दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा में हाल ही में हजारों फैक्टरी मजदूर वेतन बढ़ाने की माँग को लेकर सड़कों पर उतर आए। इस दौरान जमकर बवाल हुआ गाड़ियों, शोरूम और कंपनियों में तोड़फोड़ की गई। इस हिंसा में नक्सलियों से लेकर पाकिस्तान तक के कनेक्शन की बात सामने आई है। इस हिंसा के बाद ऑपइंडिया ने इसके कुछ प्रत्यक्षदर्शियों से बातचीत की है जिन्होंने इस पूरे मामले को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी हैं।
क्या है पूरा मामला?
इस मामले में हिंसा की शुरुआत सोमवार (13 अप्रैल 2023) से हुई और हजारों श्रमिक सड़कों पर आए गए। फेज-2 और सेक्टर-62 समेत कई इलाकों में प्रदर्शन के दौरान हालात बिगड़ गए और कुछ उपद्रवी तत्वों ने वाहनों-कंपनियों में तोड़फोड़ की, यहाँ तक कि कुछ गाड़ियों में आग भी लगा दी गई।
अगले दिन तक हिंसा जारी रही। मंगलवार (14 अप्रैल 2026) को लगातार दूसरे दिन मजदूरों ने सड़कों पर उतरकर बवाल किया। मंगलवार को फैक्ट्री कर्मचारी कुछ जगहों पर सड़कों पर उतर आए और जब पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो बवाल हो गया।
मामले में पुलिस ने 300 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया है और इस मामले में 7 FIR दर्ज की गई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि सोमवार को करीब 42000 कर्मी सड़कों पर उतरे और 80 अलग-अलग जगहों पर उपद्रव किया।
इस दौरान फेस-2 इलाके की एक फैक्ट्री के बाहर शुरू हुई आगजनी सेक्टर-67, 63 में भी फैल गई। साथ ही, मदरसन में भी 3-4 गाड़ियों को आग लगा दी गई। दावा किया जा रहा है कि इस पूरे प्रदर्शन के दौरान 100 से अधिक गाड़ियों में तोड़फोड़ और आगजनी की गई। इस दौरान उपद्रवियों ने पुलिसकर्मियों पर पथराव किया और मीडियाकर्मियों के साथ भी बदसलूकी की।
प्रत्यक्षदर्शियों ने ऑपइंडिया को क्या बताया?
घटना के प्रत्यक्षदर्शियों ने ऑपइंडिया को इस हिंसा को लेकर बताया कि कैसे ऑफिस में पूरा झुंड घुस रहा था और तोड़फोड़ करते हुए बाहर निकल रहा था। धर्मेंद्र सिंह नाम के एक व्यक्ति ने बताया की “हुआ ये था कि बाहर से अचानक भीड़ आई और उन्होंने एकदम से हमला कर दिया। भीड़ मतलब ये लगा लो पूरा झुंड था, 300-500 तक लोग थे, रोड भरी हुई थी।”
उन्होंने आगे कहा, “पहले इन्होंने पत्थरबाजी की, फिर यहाँ पर गाड़ियों में तोड़फोड़ की। बाहर जो गाड़ियाँ खड़ी थीं, उन में आग लगा दी। हम लोग अपनी जान बचाने के लिए अंदर चले गए। अंदर तक घुस गए थे, करीब 40-45 गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए। हमें तो ये भी नहीं पता कि आग कैसे लगाई गई, हमारा मकसद तो बस अपनी जान बचाना था।”
इसी तरह एक अन्य ने बताया प्रत्यक्षदर्शी अरुण कुमार ने बताया की “कुछ नहीं, पब्लिक आई इधर से करीब 200-250 आदमी थे, महिलाएँ भी थीं। कंपनी बंद थी फिर भी पत्थर फेंकने लगे, गेट तोड़ दिया, कैमरे भी तोड़ दिए। हमसे बोले कि कंपनी दिखाओ अंदर चल के, हमने कहा कोई नहीं है। 12 कैमरे तोड़कर निकाल ले गए, गेट का सरिया तक तोड़ दिया। अंदर घुस गए और बस उपद्रव कर रहे थे, पत्थर मार रहे थे उनका कोई मोटिव नहीं था।”
इसी तरह कुछ लोगों ने बताया कि उनकी कंपनी बंद थी उसके बाद भी वे लोग ताला तोड़कर अंदर घुस गए और तोड़फोड़ करनी शुरू कर दी। सिक्योरिटी रूम कंप्यूटर डेस्कटॉप सब डैमेज कर दिया। कई लोगों ने कहा कि वे बाहर के लोग थे, हाथ में डंडा और पत्थर लेकर घुस गए और तोड़फोड़ करने लगे। प्रत्यक्षदर्शियों ने कहा कि अगर माँग है तो धरना दो, हड़ताल करो लेकिन तोड़फोड़ करना गलत है।
घटनास्थल के पास मौजूद दुकानदारों का कहना है कि वे चार-पाँच साल से दुकान लगा रहे हैं लेकिन ऐसा माहौल उन्होंने नहीं देखा और अब दुकान पर लोग नहीं रहे हैं। विक्रम राणा नाम के एक व्यक्ति ने बताया, “ये महावीरा कंपनी के वर्कर थे, वहीं से शुरू हुआ था उसके बाद आसपास के लोग भी जुड़ गए पहले डेढ़ घंटे सब नॉर्मल था फिर दो-तीन बजे के बाद पत्थर बाजी शुरू हो गई।”
उन्होंने आगे बताया, “400-500 लोग थे, हमारे ऑफिस पर भी पत्थर मारे गए, हमारा कोई पर्सनल मामला नहीं था। माँगें जायज हो सकती हैं लेकिन तरीका गलत है।”
इस पूरे उपद्रव के दौरान 10 पुलिसकर्मियों सहित कुल 30 लोग घायल हुए। औद्योगिक इकाइयों और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचा है, जिसकी भरपाई का अनुमान करीब 3000 करोड़ रुपए लगाया गया है।
वहीं पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने बताया कि अफवाह फैलाने वाले कई ग्रुप्स की पहचान की गई है। करीब 50 X (ट्विटर) हैंडल के जरिए लोगों को हिंसा के लिए उकसाया गया। पुलिस के मुताबिक, इन हैंडल्स के जरिए QR कोड भेजकर लोगों को ग्रुप में जोड़ा जा रहा था और ‘सड़कों पर आओ, पुलिस को पीटो’ जैसे मैसेज फैलाए जा रहे थे।
पुलिस का कहना है कि एक राजनीतिक पार्टी से जुड़ा हैंडल भी जाँच में सामने आया है। ये सभी हैंडल घटना से पिछले 24 घंटों में बनाए गए और इनका इस्तेमाल भ्रामक जानकारी फैलाने के लिए किया गया।
पुलिस का कहना है कि यह पूरी साजिश सुनियोजित लगती है जिसमें मजदूरों से जुड़े मुद्दे को आधार बनाकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की गई। इस बीच डीजीपी राजीव कृष्ण ने साफ कहा कि हिंसा और आगजनी में शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई होगी। साथ ही नुकसान की भरपाई भी उपद्रवियों से ही कराई जाएगी।
महाराष्ट्र के नासिक में TCS कंपनी में हिंदू युवतियों के शोषण और धर्मांतरण की साजिशों के बीच सोशल मीडिया पर बड़ी-बड़ी कंपनियों के वर्क कल्चर को लेकर चर्चा हो रही है। इस बीच आईवियर रिटेल कंपनी लेंसकार्ट (Lenskart) के ‘हिंदू विरोधी नियमों’ को लेकर भी सोशल मीडिया पर विवाद छिड़ गया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला लेंसकार्ट के कर्मियों को ट्रेनिंग के दौरान दिए जाने वाले परिचयात्मक दस्तावेज (Introductory Document) से जुड़ा हुआ है। इस दस्तावेज में ‘ग्रूमिंग और यूनिफॉर्म से जुड़े नियम’ बताए गए हैं। 23 पन्नों के इस डॉक्यूमेंट में लिखा गया है, “इसमें वे सभी ग्रूमिंग (साफ-सफाई और सलीके से तैयार रहने) से जुड़े नियम शामिल हैं जिन्हें लेंसकार्ट के सभी कर्मचारी फॉलो करते हैं।”
इसी परिचयात्मक दस्तावेज के कुछ पन्ने अब सोशल मीडिया पर वायरल हैं और इन पन्नों में ‘हिंदू विरोधी बातें’ कही गई हैं। डॉक्यूमेंट में 7 नंबर पेज पर लिखा गया है कि लेंसकार्ट के कर्मियों के लिए कलावा और बिंदी पहनाना मना है जबकि कर्मचारी हिजाब पहन सकते हैं।
इसमें लिखा गया है, “अगर आप हिजाब/पगड़ी पहनते हैं, तो उसका रंग काला होना चाहिए। हिजाब ऐसा होना चाहिए जो छाती तक मध्यम रूप से ढका रहे। रंग-बिरंगे पत्थरों वाली अंगूठियाँ (जैसे काला, नीला, हरा, लाल आदि) पहनने की अनुमति नहीं है। बिंदी और क्लचर भी पहनना मना है। साथ ही, धार्मिक धागे या कलाई में पहनने वाले बैंड को भी हटाना जरूरी है।”
लेंसकार्ट के परिचयात्मक दस्तावेज का पेज
इस डॉक्यूमेंट में जूते-कपड़े-घड़ी आदि चीजों को लेकर भी बताया गया है कि किस तरह की चीजें कर्मी पहनते हैं और किस तरह की नहीं। इसी दस्तावेज के एक और हिस्से को लेकर विवाद है। इसके पेज नंबर 10 पर सिंदूर लगाने को लेकर भी टिप्पणी की गई है। इसमें कहा गया है कि अगर कोई सिंदूर लगाता है तो उसे बहुत कम लगाना चाहिए और वह माथे पर फैलना नहीं चाहिए।
लेंसकार्ट के परिचयात्मक दस्तावेज का पेज
इसके अलावा लेंसकार्ट से जुड़े कुछ और डॉक्यूमेंट भी सामने आए हैं जिसमें इसी तरह की बातें कही गई हैं। लेखिका शेफाली वैद्य ने X पर ‘लेंसकार्ट स्टाइल गाइड’ (Lenskart style guide) की एक तस्वीर शेयर की है जिसमें बिंदी ना लगाने और हिजाब पहनने की बातें कही गई हैं।
शेफाली वैद्य ने अपने पोस्ट में लिखा, “पीयूष बंसल (लेंसकार्ट के फाउंडर) अपने कर्मचारियों से कहते हैं कि हिजाब ठीक है लेकिन बिंदी/तिलक/कलावा नहीं। लेंसकार्ट जैसी कंपनी, जो एक हिंदू बहुल भारत में काम करती है, जहाँ ज्यादातर कर्मचारी और ग्राहक हिंदू हैं, इस पर आप क्या कहेंगे?”
So I confirmed, this is genuine. This is what @peyushbansal tells his employees, hijab is okay, but bindi/tilak/Kalawa is not, for @Lenskart_com, a company that exists in Hindu majority Bharat, where most of the employees and consumers are Hindu! What do you say to this? This is… https://t.co/jQ2EPdWPJMpic.twitter.com/SWfOajOjpo
जैसे ही सोशल मीडिया पर ये पेज सामने आए लोगों को गुस्सा फूट पड़ा। कई लोगों ने लेंसकार्ट को बॉयकाट करने का अभियान शुरू करने की वकालत की तो कई ने कहा कि वे अब कभी लेंसकार्ट से कोई सामान नहीं खरीदेंगे।
एक यूजर ने लिखा, “पीयूष बंसल ये क्या बेतुका नियम है? बिंदी, कलावा और सिंदूर से काम का माहौल कैसे खराब हो सकता है या यह कैसे भेदभाव पैदा करते हैं? इस तरह की पाबंदियाँ क्यों लगाई जा रही हैं? अब से लेंसकार्ट से कुछ नहीं खरीदेंगे।” एक अन्य ने लिखा, “मैं लेंसकार्ट से कभी चश्मा नहीं खरीदूँगा। अब हिजाब पहनने वाली महिलाएँ ही चश्मे खरीदें। कृपया कर्मचारियों को नमाज पढ़ने और रमजान में रोजा रखने का तरीका भी सिखा दो।”
हमें लेंसकार्ट के स्टोर पर क्या पता चला?
इस मामले पर लेंसकार्ट की प्रतिक्रिया जानने के लिए हमने HR विभाग की एक वरिष्ठ अधिकारी से बातचीत की लेकिन उन्होंने इस मामले पर कोई जवाब देने से इनकार कर दिया। इस मामले में लेंसकार्ट की प्रतिक्रिया के लिए हमने उन्हें ई-मेल भी भेजा है जिसका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है और जवाब आने पर यह खबर अपडेट कर दी जाएगी।
इस बीच हम दिल्ली में लेंसकार्ट के एक स्टोर में पहुँचे और वहाँ काम करने वाले कर्मियों से इन वायरल खबरों पर उनकी प्रतिक्रिया और इस मामले की सच्चाई जाननी चाही। स्टोर पर काम करने वाले एक कर्मी ने हमें नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि यह डॉक्यूमेंट बिल्कुल सही है और हर कर्मी को इसमें दिए हुए नियमों और शर्तों का पालन करना होता है।
हमें स्टोर में लोगों को चश्मे दिखा रहे उस कर्मी से पूछा कि ‘क्या होगा अगर कोई कर्मी किसी दिन गलती से कलावा या कोई अन्य ऐसी चीज पहनकर आ जाए जिसकी इसमें मनाही हो’। उन्होंने हमें बताया कि ऐसा होने पर उस कर्मी को उस दिन के लिए बाहर जाने के लिए कह दिया जाता है और वो चाहे तो इन नियमों को मानकर काम करते रह सकता है।
कलावा, जिससे लोगों की धार्मिक आस्था जुड़ी है और उसे हटाना या काटना कई लोगों के लिए मुश्किल होता है। इसे लेकर जब हमने पूछा तो कर्मी ने हमें बताया कि अगर किसी को कलावा पहनना भी है तो वो उसे ‘स्लीव्स’ के भीतर छिपाकर पहन सकता है। यानी किसी भी अन्य व्यक्ति या ग्राहक को उसका कलावा नजर नहीं आना चाहिए।
लेंसकार्ट का एक स्टोर
जाहिर तौर पर कलावे-बिंदी जैसी चीजें लैब जैसे किसी महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्र में नियमों के चलते प्रतिबंधित हो सकती है लेकिन स्टोर पर काम करने वालों के लिए इससे कोई दिक्कत नहीं नजर आता है। लेंसकार्ट के उन कर्मी ने हमें बताया कि कलावा, बिंदी और सिंदूर को लेकर बनाए नियम तो सभी कर्मियों पर लागू हैं और लैब जैसी सेंसेटिव जगहों पर ये नियम और भी कड़े हैं। हालाँकि, उन्होंने इस बारे में विस्तार से कोई जानकारी हमें नहीं दी।
उनसे जब हमने पूछा कि ‘इस तरह के बाध्यकारी नियमों से काम करना मुश्किल होता है’ तो उन्होंने कहा कि कंपनी हमें इन नियमों के जरिए प्रोफेशनल बनाने की कोशिश कर रही है। हालाँकि, ‘कलावा पहनने से कोई अनप्रोफेशनल कैसे हो जाता है’ पूछे जाने पर उन्होंने चुप्पी साध ली।
स्टोर पर बैठे कर्मचारी के लिए कलावा-बिंदी पर रोक ‘धार्मिक हस्तक्षेप’!
इस पूरे मामले में एक सवाल जो खड़ा होता है वो ये कि अगर किसी लैब या मशीन वाले काम में कलावा, बिंदी या सिंदूर पर रोक लगाई जाती है तो उसे समझा जा सकता है। वहाँ सुरक्षा का सवाल होता है कलावा या उसका धागा मशीन में फँस सकता है, बिंदी या सिंदूर किसी महत्वपूर्ण मशीन या अन्य चीज में गिर सकता है जिससे काम प्रभावित हो सकता है।
लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब यही नियम एक सामान्य स्टोर या शोरूम में काम करने वाले कर्मचारी पर लागू किए जाते हैं। क्योंकि यहाँ उसका काम सिर्फ ग्राहकों से बात करना और सामान बेचना है। ऐसे माहौल में अगर किसी कर्मचारी को कहा जाए कि वह कलावा न पहने, बिंदी न लगाए या सिंदूर न लगाए तो यह सिर्फ ‘प्रोफेशनल लुक’ का मामला नहीं रह जाता बल्कि यह उसकी निजी और धार्मिक पहचान से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।
भारत जैसे देश में जहाँ धर्म और संस्कृति रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं, वहाँ ये चीजें सिर्फ ‘सजावट’ नहीं होतीं बल्कि आस्था और पहचान का प्रतीक होती हैं। ऐसे में अगर इन्हें हटाने के लिए कहा जाए तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह नियम वास्तव में तटस्थ (Neutral) हैं या किसी खास पहचान को दबाने की कोशिश है।
अगर कोई नियम काम की जरूरत के कारण है (जैसे सुरक्षा) तो वह उचित माना जा सकता है। लेकिन अगर वही नियम बिना ठोस कारण के केवल ‘दिखावे’ या ‘इमेज’ के नाम पर लागू किया जाए तो मामला भेदभाव तक पहुँच जाता है। अगर एक सेल्समैन कलावा पहनकर या माथे पर छोटी बिंदी लगाकर काम कर रहा/रही है और इससे कंपनी के काम या ग्राहक अनुभव पर कोई असर नहीं पड़ रहा तो उसे रोकने का तर्क बेमानी हो जाता है।
नौकरी चाहिए है? तो पहले नमाज पढ़ो… सैलरी हाइक या प्रमोशन चाहिए है? तो पहले बीफ खाओ… महाराष्ट्र के नासिक में मुस्लिम कट्टरपंथियों के ‘कॉरपोरेट जिहाद’ का शिकार बनी हिंदू युवतियों और महिलाओं ने ऐसे आरोप लगाए थे। आइए समझते हैं कि विवाद क्या था और इसी क्षेत्र में काम करते हुए मेरा क्या अनुभव रहा।
हाल ही में महाराष्ट्र के नासिक में ‘कॉरपोरेट जिहाद’ का मामला सामने आया है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) की एक BPO ऑफिस में हिंदू महिला कर्मचारियों को निशाना बनाकर उन्हें किस तरह इस्लामी जिहाद में फँसाया जा रहा था और इसको लेकर चर्चा हो रही है। सभी आरोपि मुस्लिम हैं और कंपनी में अच्छी और प्रभावशाली पोस्ट पर काम कर रहे थे। इस विवाद के सामने आने के बाद से BPO और KPO की कार्यप्रणाली को लेकर भी बहस शुरू हो गई है। ऐसे में इस क्षेत्र में काम करने का मेरा अनुभव भी शायद समाज के लिए उपयोगी हो सकता है।
मेरा अनुभव
जब पूरा शहर रात के अँधेरे में सो रहा होता है, तब इन चमकती हुई काँच की इमारतों में हजारों युवा जाग रहे होते हैं। आज मैं यह खुलासा करूँगा कि कॉर्पोरेट लाइफस्टाइल और आधुनिकता के नाम पर यहाँ क्या चल रहा है। आज ऑपइंडिया पर मैं अपना निजी अनुभव साझा कर रहा हूँ।
मैंने BPO और KPO सेक्टर में सालों तक काम किया है। मैंने वहाँ का माहौल देखा है, नेटवर्क देखा है और वहाँ की मानसिकता को करीब से अनुभव किया है। नासिक में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 6 मुस्लिम टीम लीडर तो बस शुरुआत भर हैं। आज मैं इस बारे में बात करूँगा कि इन दफ्तरों के अंदर असली खेल कैसे खेला जाता है।
BPO-KPO सेक्टर के अंदर की सच्चाई
इस सेक्टर में नौकरी पाने के लिए आपको किसी बड़ी डिग्री की जरूरत नहीं होती। थोड़ी-बहुत अंग्रेजी जानने भर से ही आपको 20-30 हजार रुपए की नौकरी मिल जाती है। यहाँ मुख्य रूप से दो तरह के लोग काम करते हैं। एक तरफ वे लोग होते हैं जो बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते और एक ही जगह पर लंबे समय तक टिके रहना चाहते हैं। दूसरी तरफ कॉलेज जाने वाले हिंदू युवक-युवतियाँ होते हैं जो अपने खर्च निकालने के लिए रात में काम करते हैं।
मैं भी अपने कॉलेज के दिनों में अपने खर्च निकालने के लिए ऐसे ही एक BPO में रात की शिफ्ट में काम किया करता था। मैंने अपनी आँखों से देखा है कि जब कोई मुस्लिम व्यक्ति टीम लीडर (TL), ट्रेनर या HR जैसी किसी ऊँची पोस्ट पर पहुँच जाता है तो वह वहाँ के पूरे माहौल (ecosystem) को ही बदल देता है। वह बड़ी आसानी से अपने मजहब के युवाओं को इंटरव्यू पास करवाकर उन्हें इस सिस्टम के अंदर ले आता है।
हिंदू युवा आमतौर पर 2-3 साल में अपनी आगे की पढ़ाई पूरी करके दूसरे क्षेत्रों में चले जाते हैं। लेकिन ये लोग सालों तक एक ही जगह पर टिके रहते हैं, क्योंकि इन्हें आगे और पढ़ाई करने की जरूरत नहीं होती। इसका नतीजा यह होता है कि वे ट्रेनिंग से लेकर मैनेजमेंट तक की सभी अहम कुर्सियों पर काबिज हो जाते हैं और जब सत्ता उनके हाथों में आ जाती है तो उनका असली खेल शुरू होता है। और तब उनका असली निशाना होती हैं- नई-नई आई हुईं हिंदू लड़कियाँ।
सीक्रेट मुस्लिम वॉट्सऐप ग्रुप
नासिक के TCS केस में पुलिस जाँच में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि इन जिहादियों ने ऑफिस के अंदर एक सीक्रेट मुस्लिम वॉट्सऐप ग्रुप बनाया हुआ था। इस ग्रुप में ऑफिस की हिंदू लड़कियों की तस्वीरें शेयर की जाती थीं। वहाँ इस तरह की चर्चाएँ होती थीं कि ‘आज किसका नंबर है?’, ‘कौन-सी लड़की कमजोर है जो जल्दी जाल में फँस जाएगी?’, ‘किसे किस तरह ब्लैकमेल करना है?’।
जो लड़की अपने टीम लीडर को अपना रक्षक मानती थी, वही टीम लीडर डिजिटल ग्रुप में उसी लड़की की बोली लगा रहा था। यह एक ‘डिजिटल मंडी’ थी, जहाँ हिंदू बेटियों की अस्मिता के सौदे हो रहे थे।
टीम आउटिंग और ब्लैकमेलिंग की रणनीति
मुझे याद है कि जब मैं काम करता था, तब ये लोग ‘टीम आउटिंग’ या ‘टीम डिनर’ के नाम पर बहुत जोर देते थे। नासिक के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। ये जिहादी पूरी टीम को आउटिंग पर ले जाते, जहाँ हिंदू लड़कियों का शारीरिक शोषण किया जाता, उनके आपत्तिजनक फोटो और वीडियो बनाए जाते और फिर धर्मांतरण के लिए ब्लैकमेलिंग शुरू कर दी जाती।
नासिक के अंबड पुलिस स्टेशन में दर्ज शिकायत में ऐसी बातें सामने आई हैं जिन्हें सुनकर खून खौल उठता है। कंपनी के मुस्लिम टीम लीडर्स और मैनेजर्स ने जैसे एक नियम बना दिया था कि अगर सैलरी हाइक या प्रमोशन चाहिए तो नमाज पढ़नी होगी और गौमांस खाना होगा।
हिंदू पुरुष भी टारगेट
ये लोग सिर्फ लड़कियों को ही नहीं बल्कि हिंदू लड़कों को भी निशाना बनाते हैं। उन्हें नशे की आदत में धकेलना, उनकी आस्था को तोड़ना और धीरे-धीरे उन्हें इस्लामी विचारधारा की ओर मोड़ना, यह सब ऑफिस के AC केबिन में बैठकर किया जाता है।
रात के समय जब कोई निगरानी करने वाला नहीं होता, तब ये जिहादी ऑफिस को अपने प्रचार का केंद्र बना देते हैं। नाइट शिफ्ट का सबसे बड़ा फायदा इन्हें यह मिलता है कि रात में पूरी दुनिया सो रही होती है। ब्रेक के नाम पर लड़कियों को बाहर ले जाना, होटलों में जाना तो यह सब आम बात बना दी जाती है। CCTV भले ही ऑफिस के फ्लोर पर लगे होते हैं लेकिन पार्किंग या बाहर क्या हो रहा है, इसकी कोई परवाह नहीं करता।
पूरे देश में फैला है नेटवर्क
नासिक पुलिस की कार्रवाई से यह साफ होता है कि यह कोई एक-दो लोगों का मामला नहीं बल्कि एक सुनियोजित नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है। महाराष्ट्र पुलिस ने फिलहाल 6 लोगों को पकड़ा है लेकिन क्या इतना ही काफी है? गुजरात से लेकर दिल्ली तक कई कंपनियों में ऐसे मामलों को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
असल में ऐसी कंपनियों के HR और मैनेजमेंट की भी जाँच होनी चाहिए। हर कंपनी की Prevention of Sexual Harassment (POSH) कमेटी में संतुलित और जवाबदेह प्रतिनिधित्व होना चाहिए ताकि पीड़ित महिलाओं को सही न्याय मिल सके।
माता-पिता से भी अपील है कि वे इस बात पर ध्यान दें कि उनके बेटे-बेटियाँ किस कंपनी में काम कर रहे हैं, उनका टीम लीडर कौन है और कार्यस्थल का माहौल कैसा है। कॉर्पोरेट कल्चर के नाम पर किसी भी तरह के शोषण या दबाव को नजरअंदाज न करें। अगर किसी के पास ऐसी कोई जानकारी हो, तो संबंधित अधिकारियों तक जरूर पहुँचाएँ क्योंकि समय पर उठाई गई आवाज किसी की जिंदगी बचा सकती है।
(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
महाराष्ट्र में अमरावती जिले से सामने आया मामला समाज की कई परतों को उजागर करता है। एक तरफ जहाँ मुस्लिम युवक मोहम्मद अयान अहमद तनवीर ने 180 लड़कियों को अपने जाल में फँसाया, उनके साथ 350 से ज्यादा अश्लील वीडियो बनाए और इनमें से 100 वीडियो वायरल भी कर दिए। दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस है, जो ऐसे गंभीर मामलों में पीड़िताओं को कठघरे में खड़ा करने से बाज नहीं आती।
इस पूरे मामले में कॉन्ग्रेस की ‘टुच्ची’ सोच को पूरी तरह उजागर करते कॉन्ग्रेस नेत्री यशोमती चंद्रकांत ठाकुर का पीड़िताओं पर सवाल उठाते बयान सामने आया है। उन्होंने उन पीड़िताओं को लेक्चर दिया- “लड़कियों में अक्ल नहीं है क्या? क्या लड़कियों ने अपनी बुद्धि खो दी है?”
🔴#BREAKING | "Didn't the girls have any sense" : Congress leader Yashomati Thakur on Maharashtra exploitation case pic.twitter.com/3aX4i44I8B
दिलचस्प बात यह है कि यशोमती ठाकुर 2019 से 2022 तक कॉन्ग्रेस और शिवसेना के गठबंधन वाली सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री रह चुकी हैं। यानी जिस पद पर रहते हुए यशोमती ठाकुर से महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान की आस थी, वही कॉन्ग्रेस नेता आज पीड़ित लड़कियों पर सवाल उठा रही है।
सीधी बात है कि ये सिर्फ एक बयान नहीं है, ये कॉन्ग्रेस पार्टी की मानसिकता है। ये वही सोच है जो हर बार रेप, छेड़छाड़ या यौन शोषण के मामलों में अपराधी पर सवाल उठाने के बजाए लड़कियों को ही नसीहत देने लगती है। कभी उनके कपड़ों पर, कभी उनकी समझ पर, कभी उनके फैसलों पर। हर बार राजनीतिक बयानबाजी में निशाना पीड़िता ही बनती हैं।
और ये पहली बार नहीं हुआ है। कॉन्ग्रेस के नेताओं का ट्रैक रिकॉर्ड उठाकर देख लीजिए, ऐसे बयान बार-बार सामने आते हैं। कर्नाटक विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर केआर रमेश कुमार का वो शर्मनाक बयान कौन भूल सकता है- “जब रेप होना ही है, तो लेटो और मजे लो।” यही नहीं कॉन्ग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया खुलेआम कहते हैं- “खूबसूरत लड़की दिख जाए तो दिमाग विचलित हो जाता है।” केरल कॉन्ग्रेस के नेता मुल्लापल्ली रामचंद्रन तो इससे भी आगे निकल जाते हैं और कहते हैं- “जिस लड़की का रेप हो, उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए।” वहीं अमरगौड़ा पाटिल जैसे नेता तो रेप पीड़िता के परिवार को ही झूठा करार देने लगते हैं।
ये कोई एक-दो फिसलती जुबान के उदाहरण नहीं हैं, ये उसी पुरानी, टुच्ची और गैर-जिम्मेदार सोच की झलक है जो अंदर तक बैठी हुई है।
और बात यहीं खत्म नहीं होती। जब राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी हाथरस की पीड़िता से मिलने जाते हैं, तब जो वीडियो सामने आई, उसने भी बहुत कुछ साफ कर दिया। जिस वक्त पूरे देश में गुस्सा और संवेदना का माहौल था, उस समय दोनों भाई-बहन का कार में हँसी-मजाक करते हुए जाना ये दिखाता है कि गंभीरता कितनी है। साफ है, ये सिर्फ अलग-अलग नेताओं की गलती नहीं है।
सबसे खतरनाक बात ये है कि इस तरह के बयान सीधे-सीधे अपराधियों को राहत देते हैं। जब देश की एक पार्टी के नेता ही पीड़ितों को दोष देने लगेंगे, तो अपराधियों का हौसला क्यों नहीं बढ़ेगा? उन्हें तो यही लगेगा कि गलती उनकी नहीं, बल्कि लड़कियों की ही है।
आखिर में साफ शब्दों में कहें तो कॉन्ग्रेस की समस्या बयान नहीं, पूरी सोच है। बार-बार वही गिरी हुई बातें, वही पीड़ितों को कठघरे में खड़ा करने की आदत ये दिखाती है कि ये कोई गलती नहीं बल्कि जड़ जमा चुकी मानसिकता है। जिस पार्टी के नेताओं को रेप जैसे गंभीर अपराध में भी संवेदनशीलता नहीं दिखती, वो महिलाओं की सुरक्षा की बात करें, ये खुद एक मजाक लगता है। सच यही है कि कॉन्ग्रेस के लिए ऐसे मुद्दे गंभीर नहीं, सिर्फ राजनीति का सामान है। और जब तक ये सोच नहीं बदलेगी, तब तक इनके बयान भी ऐसे ही जहरीले और शर्मनाक आते रहेंगे।
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी TCS की नासिक BPO यूनिट में यौन उत्पीड़न और धर्मांतरण के आरोपों से भारत हिल गया है। अब तक सात गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं। इसमें कंपनी की एचआर मैनेजर और मुख्य आरोपित निदा खान भी शामिल हैं। गिरफ्तार किए गए आरोपितों में आसिफ अंसारी, शफी शेख, शाहरुख कुरैशी, रजा मेमन, दानिश शेख और तौसिफ अत्तर शामिल हैं।
जाँच करने वालों का कहना है कि एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम अब इसकी जाँच भी कर रही है कि निदा खान ने कंपनी में किस तरह से लड़कियों पर दबाव डाला। निदा खान के नेटवर्क के अंदर फाइनेंशियल लिंक, डिजिटल फुटप्रिंट की जाँच भी हो रही है।
इस मामले को लेकर एक रिसॉर्ट से CCTV फुटेज जब्त किया गया है, जहाँ एक पीड़िता पर हमला किया गया था। बताया जा रहा है कि यह रैकेट 2021 से एक्टिव था। इसमें कमजोर कर्मचारियों को टारगेट किया जाता था और इसके लिए ‘बाहरी फंडिंग’ की आशंका भी है। पीड़ितों को धमकाने के लिए एक और HR अधिकारी जाँच के दायरे में है। अब तक 9 FIR दर्ज की गई है।
पीड़िताओं ने आरोप लगाा है कि टीम लीडर्स, जैसे- आसिफ अंसारी, तौसीफ अत्तर, दानिश शेख, रजा मेमन, शाहरुख कुरैशी, शफी शेख आदि ने उन्हें अच्छी सैलरी, प्रमोशन और नौकरी के बेहतर अवसर का लालच देकर फँसाया।
इसके बाद शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डाला। ब्लैकमेल किया गया। कुछ मामलों में बलात्कार तक के आरोप लगे हैं। हिन्दू लड़कियों को नमाज पढ़ने, रोजा रखने, माँसाहार करने और यहाँ तक कि धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया। इस जिहादी नेटवर्क का भंडाफोड़ तब हुआ, जब अंडरकवर महिला पुलिस ने कंपनी में शामिल होकर सच सामने लाया।
कौन है निदा खान
30 साल की निदा खान सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट हैं। वह नासिक TCS के BPO यूनिट में HR मैनेजर के तौर पर काम करती थी और कंपनी की इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी यानी ICC का भी हिस्सा थी।
उसके काम में कर्मचारियों की शिकायतों को दूर करना, कार्यस्थल में कर्मचारियों की सुरक्षा का ध्यान रखना और POSH (यौन उत्पीड़न की रोकथाम) एक्ट के नियमों का पालन करना शामिल था। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, वह पुणे के कामकाज से जुड़ी थीं और कहा जाता है कि उन्होंने जनवरी में कंपनी से इस्तीफा दे दिया था। हालाँकि, उनके खिलाफ लगाए गए आरोप उनके प्रोफेशनल काम की वजह से खास तौर पर गंभीर हैं।
HR head Nida Khan was playing a key role in the jihadist conspiracy at TCS Nashik.
She helped recruit Hindu women, pushed them to adopt burqas, hijabs, and Islamic customs, and then deliberately suppressed their complaints of sexual exploitation.
जाँच में ये बात सामने आई है कि लंबे वक्त तक कई महिलाएँ परेशान थीं, उन्होंने एचआर अधिकारी निदा खान को जानकारी भी दी, लेकिन न तो उनकी शिकायतें दर्ज हुई और न ही कोई कार्रवाई की। जाँचकर्ताओं का मानना है कि निदा खान ने शायद आरोपों का जवाब नहीं दिया और न ही आलाधिकारियों को शिकायतों की जानकारी दी।
नासिक सिटी पुलिस कमिश्नरेट के मुंबई नाका और देवलाली कैंप पुलिस स्टेशनों में FIR दर्ज कराने वाली कई हिंदू महिलाओं ने कहा कि उनके यौन उत्पीड़न की शिकायतों को नजरअंदाज किया गया। कुछ शिकायत करने वालों ने यह भी कहा कि उन पर चुप रहने का दबाव बनाया गया था। अब यह भी जानने की कोशिश की जा रही है कि क्या निदा खान ने जानबूझकर आरोपितों को बचाने की कोशिश की?
आखिर पीड़िताओं के बार-बार किए गए दावों को क्यों खारिज कर दिया। 78 ईमेल और चैट मैसेज मिलने के बाद भी उसने अपने सीनियर्स को इस बारे में क्यों नहीं बताया। निदा खान की कॉल डिटेल्स में भी पता चला है कि आरोपितों से उसकी बातचीत होती रहती थी।
शिकायत करने वालों के मुताबिक, वह POSH कमेटी की मेंबर थीं, लेकिन उन्होंने इस मामले में कोई एक्शन नहीं लिया, बल्कि पीड़िताओं को ये समझाने की कोशिश की कि बिजनेस की दुनिया में ऐसी घटनाएँ आम हैं।
निदा खान की भर्ती प्रक्रिया के पैटर्न की जाँच
जाँच के मुताबिक, निदा खान ने हिंदू लड़कियों को इस्लामिक परंपरा सीखने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्हें अपने विश्वास में लिया और झूठे वादे किए। फिर उन्हें मुस्लिम महिलाओं की तरह बुर्का, हिजाब और दूसरे कपड़े पहनने के लिए मजबूर किया। वह मामले के खुलासे के वक्त पुणे ऑफिस से जुड़ गई थी। इसलिए नासिक से पुणे तक पुलिस की टीम जाँच में जुटी है। वह किन लोगों से मिली, कहाँ कहाँ की यात्राएँ की, इन सब का भी पता लगाया जा रहा है।
खास बात यह है कि निदा खान का नाम पहली आधिकारिक शिकायत में भी दर्ज है। इसमें दानिश शेख और तौसीफ अत्तर के साथ उसका नाम एक 23 साल की दलित हिंदू पीड़िता ने दर्ज कराया था। शिकायतकर्ता ने बताया कि जुलाई 2022 से फरवरी 2026 तक तीनों ने हिंदू देवी-देवताओं के बारे में गलत बातें कहीं, जिससे उसकी धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं। उसने दानिश पर रेप का आरोप लगाया। दानिश पहले से शादीशुदा है और उसके 2 बच्चे हैं। उसने शादी का झाँसा देकर उसे शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया, जबकि तौसीफ ने वर्कप्लेस पर उसके सामने सेक्सुअल प्रपोजल रखे।
इस मामले की जाँच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन किया गया है। एसआईटी ये भी जाँच कर रही है कि ये सिस्टम की विफलता थी या व्यक्तिगत मामला था। पुलिस उनके बैंक खातों की भी जाँच कर रही है, ताकि किसी तरह के लेन-देन का पता लगाया जा सके।
पीएम मोदी ने 14 जनवरी को भारत रत्न डॉक्टर भीमराव रामजी अंबेडकर की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान निर्माता के देश निर्माण की कोशिशें बहुत मोटिवेट करने वाली हैं। उनका जीवन और काम आने वाली पीढ़ियों को एक न्यायपूर्ण और आगे बढ़ने वाला समाज बनाने के लिए प्रेरित करता रहेगा।
Tributes to Dr. Babasaheb Ambedkar on his birth anniversary. His efforts towards nation building are deeply motivating. His life and work continue to inspire generations to build a just and progressive society. pic.twitter.com/MWHUTlpf9Y
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर 85 साल पहले महाराष्ट्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की एक शाखा में आए थे। संघ के विश्व संवाद केंद्र (वीएसके) ने विदर्भ में कहा कि अंबेडकर ने अपने दौरे के दौरान कहा था कि कुछ मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद वह आरएसएस को अपनेपन की भावना से देखते हैं। उन्होंने दौरा कर उन आरोपों को भी झुठलाया, जो उस वक्त सामाजिक संगठन पर लग रहे थे। यह आरएसएस की निस्वार्थ योगदान को दर्शाता है। आरएसएस पर तीन बार प्रतिबंध लगा, लेकिन यह बेदाग बाहर निकला। उस वक्त संगठन को लेकर मनगढ़ंत सूचना फैलाई गई थी।
सतारा की शाखा में पहुँचे थे डॉक्टर अंबेडकर
डॉ. अंबेडकर ने दो जनवरी 1940 को सतारा जिले के कराड में आरएसएस की शाखा का दौरा किया। उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों को संबोधित भी किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा, “हालाँकि कुछ मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन मैं संघ को अपनेपन की भावना से देखता हूँ।” 9 जनवरी, 1940 को पुणे के मराठी दैनिक ‘केसरी’ में डॉ. आंबेडकर के आरएसएस शाखा का दौरा करने के बारे में एक खबर प्रकाशित हुई थी।
(साभार-Arise Bharat)
आरएसएस विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी की किताब ‘डॉ. अंबेडकर और सामाजिक क्रांति की यात्रा’में भी इसका जिक्र किया गया है, इसमें आरएसएस और डॉ. अंबेडकर के बीच संबंधों के बारे में बताया गया है। किताब के आठवें अध्याय में ठेंगड़ी कहते हैं कि डॉ. आंबेडकर को आरएसएस के बारे में पूरी जानकारी थी। संघ के स्वयंसेवक नियमित रूप से अंबेडकर के संपर्क में रहते थे और उनसे चर्चा करते थे।
डॉक्टर अंबेडकर यह भी जानते थे कि आरएसएस हिंदुओं को एकजुट करने वाला एकमात्र अखिल भारतीय संगठन है। वह इस बात से भी वाकिफ थे कि हिंदुत्व की बात करने वाले दूसरे संगठनों से आरएसएस बिल्कुल अलग है। आरएसएस के विकास की गति को लेकर उनके मन में संदेह था। इस दृष्टि से डॉ. आंबेडकर और आरएसएस के बीच संबंधों का विश्लेषण करने की आवश्यकता है।
(साभार-Arise Bharat)
संघ ने इस आरोप को भी गलत साबित कर दिया है कि वह केवल ब्राह्मणों के लिए है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने 1934 में वर्धा में आरएसएस शिविर का दौरा किया था, जहाँ उन्होंने महसूस किया कि संघ में विभिन्न जातियों और धर्मों के स्वयंसेवक शामिल थे। वहाँ उन्होंने खुद अनुभव किया कि शिविर में कोई भी स्वयंसेवक अपनी या अन्य स्वयंसेवकों की जाति जानने में दिलचस्पी नहीं रखता था। सभी के मन में एक ही भावना थी कि हम सभी हिंदू हैं। इसलिए स्वयंसेवकों ने अपनी दैनिक गतिविधि सहजता से की।
यह देख कर गाँधीजी बहुत हैरान हुए। उन्होंने आरएसएस संस्थापक डॉ. हेडगेवार के साथ वार्ता की और अस्पृश्यता उन्मूलन कार्यक्रम के सफल कार्यान्वयन के लिए उन्हें बधाई दी।
चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल में किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत करीब 90 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। चुनाव आयोग ने भी पुष्टि की कि संशोधन प्रक्रिया के अंतिम चरण में 27,16,393 मतदाता अयोग्य पाए गए। इसके बाद इस मुद्दे को लेकर कुछ इस्लामी-वामपंथी झुकाव वाले राजनीतिक और मीडिया गुटों ने मुस्लिम-पीड़ित की कहानी को हवा देना शुरू कर दिया।
“Political turmoil in Indian border state as nine million lose voting rights” हेडलाइन के साथ इस आर्टिकल में स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने एक तरह का डर का माहौल बनाने की कोशिश की। उन्होंने नाम हटाए जाने को राजनीतिक साजिश के तौर पर पेश करते हुए इसे ‘वोटिंग अधिकार छिन जाने’ का मामला बताया, जो राज्य की नीतियों को प्रभावित कर सकता है। अपने इस एकतरफा लेख में कोलकाता के इस तथाकथित ‘स्वतंत्र पत्रकार’ ने खासतौर पर मुस्लिमों को निशाना बनाए जाने की एक काल्पनिक कहानी को ज्यादा उभारने की कोशिश की।
इस आर्टिकल में चालाकी से आँकड़े, भौगोलिक संदर्भ, राजनीतिक बयान और सहानुभूति जगाने वाली व्यक्तिगत कहानियों को इस तरह पेश किया गया है कि पाठक खुद ही इन बिंदुओं को जोड़कर एक कथित साजिश का अंदाजा लगाने लगें। मानो बंगाल के मुस्लिमों के वोटिंग अधिकार छीनने की कोशिश हो रही हो, जो आमतौर पर BJP के खिलाफ वोट करते हैं।
12 अप्रैल 2026 को प्रकाशित BBC के इस आर्टिकल में लिखा गया है, “भारत की बांग्लादेश के साथ 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है, जो काफी हद तक खुली और कुछ हिस्सों में नदी के किनारे-किनारे गुजरती है। इसका एक बड़ा हिस्सा बंगाल से होकर जाता है। यही वजह है कि राज्य में प्रवासन और मतदाता सूची को लेकर होने वाली बहस को एक संवेदनशील और राजनीतिक रूप दे दिया गया है।”
स्निगधेंदु भट्टाचार्य ने इशारों-इशारों में यह जताने की कोशिश की कि सुप्रीम कोर्ट ने सही फैसला नहीं लिया, जब उसने सभी ‘विवाद सुलझाए बिना ही इस अप्रैल में चुनाव कराने की अनुमति दे दी।’ उन्होंने यह भी लिखा की इस वजह से ‘करीब 27 लाख मतदाताओं का भविष्य अब भी अनिश्चित’ बना हुआ है।
बंगाल SIR में मतदाता हटाना पारदर्शी जाँच या मुस्लिमों का मत छीनने की कोशिश?
गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट मतदाता सूची से 58.25 लाख नाम हटाए थे। ये वे लोग थे जो या तो मृत पाए गए, कहीं और शिफ्ट हो चुके थे, लंबे समय से अनुपस्थित थे या जिनके नाम दोहराए गए थे। इसके बाद कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ रह गई। फिर 28 फरवरी को अंतिम सूची से करीब 5 लाख और नाम हटाए गए, जिससे कुल मिलाकर हटाए गए नामों की संख्या करीब 91 लाख के आसपास पहुँच गई।
शुरुआत में 60.06 लाख मतदाताओं को जाँच के दायरे में रखा गया था, जिनमें से लगभग आधे लोग अयोग्य पाए गए। सबसे ज्यादा नाम मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में हटाए गए, जहाँ 11 लाख संदिग्ध मतदाताओं में से 4.55 लाख से ज्यादा अयोग्य निकले। मुर्शिदाबाद की सीमा बांग्लादेश से लगती है। यहाँ बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ और भीड़ जुटाकर हिंसा जैसे मुद्दे लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में अयोग्य मतदाताओं का सामने आना इसी पृष्ठभूमि से जुड़ा माना जा रहा है। मालदा और अन्य सीमावर्ती जिलों में भी कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिली।
सीमावर्ती इलाकों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटना और बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ की बढ़ती संख्या जैसे संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इन जिलों की धार्मिक जनसंख्या संरचना को बदलने की एक सुनियोजित कोशिश हो सकती है। हालाँकि, इस पूरे मामले पर पर्दा डालने के लिए कुछ इस्लामी-वामपंथी झुकाव वाले गुट यह कहानी गढ़ रहें है कि चुनाव आयोग और BJP मिलकर मुस्लिमों को मनमाने तरीके से वोटिंग अधिकार से वंचित कर रहे हैं।
चुनाव आयोग के आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि हटाए गए ज्यादातर नाम सामान्य श्रेणियों में आते हैं। जैसे मृतक, लंबे समय से अनुपस्थित, स्थायी रूप से कहीं और शिफ्ट हो चुके लोग, दिए गए पते पर न मिलने वाले या फर्जी एंट्रीज। मतदाता सूची में इस तरह की गड़बड़ियाँ आम होती हैं और SIR अभियान का मकसद ही इन्हें ठीक करना था। यह प्रक्रिया सिर्फ बंगाल में ही नहीं, बल्कि अब तक शामिल 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी इसी उद्देश्य से चलाई गई। ताकि घोस्ट वोटर, पलायन और पुरानी एंट्रीज जैसी समस्याओं को दूर किया जा सके।
SIR में चुनाव आयोग ने तय प्रक्रिया का पालन किया, जबकि उसे राज्य की TMC सरकार के दबाव और विरोध का भी सामना करना पड़ा। लेकिन BBC के आर्टिकल में इस बात का जिक्र तक नहीं है कि चुनाव आयोग के अधिकारी लगातार दबाव में काम कर रहे थे और मालदा में तो न्यायिक अधिकारियों को अपने काम के दौरान इस्लामी भीड़ की हिंसा तक झेलनी पड़ी। जाहिर है, ये बातें उस ‘मुस्लिम पीड़ित’ वाली कहानी में फिट नहीं बैठतीं, जिसे पेश करने की कोशिश की गई है।
BBC के आर्टिकल में दावा किया गया है, “राजनीतिक दलों द्वारा जुटाए गए आँकड़ों के मुताबिक, जिन 27 लाख मामलों पर स्थिति स्पष्ट नहीं है, उनमें करीब 65 प्रतिशत मुस्लिम हैं। कुल मिलाकर हटाए गए 90 लाख नामों में से 31.1 लाख यानी लगभग 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो कि 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी से ज्यादा है।”
हालाँकि, BBC की इस कहानी के उलट सच यह है कि जिन 27 लाख मामलों को ‘अभी तय नहीं’ बताया जा रहा है, या जिन 27,16,393 मतदाताओं के नाम हटाए गए। उन्हें बिना जाँच के बाहर नहीं किया गया। बल्कि हर मामले की न्यायिक समीक्षा हुई। इन नामों को कुछ गड़बड़ियों की वजह से चिन्हित किया गया था और करीब 705 न्यायिक अधिकारियों ने इनकी जाँच की। यह पूरी प्रक्रिया हाई कोर्ट की निगरानी में और सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में हुई। कुल 60.06 लाख मामलों में से 32.68 लाख लोगों को योग्य माना गया, जबकि 27.16 लाख को अयोग्य घोषित किया गया।
सबसे अहम बात यह है कि जिन लोगों को लगता है कि उनका नाम गलत तरीके से हटाया गया है, उनके लिए आपत्ति दर्ज कराने का रास्ता भी खुला है। इसके लिए 19 खास ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जहा वे अपील कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 23 और 29 अप्रैल 2026 को मतदान कराने की अनुमति जरूर दी है और यह भी कहा कि दूसरे राज्यों में SIR प्रक्रिया ‘सुचारू रूप’ से पूरी हुई, जबकि बंगाल में ‘कानूनी विवादों’ के चलते स्थिति अलग रही। साथ ही, शीर्ष अदालत ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि बिना SIR या चुनाव को रोके पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा और तय समयसीमा का ध्यान रखा जाए।
वहीं BBC के आर्टिकल में ‘राजनीतिक दलों’ के आँकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया, “हटाए गए 90 लाख नामों में से 3.11 लाख यानी करीब 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो कि राज्य की आबादी में उनकी 27 प्रतिशत हिस्सेदारी से ज्यादा हैं।”
लेकिन BBC ने इस बात को नजरअंदाज किया कि कुल संख्या के हिसाब से सबसे ज्यादा नाम हिंदुओं के ही हटाए गए, जो करीब 63 प्रतिशत हैं। यहाँ तक कि कुछ हिंदू बहुल इलाकों जैसे पश्चिम बर्धमान और उत्तर 24 परगना के मतुआ समुदाय वाले क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। इसके बावजूद BBC का आर्टिकल SIR प्रक्रिया को इस तरह पेश करता है मानो यह बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ और किसी ‘मुस्लिम-विरोधी साजिश’ से जुड़ा मामला हो, जिससे राज्य में डर और तनाव का माहौल बन सकता है।
चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी जाँच के बाद की गई है, न कि किसी खास समुदाय को निशाना बनाने के लिए। मुस्लिम मतदाताओं को जानबूझकर बाहर करने का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। इसके बावजूद BBC ने कमजोर दलीलों और अस्पष्ट वजहों के सहारे अपनी साजिश वाली कहानी को सही ठहराने की कोशिश की है।
अगर एक पल के लिए मान भी लें कि चुनाव आयोग और BJP ने मिलकर चुनावी सूची को अपने पक्ष में करने की कोशिश की, तो फिर सवाल उठता है कि खुद को हिंदू समर्थक बताने वाली पार्टी ऐसी प्रक्रिया क्यों होने देंगी, जिसमें हटाए गए नामों में 63 प्रतिशत हिंदू हों? और बंगाल में पहली बार जीत हासिल करने की कोशिश कर रही BJP आखिर ऐसा खुद को नुकसान पहुँचाने वाला कदम क्यों उठाएगी?
इसके बावजूद द वायर, न्यूजलॉन्ड्री, द क्विंट और आर्टिकल-14 जैसे प्लैटफॉर्म्स के लिए लिखने वाले स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने आधिकारिक आँकड़ों या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी को तवज्जो देने के बजाए कुछ चुनिंदा उदाहरणों और TMC जैसे दलों के सूत्रों पर ज्यादा भरोसा किया। यहाँ तक कि द क्विंट में अपने एक आर्टिकल में उन्होंने बंगाल के SIR अभियान को ‘घोषित किए बिना लागू किया NRC’ तक बता दिया।
वोटर लिस्ट फ्रीज होने के चलते हटाए गए मतदाता बंगाल चुनाव में नहीं कर सकते वोट
जिन मतदाताओं के नाम स्थायी रूप से हटा दिए गए हैं, उन्हें सिर्फ इस वजह से दोबारा वोट देने की इजाजत नहीं दी जा सकती कि उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम हैं। चुनाव आयोग पहले ही बंगाल की मतदाता सूची को फ्रीज कर चुका है यानी जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई निर्देश नहीं देता, तब तक इसमें नए नाम नहीं जोड़े जा सकते।
इस बात की पुष्टि 13 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी कर दी। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जोमल्या बागची की बेंच ने साफ कहा कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं और जिनकी दोबारा शामिल होने की अर्जी लंबित है, उन्हें आने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव में वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
यह टिप्पणी कोर्ट ने उस समय की जब 13 लोगों की याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिन्होंने अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ कोर्ट से दखल देने की माँग की थी। हालाँकि, कोर्ट ने उनकी याचिका को ‘समय से पहले’ बताया और उन्हें पहले अपील ट्रिब्यूनल के पास जाने की सलाह दी।
TMC नेता कल्याण बनर्जी ने कोर्ट से कहा था कि करीब 16 लाख लोगों ने अपील की है और उन्हें चुनाव में वोट देने की इजाजत दी जाए। इस पर CJI सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा, “यह बिल्कुल संभव नहीं है। अगर ऐसा किया गया, तो इशसे जुड़े लोगों के वोटिंग अधिकारों को ही रोकना पड़ेगा।”
वहीं जस्टिस बागची ने बताया कि SIR प्रक्रिया के दौरान करीब 34 लाख अपीलें दायर की गई हैं। कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता (कुरैशा यासमीन और अन्य) पहले ही अपील ट्रिब्यूनल के पास जा चुके हैं… ऐसे में हमें लगता है कि उनकी चिंता अभी समय से पहले की है। अगर उनकी माँग मान ली जाती है, तो उसके जरूरी कानूनी परिणाम भी सामने आएँगे।”
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने का आवेदन 9 अप्रैल 2026 या उसके कुछ दिन बाद मंजूर हो जाता है, तो उसका नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाएगा और वह वोट दे सकेगा। लेकिन कोर्ट ने यह भी बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि जिन लोगों के मामले अभी लंबित हैं, उन्हें चुनाव में वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
BBC आर्टिकल के लेखक की हिंदू-विरोधी, BJP-विरोधी और कभी प्रो-TMC आर्टिकल लिखने की आदत
हालाँकि, स्निधेंदु भट्टाचार्य का बार-बार ‘मुस्लिम-पीड़ित’ वाली कहानी को आगे बढ़ाना हैर करने वाला नहीं है, क्योंकि पहले भी वह हिंदू और हिंदुत्व के खिलाफ लिखे गए आर्टिकल को लेकर चर्चा में रहे हैं।
इतना ही नहीं चुनावों के दौरान उनके TMC के पक्ष में लिखे गए आर्टिकल का भी एक रिकॉर्ड रहा है, जिससे उनकी रिपोर्टिंग पर सवाल उठते रहे हैं।
जहाँ तक बंगाल का सवाल है, यह उन राज्यों में शामिल है जहाँ बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के मामले ज्यादा सामने आते हैं। पिछले तीन साल में 2600 से ज्यादा बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और वापस भेजा गया है। राज्य के कुल 10 जिले ऐसे हैं जो बांग्लादेश की सीमा से जुड़े हुए हैं। जैसे उत्तर 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, दार्जिलिंग, कूचबिहार और जलपाईगुड़ी। ऐसे सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ और उससे जुड़े मुद्दे लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं।
सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों की जातीय और भाषा की समानता की वजह से आवाजाही को पकड़ना हमेशा मुश्किल रहा है। इसी का फायदा उठाकर कई बांग्लादेशी घुसपैठिए, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम बताए जाते हैं, यहाँ स्थानीय पहचान पत्र बनवाने और मतदाता सूची में अपने नाम जुड़वाने में सफल हो जाते हैं। ऐसे में SIR जैसे अभियान के जरिए उनकी पहचान करना और उन्हें मतदाता सूची से हटाना एक तरीका माना जा सकता है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या कुछ राजनीतिक दल और उनके समर्थक मीडिया समूह ऐसे लोगों को वोटबैंक के रूप में बनाए रखना चाहते हैं।
पिछले साल भी ऐसा देखा गया था कि जैसे ही नवंबर 2025 में SIR के दूसरे चरण के तहत घर-घर जाकर जाँच की घोषणा हुई, कई अवैध घुसपैठियों में घबराहट फैल गई। कुछ लोगों ने तो यह भी माना कि वे बिना किसी वैध दस्तावेज के भारत में आए थे। इसके बाद अचानक कई लोगों का वहाँ से चले जाना इस बात का संकेत था कि उन्हें पकड़े जाने का डर था।
वहीं, यह भी हैरानी की बात नहीं मानी जा रही कि BBC ने स्निगधेंदु भट्टाचार्य जैसे पत्रकार को मंच दिया, जिन्होंने इस मुद्दे पर ‘मुस्लिम-पीड़ित’ वाली कहानी को आगे बढ़ाया। BBC पर पहले भी भारत और हिंदू समाज से जुड़े मामलों में एकतरफा रिपोर्टिंग के आरोप लगते रहे हैं। चाहे 2022 की लीसेस्टर हिंसा हो, 2020 के दिल्ली दंगे या फिर बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ घटनाों की कवरेज।
यह हैरानी की बात नहीं है कि BBC ने स्निगधेंदु भट्टाचार्य जैसे एक पक्षपाती ‘स्वतंत्र पत्रकार’ को मंच दिया, जिन्होंने बंगाल के SIR को लेकर मुस्लिम पीड़ित वाली कहानी पेश की। ब्रिटेन के इस मीडिया संस्थान पर पहले भी कई बार भारत और हिंदू समाज से जुड़े मामलों में एकतरफा रिपोर्टिंग के आरोप लग चुके हैं। चाहे 2022 में लीसेस्टर की हिंसा की कवरेज हो, 2020 के दिल्ली दंगों की रिपोर्टिंग या फिर हिंदू-घृणा वाले पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर जैसे लोगों को नरम छवि में दिखाना। इन सभी मामलों में उस पर सवाल उठे हैं।इसके अलावा ईरान युद्ध से पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान भारत के तेल भंडार को लेकर डर फैलाने वाली खबरें हो या 2024 में बांग्लादेश में हिंदू-विरोधी नरसंहार को छिपाने का प्रयास करने जैसे उदाहरण हों।
(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
नासिक के अशोका मार्ग पर स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के बीपीओ यूनिट से हिंदू महिला कर्मचारियों के साथ यौन उत्पीड़न, शारीरिक दुर्व्यवहार और धर्म के आधार पर भेदभाव का एक बेहद परेशान करने वाला मामला सामने आया। महज 48 घंटों के भीतर, मुंबई नाका पुलिस स्टेशन में एक ही विभाग के पाँच मुस्लिम पुरुष कर्मचारियों के खिलाफ कई FIR दर्ज की गई हैं। ऑपइंडिया (OpIndia) के पास मौजूद इन FIR की कॉपियों से पता चला है कि इस BPO में काम करने वाली हिंदू महिलाएँ पिछले कई सालों से यौन शोषण और धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हो रही थीं।
इन मामलों में आरोपित शाहरुख कुरैशी, रजा मेमन, आसिफ अंसारी, तौसीफ अत्तर और शफी शेख सभी ओडीसी-02 (ODC-02) यूनिट से जुड़े हैं, जो कॉलिंग के जरिए एक्सिस बैंक क्रेडिट कार्ड कलेक्शन का काम संभालते हैं। दर्ज की गई शिकायतों में तीन हिंदू महिला कर्मचारियों (जिनमें दो 23 साल की सहयोगी और एक 36 साल की टीम लीडर) ने दफ्तर के बेहद खराब माहौल का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि वहाँ लगातार यौन उत्पीड़न, निजी जिंदगी को लेकर बेतुके सवाल, गलत तरीके से छूने की कोशिश और हिंदू धार्मिक मान्यताओं पर अपमानजनक टिप्पणियाँ की जाती थीं।
(FIR नंबर: 156/2026) हिंदू देवी-देवताओं पर अश्लील टिप्पणी और यौन शोषण
नासिक की TCS कंपनी में काम करने वाली एक 23 वर्षीय हिंदू छात्रा ने सहकर्मी दानिश शेख, तौसीफ अख्तर और निदा खान के खिलाफ यौन उत्पीड़न और धार्मिक प्रताड़ना पर रिपोर्ट दर्ज कराई है। FIR के अनुसार, आरोपित दानिश शेख ने अपने निकाह और दो बच्चों की बात छिपाकर युवती को प्रेम जाल में फँसाया और शादी का झांसा देकर जुलाई 2022 से फरवरी 2026 तक अलग-अलग होटलों में उसका शारीरिक शोषण किया। इस दौरान आरोपित तौसीफ और निदा खान ने पीड़िता को इस्लाम कबूलने के लिए मजबूर किया और शिवलिंग व भगवान कृष्ण सहित हिंदू देवी-देवताओं पर बेहद अश्लील और अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं।
हद तो तब हो गई जब तौसीफ अख्तर ने पीड़िता को ब्लैकमेल करते हुए ऑफिस की पेंट्री और लॉबी में यौन उत्पीड़न किया और धमकी दी कि यदि उसने उसकी शारीरिक माँगें पूरी नहीं कीं, तो वह उसके घर वालों को सब बता देगा। इस पूरे मामले में आरोपितों ने न केवल पीड़िता का विश्वास तोड़ा, बल्कि एक सोची-समझी साजिश के तहत उसकी धार्मिक भावनाओं और गरिमा को छलनी किया।
(FIR नंबर: 163/2026) रजा मेमन और शाहरुख पर गंभीर आरोप, हेड अश्विनी पर भी कार्रवाई
नासिक की TCS कंपनी (BPO यूनिट) में काम करने वाली एक 25 वर्षीय शादीशुदा महिला कर्मचारी ने टीम लीडर रजा मेमन और सहकर्मी शाहरुख कुरैशी के खिलाफ यौन उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना की रिपोर्ट दर्ज कराई। FIR के अनुसार, रजा मेमन मई 2023 से ही पीड़िता को अकेले पाकर गंदी नीयत से छूने, अश्लील पहेलियाँ बुझाने और घूरने जैसी हरकतें कर रहा था। पीड़िता की शादी होने के बाद आरोपित ने उसकी पर्सनल लाइफ पर भद्दे और ‘सेक्सुअली सजेस्टिव’ कमेंट्स किए, जैसे- ‘रात में क्या करती हो कि दिन में नींद आती है?’ और गोवा ट्रिप के नाम पर ‘हनीमून और शराब’ जैसे शर्मनाक सवाल पूछे।
ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त FIR की कॉपी
शिकायत में यह भी आरोप है कि जब पीड़िता ने विरोध किया, तो टीम लीडर रजा ने उसका नाम ऑफिस बॉय से जोड़कर चरित्र हनन किया और दानिश-तौसीफ के साथ मिलकर उस पर काम का बोझ बढ़वा दिया। हद तो तब हो गई जब गुड़ी पड़वा पर साड़ी पहनकर आने पर शाहरुख ने उसे गंदी नजरों से देखा और अश्लील टिप्पणी की। पीड़िता का सबसे गंभीर आरोप कंपनी की ऑपरेशनल हेड अश्विनी चौनानी पर है, जिन्होंने बार-बार शिकायत के बावजूद कोई एक्शन नहीं लिया, बल्कि आरोपितों का साथ देकर पीड़िता की आवाज दबाने की कोशिश की।
(FIR नंबर: 164/2026) हिंदू महिलाओं के अंगों को घूरते थे मुस्लिम कर्मचारी, मिसकैरेज होने पर जबरन ‘अजमेर के मौलवी’ के पास भेजने का दबाव
नासिक की TCS कंपनी में एक 36 वर्षीय हिंदू महिला टीम लीडर ने मुस्लिम सहकर्मियों के एक खास गुट पर धार्मिक प्रताड़ना और यौन उत्पीड़न का सनसनीखेज आरोप लगाया। FIR के अनुसार, शफी शेख, तौसीफ अत्तर, दानिश शेख, रज़ा मेमन और शाहरुख कुरैशी जैसे मुस्लिम कर्मचारी दफ्तर में एकजुट होकर गैर-मजहबी लड़कियों और लड़कों को चुन-चुनकर निशाना बनाते हैं। पीड़िता ने बताया कि आरोपित शफी शेख मीटिंग के दौरान सार्वजनिक रूप से उसके प्राइवेट पार्ट्स (छाती) को गंदी नजरों से घूरता था और विरोध करने पर गंदी मुस्कान देता था, जिसकी शिकायत के बावजूद उसे सिर्फ दूसरे विभाग में भेज दिया गया जहाँ से वह लगातार पीड़िता का पीछा करता रहा।
ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त FIR की कॉपी
हद तो तब पार हो गई जब फरवरी 2026 में पीड़िता का मिसकैरेज (गर्भपात) हुआ, तो तौसीफ अत्तर ने उसकी व्यक्तिगत पीड़ा का मजाक उड़ाते हुए उसे ‘अजमेर के मौलवी’ का नंबर दिया और जबरन वहाँ जाने का दबाव बनाया। आरोपितों पर आरोप है कि वे दफ्तर में हिंदू लड़कियों पर अश्लील कमेंट करते हैं, उन्हें सिर से पैर तक गंदी नजरों से घूरते हैं और उनकी निजी जिंदगी में दखल देकर उन्हें मजहबी आधार पर प्रताड़ित और शर्मिंदा करते हैं।
(FIR नंबर: 165/2026) हिंदू देवी-देवताओं पर भद्दी टिप्पणी और महिला कर्मचारी को प्राइवेट पार्ट दिखाकर किया यौन उत्पीड़न
नासिक की TCS कंपनी में कार्यरत 25 वर्षीय हिंदू महिला कर्मचारी ने बिजनेस प्रोसेस लीडर तौसीफ अत्तर के खिलाफ यौन प्रताड़ना और हिंदू धर्म के अपमान की FIR दर्ज कराई। FIR के अनुसार, आरोपित तौसीफ दफ्तर में हिंदू लड़कियों को सिर से पैर तक घूरता और उनके अंगों को देखकर आँखें मारता था। पीड़िता ने बताया कि तौसीफ आने-जाने वाली लड़कियों के फिजिकल साइज पर भी बात करता था। हद तो तब पार हो गई जब दिसंबर 2025 में पीड़िता को छाछ पीते देख आरोपित ने अपने प्राइवेट पार्ट की ओर इशारा करते हुए बेहद अश्लील टिप्पणी की और कहा- ‘मेरे पास भी छाछ है, तुझे चाहिए क्या?’
ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त FIR की कॉपी
यही नहीं, आरोपित ने दफ्तर में हिंदू धर्म और आस्था पर भी जहरीला हमला बोला। पीड़िता की टेबल पर रखी महादेव की मूर्ति को देखकर मुझसे पूछा कि क्या महादेव सच में भगवान हैं? अगर पार्वती ने गणपति को बनाया, तो महादेव को इसके बारे में क्यों नहीं पता? गणेश सच में महादेव के बेटे है? यह कहते हुए तौसीफ ने देवी पार्वती के चरित्र पर कीचड़ उछाला। इसके अलावा, उसने भगवान ब्रह्मा के लिए भी टिप्पणी कर कहा कि ब्रह्मा अपनी ही बेटी का रेपिस्ट है। और प्रभु श्री राम व माता सीता के बारे में अपमानजनक बातें कहीं कि उन्होंने वनवास में मांस खाया होगा, वे कंद खाकर नहीं रह सकते। तौसीफ ने जहर उगलते हुए हिंदू देवताओं को ‘झूठा’ और ‘दिखावे वाला’ बताया और इस्लाम को श्रेष्ठ साबित करने के लिए हिंदू भावनाओं को बुरी तरह कुचला।
(FIR नंबर: 166/2026) हिंदू कर्मचारी को जबरन खिलाया नॉन-वेज, पत्नी के लिए बोली बेहद शर्मनाक बात
नासिक की TCS कंपनी में काम करने वाले एक वरिष्ठ विश्लेषक ने सहकर्मी तौसीफ अत्तर, दानिश शेख, शाहरुख शेख और रजा मेमन के खिलाफ FIR दर्ज कराई। FIR के अनुसार, ये आरोपित दफ्तर में एक संगठित गिरोह की तरह काम करते थे और हिंदू कर्मचारियों को निशाना बनाकर उनका धर्मांतरण कराने का दबाव डालते थे। पीड़ित, जो रुद्राक्ष की माला पहनते हैं और धार्मिक मार्ग पर चलते हैं, उन्हें आरोपितों ने मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। आरोपितों ने छत्रपति संभाजी महाराज को ‘इस्लाम का गुलाम’ बताकर अपमानित किया। हद तो तब हो गई जब आरोपितों ने पीड़ित के शाकाहारी होने के बावजूद उन्हें देर रात जबरन नॉन-वेज खिलाया और मना करने पर जान से मारने की धमकी दी।
ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त FIR की कॉपी
इस गिरोह की दरिंदगी यहीं नहीं रुकी। जब आरोपितों को पता चला कि पीड़ित की संतान नहीं हो रही है, तो तौसीफ और दानिश ने सारी मर्यादाएँ लाँघते हुए घटिया टिप्पणी की। आरोपितों ने पीड़ित से कहा, “दवा से बच्चे नहीं हो रहे, तो अपनी पत्नी को हमारे पास भेज दो।” इसके अलावा, पीड़ित को धोखे से घर ले जाकर जबरन टोपी पहनाई गई, कलमा पढ़वाया गया और उसकी तस्वीरें वायरल कर दी गईं। FIR में यह भी आरोप है कि ये आरोपित दफ्तर की महिलाओं को देखकर गंदे कमेंट्स करते थे और कहते थे कि ‘तुम जो भी पसंद करोगी, उसे खुश करना होगा।’ जब पीड़ित ने इस धर्मांतरण और उत्पीड़न का विरोध किया, तो उसे जान से मारने की धमकी दी गई और काम के बहाने प्रताड़ित किया गया।
(FIR नंबर: 167/2026) हिंदू महिला के अंगों को हाथ से छुआ, भगवान कृष्ण को बताया ‘औरतबाज’
नासिक की TCS कंपनी में 25 वर्षीय हिंदू महिला कर्मचारी (जो एक पावरलिफ्टर भी हैं) ने आसिफ अंसारी, शफी शेख और तौसीफ अत्तर के खिलाफ FIR दर्ज कराई। FIR के मुताबिक, आरोपित आसिफ अंसारी ने पीड़िता की छाती को सरेआम घूरते हुए अश्लील सवाल पूछा, “तुम्हारी पसंद छोटी है या बड़ी?” पीड़िता के वजन और शरीर की बनावट का मजाक उड़ाते हुए आरोपित तौसीफ और आसिफ उस पर गंदे कमेंट्स करते थे। दिसंबर 2024 में आरोपित शफी शेख ने पीड़िता के पास बैठकर पैर से पैर रगड़ा और काम सिखाने के बहाने उसके सीने और प्राइवेट पार्ट्स को हाथ से छुआ। जब पीड़िता ने विरोध किया, तो आरोपित गंदी मुस्कान देकर वहाँ से चला गया।
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यही नहीं, आरोपितों ने दफ्तर के माहौल को मजहबी जहर से भर दिया था। आरोपित तौसीफ अत्तर ने हिंदू आस्था को चोट पहुँचाने के लिए भगवान कृष्ण को ‘औरतबाज’ कहा और भगवान शिव व माता पार्वती के रिश्ते पर निहायत ही गंदी और अश्लील टिप्पणी की। पीड़िता का आरोप है कि ये आरोपित दफ्तर में एकजुट होकर हिंदू लड़कियों को उनके शरीर और धर्म के आधार पर शर्मिंदा करते थे।
(FIR नंबर: 168/2026) नई नवेली हिंदू दुल्हन से ‘हनीमून’ पर अश्लील सवाल, भगवान ‘नंगे’ रहने पर टिप्पणी
नासिक की TCS कंपनी से एक 23 वर्षीय विवाहित हिंदू महिला कर्मचारी ने शाहरुख कुरैशी, रजा मेमन, आसिफ अंसारी, तौसीफ अत्तर और शफी शेख के खिलाफ सामूहिक उत्पीड़न की FIR दर्ज कराई। FIR के अनुसार, पीड़िता की शादी के महज एक महीने बाद ही टीम लीडर रजा मेमन और शाहरुख कुरैशी ने उसे दफ्तर में घेर लिया और उसके हनीमून को लेकर गंदे और अश्लील सवाल पूछे लगे, जैसे- ‘हनीमून पर क्या किया? क्या तुम्हारे पति ने तुम्हें गाजर दी?’ आरोपितों ने पीड़िता का नाम ‘प्लेयर’ रख दिया था और उसे अपने पति को छोड़कर दूसरा बॉयफ्रेंड बनाने के लिए मजबूर किया।
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प्रताड़ना का सिलसिला यहीं नहीं रुका। आरोपित आसिफ अंसारी दफ्तर में पीड़िता को जबरन गले लगा लेता था, उसकी कमर, पेट और जाँघों को गंदी नीयत से छूता था और उसके अंदर के कपड़ों (innerwear) के साइज के बारे में भद्दी बातें पूछता था। आरोपित तौसीफ अत्तर भी काम सिखाने के बहाने पीड़िता के अंगों पर हाथ फेरता था और ‘संतरे छोटे हैं या बड़े’ जैसी अश्लील टिप्पणियाँ करता था। आरोपितों ने हिंदू धर्म पर भी जहर उगला। आसिफ अंसारी ने कहा कि ‘तुम्हारे भगवान नंगे घूमते हैं और तुम लोग नकाब नहीं पहनती, इसीलिए तुम हिंदुओं का रेप होता है।’ गुड़ी पड़वा के दिन आरोपितों ने पीड़िता की साड़ी का पल्लू तक खींच लिया। इन दरिंदों ने पीड़िता को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया, जिससे वह दफ्तर जाने से भी डरने लगी थी।
(FIR नंबर: 169/2026) महिला कर्मचारी की बीमारी का मजाक उड़ाया, प्राइवेट पार्ट और ‘फिजिकल रिलेशन’ पर पूछते अश्लील सवाल
नासिक की TCS कंपनी से एक 23 वर्षीय हिंदू महिला कर्मचारी ने शफी शेख, रजा मेमन और शाहरुख कुरैशी के खिलाफ FIR दर्ज कराई। FIR के अनुसार, ट्रेनिंग के बहाने आरोपित शफी शेख पीड़िता को घेर लेता था और काम की जगह उसकी निजी जिंदगी पर गंदे सवाल पूछता था। शफी पीड़िता से पूछता था कि ‘क्या तुम्हारे अपने बॉयफ्रेंड के साथ फिजिकल रिलेशन (शारीरिक संबंध) रहे हैं?’ और ‘क्या तुम रात को सोई या नहीं?’। हद तो तब हो गई जब अगस्त 2025 में आरोपित ने कैंटीन में पीड़िता को अकेला पाकर जबरन ‘गर्लफ्रेंड’ बनने का दबाव बनाया, जिससे डरकर पीड़िता रोने लगी।
ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त FIR की कॉपी
शिकायत के मुताबिक, जब पीड़िता ने इसकी शिकायत अपने टीम लीडर रज़ा मेमन से की, तो उसने आरोपित शफी के खिलाफ एक्शन लेने के बजाय उसे शह दी और खुद भी पीड़िता का शोषण शुरू कर दिया। रजा मेमन ने पीड़िता की बीमारी (PCOD) का मजाक उड़ाते हुए उसके शरीर पर भद्दी टिप्पणियाँ कीं और उसे जिम जाने व फेशियल कराने की सलाह देते हुए गंदी नीयत से छूने की कोशिश की। आरोपित शाहरुख कुरैशी ने भी पीड़िता को व्यवस्थित ट्रेनिंग न देकर उसे शफी के हवाले कर दिया ताकि वे मिलकर उसे प्रताड़ित कर सकें। पीड़िता ने बताया कि आरोपित उस पर नजर रखते थे और उसे शारीरिक संबंध बनाने के लिए उकसाते थे, जिससे वह दफ्तर में असुरक्षित महसूस करने लगी थी।
(FIR नंबर: 171/2026) हिंदू युवती के शरीर पर भद्दे कमेंट्स, गुड़ी पड़वा पर ड्रेस को लेकर उड़ाया मजाक और डाली गंदी नजर
नासिक की TCS कंपनी से 23 वर्षीय हिंदू पीड़िता ने रजा मेमन और शाहरुख कुरैशी के खिलाफ FIR दर्ज कराई है। FIR के अनुसार, शाहरुख कुरैशी पीड़िता को अकेले पाकर जबरन उसकी पर्सनल लाइफ, बॉयफ्रेंड और ‘एक्स’ के बारे में अश्लील सवाल पूछता था और माता-पिता की गैरमौजूदगी का फायदा उठाकर उसे अपने साथ घूमने चलने के लिए दबाव डालता था। आरोपित रजा मेमन ने पीड़िता के शरीर पर भद्दे कमेंट्स करते हुए उसे ‘शेप में आने’ और जिम जाने जैसी शर्मनाक बातें कहीं।
ऑपइंडिया द्वारा प्राप्त FIR की कॉपी
प्रताड़ना की हद तब पार हो गई जब 19 मार्च 2026 को गुड़ी पड़वा के पावन अवसर पर पीड़िता नई ड्रेस पहनकर ऑफिस आई। आरोपित रजा मेमन ने उसे सबके सामने बुलाकर सिर से पैर तक गंदी नजर से घूरा और हिंदू त्योहारों का अपमान करते हुए ताना मारा कि ‘क्या तुम पूजा नहीं करती, बस तैयार होकर ऑफिस आ जाती हो?’ आरोपितों ने दफ्तर में ऐसा खौफ पैदा कर रखा था कि पीड़िता शिकायत करने से भी डरती थी। पीड़िता का आरोप है कि ये लोग उस पर लगातार नजर रखते थे और गंदे इशारे कर उसे शारीरिक संबंध बनाने के लिए उकसाते थे।
नासिक TCS कंपनी से सामने आई यह रिपोर्ट न केवल यौन उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना की पराकाष्ठा है, बल्कि एक इस्लामिक संगठित गिरोह द्वारा हिंदू आस्था और मानवाधिकारों पर किया गया गहरा प्रहार भी है। दफ्तर जैसे पेशेवर माहौल को मजहबी कट्टरता, लव जिहाद और धर्मांतरण की साजिशों का अड्डा बनाना समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह बेहद शर्मनाक है कि जहाँ महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान प्राथमिकता होनी चाहिए थी, वहाँ उनकी धार्मिक पहचान को हथियार बनाकर उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से छलनी किया गया।
नोएडा में मजदूरों के वेतन वृद्धि समेत ज्यादातर माँगों को सरकार ने मान लिया है और उसे 1 अप्रैल 2026 से लागू भी कर दिया है। इसके बावजूद मजदूरों का हिंसक प्रदर्शन जारी है। मंगलवार (14 अप्रैल 2026) को प्रदर्शनकारियों ने 2 से 3 जगहों पर पुलिस की गाड़ियों पर पथराव किया और आगजनी की।
अब सवाल उठ रहा है कि सरकार जब मजदूरों के असंतोष का पता चलते ही एक्शन में आ गई, उनके साथ संवाद किया और सुनिश्चित किया कि उनकी माँगे पूरी हों, इसके बाद भी आगजनी और पथराव की घटनाएँ हो रही है, तो सवाल उठता है कि इसके पीछे कोई साजिश तो नहीं…
हिंसा का नक्सली और पाकिस्तानी कनेक्शन की आशंका
साजिश का तो जाँच के बाद में पता चलेगा, लेकिन मुख्यमंत्री ने आशंका जताई है कि ये नक्सलवाद को फिर से जीवित करने का प्रयास हो सकता है। सीएम ने कहा कि देश में नक्सलवाद खात्मे के कगार पर है, लेकिन इसे पुनर्जीवित करने की कोशिश हो सकती है।
प्रदर्शनकारियों में भ्रामक और विघटनकारी तत्व भी शामिल हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि जो वास्तव में मजदूर हैं, उनसे ही बातचीत की जानी चाहिए। अक्सर बाहरी लोग मजदूर के प्रतिनिधि बनकर आंदोलन में घुसपैठ करते हैं।
वहीं श्रम मंत्री अनिल राजभर ने हिंसक प्रदर्शन के मद्देनजर पाकिस्तान लिंक की भी जाँच करने की बात कही थी। उन्होंने हिंसा को सुनियोजित साजिश करार दिया है। उनका कहना है कि मेरठ और नोएडा से 4 आतंकियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनका पाकिस्तान कनेक्शन सामने आया है।
सरकार के आला अधिकारी आलोक कुमार ने कहा है कि मजदूरों का प्रदर्शन हिंसक होने के पीछे खुफिया जानकारी मिली है कि कुछ अराजक तत्व मजदूरों की आड़ में हिंसा फैला रहे हैं। राज्य में उद्योगों को लेकर योगी सरकार ने सकारात्मक माहौल बनाया है। कानून व्यवस्था दुरुस्त किया गया है। साजिश कर इसे बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है।
गलत वीडियो और जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर की गई
डीजीपी राजीव कृष्ण, जो लखनऊ कंट्रोल रूम से मॉनिटरिंग कर रहे हैं, ने कहा है कि अफवाह फैलाने वाले कई ग्रुप को चिन्हित किया गया है। कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो अलग-अलग जगहों पर भी पाए गए हैं। अफवाहें फैलाने वाले दो एक्स हैंडल के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई हैं। इसके अलावा 50 से अधिक एक्स हैंडल की पहचान की गई है, जिनमें से कई पिछले 24 घंटों में बनाए गए हैं। अब उनकी जाँच होगी।
इतना ही नहीं, यूपी पुलिस ने सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे वीडियो को गलत बताते हुए कहा है कि यह वीडियो मध्यप्रदेश के शहडोल जिले की घटना का है। इसे गौतमबुद्ध नगर का बताकर सोशल मीडिया अकाउंट्स से प्रसारित किया जा रहा है, जो पूर्णतः असत्य है।
मध्यप्रदेश के शहडोल जनपद के बुढार थाना क्षेत्र में एक युवक द्वारा नशे की अवस्था में हंगामा किए जाने की घटना के वीडियो को भ्रामक रूप से जनपद गौतमबुद्ध नगर की घटना बताकर कतिपय सोशल मीडिया एकाउंट से प्रसारित किया जा रहा है, जो पूर्णतः असत्य एवं भ्रामक है।
यूपी पुलिस ने किसी भी वीडियो या जानकारी को साझा करने से पहले उसकी सत्यता जानने की जरूरत पर बल दिया है। इसके अलावा NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, एक ऑडियो क्लिप में एक शख्स लोगों से कहता सुनाई दे रहा है कि मंगलवार को फिर से पुलिस पर हमला करना है और लाठीचार्ज करवाना है, क्योंकि कई लोग पहले दिन घायल हुए थे। इस ऑडियो में शख्स कह रहा है कि हमारे बहुत से बहन-भाई घायल हुए हैं और इसीलिए आप लोग सुबह आने की कृपा करें।
इसी के साथ कुछ चैट्स में प्रदर्शनकारियों को मिर्ची पाउडर साथ लाने की सलाह दी गई ताकि जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल किया जा सके। एक मैसेज में लिखा गया कि अगर पुलिस लाठी उठाए तो मिर्ची पाउडर काम आएगा और ज्यादा से ज्यादा लोग इसे लेकर आएँ। वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि जब तक उनकी माँगें पूरी नहीं होंगी तब तक हड़ताल जारी रहेगी।
POLICE SOURCES CLAIM WHATSAPP NETWORK BEHIND MOBILISATION EVEN AS UNREST CONTINUES IN SECTOR 70 NOIDA TODAY. Police are facing continuous stone pelting. Efforts are underway to bring the crowd under control. POLICE SOURCES CLAIM PROTESTERS ADDED TO GROUPS OVERNIGHT VIA QR CODES.… pic.twitter.com/WtZnsZ8JRG
अब नोएडा का मामले में साजिश का पता तो जाँच पूरी होने के बाद चलेगा, लेकिन मानेसर को लेकर जो रिपोर्ट आई है उसने साफ हो गया है कि यहाँ मजदूरों की आड़ में साजिश के तहत हिंसा भड़काई गई।
मानेसर में रची गई गहरी साजिश का हुआ खुलासा
9 अप्रैल 2026 को गुरुगाम के मानेसर में आईएमटी कंपनी में वेतन वृद्धि की माँग लेकर मजदूरों ने प्रदर्शन किया। इस दौरान 300 से 400 की भीड़ जमा हो गई और कंपनी प्रबंधन के साथ-साथ पुलिस पर पथराव किया। घटना की जाँच के दौरान पता चला है कि व्हाट्स एप पर ग्रुप बनाई गई थी, जिसमें मैनेजर रामबीर को मारने की बात थी और फिर दंगा भड़काने की साजिश की गई थी। इस मैसेज में लिखा था कि रामबीर को बाहर लेकर आओ।
(साभार- दैनिक भास्कर)
दूसरे मैसेज में रात तक इंतजार करने और फिर आग लगाने को कहा गया था। दरअसल साजिशकर्ता चाहते थे कि रात के अंधेरे का फायदा उठा कर काम को अंजाम दिया जाए। इतना ही नहीं मैसेज से पता चलता है कि पेट्रोल बम से हमले की तैयारी की गई थी। मैसेज में कहा गया है कि ठेके से बीयर की बोतल लेकर आना और पेट्रोल भरकर कंपनी पर फेंक देना। इससे पता चलता है कि साजिश कर मजदूरों की आड में कंपनियों को जलाने और मैनेजर को मारने की योजना थी।
पुलिस का कहना है कि व्हाट्स एप में जिस तरह के मैसेज मिले हैं, उससे पता चलता है कि कितनी बड़ी साजिश रची गई थी। पुलिस इस मामले की गहनता से जाँच कर रही है। जल्द ही ऐसे नकाबपोशों को बेनकाब किया जाएगा, जिन्होंने मजदूरों की आड में हिंसा फैलाने की कोशिश की। इस घटना ने बता दिया है कि कैसे भोलेभाले मजदूरों को भड़का कर, उन्हें विरोध प्रदर्शन के लिए उकसा कर अपनी रोटी सेंकने की कोशिश अराजक तत्व करते हैं।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों से जुड़े विवाद समय-समय पर सामने आते रहे हैं, और इस बार मामला और भी गंभीर है। एक छात्र, शहबाज, के कमरे से पुलिस को जाली नोट और जिंदा कारतूस मिले हैं। छापेमारी से पहले ही वह फरार हो गया। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने 13 अप्रैल को उसे सस्पेंड कर दिया।
पुलिस अब उसकी तलाश कर रही है। जाँच के दौरान 113 संदिग्धों की सूची भी बनाई गई है। इनकी तलाशी ली जाएगी। यह पहली बार नहीं है जब एएमयू का नाम ऐसे मामलों में आया है। इससे पहले भी यहाँ कट्टरपंथ और आतंकी मॉड्यूल से जुड़े मामले सामने आ चुके हैं।
शहबाज की तलाश में पुलिस
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शहबाज एमसीए का छात्र है। पुलिस ने खुफिया जानकारी के आधार पर एएमयू सुरक्षा विभाग के साथ मिलकर कॉलेज हॉस्टल में छापेमारी की थी, इसको लेकर कॉलेज प्रशासन की मदद से एटीएस ने कमरे की छापेमारी की थी। इस दौरान उसके कमरे से 32 बोर पिस्टल की गोलियाँ, 12 बोर हथियार के चार कारतूस, नकली नोट, आठ मोबाइल फोन, खोखे और मैगजीन के अलावा नकली आईडी कार्ड मिले थे, लेकिन शहबाज कमरे में मौजूद नहीं था।
उसका अब तक सुराग नहीं मिल पाया है। पुलिस उसकी तलाश में लगी हुई है। इस बीच यूनिवर्सिटी ने उसे सस्पेंड कर दिया है। बरामद सामानों की फॉरेंसिक जाँच की जा रही है। ये भी पता लगाया जा रहा है कि नकली नोट और छिपाकर रखे गए हथियार किस उद्देश्य के लिए और किसके कहने पर शहबाज ने रखे थे?
कॉलेज के हॉस्टल में छापेमारी हाल ही में हुए सिविल लाइंस क्षेत्र में फायरिंग को लेकर की गई थी। इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था। उनसे पूछताछ में ही शहबाज का नाम सामने आया था।
एएमयू की दो डिग्रियाँ और फर्जी सर्टिफिकेट
शहबाग ने इससे पहले डिप्लोमा इन कैमिकल इंजीनियरिंग करने के लिए भी नामांकन लिया था। उसके पास एएमयू के हाईस्कूल और 12वीं के फर्जी सर्टिफिकेट भी मिले हैं। यूनिवर्सिटी प्रशासन अब उसकी कुंडली खँगाल रही है। ये बात भी सामने आई है कि शहबाज को रूम अलॉट नहीं किया गया था। उसने कमरे पर अवैध रूप से महीनों से कब्जा कर रखा था। वह गैर आवासीय छात्र था।
#WATCH अलीगढ़, उत्तर प्रदेश: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) हॉस्टल में पुलिस की रेड के बाद स्टूडेंट के कमरे से नकली नोट और कारतूस मिले।
इस पर AMU के प्रॉक्टर मोहम्मद नावेद खान ने कहा, "… हमने बच्चे के बारे में अपने रिकॉर्ड चेक किए और उसने यूनिवर्सिटी में 2 अलग-अलग समय पर… pic.twitter.com/r2qTwphmIr
शहबाज ने अलग-अलग वक्त पर अलग कोर्स में एडमिशन लिया था। उसने डिप्लोमा इन केमिकल इंजीनियरिंग में भी पहले नामांकन लिया था। दूसरी बार एमसीए में नामांकन लिया। उसके कमरे से कई सर्टिफिकेट और दस्तावेज मिले हैं। दो एएमयू की मार्कशीट मिली है, जो फर्जी बताया गया है। वह हाईस्कूल और 12वीं की है। यूनिवर्सिटी ने साफ कहा है कि उसने 12वीं यहाँ से नहीं किया है और वह फर्जी सर्टिफिकेट है। उसे सस्पेंड कर दिया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने 113 संदिग्धों की लिस्ट बनाई
एएमयू प्रशासन ने कॉलेज में आने जाने वालों पर कड़ी नजर रखने के सख्त हिदायत दिए हैं, साथ ही 113 संदिग्ध और अराजक तत्वों की लिस्ट तैयार की है। कॉलेज प्रशासन का मानना है कि कुछ छात्रों की वजह से पूरी यूनिवर्सिटी का नाम खराब होता है और करीब 26 हजार छात्र-छात्राओं के भविष्य पर असर पड़ता है।
कॉलेज प्रशासन का मानना है कि 99 फीसदी बच्चा पढ़ने आता है। बहुत कम बच्चे हैं, जो कॉलेज किसी और मकसद से आते हैं। उन्हें अलग किया जा रहा है। अब छात्र-छात्राएँ भी गोपनीय तरीके से इनकी जानकारी प्रशासन को दे रहे हैं। यह भी पता लगाया जा रहा है कि कितने स्टूडेंट नियमित कॉलेज आते हैं और कितने बाहरी बच्चें हैं, जो गलत काम में शामिल हैं। उन पर कार्रवाई की जा रही है।
एएमयू के कुछ छात्रों का ISIS कनेक्शन सामने आया था
यह पहला मामला नहीं है जब एएमयू के छात्र संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त पाए गए हों। नवबंर 2023 में ISIS मॉड्यूल का अलीगढ़ में भंडाफोड़ हुआ था जिसमें 7 एएमयू के छात्र थे। इसका पता तब चला जब एक फर्जी दस्तावेज और चोरी के मामले में एफआईआर दर्ज हुई थी और उसकी जाँच के दौरान एटीएस को आईएसआईएस मॉड्यूल का पता चला था। इनमें से दो छात्र शाहनवाज और रिजवान एएमयू के छात्र संगठन एसएएमयू के सदस्य थे।
दरअसल छात्र संगठन SAMU पर CAA-NRC विरोधी हिंसा के दौरान ही खुफिया एजेंसियों की नजर थी। उस वक्त भी एटीएस ने एएमयू के कुछ छात्रों को हिरासत में लिया था। इसमें नवंबर 2025 में गिरफ्तार एएमयू के छात्र भी थे।
2023 में सामने आया था मामला
ISIS लिंक को लेकर नवंबर 2023 से फरार चल रहे दो छात्रों, अब्दुल समद मलिक और फैजान बख्तियार पर सरकार ने 25-25 हजार रुपए का इनाम भी घोषित किया था। ये लोग भी SAMU से जुड़े थे।
ATS की FIR के मुताबिक, फैजान बख्तियार और अब्दुल समद मलिक सोशल मीडिया के साथ कई अन्य माध्यमों से ISIS की विचारधारा का प्रचार-प्रसार कर रहे थे। ये दोनों अपने अन्य साथियों के साथ मिल कर कई युवाओं को कट्टरपंथ की राह पर धकेलने की कोशिशों में जुटे थे। इन दोनों को जनवरी 2024 में एटीएस ने गिरफ्तार किया।
दिल्ली में हुई थी कई गिरफ्तारियाँ
अक्टूबर 2023 में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने कई आतंकियों को दिल्ली से लेकर अलीगढ़ तक गिरफ्तार किया था। ये आतंकी आईएसआईएस का मॉड्यूल संचालित कर रहे थे। दिल्ली पुलिस के इस ऑपरेशन में पता चला था कि शहनवाज, रिजवान और अरशद नाम के आतंकी, जिसमें शहनवाज पुणे में यूएपीए केस में गिरफ्तारी के बाद से फरार था, वो उत्तरी भारत में आईएसआईएस का पूरा मॉड्यूल खड़ा कर रहे थे और दीपावली के त्योहार के समय कई जगहों पर धमाकों-हमलों की फिराक में थे।
इससे पहले 2023 में ही AMU से पीएचडी करने वाले ISIS आतंकी वजीउद्दीन की छत्तीसगढ़ में गिरफ्तारी हुई थी।
दरअसल एएमयू को आतंकी छिपने का अड्डा बनाते रहे है। हर तरह के कोर्स इस यूनिवर्सिटी में होते हैं। स्कूल से पीएचडी तक की पढ़ाई यहाँ होती है। ऐसे में किसी कोर्स में एडमिशन लेकर छिपना आसान होता है। छात्रों का ब्रेनवॉश कर उन्हें देश विरोधी गतिविधियों में शामिल करना भी तुलनात्मक रूप से आसान होता है, क्योंकि पढ़ने लिखनेवाले छात्र एक साथ रहते हैं और एक-दूसरे पर विश्वास कर लेते हैं। यही वजह है कि कई बार छात्रों के कनेक्शन आतंकियों, कट्टरपंथियों और देश में अराजकता फैलाने वालों से हो जाते है।