को समझना जरूरी है।

जसवंत सिंह खालड़ा, जो अमृतसर में एक बैंक मैनेजर थे, उन्होंने श्मशान घाटों में खरीदी गई लकड़ियों के रिकॉर्ड की जाँच की। इसी आधार पर उन्होंने दावा किया कि कई अज्ञात लोगों के शवों को गैरकानूनी तरीके से अंतिम संस्कार किया गया था। सितंबर 1995 में पंजाब पुलिस ने उनका अपहरण कर लिया और बाद में उनकी हत्या कर दी। इस मामले में 6 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

CBI की दिसंबर 1996 की रिपोर्ट में भी कहा गया कि केवल अमृतसर जिले में ही 2,097 लोगों का गैरकानूनी तरीके से अंतिम संस्कार किया गया था। इनमें से 582 लोगों की पहचान हो गई थी, जबकि 278 लोगों की आंशिक पहचान हो सकी थी।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया। अदालत ने इस मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के पास भेजा। इसके बाद 2006 तक 1245 पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया गया।

लेकिन यह कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है। दूसरी ओर, पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियान ऐसे समय चला, जब करीब एक दशक तक खालिस्तानी उग्रवाद ने राज्य में भारी हिंसा फैलाई थी। पुलिस अधिकारी केपीएस गिल के अनुसार, इस हिंसा में करीब 21,469 लोगों की जान गई। इनमें लगभग 11,700 आम नागरिक थे, जिन्हें खालिस्तानी उग्रवादी संगठनों ने मार डाला। मरने वालों में हजारों सिख और करीब 4,500 हिंदू भी शामिल थे।

Human Rights Watch की रिपोर्ट भी इन दोनों पहलुओं का जिक्र करती है। रिपोर्ट के अनुसार, एक तरफ खालिस्तानी संगठनों ने आम लोगों की हत्याएँ और राजनीतिक नेताओं पर हमले किए। वहीं दूसरी तरफ 1984 से 1995 के बीच सरकारी कार्रवाई के दौरान कई लोगों को बिना कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में लिया गया, उनके साथ यातनाएँ हुईं और हजारों लोग लापता हो गए।

यानी अगर कोई फिल्म या लेख सिर्फ एक पक्ष दिखाता है, तो जरूरी नहीं कि वह गलत हो। लेकिन वह पूरी कहानी भी नहीं बता रहा होता। इस पूरे दौर को समझने के लिए दोनों पक्षों को साथ देखकर ही सही तस्वीर सामने आती है।

निष्कर्ष

अगर कोई कहता है कि सतलुज पर सरकार ने बैन लगा दिया, तो पूरी सच्चाई इससे थोड़ी अलग है। अब तक ऐसे कोई जानकारी सामने नहीं आई है कि सरकार ने फिल्म पर आधिकारिक रोक लगाई हो। फिल्म पहले IT नियम, 2021 के नियम 9 के तहत OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई और बाद में उसी व्यवस्था के तहत उसे हटा भी दिया गया। खास बात यह है कि इसी नियम पर 2021 से अदालतों में सुनवाई चल रही है और इसकी वैधता पर अब तक अंतिम फैसला नहीं आया है।

फिल्म के निर्माताओं रॉनी स्क्रूवाला की कंपनी RSVP Movies और MacGuffin Pictures ने पहले ही दिन का पूरा और बिना किसी कट वाला संस्करण ZEE5 के अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर रिलीज कर दिया था। इसलिए भारत में फिल्म हटने के बाद भी दुनिया के कई देशों में दर्शक इसे देख सकते थे।

कुल मिलाकर, पाँच साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद IT नियम 2021 के नियम 9 की कानूनी स्थित अब भी पूरी तरह साफ नहीं है। इसके बावजूद OTT प्लेटफॉर्म और कंटेन्ट बनाने वाले इसी व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

बाबू जगजीवन राम: वो दलित नेता जिन्हें कॉन्ग्रेस और लेफ्ट से कभी उनका हक नहीं मिला, क्योंकि वे हिंदू धर्म से नहीं करते थे नफरत

आज देश के पूर्व उप-प्रधानमंत्री और महान दलित नेता बाबू जगजीवन राम की पुण्यतिथि है। भारतीय राजनीति के इतिहास में ‘बाबूजी’ के नाम से मशहूर जगजीवन राम एक ऐसे अद्वितीय और कद्दावर नेता थे, जिन्होंने लगभग आधी सदी तक देश की मुख्यधारा की राजनीति और नीति-निर्धारण में केंद्रीय भूमिका निभाई। लेकिन यह भारतीय इतिहास की एक बड़ी विडंबना है कि दलित अधिकारों और सामाजिक समरसता के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले इस नेता को न तो कॉन्ग्रेस ने वह ऐतिहासिक स्थान दिया जिसके वे हकदार थे, और न ही देश के वामपंथी (लेफ्ट) विचारकों ने उन्हें कभी खुलकर अपनाया।

आइए बाबू जगजीवन राम की पुण्यतिथि पर समझते हैं कि छुआछूत और सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़ाई में बाबूजी और डॉ. आंबेडकर के रास्तों में क्या बुनियादी अंतर था और क्यों बाबूजी को इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।

छुआछूत बनाम जाति के मामले में दोनों नेताओं की वैचारिक समझ का अंतर

बाबू जगजीवन राम और डॉ. भीमराव आंबेडकर दोनों का अंतिम लक्ष्य एक ही था दलितों और शोषितों को समाज में समानता, सम्मान और अधिकार दिलाना। लेकिन इस बीमारी के कारणों और उसके इलाज को लेकर दोनों की समझ में गहरा अंतर था। बाबू जगजीवन राम छुआछूत को हिंदू समाज की एक विकृति या सामाजिक समस्या मानते थे। उनका मानना था कि समय के साथ हिंदू समाज में कुछ कुरीतियाँ और पाप प्रवेश कर गए हैं, जिन्हें दूर किया जा सकता है।

इसके विपरीत डॉ. आंबेडकर जाति प्रथा को केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि हिंदू धर्म के धार्मिक ग्रंथों और उसके सामाजिक ढाँचे का अभिन्न हिस्सा मानते थे। आंबेडकर का मानना था कि जब तक इस ढाँचे को पूरी तरह चुनौती नहीं दी जाएगी, तब तक सामाजिक न्याय संभव नहीं है।

इसी वैचारिक अंतर के कारण दोनों के कार्य करने के तरीकों में भी भिन्नता आई। बाबूजी का दृढ़ विश्वास था कि हिंदू समाज के भीतर रहकर ही इस सामाजिक बुराई के खिलाफ लड़ना सबसे प्रभावी तरीका है। वे गाँधी-नेहरू विचारधारा से प्रभावित थे और मानते थे कि व्यापक समाज को साथ लिए बिना स्थाई बदलाव नहीं आ सकता। वहीं आंबेडकर का मानना था कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था के भीतर दलितों को कभी भी पूर्ण समानता नहीं मिल सकती, इसलिए वे कानून, संविधान और स्वतंत्र आंदोलनों के जरिए व्यवस्था परिवर्तन के पैरोकार थे।

धर्म परिवर्तन पर था अलग दृष्टिकोण, ‘सनातन पहचान’ बनाम ‘बौद्ध धम्म’ का रास्ता

दोनों नेताओं के बीच सबसे बड़ा और स्पष्ट वैचारिक टकराव धार्मिक पहचान और धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर था। सोशल मीडिया पर अक्सर जगजीवन राम के ऐतिहासिक भाषणों और बयानों से जुड़ी कतरनें चर्चा का विषय बनती हैं, जो वास्तव में उनके गहरे धार्मिक और राष्ट्रीय स्वाभिमान को रेखांकित करती हैं। अकादमिक शोध पत्रों से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस वैचारिक संघर्ष के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।

Reassessing Religion and Politics in the Life of Jagjivan Rām नाम के रिसर्च पेपर में दर्ज विवरणों के अनुसार, बाबू जगजीवन राम ने 1931 में पटना में ‘अछूतोद्धार सभा’ के एक सम्मेलन में (जहाँ मुख्य अतिथि डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे) एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक भाषण दिया था। जगजीवन राम ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि सवर्ण हिंदुओं द्वारा दलितों को मांस छोड़ने, शराब छोड़ने और पवित्र जीवन जीने के उपदेश देने का समय अब चला गया है। अब दलितों को उपदेश नहीं, बल्कि उचित व्यवहार और ठोस कार्रवाई की जरूरत है।

जगजीवन राम ने कहा था कि मोहम्मद अली जिन्ना मुसलमानों के लिए अलग देश की माँग कर रहे हैं और डॉ. आंबेडकर अलग निर्वाचन क्षेत्र के लिए आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन मैं किसी भी प्रकार के धार्मिक धर्मांतरण के खिलाफ हूँ। हम अछूत हिंदू हैं, हम हिंदू पैदा हुए हैं, हिंदू रहेंगे और हिंदू ही मरेंगे। हमने इस राष्ट्र का निर्माण किया है; हम राष्ट्र द्वारा निर्मित नहीं हुए हैं, यह राष्ट्र हमारा है।

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिसर्च पब्लिकेशन एंड रिव्यूज में प्रकाशित प्रगति पटेल के शोधपत्र – ‘एंपॉवरमेंट ऑफ द बैकवर्ड क्लासेस: कॉन्ट्रिब्यूशन ऑफ बाबू जगजीवन राम’ को पढ़ें तो उसमें साफ लिखा है कि जगजीवन राम का मानना था कि किसी दूसरे धर्म में चले जाना जातिवाद की बीमारी से मुक्ति पाने का सही तरीका नहीं है, क्योंकि जातिगत भेदभाव का जाल कमोबेश हर धर्म में फैल चुका है। उनका मानना था कि अपने मूल धर्म को छोड़ना एक तरह से समस्या से भागने जैसी कायरता है; बहादुरी इसमें है कि आप समाज के भीतर रहकर बुराइयों से लड़ें और उसे सुधारें।

मुख्यधारा की राजनीति बनाम स्वतंत्र दलित नेतृत्व वाली राजनीति का रास्ता

बाबू जगजीवन राम और डॉ आंबेडकर को राजनीतिक रणनीति के मामले में देखें, तो इसमें भी दोनों दिग्गजों के रास्ते पूरी तरह अलग थे। बाबू जगजीवन राम चाहते थे कि दलित समाज देश की मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बने। इसी सोच के तहत वे भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस में शामिल हुए और अखिल भारतीय शोषित वर्ग लीग (All India Depressed Classes League) के माध्यम से दलित युवाओं को संगठित किया। उनका मानना था कि सत्ता और शासन के शीर्ष पर बैठकर देश की मुख्यधारा के साथ मिलकर नीतियाँ बनाने से दलितों का अधिक भला होगा।

इसके विपरीत डॉ. आंबेडकर एक स्वतंत्र दलित राजनीतिक नेतृत्व और स्वतंत्र राजनीतिक दलों के गठन के पैरोकार थे। उनका मानना था कि मुख्यधारा के दलों में शामिल होकर दलित नेता अपनी स्वतंत्र आवाज खो देते हैं और सवर्ण नेतृत्व के अधीन हो जाते हैं।

बाबूजी का अनूठा ‘रेलवे प्रयोग’, मानसिकता बदलने की एक अनूठी सोशल इंजीनियरिंग

बाबू जगजीवन राम केवल बातों के बैरिस्टर नहीं थे, वे एक बेहद कुशल और व्यावहारिक प्रशासक थे। जब वे देश के रेल मंत्री बने, तो उन्होंने छुआछूत की मानसिकता पर चोट करने के लिए एक ऐसा क्रांतिकारी और व्यावहारिक कदम उठाया जो भारतीय प्रशासनिक इतिहास में अमर है। आमतौर पर आरक्षण या सकारात्मक भेदभाव को केवल सरकारी नौकरियों या उच्च पदों तक सीमित देखा जाता है, लेकिन बाबूजी ने इंसानी स्वभाव और मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर एक अनोखा आरक्षण लागू किया। उन्होंने रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को मुफ्त पानी पिलाने (Watermen) के पदों पर बड़े पैमाने पर दलितों की भर्ती करने का आदेश दिया।

यह एक बेहद गहरा और रणनीतिक कदम था। भारत की झुलसा देने वाली तपती गर्मी में जब कोई सवर्ण यात्री प्यास से व्याकुल होता, तो उसके सामने दो ही रास्ते होते या तो वह छुआछूत के अपने अहंकार को छोड़कर उस दलित कर्मचारी के हाथ से पानी पी ले और अपनी जान बचाए या फिर प्यासा तड़पता रहे।

इस प्रयोग ने सवर्ण समाज की उस मानसिकता पर सीधा प्रहार किया जो दलितों को छूने तक से कतराती थी। जब लोगों ने प्यास के मारे तड़पते हुए दलितों के हाथों से पानी पीना शुरू किया, तो सदियों पुरानी छुआछूत की मानसिक दीवारें अपने आप ढहने लगीं। यह एक क्रांतिकारी कदम था, लेकिन इसमें आंबेडकर के दृष्टिकोण की तरह कोई कटुता या शत्रुता नहीं थी। यह समाज को बिना तोड़े, उसकी बुनियादी इंसानी जरूरत के जरिए सुधारने का एक बेजोड़ तरीका था।

संत परंपरा और ‘बेगमपुरा’ की परिकल्पना जैसी आध्यात्मिक ताकत

वामपंथी और आधुनिक सेक्युलर विचारक अक्सर बाबू जगजीवन राम को केवल एक धर्मनिरपेक्ष राजनेता के रूप में देखते हैं, लेकिन अकादमिक शोध बताते हैं कि बाबूजी के राजनीतिक विचार उनकी गहरी धार्मिक और आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े थे। बाबूजी का परिवार ‘शिव नारायणी’ संत परंपरा से जुड़ा था और वे स्वयं मध्यकालीन दलित संत गुरु रविदास के बहुत बड़े भक्त और अनुयायी थे।

साल 1980 में आई अपनी पुस्तक ‘Caste Challenge in India’ में बाबूजी ने लिखा था कि भारत में बुद्ध से लेकर कबीर, नानक, रविदास, एकनाथ, तुकाराम और महात्मा गाँधी जैसे संतों ने हमेशा भगवान के सामने सभी मनुष्यों की समानता की बात की। बाबूजी का मानना था कि जातिवाद को खत्म करने के लिए तीनतरफा हमले की जरूरत है, जिसमें कानून, आर्थिक विकास और आरक्षण शामिल हैं।

साल 1986 में अपने निधन से कुछ समय पहले उन्होंने ‘रविदास’ पत्रिका में एक बेहद प्रभावशाली लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था- “ईश्वर के अंशधरों के प्रतीक के रूप में गुरु रविदास”। इस लेख में उन्होंने गुरु रविदास के प्रसिद्ध पद ‘बेगमपुरा’ (गम से रहित शहर) का जिक्र किया था।

‘बेगमपुरा’ एक ऐसे आदर्श समाज की परिकल्पना है जहाँ कोई दुःख, चिंता या डर न हो, कोई टैक्स या भेदभाव न हो और सभी लोग बराबर हों तथा किसी को भी कहीं भी आने-जाने से न रोका जाए।

जगजीवन राम ने कबीर, नामदेव और रविदास के दोहों का हवाला देते हुए यह साबित किया कि भारतीय अध्यात्म और संत परंपरा में पहले से ही ऊँच-नीच और धार्मिक कट्टरता के खिलाफ बेहद मजबूत विद्रोह मौजूद रहा है। वे इसी उदारवादी, समतावादी और समावेशी हिंदू संत परंपरा के बल पर समाज को बदलना चाहते थे, न कि पश्चिमी सिद्धांतों या धर्म-विरोधी विचारों के सहारे।

कॉन्ग्रेस और लेफ्ट ने क्यों नहीं दिया बाबूजी को उनका हक?

इतने विशाल व्यक्तित्व, दूरदर्शी सोच और देश के सबसे लंबे समय तक कैबिनेट मंत्री रहने वाले नेता को इतिहास में वह गौरवशाली स्थान क्यों नहीं मिला जो डॉ. आंबेडकर या अन्य नेताओं को मिला?

इसके पीछे साफ तौर पर राजनीतिक और वैचारिक कारण थे। पहली वजह कॉन्ग्रेस की बेरुखी थी, जो उनके इंदिरा गाँधी से विद्रोह के बाद पैदा हुई। बाबू जगजीवन राम दशकों तक कॉन्ग्रेस के संकटमोचक रहे। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय वे देश के रक्षा मंत्री थे, जब भारत ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। लेकिन 1977 में आपातकाल के बाद बाबूजी ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए इंदिरा गाँधी के खिलाफ विद्रोह कर दिया। उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़कर ‘कॉन्ग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ बनाई और जनता पार्टी की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई। कॉन्ग्रेस इस विद्रोह को कभी पचा नहीं पाई, जिसके कारण बाद के वर्षों में कॉन्ग्रेस के इतिहास और प्रचार-प्रसार से बाबूजी के योगदान को धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिया गया।

दूसरी वजह लेफ्ट यानी वामपंथ द्वारा उनकी उपेक्षा की जानी थी, जिसका कारण उनका हिंदू धर्म से नफरत न करना था। भारत के वामपंथी और प्रगतिशील विचारकों ने हमेशा उसी दलित विमर्श को बढ़ावा दिया जो हिंदू धर्म, उसके ग्रंथों और उसकी संस्कृति के प्रति आक्रामक या पूरी तरह शत्रुतापूर्ण रुख रखता था।

चूँकि बाबू जगजीवन राम गर्व से खुद को हिंदू कहते थे, कबीर-रविदास की परंपरा पर गर्व करते थे और हिंदू समाज के भीतर से सुधार के पैरोकार थे, इसलिए लेफ्ट ने उन्हें कभी अपना प्रतीक पुरुष नहीं माना। वामपंथी बुद्धिजीवियों के लिए बाबूजी का यह रुख उनकी वैचारिक लाइन में फिट नहीं बैठता था।

हिंदू धर्म से नफरत न करने के चलते भुला दिए गए बाबू जगजीवन राम?

आज जब हम बाबू जगजीवन राम को उनकी पुण्यतिथि पर याद करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता कि डॉ. आंबेडकर और बाबूजी के बीच का अंतर किसी वैमनस्य का नहीं, बल्कि दो महान शख्सियतों के बीच का अकादमिक और रणनीतिक मतभेद था। दोनों ही नेता अपने समाज को न्याय दिलाना चाहते थे। आंबेडकर का रास्ता संवैधानिक, कानूनी और अंततः धर्मांतरण का था, तो बाबूजी का रास्ता व्यावहारिक प्रशासन, मुख्यधारा की राजनीति और देश की मूल संत-संस्कृति के भीतर रहकर हृदय-परिवर्तन कराने का था।

बाबूजी को केवल इसलिए भुला दिया जाना कि वे हिंदू धर्म से नफरत नहीं करते थे या उन्होंने एक समय पर राजनीतिक सत्ता को चुनौती दी थी, इस महान राष्ट्र नायक के साथ सरासर अन्याय है। समय आ गया है कि देश के इस सच्चे, निडर और व्यावहारिक सपूत को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इतिहास की पाठ्यपुस्तकों और जनमानस में उनका वास्तविक और उचित स्थान दिया जाए।

खंजर से चीरी कोख, निर्वस्त्र की गई बहन… सब भूल जाओ, जिया की चाँद बाली पर लिखो नज्म: पढ़िए Arfa Khanum को क्यों भायी इम्तियाज अली की ‘मैं वापस आऊँगा’

घर की माँ-बहन-बेटी का चाहे बलात्कार हो जाए, गर्भवतियों की कोख चीर दी जाए, चाहे एक साथ सारी महिलाएँ अपना गला खुद रेतने को मजबूर हो जाएँ… लेकिन आपकी स्मृति में रहनी चाहिए एक मुस्लिम लड़की की चाँद बालियाँ, उसके प्रेम में लिखी गई सिख लड़के की नज्म और लाहौर के सरगोधा की गलियाँ…

यही मकसद है 12 जून को पर्दे पर आई इम्तियाज अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ का। इस फिल्म में कलाकार के तौर पर दिलजीत दोसांझ, नसीरुद्दीन शाह मुख्य कलाकार हैं। फिल्म कैसी है इसका अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि इसकी तारीफ करने वालों में एक नाम आरफा खानम शेरवानी जैसों का भी है जिन्हें ये फिल्म विभाजन के जख्मों पर मरहम लगाने वाली एक ‘कविता’ जैसी लगती है।

आरफा इस फिल्म को देखकर रोने लगती हैं क्योंकि उनसे ये नहीं देखा जाता है कि कैसे इतने समय बाद पर्दे पर कीनू की कहानी के रूप में उनके नैरेटिव का कंटेंट आया है।

इंटरनेट पर फिल्म के बारे में पढ़ने चलेंगे तो पता चलेगा इम्तियाज अली ने कहने को ये फिल्म विभाजन के दर्द को बयाँ करते हुए बनाई है, लेकिन जब देखेंगे तो खुद से सवाल पूछेंगे कि क्या सच में ये फिल्म विभाजन की त्रासदी का सही चित्रण करती है, या फिर ‘क्रिएटिव लिबर्टी’ के नाम पर इतिहास को धुँधला करने का एक और बॉलीवुड प्रयास है?

फिल्म की मूल कहानी एक सिख बुजुर्ग ‘कीनू’ (नसीरुद्दीन शाह) के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जिन्हें अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में आकर 1947 के विभाजन के दौरान लाहौर में छूटा अपना पहला प्यार याद आता है। यह प्यार एक मुस्लिम लड़की ‘जिया’ से था, जो विभाजन की वजह से मुकम्मल नहीं हो सका। भारत आकर कीनू सब भुलाकर कड़ी मेहनत से वो सब हासिल करता है जो लाहौर में छूट गया था, लेकिन जीवन के आखिरी पलों में वे जिया पर आकर दोबारा रुक गए है, उनकी यादश्त में सिर्फ जिया और जिया की कहानी चल रही है। उन्हें ये दर्द नहीं है कि उनकी घर की औरतों के साथ क्या हुआ…

फिल्म में कीनू जब अपने पोते (दिलजीत दोसांझ ) को यह प्रेम कहानी सुनाने की शुरुआत करते हैं, वहीं से फिल्म का नैरेटिव साफ होने लगता है।

सबसे शर्मनाक चीज ये पकड़ में आती है कि फिल्म निर्माता यहाँ क्रिएटिव लिबर्टी और सौहार्द बनाने की आड़ में बड़ी चालाकी से मजहबी दंगाइयों को ढाँकने की कोशिश करते हैं और मजहबी दंगाइयों को MARS से आए प्राणी बताकर पेश करते हैं।

फिल्म में विभाजन के दर्द को, गैर-मुस्लिमों पर हुए अत्याचार को पूरी तरह एक सूफियाना रोमांस के पर्दे के पीछे छिपा दिया है। विभाजन की इस अथाह पीड़ा को एक प्रेम कहानी के तौर पर परोसा गया है।

ढाई घंटे की इस फिल्म में माताओं-बहनों के साथ हुई बर्बरता, बच्चियों के गले रेते जाने और खचाखच भरी लाशों की ट्रेनों के उस खौफनाक सच को महज 5 से 10 मिनट के दृश्यों में समेट कर किनारे कर दिया गया।

फिल्म का अंत होते-होते उस खूनी इतिहास को इस तरह भुला दिया जाता है, मानो वह कोई बड़ी घटना थी ही नहीं।

फिल्म में गैर-मुस्लिम औरतों के साथ हुई वीभत्सता को एक डॉयलॉग ‘हमारे घर को श्राप है कि कोई औरत नहीं बचेगी’ जैसे डॉयलॉग के साथ भी समेटने का प्रयास हुआ है।

देखने वालों को ये लगे कि बुजुर्ग कीनू के भीतर अब भी महिलाओं के साथ हुए अत्याचार का दर्द है और पर्दे पर उनके साथ वीभत्सता करने वालों की कहानी भी न आए।

क्या सिर्फ एक डॉयलॉग या 5-7 मिनट के सीन से आप सोच सकते हैं कि विभाजन के वक्त हिंदू-सिख औरतों के साथ दंगाइयों ने क्या किया होगा।

प्रेम कहानी के नाम पर विभाजन का दर्द बताने का दावा करने वाली ये फिल्म बिलकुल वैसी करतूत है जैसा कुछ समय पहले विधु विनोद ने ‘शिकारा’ परोस कर की थी। उसमें भी कश्मीरी पंडितों के वास्तविक विस्थापन और दर्द को बताकर फिल्म ‘शिकारा’ का प्रमोशन हुआ और आखिर में वो सिर्फ एक प्रेम कहानी निकली। इस बार भी पीड़ितों की चीखों को दबाकर उनके दर्द का सरलीकरण किया जा रहा है।

फिल्म में जगह-जगह सोच-समझकर ‘बैलेंसिंग एक्ट’ दिखाने की कोशिश हुई है। कहानी में दिखाया गया है कि अगर सामने मजहबी दंगाई थे, तो ‘मुस्तफा’ जैसे लोग भी थे जिन्होंने अपनों को खोकर भी सिख परिवार की जान बचाई।

बेशक इतिहास में इंसानियत के ऐसे उदाहरण रहे होंगे, लेकिन फिल्म निर्माता ने जिस तरह उन्हें पेश किया है और जैसे मजहबी कट्टरपंथ को ढाका है, उससे उनकी मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है।

फिल्म यह संदेश देने की कोशिश करती है कि उजड़े हुए हिंदू-सिख घरों के पीछे उनके पड़ोस में रहने वाले मजहबी कट्टरपंथियों का हाथ नहीं था, बल्कि मानो वे लोग किसी दूसरे ग्रह ‘मार्स’ से आए थे।

इम्तियाज अली की मंशा तब और ज्यादा बेनकाब हो जाती है, जब वे विभाजन का दर्द बताते-बताने अचानक लेबनान और गाजा की समकालीन क्लिप्स चलाने लगते हैं।

एक बार को ये देख ऐसा लग सकता है कि वे इसे यहाँ विस्थापन की पीड़ा बयान करने के लिए दिखाते हैं लेकिन हकीकत में उनका मकसद दर्शकों के दिमाग में एक खास तरह की राजनीतिक धारणा को बिठाना था।

राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर विपक्ष का प्रोपेगेंडा फेल, श्रद्धालुओं की आस्था अटूट: आँकड़े बता रहे हैं कि अयोध्या में रामलला के दर्शन पर नहीं पड़ा कोई असर, कॉन्ग्रेसी-सपाई सियासी नरेटिव हुआ ध्वस्त

बीते एक महीने से अयोध्या स्थित राम मंदिर में चढ़ावा चोरी को लेकर सियासत गरमाई हुई है। विपक्ष एक नरेटिव खड़ा करने की कोशिश कर रहा है कि चढ़ावा चोरी का सीधा असर श्रद्धालुओं के आस्था पर पड़ा है। हालाँकि श्रद्धालुओं की संख्या में हुई बढ़ोतरी ने इस नरेटिव को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है।

राम मंदिर में श्रद्धालुओं का आना रुका नहीं है, कम नहीं हुआ है और न ही किसी तरह से आस्था कमजोर पड़ी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जून 2026 में राम मंदिर में रोजाना लगभग 1 लाख श्रद्धालु और 7 जून से 11 जून के बीच रोजाना 81,000 से 1,16,689 तक दर्शनार्थी दर्ज किए गए।

इस रिपोर्ट के अनुसार, महज पाँच दिनों में 4.90 लाख दर्शनार्थी राम मंदिर में दर्शन करने पहुँचे। अगर मंदिर खाली हो गया होता या लोग आना बंद कर चुके होते, तो इस तरह के फुटफॉल आँकड़े सामने ही नहीं आते।

टीवी9 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 7 जून से पहले औसत 16-18 लाख रुपए प्रतिदिन चढ़ावे के तौर पर बैंक में जमा किए जाते थे। वहीं चढ़ावे का विवाद के शुरू होने के बाद ये औसत 22-24 लाख के बीच पहुँच गया है।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, 22 जनवरी 2024 से 2026 तक करीब 12 करोड़ लोगों ने रामलला के दर्शन किए और सामान्य दिनों में लगभग 50 से 60 हजार श्रद्धालु रोज आते रहे।

SIT की रिपोर्ट में भी औसतन हर महीने 25 लाख श्रद्धालुओं के आने की बात सामने आई है। जहाँ तक सवाल है चढ़ावा चोरी और उसमें कमी का, तो हाल के हफ्तों में दान 16 से 18 लाख से बढ़कर 22 से 24 लाख रुपये प्रतिदिन तक पहुँच गया।

‘कोई सबूत नहीं है’- अफवाह को सुर्खी बनाने की कोशिश

कहानी की शुरुआत ही पाखंड की मिसाल है। 5 जून 2026 को मंदिर परिसर में रूटीन सुरक्षा जाँच के दौरान कुछ कर्मचारियों की जेब से नकदी बरामद हुई थी। 7 जून को जब यह बात सार्वजनिक हुई तो सपा मुखिया अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर गबन का मुद्दा उठाकर जाँच की माँग कर दी। लेकिन जब सवाल पूछा गया, तो असली रंग सामने आया।

अयोध्या से पूर्व विधायक और सपा प्रवक्ता पवन पांडेय ने खुद ऑपइंडिया को बताया कि यह बात महज चार दिनों से शहर में सूत्रों के हवाले से ‘टहल’ रही थी, जिसका कोई ठोस सबूत उनके पास नहीं था। यानी जिस ‘सबूत दो’ के नारे पर सपा हर सरकारी योजना, हर मुठभेड़, हर आंकड़े को कठघरे में खड़ा करती है, अपने ही सबसे बड़े ‘राम-भक्ति’ के दावे में वह खुद यह शर्त भूल गई।

ऑपइंडिया की अपनी पड़ताल में अखिलेश का यह दावा तथ्यों की कसौटी पर टिक ही नहीं पाया था। पूरे तथ्य सामने आने से पहले ही निशाना साध दिया गया था।

भले ही बाद में जाँच में सचमुच गड़बड़ी मिली, लेकिन टूटी हुई घड़ी भी दिन में दो बार सही समय बता देती है तो इससे घड़ी की साख साबित नहीं होती। सवाल यह नहीं कि सपा का शक गलत निकला या इत्तेफाक से सही, सवाल यह है कि बिना सबूत माइक थामकर हल्ला मचाना और बाद में संयोगवश सही साबित होकर पूरा श्रेय बटोर लेना ही अब सपा की स्थायी रणनीति बन चुकी है।

गोलियाँ चलवाने वाले ले रहे भगवान राम का सहारा

मंदिर में चढ़ावे की चोरी एक प्रशासनिक और जाँच का विषय है। वह प्रक्रिया चल भी रही है। लेकिन इसे बहाना बनाकर राम मंदिर के खिलाफ माहौल बनाकर श्रद्धालुओं की भावना पर सवाल उठाना और फिर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करना एक अलग ही एजेंडा दिखाता है। यह मंदिर-विरोधी नरेटिव वही लोग आगे बढ़ा रहे हैं, जिनका राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रति रवैया हमेशा से ही सवालों के घेरे में रहा है।

यह भी याद रखने की जरूरत है कि राम मंदिर पर सवाल उठाने वालों का राजनीतिक इतिहास पहले से दर्ज है। 1990 के दशक में जब कारसेवक राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए निकलते थे, तब गोलियों से उनका स्वागत करने वाली समाजवादी पार्टी आज रामभक्ति के सबसे बड़े पैरोकार बनने की कोशिश कर रही है।

30 अक्टूबर 1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के आदेश पर पुलिस ने कारसेवकों पर गोली चलाई, जिसमें कई लोगों की मौत हुई। दो दिन बाद, 2 नवंबर 1990 को हनुमानगढ़ी के पास दोबारा गोलीबारी हुई। जान बचाने के लिए कई कारसेवकों ने सरयू नदी में छलांग लगा दी। कुछ तो शवों के बीच लेटकर ही बच पाए।

आडवाणी की रथ यात्रा रोकने के लिए मुलायम यादव ने ऐलान किया था कि कारसेवकों को ‘कानून का अर्थ’ सिखाया जाएगा और हनुमानगढ़ी की तरफ बढ़ते कारसेवकों को चेतावनी दी थी कि ‘बाबरी मस्जिद पर परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा।’

1990 का गोलीकांड कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं थी बल्कि यह सपा की स्थापना की बुनियाद बना। बाबरी ढाँचा गिरने के बाद 1992 में मुलायम सिंह यादव ने जनता दल से अलग होकर समाजवादी पार्टी की नींव रखी थी यानी जिस पार्टी का जन्म ही राम मंदिर आंदोलन के सीधे विरोध की कोख से हुआ, वह पार्टी आज उसी मंदिर की आस्था का ठेकेदार बनने चली है।

समाजवादी पार्टी का समाजवाद अयोध्या के मसले पर हमेशा एक खास वोट बैंक के तुष्टिकरण का रहा है। यही प्रवृत्ति मुलायम सिंह के बाद उनके बेटे अखिलेश यादव के दौर में भी बिना रुके चलती रही। हजारों कारसेवकों की गिरफ्तारियाँ और अस्थायी जेलें भी उसी सपाई विरासत का हिस्सा रही हैं।

अब यह सिर्फ सपा तक सीमित बीमारी भी नहीं रही बल्कि पूरे ‘इंडिया गठबंधन’ में यही रग दौड़ती है। बिहार में लालू यादव की पार्टी आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव ने प्राण प्रतिष्ठा से पहले तंज कसा था कि मंदिर जाओगे तो वहाँ भी दान माँग लेंगे। मतलब गोत्र भले ही अलग हों, पर नीयत एक जैसी ही है।

असल में जिनके राजनीतिक संस्कार राम मंदिर के विरोध, तुष्टिकरण और मंदिर आंदोलन की आलोचना से बने हों, उनसे आज श्रद्धा और मर्यादा की उम्मीद करना जनता की समझ का अपमान होगा।

यह सबसे बड़ा विरोधाभास भी है कि जब असल में राम मंदिर के लिए जनता का साथ देने की बारी थी तब इसी विपक्ष का विरोध दिखा था और अब जब चुनावी माहौल और सियासत के जरिए जनता को लुभाना है तो दिखावटी सहानुभूति सामने आ रही है। तब राम आंदोलन को रोकने की कोशिश थी और आज उन्हीं श्री राम के नाम पर नरेटिव बनाने की कोशिश में सपा और कॉन्ग्रेस जुटी हुई है।

चुनाव आया तो याद आ गए श्री राम

सबसे बड़ा सवाल यही है कि विपक्ष की अयोध्या-सक्रियता चुनाव से ठीक पहले अचानक तेज क्यों हुई। मंदिर निर्माण के पाँच साल और प्राण प्रतिष्ठा के डेढ़ साल में सपा को मंदिर-प्रबंधन की पारदर्शिता की याद कभी क्यों नहीं आई? यह ‘चिंता’ अचानक तभी क्यों जागी जब 2027 का विधानसभा चुनाव सिर पर है? इसी समय चढ़ावा-चोरी की खबर को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जाने लगा।

असल बात यह है कि विपक्ष को चढ़ावा चोरी के मामले से एक ऐसा राजनीतिक मुद्दा मिल गया, जिसके सहारे वह राम मंदिर को बदनाम करने का प्रयास कर सकता था। लेकिन यह दांव उल्टा पड़ रहा है, क्योंकि जनता भावनाओं से ज्यादा अब वास्तविक आँकड़े देख रही है।

मंदिर में भीड़ है, दर्शन हो रहे हैं, श्रद्धालु आ रहे हैं और आस्था जस की तस बनी हुई है। अगर कहीं कमी है, तो वह विपक्ष की विश्वसनीयता में है, रामभक्तों की श्रद्धा में नहीं। राम मंदिर के खिलाफ यह प्रोपेगेंडा सिर्फ एक विवाद को हवा देना नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना पर चोट करने की कोशिश है जिसने देश को वर्षों तक एक प्रतीक के लिए संघर्ष करते देखा।

हालाँकि अयोध्या का सच साफ है कि रामलला के दर्शन के लिए आने वाले भक्त आज भी उतनी ही निष्ठा से कतारों में खड़े हैं और यह तथ्य हर झूठे नरेटिव पर भारी पड़ता नजर आ रहा है।

जिस पार्टी की सरकार ने कभी राम भक्तों पर गोलियाँ चलवाईं, आज वही पार्टी खुद को उन्हीं भक्तों की आस्था का सबसे बड़ा प्रहरी बताकर पेश कर रही है। यही पाखंड की पराकाष्ठा है। विपक्ष जिस ‘कम भीड़’ वाले नरेटिव को बार-बार दोहरा रहा है, वह तथ्य के बजाय प्रचार पर आधारित है।

दान और चढ़ावे की राशि पर बहस अलग हो सकती है, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल अलग हो सकते हैं, लेकिन श्रद्धालुओं की उपस्थिति के बारे में झूठ फैलाना न केवल गलत है बल्कि सनातन आस्था के साथ खिलवाड़ भी है।

राम मंदिर सिर्फ एक इमारत नहीं, करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं, संघर्ष और प्रतीक्षा का प्रतीक है। ऐसे में उसके खिलाफ कोई भी झूठा प्रचार स्वाभाविक रूप से जनता के बीच टिक नहीं सकता।

‘आप कौन हैं?’ वाला सवाल अरविंद केजरीवाल पर पड़ा भारी, AAP नेता को याद दिलाई गई उनके ‘भ्रष्टाचारों’ की गिनती: शायद इसीलिए ‘कर्मठ’ BJP अध्यक्ष नितिन नवीन को पहचानने से कर रहे इनकार

अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे को लेकर चल रहे विवाद में विपक्षी नेताओं के राजनीतिक स्वर बदल रहे हैं। कभी इसी राम मंदिर को बनने के विरोध में रहे इन विपक्षी नेताओं को अचानक ‘हिंदुओं की आस्था’ की चिंता सताने लगी है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अध्यक्ष नितिन नवीन ने इन्हीं विपक्षी नेता राहुल गाँधी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल को आईना दिखाया है।

लखनऊ में शक्ति केंद्र संयोजक सम्मेलन को संबोधित करते हुए नितिन नवीन ने कहा, “आज मैं राहुल गाँधी, अखिलेश यादव और केजरीवाल से कहना चाहता हूँ कि हिंदू धर्म को इतना कमजोर मत समझिएगा कि लोग आपके साँझे में आ जाएँगे।” उन्होंने आगे कहा, “क्योंकि जब आपके लोग हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करते हैं, तो आप लोग मौन रहते हैं। सनातन का अपमान यूपी और देश की जनता कभी बर्दाश्त नहीं करेगी। हमने विरासत को संजोया है, इसके लिए हमारे पुरखों ने कुर्बानियाँ तक दी हैं।”

नितिन नवीन के इस बयान पर आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने टिप्पणी की है। बीजेपी के ‘एक्स’ हैंडल से शेयर हुए नितिन नवीन के बयान पर कमेंट करते हुए केजरीवाल ने नितिन नवीन से पूछा कि आप कौन हैं? लेकिन अरविंद केजरीवाल को उनकी यह टिप्पणी भारी पड़ गई क्योंकि सिर्फ बीजेपी के नेता ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया यूजर्स तक केजरीवाल को उनकी ‘औकात’ दिखाने लगे।

अपने ही सवाल पर घिरे केजरीवाल

अरविंद केजरीवाल से दिल्ली की मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनने वालीं रेखा गुप्ता ने खुद मोर्चा संभाला और इसे केजरीवाल का ‘अहंकार’ बताया। रेखा गुप्ता ने नितिन नवीन का परिचय देते हुए केजरीवाल से सीधे तौर पर कहा, “आप हताश और निराश हैं, इस बात से सभी अवगत हैं। लेकिन लगता है, आपका अहंकार अभी भी सातवें आसमान पर है!”

रेखा गुप्ता ने याद दिलाया कि यही सवाल एक बार तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और मौजूदा केंद्रीय मंत्री अमित शाह से भी पूछा था और कहा कि समय हर प्रश्न का उत्तर देता है। उन्होंने केजरीवाल से यह भी कहा कि अहंकार तो रावण का भी नहीं टिका, आप कौन?

दिल्ली सरकार में मंत्री प्रवेश शर्मा ने भी केजरीवाल के सवाल पर तंज कसते हुए कहा, “मैं याद हूँ कि नहीं?” बता दें कि प्रवेश वर्मा ने ही दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में नई दिल्ली विधानसभा सीट से अरविंद केजरीवाल को हराकर दिल्ली से बाहर का रस्ता दिखाया था।

वहीं दिल्ली के मंत्री कपिल मिश्रा ने तो केजरीवाल की इज्जत उतारकर रख दी। उन्होंने कहा, “दारू के नशे में कुछ ऐसे डूबे AAP, बाप से ही पूछ बैठे कौन हैं आप।”

यहाँ तक की AAP की बागी नेता स्वाती मालीवाल भी केजरीवाल को आइना दिखाने से पीछे नहीं रही हैं। उन्होंने कहा कि जो सवाल केजरीवाल ने नितिन नवीन से पूछा है, वही सवाल आज पंजाब की जनता केजरीवाल से भी पूछ रही है। स्वाती मालीवाल ने पंजाब की AAP सरकार में अपराध, भ्रष्टाचार, ड्रग्स पर सवाल उठाए।

स्वाती मालीवाल ने नितिन नवीन को मेहनती और विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बताते हुए कहा कि AAP में केवल केजरीवाल को तर्जी दी जाने पर भी सवाल किया, “AAP में केजरीवा ही अध्यक्ष है, वही सरकार है और वही सुपर CM है।” साथ ही केजरीवाल के सवाल को अहंकार बताते हुए स्वाती ने कहा, “इतना अहंकार अच्छा नहीं है, पहले दिल्ली में टूटा था, अब पंजाब में टूटेगा।”

सिर्फ नेता ही नहीं, केजरीवाल को आम जनता ने भी लताड़ा। एक्स पर कल्पना श्रीवास्तव ने केजरीवाल से कहा, “यह सवाल पूछने वाले आप स्वयं कौन हैं? जो दिल्ली की जनता ने नौकर बनाया था, मालिक बन बैठे। आप वो हैं जिनकी पार्टी में हिंदू देवी-देवताओं का अपमान होने पर मौन रह जाते हैं। आप वो हैं जो राम मंदिर पर चढ़ावे की चोरी पर भी राजनीति करते हैं, लेकिन सनातन के अपमान पर “आप कौन हैं” कहकर बच निकलना चाहते हैं।”

अर्पित मिश्र ने कहा, “लगातार भ्रष्टाचार के आरोप में जेल और अदालतों के चक्कर लगाने वाले, झूठ और मक्कारी के प्रत्यक्ष प्रमाण अरविंद केजरीवाल का गुरूर 7वें आसमान पर है या यह मात्र सुर्खियों में बने रहने का इसका वही पुराना राग है। केजरीवाल के नीचे जमीन ही नहीं है, लेकिन कमाल है इसको अभी भी यकीन ही नहीं है।”

आनंद शंकर झा ने केजरीवाल के सवाल का जवाब देते हुए कहा, “तेरे जैसे गिरगिट को जिस पार्टी ने तेरी सही औकात बता दी उसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं!”

केजरीवाल के लिए जानिए, कौन हैं नितिन नवीन?

अरविंद केजरीवाल ने जिस नितिन नवीन से ‘आप कौन हैं?’ पूछा है, वे बीजेपी के कोई साधारण नेता नहीं हैं। हर कोई उन्हें जानता है लेकिन केजरीवाल को शायद इसकी जानकारी नहीं है इसीलिए उनकी जानकारी में लाने के लिए नितिन नवीन का परिचय जरूरी है। 45 वर्षीय नितिन नवीन के पास इस समय बीजेपी की कमान है यानी वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और पार्टी के सबसे कम उम्र में इस पद तक पहुँचने वाले नेताओं में शामिल हैं। वे बिहार की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे हैं और लंबे समय तक संगठन से लेकर सरकार तक अहम जिम्मेदारियाँ निभा चुके हैं।

नितिन नवीन बिहार के पटना स्थित बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र से लगातार पाँच बार के विधायक हैं। उनके पिता नवीन किशोर सिन्हा भी बीजेपी के वरिष्ठ नेता और विधायक थे। पिता के निधन के बाद नितिन नवीन ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और साल 2006 में महज 26 साल की उम्र में उपचुनाव जीतकर पहली बार विधायक बने। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। परिसीमन के बाद बनी बांकीपुर सीट से वे लगातार चुनाव जीतते रहे और अब तक पाँच बार विधानसभा पहुँच चुके हैं।

सिर्फ चुनावी राजनीति ही नहीं, नितिन नवीन का संगठन में भी लंबा अनुभव रहा है। उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) में कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत की और प्रदेश अध्यक्ष से लेकर राष्ट्रीय महासचिव तक की जिम्मेदारी निभाई। इसके बाद बीजेपी ने उन्हें छत्तीसगढ़ का सह-प्रभारी और फिर प्रभारी बनाया। संगठन में लगातार बढ़ती जिम्मेदारियों के बाद पार्टी नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी।

बिहार सरकार में भी नितिन नवीन कई जरूरी विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। वे पथ निर्माण मंत्री रहने के साथ-साथ कानून एवं न्याय और शहरी विकास एवं आवास जैसे विभागों का भी नेतृत्व कर चुके हैं। संगठन और सरकार, दोनों स्तर पर उनके अनुभव को देखते हुए बीजेपी ने उन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व की कमान सौंपी।

‘₹20 की थाली शेयर करते थे’: सहपाठी ने सुनाए नितिन नवीन के छात्र जीवन के किस्से

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नवीन के छात्र जीवन से जुड़े कई किस्से भी सामने आए हैं। इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर पीयूष पदमाकर ने ‘एक्स’ पर पोस्ट कर दावा किया कि वह नितिन नवीन के सहपाठी रहे हैं। उन्होंने 1998 के दिनों को याद करते हुए बताया कि दोनों ने 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली में कॉलेज में दाखिले की तैयारी साथ की थी और कुछ समय तक एक ही कमरे में भी रहे थे।

पीयूष पदमाकर के मुताबिक, उस समय नितिन नवीन के पिता बिहार में विधायक थे, लेकिन उन्होंने कभी इसका रौब नहीं दिखाया। उन्होंने बताया कि दोनों कई बार ₹20 की थाली शेयर करके खाना खाते थे ताकि ₹10 बच सकें। ऑटो की जगह डीटीसी बसों में सफर करते थे और खर्च कम रखने की पूरी कोशिश करते थे। उन्होंने लिखा कि नितिन ने कभी यह जताने की कोशिश नहीं की कि वह एक विधायक के बेटे हैं।

पीयूष पदमाकर ने अपने दूसरे पोस्ट में बताया कि कॉलेज शुरू होने के बाद उन्होंने नितिन नवीन और दो अन्य दोस्तों के साथ दिल्ली के पटपड़गंज इलाके में किराए का कमरा तलाशा था। प्रॉपर्टी डीलर को जब पता चला कि नितिन के पिता विधायक हैं तो उसने महँगे फ्लैट दिखाने शुरू कर दिए। हालाँकि, नितिन ने साफ कह दिया कि उनके पास पूरे महीने का बजट सिर्फ ₹2 हजार है और उसी में रहना, खाना और कॉलेज जाना है। इसके बाद चारों दोस्तों ने पश्चिम विनोद नगर के मंडावली इलाके में एक साधारण किराए का कमरा लिया।

उन्होंने दावा किया कि उस दौरान चारों दोस्त मिलकर घर का सारा काम खुद करते थे। कोई नाश्ता बनाता था तो कोई बर्तन धोता था। झाड़ू-पोंछा लगाने से लेकर खाना बनाने तक सभी जिम्मेदारियाँ आपस में बाँट लेते थे। पीयूष पदमाकर के मुताबिक, नितिन नवीन उस समय भी बेहद अनुशासित, सरल और मिलनसार स्वभाव के थे। दोस्तों के बीच जब भी किसी बात पर विवाद होता, तो उसे सुलझाने का काम अक्सर नितिन ही करते थे।

अब जान लेते हैं कि सवाल करने वाले केजरीवाल आखिर कौन हैं?

नितिन नवीन के राजनीतिक सफर, संगठन में उनकी भूमिका और छात्र जीवन के संघर्ष की कहानी तो जान ली। अब उस सवाल के दूसरे पहलू पर भी नजर डाल लेते हैं। आखिर जिस नेता ने नितिन नवीन से पूछा कि आप कौन हैं? वह खुद कौन हैं? अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक सफर की उपलब्धियाँ क्या हैं, कैसे उनके कारनामों के चलते दिल्ली से भागना पड़ा, कैसे अब घोटाले ही केजरीवाल की पहचान बन चुके हैं और ये भी जानेंगे कि अचानक हिंदुओं और राम मंदिर की बात करने वाले केजरीवाल कभी इसी मंदिर को बनवाने के खिलाफ क्या-क्या बोले?

अरविंद केजरीवाल का जन्म 16 अगस्त 1968 को हरियाणा में हुआ था। वे देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIT खड़गपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर 1993 में भारतीय राजस्व सेवा (IRS) में नौकरी करने लगे। लेकिन राजनीति में हाथ आजमाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता बने।

साल 2011 के अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोल का प्रमुख चेहरा बने। उसी आंदोलन से उन्हें पहचान मिली और अन्ना हजारे को अलग कर 2012 में अपनी आम आदमी पार्टी (AAP) का गठन किया। अब तक हर कोई उन्हें अन्ना हजारे के आंदोलन से ही जानता था और उसी अन्ना हजारे को उन्होंने पूछा तक नहीं।

अब बारी आई दिल्ली में 2013 के विधानसभा चुनावों की, इन चुनावों में पहली बार AAP ने दिल्ली की सत्ता हासिल की और अगले 10 वर्षों तक दिल्ली में राज किया। केजरीवाल का ऐसा राज, जो जनता को लूटकर अपना खजाना भरने में लगे रहे। इन 10 वर्षों में केजरीवाल ने अपना ‘शीशमहल‘ खड़ा किया और जनता के पैसों से कई घोटाले किए। चाहे ₹100 करोड़ का शराब घोटाला हो, दिल्ली के अस्पतालों में ₹382 करोड़ का घोटाला हो, दिल्ली जल बोर्ड अनियमितता का मामला हो या दिल्ली में बस खऱीदने को लेकर करोंड़ो का घोटाला हो।

और केजरीवाल के इन घोटालों का असर यह हुआ कि 2025 के विधानसभा चुनाव में केजरीवाल को दिल्ली छोड़नी पड़ी और बीजेपी ने पहली बार सत्ता संभाली। इन चुनावों में वह अपनी नई दिल्ली सीट भी नहीं बचा सके। अब केजरीवाल दिल्ली जैसा हाल पंजाब में करने में लगे हुए हैं। पंजाब में AAP सरकार में अपराध कई गुना बढ़ चुका है, ड्रग्स पर शिकंजा कसने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जा रही। यहाँ तक कि हाल ही में सीएम भगवंत मान के ‘बेअदबी’ के वीडियो सामने आने के बाद ‘पंजाबी’ लोगों में सरकार के खिलाफ गुस्सा और फूट गया है।

अरविंद केजरीवाल का हिंदू-विरोधी चेहरा

अरविंद केजरीवाल का हिंदू-विरोधी चेहरा भी किसी से छिपा नहीं है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर केजरीवाल ने विरोध किया। उन्होंने कई मौकों पर कहा था कि मंदिरों की देश में जरूरत नहीं है, मंदिर से देश का भलो नहीं हो सकता जैसे कई कथन कहे थे। हिंदू त्योहारों को भी केजरीवाल ने निशाना बनाया और दिल्ली में सत्ता संभालने के दौरान दीवाली पर पटाखों पर बैन लगा दिया था।

बीजेपी भी केजरीवाल का हिंदू विरोधी चेहरा सामने ला चुकी है। बीजेपी ने याद दिलाया कि जब केजरीवाल ने ‘स्वास्तिक’ और भगवान हनुमान का अपमान करते एक्स पोस्ट किया था। बीजेपी ने अरविंद केजरीवाल के उन पुराने बयानों को भी सामने लाकर रखा जिसमें वह कश्मीरी हिंदुओं का मजाक बना रहे हैं और राम मंदिर का विरोध कर रहे हैं और दूसरे तरफ मस्जिद में नमाज अदा करने पहुँच रहे हैं।

अब यही अरविंद केजरीवाल की आजकल हिंदओं के हित की बात कर रहे हैं। अयोध्या के राम मंदिर के चढ़ावा में कथित चोरी मामले में लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं और हिंदुओं की आस्था आहत होने का रोना रो रहे हैं। अब उन्हें मंदिर याद आ रहे हैं। उनकी एक्स की टाइमलाइन देखें तो आजकल उनके पोस्ट में केवल हिंदू और सनातन प्रेम भरा हुआ है और इसकी आड़ में बीजेपी पर निशाना साधने में लगे हुए हैं।

निष्कर्ष: केजरीवाल ने नितिन नवीन को पहचानने से क्यों किया इनकार?

अब नितिन नवीन और अरविंद केजरीवाल, दोनों के राजनीतिक सफर पर नजर डालने के बाद यह सवाल पाठकों के सामने है कि आखिर ‘आप कौन हैं?’ वाला सवाल किस पर ज्यादा भारी पड़ता है। एक तरफ नितिन नवीन हैं, जिन्होंने छात्र राजनीति से लेकर पार्टी संगठन और सरकार में अलग-अलग जिम्मेदारियाँ निभाते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक का सफर तय किया। दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से अपनी राजनीति शुरू की, लेकिन बाद में खुद भ्रष्टाचार के आरोपों से लद गए।

इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि नितिन नवीन का औदा और उनकी उपलब्धियाँ अरविंद केजरीवाल से कहीं ज्यादा हैं। नितिन नवीन का न तो अब तक किसी घोटाले में नाम सामने आया है, न ही उन्हें केजरीवाल की तरह कोर्ट से कोई लताड़ लगाई जाती है। नितिन नवीन का कानूनी रिकॉर्ड नहीं रहा है, इसीलिए शायद एक ‘भ्रष्टाचारी’ नेता को नहीं मालूम कि नितिन नवीन कौन हैं? और हाँ हिंदुओं की आस्था की चिंता की बात करें तो केजरीवाल का रुख सबके सामने है कि कैसे उन्होंने राम मंदिर का विरोध किया था और अब यूपी में चुनाव करीब आते ही उन्हें राम मंदिर और हिंदुओं के आस्था की चिंता होने लगी है।