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मुहर्रम की नंगी तलवारों में जिन वामपंथियों को दिखती है ‘शांति’, हिंदुओं के त्रिशूल वितरण में उनको दिख रहा ‘भय’: तरुण की हत्या The Wire के लिए मामूली विवाद

दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दिन हिंदू युवक तरुण कुमार की मुस्लिमों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। तब किसी वामपंथी ने एक शब्द नहीं बोला। परिवार बेसहारा हुआ, तो कोई लेफ्ट लिबरल गैंग का सदस्य उन्हें सांत्वना देने नहीं पहुँचा। पीड़ित होने के बावजूद उन्हीं पर हत्या के इल्जाम लगे। किसी ने आवाज नहीं उठाई। लेकिन जब हिंदू समाज ने तरुण के परिवार के साथ एकजुटता दिखाई तो इस धड़े का हर व्यक्ति बिलबिला उठा।

आज इस घटना को सवा महीने बीतने के बाद भी ये घृणा दबी नहीं है। ‘द वायर’ ने एक आर्टिकल पब्लिश किया है। इसमें उन्होंने मुद्दा इस चीज को लेकर बनाया है कि उत्तम नगर से थोड़ी दूर स्थित अयप्पा पार्क के पास क्यों हिंदू समाज के लोग अब भी एक्टिव हैं, क्यों आसपास कार्यक्रम करवाकर तरुण के मुद्दे को खत्म नहीं होने दिया जा रहा, क्यों कार्यक्रम में आत्मरक्षा के नाम पर छोटे त्रिशूल दिए जा रहे हैं।

अपनी रिपोर्ट में द वायर ने तरुण की हत्या मामले को एक ‘मामूली विवाद’ बताया है। इसके बाद इस बात पर जोर दिया है कि कैसे मुस्लिम परिवार को आरोपित बनाकर उनके घर पर बुलडोजर चलाया गया और स्थिति ऐसी कर दी गई कि उन्हें घर छोड़कर वहाँ से निकलना पड़ा। आगे ये दिखाने की कोशिश हुई है कि एक तरफ तो मुस्लिम परिवार के साथ ये सब हुआ और दूसरी ओर अब हिंदू समाज के लोग यहाँ कार्यक्रम कर रहे हैं।

द वायर को ‘त्रिशुल दीक्षा’ के जमीन पर मायने अलग लग रहे

द वायर ने इस कार्यक्रम की ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर यह आर्टिकल लिखा है और वह इस आर्टिकल में संगठन के हवाले से बता रहा है कि यह ‘त्रिशूल दीक्षा’ कार्यक्रम है, जो ‘संस्कार, सेवा और सुरक्षा’ का संकल्प दिलाने के लिए होता है। इसके बावजूद वह अपनी कमेंटरी से पीछे नहीं हटता और लिखता है- जमीन पर इसके मायने कहीं अधिक जटिल दिखाई देते हैं। मानो किसी को समझ नहीं आ रहा है कि किस ओर इशारा किया जा रहा है।

इस कमेंटरी के बाद वह VHP (इंद्रप्रस्थ) के प्रचार-प्रसार प्रमुख संजीव कुमार के उस बयान को आगे जोड़ देता है, जो उसके हिसाब से इस कमेंटरी के लिए फिट बैठता है। संजीव कुमार का वो बयान, जिसमें वह कहते हैं कि आने वाले दिनों में पूरी दिल्ली में 30 हजार से अधिक त्रिशूल वितरित किए जाने की संभावना है। यहाँ आर्टिकल पढ़ने वाले आम इंसान के मन में ये नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की गई है कि अभी तो और त्रिशूल बँटने है, जिनसे जमीन पर मायने पूरी तरह बदल जाएँगे।

तरुण की हत्या से कार्यक्रम को जोड़ा

दिलचस्प बात है कि ये बात जानते हुए कि दिल्ली विश्व हिंदू परिषद त्रिशूल वितरण कार्यक्रम पहली बार नहीं करवा रहा, द वायर ने इसे मुद्दा बनाया। उसके लिए गौर करने वाली बात कार्यक्रम की लोकेशन है। उत्तम नगर में होली के दिन हुई तरुण की हत्या, जिसे असहिष्णु इस्लामी कट्टरपंथियों ने अंजाम दी। इसके बाद जब पीड़ित परिवार के न्याय की बात आई, तो हिंदुओं ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। कहीं कोई हिंसा की खबरें नहीं आई।

बावजूद बिना किसी मतलब के द वायर ने ‘त्रिशूल दीक्षा’ कार्यक्रम और तरुण की हत्या को एक खेमे में रखा। उसने नैरेटिव बनाने के लिए अपराधियों का नाम लिए बिना घटना को ‘मामूली’ करार दिया और इसका ठीकरा हिंदुओं पर फोड़ डाला। इतना ही नहीं द वायर को अपराधियों के घर पर बुलडोजर चलने की भी बड़ी चिंता हुई। लेकिन तरुण को न्याय दिलाने के लिए एक शब्द भी बोलना मुनासिब नहीं समझा।

बात रही उत्तर नगर से कुछ दूर पर कार्यक्रम करने की, तो VHP पदाधिकारियों से बातचीत में द वायर खुद बताता है कि ‘उत्तम नगर को इसलिए चुना गया क्योंकि इस जिले का नंबर आया है, और कोई कारण नहीं है।’

द वायर को पता है कि यह कार्यक्रम पहली बार नहीं करवाया जा रहा है, इसके बावजूद बात को तोड़-मरोड़कर पेश कर अपना नैरेटिव गढ़ लिया और लेख के अंत में जाकर लिखा कि ऐसा कार्यक्रम साल 2024 में भी हुआ था और साल 2025 में भी शस्त्र दीक्षा समारोह के तहत 20 हजार लड़कियों को कटार बाँटी गई थी।

कार्यक्रम में भाषण को ‘उग्र’ और मुस्लिम हेट स्पीच को बताया ‘कथित’

अमूमन द वायर ने इस पूरे कार्यक्रम को अपने नैरेटिव के अनुसार कवर किया। कार्यक्रम में शामिल लोगों की हलचल को कैमरे में अपने अनुरूप कैद किया। मंच से दिए गए भाषण को ‘उग्र’ बताकर पेश किया गया। कार्यक्रम में ‘हनुमान चालीसा’ के पाठ से असहजता सामने रखी। तरुण के परिवार की न्याय की माँग को तक अतिवाद का रूप दिया गया।

इतना ही नहीं जमीनी हकीकत को समझने से भी द वायर पीछे नहीं हटा और इसे ‘कथित’ बताकर लिखा गया। चाहे वो हैदराबाद में अकबरुद्दीन ओवैसी का 15 मिनट का भाषण पर की गई टिप्पणी हो, या दिल्ली के त्रिनगर में मुस्लिमों के डर से पलायन को मजबूर हुए हिंदुओं की बात हो।

द वायर का दोहरा रवैया

वामपंथी ‘द वायर’ का इस कार्यक्रम को कवर करने का मंसूबा आर्टिकल के लिखे गए स्टाइल से ही समझ आता है। वह पढ़ने वाले को सोचने के लिए मजबूर कर देता है कि कैसे कार्यक्रम के नाम पर हिंसा के प्रति उकसाया जा रहा है। जबकि हकीकत भी उसने इसी आर्टिकल के कुछ अंशों में साफ झलका दी है। लेकिन तोड़-मरोड़कर पेश किए जाने के चलते एक आम इंसान की सोच पर असर डालने वाला है।

द वायर की सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। आज एक हिंदूवादी कार्यक्रम से असहज होने वाला द वायर कभी किसी मुस्लिम जुलूस पर नहीं बोलता। तब इसे समस्या नहीं होती जब मुस्लिम ‘मुहर्रम’ में तलवार लहराकर सड़कों पर निकलते हैं, हाथों में धारदार हथियार दिखते हैं। ऐसे माहौल में सड़क से गुजरने वाला हर आम इंसान डर जाता है। परिवार में माँ-बाप अपने बच्चे को घर से बाहर निकलने से मना कर देते हैं, लड़कियों को बाहर निकलने से खतरा बताया जाता है।

लेकिन द वायर तब बिलखने लगता है कि जब हिंदू कार्यक्रम आयोजित किया जाता है और तस्वीरें खींचने के लिए हाथ में त्रिशूल थामे जाते हैं और सेवाभाव से इसे लोगों में बाँटा जाता है। जबकि इस कार्यक्रम से न कोई आम इंसान घबराता है। न किसी परिवार में माँ-बाप अपने बच्चे को बाहर निकलने से रोकते हैं और न कोई लड़की किसी खतरे को महसूस करती है। यह एकता का प्रतीक और अपने हितों की बात करने से ज्यादा और कुछ नहीं लगता।

300 वर्ष पहले ही भारत में रख दी विकास की नींव, रानी अहिल्याबाई ने बनवाई सड़कें-मंदिर-बाँध: जानिए भारत की एकता में क्या रहा ‘मालवा की रानी’ का योगदान

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार 13 अप्रैल 2026 को मुजफ्फरनगर में रानी अहिल्याबाई होल्कर की भव्य प्रतिमा का अनावरण किया। यह कार्यक्रम जिला अस्पताल चौराहे पर आयोजित हुआ, जहाँ सीएम ने कई विकास परियोजनाओं का भी लोकार्पण किया।

मुजफ्फरनगर में यह अनावरण ₹951 करोड़ की 423 परियोजनाओं के साथ हुआ। सीएम योगी ने लोकमाता अहिल्याबाई के न्यायप्रिय शासन और लोक कल्याण कार्यों की याद दिलाई। यह उनके 300वीं जयंती वर्ष का हिस्सा है। माहेश्वर में अहिल्याबाई होल्कर की मौजूदा प्रतिमा उनके योगदान का प्रतीक है।

महारानी अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमाएँ देश के विभिन्न हिस्सों में स्थापित हो चुकी हैं, जो उनके शासनकाल, धार्मिक योगदान और लोक कल्याण कार्यों की स्मृति को जीवंत रखती हैं।

मध्य प्रदेश के माहेश्वर में नर्मदा तट पर उनकी एक प्रमुख प्रतिमा स्थित है, जो उनके सादगीपूर्ण जीवन और राजधानी के रूप में चुने गए इस स्थान का प्रतीक है। माहेश्वर में स्थित यह प्रतिमा अहिल्याबाई होल्कर के शाही स्वरूप और धार्मिक निष्ठा को खूबसूरती से दर्शाती है।

इंदौर के राजवाड़ा के सामने अहिल्या चौक पर भी एक भव्य प्रतिमा स्थापित है, जिसे लगाने में 36 वर्षों का लंबा संघर्ष हुआ। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में संगम नोएडा पर 12 फीट ऊँची प्रतिमा का अनावरण 2025 में डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने किया, जबकि जयपुर के हरिपुरा क्षेत्र के अहिल्याबाई होल्कर उद्यान में 8 फीट की प्रतिमा 2025 में स्थापित हुई।

गुजरात के अहमदाबाद में शहर की पहली प्रतिमा पाल बघेल समुदाय ने स्थापित की, वहीं सोमनाथ में उनकी मंदिर निर्माण की स्मृति में दूसरी प्रतिमा है।

जबलपुर के तिलवाराघाट पर नर्मदा तट के किनारे 2025 में एक और प्रतिमा लोकार्पित हुई। इसके अलावा काशी विश्वनाथ क्षेत्र के मणिकर्णिका घाट पर हाल में स्थानांतरण के बाद उनकी प्रतिमा की पूजा प्रारंभ हुई।

300वीं जयंती वर्ष के अवसर पर कई अन्य शहरों जैसे आगरा आदि में स्थानीय समितियों ने प्रस्ताव दिए हैं। प्रस्तावित प्रतिमाओं की बात करें तो उत्तर प्रदेश के संभल जिले के सद्भावना पार्क में उनकी प्रतिमा लगाने की योजना पर डीएम और एसपी ने 2025 में निरीक्षण किया जो जल्द ही पूरा हो सकता है।

इसके अलावा महाराष्ट्र में पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर स्मारक स्थल पर ₹681 करोड़ की परियोजना के तहत एक भव्य प्रतिमा प्रस्तावित है, जिसमें उनके जीवन से जुड़े स्मारक शामिल होंगे। ये सभी प्रयास अहिल्याबाई के न्यायप्रिय शासन और सांस्कृतिक एकता के संदेश को आगे बढ़ाते हैं।

महारानी से लोकमाता बनने का अहिल्याबाई का सफर

महारानी अहिल्याबाई होल्कर का जीवन भारतीय इतिहास की एक ऐसी प्रेरणादायी कहानी है, जो शासन, धर्म, समाज सुधार और लोक कल्याण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है।

31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के चौंडी गाँव में एक साधारण धांगर परिवार में जन्मीं अहिल्याबाई ने 28 वर्षों तक मालवा साम्राज्य पर शासन किया और पूरे भारत में मंदिरों, घाटों, धर्मशालाओं तथा सड़कों का निर्माण करवाकर सनातन संस्कृति की रक्षा की।

2025 में उनकी 300वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भोपाल में विकास परियोजनाओं का लोकार्पण किया, स्मारक डाक टिकट और सिक्का जारी किया तथा काशी विश्वनाथ मंदिर में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई, जो उनके योगदान का प्रमाण है।

प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

अहिल्याबाई का जन्म माकोजी शिंदे और सुशीला बाई के घर हुआ, जहाँ उनके पिता गाँव के पाटिल थे। बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति की अहिल्याबाई मंदिर सेवा में रुचि रखती थीं। बाजीराव पेशवा के सेनापति मल्हार राव होल्कर ने 1733 में उनका विवाह अपने पुत्र खांडेराव से करवाया लिया।

पति की 1754 में कुम्भेर के युद्ध में मृत्यु के बाद उन्होंने सती होने का संकल्प लिया, किंतु ससुर मल्हार राव ने उन्हें रोककर प्रशासन और युद्धकला सिखाई। 1766 में मल्हार राव तथा 1767 में पुत्र माले राव की मृत्यु के बाद पेशवा से अनुमति लेकर उन्होंने 11 दिसंबर 1767 को इंदौर की गद्दी संभाली।

उनका शासनकाल मराठा साम्राज्य के लिए स्वर्णिम युग सिद्ध हुआ। उन्होंने महेश्वर को राजधानी बनाया, जहाँ नर्मदा तट पर सादा जीवन व्यतीत किया। व्यक्तिगत खजाने से ही उन्होंने कई लोक कल्याण कार्य किए।

अहिल्याबाई का मानना रहा कि राज्य कोष का दुरुपयोग न किया जाए। ब्रिटिश अधिकारी सर जॉन माल्कम ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि वे न्याय की मूर्ति थीं तथा प्रजा के दुख-दर्द को स्वयं सुनती थीं।

शासन प्रणाली और प्रशासनिक कुशलता

अहिल्याबाई का शासन कल्याणकारी राज्य का प्रतीक था। उन्होंने दैनिक दरबार लगाकर प्रजा की समस्याएँ सुनीं तथा न्याय निःशुल्क प्रदान किया। जाति, धर्म भेदभाव के बिना उन्होंने ब्राह्मण, मराठा, बहुजन, मुस्लिम सबको सभी को समान अवसर दिया। टिपू सुल्तान के राज्य से ब्राह्मणों ने शरण ली, निजाम के क्षेत्रों में भी शांति बनी रही।

उन्होंने सैन्य शक्ति पर ध्यान दिया। 1792-93 में अमेरिकी जनरल बॉयड को राज्य में नियुक्त कर ब्रिटिश शैली की ड्रिल सेना गठित की। साथ ही पेशवा को पत्र लिखकर सैन्य सुदृढ़ीकरण की सलाह दी।

उनके शासन से मालवा आर्थिक दृष्टि से काफी समृद्ध हुआ। कर-व्यवस्था बेहतर हुई। व्यापार को भी प्रोत्साहन मिला। उन्होंने माहेश्वरी साड़ियों का उद्योग स्थापित कर स्थानीय आदिवासी महिलाओं को प्रशिक्षित किया, जिससे वे आत्मनिर्भर बनीं। इसके अलावा किसानी में मिश्रित फसलें, मसाले, बागवानी को बढ़ावा दिया। साथ ही बीज परीक्षण, जल संरक्षण, तालाब, बाँध पर जोर दिया।

रानी अहिल्याबाई ने माहेश्वर को सांस्कृतिक केंद्र बनाया। वहाँ कवि, कलाकार, विद्वानों को संरक्षण मिली। उन्होंने पुस्तकालय स्थापित कर धार्मिक ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ बनवाईं।

इसके अलावा महिलाओं के लिए क्रांतिकारी कदम उठाए। विधवा के लिए पुनर्विवाह को प्रोत्साहन दिया, संपत्ति में अधिकार, शिक्षा तथा सेना में भर्ती जैसे कई विस्तार में महिलाओं को अग्रणी रखने में उनकी सर्वाधिक भूमिका रही।

धार्मिक योगदान और सांस्कृतिक पुनरुत्थान

अहिल्याबाई ने मुगल आक्रमणों से क्षतिग्रस्त मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया। काशी विश्वनाथ (1780), ज्ञानवापी क्षेत्र में कार्य, सोमनाथ (अहिल्याबाई मंदिर के नाम से प्रसिद्ध), केदारनाथ, बद्रीनाथ, त्र्यंबकेश्वर, ओंकारेश्वर, महाकालेश्वर आदि 12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़े स्थलों का निर्माण करवाया।

इसके अलावा काशी में मणिकर्णिका घाट, दशाश्वमेध घाट, लोलार्क कुंड का निर्माण करवाया। काशी के साथ हरिद्वार में घाट-धर्मशाला बनवाई, गया में विष्णुपद मंदिर, वृंदावन में बावड़ी और भोजनालय बनवाए और पुरी में छत्र दान का निर्माण करवाया।

उन्होंने काशी से लेकर कोलकाता तक जाने वाली देशव्यापी सड़कें, पुल और देश भर में तालाब बनवाए। गर्मियों में लोगों की सहूलियत के लिए प्याऊ लगवाए और सर्दियों में लोगों के बीच गर्म कपड़ों के वितरण को बढ़ावा दिया। यहाँ तक कि चिड़ियों और मछलियों के लिए चारा स्थल भी बनवाया।

अहिल्याबाई ने व्यक्तिगत धन से ब्रह्मपुरी (काशी) और सदावर्त को स्थापित किया। यह कार्य राष्ट्रीय एकता का प्रतीक के तौर पर उभरा। ऐसा करके मालवा की रानी ने पूरे भारत को आपस में जोड़ा और सशक्तिकरण की मिसाल कायम की।

सामाजिक सुधार और महिला सशक्तिकरण

रानी अहिल्याबाई समाज सुधारों में अग्रणी रहीं। विधवाओं को पुनर्विवाह, शिक्षा, आर्थिक सहायता दी। आदिवासी महिलाओं को कपड़ा बुनाई सिखाई, ऋण दिए। जाति भेद मिटाया, धार्मिक सहिष्णुता बढ़ाई। महिलाओं की सेना गठित कर स्वरक्षा सिखाई।

ब्रिटिश इतिहासकारों ने उनकी धार्मिकता पर आपत्ति की पर वे सिद्ध करती रहीं कि धर्म ही कल्याण का आधार है। उनका राज्य आदर्श कल्याण राज्य था जिसमें कृषि, उद्योग, जल प्रबंधन, शिक्षा समेत हर स्तर और विधा विकसित हुई।

आधुनिक प्रासंगिकता और 300वीं जयंती

13 अगस्त 1795 को 70 वर्ष की आयु में उन्होंने समाधि ली थी। उनकी विरासत आज भी जीवंत है। इंदौर का हवाई अड्डा और विश्वविद्यालय आज भी उनके नाम पर है। 2024 में ‘पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर महिला स्टार्टअप योजना’ शुरू की गई।

इसके अलावा 2025 में उनकी जयंती पर 31 मई 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भोपाल के जंबूरी मैदान में महिला सशक्तिकरण महासम्मेलन के दौरान अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती पर ₹300 का विशेष स्मारक सिक्का जारी किया। यह सिक्का संस्कृति मंत्रालय द्वारा जारी किया गया, जिसमें उनकी छवि अंकित है।

अहिल्याबाई का जीवन सिद्ध करता है कि सत्ता सेवा का माध्यम है। छत्रपति शिवाजी की उत्तराधिकारी के रूप में उन्होंने स्वराज्य को सांस्कृतिक एकता से मजबूत किया। आज के नेताओं को उनके सादगीपूर्ण जीवन से प्रेरित होना चाहिए।

आज PDA का अखिलेश यादव दे रहे झाँसा, सरकार में रहते ‘D’ का अस्तित्व भी नहीं था कबूल: योगी राज में मिला ‘छत्र’, जानिए- सपा शासन में कैसे होता था दलितों का उत्पीड़न

देशभर में कल (14 अप्रैल 2026) को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जयंती मनाई जाएगी। उनकी जयंती से पहले ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने बाबा साहेब से जुड़े कई बड़े ऐलान किए हैं। योगी कैबिनेट ने ‘डा बीआर अंबेडकर मूर्ति विकास योजना’ को मंजूरी दी है जिसके तहत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर और अन्य सुधारकों और महापुरुषों की मूर्तियों का संरक्षण और सौंदर्यीकरण किया जाएगा।

यह योजना सामाजिक सम्मान और ऐतिहासिक विरासत को मजबूत करने का ठोस कदम है। जिन महापुरुषों ने समाज के सबसे वंचित वर्गों को आवाज दी, उनके योगदान को योगी सरकार में जमीन पर उतारने का काम हो रहा है। अखिलेश यादव के काल में जो दलित भुला दिए गए, जिन नायकों का अपमान किया गया और जिन समुदायों को बस वोट का साधन मानकर छोड़ दिया गया उन्हें अब योगी सरकार में सम्मान और पहचान मिल रही है।

दलितों के नायकों को योगी सरकार का सम्मान

सबसे पहले बात योगी सराकर की सबसे नई योजना से ही शुरू करते हैं। योगी सरकार प्रदेश में डॉ. भीमराव अंबेडकर, संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले, महर्षि वाल्मीकि जैसे महानायकों की मूर्तियों का सौंदर्यीकरण और संरक्षण करने जा रही है। योजना के तहत प्रदेश के सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में 10-10 स्मारकों का विकास किया जाएगा और इसके लिए 403 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँगे।

इन स्मारकों के आसपास बाउंड्री वॉल, छतरी, सौंदर्यीकरण, हरियाली और लाइट की व्यवस्था की जाएगी। इस योजना का उद्देश्य केवल मूर्तियों की सुरक्षा करना नहीं है, बल्कि आसपास के क्षेत्र को विकसित कर रोजगार के अवसर बढ़ाना भी है। निर्माण कार्यों के जरिए ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को सीधा बढ़ावा मिलेगा। यह पहल मूर्ति स्थलों को केवल प्रतीकात्मक स्थान तक सीमित नहीं रखेगी बल्कि उन्हें उपयोगी और जानकारी देने वाले केंद्र के रूप में विकसित करेगी।

गोरखपुर में BJP के स्थापना दिवस (6 अप्रैल 2026) पर एक कार्यक्रम में सीएण योगी आदित्यनाथ ने ऐलान किया था कि प्रदेश में जहाँ भी बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा होगी उसके ऊपर छत्र लगाया जाएगा। उन्होंने कहा था, “हमारी सरकार ने तय किया है कि 14 अप्रैल को भारत के संविधान के शिल्पी बाबा साहब की पावन जयंती पर भाजपा के कार्यकर्ता बूथ स्तर पर बाबा साहब की मूर्तियों के पास एक दिन पहले साफ-सफाई करेंगे। 14 अप्रैल को प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करेंगे।”

एक ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दलितों और दलित नायकों के प्रति संवेदना है तो दूसरी तरफ उनसे पूर्ववर्ती सपा का शासनकाल था। अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली उस सरकार में दलितों का खूब उत्पीड़न हुआ तो दलित नायकों का भी अपनाम किया गया।

अखिलेश यादव के काल में दलित नायकों का अपमान

उत्तर प्रदेश में 2012 में सत्ता सँभालने के कुछ ही दिनों के भीतर अखिलेश यादव का दलित विरोधी चेहरा सामने आने लगा था। जुलाई 2012 में अखिलेश यादव ने मायावती के काल के 8 जिलों के नाम बदल दिए थे। इनमें से कुछ नवगठित थे जबकि कुछ के मायावती ने नाम बदले थे। हैरानी की बात ये है कि अखिलेश ने जिन जिलों के नामों को बदला उनमें से अधिकतर बहुजन नायकों से जुड़े नाम थे।

छत्रपति शाहूजी महाराज नगर जिले का नाम बदलकर गौरीगंज कर दिया गया जबकि रमाबाई नगर को फिर से उसके पुराने नाम कानपुर देहात में परिवर्तित कर दिया गया। अखिलेश ने भीमनगर, प्रबुद्धनगर और पंचशीलनगर जैसे जिलों के नाम भी बदले और इन्हें क्रमशः बहजोई, शामली और हापुड़ कर दिया। साथ ही, कांशीराम नगर, महामायानगर और जेपीनगर का नाम बदलकर क्रमशः कासगंज, हाथरस और अमरोहा कर दिया गया। इसी बैठक में छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ का नाम फिर से ‘किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय’ किया गया था।

जब कांशीराम से अखिलेश ने निकाली ‘खुन्नस’

अखिलेश यादव ने कुछ दिनों पहले एक सियासी नाटक करते हुए कांशीराम जयंती को ‘PDA दिवस’ के रूप में मनाने का ऐलान किया था। हालाँकि, जब कांशीराम की जयंती मनाने की बारी आई तो रविवार (15 मार्च 2026) को अखिलेश यादव मुंबई में सितारों संग महफिल जमाने पहुँच गए। कांशीराम का यह अपमान और सपा का यह राजनीतिक पाखंड नया नहीं है। अखिलेश ने सत्ता सँभालते ही कांशीराम का अपमान करना शुरू कर दिया था।

अखिलेश यादव ने कांशीराम नगर जिले का नाम बदलकर तो कासगंज किया ही और इसके कुछ ही महीनों में लखनऊ के श्री कांशीराम जी उर्दू, अरबी-फारसी विश्वविद्यालय का नाम बदल कर ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी फारसी विश्वविद्यालय कर दिया गया। तब मायावती ने इस पर कड़ा एतराज जताया था। यहाँ तक कि अजमेर शरीफ दरगाह के सज्जादनशीन ने सूफी संत को सियासत में खींचे जाने पर आपत्ति जताई थी। लेकिन दलितों की भावनाओं को ताक पर रख अखिलेश जमकर मुस्लिम तुष्टिकरण में लगे थे और ऐसा आजम खान के कहने पर किया गया था।

अखिलेश का तुष्टीकरण यहीं नहीं थमा, 2013 के आखिर में अखिलेश सरकार ने सहारनपुर में कांशीराम के नाम पर बनाए जा रहे मेडिकल कॉलेज का नाम बदलकर ‘शेखुल हिन्द महमूदुल हसन मदनी’ के नाम पर कर दिया। यह मुजफ्फरनगर में दंगों के बाद का दौर था और अखिलेश किसी भी तरह अपने मुस्लिम वोट बैंक को खुश रखना चाहते थे। अखिलेश ने मायावती सरकार में कांशीराम की पुण्यतिथि पर शुरू की गई छुट्टी को भी रद्द कर दिया था।

अखिलेश यादव ने सत्ता संभालने के बाद मायावती के काल की 25 से अधिक योजनाएँ बंद की थीं जिनमें से कई दलित नायकों के नाम पर थीं। कांशीराम जी शहरी गरीब आवास योजना, कांशीराम ग्रीन (ईको) गार्डेन का निर्माण, कांशीराम शहरी दलित बाहुल्य बस्ती समग्र विकास योजना और अनुसूचित जाति-छात्रवृत्ति योजना जैसी योजनाएँ शामिल थीं।

अखिलेश के राज में दलितों का उत्पीड़न

अखिलेश के राज में दलितों पर उत्पीड़न चुनाव जीतते ही शुरू हो गया था। यूपी में 2012 में जैसी ही सपा लौटी तुरंत हिंसा का दौर लौट आया, फिर अराजकता वाले दिनों की आहट सुनाई देने लगी। मार्च 2012 की इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में लिखा है, “पिछले 36 घंटों के दौरान पूरे राज्य में हुई हिंसा की घटनाओं में कम से कम 3 लोगों की मौत हो गई है और दर्जनों दलितों के घरों में आग लगा दी गई है और इनमें से कई घटनाओं में सपा कार्यकर्ता शामिल थे।”

जानते हैं इस समय मुलायम सिंह की चिंता क्या थी? मुलायम सिंह ने सपा कार्यकर्ताओं से कहा था, “अगर आप अनुशासन नहीं बनाए रखेंगे तो आप भविष्य में मुझे प्रधानमंत्री नहीं बना पाएँगे।”

NDTV की 12 मार्च 2012 की एक रिपोर्ट बताती है कि सपा की जीत के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं ने जमकर उत्पाद मचाया। भदोही और सीतापुर में दलितों के घर में आग लगा दी गई। रिपोर्ट में कहा गया, “होली के दिन बाह के पार्वती पूरा गाँव में बीएसपी की प्रधान गुड्डी देवी के पति मुन्ना लाल जाटव की हत्या कर दी गई। हत्या से पहले घर में तोड़फोड़ भी की गई है। भदोही में समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं पर दलितों के घर में आग लगाने का आरोप लगा है।”

इसी रिपोर्ट में कहा गया कि यूपी में बलिया के भुज छपरा गाँव में सपा कार्यकर्ताओं पर 5 दलित महिलाओं और बच्चों को बुरी तरह मारने-पीटने के आरोप लगे। जब सपा कार्यकर्ताओं को पता चला कि इस गाँव के ज्यादातर लोगों ने JDU को वोट दिया है तो 40+ सपा कार्यकर्ता गाँव में घुसे और मारपीट की। इसी दौरान बसपा सरकार में मंत्री रहे राम अचल राजभर की एक राइस मिल भी सपा समर्थित लोगों ने फूँक दी थी।

हिन्दुस्तान टाइम्स की 15 मार्च 2012 एक रिपोर्ट बताती है कि बसपा प्रमुख मायावती के पैतृक गाँव बादलपुर के पास दादरी इलाके में सपा के कार्यकर्ताओं ने दलित परिवारों पर हमला कर दिया। दलितों को लाठियों से पीटा गया। इस हमले में महिलाओं समेत 19 लोग घायल हुए थे। यह हमला इसलिए हुआ क्योंकि दादरी से बसपा के विधायक जीत गए थे और सपा का उम्मीदवार हार गया था।

2013 में सपा के दौर में एक दलित चिंतक और लेखक कंवल भारती को फेसबुक स्टेट्स के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था। बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि कंवल भारती ने इतना लिखा था कि आरक्षण के मामले में सपा सरकार पूरी तरह नाकाम हो गई है और अखिलेश-शिवपाल-आजम-मुलायम जनता से कट गए हैं। इसके बाद बनियान और पाजामे में कंवल भारती को अखिलेश की पुलिस ने घर से उठा लिया। अखिलेश सरकार का पूरा काल हिंसा की लपटों में बीता और इसमें दलितों को खूब निशाना बनाया गया।

योगी सरकार ने ली दलितों की सुध

मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार सत्ता में आई तो उसने समाज के सभी वर्गों को साथ लेने का बीड़ा उठाया। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) छात्रों की 2016-17 की छात्रवृत्तियाँ जो बंद कर दी गई थीं उन्हें योगी सरकार ने फिर से शुरू किया DBT (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के जरिए राशि सीधे खातों में पहुँचाई गई। इस योजना से लाखों दलित छात्रों को लाभ पहुँचा है।

प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत दलित परिवारों को प्राथमिकता दी गई। सत्ता में आने के साल में ही 2017 के अंत तक लाखों दलित परिवारों को पक्के घर, राशन कार्ड, शौचालय और बिजली कनेक्शन मिलने शुरू हो गए। सरकार ने दावा किया कि दलित सबसे ज्यादा योजनाओं के लाभार्थी बने।

2018 में जब योगी आदित्यनाथ को सत्ता में आए बमुश्किल एक साल ही हुआ था तब तक भी दलितों के लिए किए जा रहे कार्यों का साफ-साफ असर दिखाई देने लगा था। अप्रैल 2018 की TOI की एक रिपोर्ट बताती है कि PMAY के तहत कुल 8.85 लाख घरों में से 6.50 लाख दलित परिवारों को दिए गए। 37 लाख दलितों को पहली बार राशन कार्ड जारी किए गए। स्वच्छ भारत मिशन के तहत 40 लाख शौचालयों में से 36 लाख दलित बस्तियों में बने और सौभाग्य योजना से 32 लाख दलित घरों को बिजली कनेक्शन मिले। यह पहले वर्ष तक का ही आँकड़ा था।

योगी सरकार ने शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में काम करके ना सिर्फ दलितों को बराबरी का अधिकार देने की कोशिश की है बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए भी प्रोत्साहित किया है। राज्य में अनुसूचित जाति (SC) के छात्रों के लिए 100 सर्वोदय स्कूल खोले गए हैं जिनमें 60% सीटें SC के लिए आरक्षित थीं। उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम ने लाखों दलित युवाओं को स्वरोजगार के अवसर दिए हैं। दलितों को बड़ी संख्या में लोन दिए गए ताकि वे अपना व्यवसाय शुरू कर सकें और आत्मनिर्भर बन सकें। ऐसे कामों की एक लंबी फेहरिस्त है जो योगी सरकार में दलितों के उत्थान और उन्हें मुख्य धारा में लाने के लिए शुरू किए गए हैं।

हत्या, लूटपाट, आगजनी, बलात्कार… पश्चिम बंगाल में 2021 विधानसभा चुनावों में TMC की जीत के बाद ये हुआ था हाल, पढ़ें हिंसा की 40 घटनाएँ

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सरकार के दौरान चुनाव केवल एक सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं रह जाते बल्कि उन लोगों के लिए अस्तित्व की लड़ाई बन जाती हैं जो पार्टी की विचारधारा का समर्थन नहीं करते। चाहे राज्य में विधानसभा चुनाव हों या स्थानीय निकाय चुनाव, राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ लक्षित चुनाव के बाद हिंसा TMC के लिए एक सामान्य परंपरा बन चुकी है।

राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है और जैसे ही चुनाव परिणामों की घोषणा होती है, वैसे ही TMC समर्थित हिंसा का एक दौर शुरू हो जाता है, जिसमें राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया जाता है।

2021 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने के बाद राज्य भर से हमलों, हत्याओं और दुष्कर्म जैसी कई भयावह घटनाएँ सामने आईं। नीचे TMC की तीसरी बार सरकार बनने के बाद मई 2021 से जुलाई 2021 के बीच BJP कार्यकर्ताओं के खिलाफ घटी 40 डरावनी हिंसा की घटनाओं के बारे में पूरी जानकारी दी गई है।

1.BJP कार्यकर्ता अविजीत सरकार को पीट-पीटकर मार डाला

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कार्यकर्ता अविजीत सरकार की 2 मई 2021 को TMC के कुछ गुंडों द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। यह घटना सिर्फ इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने फेसबुक पर दो वीडियो अपलोड किए थे, जिनमें कोलकाता के बेलियाघाटा इलाके के वार्ड नंबर 30 में TMC कार्यकर्ताओं द्वारा उनके घर और NGO कार्यालय में तोड़फोड़ करते हुए दिखाया गया था।

अविजीत सरकार एक डॉग-लवर थे और उन्होंने कई आवारा कुत्तों को अपने NGO में रखा था, जिनमें से एक ने उस समय 5 पिल्लों को जन्म दिया था। लेकिन TMC कार्यकर्ताओं की क्रूरता थी कि उन्होंने कुत्तों को भी नहीं बख्शा और उन 5 पिल्लों को बेरहमी से पीटा।

भारतीय मजदूर ट्रेड यूनियन काउंसिल के पदाधिकारी रहे अविजीत सरकार ने दरवाजे पर हुई दस्तक का जवाब दिया, जिसके बाद उन्हें बाहर घसीटा गया, बुरी तरह पीटा गया और केबल टीवी के तार से उनका गला घोंट दिया गया। बाद में उनका शव उनके घर से कुछ दूरी पर बरामद हुआ। अविजीत सरकार की एकमात्र गलती यह थी कि वे BJP के समर्थक थे।

2. BJP कार्यकर्ता विश्वनाथ धर के घर में तोड़फोड़

चुनाव के बाद हिंसा की एक और घटना में 2 मई 2021 को तृणमूल कॉन्ग्रेस के कई गुंडों ने BJP के सक्रिय कार्यकर्ता बिश्वनाथ धर के घर पर हमला किया। यह घटना पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिला के पानीहाटी नगरपालिका क्षेत्र के घोला मल्लिकपाड़ा में हुई।

TMC समर्थित हमलावरों ने धर के घर में घुसकर जमकर तोड़फोड़ की। बदमाशों ने पहले CCTV कैमरों को नष्ट किया और उसके बाद घर में लूटपाट शुरू कर दी। उन्होंने अलमारी तोड़कर नकदी और गहने चुरा लिए। वापस जाते समय उन्होंने धर की मारुति कार और रॉयल एनफील्ड बुलेट बाइक को भी तोड़ दिया।

3. BJP कार्यकर्ता को उसके ही घर में बेरहमी से पीटा

एक अन्य घटना में BJP के एक कार्यकर्ता को उसके ही घर में सत्तारूढ़ TMC के कार्यकर्ताओं द्वारा बेरहमी से पीटा गया। यह घटना पश्चिम बंगाल के दक्षिण दिनाजपुर जिला के त्रिमोहिनी क्षेत्र के किस्मतदापत गाँव में हुई, जो बालुरघाट विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है।

TMC समर्थित हमलावरों ने पीड़ित के घर पर धावा बोलकर उस पर हमला किया। इस हमले में BJP कार्यकर्ता के सिर पर गंभीर चोटें आईं और वह बुरी तरह खून से लथपथ हो गया। बदमाशों ने उसके घर में घुसकर जमकर तोड़फोड़ भी की।

घटना का एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें एक नशे में धुत व्यक्ति पीड़ित और उसकी पत्नी को भद्दी-भद्दी गालियाँ दे रहा था। वह BJP कार्यकर्ता को ‘सूअर का बेटा’ कहकर बोलते हुए बाँस के डंडे से उसकी पिटाई कर रहा था। साथ ही वह धमकी दे रहा था, “मुझे BJP की ताकत दिखाओ? कितनी ताकत है तेरी? क्या तुम सत्ता में आ गए हो?”

4. BJP उम्मीदवार साइंटिस्ट गोबरधन दास को उनके घर में TMC के गुंडों ने बनाया बंधक

चुनाव के बाद TMC के गुंडों ने BJP उम्मीदवार गोबरधन दास से जुड़े कई BJP कार्यकर्ताओं को उनके गाँव में निशाना बनाकर हमला किया। गोबर्धन दास पूर्वस्थली उत्तर विधानसभा क्षेत्र से BJP उम्मीदवार थे।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मॉलिक्यूलर मेडिसिन के प्रोफेसर और वैज्ञानिक गोबर्धन दास को भी निशाना बनाया गया। 4 मई 2021 को TMC समर्थित हमलावरों ने दास के घर को घेर लिया।

हमलावरों ने उनके आवास पर धावा बोला, जिसके चलते वे अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ घर के अंदर ही फँस गए। आरोप है कि TMC के गुंडों ने उनके घर पर देसी बम भी फेंके, जिससे स्थिति और भयावह हो गई।

5.TMC कार्यकर्ताओं ने BSF कर्मियों के घरों पर किया हमला

TMC के गुंडों ने केवल BJP के कार्यकर्ताओं को ही नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों के जवानों को भी निशाना बनाया। जबकि वो उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी नहीं थे। सीमा सुरक्षा बल के जवान कमल सेन के घर पर जलपाईगुड़ी जिले के रानीपारहाट में TMC समर्थित हमलावरों ने हमला कर लूटपाट और तोड़फोड़ की। छुट्टी पर घर आए इस जवान और उनके परिवार के साथ मारपीट की गई, जबकि उनके घर, ट्रैक्टर और बाइक को आग के हवाले कर दिया गया।

इसी तरह की हिंसा कूचबिहार में BSF जवान सुशांत बर्मन के खिलाफ भी देखने को मिली। आरोप है कि TMC कार्यकर्ताओं ने उन पर हमला किया और लूटपाट की। केवल इसलिए क्योंकि उनके भाई BJP के समर्थक थे। अपनी जान बचाने के लिए उनके परिवार के सदस्यों को घर छोड़कर भागना पड़ा।

6. TMC के गुंडों ने ABVP दफ्तर में की तोड़फोड़

2021 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जीत के बाद TMC के गुंडों ने अपने राजनीतिक विरोधियों से बदला लेने की मुहिम शुरू कर दी। इसी क्रम में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कोलकाता स्थित दफ्तर पर हमला किया गया।

बताया जाता है कि TMC के 20 से अधिक गुंडे ABVP कार्यालय में घुस आए और वहाँ मौजूद कार्यकर्ताओं पर हमला कर दिया, जिसमें ABVP के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव भी शामिल थे।

आरोप है कि हमलावरों ने देवी-देवताओं और विचारकों की कई मूर्तियों को भी तोड़ दिया। ABVP का कहना है कि यह हमला पूरी तरह से पूर्व नियोजित था, क्योंकि TMC के 150 से अधिक गुंडे कई बार बाइक से ABVP दफ्तर के आसपास चक्कर लगा रहे थे।

7. BJP कार्यकर्ता सुनील बक्सी पर हमला

चुनाव के बाद हिंसा के एक और मामले में जुलाई 2021 में BJP के बूथ कार्यकर्ता सुनील बक्सी के घर पर एक मुस्लिम भीड़ द्वारा हमला किए जाने का आरोप है। भीड़ ने उनके घर में घुसकर फर्नीचर और अन्य सामान को नष्ट कर दिया, महिलाओं के साथ अभद्रता की और उनकी पत्नी के साथ दुष्कर्म की धमकी तक दी।

शिकायत के अनुसार, करीब 15 घरों को आग के हवाले कर दिया गया। घटना के बाद वे गाँव छोड़कर भागने को मजबूर हो गए। जब बक्सी ने पुलिस का रुख किया तो उन्हें धमकी दी गई कि इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इतना ही नहीं, पुलिस ने यह भी दबाव बनाया कि वे लिखें कि घरों में आग बिजली गिरने की वजह से लगी थी।

इससे पहले 3 मई 2021 को भी बक्सी पर TMC से जुड़े गुंडों द्वारा हमला किया गया था। उन्होंने बताया कि उनके सिर पर वार किया गया, हालाँकि उनके भाई ने उन्हें बचा लिया। जब वे पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने पहुँचे, तो उनकी शिकायत दर्ज करने से मना कर दिया गया और उल्टा उनके खिलाफ ही मामले दर्ज कर लिया गया।

सुनील बक्सी ने इस संबंध में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) में भी शिकायत दर्ज कराई थी।

8. बीजेपी कार्यकर्ता जय प्रकाश यादव की क्रूड बम हमले में मौत

TMC की चुनाव के बाद हिंसा के तहत, जुलाई 2021 में पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिला के भाटपाड़ा में 28 वर्षीय BJP कार्यकर्ता जॉय प्रकाश यादव की देसी बम हमले में हत्या कर दी गई।

बताया जाता है कि हत्या से पहले जॉय प्रकाश यादव की दो लोगों के साथ तीखी बहस हुई थी, जिसके बाद एक देसी बम उनके सिर पर फेंका गया, जिससे उनकी मौत हो गई। हमले से पहले एक आरोपित को यह कहते हुए सुना गया, “पुलिस को भूल जाओ… बहुत BJP-BJP कर रहे हो, इसे छोड़ दो।”

इस पूरी घटना को यादव की 17 वर्षीय भतीजी सपना ने कैमरे में रिकॉर्ड किया। इस हमले के दौरान उनकी माँ राजमती देवी भी मौजूद थीं, जिन्हें इस घटना के बाद से सुनने में समस्या होने लगी।

9. BJP कार्यकर्ताओं ने इस्लाम धर्म कबूला और लापता

पश्चिम बंगाल में BJP कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के एक और मामले में दो BJP नेताओं को BJP का समर्थन करने की सजा देते हुए जबरन इस्लाम धर्म कबूलने के लिए मजबूर किया गया। इसके बाद दोनों नेता लापता हो गए, दोनों आपस में भाई थे। उनकी पत्नियों ने अपने पतियों का पता लगाने के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

मामले की जाँच में गंभीर खामियाँ पाए जाने के बाद हाई कोर्ट ने इसे CBI और NIA को सौंप दिया। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि उनके पति लापता हो गए हैं और उनका कोई पता नहीं चल रहा है।

इसके बाद उन्होंने पहले मोथाबाड़ी पुलिस स्टेशन और फिर कालियाचक पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। उनका कहना था कि एक शिकायत तो दर्ज कर ली गई थी, लेकिन बाद में एक ‘सिविक वॉलंटियर’ ने उस शिकायत को फाड़ दिया और उन्हें बताया कि उनके पतियों ने इस्लाम धर्म अपना लिया है।

10. कूचबिहार में BJP कार्यकर्ता अनिल बर्मन रहस्यमय तरीके से पेड़ से लटके मिले

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले के सिताई स्थित अदाबाड़ी इलाके में 30 मई 2021 को BJP के एक कार्यकर्ता का शव संदिग्ध परिस्थितियों में पेड़ से लटका हुआ मिला। स्थानीय लोगों को उनका शव उनके घर के पास एक बगीचे से मिला।

BJP ने इस घटना के लिए सत्तारूढ़ TMC सरकार पर अपने कार्यकर्ता की हत्या का आरोप लगाया। पार्टी का कहना था कि अनिल बर्मन चुनाव के दौरान TMC के निशाने पर थे। यह भी दावा किया गया कि इससे पहले TMC के गुंडों ने मृतक के घर में तोड़फोड़ की थी।

11. TMC के गुंडों ने की BJP समर्थक कुश खेत्रपाल की हत्या

BJP समर्थक 26 वर्षीय कुश खेतरपाल 5 मई 2021 को लापता हो गए। उनका शव दो दिन बाद, 8 मई 2021 को बैष्ठम तालाब के पास गणेश प्रतिमा के पीछे मिला। FIR के अनुसार, उनके शरीर पर चाकू के कई घाव थे। उनके भाई श्रीकांत खेतरपाल ने आरोप लगाया कि TMC के गुंडों ने कुश की रैभगीनी पार्टी कार्यालय में ले जाकर हत्या कर दी।

श्रीकांत ने बताया कि कुश एक होटल में काम करते थे और काम से लौटते समय TMC से जुड़े कानन खेतरपाल, सुकुमार खेतरपाल और दिलीप खेतरपाल अक्सर उन्हें रास्ते में रोकते थे। उन्होंने कुश को TMC में शामिल न होने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी थी।

12. TMC के गुंडों ने BJP कार्यकर्ता राजीब पल्ली के घर पर किया हमला

बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 के नतीजे घोषित होते ही TMC के कुछ गुंडों ने हावड़ा में BJP कार्यकर्ता राजीब पाली के घर पर बम फेंके। हमलावरों ने पीड़ित के घर से नकदी और गहनें भी लूटे और यहाँ तक कि घर की महिलाओं के साथ छेड़छाड़ भी की।

13. BJP नेत्री चंदना हलदर की TMC कार्यकर्ताओं ने पीट-पीटकर की हत्या

2 जुलाई 2021 को पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिला में BJP कार्यकर्ता चंदना हलदर की कथित तौर पर TMC के गुंडों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। हलदर सतगाछिया विधानसभा क्षेत्र के रामचंद्रपुर गाँव की रहने वाली थीं। उनके पति गौतम हलदर ने बताया कि वे और उनकी पत्नी दोनों BJP कार्यकर्ता थे।

घटना के दिन TMC समर्थित हमलावरों ने पहले उनके चचेरे भाई स्वरूप हलदर पर हमला किया था। जब गौतम हलदर और उनकी पत्नी चंदना हलदर उन्हें बचाने पहुँचे, तो हमलावरों ने उन पर भी बेरहमी से हमला कर दिया। गंभीर चोट लगने से इलाज के दौरान चंदना हलदर की मौत हो गई।

14. BJP बूथ अध्यक्ष राजा सामोंटो की पीट-पीटकर हत्या

चुनाव के बाद TMC की हिंसा की एक और घटना में BJP के बूथ अध्यक्ष राजा सामंतो की 29 मई 2021 को दक्षिण 24 परगना के डायमंड हार्बर के साधुरघाट गाँव में बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई।

15. TMC सदस्यों ने की BJP कार्यकर्ता धीरेन बर्मन की हत्या

राज्य विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद पश्चिम बंगाल में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने X पर जानकारी दी कि BJP के एक समर्थक 34 वर्षीय धीरेन बर्मन जो सिटलाकुची विधानसभा क्षेत्र के SC राजबंशी समुदाय से थे, उनकी TMC के गुंडों द्वारा बेरहमी से हत्या कर दी गई।

BJP कार्यकर्ताओं पर हमलों की निंदा करते हुए अधिकारी ने ममता बनर्जी पर आरोप लगाया कि वे TMC के गुंडों का परोक्ष रूप से समर्थन कर रही हैं।

16. TMC के गुंडों की प्रताड़ना से परेशान होकर BJP कार्यकर्ता प्रोसेनजीत दास ने की आत्महत्या

एक अन्य भयावह घटना में BJP के कार्यकर्ता प्रोसेनजीत दास ने TMC के कुछ सदस्यों द्वारा मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सामना करने के बाद आत्महत्या कर ली।

उनके परिवार का कहना था कि TMC के गुंडों ने उन्हें दो बार पीटा और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। राजारहाट के गोपालपुर क्षेत्र के हरिजन पल्ली के निवासी दास मानसिर रूप से आहत हो गए। वे इस दबाव को सहन नहीं कर सके और आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया।

17. BJP कार्यकर्ता निर्मल मंडल की पीट-पीटकर हत्या

एक और इसी तरह की घटना में BJP के कार्यकर्ता निर्मल मंडल की सोनारपुर नॉर्थ विधानसभा क्षेत्र में उनके राजनीतिक विरोधियों द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। मृतक की माँ ने आरोप लगाया कि स्थानीय पार्षद शम्पा चक्रवर्ती ने आरोपितों को सजा दिलाने के बजाए उन्हें ही डाँटते हुए कहा कि वे अपने बेटे का ख्याल नहीं रख पाए।

18. BJP कार्यकर्ता घनश्याम राणा को पहले गोली मारी, फिर चाकू से किए वार

हुगली जिले के आरामबाग नगर के खानाकुल में BJP कार्यकर्ता पर हमले का एक और मामला सामने आया। पीड़ित घनश्याम राणा को उनके ही घर के बाहर पहले गोली मारी गई और फिर बेरहमी से चाकू से हमला किया गया।

उन्हें बेहद गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया। BJP ने इस हमले के लिए TMC के गुंडों को जिम्मेदार ठहराया।

19. अरिंदम मिद्या को TMC के गुंडों ने फाँसी पर लटकाया

राज्य विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद BJP के युवा समर्थक अरिंदम मिद्या को TMC के इस्लामी कट्टरपंथी समर्थकों ने फाँसी पर लटका दिया गया। अरिंदम मिद्या डायमंड हार्बर के फाल्टा विधानसभा क्षेत्र के पंचकोली गाँव के निवासी थे।

20. TMC के गुंडों के हमले में घायल BJP कार्यकर्ता धर्म मंडल की मौत

14 मई 2021 को पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में BJP कार्यकर्ता धर्म मंडल पर उनके ही घर में TMC के गुंडों ने बेरहमी से हमला किया। गुंडो के हमले से गंभीर रूप से घायल धर्म मंडल को अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन इलाज के दौरान 16 मई 2021 को कोलकाता के एक अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया।

21. BJP कार्यकर्ता मनोज जायसवाल की हत्या

उसी दिन बीरभूम जिले के नलहाटी विधानसभा क्षेत्र के BJP कार्यकर्ता मनोज जायसवाल की हत्या का मामला भी सामने आया। BJP ने आरोप लगाया कि उनकी हत्या TMC के गुंडों ने की है।

22. बंगाल में BJP समर्थकों का डबल मर्डर

पश्चिम बंगाल में BJP ने आरोप लगाया कि मालदा के उत्तर लक्ष्मीपुर में उसके दो कार्यकर्ताओं की TMC के गुंडों द्वारा हत्या कर दी गई। BJP के अनुसार, मृतकों की पहचान मनोज मंडल और चैतन्य मंडल के रूप में हुई है। BJP ने साझा की भयावह तस्वीर में दिखाया गया कि दोनों कार्यकर्ताओं को एक ही रस्सी से बाँधकर पेड़ से लटका दिया गया था।

हालाँकि, व्यापक स्तर पर हुई TMC समर्थित हिंसा के बावजूद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इन आरोपों से इनकार करते हुए BJP पर झूठ फैलाने का आरोप लगाया। वहीं, बाद में ममता बनर्जी ने हिंसा को स्वीकार किया और पीड़ितों के परिवारों को मुआवजा देने का आश्वासन दिया।

23. BJP कार्यकर्ता अरूप रुइदास को हत्या कर पेड़ से लटकाया शव

राजनीतिक हत्याओं के एक और मामले में BJP के कार्यकर्ता अरूप रुइदास को बांकाुरा जिले में हत्या कर उन्हें पेड़ से लटका दिया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, पश्चिम बंगाल के इंडस विधानसभा क्षेत्र से बूथ एजेंट अरूप रुइदास की कथित तौर पर TMC के कार्यकर्ताओं द्वारा हत्या की गई थी।

24. BJP कार्यकर्ता देवव्रत मैती की बेरहमी से हत्या

3 मई 2021 को BJP कार्यकर्ता देवव्रत मैती पर TMC के गुंडों ने बेरहमी से हमला किया। नंदीग्राम निवासी मैती को हमले के बाद गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया, जहाँ 13 मई 2021 को इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।

25. TMC के गुंडों ने की गौरव सरकार की हत्या

इसी तरह पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के बोलपुर निवासी BJP कार्यकर्ता गौरव सरकार भी राज्य में चुनाव के बाद हुई हिंसा का शिकार बने थे।

26. सीतलकुची में BJP कार्यकर्ता माणिक मंडल की हत्या

इसी तरह की एक अन्य घटना में पश्चिम बंगाल के सीतलकुची विधानसभा क्षेत्र में BJP कार्यकर्ता माणिक मंडल की हत्या कर दी गई। यह घटना मई 2021 के पहले सप्ताह में हुई, जब विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित होने के तुरंत बाद राज्य में तनाव और हिंसा की स्थिति बनी हुई थी।

27. TMC के गुंडों ने की BJP कार्यकर्ता की 80 साल की माँ की हत्या

एक अन्य घटना में जगद्दल से BJP कार्यकर्ता कमल मंडल की 80 साल की माँ शोवा रानी मंडल की हत्या कर दी गई, जब वह अपने बेटे को TMC कार्यकर्ताओं से बचाने की कोशिश कर रही थीं। TMC के गुंडे कमल मंडल और उनकी पत्नी को BJP से जुड़े होने के कारण पीट रहे थे, तभी उनकी माँ अपने बेटे को बचाने के लिए बीच में आई और गंभीर रूप से घायल हो गई। बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

28. चुनाव के बाद हुई हिंसा में BJP कार्यकर्ता उत्तम घोष की हत्या

रानाघाट के गंगनापुर में 2 मई 2021 की आधी रात को TMC कार्यकर्ताओं ने BJP कार्यकर्ता उत्तम घोष की हत्या कर दी।

29. BJP कार्यकर्ता होरम अधिकारी की बेरहमी से हत्या

दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर दक्षिण क्षेत्र में कार्यरत BJP के समर्थक होरम अधिकारी की चुनाव के बाद हिंसा के दौरान बेरहमी से हत्या कर दी गई।

30. वोटों की गिनती के बाद TMC के गुंडों ने BJP के मोमिक मोइत्रा की बेरहमी से हत्या

02 मई 2021 को मतगणना के बाद कूचबिहार जिले के सिटलाकुची विधानसभा क्षेत्र में BJP कार्यकर्ता मोमिक मोइत्रा की TMC के गुंडों ने हत्या कर दी। इसी क्षेत्र में ममता बनर्जी के आह्वान पर TMC के समर्थकों ने CRPF पर हमला किया था।

31. बीजेपी समर्थक चंदन रॉय और हराधोन रे की TMC कार्यकर्ताओं ने की हत्या

पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद 2 मई 2021 को कूचबिहार और दिनहाटा में बीजेपी समर्थक चंदन राय और हराधन राय की हत्या कर दी गई। आरोप लगा कि यह हत्याएँ TMC के कार्यकर्ताओं द्वारा की गईं, जब राज्य में चुनाव बाद तनाव और हिंसा की स्थिति बनी हुई थी।

32. बीजेपी कार्यकर्ता मिंटू बर्मन की पीट-पीटकर हत्या कर दी

एक अन्य राजनीतिक हिंसा की घटना में कूचबिहार में भारतीय जनता पार्टी कार्यकर्ता मिंटू बर्मन की तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। गंभीर रूप से घायल मिंटू बर्मन को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

33. टीएमसी के गुंडों ने लड़की के साथ उसके पिता के सामने गैंगरेप किया

चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद पश्चिम बंगाल में हुई चुनाव बाद हिंसा की एक घटना में रीतु (नाम बदला गया) नाम की युवती के साथ गंभीर हिंसा और यौन उत्पीड़न की बात सामने आई।

आरोप है कि 2 मई 2021 को जब वह और उनके पिता, जो भारतीय जनता पार्टी के समर्थक बताए गए हैं, संभावित हमले की आशंका के चलते घर से निकलने की तैयारी कर रहे थे, तभी कुछ लोगों का एक समूह उनके घर में घुस आया।

पीड़िता के अनुसार, हमलावरों ने उसके पिता के साथ मारपीट की और उसके साथ गैंगरेप किया। बाद में ऑपइंडिया से बातचीत के दौरान रीतु ने बताया की पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया और किसी भी प्रकार की सहायता भी नहीं मिली।

34. TMC के गुंडों ने 60 साल की महिला के साथ उसके पोते के सामने गैंगरेप किया

इस तरह की एक अन्य घटना में, 60 साल की महिला के साथ यौन हिंसा की घटना सामने आई। यह हिंसा महिला के 6 साल के पोते के सामने उसके साथ हुई आरोप है कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद, 4 और 5 मई 2021 की मध्यरात्रि में तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता उसके घर में जबरन घुसे। फिर उसके साथ दुष्कर्म किया गया और घर से कीमती सामान भी लूट लिया गया।

35. महिला BJP समर्थक ने रेप की कोशिश को चकमा दिया, जबकि उसके सामने उसके पति की हत्या कर दी गई

पश्चिम बंगाल में 14 मई 2021 को भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रचार करने वाले पूर्निमा मंडल और उनके पति धर्मा मंडल पर जानलेवा हमला किया गया।

आरोप है कि दोनों की पहचान कर उन पर कुल्हाड़ियों से हमला किया गया। पूर्निमा को अपने पति और देवर पर हुए हमले को देखने के लिए मजबूर किया गया, जबकि उनके साथ अभद्र व्यवहार और यौन उत्पीड़न का प्रयास भी किया गया।

पीड़िता के अनुसार, इस भीड़ का नेतृत्व एक स्थानीय जनप्रतिनिधि कालू शेख कर रहा था। उनके पति ने गंभीर चोटों के चलते 16 मई 2021 को दम तोड़ दिया।

36. टीएमसी सदस्यों ने एक किशोरी के साथ सामूहिक बलात्कार किया

एक 17 साल की नाबालिग लड़की के साथ 9 मई 2021 को रेप की घटना सामने आई। पीड़िता को अगले दिन जंगल से गंभीर हालत में पाया गया। बाद में परिवार ने आरोप लगाया कि शिकायत दर्ज न कराने के लिए उन्हें जान से मरने की धमकियाँ दी और घर जलाने की बात भी कही गई।

37. आरएसएस कार्यकर्ता बलराम माझी की मौत

चुनाव परिणामों के बाद पूर्व बर्धमान जिले के केतुग्राम तहसील के श्रीपुर गाँव में 22 साल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यकर्ता बलराम माझी पर TMC के गुंडों द्वारा उनके ही घर में बेरहमी से हमला किया गया। जिसके बाद गंभीर रूप से घायल होने के बाद उसी दिन उनकी मृत्यु हो गई।

38. टीएमसी हिंसा के कारण भाजपा कार्यकर्ताओं का पलायन

2021 के विधानसभा चुनावों में TMC की भारी जीत के बाद, पश्चिम बंगाल में कई बीजेपी कार्यकर्ता और उनके परिवार पर हिंसा के डर से अपने घर छोड़कर पड़ोसी राज्य असम चले गए।

रिपोर्ट्स के अनुसार, लगभग 300-400 लोग उत्तर बंगाल से सीमा पार कर असम के धुबरी जिले में पहुँचे, जहाँ उन्हें अस्थायी शिविरों में आश्रय दिया गया। कई भाजपा नेताओं ने इन शिविरों का दौरा कर राहत सामग्री और आवश्यक वस्तुएँ वितरित कीं।

असम सरकार ने भी धुबरी में इन लोगों के लिए अस्थायी सहायता उपलब्ध कराई और कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान संक्रमण जाँच के लिए एक विशेष केंद्र भी स्थापित किया।

39. भाजपा कार्यकर्ताओं के घरों में तोड़फोड़

2021 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद, कांकिनारा (भाटपाड़ा) क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता के घर पर बम फेंके जाने की घटना सामने आई।

भाजपा कार्यकर्ता राज बिस्वास ने आरोप लगाया कि तीन लोगों ने उनके घर पर बम फेंके। यह घटना उस समय हुई जब राज्य में चुनाव परिणामों के बाद तनाव और हिंसा की स्थिति बनी हुई थी।

वही एक दूसरी घटना में जादवपुर क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार रिंकू नस्कर के घर पर भी हमला किया गया। आरोप है कि चुनाव में हार के बाद TMC से जुड़े लोग उनके घर में घुसे और तोड़फोड़ की।

40. भाजपा कार्यकर्ता का परिवार हुआ बंगाल छोड़ने को मजबूर

2021 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद पश्चिम बंगाल में TMC की जीत के बाद, बीजेपी के कार्यकर्ता गणेश घोष को राज्य छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

आरोप है कि TMC से जुड़े गुंडों ने शांतिनिकेतन के खोई हाट क्षेत्र के शकुंतला गाँव में स्थित उनके रिसॉर्ट पर हमला कर भारी तोड़फोड़ की। इसके बाद वह अपने परिवार के साथ पश्चिम बंगाल छोड़कर चले गए। यह रिसॉर्ट विश्वभारती विश्वविद्यालय से कुछ ही मिनटों की दूरी पर है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

योगी सरकार ने मजदूरों की मानी हर माँग, फिर नोएडा में क्यों भड़का बवाल?: पढ़िए ‘आंदोलन’ के नाम पर हो रहा संगठित उत्पात या ये है सियासी खेल

नोएडा में वेतन वृद्धि समेत कई माँगों को लेकर अस्थायी मजदूरों का प्रदर्शन जारी है। नोएडा के फेज-2 में स्थित मदरसन कंपनी के अस्थायी मजदूरों ने मनमानी का आरोप लगाते हुए दो-तीन दिन पहले प्रदर्शन शुरू किया था। इसके बाद योगी सरकार ने उनकी कई माँगें मान ली। जिला प्रशासन ने कई आश्वासन दिए।

इसके बावजूद सोमवार (13 अप्रैल 2026) को प्रदर्शन हिंसक हो गया। प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया और जमकर तोड़फोड़ की। स्थिति को काबू में करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले दागने पड़े। बवाल की वजह से एनएच-9, दिल्ली- मेरठ एक्सप्रेस वे और चिल्ला बॉर्डर पर 5 किलोमीटर तक लंबा जाम लग गया। रूट डायवर्ट कर सेक्टर 62 और डीएनडी की ओर भेजा गया। इलाके को छाबनी में तब्दील कर दिया गया है।

मजदूरों का कहना है कि उनकी कंपनी में नए श्रम कानून के प्रावधान लागू नहीं हैं, इसलिए मजदूरों को कम वेतन मिलता है और सुविधाएँ भी न्यूनतम हैं। दिल्ली-हरियाणा समेत कई राज्यों में 1 अप्रैल 2026 से न्यूनतम मजदूरी बढ़ाई गई है। दिल्ली में मजदूरों को अकुशल, कुशल, अर्ध कुशल वर्गों में विभाजित कर 18000 रुपए से 24000 रुपए हर महीना देने का प्रावधान है, जबकि हरियाणा में 15220 रुपए हर महीना मिलता है।

लेकिन, यूपी में मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी 13000 रुपए महीना है, इसलिए मजदूर वेतन वृद्धि की माँग कर रहे हैं। 12 अप्रैल को कथित तौर पर एक महिला मजदूर के फायरिंग में घायल होने की खबर फैली। इसके बाद सोमवार को मजदूर उग्र हो गए और उन्होंने बवाल काटा। बताया जा रहा है कि आंदोलन में कई असामाजिक तत्व शामिल हो गए हैं, जो साजिश रच रहे हैं।

मजदूरों की माँगों को सरकार ने माना

  • योगी सरकार मजदूरों की ज्यादातर माँगों को पहले ही मान चुकी है। इसके बावजूद मजदूरों का बवाल सवाल खड़े करता है। योगी सरकार ने जिन माँगों को माना है, उनमें
  • दोगुना ओवरटाइम भुगतान
  • समय पर सैलरी सीधे बैंक में
  • 10 तारीख से पहले हर महीना वेतन मिलना चाहिए
  • सैलरी स्लिप हर मजदूर को हर महीने मिलना चाहिए
  • 30 नवंबर से पहले बोनस का भुगतान सीधा बैंक खाते में होना चाहिए
  • साप्ताहिक अवकाश सुनिश्चित हो
  • अवकाश के दिन काम करने पर दोगुनी मजदूरी मिले
  • महिला सुरक्षा के लिए आंतरिक शिकायत समितियाँ और कंट्रोल रूम बनाना अनिवार्य
  • समिति में एक महिला सदस्य जरूर हो
  • कंट्रोल रूम में शिकायत पेटी लगाई जाए
  • हेल्पलाइन नंबर जारी की जाए, ताकि उससे भी शिकायत दर्ज कराई जा सके
  • शिकायतों का तुरंत निपटारा किया जाए
  • सरकार के निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए नियमित निगरानी की जाए।
  • नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

शनिवार 11 अप्रैल 2026 को सीएम योगी ने मजदूरों के विरोध प्रदर्शन को संज्ञान में लेते हुए उच्च स्तरीय बैठक की और निर्देश जारी करते हुए कहा कि मजदूरों के हितों की किसी भी हाल में अनदेखी नहीं की जाएगी। नोएडा प्रशासन ने इसकी जानकारी भी दी।

मजदूरों का डिरेल होता आंदोलन

नोएडा में हो रहा मजदूर आंदोलन डिरेल होता नजर आ रहा है। सरकार ने भी हर हाल में मजदूरों के हितों की रक्षा करने की बात कही और सीएम योगी ने खुद संज्ञान लिया। इसके लिए निर्देश जारी किए। लेकिन अब एक प्राइवेट कंपनी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में कई कंपनियों के अस्थायी मजदूर शामिल हो गए हैं। इसमें ऐसे असामाजिक तत्व भी हैं, जो इसे हिंसक बना रहे हैं।

मजदूरों को उनका हक हर हाल में मिलना चाहिए, लेकिन इनके शांतिपूर्ण विरोध को हिंसक बनाने वाले तत्वों को जरूर सामने लाया जाना चाहिए। ऐसा करने वाले मजदूरों का भला नहीं कर रहे होते हैं, क्योंकि आंदोलन के हिंसक होते ही मजदूरों की माँगें कहीं खो जाती है और बातें उस हिंसा की होती है, जो असामाजिक तत्व फैलाते हैं। ऐसी ही हालत अब नोएडा में मजदूर आंदोलन की हो रही है।

इससे पहले पानीपत, मानेसर समेत कई जगहों पर मजदूरों को भड़काने की कोशिश की गई। पानीपत-मानेसर में रिफाइनरी में अस्थायी मजदूरों की कई माँगे हैं। उन्हें 12 घंटे काम कराकर 8 घंटे की ड्यूटी बताया जाता है। मजदूरों ने वेतन वृद्धि और फैक्ट्री में मजदूरों के लिए बेहतर सुविधाएँ देने की माँग की है।

यह आंदोलन भी हिंसक हो गया और मजदूरों की माँग पीछे रह गई और 2500 अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। असामाजिक तत्वों ने हिंसा फैला कर मजदूर आंदोलन को डिरेल कर दिया। इस बीच फरीदाबाद में भी मजदूरों का मुद्दा गरमाने लगा है और विरोध प्रदर्शन की तैयारी चल रही है। मजदूर संगठनों ने पानीपत-मानेसर के मजदूरों को समर्थन देने के लिए आंदोलन करने की चेतावनी दी है।

इसी तरह मध्यप्रदेश के सिंगरौली में अडानी ग्रुप की परियोजना का विरोध किया गया। यहाँ की सुलियारी और थिरौली कोयला खदानों को बंद करने की माँग करते हुए विरोध प्रदर्शन हुए। इस दौरान संदिग्ध परिस्थिति में एक मजदूर की मौत के बाद बवाल मच गया।

यूपी समेत कई बीजेपी राज्यों में साजिश रची गई

यूपी को अशांत करने की कोशिशें काफी दिनों से हो रही है। किसान आंदोलन के दौरान पंजाब से यूपी खासकर पश्चिम यूपी में बवाल मचा। जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हरियाणा, राजस्थान, यूपी समेत कई राज्य इसकी जद में आए।

इन आंदोलनों के दौरान सड़कों को जाम कर सरकारी बसों और दूसरे वाहनों को आग के हवाले करना, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाना आम बात हो गई थी। सोशल मीडिया ने इस दौरान आग में घी का काम किया और आंदोलन को लेकर तरह-तरह की अफवाहें फैलाई गई। दरअसल इन आंदोलनों के पीछे सियासी साजिश थी, जिसका खुलासा बाद में सरकारी एजेंसियों ने किया।

2025 में ‘आई लव मोहम्मद’ बीजेपी शासित राज्यों उत्तराखंड, यूपी, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात समेत कई राज्यों में विवाद का विषय रहा। यूपी में कानपुर में 4 सितंबर 2025 को शुरू हुआ यह विवाद बरेली, अलीगढ़, मेरठ तक फैला। इस दौरान ‘आई लव मोहम्मद’ के बैनर-पोस्टर के साथ सड़कों को इस्लामी भीड़ ने जाम किया और भड़काऊ नारेबाजी की। कई जगहों पर पथराव हुए और पुलिस पर हमले किए गए।

इस्लामी कट्टरपंथियों पर काबू पाने के लिए कई जगहों पर पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया। उत्तराखंड के काशीपुर में ‘आई लव मुहम्मद’ को लेकर हुए बवाल और पुलिस पर पत्थरबाजी में समाजवादी पार्टी नेता नदीम अख्तर का नाम सामने आया। इस विवाद को भी सोशल मीडिया के माध्यम से हवा दी गई।

दरअसल किसानों, मजदूरों और इस्लामी कट्टरपंथियों के बवाल के पीछे साजिश का खुलासा बाद में होता है। भोले-भाले किसानों और मजदूरों की माँगों को आगे कर सियासी रोटी सेंकने की आदत पार्टियों की रही है। मजदूरों की माँग न्यूनतम मजदूरी की रही है, जिसे नाजायज नहीं कहा जा सकता। लेकिन, क्या इसके पीछे यूपी के विकास और औद्योगिक धंधों को डिरेल करने की कोशिश तो नहीं है?

विवादों में घिरा IPL 2026, डगआउट में फोन इस्तेमाल करते देखे गए राजस्थान रॉयल्स के टीम मैनेजर रोमी भिंडर: पास में बैठे थे वैभव सूर्यवंशी, समझें- ये कितना बड़ा मामला

IPL 2026 में राजस्थान रॉयल्स के टीम मैनेजर रोमी भिंडर विवादों में आ गए हैं। मामला रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के खिलाफ खेले गए मैच का है, जहाँ कैमरों में उन्हें डगआउट में मोबाइल फोन इस्तेमाल करते हुए देखा गया।

ये मैच शुक्रवार (10 अप्रैल 2026) को गुवाहाटी में खेला गया था। यह वही मैच था जिसमें राजस्थान रॉयल्स ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 6 विकेट से जीत दर्ज की। उस दौरान उनके पास युवा खिलाड़ी वैभव सूर्यवंशी भी बैठे हुए थे।

BCCI के एक अधिकारी ने साफ तौर पर माना है कि डगआउट में फोन का इस्तेमाल करना नियमों के खिलाफ है। IPL जैसे बड़े टूर्नामेंट में इस तरह की गलती को हल्के में नहीं लिया जाता, क्योंकि यहाँ एंटी-करप्शन से जुड़े नियम बहुत सख्त होते हैं। अब यह माना जा रहा है कि भिंडर पर किसी न किसी तरह की कार्रवाई जरूर हो सकती है।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल मैच के दौरान टीवी कैमरों ने रोमी भिंडर को फोन इस्तेमाल करते हुए कैद कर लिया। बाद में यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। शुरुआत में इसे सामान्य बात समझा गया, लेकिन जब इसकी जाँच हुई तो यह पुष्टि हो गई कि वह वास्तव में फोन इस्तेमाल कर रहे थे।

रोमी भिंडर लंबे समय से टीम के साथ जुड़े हुए हैं और IPL की शुरुआत से ही टीम मैनेजमेंट का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में उनसे उम्मीद की जाती है कि वे सभी नियमों और प्रोटोकॉल को अच्छी तरह जानते होंगे। इसलिए यह मामला थोड़ा गंभीर माना जा रहा है। हालाँकि कुछ लोग इसे गलती से हुआ काम बता रहे हैं, लेकिन नियमों का उल्लंघन तो साफ तौर पर हुआ है।

अब इस पूरे मामले की रिपोर्ट मैच रेफरी और एंटी-करप्शन यूनिट (ACU) को सौंपी जाएगी, जिसके आधार पर आगे का फैसला लिया जाएगा। यह फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे कितनी बड़ी गलती माना जाता है।

क्या कहते हैं IPL के नियम?

IPL में PMOA यानी प्लायर्स एण्ड मैच अफिशल एरिया को बहुत ही संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। इसमें ड्रेसिंग रूम, डगआउट, खिलाड़ियों की बैठने की जगह और मैच अधिकारियों के कमरे शामिल होते हैं। इस पूरे इलाके में सुरक्षा और नियमों का खास ध्यान रखा जाता है।

स्क्रीन शॉर्ट – IPL PMOA PROTOCOL

नियम साफ कहते हैं कि डगआउट में मोबाइल फोन का इस्तेमाल पूरी तरह से बैन है। टीम मैनेजर को सिर्फ ड्रेसिंग रूम में ही फोन इस्तेमाल करने की अनुमति होती है। इसके अलावा खिलाड़ियों और सपोर्ट स्टाफ को अपने फोन और स्मार्ट डिवाइस बंद करके जमा कराने होते हैं, ताकि मैच के दौरान किसी भी तरह का बाहरी संपर्क न हो सके।

डगआउट और ड्रेसिंग रूम के बीच बातचीत के लिए सिर्फ वॉकी-टॉकी का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन सभी नियमों का मकसद मैच को पूरी तरह निष्पक्ष और सुरक्षित बनाए रखना होता है, ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी या भ्रष्टाचार की संभावना न रहे।

अब अगर रोमी भिंडर के मामले की बात करें, तो यह तय है कि नियमों का उल्लंघन हुआ है। ऐसे में उन पर चेतावनी, जुर्माना या फिर मैच बैन जैसी कार्रवाई हो सकती है। अंतिम फैसला ACU की रिपोर्ट और मैच रेफरी की सिफारिश के बाद ही लिया जाएगा।

एक के बाद एक वैज्ञानिकों की मौत और गुमशुदगी से हिला अमेरिका, निशाने पर न्यूक्लियर साइंटिस्ट से लेकर NASA इंजीनियर तक: पढ़ें- ऐसे 10 मामले

क्या अमेरिका में कुछ ऐसा हो रहा है जो आम लोगों से छिपाया जा रहा है? एक के बाद एक NASA के कर्मियों, न्यूक्लियर साइंटिस्ट और सैन्य अधिकारियों की मौत और गुमशुदगी ने अब एक खौफनाक पैटर्न का रूप ले लिया है। जिन लोगों पर देश की सुरक्षा और विज्ञान की खोज की जिम्मेदारी थी, वही अब रहस्यमयी हालात में या तो मर रहे हैं या अचानक लापता हो रहे हैं और सबसे बड़ी बात कई मामलों में किसी भी एजेंसी के पास इसका कोई साफ जवाब नहीं है।

मीडिया में इन मामलों की हालिया चर्चा डेली मेल की एक रिपोर्ट के बाद शुरू हुई। 22 मार्च 2026 की इस रिपोर्ट में रिटायर्ड जनरल विलियम नील मैककासलैंड और नासा की एयरोस्पेस इंजीनियर मोनिका जैसिंटो रेजा के सिर्फ आठ महीनों के भीतर 2 अलग-अलग घटनाओं में ट्रैकिंग के दौरान रहस्यमयी तरीके से गायब होने की बात कही गई। 22 मार्च 2026 की डेली मेल की इस रिपोर्ट में ऐसे रहस्यमयी मामलों की संख्या 5 बताई गई थी जो 11 अप्रैल 2026 की एक ताजा रिपोर्ट में बढ़कर 10 बताई गई है।

कौन थे मैककासलैंड व रेजा और कैसे हुए गायब?

68 साल के रिटायर्ड जनरल मैककासलैंड और 60 वर्षीय रेजा दोनों एयर फोर्स रिसर्च लेबोरेटरी से जुड़े बड़े नाम थे। मैककासलैंड का नाम ओहायो के राइट-पैटरसन एयर फोर्स बेस में कथित गुप्त UFO प्रोग्राम से जोड़ा जाता रहा है। वहीं, रेजा एडवांस स्पेस टेक्नोलॉजी पर काम कर रही थीं। इसी वजह से कुछ लोग यह दावा कर रहे हैं कि दोनों को उनके काम की वजह से निशाना बनाया गया हो सकता है या वे खुद छिप गए हों।

मैककासलैंड 27 फरवरी 2026 को अचानक अपने घर से बिना फोन के निकल गए थे और आखिरी बार न्यू मैक्सिको के अल्बुकर्क में एक जगह के पास देखे गए। उनके पास न फोन था, न कोई ट्रैकिंग डिवाइस और न ही चश्मा। उनकी पत्नी सुसान ने कहा कि उन्हें किसी साजिश का शक नहीं है लेकिन यह जरूर बताया कि मैककासलैंड सिर्फ जूते और अपनी .38 कैलिबर रिवॉल्वर लेकर घर से निकले थे। टेनेसी के सांसद टिम बर्चेट का कहना है कि मैककासलैंड के पास अमेरिका के परमाणु रहस्य थे।

जनरल मैककासलैंड

वहीं, मोनिका रेजा 22 जून 2025 से लापता हैं। वह जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी में काम कर रही थीं और ‘मोंडालॉय’ नाम की एक खास धातु की सह-खोजकर्ता थीं। उनके गायब होने के चार दिन बाद इंटरनेट पर उनका एक मेमोरियल पेज भी बना जिसमें उन्हें मृत बताया गया था लेकिन बाद में वह पेज हटा दिया गया। अधिकारियों ने अभी तक उनके शव मिलने की पुष्टि नहीं की है और मामला अब भी अनसुलझा है।

मोनिका रेजा

3 अन्य वैज्ञानिकों की रहस्यमयी मौत की कहानी

इस रिपोर्ट में 3 अन्य वैज्ञानिकों की हत्या का भी जिक्र किया गया है जिसमें 47 साल के नूनो लुरेरो भी शामिल हैं। लुरेरो की 15 दिसंबर 2025 को बोस्टन के पास उनके घर में हत्या कर दी गई। पुलिस के अनुसार, हमलावर उनका पुराना सहपाठी था। लुरेरो एक जाने-माने वैज्ञानिक थे और हाल ही में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के फ्यूजन सेंटर के प्रमुख बने थे। उनका काम ऐसी ऊर्जा पर था जो भविष्य में क्लीन और लगभग असीमित ऊर्जा दे सकती है।

नूनो लुरेरो

उनका शोध बहुत गर्म गैसों (प्लाज्मा) और फ्यूजन ऊर्जा पर आधारित था। हालाँकि, जाँचकर्ता डैनियल लिस्जट का कहना है कि इस तरह का काम गुप्त UFO तकनीक से भी जोड़ा जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि लुरेरो का काम न्यूट्रॉन स्टार जैसी अंतरिक्ष घटनाओं से जुड़ा था जिसे असीमित ऊर्जा का स्रोत माना जाता है।

67 साल के खगोल वैज्ञानिक कार्ल ग्रिलमायरकी 16 फरवरी 2026 को उनके घर पर हत्या कर दी गई। सुबह करीब 6 बजे उन्हें उनके घर के बाहर गोली मार दी गई। ग्रिलमायर ने एक दूर के ग्रह पर पानी की खोज में अहम योगदान दिया था। उनके साथियों ने कहा था कि इससे धरती से करीब 160 प्रकाश वर्ष दूर जीवन के संकेत मिल सकते हैं। इस मामले में पुलिस ने 29 साल के फ्रेडी स्नाइडर को संदिग्ध मानकर बाद में उस पर हत्या, कार चोरी और चोरी के आरोप लगाए। हालाँकि पुलिस ने अभी तक हत्या का कारण नहीं बताया है।

वहीं, 45 साल के जेसन थॉमस का शव 17 मार्च 2026 को मैसाचुसेट्स के वेकफील्ड में लेक क्वानापोविट से मिला। वह 12 दिसंबर 2025 से लापता थे। थॉमस नोवार्टिस कंपनी में केमिकल बायोलॉजी के असिस्टेंट डायरेक्टर थे और उनका काम नई दवाएँ बनाने, खासकर कैंसर के इलाज से जुड़ा था। नोवार्टिस के अमेरिकी रक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग के साथ भी काम करने की जानकारी है। इस मामले में पुलिस का कहना है कि मौत का कारण अभी नहीं पता है लेकिन फिलहाल किसी साजिश के सबूत नहीं मिले हैं।

परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़ी कैसियस लापता

अपनी इस रिपोर्ट के 4 दिन बाद 26 मार्च 2026 को डेली मेल ने एक और रिपोर्ट छापी जिसमें वैज्ञानिक मेलिसा कैसियस (Melissa Casias) के गायब होने का दावा किया गया। बताया गया कि 54 साल की कैसियस 26 जून 2025 से लापता हैं। कैसियस लॉस अलामोस नेशनल लैब (LANL) में एडमिनिस्ट्रेटिव असिस्टेंट थीं। यह वही लैब है जिसकी स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मैनहट्टन परियोजना के तहत हुई थी और तब से यह अमेरिका के परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़ी रही है।

रिपोर्ट में कैसियस के परिवार के हवाले से बताया गया है कि उस दिन कैसियस ने घर से काम करने का फैसला किया था जो उनके स्वभाव के बिल्कुल विपरीत था। बाद में उन्हें उनके घर से कई किलोमीटर दूर अकेले चलते हुए देखा गया और हैरानी की बात यह थी कि उनके पास न फोन था, न पर्स और न ही चाबियाँ।

हालाँकि, कैसियस के परिवार का मानना था कि वह निजी और आर्थिक परेशानियों के चलते खुद कहीं चली गई होंगी। मामला इतना भी सीधा नहीं है। 24 साल तक एफबीआई में रह चुके क्रिस स्वेकर इस मामले को कहीं ज्यादा गंभीर मानते हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक गुमशुदगी नहीं बल्कि एक बड़े पैटर्न का हिस्सा हो सकता है।

कैसियस के गायब होने वाले दिन की घटनाएँ भी बेहद अजीब थीं। उसी लैब में काम करने वाले उनके पति मार्क कैसियस ने बताया कि वह उन्हें सुबह ऑफिस छोड़ने गई थीं और उनके पास लैब में एंट्री के लिए सिक्योरिटी बैज भी था। वहीं, उनकी बेटी सिएरा के अनुसार, कैसियस बाद में उसके पास आईं, एक सैंडविच दिया और कहा कि वह घर लौट रही हैं क्योंकि वह बैज भूल गई हैं। शाम होते-होते मामला और रहस्यमयी हो गया।

लैब से सूचना मिली कि कैसियस ने न तो ऑफिस जॉइन किया और न ही घर से काम किया। घर लौटने पर परिवार को पता चला कि उनके दोनों फोन घर पर ही थे और उन्हें पूरी तरह से फैक्ट्री रीसेट किया गया था यानी सारा डेटा मिटा दिया गया था। CCTV फुटेज में उन्हें आखिरी बार न्यू मैक्सिको के स्टेट रोड 518 पर अकेले चलते हुए देखा गया। इसके बाद उनका कोई पता नहीं चला न कोई शव मिला, न ही कोई ठोस सबूत।

आखिरी बार न्यू मैक्सिको में दिखीं कैसियस (फोटो साभार:डेली मेल)

NASA के वैज्ञानिक की मौत और LANL का पूर्व कर्मी लापता

वैज्ञानिकों और महत्वपूर्ण पदों पर रहे लोगों के गायब होने या रहस्यमयी मौतों की रिपोर्ट्स की कड़ी में डेली मेल ने 1 अप्रैल 2026 को एक और रिपोर्ट जारी की जिसमें दो अन्य लोगों का जिक्र था। रिपोर्ट में बताया गया कि NASA के वैज्ञानिक फ्रैंक माइवॉल्ड की 4 जुलाई 2024 को लॉस एंजेलिस में 61 साल की उम्र में मौत हो गई थी लेकिन उनकी मौत का कारण आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया। उनका पोस्टमार्टम नहीं किया गया था।

माइवॉल्ड 1999 से जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी में काम कर रहे थे और एडवांस सैटेलाइट तकनीक पर कई अहम प्रोजेक्ट्स से जुड़े थे जिनकी मदद से धरती और दूसरे ग्रहों की स्कैनिंग की जा सकती है। अपनी मौत से करीब 13 महीने पहले माइवॉल्ड एक ऐसे बड़े रिसर्च प्रोजेक्ट के प्रमुख थे जिससे भविष्य में अंतरिक्ष मिशनों को दूसरे ग्रहों पर जीवन के साफ संकेत खोजने में मदद मिल सकती है। उन्हें ‘प्रिंसिपल’ सम्मान मिला था लेकिन इसके बावजूद नासा ने उनकी मौत पर कभी खुलकर कोई जानकारी नहीं दी।

वैज्ञानिक फ्रैंक माइवॉल्ड

वहीं, दूसरा मामला लॉस एलामोस नेशनल लैब (NANL) से जुड़ा है। यह अमेरिका की प्रमुख परमाणु शोध संस्थाओं में से एक है। यहाँ के पूर्व कर्मचारी एंथनी चावेज (79 साल) 4 मई 2025 को अचानक लापता हो गए लगभग एक साल बाद भी उनका कोई सुराग नहीं मिल पाया है। पुलिस के अनुसार, उनकी तलाश अभी भी जारी है। चावेज को आखिरी बार अपने घर से पैदल निकलते हुए देखा गया था। उनका वाहन घर के बाहर ही खड़ा मिला और उनका पर्स, चाबियाँ और अन्य जरूरी सामान घर के अंदर ही मिले।

NASA के वैज्ञानिक माइकल डेविड हिक्स की रहस्यमयी मौत

डेली मेल ने 7 अप्रैल 2026 को एक अन्य रिपोर्ट में अमेरिका के स्पेस प्रोग्राम से जुड़े वैज्ञानिक माइकल डेविड हिक्स का नाम भी उस सूची में शामिल किया जिसके बाद ऐसे मामलों की संख्या बढ़कर 9 हो गई। माइकल डेविड हिक्स नासा की जेट प्रोपल्शन लैब (JPL) में काम करते थे। उनकी 30 जुलाई 2023 को 59 साल की उम्र में मौत हो गई लेकिन उनकी मौत की वजह आज तक नहीं बताई गई। यहाँ तक कि यह भी साफ नहीं है कि उनका पोस्टमॉर्टम हुआ था या नहीं।

हिक्स ने 1998 से 2022 तक JPL में काम किया और 80 से ज्यादा रिसर्च पेपर लिखे। उन्होंने धूमकेतु (comets) और एस्टेरॉयड (asteroids) को समझने में नासा की मदद की। खास तौर पर हिक्स DART प्रोजेक्ट से जुड़े थे जो नासा का एक टेस्ट था यह देखने के लिए कि क्या इंसान खतरनाक एस्टेरॉयड को पृथ्वी से दूर मोड़ सकते हैं। उन्होंने डीप स्पेस 1 मिशन पर भी काम किया जिसमें नई स्पेस टेक्नोलॉजी का परीक्षण किया गया था और जिसने 2001 में एक धूमकेतु के पास से उड़ान भरी थी।

अजीब बात यह है कि हिक्स के लिए लिखे गए कई ऑनलाइन श्रद्धांजलि संदेशों में उनकी मौत से पहले किसी बीमारी का जिक्र नहीं था। उनकी मौत अचानक हुई और यह लगभग एक साल बाद हुई जब उन्होंने नासा JPL छोड़ दिया था।

माइकल डेविड हिक्स

न्यूक्लियर रहस्यों से जुड़े स्टीवन भी लापता

डेली मेल ने रविवार (11 अप्रैल 2026) को अपनी रिपोर्ट में न्यूक्लियर रहस्यों से जुड़े एक और शख्स के गायब होने का दावा किया। रिपोर्ट में बताया गया कि 48 साल के स्टीवन गार्सिया 28 अगस्त 2025 को बिना किसी सुराग के गायब हो गए। उन्हें आखिरी बार न्यू मैक्सिको के अल्बुकर्क स्थित अपने घर से पैदल निकलते हुए देखा गया था और उनके पास सिर्फ एक हैंडगन थी। गार्सिया एक सरकारी ठेकेदार थे जो कंसास सिटी नेशनल सिक्योरिटी कैंपस (KCNSC) के लिए काम करते थे।

KCNSC ऐसी जगह है जहाँ सेना के परमाणु हथियारों में लगने वाले ज्यादातर (80% से ज्यादा) गैर-परमाणु हिस्से बनाए जाते हैं। बताया गया है कि गार्सिया वहाँ सामान और उपकरणों की देखभाल करने का काम करते थे। इस वजह से उनके पास ऊँची सुरक्षा अनुमति थी और उन्हें वहाँ की कई अहम और गोपनीय जानकारियों तक पहुँच थी। रिपोर्ट के मुताबिक, उनका काम बहुत जिम्मेदारी वाला था और वे वहाँ मौजूद सभी मशीनों और सामान की निगरानी करते थे जिनकी कीमत करोड़ों डॉलर तक हो सकती है। इस तरह स्टीवन ऐसे मामलों से जुड़े 10वें शख्स बन गए हैं।

स्टीवन गार्सिया हुए गायब

अल्बुकर्क पुलिस के अनुसार, गार्सिया को आखिरी बार सुबह करीब 9 बजे अपने घर (कैटटेल कोर्ट SW) से बाहर निकलते हुए देखा गया था। उन्होंने हरे रंग की कैमोफ्लाज टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहने हुए थे। उन्हें एक हैंडगन लिए हुए भी देखा गया था। हालाँकि, रिपोर्ट में इस बात से इनकार किया गया कि गार्सिया आत्महत्या करने वाले थे या किसी मानसिक परेशानी से जूझ रहे थे। संदेह जताया गया है कि उन्हें विदेशी जासूसों द्वारा निशाना बनाया गया हो।

क्या है अमेरिका के खुफिया अधिकारियों को संदेह?

अमेरिका में वैज्ञानिकों के अचानक गायब होने और रहस्यमयी मौतों की घटनाओं के लगातार बढ़ने पर एक पूर्व खुफिया अधिकारी क्रिस स्वेकर ने बड़ा शक जताया है। 24 साल तक FBI में काम कर चुके स्वेकर का कहना है कि अन्य देश अमेरिका के उन लोगों को निशाना बना सकते हैं जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी अहम जानकारी होती है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी वैज्ञानिकों खासकर रॉकेट और मिसाइल तकनीक से जुड़े विशेषज्ञों को लंबे समय से निशाना बनाया जाता रहा है।

स्वेकर ने चेतावनी दी कि अगर ये घटनाएँ आपस में जुड़ी हैं तो कई विदेशी ताकतें इसमें शामिल हो सकती हैं। ये लोग वैज्ञानिकों का अपहरण कर सकते हैं, उन्हें ब्लैकमेल कर सकते हैं, उनसे जानकारी निकलवा सकते हैं या यहाँ तक कि उन्हें मार भी सकते हैं। उन्होंने कहा कि चीन, रूस, पाकिस्तान, भारत, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देश इस तरह की तकनीक हासिल करने की कोशिश करते रहते हैं। उन्होंने कहा कि शीत युद्ध के समय से ही ऐसे प्रयास होते रहे हैं।

कभी ‘खराब आवाज’ के लिए स्टूडियो से निकाली गईं, बहन लता मंगेशकर से रही राइवलरी: जानें- कैसे आशा भोसले ने दशकों किया म्यूजिक इंडस्ट्री पर राज

पद्मविभूषण से सम्मानित, सुरों की मल्लिका और सबसे ज्यादा गाना रिकॉर्ड करने के लिए ग्रिनीज बुक ऑफ द वर्ल्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाली मशहूर गायिका आशा भोसले अब इस दुनिया में नहीं हैं। 10 साल की उम्र से पार्श्व गायन के क्षेत्र में आ चुकी आशा भोसले ने 92 साल की उम्र तक अपनी गायकी को खुद से अलग नहीं होने दिया। 80 साल की सिंगिग करियर में उन्होंने 12000 से ज्यादा गाने रिकॉर्ड किए। ये 20 से ज्यादा भाषाओं में थे।

उनकी मौत संगीत के कद्रदानों के लिए बड़े सदमे से कम नहीं है। 12 अप्रैल 2026 को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में उन्होंने अंतिम साँस ली। एक दिन पहले उन्हें हार्ट अटैक आया था, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

कुछ समय पहले यूके बेस्ड ‘गोरिलाज’ के साथ जुड़ीं, जो वर्चुअल बैंड हैं। इस बैंड की थीम है कि कला को किसी रंग या रूप में नहीं पहचाना जा सकता, इसलिए इनका कोई चेहरा नहीं है यानी इसमें एनिमेटेड कैरेक्टर है। इसके एलबम द माउंटेन के लिए आशा भोसले ने गाना गाया। इसे सुनकर कोई भी रो देगा।

91 साल में लाइव परफॉर्म किया

2025 में 91 साल की उम्र में आशा भोसले ने लाइव परफोर्म करके दर्शकों का मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके गाने के अंदाज की कॉपी करने की कई कलाकारों ने कोशिश की, लेकिन असली तो फिर असली होता है। वह सबसे अलग और अनोखा होता है।

हर दौर में नए तेवर और नए अंदाज में वह आईं और अपनी आवाज का जादू बिखेरा। कव्वाली से लेकर शास्त्रीय संगीत तक हर गाना खुद में आइकॉनिक है। उनके करियर की शुरुआत 1943 में हुई थी। पिता दीनानाथ मंगेशकर के निधन के बाद जब परिवार संभालने की जिम्मेदारी दीदी लता मंगेशकर पर आई तो उन्होंने बड़ी बहन का पूरा साथ दिया। उन्होंने पहला गाना मराठी फिल्म के लिए गाया।

उस रिकॉर्डिंग को याद करते हुए उन्होंने अपने इंटरव्यू में बताया था कि उनके पैर हाथ काँप रहे थे। उन्हें पता नहीं था कि माइक क्या होता है और इस पर कैसे गाया जाता है। लेकिन जब गाना गा लिया, तो उन्हें एहसास हुआ कि वह भी गा सकती हैं, सिर्फ दीदी ही नहीं। वहाँ से नई जिंदगी शुरू हुई।

बॉलीवुड में उन्होंने फिल्म ‘चुनरिया’ के लिए 1948 में गीता दत्त और शमशाद बेगम के साथ पहला गाना रिकॉर्ड किया था। उस गाने के बोल थे- सावन आया रे। 1949 में उन्होंने फिल्म रात की रानी में अपना पहला सोलो गाना रिकॉर्ड किया। बहन लता मंगेशकर के लिए यह साल वरदान साबित हुआ। फिल्म महल में गाने से वह रातोरात कामयाबी के शिखर पर चढ़ गईं। 1950 आते आते लता मंगेशकर दिग्गज संगीतकारों की पहली पसंद बन चुकी थीं। बहन के साए में आशा भोसले को मात्र बी ग्रेड की फिल्में ही ऑफर की जाती। बड़े संगीतकार उनसे दूर थे।

16 साल की उम्र में घर से भाग कर शादी की

ऐसे समय में 16 साल की उम्र में आशा भोसले ने 31 साल के लता मंगेशकर के सेक्रेटरी गणपतराव भोसले संग घर से भाग कर शादी रचा ली। परिवार ने बहुत विरोध किया और इसके बाद दोनों बहनों के रिश्तों में दरार आ गई, जो लंबे वक्त तक चली।

एक इंटरव्यू में आशा भोसले ने खुद माना था कि लता दीदी उनकी शादी के खिलाफ थीं। उनके रिश्ते इसके बाद कड़वे हो गए और सालों तक दोनों बहनों में बातचीत भी नहीं हुई। दूसरी तरफ ये शादी सचमुच आशा भोसले के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं थी। रूढिवादी परिवार को ‘सिंगर बहू’ से काफी एतराज था। पति से भी वह काफी परेशान रहीं। उनकी निजी जिंदगी में उथल-पुथल मचा था और करियर का भी बुरा हाल था।

आशा भोसले की करियर में बदलाव फिल्म परिणीता (1953) से आई। 1954 में राजकपूर ने उन्हें फिल्म बूट पॉलिश में गाने का मौका दिया। संगीतकार ओपी नय्यर का मानना था कि वह लता मंगेशकर के बगैर भी सुपरहिट गाने दे सकते हैं। उन्होंने आशा भोसले को अपनी फिल्मों में गाने का मौका दिया। फिल्म सीआईडी के गानों के हिट होते ही आशा भोसले उनकी पसंदीदा गायिका बन गईं।

नय्यर का साथ आशा भोसले के लिए बेहतरीन दौर साबित हुआ। इस जोड़ी ने एक के बाद एक कई हिट गाने दिए। इन गानों ने आशा को वह मुकाम दिया, जिससे वह अपनी बहन लता मंगेशकर की परछाई से बाहर निकल गईं। ओपी नय्यर के साथ उन्होने 60 फिल्मों के करीब 324 गीत गाए।

फिल्म नया दौर (1957) के हिट गानों के बाद हर एक की जुबान पर उनका नाम था। इसी वक्त एसडी बर्मन और लता मंगेशकर में मनमुटाव हुआ और आशा के जीवन में नया मोड़ आया।

लता से राइवलरी और सालों तक बातचीत बंद

आशा भोसले, किशोर कुमार,एसडी बर्मन और मजरूह सुल्तानपुरी की चौकड़ी ने चुलबुले गीतों का नया ट्रेंड विकसित किया, जो आसानी से हर दिलों तक पहुँच जाता था।

आज भी ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘बंबई का बाबू’ जैसी फिल्मों के गीत लोग गुनगुनाते हैं। फिल्म ‘काला पानी’ में ‘अच्छा जी मैं हारी’ रोमांटिक गीत का शोखभरा अंदाज से लेकर ‘सुजाता’ और ‘लाजवंती’ के बेहद गंभीर गानों में आशा की आवाज हर रंग में माहिर दिखी।

इसके बावजूद लता मंगेशकर की तुलना में आशा भोसले को काफी कम मेहनताना मिलता था। 1960 में जब लता एक गाने के लिए 500 रुपए लेती थीं, तो आशा को मात्र 100-150 रुपए मिलते थे। मशहूर डायरेक्टर सई परांजपे ने फिल्म साज में ऐसी ही दो बहनों की कहानी दिखाई है जो संगीत की दुनिया की बादशाह थीं।

आशा भोसले को स्टूडियों से निकाला गया

आशा भोसले को एक बार रिकॉर्डिंग रुकवा कर स्टूडियो से बाहर निकाला गया था। ये घटना 1947 की है। आशा भोसले और किशोर कुमार फेमस स्टूडियों में फिल्म ‘जान पहचान’ के लिए एक गाना रिकॉर्ड कर रहे थे। इस फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर खेमचंद प्रकाश थे। उन्होंने खराब आवाज बोल कर रात 2 बजे दोनों की रिकॉर्डिंग बंद करवा दी और बाहर जाने को कह दिया।

करीब 10 साल बाद किशोर कुमार ने इस अपमान का बदला लिया। उन्हें फेमस स्टूडियो में रिकॉर्ड के लिए बुलाया गया। उस दिन आशा भोसले भी गाने के लिए पहुँची थीं। जब डायरेक्टर ने उन्हें गाने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि आप ने तो हमारी आवाज को खराब बता कर रिकॉडिंग रुकवा दी थी। आज देखिए हम कहाँ हैं।

पंचम दा का साथ और आशा की दूसरी शादी

1960 में आशा भोसले अपने तीन बच्चों के साथ पति से अलग हो गईं। 1966 में तीसरी कसम में उन्होंने पहली बार एचडी बर्मन के साथ काम किया। हालाँकि उनके पिता एसडी बर्मन के साथ काम करते वक्त उनकी मुलाकात एचडी बर्मन से होती रहती थी। इस जोड़ी ने सुरों को नया आयाम दिया।

एचडी बर्मन यानी पंचम दा ने पश्चिमी मिजाज को भारतीय संगीत के रंग में रंगा और आशा की आवाज उसमें कशिश डाल देती। इससे दुनिया ने आशा की आवाज की उस ऊँचाई से वाकिफ हुई, जो अब तक अनसुना था। कैबरे हो या गजल, शास्त्रीय हो या पाश्चात्य, हर जटिलता को आसान बना कर गीतों में पिरोया। 1980 की शुरुआत में दोनों ने शादी की लेकिन दशक के अंत तक अलग भी हो गए। इसकी वजह संगीतकार के नशे की आदत बताई गई। हालाँकि अलग होने के बाद भी दोनों की दोस्ती कायम रही।

परमाणु हथियारों पर बिगड़ी ईरान-अमेरिका की बात: समझें- शिया मुल्क के न्यूक्लियर पावर बनने के सपने से क्यों घबराया है US, क्या होगा इसका वैश्विक असर

परमाणु हथियारों का फैलाव न हो, इसके लिए ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ अमेरिका ने भी कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। मध्यपूर्व में परमाणु होड़ को रोकने से लेकर आतंकी संगठनों हूती, हिजबुल्ला और हमास तक पर लगाम कसने के लिए ईरान पर ‘रोक’ जरूरी है। इजरायल के अस्तित्व को नकारने वाले ईरान के हाथ परमाणु बम लगने का वैश्विक असर पड़ सकता है। इसलिए परमाणु कार्यक्रम पर पूर्ण विराम अमेरिका की अहम शर्त है।

परमाणु करार पर बढ़ी ‘रार’

ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध को स्थाई तौर पर रोकने के लिए इस्लामाबाद में 21 घंटे की वार्ता विफल रही। मध्यपूर्व में स्थाई शांति, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह रोकना और होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए चल रही वार्ता पर दुनियाभर की नजर थी। इसके विफल रहने के पीछे अहम वजह होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण और उसका परमाणु कार्यक्रम ही है।

अमेरिका नहीं चाहता है कि किसी भी हालत में ईरान के पास परमाणु बम हो। वह हर हाल में ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म या सीमित करना चाहता है, लेकिन ईरान इसे एक देश का अधिकार मानता है।

ईरान-अमेरिका वार्ता भी इसकी वजह से सफल नहीं हो सकी। दरअसल परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिकी दबाव ईरान को अस्वीकार है। उसका कहना है कि यूरेनियम संवर्धन वह पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता, लेकिन परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।

ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद से ही अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे में कमी आनी शुरू हो गई थी। अमेरिका को ईरान पर जरा भी एतबार नहीं है।

2015 में अमेरिका डील से बाहर निकल गया

2003 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि ईरान चोरी छिपे परमाणु हथियार बनाने की कोशिशों में लगा हुआ है। इसके आधार पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए। 2006 में ईरानी कंपनियों की संपत्ति, जो विदेशों में थी, उसे फ्रीज कर दिया गया और ईरान में यूरेनियम संवर्धन पर प्रतिबंध लगाया गया।

इसके अगले साल यानी 2007 में ईरान के हथियार खरीदने पर प्रतिबंध लगाया गया। ईरान की अर्थव्यवस्था पर सबसे गहरी चोट तब पहुँची, जब ईरानी सेंट्रल बैंक और तेल निर्यात पर रोक लगा दी गई।

2015 में ईरान के परमाणु बम नहीं बनाने को लेकर एक बड़ा समझौता हुआ था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की अगुवाई में ईरान और दुनिया के बड़े देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन के बीच JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) समझौता हुआ था।

उस वक्त ईरान ने माना था कि वो यूरेनियम संवर्धन का स्तर निम्न रखेगा, स्टॉकपाइल सीमित करेगा और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को अपने प्लांट के निरीक्षण की इजाजत देगा। समझौते के बाद उस पर लगी आर्थिक पाबंदियाँ हटा दी गईं।

अमेरिका और इजराइल का मानना था कि इससे ईरान परमाणु बम नहीं बना पाएगा और अगर चोरी-छिपे बनाता भी है, तो इसमें काफी समय लगेगा। लेकिन, 2018 में अमेरिका इस डील से बाहर निकल गया। राष्ट्पति ट्रंप का मानना था कि डील एक तरफा और कमजोर है। इसमें ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों पर रोक नहीं लगी है। प्रॉक्सी ग्रुप्स (जैसे हिजबुल्लाह, हूती हमास) पर कोई रोक नहीं है और 10-15 साल बाद ईरान फिर से खुलकर परमाणु कार्यक्रम चला सकता है। इसके बाद ईरान ने भी धीरे-धीरे डील तोड़ी। उसने यूरेनियम 60% तक संवर्धित करना शुरू कर दिया। हालाँकि परमाणु बम के लिए ये संवर्धन 90% जरूरी होता है। स्टॉकपाइल बढ़ा दिया और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से सहयोग करना कम कर दिया।

10 साल बाद यानी 2025-26 में जब ईरान पर संयुक्त राष्ट्र का प्रतिबंध हटने वाला था, लेकिन JCPOA का उल्लंघन करने, 60 फीसदी से ज्यादा यूरेनियम संवर्धन करने और परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के जुर्म में उस पर ज्यादा कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए। हालाँकि ईरान कहता रहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम ऊर्जा और चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए है, लेकिन अमेरिका नहीं माना।

ईरान के साथ बातचीत के बीच अमेरिका ने चेतावनी दी और अंत में इजरायल के साथ मिलकर 28 फरवरी 2026 को हमला कर दिया।

क्या सुरक्षा की गारंटी है परमाणु हथियार

अमेरिका के धूर विरोधी उत्तर कोरिया और ईरान दोनों ही देश हैं। दोनों देशों के संबंध रूस और चीन के साथ अच्छे हैं। लेकिन, अमेरिका उत्तर कोरिया पर हमला करने की हिम्मत नहीं करता, लेकिन ईरान पर हमला करता है। इसकी एक अहम वजह ईरान का परमाणु शक्ति संपन्न नहीं होना भी है।

अगर उत्तर कोरिया की तरह ईरान के पास परमाणु बम होता, तो इजरायल और अमेरिका दोनों ही देश उस पर हमला करने से पहले सौ बार सोचते। दरअसल अमेरिका को डर रहता है कि अगर उसने उत्तर कोरिया को छेड़ा, तो उस तक युद्ध की आँच पहुँच जाएगी। उत्तर कोरिया के पास ऐसे मिसाइल मौजूद हैं, जिससे अमेरिका को टारगेट किया जा सकता है।

अगर ईरान को ‘परमाणु बम’ मिल जाए तो क्या होगा?

अगर ईरान परमाणु हथियार बना लेता है, तो मध्यपूर्व में क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होने का तर्क अमेरिका देता रहा है। ईरान के पड़ोसी देशों सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन, तुर्की, इजरायल समेत सभी देश परमाणु हथियार बनाने की होड़ में शामिल हो सकते हैं। इससे पूरे मध्यपूर्व और पूरी दुनिया को खतरा पैदा होगा। फिलहाल इस्लामिक देशों में सिर्फ पाकिस्तान के पास परमाणु बम है, इसकी धौंस वह भारत पर भी जमाता रहता है।

अमेरिका का करीबी देश इजरायल परमाणु संपन्न है, इसके बावजूद ईरान का परमाणु शक्ति संपन्न होना उसकी सुरक्षा के लिए खतरनाक है। 1979 में इस्लामिक क्रांति से पहले ईरान के इजरायल से काफी अच्छे संबंध थे। 1950 में ईरान ने इजरायल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी। ऐसा करने वाली ईरान उन शुरुआती देशों में शामिल था, जिन्होंने इजरायल को राष्ट्र के रूप में स्वीकारा, लेकिन इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने उसे ‘दुश्मन देश’ करार दिया और विश्व मानचित्र से हटाने की बात कही। जाहिर तौर पर इजरायल के लिए ईरान का परमाणु शक्ति संपन्न होना खतरे की घंटी होगी। इसके अलावा हमास से तो इजरायल का युद्ध लंबे वक्त तक चला। हमास को कमजोर करने में वह सफल रहा है, लेकिन ईरान के परमाणु संपन्न होने से हमास एक बार फिर सामरिक और राजनीतिक रूप से ‘जीवित’ हो सकता है।

हिज्बुल्लाह, हूती, हमास जैसे आतंकियों तक परमाणु बम पहुँच सकते हैं

ईरान के परमाणु बम बना लेने से लेबनान का हिज्बुल्लाह, यमन के हूती, फिलिस्तीन के हमास जैसे संगठन काफी ताकतवर हो सकते हैं। इन संगठनों को ईरान मदद करता है और ये संगठन लगातार इजरायल और मध्यपूर्व के देशों के खिलाफ आतंकी कार्रवाई को अंजाम देते हैं। ऐसे में इन आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई को ईरान परमाणु बम का धौंस दिखा कर रोकने की कोशिश कर सकता है। इसके बाद ये आतंकी संगठन बेखौफ होकर आक्रामक गतिविधियों को अंजाम दे सकते हैं। ईरान को इनकी मदद करने में कोई दिक्कत भी नहीं होगी, क्योंकि उसे किसी का डर नहीं होगा।

जो ईरान अभी होर्मुज स्ट्रेट पर कंट्रोल कर अमेरिका को वार्ता की मेज तक आने के लिए मजबूर कर दिया। दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर डालने में कामयाब रहा, वह हूतियों के माध्यम से लाल सागर पर भी नियंत्रण कर लेगा। होर्मुज की तरह लाल सागर भी दुनिया के व्यस्ततम मार्गों में एक है। ऐसे में ईरान का प्रभुत्व काफी बढ़ जाएगा। इससे क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होगा।

ईरान के परमाणु संपन्न होने से न सिर्फ मध्यपूर्व के देश परमाणु बनाने की होड़ में शामिल हो जाएँगे, बल्कि दुनियाभर में परमाणु बम बनाने की एक सनक सवार हो सकती है। परमाणु अप्रसार को रोकने के लिए वैश्विक परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी कमजोर पड़ सकता है। परमाणु संपन्न देश अपने एटमी बमों और हथियारों को दुनिया में न फैलाएँ और धीरे-धीरे दुनिया परमाणु निरस्त्रीकरण की ओर बढ़े, ये इसका उद्देश्य है, लेकिन ईरान जैसे ‘गैर जिम्मेदार’ देशों के पास परमाणु हथियारों का पहुँचना, पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है।

SC के फैसले की अवहेलना? पंजाब के ‘दलित ईसाइयों’ के लिए आरक्षण के पक्ष में बैटिंग कर रहा The Wire: समझें- कैसे गलत तर्कों से बढ़ाया जा रहा समाज में असंतोष

सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च 2026 को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। उसमें साफ कहा गया कि सिर्फ हिंदू, बौद्ध और सिख लोग ही अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्य बन सकते हैं और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून के तहत सुरक्षा माँग सकते हैं। इसमें बताया गया कि अगर कोई दूसरा धर्म अपना ले, चाहे ईसाई हो या इस्लाम तो कन्वर्जन होते ही अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूरी तरह खत्म हो जाता है, भले ही जन्म से वो कुछ भी हो।

जैसा कि सबको पहले से पता था, यह बात वामपंथियों और उदारवादी ढोंगियों को बहुत बुरा लगी। ये लोग दूसरे मौकों पर कहते हैं कि न्यायपालिका देश का सबसे बड़ा संवैधानिक संस्थान है और हमें उसके फैसलों का सम्मान करना चाहिए, लेकिन सिर्फ तब जब वो फैसला उनके फायदे का हो। यह उनकी लोकतंत्र, मीडिया, चुनाव आयोग और यहाँ तक कि संविधान के बारे में सबसे बड़ी शर्त है। वरना यह गिरोह हमेशा विरोध में खड़ा रहता है, वो भी सही-गलत के आधार पर नहीं बल्कि अपनी विचारधारा और स्वार्थ के आधार पर।

वायर ने सुप्रीम कोर्ट पर लगाया संविधान का पालन न करने का आरोप

‘द वायर’ ने गुरुवार (9 अप्रैल 2026) को एक लेख छापा जिसमें इसी तरह की नाराजगी दिखाई गई और इस नई घटना को पंजाब के ‘दलित ईसाइयों’ से जोड़ दिया गया। कुसुम अरोड़ा ने लिखा, “पंजाब में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने कि ईसाई दलित नहीं माने जा सकते, इससे पूरे राज्य में बेचैनी फैल गई है।” लेख में कहा गया कि यह फैसला पूरे देश में, खासकर उत्तर राज्य के उस समुदाय में, बहुत संवेदनशील मुद्दा बन गया है।

वायर ने लिखा, “2011 की जनगणना के मुताबिक लगभग एक तिहाई (31.9%) आबादी वाला यह राज्य अनुसूचित जातियों का सबसे बड़ा हिस्सा वाला है। यहाँ जाति आधारित भेदभाव की लंबी परंपरा रही है।” अरोड़ा ने चिंथड़ा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के हालिया मामले का हवाला दिया जिसमें एक पादरी ने सुप्रीम कोर्ट से एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) कानून 1989 के तहत सुरक्षा माँगी थी लेकिन उसे मना कर दिया गया।

लेख में शिकायती लहजे में लिखा गया, “इस फैसले ने सुरक्षा देने से इनकार कर दिया जिससे पंजाब के दलित ईसाइयों में काफी चिंता फैल गई है, जो मुख्य रूप से वाल्मीकि, मझबी सिख और आद-धर्मी समुदायों से हैं, जो राज्य की प्रमुख अनुसूचित जाति समूह हैं।”

उसने यह भी जोड़ा कि पंजाब की आबादी में लगभग 1.5 प्रतिशत ईसाई हैं, 2011 की जनगणना के अनुसार और यह संख्या बढ़ रही है क्योंकि गाँवों, कस्बों और शहरों में, खासकर जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला, अमृतसर, तरन तारन, गुरदासपुर, फिरोजपुर और पठानकोट जिलों में मझा और दोआबा इलाकों में मंत्रालय और चर्च बन रहे हैं।

लेख में लिखा है, “दलित ईसाई ज्यादातर दोआबा इलाके में रहते हैं, जहाँ 32 प्रतिशत से ज्यादा पंजाबी दलित आबादी है, चाहे वो किसी भी धर्म के हों। वहीं मझा इलाके में वाल्मीकि समुदाय और मझबी सिखों की अच्छी खासी आबादी है, जिनमें ईसाई धर्म अपनाने वालों की भी अच्छी संख्या है।”

लेखिका का मूल तर्क लगता था कि वो देश के कानूनी नियमों को नजरअंदाज कर रही थी। असल में वो चाहती थी कि सबसे ऊपरी अदालत इन नियमों को तोड़कर कन्वर्शन को बढ़ावा दे। ऐसा लगता था जैसे वो चाहती हो कि न्यायपालिका इस काम में मददगार बने।

भाजपा चाहती है एंटी-कन्वर्जन कानून, कोर्ट ने डाला आग में घी: वायर ने किया गैरकानूनी कन्वर्जन का समर्थन

ऐसा कोई हमला भाजपा पर आरोप लगाए बिना कैसे पूरा हो सकता था और अरोड़ा ने निराश नहीं किया। अपने लेख में उन्होंने लिखा, “हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य के मोगा में ‘बदलाव’ रैली में कहा कि भाजपा पंजाब में एक नया कानून लाकर धार्मिक कन्वर्जन पर रोक लगाएगी। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का फैसला दलित ईसाइयों के डर को और बढ़ा रहा है, भले ही भाजपा (शाह की पार्टी) पंजाब की राजनीति में बहुत छोटी भूमिका निभाती है।”

यह समझना जरूरी है कि पंजाब में गैरकानूनी कन्वर्जन की समस्या बहुत गंभीर हो गई है, जिससे कई लोग चिंतित हैं। पिछले साल रिपोर्ट्स में सामने आया कि पिछले 24 महीनों में 3.5 लाख लोग ईसाई मजहब में कन्वर्ट हो चुके हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये आँकड़े असली विश्वास से ज्यादा धोखे वाली बातों से जुड़े हैं- जैसे बीमारी ठीक करने का झूठा वादा, पैसे और सामान देने का लालच, नौकरी का ऑफर और ऐसी ही दूसरी चीजें।

पंजाब बचाओ मोर्चा ने राज्य में ‘चमत्कारिक इलाज’ से जुड़ी इस महामारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का फैसला किया। इसके अध्यक्ष तेजस्वी मिन्हास ने पंजाब में एंटी-कन्वर्जन बिल लाने की माँग की ताकि ‘स्वयंभू बाबाओं और पादरियों’ द्वारा कराए जा रहे कन्वर्जन पर रोक लगे।

संगठन ने बताया, “राज्य में करीब 65,000 पादरी काम कर रहे हैं जो लालच, दबाव और झूठे चमत्कारिक इलाज के जरिए कन्वर्जन करा रहे हैं, जो ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) कानून 1954 और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की कई धाराओं का उल्लंघन है।” उसने यह भी वादा किया कि जो कोई भी ‘गैरकानूनी कन्वर्जन का सबूत’ देगा उसे गोपनीयता और 2 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा।

यह समस्या की गंभीरता दिखाता है। लेकिन मीडिया हाउस इन गतिविधियों को और बढ़ावा देने के लिए तरस रहा है, जो न सिर्फ निर्दोष लोगों को झूठे वादों के सहारे उनके धर्म छोड़ने पर मजबूर करता है बल्कि गरीब और कमजोर लोगों की जान और सेहत को भी खतरे में डालता है, जिन्हें इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाना चाहिए न कि ईसाई पादरियों के पास। अरोड़ा वैज्ञानिक सोच या अंधविश्वास की भी परवाह नहीं करती, जो तब बड़ा मुद्दा बन जाता है जब कोई हिंदू किसी संत या साधु के पास जाता है।

‘भेदभाव’ वाली भारत सरकार

इस लेख में वायर ने इंटरव्यूज का इस्तेमाल करके दावा किया कि कोर्ट का फैसला देश में रहने वाले दलित ईसाई और मुस्लिम समुदायों की भावनाओं के खिलाफ है, साथ ही विवादास्पद सच्चर कमेटी की रिपोर्ट का जिक्र करके इन लोगों के बीच पीड़ित होने का भाव जगाने की कोशिश की।

उसने पंजाब के पूर्व अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन प्रोफेसर इमैनुएल नाहर का हवाला दिया जिन्होंने कहा, “मजहबी सिख और रविदासिया को 1956 में अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल किया गया था, जब संसद ने संविधान में पहला संशोधन पास किया, और 1990 में दूसरे संशोधन के बाद बौद्धों को जोड़ा गया। ईसाई और मुस्लिमों को खुद अपनी लड़ाई लड़नी पड़ी।”

इमैनुएल नाहर ने आगे कहा कि पंजाब में आद-धर्मी, रविदासिया और रामदासिया सिख समुदाय आरक्षण के जरिए तरक्की कर रहे हैं, लेकिन वाल्मीकि, ईसाई और मुस्लिम जो कन्वर्ट हुए हैं उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है और सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से वे पिछड़े रह गए हैं।

नाहर ने गृह मंत्री को चुनौती दी कि ‘कार्रवाई तो करें लेकिन यह भी बताएँ कि कितने लोगों ने दबाव में धर्म बदला। और कहा कि पंजाब एक अनोखा राज्य है, जिसने कभी ऐसे भावनाओं के आगे झुककर नहीं। उन्होंने कहा कि वे सांसदों से संपर्क करेंगे और उनसे मुद्दा उठाने और राष्ट्रपति के हस्तक्षेप की माँग करने को कहेंगे।

हालाँकि ये मनमाने सवाल तुरंत जवाब न दें, लेकिन गैरकानूनी कन्वर्जन का लगातार समर्थन करने से एक गहरी साजिश का पता चलता है। इसके अलावा, यह ‘अनोखा’ संवेदनशील बॉर्डर वाला राज्य अपनी जनसांख्यिकी बदलने वाली बुरी साजिशों से जूझ रहा है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है, खासकर बाहरी मिशनरियों की वजह से जैसा हाल ही में राजस्थान में देखा गया।

पंजाब क्रिश्चियन मूवमेंट के अध्यक्ष हमीद मसीह ने भी यही कहा और 1950 के राष्ट्रपति आदेश का जिक्र किया जिसमें अनुसूचित जाति का दर्जा सिर्फ हिंदुओं तक सीमित रखा गया था। उन्होंने कहा, “कोर्ट मुस्लिमों और ईसाइयों को भारत का मूल निवासी नहीं मानता जबकि हकीकत यह है कि वे यहाँ सदियों से रह रहे हैं।”

मसीह ने शाह पर विभाजनकारी राजनीति करने और विधानसभा चुनावों से पहले सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने का आरोप लगाया। उसने कहा, “कोर्ट ने जाति व्यवस्था को नजरअंदाज किया और सिर्फ धार्मिक कन्वर्जन पर फोकस किया।” उसने सवाल दागा कि अगर कोई ईसाई हिंदू धर्म अपना ले तो क्या कोर्ट उसे (मूल) भारतीय नागरिक मानेगा?

उन्होंने दोहराते हुए कहा, “देखिए, सिर्फ दलितों को अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत आरक्षण मिलता है। बाकी, मुस्लिमों और ईसाइयों सहित, भेदभाव का शिकार हैं।” उसने आगे कहा, “पंजाब के दलित ईसाई या तो प्राइवेट सेक्टर में काम करते हैं या मजदूरी करते हैं, जिससे उनकी आर्थिक तरक्की का कोई स्कोप नहीं है। चर्च में कम से कम उन्हें बराबरी और सम्मान मिलता है, जो उन्हें दूसरे धर्मों में नहीं मिलता। यही नहीं, उसने कहा कि पंजाब सरकार में ईसाइयों के लिए कोई नौकरी का प्रावधान नहीं है।

मसीह ने जोर दिया कि चर्च में कोई भेदभाव नहीं है और यही अब्राहमिक मजहबों द्वारा दूसरों को कन्वर्ट करने का मुख्य हथियार है, बराबरी के नाम पर। जाति की अवधारणा वे हिंदू धर्म से जोड़ते हैं। तो क्या यह उनकी आरक्षण की माँग को कमजोर नहीं करता?

जब उनके अपनाए गए धर्म में जाति को मान्यता ही नहीं है तो उन पर भेदभाव कैसे हो सकता है? कन्वर्जन का मूल मकसद तो अपने मूल जड़ों से जुड़ाव तोड़कर इस प्रथा से आजादी पाना है ना? फिर उन्हें जाति आधारित आरक्षण के फायदे क्यों मिलने चाहिए? क्या वे मूल धर्म से अलग हो गए लेकिन फिर भी जाति से बंधे रहना चाहते हैं? यहाँ तो विडंबना भी मर जाती है।

आरक्षण के लिए ‘पीड़ित’ होने का रोना

पूरी लेख पूरी तरह से विरोधाभासों से भरा है, जहाँ कन्वर्जन के बाद बराबरी का दावा किया जा रहा है और साथ ही भेदभाव का रोना रोया जा रहा है तथा आरक्षण की माँग की जा रही है। पेंदू मजदूर यूनियन के अध्यक्ष तारसेम पीटर ने कहा, “यह सरासर भेदभाव है कि पंजाब में दलित सिख, हिंदू और बौद्ध आरक्षण का फायदा उठाते हैं, लेकिन जो दलित ईसाई बन जाते हैं वे गरीबी में पड़ जाते हैं क्योंकि वे अल्पसंख्यक श्रेणी में आ जाते हैं।”

उनके मुताबिक मोदी सरकार ने विदेशी फंडिंग बंद कर देने के बाद कई पादरियों ने अपने खुद के मंत्रालय शुरू कर दिए। उसने आगे कहा, “इस बदलाव के बाद मंत्रालयों की संख्या बहुत बढ़ गई है, जो लोगों से आर्थिक और शारीरिक हालत में चमत्कारिक बदलाव का वादा और प्रचार करते हैं।”

पीटर ने कहा कि सरकारें और राजनेता सिस्टम का फायदा उठाते हैं और फिर तुरंत भगवा पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और ‘गोदी’ मीडिया पर गैरकानूनी कन्वर्जन रोकने की कोशिश का आरोप लगाया।

उन्होंने स्वीकार किया कि विदेश से निवेश लोगों को कन्वर्ट करने के लिए आ रहा था, जिसकी वजह से फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल लाया गया। इसके अलावा, मुस्लिम और ईसाई समुदाय दलितों के लिए बने खास कानूनों के हकदार कैसे हो सकते हैं? क्या हिंदू उन नियमों का हक जता सकते हैं जो पहले वाले को खुश करने के लिए बनाए गए, जैसे मुस्लिम पर्सनल लॉ, जो दूसरे सबसे बड़े मजहबी समूह को कानून तोड़ने की छूट देता है।

क्रिश्चियन जसबीर संधू ने कहा, “सरकार अमृत काल और डिजिटल इंडिया की बात करती है, तो हमारे साथ यह भेदभाव क्यों? हमें हमारी तकलीफ समझनी चाहिए।” उन्होंने दलित ईसाइयों की गंभीर आर्थिक मुश्किलों का जिक्र किया और भाजपा पर मुद्दे का राजनीतिक फायदा उठाने का आरोप लगाया, फैसले पर चिंता जताई।

संधू ने गुस्से में कहा, “भाजपा जानती है कि ज्यादातर अल्पसंख्यक उन्हें सपोर्ट नहीं करते। पंजाब विधानसभा चुनाव अगले साल जल्दी होने वाले हैं, इसलिए वे इस मुद्दे को उठाकर वोट माँग रहे हैं। शायद भाजपा को पता नहीं कि पंजाब में नफरत का बीज कभी नहीं जमता। पंजाबी हमेशा साथ रहते हैं, चाहे जाति या धर्म कुछ भी हो।”

सबसे पहले, केंद्र द्वारा शुरू की गई योजनाएँ और कार्यक्रम देश को आगे बढ़ाने के लिए हैं, न कि गैरकानूनी धार्मिक कन्वर्जन को बढ़ावा देने के लिए। लेकिन सरकार को किसी भी ऐसी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है जो भारत की सुरक्षा, सामाजिक ढाँचे और राष्ट्रीय हित को नुकसान पहुँचा सकती है।

देश में कई समूह हैं जो आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं लेकिन वे किसी खास मदद की माँग नहीं करते या अपनी स्थिति सुधारने के लिए कुछ नहीं करते। सच्चाई यह है कि वे अक्सर बुरे तत्वों द्वारा कन्वर्जन के मुख्य निशाने बनाए जाते हैं।

संधू ने आगे कहा, “ज्यादातर दलित चर्च जाते हैं लेकिन उन्होंने औपचारिक रूप से ईसाई महजब नहीं अपनाया। साथ ही पंजाब में कुछ कन्वर्टेड ईसाई अभी भी अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत फायदे ले रहे हैं।” ये बात साबित करती है कि कुछ लोग आरक्षण का दुरुपयोग और कानून तोड़ रहे हैं।

संधू ने जोर दिया कि चर्च जाना दलित के लिए सामाजिक बराबरी के बारे में है, क्योंकि इससे उनकी जिंदगी और समस्याओं पर कोई असर नहीं पड़ता, और कहा कि न हमारी हालत सुधरी है न हमारी तकलीफें खत्म हुई हैं।

ये विरोधाभास बहुत हैरान करने वाले हैं। अगर चर्च ने उन्हें बराबरी दे दी है तो फिर वे उस भेदभाव का सामना क्यों कर रहे हैं जो उनके धर्म में नहीं है? तुम केक खा भी सकते हो और रख भी सकते हो, ऐसा नहीं होता। कोई उनकी मुश्किलों से इनकार नहीं कर रहा, लेकिन उनकी दलील की कमजोर नींव और माँगों की बेतुकी बात साफ दिख रही है।

हालाँकि यह बहुत जरूरी है कि दलित हिंदुओं के साथ कोई बड़ा अन्याय न हो, उनके हिस्से को चुराकर दूसरों को दे दिया जाए, जो इस गिरोह का मकसद है जो खुद को एससी-एसटी का समर्थक बताता है।

कानूनी लड़ाइयों का जिक्र

लेख में आगे बताया गया कि दलित ईसाई संगठन आरक्षण कोटा के लिए याचिकाएँ दायर करके अभियान चला रहे हैं। इसमें क्रिश्चियन पादरी चिंथड़ा आनंद के मामले का भी जिक्र किया गया जिसमें आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने उन्हें कथित हमले के मामले में एससी/एसटी कानून का दुरुपयोग करने के लिए फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता के ईसाई बन जाने की वजह से इस कानून के तहत एफआईआर दर्ज करना गैरकानूनी था।

अरोड़ा ने आगे लिखा, “इस बीच, केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2022 में जस्टिस के.जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच आयोग गठित किया था ताकि यह देखा जा सके कि क्या हिंदू, सिख या बौद्ध के अलावा दूसरे धर्म अपनाने वाले दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जा सकता है, खासकर ईसाई और मुस्लिमों पर फोकस करते हुए।”

उसने आगे लिखा, “आयोग को डॉ. अंबेडकर अनुसूचित जाति अधिकारी कर्मचारी मंच जैसे समूहों से आपत्तियाँ मिली हैं, जो तर्क दे रहे हैं कि कन्वर्ट्स को अनुसूचित जाति का दर्जा देने से मौजूदा लाभार्थियों के अधिकार और फायदे कम हो जाएँगे। जिससे दलित हिंदू समुदाय का इस मुद्दे पर स्टैंड साफ होता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है आखिरी फैसला

जस्टिस पीके मिश्रा और एनवी अंजारिया की बेंच ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 के क्लॉज 3 का हवाला दिया जिसमें साफ लिखा है कि ‘हिंदू धर्म के अलावा किसी दूसरे धर्म को मानने वाला कोई भी व्यक्ति’ अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं माँग सकता। सबसे ऊपरी अदालत ने कहा कि यह रोक स्थायी और अपरिवर्तनीय है।

आदेश में कहा गया, “संविधान या संसद या राज्य विधानसभा द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के तहत कोई भी वैधानिक फायदा, सुरक्षा या आरक्षण या हक उस व्यक्ति को नहीं मिल सकता या बढ़ाया नहीं जा सकता जो क्लॉज 3 के तहत अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता। यह रोक पूर्ण है और इसमें कोई अपवाद नहीं। कोई व्यक्ति क्लॉज 3 में बताए गए धर्म के अलावा किसी दूसरे धर्म को मानते और व्यवहार करते हुए अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं बन सकता।”

गैर-भारतीय समुदायों को आरक्षण क्यों नहीं?

गैरकानूनी कन्वर्जन पूरे भारत में एक खतरे में बदल गए हैं और कन्वर्ट्स को अनुसूचित जाति का दर्जा देने से सिर्फ शिकारी मिशनरियों जैसे तत्वों को और ताकत मिलेगी जो इस देश को अपने धर्म में लाने का सुनहरा मौका मानते हैं। साथ ही, कन्वर्जन का घड़ा तो भेदभाव न करने पर आधारित है, फिर वे जाति पर आधारित आरक्षण कैसे माँग सकते हैं? ये दोनों चीजें साथ-साथ नहीं चल सकतीं।

यह दलित हिंदुओं के साथ बहुत बड़ा अन्याय होगा जिन्होंने लालच के बावजूद अपने विश्वास पर टिके रहने का फैसला किया और उन्हें शिक्षा और रोजगार जैसे सही अवसरों से वंचित कर दिया जाएगा। सरकार सिर्फ हिंदू मंदिरों की संपत्ति पर टैक्स लगाती है, जिसका इस्तेमाल जरूरतमंद समुदाय के सदस्यों की मदद के लिए किया जा सकता था। नतीजा यह है कि उन्हें आरक्षण पर निर्भर रहना पड़ता है जबकि मुस्लिम और ईसाई अपने सारे संसाधन अपने समुदाय की तरक्की पर लगा सकते हैं।

दलित हिंदू किसी भी ऐसे कदम के खिलाफ हैं और समुदाय का डर, जो सीधे प्रभावित होगा, को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आखिरकार, भारत पहले ही लव जिहाद, चंगाई सभाओं और अपराधी पादरियों से जुड़ी कन्वर्जन की बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है। देश कभी ऐसा कानून नहीं बना सकता जो उनकी बुरी महत्वाकांक्षाओं को और मजबूत करे।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)