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थाने गई माँ तो पुलिस ने की बदसलूकी, परेशान बेटे ने कर्नाटक विधानसभा के बाहर फूँक दी स्कूटर: शांतिभंग में गिरफ्तारी, पुलिसकर्मी भी सस्पेंड

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में एक युवक ने अपने स्कूटर को विधानसभा के सामने आग लगा दी। इसके बाद वह चिल्ला-चिल्ला कर अपना विरोध दर्ज करवाने लगा। उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। युवक अपनी माँ के साथ हुई पुलिसिया बदसलूकी से परेशान था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना बुधवार (14 अगस्त, 2024) को हुई। बताया गया कि एक युवक विधान सभा के सामने आया और अपने स्कूटर को खड़ा कर दिया। इसके बाद उसने इस्मने पेट्रोल डाल कर आग लगा दी। ऐसा करने से पहले उसने अपने स्कूटर को चूमा भी।

युवक आग लगाने के बाद चिल्लाने लगा और गालियाँ देने लगा। इस दौरान आसपास मौजूद लोग चौंक गए और कुछ ने वीडियो बनाना चालू कर दिया। यह सारा वाकया भरी दोपहर में हुआ। इसके बाद यहाँ पर सुरक्षाकर्मी आ गए और स्कूटर में लगी आग को बुझाया। उन्होंने आग लगाने वाले लड़के को भी हिरासत में ले लिया।

इसके बाद इस लड़के से पूछताछ में पूरा मामला खुला। स्कूटर में आग लगाने वाले लड़के का नाम पृथ्वीराज है और वह 27 वर्ष का है। वह बेंगलुरु के ही यशवंतपुर का रहने वाला है। उसने पुलिस को बताया कि उसकी माँ से कुछ समय पहले पुलिस ने काफी रूखा बर्ताव किया था।

उसकी माँ पुलिस के पास उसकी गुमशुदगी की शिकायत करने गई थी। पृथ्वीराज उस दौरान शिवमोगा गया हुआ था और उसकी माँ उसके लिए चिंतित थी क्योंकि दोनों का सम्पर्क टूट गया था। हालाँकि, पुलिस ने उसकी माँ की बात नहीं सुनी और बदसलूकी की। इसके बाद जब वह स्वयं पुलिस स्टेशन पहुँचा तो उसके साथ भी बदतमीजी की गई और उसे मारापीटा गया।

इससे यह युवक क्षुब्ध हो गया और यह कदम उठाने का निर्णय लिया ताकि उसकी आवाज सुनी जा सके। पुलिस ने अब उसे गिरफ्तार करके शांतिभंग का मुकदमा दर्ज कर लिया है। उसके साथ बदतमीजी करने वाले एक पुलिसकर्मी को भी निलंबित कर दिया गया है।

अंबेडकर का अपमान नहीं है सिविल कोड को ‘सांप्रदायिक’ कहना, नेहरू से लेकर राहुल गाँधी तक के तुष्टिकरण पर है प्रहार: जानिए क्यों PM मोदी ने बताई UCC की जरूरत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किला के प्राचीर से समान नागरिक संहिता की जमकर वकालत की। ध्वजारोहण के बाद पीएम मोदी ने कहा कि अब देश की मांग है कि देश में धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता हो। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी बार-बार इसकी वकालत कर चुका है। जिस समय प्रधानमंत्री यह बात कह रहे थे उस वक्त CJI डीवाई चंद्रचूड़ भी वहाँ मौजूद थे।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह सांप्रदायिक नागरिक संहिता है जो लोगों के बीच भेदभाव करती है। देश का एक बड़ा वर्ग यही मानता है। यह लोगों के बीच भेदभाव करती है। उन्होंने कहा कि देश को सांप्रदायिक आधार पर बाँटने और असमानता को बढ़ावा देने वाले कानूनों का आधुनिक समाज में कोई स्थान नहीं है। इस खाई को पाटने के लिए एक धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता अपनाने की जरूरत है।

पीएम मोदी ने कहा, “मैं कहूँगा कि यह समय की माँग है कि भारत में एक धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता होनी चाहिए। हम 75 साल से सांप्रदायिक नागरिक संहिता के साथ जी रहे हैं। अब हमें एक धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता की ओर बढ़ना होगा, तभी धर्म आधारित भेदभाव खत्म होगा। इससे आम लोगों में जो अलगाव की भावना है, वह भी खत्म होगी।”

क्यों किया पीएम मोदी ने UCC का जिक्र

समान नागरिक संहिता भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का प्रमुख मुद्दा है। यह मुद्दा उसके चुनावी घोषणा पत्र का अहम हिस्सा है। अपने इस वादे को पूरा करने की बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित सभी बड़े नेता प्रमुखता से कर चुके हैं। पीएम मोदी के आदेश के बाद उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने इसे प्रदेश में लागू भी कर दिया है। इसके तहत दोनों समुदायों के लिए सिविल मामले में यानी शादी-विवाह, संपत्ति, उत्तराधिकार आदि गैर-आपराधिक मामलों में एक ही कानून होगा।

यह मुद्दा भाजपा के घोषणा पत्र में 1989 से पहले के चुनावी घोषणा पत्रों का हिस्सा नहीं था। हालाँकि, सन 1980 में भाजपा के गठन से पहले जनसंघ था और यह उसके मुद्दे में शामिल था। साल 1986 में शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तत्कालीन राजीव गाँधी की सरकार द्वारा पलटने के बाद 1989 के चुनावी घोषणा पत्र में भाजपा ने पहली बार समान नागरिक संहिता को शामिल किया था।

उसमें कहा गया था कि देश में प्रचलित विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों- हिंदू कानून, मुस्लिम कानून, ईसाई कानून, पारसी कानून आदि की जाँच करने और इन कानूनों में निष्पक्ष एवं न्यायसंगत तत्वों की पहचान करने के लिए एक आयोग की नियुक्ति की जाएगी, ताकि समान नागरिक संहिता के लिए आम सहमति विकसित करने के उद्देश्य से एक मसौदा तैयार किया जा सके।

भाजपा ने अपने दो प्रमुख चुनावी मुद्दे- राम मंदिर को पूरा कर लिया है, जबकि समान नागरिक संहिता उत्तराखंड में लागू करके इसे आंशिक रूप से पूरा कर लिया गया है। हालाँकि, इसे पूरे देश में लागू करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार की ओर से इस पर कानून बनाने को लेकर बहस लगातार चल रही है और भाजपा सरकार के मंत्री समय-समय पर इसकी वकालत कर चुके हैं। अब पीएम मोदी ने लाल किले से इसकी घोषणा कर दी है।

कॉन्ग्रेस सहित विपक्ष का विरोध

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद कॉन्ग्रेस छटपटाने लगी है। कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी भारतीय संविधान के जनक डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का अपमान है। जयराम रमेश ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “गैर-जैविक प्रधानमंत्री की दुर्भावना, शरारत और इतिहास को बदनाम करने की क्षमता की कोई सीमा नहीं है। आज लाल किले से इसका पूरा प्रदर्शन हुआ।”

जयराम ने आगे कहा, “यह कहना कि हमारे पास अब तक ‘सांप्रदायिक नागरिक संहिता’ है, डॉक्टर अंबेडकर का घोर अपमान है। वे हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में सुधारों के सबसे बड़े समर्थक थे। यह सुधार 1950 के दशक के मध्य तक एक वास्तविकता बन गए। इन सुधारों का आरएसएस और जनसंघ ने कड़ा विरोध किया था।”

वहीं, कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, “वह संविधान की शपथ लेते हैं और फिर बाबासाहेब अंबेडकर द्वारा लिखे गए नियमों को सांप्रदायिक बताते हैं। वह एक तरह से अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ बोलते हैं और कहते हैं कि पिछली सरकारों के कार्यकाल में आतंकवादी हमले हुए थे। हम जानना चाहते हैं कि उन्होंने बांग्लादेशी हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए हैं?”

क्या है समान नागरिक संहिता?

समान नागरिक संहिता को सरल अर्थों में समझा जाए तो यह एक ऐसा कानून है, जो देश के हर समुदाय पर समुदाय लागू होता है। व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का हो, जाति का हो या समुदाय का हो, उसके लिए एक ही कानून होगा। अंग्रेजों ने आपराधिक और राजस्व से जुड़े कानूनों को भारतीय दंड संहिता 1860 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872, भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872, विशिष्ट राहत अधिनियम 1877 आदि के माध्यम से सब पर लागू किया, लेकिन शादी, विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति आदि से जुड़े मसलों को सभी धार्मिक समूहों के लिए उनकी मान्यताओं के आधार पर छोड़ दिया।

हिंदुओं की धार्मिक प्रथाओं के तहत जारी कानूनों को निरस्त कर हिंदू कोड बिल के जरिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिंदू नाबालिग एवं अभिभावक अधिनियम 1956, हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम 1956 लागू कर दिया गया। वहीं, मुस्लिमों के लिए उनके पर्सनल लॉ को बना रखा, जिसको लेकर विवाद जारी है। इसकी वजह से न्यायालयों में मुस्लिम आरोपितों या अभियोजकों के मामले में कुरान और इस्लामिक रीति-रिवाजों का हवाला सुनवाई के दौरान देना पड़ता है।

इन्हीं कानूनों को सभी धर्मों के लिए एक समान बनाने की जब माँग होती है तो मुस्लिम इसका विरोध करते हैं। मुस्लिमों का कहना है कि उनका कानून कुरान और हदीसों पर आधारित है, इसलिए वे इसकी को मानेंगे और उसमें किसी तरह के बदलाव का विरोध करेंगे। इन कानूनों में मुस्लिमों द्वारा चार शादियाँ करने की छूट सबसे बड़ा विवाद की वजह है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी समान नागरिक संहिता का खुलकर विरोध करता रहा है।

UCC को लेकर संविधान और डॉक्टर अंबेडकर

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश में एक समान कानून होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट भी कई मौकों पर समान नागरिक संहिता की वकालत कर चुका है। हालाँकि, भाजपा सरकार और सुप्रीम कोर्ट द्वारा समान नागरिक संहिता की वकालत करना संविधान के अनुरूप है। संविधान में समान नागरिक संहिता को लागू करने के बारे में स्पष्ट रूप से कहा गया है। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस तुष्टिकरण की राजनीति के कारण इसे मुद्दा बनाती रहती है।

कॉन्ग्रेस कह रही है कि पीएम मोदी का बयान संविधान और डॉक्टर अंबेडकर का अपमान है। हालाँकि, ऐसा नहीं है। 26 जनवरी 1950 को लागू भारतीय संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से लेकर 51 तक राज्य के नीति निदेशक तत्वों का वर्णन किया गया है। ये निदेशक तत्व, मूल अधिकारों की मूल आत्मा कहे जाते हैं। अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता को अनिवार्य बताया गया है।

अनुच्छेद 44 में कहा गया है, “भारत पूरे देश में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को लागू करने का प्रयास करेगा।” यहाँ बताना आवश्यक है कि संविधान के अनुच्छेद 37 में अनुच्छेद 44 में जैसे नीति निदेशक तत्व कानून की अदालत में अप्रवर्तनीय है, फिर भी देश के शासन में मौलिक है और कानून बनाकर इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य (भारत) का कर्तव्य है।

75 साल पहले बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि समान नागरिक संहिता को ‘विशुद्ध रूप से स्वैच्छिक’ नहीं बनाया जा सकता है। उन्होंने उस दौरान भी अल्पसंख्यक समुदाय के डर और आशंकाओं को देखते हुए यह बात कही थी। आज जब पीएम मोदी लाल किले से इसे लागू करने की बात कर रहे हैं तो कॉन्ग्रेस इसे डॉक्टर अंबेडकर का अपमान बता रही है, जोकि पूरी तरह झूठ है।

पंडित नेहरू ने समान नागरिक संहिता का किया था विरोध

हिंदू कोड पर संसद में बहस के दौरान दौरान जब समान नागरिक संहिता की बात हुई तो भारत के पहले एवं तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कहा था कि समान नागरिक संहिता के लिए अभी सही समय नहीं आया है, क्योंकि मुस्लिम इसके लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने इस पूरे मुद्दे को देशहित से बढ़कर मुस्लिमों की इच्छा पर डाल दिया था।

पंडित नेहरू ने संसद में समान नागरिक संहिता के बजाए हिंदू कोड बिल का बचाव करते हुए कहा था, “मुझे नहीं लगता कि वर्तमान समय में भारत में इसे लागू करने का समय आया है। जब हिंदू कोड बिल के माध्यम से देश की 80% से अधिक जनता के लिए व्यक्तिगत कानून के तहत लाया जा चुका है तो भारत में सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का कोई औचित्य नहीं है।”

कॉन्ग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण

आजादी के बाद मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी के भारत में रह जाने के बाद कॉन्ग्रेस ने इसे अपने वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। साल 1954 में हिंदू कोड बिल पर बहस के दौरान समाजवादी नेता जेपी कृपलानी ने पंडित नेहरू की कॉन्ग्रेस सरकार पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि यह सरकार केवल हिंदुओं के लिए कानून ला रही है, मुस्लिमों के लिए नहीं।

भारत के पहले और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने भी हिंदू कोड बिल का जोरदार विरोध किया था। राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि इस तरह के कानून जनता की राय को ध्यान में रखे बिना एकतरफा और मनमाने ढंग से बनाया जा रहा है। उन्होंने कानून पर हस्ताक्षर करने से भी इनकार करने की धमकी दी। इसके कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और राष्ट्रपति के बीच टकराव की स्थिति आ गई थी।

इतना ही नहीं, राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन कॉन्ग्रेस ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट कर मुस्लिम तुष्टिकरण की एक नई लकीर खींच दी थी। दरअसल, 59 साल की शाहबानो को को उनके शौहर मोहम्मद अहमद खान ने तीन तलाक दे दिया था और उन्हें एवं उनके 5 बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया था।

विभिन्न न्यायालयों से होते हुए यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने 23 अप्रैल 1985 को मुस्लिम पर्सनल लॉ बॉर्ड के आदेश के खिलाफ जाते हुए शाहबानो के शौहर को आदेश दिया कि वो अपने बच्चों को गुजारा भत्ता दे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत हर महीने मोहम्मद अहमद खान को 179.20 रुपए देने थे।

इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस आदेश में केंद्र सरकार से ‘समान नागरिक संहिता’ की दिशा में आगे बढ़ने भी की अपील की थी। इस पर मुस्लिमम कट्टरपंथियों ने आपत्ति जताई थी। इनके आगे झुकते हुए राजीव गाँधी की सरकार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) कानून 1986 सदन में पास कराया था।

सरकार के इस कदम के कारण मुस्लिम महिलाओं का जीवन पहले की तरह ही नारकीय बना रहा। 59 साल की उम्र में जब शाहबानो को तलाक दे दिया और बिना एक पाई के उन्हें उनके पाँच बच्चों के साथ जीने के लिए छोड़ दिया गया था। ऐसे में किसी भी मुस्लिम महिला के लिए उम्मीद के दरवाजे बंद हो गए थे। हालाँकि, मोदी सरकार ने तीन तलाक खत्म किया और UCC की दिशा में आगे बढ़ रही है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ है ‘कम्यूनल सिविल कोड’!

खुद को धर्मनिरपेक्ष और संविधान का सम्मान करने वाला बताने वाला एक वर्ग संविधान के समान नागरिक संहिता के उद्देश्य को नकारना चाहता है। पंडित नेहरू द्वारा मुस्लिम पर्सनल और अन्य धर्मों के लिए हिंदू कोड बनाने को सही मानता है। हालाँकि, एक देश में दो तरह के कानून कभी भी सही नहीं कहे जा सकते, खासकर तब, जब वे एक-दूसरे के ठीक विपरीत हों।

जैसे लड़़कियों के विवाह को ही लें। हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख आदि धर्मों के लिए लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल निश्चित की गई है। इससे एक दिन पहले भी अगर लड़की की सहमति से कोई पुरूष शारीरिक संबंध बना लेता है तो लड़की को नाबालिग मानते हुए उस पर POCSO के तहत बलात्कार का मुकदमा चलेगा। दूसरी, तरफ मुस्लिम पर्सनल कानून 15 साल की लड़की की निकाह की बात करता है।

मुस्लिमों में चार शादियाँ: मुस्लिम पर्सनल लॉ, जिसे शरिया कानून भी कहा जाता है, इस्लामिक किताब कुरान और हदीसों पर आधार है। कुरान में मुस्लिमों को चार शादियाँ करने को वैध माना गया है। इसके आधार पर मुस्लिम चार निकाह को वैध मानते हैं। वहीं, सामान्य भारतीय कानून के तहत कोई भी व्यक्ति सिर्फ एक शादी कर सकता है। विशेष परिस्थितियों में दूसरी शादी की इजाजत दी जा सकती है।

तलाक एवं गुजारा भत्ता: मुस्लिम पर्सनल लॉ में महिलाओं को तीन तलाक देने के प्रावधान है। हालांकि, साल 2019 में मोदी सरकार ने इस पर रोक लगा दी है। वहीं, जिस महिला को मुस्लिम तलाक देते हैं, उन्हें गुजारा भत्ता देने का रिवाज नहीं है। वे सिर्फ महर की रकम वापस करते हैं, जो बेहद की कम होता है। वहीं, सामान्य भारतीय तलाक कानून में पति को अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता या एकमुश्त रकम देनी होती है।

तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी: हिंदू कानून के मुताबिक माता-पिता के तलाक की स्थिति में बच्चे की कस्टडी हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप ऐक्ट 1956 के तहत निर्धारित होती है। तलाक के वक्त अगर बच्चे की उम्र 5 साल से कम है तो उसे उसके माँ के हवाले किया जाएगा। अगर बच्चा है 9 साल से ऊपर का हो गया है तो वह कोर्ट में बता सकता है कि वह अपनी माँ के साथ जाना चाहता है या अपने पिता के साथ। इसके आधार पर उसे माँ या पिता की कस्टडी में दी जाएगी।

वहीं, मुस्लिम शरिया कानून के तहत बच्चे की उम्र 7 साल होने तक उसकी कस्टडी माँ के पास होती है। अगर माँ उसे रखने या उसका पालन पोषण करने में असमर्थ है तो उस बच्चे की कस्टडी उसके अब्बू को दे सकती है। वहीं, ईसाइयों में कस्टडी को लेकर कोई नियम निर्धारित नहीं है।

संपत्ति में बेटियों का अधिकार: भारत के सामान्य सिविल कानून में बेटियों को अपने पिता एवं पति की संपत्ति में बराबर का अधिकार है। हालाँकि, मुस्लिम पर्सनल कानून में यह अधिकार बेटियों को बराबर नहीं है। शरिया कानून के तहत, पैतृक संपत्ति में पुरुष के अधिकार का आधा महिलाओं का हिस्सा होता है। यानि महिलाओं को बराबर का हिस्सेदार नहीं नहीं माना जाता।

वहीं, ससुराल पक्ष में मुस्लिम महिला का संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता। उसे निकाह के दौरान मिली मेहर की राशि, मिले उपहार, पिता की तरफ से मिले धन पर ही उसका अधिकार होता है। अगर वह तलाक लेती है तो सिर्फ इन्हीं संपत्तियों को वह शरिया कानून के तहत पाने की अधिकारी है। अगर शौहर चाहे तो अपनी इच्छा के आधार पर उसे कुछ दे सकता है।

उत्तराधिकार कानून: हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम 1956 के तहत दत्तक पुत्र को गोद लेने वाले माता-पिता की संपत्ति में एक सामान्य पुत्र की तरह अधिकार होता है। वहीं, मुस्लिम शरिया कानून के तहत ऐसा नहीं है। इस्लाम में गोद लिए गए बच्चों को संपत्ति में अधिकार नहीं होता। दारुल उलूम देवबंद ने भी इस संबंध में फतवा जारी किया था।

शरिया कानून के आधार पर देवबंद ने कहा था कि गोद लिए गए बच्चे का अधिकार असली बच्चे के समान नहीं होगा। उसे संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलेगा और ना ही उसे किसी मामले में वारिस बनाया जा सकता है। इसमें आगे कहा गया है कि सिर्फ गोद ले लेने से वास्तविक बच्चे का अधिकार उस पर लागू नहीं हो जाते। परिपक्व होने के बाद उसे शरिया का पालन करना होगा।

शरिया कानून के अनुसार, दत्तक बच्चे को हिबा (उपहार) दिया जा सकता है, लेकिन वारिस नहीं बनाया जा सकता। इस्लाम के अनुसार, गोद लिया जाने वाले बच्चे को लेकर ‘महरम’ का सवाल खड़ा हो जाता है। इस्लाम में महरम उसे कहते हैं, जिससे शादी नहीं की जा सकती है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी कोर्ट में कहा था कि इस्लामी कानून गोद लिए बच्चे को जन्म दिए गए बच्चे के समान नहीं मानता।

इतना ही नहीं, शरीयत कानून के तहत एक मुस्लिम सिर्फ अपनी संपत्ति का एक-तिहाई हिस्सा ही किसी को वसीयत कर सकता है। शेष संपत्ति को शरीयत कानून के अनुसार विभाजित करना होगा। शरीयत कानून में किसी भी लड़का या लड़की को पूरी संपत्ति वसीयत करने का प्रावधान नहीं है। ऐसी स्थिति में शुक्कुर जैसे पिता के सामने विशेष विवाह अधिनियम जैसे विकल्प बचते हैं।

पर्सनल कानून संविधान के खिलाफ

पर्सनल कानून भारतीय संविधान के खिलाफ है। संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार देश के सभी नागरिक एक समान हैं। आर्टिकल 15 जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है। आर्टिकल 16 सबको समान अवसर उपलब्ध कराता है। आर्टिकल 19 देश मे कहीं पर भी जाकर पढ़ने, रहने, बसने, रोजगार करने का अधिकार देता है।

उसी तरह, आर्टिकल 21 सबको सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है। आर्टिकल 25 धर्म पालन का अधिकार देता है, लेकिन अधर्म पालन का नहीं। रीतियों को पालन करने का अधिकार देता है, लेकिन कुरीतियों को नहीं। प्रथा को पालन करने का अधिकार देता है, लेकिन कुप्रथा को नहीं। इस तरह देश में समान नागरिक संहिता लागू होने से संविधान का किसी तरह उल्लंघन नहीं होगा।

देश में किसी एक तबके को प्रश्रय देना और उसके लिए अलग व्यवस्था करना ना सिर्फ संविधान का अपमान है, वरन यह सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना भी है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसा बेहद निजी संगठन सरकार पर दबाव बनाकर मनवांछित काम करा लेता है। अगर देश में कानून समान हो जाएगा तो सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने पर अंकुश लगेगा।


6 दिन डिजिटल अरेस्ट रहीं PGI की महिला डॉक्टर, ऑनलाइन बैठी कोर्ट, ₹2.5 करोड़ का लगा चूना… जानिए क्या है ठगी का वह मॉडर्न तरीका जिसके पढ़े-लिखे बन रहे शिकार

साइबर अपराध की दुनिया में डिजिटल ठगी के बाद ‘डिजिटल अरेस्ट’ के केस बढ़ते जा रहे हैं। पहले जहाँ धोखे से लोगों के अकॉउंट, कार्ड डिटेल या किसी स्कीम आदि के नाम पर लोगों को लूटा जाता था। वहीं अब कानून का डर दिखाकर, मानसिक तौर पर कमजोर करके लोगों से पैसे ठगे जा रहे हैं और लोगों को एहसास भी नहीं हो रहा है कि उनके साथ क्या सब हो रहा है। बीते दिनों डिजिटल अरेस्ट के कई मामले खबरों में आए हैं। जिनमें से ताजा मामला लखनऊ के पीजीआई डॉक्टर से जुड़ा है जिनके अकॉउंट से ढाई करोड़ रुपए ट्रांसफर करवाए गए।

लखनऊ में डॉक्टर ने गवाए 2.5 करोड़ रुपए

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में पीजीआई की महिला डॉक्टर के साथ 2.5 करोड़ रुपए की ठगी हुई है। ठगों ने पीड़िता को सीबीआई ऑफिसर बनकर अपने जाल में फँसाया। फिर उन्हें 6 दिन डिजिटल अरेस्ट रखा गया और उनसे अलग-अलग खातों में पैसे भी ट्रांसफर भी कराए। जब डॉक्टर को एहसास हुआ कि वो डिजिटल अरेस्ट का शिकार हुईं हैं तब उन्होंने इस संबंध में साइबर थाने में शिकायत कराई।

शिकायत में उन्होंने बताया कि उन्हें कैसे ठगों ने डिजिटल अरेस्ट किया था। महिला के अनुसार, 1 अगस्त को उनके पास फोन आया जिसमें उन्हें कहा गया कि वो टेलिकॉम अथॉर्टी ऑफ इंडिया का अधिकारी है और अब महिला के सारे नंबर बंद कर दिए जाएँगे। महिला ने हैरान होकर सवाल किया तो जवाब मिला कि आपके खिलाफ 22 बार शिकायत मिल चुकी है।स्काइप को डाउनलोड करिए। सीबीआई ऑफिसर आपसे बात करेंगे। इसके बाद ठग ने सीबीआई ऑफिसर बनकर महिला डॉक्टर को डराया कि उनका नाम मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आया है। इसका पैसा महिला और बाल तस्करी में इस्तेमाल हुआ है। आपको अरेस्ट किया जाना है लेकिन पहले आपको डिजिटल अरेस्ट करके पूछताछ होगी। इस संबंध में घरवालों को नहीं बताना।

इसके बाद धीरे-धीरे केस का डर दिखाकर ठग ने महिला डॉक्टर से सारे पैसे अपने अकॉउंट में ट्रांसफर करवा लिए। जब तक महिला को एहसास हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी और सारे पैसे वो अलग-अलग अकॉउंट में डाल चुकी थी।

पति को कर लिया अरेस्ट, 2 लाख रुपए दो

मालूम हो कि ये पहला मामला नहीं है जब कोई महिला डिजिटल अरेस्ट का शिकार हुई हो। इससे पूर्व अगस्त में दिल्ली में हमला इसी तरह के स्कैम का शिकार हुई थी। उस समय उसे कहा था कि उसके पति को अरेस्ट कर लिया गया है और छुड़वाना है तो 2 लाख रुपए देने होंगे। इस दौरान ठगों ने महिला को 6 घंटे तक फोन पर रखा था। हालाँकि बाद में शिकायत होने के बाद आरोपित बिहार से जाकर गिरफ्तार हुए थे।

हैदराबाद के युवक से ठगे 1.2 करोड़ रुपए

इस प्रकार कुछ समय पहले हैदराबाद का एक युवक भी डिजिटल अरेस्ट का शिकार हुआ था। रिपोर्टस में बताया गया था कि कैसे ठगों ने लगभद 20 दिन तक युवक को चूना लगाकर उससे पैसे ठगे। युवक के मुताबिक, एक फर्जी पुलिस अधिकारी ने उससे कहा था कि उसके पार्सल में ड्रग्स और नशीले पदार्थ मिले हैं। इसके बाद नकली पुलिस अधिकारी ने उसे धमकाकर पर्सनल जानकारियाँ निकाल लीं। साथ ही 24 घंटे उसे ऑनलाइन रहने को कहा गया और 20 दिन वह घर में ही बंद रहा। इस बीच उससे 1.2 करोड़ रुपए की ठगी हुई।

फरीदाबाद की युवती से ठगे 2.5 लाख रुपए

2023 में फरीदाबाद की 23 वर्षीय युवती को लखनऊ कस्टम अधिकारी बनकर ठगा गया था। फोन करने वाले ने कहा था कि कंबोडिया में एक पैकेज भेजा जा रहा है जिसमें पीड़िता के आधार नंबर से जुड़े कार्ड और पासपोर्ट शामिल हैं। ठग ने पीड़िता को यह विश्वास दिलाया कि उसकी गतिविधि अवैध है जिसके जरिए मानव तस्करी हो रही है। इसके बाद उस ठग ने युवती को पुलिस अधिकारी बनकर 2.5 लाख रुपए ठगे।

डिजिटल अरेस्ट क्या होता है?

डिजिटल ठगी का अपग्रेड वर्जन डिजिटल अरेस्ट है। इसका शिकार बनाने के लिए पहले आपकी डिटेल इकट्ठा करके आपको टारगेट किया जाता है। फिर आपसे जुड़ी कोई ऐसी जानकारी आपको बताई जाती है जो वास्तविक में आपसे संबंधित हो। इसके बाद आपको कानून का डर दिखाकर आप पर ऐसे इल्जाम लगाए जाते हैं कि आप डर जाएँ और फिर धीरे-धीरे आपसे पैसे ऐंठे जाते हैं। ऊपर दिए केसों में में देख सकते हैं कि हर जगह कहीं पति की गिरफ्तारी का डर दिखाया गया, कहीं ड्रग केस का, कहीं मनी लॉन्ड्रिंग का और बाद में उनसे पैसे लूट लिए गए।

क्या पढ़े-लिखे भी हो रहे डिजिटल अरेस्ट का शिकार

आमतौर पर ठगी को लेकर कहा जाता है कि जिसे जानकारी नहीं होती या जो कम-पढ़ा लिखा होता है वो इन स्कैमों में फँस जाता है लेकिन डिजिटल अरेस्ट एक ऐसा स्कैम है जिसका शिकार पढ़े लिखे लोग ज्याजा होते हैं। डॉक्टर हो या फिर कोई इंजीनियर। इस स्कैम में कोई भी फँसाया जा सकता है। कभी इनकम टैक्स ऑफिसर बनकर आपको धमकी दी जाएगी, कभी पुलिस ऑफिसर बनकर, कभी सीबीआई का कोई अधिकारी बनकर… ये मामले इतने बढ़ गए हैं कि कुछ समय पहले साइबर क्राइम पुलिस ने इसे लेकर एडवाइजरी भी जारी की थी।

फ्रॉड की कैसे करें पहचान

डिजिटल अरेस्ट के मामलों को देखते हुए इस फ्रॉड को पहचानने के कुछ जरूरी बिंदु यही हैं कि अगर कोई अंजान नंबर से कॉल आपको आता है और वो अपने आपको कोई अधिकारी बताकर आपसे डिटेल माँगता है तो समझ जाएँ कि कुछ गड़बड़ है। तुरंत ऐसे मामलों में फोन काट दें और आगे ऐसे ठगों से आगे बात न करें। परेशान करने पर इसकी शिकायत फौरन दें। उनकी बात रिकॉर्ड करके शिकायत कराएँ।

बचने के तरीके

ऐसे ठगी के मामलों से बचने के लिए जरूरी है कि हमेशा खुद को सतर्क रखें। इसके बाद खुद पर यकीन रखें कि जो इल्जाम सामने वाला आप पर लगा रहा है वो सच कैसे हो सकता है जब आपने कुछ किया ही नहीं। अगर आपको लगता है कि ये बात सच हो सकती है कि इस बारे में संबंधित संस्थान से संपर्क करें। बताएँ कि उनके पास ऐसी कॉल आई है और इसकी सत्यता क्या है। पुष्टि होने पर फौरन इस मामले की शिकायत करें और दूसरों को भी बताएँ कि ऐसी कॉल के जरिए उन्हें ठगने का प्रयास हुआ था। कभी भी किसी को घर का एड्रेस, बैंक अकॉउंट की डिटेल, आधार कार्ड, पैन कार्ड की जानकारी न दें।

इसके अलावा तकनीकी रूप से भी खुद को बचाकर रखें। हमेशा अपनी हर साइट के पारवर्ड को अपडेट और स्ट्रॉन्ग रखें। कभी किसी प्रकार के ऑनलाइन झांसे में न फँसे। डिवाइस से कभी ऐसी साइट न इस्तेमाल करें जिन्हें लेकर संदेह हो कि उसमें वायरल हो सकता है। वीपीएन प्राइवेट नेटरवर्क का प्रयोग करें ताकि आपका इंटरनेट कनेक्शन एन्क्रिप्ट रहे। कोई आपकी गोपनीयता और सुरक्षा में हस्तक्षेप न कर पाए। ऑनलाइन सर्विसों के प्रति हमेशा चौकस रहें और सुरक्षित संचार माध्यमों का ही प्रयोग जानकारी साझा करने के लिए करें।

गोल्ड मेडल लाना चाहती थी वह डॉक्टर जिसकी कोलकाता के अस्पताल में रेप के बाद कर दी गई हत्या, डायरी में लिखी ‘अंतिम बात’ पिता ने बताई

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के RG कर मेडिकल कॉलेज में रेप के बाद मार दी गई छात्रा मेडिकल पढ़ाई में गोल्ड मेडलिस्ट बनना चाहती थी। गोल्ड मेडल लाने की इच्छा पीड़िता ने अपनी डायरी में भी लिखी है। वह रोज 10-12 घंटे पढ़ती भी थी। यह सारी बातें उसके पिता ने बताई है।

पीड़िता के पिता ने इंडिया टुडे से बातचीत ने बताया है कि उनकी बेटी काफी मेहनत के बाद यहाँ तक पहुँची थी। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी लगातार पढ़ते रहती थी। वह किताबों में व्यस्त रहती थी। पीड़िता के पिता ने बताया कि जिस दिन उसे रेप करके मारा गया, उस दिन ड्यूटी पर जाने से पहले उसने अपनी इच्छा डायरी में लिखी थी।

पीड़िता के पिता ने बताया कि उनकी बेटी RG कर मेडिकल कॉलेज के PG मेडिकल कोर्स में टॉप करना चाहती थी और गोल्ड मेडल लाना चाहती थी। उन्होंने बताया कि अब उनके सारे सपने टूट चुके हैं। पीड़िता के पिता ने बताया है कि देश उनकी बेटी को न्याय के लिए समर्थन दे रहा है, जिससे उन्हें आस जगी है।

उन्होंने माँग की है कि उनकी बेटी के बलात्कारी और हत्यारों को मौत की सजा दी जाए। पीड़िता के पिता ने मामले के जल्दी निपटारे और जाँच पूरी करके आरोपितों को सजा देने की माँग की हिया। उनका कहना है कि जब इस मामले में सजा का ऐलान होगा तभी उन्हें कुछ राहत मिल सकेगी।

पीड़िता के परिवार से इंडियन मेडिकल असोसिएशन (IMA) के पदाधिकारियों ने भी मुलाकात की है। IMA पदाधिकारियों ने कहा कि जिस हिसाब की नृशंसता से पीड़िता को मारा गया है, इससे साफ़ हो जाता है कि यह एक गैंगरेप था। IMA ने इस बात को लेकर भी नाराजगी जताई है कि आखिर RG कर मेडिकल कॉलेज के प्रधानाध्यापक ने इस मामले में FIR क्यों नहीं करवाई।

गौरतलब है कि कोलकाता के RG कर मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाली एक PG मेडिकल छात्रा का शव 9 अगस्त को अर्धनग्न अवस्था मिला था। उसके शरीर पर चोट के निशान थे। पोस्टमार्टम में साफ़ हुआ था कि छात्रा के साथ रेप हुआ है और फिर उसकी नृशंसता से हत्या कर दी गई।

इस मामले में कॉलेज और पुलिस प्रशासन पर शुरुआत में ढिलाई बरतने के के आरोप हैं। मामले में हीलाहवाली से क्षुब्ध होकर इसकी जाँच कलकत्ता हाई कोर्ट ने CBI को सौंप दी थी। इस बीच लगातार छात्र इस मामले में आरोपितों की गिरफ्तारी और न्याय के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। मामले में ममता बनर्जी सरकार पर प्रश्न उठ रहे हैं।

100 ग्राम वजन से हुई बाहर, 5 सदस्यों की जूरी ने सुनी अपील, 3 का मानना था विनेश फोगाट को मिले सिल्वर… फिर भी CAS में खाली हाथ रही भारतीय पहलवान: जानिए क्यों?

पेरिस ओलंपिक में 50 किलो भार वर्ग की फ्रीस्टाइल कुश्ती प्रतियोगिता के फाइनल में पहुँचने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी विनेश फोगाट को कोई पदक नहीं मिल सकेगा। उनका वजन निर्धारित मानक से 100 ग्राम अधिक निकला था, जिसकी वजह से उन्हें फाइनल मुकाबले में उतरने की अनुमति नहीं मिली थी। इस फैसले के खिलाफ विनेश फोगाट ने अपील की थी, लेकिन उनकी पहली अपील तुरंत ही खारिज हो गई थी, जिसके बाद उन्होंने इसे कोर्ट ऑफ अर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट्स (सीएएस) में चुनौती दी थी। लेकिन अब सीएएस ने अपना फैसला सुना दिया है, जिसमें विनेश फोगाट की अपील को खारिज कर दिया गया है।

इस मामले में सीएएस ने 9 अगस्त को ही फैसला सुरक्षित रख लिया था, लेकिन 14 अगस्त को उसने अपना फैसला 1 लाइन में सुना दिया। हालाँकि इस फैसले की पूरी जानकारी अभी नहीं आई है, लेकिन पूरी जानकारी आने के बाद शायद इस फैसले को चुनौती दी जा सके।

कोर्ट ऑफ अर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट्स द्वारा जारी किए गए प्रेस रिलीज में बताया गया है कि विनेश फोगाट ने सिल्वर मेडल के लिए जो अपील दाखिल की थी, उसे खारिज कर दिया गया है। सीएएस की ओर से बताया गया, “यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग (UWW) का फैसला ही मान्य है। विनेश फोगाट की अपील खारिज कर दी गई है।” इस मामले की सुनवाई ऑस्ट्रेलिया के सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज डॉ एनाबेले बेनेट कर रही थी।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, फाइनल मैच से पहले हुए वजन में 100 ग्राम ज्यादा होने की वजह से उन्हें जब गोल्ड मेडल के लिए मुकाबले में जाने से अयोग्य ठहराया गया, तभी विनेश फोगाट ने इस फैसले के खिलाफ अपील की थी, और फाइनल में उतरने की अनुमति माँगी थी, लेकिन यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग ने इस माँग को खारिज कर दिया था, इसके बाद विनेश की तरफ से सीएएस में अपील की गई थी।

सीएएस में की गई अपील में विनेश फोगाट की तरफ से कहा गया था कि अगर उन्हें फाइनल में नहीं खेलने दिया जा रहा है, तो उन्हें संयुक्त रूप से रजत पदक दिया जाए, क्योंकि वो पिछले मुकाबलों को निर्धारित वजन में रहकर ही जीती हैं। उन्होंने 7 अगस्त को ये अपील की थी, लेकिन 9 अगस्त तक UWW के पक्ष को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। दरअसल, सीएएस कोई भी फैसला करने से पहले UWW का पक्ष भी सुनना चाहती थी। हालाँकि इस फैसले को आगे चुनौती दी जा सकती है, लेकिन पूरा फैसला आगे के बाद ही इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन इस पर कोई फैसला ले पाएगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामले की सुनवाई कर रहे 5 सदस्यीय जूरी में से 3 सदस्य इस बात के लिए सहमत थे कि विनेश फोगाट को संयुक्त रूप से रजत पदक दे दिया जाए, लेकिन आखिरी फैसला ये हुआ कि अगर विनेश फोगाट को पदक दे दिया जाएगा, तो फिर बाकी खिलाड़ियों के लिए भी यही प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी। ऐसे में नियमों में बदलाव किया जाए और उसे आगे के टूर्नामेंट्स में लागू किया जाए। ऐसे में विनेश फोगाट को अभी के लिए सिर्फ दिलासा ही दिया जा सकता है। इस बीच, विनेश के पिता और कोच महावीर फोगाट ने कहा है कि सारी उम्मीदें खत्म हो गई हैं, इसके बावजूद विनेश के लौटने पर उनका स्वागत गोल्ड मेडलिस्ट की तरह ही किया जाएगा।

बता दें कि विनेश ने पेरिस ओलंपिक में गोल्ड मेडल पाने के लिए एक ही दिन में 3 धुरंधर पहलवानों को पटखनी दी थी। उन्हें सिर्फ फाइनल मैच खेलना था जिसे जीतकर गोल्ड अपने नाम कर लेतीं। मगर इस मेडल मैच और विनेश के बीच वो नियम आ गया, जिसमें किसी भी खिलाड़ी को उसके तय वजन से ज्यादा होने पर बाहर कर दिया जाता है और उसे कोई मेडल नहीं दिया जाता।

पाकिस्तान में बेल्जियम की युवती से 5 दिन तक रेप, हाथ-पैर बाँध सड़क पर फेंका: पुलिस ने तमीजुद्दीन को पकड़ा, जाँच जारी

बेल्जियम की एक महिला के साथ पाकिस्तान में लगातार पाँच दिन तक रेप हुआ। इसके बाद उसको राजधानी इस्लामाबाद की सड़कों पर फेंक दिया गया। महिला लावारिस हालत में मिली, इसके बाद उसको अस्पताल में भर्ती करवाया गया। मामले में पाकिस्तान की पुलिस ने एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया है।

जानकारी के अनुसार, यह घटना बुधवार (14 अगस्त, 2024) की है, जिस दिन पाकिस्तान अपना आजादी का जश्न मनाता है। बताया गया कि बेल्जियन महिला को इस्लामाबाद के G-6 सेक्टर में लावारिस हालत में पाया गया। उसके हाथ पैर को रस्सी से बाँध रखा गया था। यहाँ आसपास मौजूद लोगों ने महिला को अस्पताल पहुँचाया।

महिला का नाम स्टिनी सिल्वा है और वह 28 वर्ष की है। उसने पुलिस को दी गई अपनी एक शिकायत में कहा है कि कई अज्ञात लोगों ने पाँच दिनों तक उसे बंधक बना कर रखा और रेप किया। पुलिस ने इस संबंध में मामला दर्ज कर जाँच चालू कर दी है। यह भी बताया गया है कि एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है।

पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का नाम तमीजुद्दीन है। बताया गया है कि जाँच आगे बढ़ने पर पुलिस उससे पूछताछ करेगी। इस बीच पीड़िता ने तमीजुद्दीन को पहचान लिया है और पुलिस को सूचना दी है कि रेप करने में वह भी शामिल था।

तमीजुद्दीन को आबपारा पुलिस ने उसके घर से गिरफ्तार किया है और आगे की मेडिकल जाँच के लिए अस्पताल भेज दिया है। तमीजुद्दीन ने दूसरी तरफ खुद को बेकसूर बताया है। उसने बेल्जियन महिला के दावों को खारिज करते हुए दावा किया है कि महिला मानसिक रूप से बीमार है।

तमीजुद्दीन ने दावों का खंडन करने के बाद महिला को पहचान भी लिया। तमीजुद्दीन ने बताया कि बेल्जियन महिला के पास सही कागज नहीं है, वह इनके बिना ही पाकिस्तान आई है। पुलिस ने पीड़िता के दस्तावेजों का पता लगाने के लिए तमीजुद्दीन के अपार्टमेंट में तलाशी भी ली है। मामले में आगे की जाँच चल रही है।

पुलिस ने महिला की पहचान स्थापित करने के लिए बेल्जियम और नीदरलैंड के दूतावासों से भी सम्पर्क साधा है। हालाँकि, यहाँ से भी महिला के विषय में कोई जानकारी नहीं मिली है। पुलिस का कहना है कि महिला उर्दू और अंग्रेजी बोल लेती है और उसकी मानसिक स्थिति ठीक है।

कट्टरपंथी हिंसा से महिला T-20 वर्ल्ड कप पर संकट, जय शाह ने बांग्लादेश का ऑफर ठुकराया: बताया- NCA में ओलंपिक खिलाड़ी भी ले सकेंगे ट्रेनिंग

बांग्लादेश में चल रही राजनीतिक उठापटक के बीच बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने बीसीसीआई से अनुरोध किया है कि वो अक्टूबर माह में होने वाले महिला क्रिकेट-20 विश्व कप का आयोजन उसकी जगह पर कर ले, लेकिन बीसीसीआई ने उसके अनुरोध को खारिज कर दिया है।

दरअसल, अगले ही महीने भारत को बांग्लादेश के साथ टेस्ट सीरीज खेलनी है, जिसमें बांग्लादेश की टीम भारत आएगी, तो उसके बाद अक्टूबर महीने में बांग्लादेश में महिला क्रिकेट टी-20 विश्वकप का आयोजन होना है। लेकिन बांग्लादेश में अस्थिरता की वजह से ऐसा होना दिख नहीं रहा है।

बीसीसीआई के सचिव जय शाह ने टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ बातचीत में साफ किया है कि बांग्लादेश की तरफ से प्रस्ताव आया था कि बीसीसीआई अक्टूबर महीने के टी-20 महिला क्रिकेट विश्वकप को होस्ट कर ले, लेकिन हमने (बीसीसीआई) ने साफ मना कर दिया।

जय शाह ने कहा, “अभी भारत में मानसून का समय चल रहा है। अगरे साल भारत खुद 50 ओवरों का महिला क्रिकेट विश्व कप होस्ट कर रहा है। मैं ये बिल्कुल नहीं चाहूँगा कि हमारे बारे में ये राय बने कि हम लगातार विश्वकप आयोजन अपने ही देश में चाहते हैं।”

इस बीच, जय शाह से अगले महीने होने वाले भारत-बांग्लादेश टेस्ट सीरीज को लेकर सवाल पूछा गया कि क्या ये सीरीज लटक सकती है? इसके जवाब में जय शाह ने साफ तौर पर कहा कि अभी ऐसी कोई खबर नहीं है। बांग्लादेश में नई सरकार अभी आई है। वो (बांग्लादेश क्रिकेट) हमसे जरूर इस सीरीज को लेकर संपर्क करेंगे। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो हम अपनी तरफ से संपर्क करेंगे। हमारे लिए बांग्लादेश के साथ सीरीज बहुत जरूरी है। हम इसके आयोजन के लिए पूरी कोशिश करेंगे।

इस दौरान जय शाह ने ये भी बताया कि बेंगलुरु में एनसीए (नेशनल क्रिकेट अकादमी) का सेंटर बनकर तैयार हो चुका है, जो बहुत भव्य है और बहुत बड़ा है। इस बड़े सेंटर में सिर्फ क्रिकेट ही नहीं, बल्कि ओलंपिक खेलों से जुड़े खिलाड़ी भी ट्रेनिंग ले सकेंगे। यहाँ सारी व्यवस्थाएँ की गई है। इसके अलावा उन्होंने वाराणसी में क्रिकेट स्टेडियम और सेंटर के साथ ही भारत के नॉर्थ-ईस्ट राज्यों में क्रिकेट की सुविधाओं को बढ़ाने पर जोर दिया।

एनसीए सेंटर के बनने में लगे सवाल पर उन्होंने कहा कि बीसीसीआई ने 2008 में ही जमीन खरीद ली थी, लेकिन इस पर काम मेरे दूसरे कार्यकाल में शुरू हुआ, लॉकडाउन के बाद जब बीसीसीआई का दफ्तर शुरू हुआ तब। जय शाह ने साफ कहा कि उन्हें नहीं पता कि एनसीए पर काम उनके पूर्ववर्तियों ने क्यों नहीं कराया।

वीर सावरकर-चंद्रशेखर आजाद की फोटो वाली टीशर्ट पहन तिरंगा यात्रा निकाल रहे थे बच्चे, कॉन्ग्रेस नेताओं ने उतारने का डाला दबाव: स्कूल प्रिंसिपल की शिकायत के बाद 5 पर FIR

कॉन्ग्रेस के एक संगठन सेवा दल के राष्ट्रीय मुख्य आयोजक लालजी देसाई और गुजरात कॉन्ग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रुत्विक मकवाना सहित पाँच लोगों के खिलाफ एक मामला दर्ज किया गया है। इन्होंने एक सरकारी स्कूल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था। इस स्कूल में विद्यार्थियों ने बुधवार (14 अगस्त) को तिरंगा यात्रा में भाग लेते हुए वीर सावरकर और चंद्रशेखर आजाद की तस्वीरों वाली टी-शर्ट पहनी थी।

कॉन्ग्रेस से जुड़े पाँचों लोगों के खिलाफ राजकोट जिले के चोटिला पुलिस थाने में दर्ज प्राथमिकी की गई है। प्राथमिकी में इन लोगों के खिलाफ यात्रा में बाधा डालने और सुरेंद्रनगर के सांगनी गाँव के प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक और शिक्षकों को उनके कर्तव्यों का निर्वहन करने से रोकने का आरोप लगाया गया है।

इन लोगों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 197(1)(सी) (दो समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 197(1)(डी) (झूठी या भ्रामक जानकारी बनाना या प्रकाशित करना, जिससे भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता या सुरक्षा को खतरा हो), 126(2) (गलत तरीके से रोकना), 189(2) (गैरकानूनी जमावड़ा), 221 (लोक सेवक को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से स्वेच्छा से बाधा डालना), 352 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) और 353(2) (विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी, घृणा या दुर्भावना की भावना पैदा करने या बढ़ावा देने की संभावना वाले किसी भी बयान या रिपोर्ट को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों सहित बनाना, प्रकाशित या प्रसारित करना) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

इस मामले में स्कूल के प्रधानाचार्य कल्पेश चौहान ने थाने में शिकायत दी थी। उनके शिकायत के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई है। FIR में कहा गया है कि कॉन्ग्रेस के नेताओं ने छात्रों और शिक्षकों को सुबह करीब 11 बजे अपना मार्च रोकने के लिए मजबूर किया था। दरअसल, कॉन्ग्रेस नेता गुजरात न्याय यात्रा निकाल रहे थे और सामने बच्चों की तिरंगा यात्रा आ गई थी।

कॉन्ग्रेस नेता लालजी देसाई ने प्रिंसिपल से कहा, “आपको छात्रों से उसी सावरकर की टी-शर्ट पहनने के लिए कहने में शर्म नहीं आती, जो महात्मा गाँधी की हत्या की साजिश का हिस्सा थे? अगर मैं कल आपको नाथूराम गोडसे या किसी रंगा-बिल्ला या दाऊद की टी-शर्ट दूँ तो क्या आप छात्रों से कहेंगे कि वे नाथूराम गोडसे या किसी रंगा-बिल्ला या दाऊद की टी-शर्ट पहनें? सावरकर की टी-शर्ट पहनने के लिए कहकर आजादी का अपमान न करें।”

पुलिस ने कहा कि कॉन्ग्रेस नेताओं ने भगवा टी-शर्ट पहने छात्रों का वीडियो शूट करके सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। FIR के अनुसार, कुछ कॉन्ग्रेस नेताओं ने प्रिंसिपल और शिक्षकों से छात्रों से अपनी टी-शर्ट उतारने का निर्देश देने को कहा। प्रिंसिपल ने सावरकर और आज़ाद को स्वतंत्रता सेनानी बताते हुए कहा कि ये टी-शर्ट मुंबई के इंदुमती वसंतलाल चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से उपहार में दी गई हैं।

न बेड बचा न, मेडिकल उपकरण… कोलकाता के अस्पताल का हाल देख स्टाफ डरे, चश्मदीद बोले- बाहर से आए थे उपद्रवी: पुलिस ने कहा- जहाँ हुआ डॉक्टर का रेप-मर्डर, वहाँ तोड़फोड़ नहीं

पश्चिम बंगाल के आर जी कर अस्पताल में तोड़फोड़ के बीच सोशल मीडिया पर आज कुछ वीडियोज सामने आई। इन वीडियोज में दिखाया गया कि कैसे सैंकड़ों की भीड़ ने अस्पताल में घुस उपद्रव मचाया और डॉक्टरों को निशाना बनाया। विजुअल्स में प्रदर्शनस्थल पर टूटी कुर्सियाँ, फटे बैनर, टूटी गाड़ी, जूते-चप्पल और अस्पताल के भीतर पलटे गए बेड और मेडिकल उपकरण भी देखे गए।

वीडियो साझा करते हुए कई जगह दावे हुए कि इन उपद्रवियों ने उस स्थल को भी तोडा है जहाँ घटना को अंजाम दिया गया। दावों पर आधारित कई मीडिया रिपोर्ट भी छपी। हालाँकि बाद में बंगाल पुलिस का बयान आया। उन्होंने इस दावे को फर्जी बताया। उन्होंने कहा कि घटना जहाँ अंजाम दी गई वो सेमिनार रूम था। वहाँ तोड़फोड़ नहीं हुई है। झूठी खबर फैलाने पर कार्रवाई की जाएगी।

गौरतलब है कि एक तरह जहाँ बंगाल पुलिस सोशल मीडिया पर फर्जी जानकारी फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई की बात कह रही है। वहीं लोगों का कहना है कि पुलिस को इसी सख्ती से उपद्रवियों के खिलाफ भी एक्शन लेना चाहिए। तमाम चश्मदीद हैं जो रोकर, डरकर पूरी स्थिति बता रहे हैं।

सोशल मीडिया पर एक महिला प्रदर्शनकारी की वीडियो वायरल है। वो चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है- “हमें लगातार पीटा जा रहा है। वो हमें मार देंगें। हम प्रदर्शन के लिए आए थे।” इसी तरह अन्य वीडियो में खुद को रेजिडेंट डॉक्टर बताने वाले लोग बता रहे हैं कि कैसे भीड़ उन पर हमला कर रही है। सबको छिपना पड़ रहा है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सुभेंदु मलिक नाम के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया, “अस्पताल में उपद्रवियों की भीड़ घुसी थी। उन्होंने प्रदर्शनकारी डॉक्टरों पर हमला किया, जिसके बाद सबको भागना पड़ा। उपद्रवियों ने उस बिल्डिंग में भी घुसने की कोशिश की, जहाँ जूनियर डॉक्टर के साथ बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई। पुलिस इस दौरान मूकदर्शक बनी हुई थी।

अनिकेत मैती नामक एक जूनियर डॉक्टर ने कहा, “हम हमला शुरू होने से बहुत पहले ही उपद्रवियों को अस्पताल के बाहर इकट्ठा होते देख रहे थे। हमने पुलिस से कदम उठाने का अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। जब उपद्रव शुरू हुआ तो पुलिसकर्मी अस्पताल परिसर के अंदर शरण लेने के लिए भागे।”

सिक्योरिटी गार्ड प्रणय दास ने कहा, “कल रात करीब 1 बजे जब करीब 500-1000 लोग यहाँ आए। हमने यहाँ गेट बंद किया, लेकिन उन्होंने उसे तोड़ दिया। हम दूसरे गेट पर गए, लेकिन उन्होंने उसे भी तोड़ दिया। वे बहुत ज्यादा थे, हम 10-12 लोग और पुलिस थे। इसलिए हम उनका मुकाबला नहीं कर सकते थे। वे अंदर घुस आए और संपत्ति को तहस-नहस कर दिया। उन्होंने हर जगह नुकसान पहुँचाया, कंप्यूटर से लेकर दवाइयों तक। उन्होंने सीसीटीवी कैमरे भी तोड़ दिए।”

गौरतलब है कि पीड़ितों के बयान, सोशल मीडिया पर होते दावों के बीच प्रदेश के भाजपा सांसद जगन्नाथ सरकार ने भी आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा पुलिस केवल कोलकाता पुलिस आयुक्त और ममता बनर्जी के कहने पर काम कर रही है। पुलिस मीडिया पर आरोप लगा रही है लेकिन टीएमसी गुंडे थे जो बाहर से आए और तोड़फोड़ की। भाजपा सांसद का आरोप है कि ये सब ममता बनर्जी करवा रही हैं।

इस्लाम-वामपंथ के नाम पर करोड़ों लोगों का कत्ल हुआ, अब हर साल जहरीली एलोपैथिक दवाएँ खाकर मर रहे करोड़ों: बाबा रामदेव, आर्थिक स्वतंत्रता का किया आह्वान

योग गुरु बाबा रामदेव ने कहा है कि सिंथेटिक एलोपैथी दवाएँ खा कर करोड़ों लोग हर साल मर रहे हैं। बाबा रामदेव ने कहा कि इससे पहले इस्लाम और वामपंथ के नाम पर करोड़ों को लोगों को मारा जा चुका है। बाबा रामदेव ने कहा कि वह देश की आर्थिक आजादी के लिए प्रयास करेंगे।

बाबा रामदेव ने हरिद्वार पतंजलि पीठ में गुरुवार (15 अगस्त, 2024) को तिरंगा फहराया। इसके बाद उन्होंने मीडिया से बात करते हुए चिंता व्यक्त की कि विश्व की संपदा पर मात्र कुछ लोगों का कब्ज़ा है। उन्होंने अंग्रेजों की लूट का भी उदाहरण दिया।

बाबा रामदेव ने कहा, “हमारी प्रतिबद्धता है कि हम राजनीतिक आजादी के साथ-साथ इस देश में आर्थिक आजादी के लिए एक बड़ी क्रान्ति कर रहे हैं और करेंगे। क्योंकि पूरी दुनिया की सम्पत्ति, एश्वर्य और वैभव पर 1% आबादी का एकाधिकार है। साम्राज्यवादी ताकतों ने सारी सम्पत्ति को जकड रखा है।”

उन्होंने आगे कहा, “ईस्ट इंडिया कम्पनी से लेकर अंग्रेजों ने इस देश में एक हजार लाख करोड़ की लूट की है। अभी भी भारत की लाखों करोड़ की अर्थव्यवस्था पर, भारत के शेयर मार्केट से लेकर हर सेक्टर पर, FMCG पर विदेशी ताकतों का कब्जा है। यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था पर कब्ज़ा होता है तो यह शर्म की बात है।”

इसके बाद उन्होंने जहरीली दवाओं से लोगों की मौत का मुद्दा उठाया। बाबा रामदेव ने कहा, “एलोपैथी की जहरीली दवाएँ खाकर करोड़ों लोगों की मौत हो रही है। अंग्रेजों ने अपना साम्राज्य कायम करने के लिए 10 करोड़ लोगों का क़त्ल किया। इस्लाम के नाम पर करोड़ों लोग मारे गए। लेनिन और माओ की क्रान्ति की नाम पर भी करोड़ों लोग मारे गए। लेकिन अब हर साल निर्दोष लोग जहरीली और सिंथेटिक दवाएँ खाकर मर रहे हैं। पतंजलि इसके विरुद्ध आन्दोलन मुखर करेगा।”

गौरतलब है कि बाबा रामदेव इससे पहले भी एलोपैथिक दवाओं से होने वाले साइड इफेक्ट के दुष्परिणामों पर बोलते आए हैं। हाल ही में उनको इस संबंध में कोर्ट में कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी थी। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें माफ़ी माँगने को भी कहा था।