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खामेनेई की मौत पर कॉन्ग्रेसियों और वामपंथियों का रुदन, लाखों ईरानियों की हत्याओं पर साध रखी थी चुप्पी: समझें- कैसे सरकार दे रही भारत के हितों को प्राथमिकता

अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों में 28 फरवरी 2026 को ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह अली खामेनेई की हत्या हो गई। ईरानी राज्य मीडिया ने इसकी पुष्टि की और 40 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ‘इतिहास के सबसे बुरे लोगों में से एक’ की मौत बताया।

दुनिया भर में प्रतिक्रियाएँ आईं। कई लोकतांत्रिक देशों ने चुप्पी साध ली या संयम की अपील की। लेकिन भारत में कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों (सीपीआई, सीपीएम आदि) ने खामेनेई की मौत पर जो रुदन शुरू किया, वह न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर कब्जा करने की जिद को भी उजागर करता है।

कॉन्ग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम खुद को विदेश नीति का ‘मालिक’ समझ रहा है और पीएम नरेंद्र मोदी को ‘चुप्पी’, ‘कायरता’ और ‘मूल्यों की धोखाधड़ी’ का आरोप लगाकर सोशल मीडिया पर घसीट रहा है।

इस लेख में हम विस्तार से देखेंगे कि खामेनेई के 37 साल के शासन में अलग-अलग प्रदर्शनों में कितने निर्दोष मारे गए, कॉन्ग्रेस-वामपंथी कैसे दोहरे मापदंड अपनाते हैं और मोदी सरकार की व्यावहारिक विदेश नीति को क्यों निशाना बना रहे हैं।

सबसे पहले कॉन्ग्रेस और वामपंथियों की प्रतिक्रिया देखें।

कॉन्ग्रेस ने ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की हत्या की कड़े शब्दों में निंदा की है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन बताया है। पार्टी ने इस घटना को क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा करार दिया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बयान जारी कर ‘टारगेटेड मर्डर’ की निंदा की, इसे ‘युद्ध की घोषणा के बिना संप्रभुता का उल्लंघन’ बताया और खामेनेई के परिवार, ईरानी जनता तथा शिया समुदाय को संवेदना व्यक्त की।

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इसे ‘Despicable’ (घृणित) करार दिया और कहा कि ‘तथाकथित लोकतांत्रिक दुनिया के नेता’ ने एक संप्रभु देश के नेता की हत्या की। उन्होंने पीएम मोदी पर ‘इजरायल और अमेरिका के सामने घुटने टेकने’ का आरोप लगाया।

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर लिखा- “भारत और ईरान की दोस्ती इतिहास जितनी पुरानी है, फिर भी मोदी खामेनेई की हत्या पर एक शब्द नहीं बोल रहे। यह भारत-ईरान संबंधों का ऐतिहासिक धोखा और मोदी की नैतिक कायरता है।”

एक अन्य ट्वीट में खेड़ा ने लिखा, “अयातुल्ला खामेनेई और दूसरे ईरानी नेताओं की सुनियोजित हत्या पर मोदी सरकार की चुप्पी दिखाती है कि इसने नैतिक नेतृत्व का सर्वथा त्याग कर दिया है और इस कृत्य के लिए अमेरिका और इज़राइल की आलोचना करने से घबरा रही है। यह भारत के उन मूल्यों के प्रति विश्वासघात है, जिनके पक्ष में वह हमेशा खड़ा रहा है। इतिहास में भारत कभी इतना कमज़ोर नहीं दिखा था।”

वामपंथी दलों ने भी इसी तर्ज पर ईरान के साथ ‘एकजुटता’ जताई और अमेरिका-इजरायल को ‘आक्रांता’ बताया। कुछ वामपंथी कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर ‘मोदी अमेरिका का पिट्ठू’ जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।

इस्लामी कट्टरपंथियों और वामपंथियों प्रोपेगेंडा फैलाने वाली बदनाम अरफा खानुम शेरवानी ने तो यहाँ तक पूछ लिया कि खामेनेई की हत्या पर भारत का क्या रुख है? उसने खामेनेई की हत्या को लेकर पीएम मोदी को निशाना बनाने की कोशिश की। उसने लिखा कि पीएम मोदी कम से कम संवेदना ही जाहिर कर देते।

ये लोग खुद को विदेश नीति का ‘निर्णायक’ मानते हैं। भारत की परंपरागत विदेश नीति ‘अपनी सबसे दोस्ती, नहीं किसी से बैर’ रही है, लेकिन कॉन्ग्रेस-वामपंथी इसे ‘ईरान-रूस-चीन के साथ अंधी दोस्ती’ समझते हैं।

इस मामले में सार्वजनिक तौर पर मोदी सरकार ने संयम की अपील की है। यूएई पर ईरानी हमलों की निंदा की और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की और कश्मीर से लेकर चाबहार पोर्ट तक रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी।

वैसे, कोई जी-7 ‘लोकताँत्रिक’ देशों ने भी तो ने खामेनेई को शोक संदेश नहीं दिया, फिर भी कॉन्ग्रेस मोदी से ‘निंदा’ की माँग कर रही है। यह विदेश नीति पर कब्जे की कोशिश है, जैसे 2005-09 में यूपीए ने IAEA में ईरान के खिलाफ वोट किया था, लेकिन अब ‘दोस्ती’ का राग अलाप रही है। वामपंथी तो हमेशा से सोवियत-चीन-ईरान की तानाशाही का समर्थन करते आए हैं।

खामेनेई के शासनकाल में अनगनित जिंदगियाँ हुई खत्म

अब मुख्य मुद्दे पर आते हैं कि खामेनेई के शासन में अलग-अलग प्रदर्शनों में लाखों लोगों की हत्याएँ होती रही हैं। खामेनेई 1989 से सत्ता में थे। उनके शासन को ‘आयरन फिस्ट’ (लोहे का मुक्का) कहा जाता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और ईरान ह्यूमन राइट्स जैसी संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, विरोध प्रदर्शनों को दबाने में हजारों निर्दोष मारे गए। महिलाओं पर जबरन हिजाब, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, इंटरनेट ब्लैकआउट और IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) की गोलीबारी से प्रदर्शनों का दबाने का यह उनका तरीका था।

ग्रीम मूवमेंट को बर्बरता से कुचलने का इतिहास

पहला बड़ा प्रदर्शन साल 2009 का ग्रीन मूवमेंट था। राष्ट्रपति चुनाव में धांधली के आरोप पर लाखों लोग सड़कों पर उतरे। ‘व्हेयर इज माय वोट’ का लोगों ने नारा’ लगा। हालाँकि खामेनेई ने इसे ‘विदेशी साजिश’ बताते हुए IRGC को दबाने का आदेश दिया। आधिकारिक आँकड़ों में दर्जनों मौतें, लेकिन BBC और अन्य रिपोर्टों के अनुसार कम से कम 72 से 80 लोग मारे गए।

सैकड़ों गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें जमकर यातनाएँ दी गईं। इस दौरान महिलाओं और युवाओं पर विशेष क्रूरता बरती गई। यह प्रदर्शन ईरान की लोकतंत्र की आखिरी उम्मीद था, लेकिन खामेनेई ने कुचल दिया।

साल 2017-18 में आर्थिक स्थिति बिगड़ने के खिलाफ लोग प्रदर्शन पर उतरे तो फिर से खामेनेई ने ‘विदेशी ताकतों’ के नाम पर लोगों को कुचल डाला।

साल 2019 में ईरान का ब्लडी नवंबर

साल 2019 का ‘ब्लडी नवंबर’ यानी ईंधन की कीमतें दोगुनी करने पर राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन। इमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक हफ्ते में 321 मौतों की पुष्टि की की। रॉयटर्स और ईरानी अधिकारियों के अनाम स्रोतों के अनुसार कुल 1500 तक लोग मारे गए। महशहर में IRGC ने दलदल में छिपे 100 प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई। इंटरनेट बंद कर दिया गया।

ईरान ह्यूमन राइट्स ने इसे ‘आधुनिक ईरान का सबसे खूनी दमन’ बताया। खामेनेई ने सार्वजनिक रूप से ‘दंगे करने वालों को सबक सिखाओ’ कहा और इसके बाद विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों का सफाया कर दिया गया।

महसा अमीनी से जुड़ा आंदोलन

सबसे चर्चित रहा साल 2022 का ‘महसा अमीनी’ या ‘वुमन, लाइफ, फ्रीडम’ आंदोलन। 22 वर्षीय कुर्द महिला महसा अमिनी नैतिक पुलिस (मोरालिटी पुलिस) की हिरासत में मारी गई, वो भी कथित तौर पर हिजाब ठीक न पहनने पर। इसके बाद हुए दंगों में ईरान ह्यूमन राइट्स के अनुसार 551 लोग मारे गए, जिनमें 68 नाबालिग थे। ईरानी पुलिस ने लाइव गोलियाँ चलाई।

दिसंबर 2022 तक 476 मौतें पुष्टि हुईं, तो 2 युवाओं को फाँसी दे दी गई। अनगिनत अन्य लोगों को मारा गया, जिनका कोई रिकॉर्ड ही नहीं मिला। यह आंदोलन ईरान की महिलाओं की आजादी की लड़ाई था, लेकिन खामेनेई ने इसे कुचल दिया।

बहरहाल, इस पूरे मुद्दे पर भारत सरकार अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया दे चुकी है। फिर भी, एक दिलचस्प प्रतिक्रिया बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे की तरफ से आई है। उन्होंने खगड़े के ट्वीट को कोट करते हुए पुराना नोट पोस्ट किया है।

निशिकांत दुबे ने अतीत में ईरान के आधिकारिक कदमों को भी गिनाया है। इत्तेफाक की बात है कि उस समय देश में कॉन्ग्रेस की ही सरकारें थी और भारत दुश्मन देश पाकिस्तान के हमले झेल रहा था।

कॉन्ग्रेसियों – वामपंथियों की खुल चुकी है कलई

भारत में ‘लोकतंत्र’ और ‘मानवाधिकार’ का राग अलापने वाले कॉन्ग्रेसी और वामपंथी एक ऐसे तानाशाह के लिए आंसू बहा रहे हैं जिसने अपने ही लोगों पर गोली चलवाई। महसा अमिनी जैसी लड़कियों की मौत पर चुप्पी साधे रखी, लेकिन खामेनेई की हत्या पर छाती पीटे जा रहे हैं। ये इनका दोहरा मापदंड दिखाता है। वो सीधे-सीधे अमेरिका-इजरायल का विरोध न करके, उनका नाम सिर्फ पीएम मोदी को भला-बुरा कहने में ले रहे हैं।

दरअसल, कॉन्ग्रेसियों और वामपंथियों का रुदन न खामेनेई के लिए है, न ईरानी जनता के लिए। उनका यह रुदन यह अपनी प्रासंगिकता बचाने और पीएम मोदी को घेरने का प्रयास है। वे विदेश नीति खुद तय करना चाहते हैं, लेकिन जनता जानती है कि राष्ट्रीय हित ‘भावनाओँ’ से ऊपर होते हैं।

भारत को ऐसी ‘मोरल लीडरशिप’ की जरूरत नहीं जो तानाशाहों का शोक मनाए और लोकतंत्र के प्रतीक मोदी को घसीटे। ऐसे में साफ है कि पीएम मोदी की चुप्पी शक्ति है, जिसमें भारत की शांति और हितों की रक्षा है। लेकिन कॉन्ग्रेस-वामपंथी अभी भी पुरानी तानाशाही के गम में डूबे हैं।


एडिटेड वीडियो के जरिए मथुरा की होली के रंग में डालना चाहते थे भंग, UP पुलिस ने 9 यूट्यूबरों और इन्फ्लुएंसर्स पर दर्ज किया मुकदमा: जानें- FIR की डिटेल्स

उत्तर प्रदेश पुलिस ने मथुरा की विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार और लड्डूमार होली को लेकर सोशल मीडिया पर गलत और भ्रामक जानकारी फैलाने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। ब्रज की हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक परंपरा को बदनाम करने के आरोप में 9 यूट्यूबरों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।

पुलिस की यह कार्रवाई वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) श्लोक कुमार के निर्देश पर की गई जाँच के बाद हुई। जाँच में सामने आया कि कुछ लोगों ने पिछले वर्षों के विवादित वीडियो क्लिप्स को कुछ इस साल की होली से जोड़कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। इन एडिटेड वीडियो के जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई कि बरसाना और नंदगाँव की होली के दौरान अव्यवस्था और अभद्रता हुई है।

दरअसल, बरसाना और नंदगाँव में मनाई जाने वाली ‘लट्ठमार’ और ‘लड्डूमार’ होली को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु और पर्यटक पहुँचते हैं। इसे ब्रज की लगभग 5,000 वर्ष पुरानी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाता है। पुलिस का कहना है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित किए गए भ्रामक वीडियो से न केवल इस परंपरा की छवि खराब हुई बल्कि स्थानीय लोगों में भी भारी गुस्सा फैल गया।

पुलिस के संज्ञान में जैसे ही यह बात आई कि कुछ इन्फ्लुएंसर्स ने होली के पुराने वीडियो को आपत्तिजनक तरीके से एडिट कर उन्हें हालिया आयोजन से जोड़ दिया। तुरंत इसकी जाँच की गई, जाँच में ये वीडियो क्लिप भ्रामक और तथ्यों से छेड़छाड़ किए हुए पाए गए। इस मामले में बरसाना थाने में सभी 9 आरोपितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।

FIR में क्या हैं आरोप और किन पर दर्ज हुआ केस?

पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(2) (विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता बढ़ाना) और 353(2) के साथ-साथ IT ऐक्ट की धारा 67/67A के तहत मामला FIR दर्ज की है।

पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR में लिखा गया है, “26 व 27 फरवरी 2026 को सोशल मीडिया सेल व अन्य प्लेटफॉर्म (जैसे वॉट्सऐप/फेसबुक/इंस्टाग्राम/X आदि) से जानकारी प्राप्त हुई कि कई भ्रामक वीडियो अलग अलग मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किए गए हैं। जिसमें घटनास्थल नंदगाँव व बरसाना दर्शाया गया है।”

इसमें आगे लिखा गया है, “वीडियो में वर्तमान की घटना बताकर शेयर किया जा रहा है जबकि जाँच करने पर ज्ञात हुआ कि यह वीडियो पुरानी हैं। किसी दूसरे स्थान/समय की हैं।” FIR में कहा गया है, “इन भ्रामक वीडियो के कारण क्षेत्र में भ्रम, अफवाह और सामाजिक वैमनस्य की स्थिति उत्पन्न हो रही है। महिलाओं में भय व असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो रही है और सामाजिक तनाव/अफवाह की स्थिति बन रही है।”

FIR में जिन लोगों औ सोशल मीडिया हैंडल्स के नाम हैं उनमें iMayankofficial, पीयूष राय, विशाल ज्योति देव अग्रवाल, Extra2ab (@UdayRoy443477), ममता राजगढ, कवीश अजीज, Prayagraj.vibes, rnagarvlogs और kotafoodexplor शामिल हैं।

FIR का एक हिस्सा

पुलिस ने क्या बताया?

मथुरा में होली से जुड़े भ्रामक वीडियो फैलाने के मामले में पुलिस ने सख्त रुख अपनाया है। अधिकारियों ने साफ कहा है कि धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को बदनाम करने या उनके साथ छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। लोगों से अपील की गई है कि बिना जाँचे-परखे कोई भी वीडियो या संदेश सोशल मीडिया पर साझा न करें।

एसपी देहात सुरेश चंद्र रावत ने बताया कि कुछ वीडियो इस तरह से एडिट और प्रस्तुत किए गए थे, जिससे इलाके में अफवाहें फैलने लगीं। पुलिस ने स्पष्ट किया कि इस साल होली का त्योहार पूरी तरह शांतिपूर्ण संपन्न हुआ। किसी भी श्रद्धालु या स्थानीय व्यक्ति की ओर से कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर भ्रामक सामग्री फैलाकर गलत तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई।

पुलिस की सर्विलांस टीम आरोपितों की लोकेशन ट्रेस कर रही है और जल्द ही आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस ने चेतावनी देते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति सांस्कृतिक परंपराओं को गलत तरीके से पेश करे या समाज में भ्रम और वैमनस्य फैलाए। ऐसे मामलों में कानून के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी।

होली: भारतीय सभ्यता की आत्मा और आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

मैं जब भी होली की बात करता हूँ, मन में पहले अपने ब्रज की याद आती है। मथुरा के उस बाज़ार की, जहाँ फाल्गुन आते-आते गुलाल की दुकानें सज जाती हैं और हवा में टेसू के फूलों की हल्की-सी महक घुल जाती है। शायद यही कारण है कि मैं होली को महज एक त्योहार नहीं मानता।

भारत एक भौगोलिक सीमा में बँधा राष्ट्र तो है ही, लेकिन उससे भी पहले यह एक जीवंत सभ्यता है। दुनिया की सबसे पुरानी, सबसे निरंतर बहने वाली सभ्यताओं में से एक। और इस सभ्यता को एक सूत्र में पिरोने का काम हमारे पर्वों ने किया है। ये उत्सव केवल खुशी मनाने के बहाने नहीं हैं। इनमें दर्शन है, पारिस्थितिकी है, सामाजिक न्याय है और एक गहरी आध्यात्मिक समझ भी है।

होली इन सबमें सबसे अलग है। सबसे खुली। सबसे निडर। यह किसी एक जाति की नहीं, किसी एक क्षेत्र की नहीं। अपने असली रूप में यह पूरी मानवता के भीतर जो आनंद छुपा है, उसका उत्सव है।

प्राचीन जड़ें: जब इतिहास और आस्था एक हो जाते हैं

होली कब शुरू हुई? यह प्रश्न उतना ही कठिन है जितना यह पूछना कि गंगा कब से बहती है। भविष्य पुराण और नारद पुराण में इस पर्व के स्पष्ट उल्लेख मिलते हैं। यानी जब यूरोप में सभ्यता अंकुरित भी नहीं हुई थी, तब भी इस भूमि पर होली के रंग उड़ते थे।

सबसे प्रसिद्ध कथा तो हम सब जानते हैं। प्रह्लाद और होलिका की। लेकिन मैं कहूँगा कि इसे केवल एक धार्मिक कहानी मत समझिए। यह एक राजनीतिक और नैतिक वक्तव्य है। हिरण्यकश्यप के पास सत्ता थी, सेना थी, वरदान था। और प्रह्लाद के पास क्या था? बस एक अटूट विश्वास। और उसी विश्वास ने जीत हासिल की।

होलिका को अग्नि से अभय का वरदान था, फिर भी वह जल गई। प्रह्लाद के पास कोई वरदान नहीं था, फिर भी वह बचा। यही होली का मूल संदेश है: सत्य और भक्ति, अंततः किसी भी बाहरी शक्ति से बड़े होते हैं।

और ब्रज की होली? वह तो बिल्कुल अलग ही दुनिया है। बरसाना की लट्ठमार होली, वृंदावन की फूलों वाली होली। जो एक बार देख ले, भूल नहीं सकता। यहाँ होली केवल उत्सव नहीं रही, यह राधा और कृष्ण के बीच उस दिव्य प्रेम की पुनर्रचना है जिसे हर पीढ़ी अपने रंगों में जीती है।

होली और प्रकृति: जब विज्ञान और परंपरा एक साथ चलते हैं

आधुनिक पीढ़ी के कुछ लोग कहते हैं कि हमारे त्योहार पुराने हो गए, अब इनकी ज़रूरत नहीं। मैं ऐसे लोगों से विनम्रतापूर्वक असहमत हूँ।

होली फाल्गुन और चैत्र के संधिकाल पर आती है। ठंड जा रही होती है, गर्मी दस्तक दे रही होती है। खेतों में फसल पक चुकी होती है। प्रकृति खुद रंगों में नहाई होती है। क्या यह संयोग है? बिल्कुल नहीं। हमारे पूर्वजों ने इस ऋतु-परिवर्तन के ठीक समय पर यह पर्व रखा, बहुत सोच-समझकर।

होलिका दहन की परंपरा लीजिए। पूर्णिमा की रात जलने वाली यह अग्नि हवा को शुद्ध करती है। शीत और बसंत के बीच के इस संक्रमण काल में जो रोगाणु पनपते हैं, यह धुआँ उन्हें नष्ट करता है। यह बात आधुनिक विज्ञान भी अब मान रहा है। और इसी अग्नि में नई फसल के दाने भूनने की परंपरा, वह धरती माँ के प्रति कृतज्ञता का सबसे सादा और सबसे सच्चा तरीका है।

टेसू, हल्दी, नीम, चंदन: इन प्राकृतिक रंगों में केवल सौंदर्य नहीं था, औषधि भी थी। गर्मी शुरू होने से पहले त्वचा को इन रंगों से मज़बूत करना, यह हमारे पूर्वजों की स्वास्थ्य-प्रज्ञा थी। उत्सव के भीतर छुपा विज्ञान। आज हम इसे ‘holistic wellness’ कहते हैं, हमारे पुरखे इसे बस होली कहते थे।

होली: जहाँ ऊँच-नीच की दीवारें रंगों में डूब जाती हैं

भारत की सबसे बड़ी चुनौती क्या रही है सदियों से? सामाजिक विभाजन। जाति, वर्ग, आयु, प्रतिष्ठा के वे बंधन जो मनुष्य को मनुष्य से अलग करते रहे।

होली साल में एक दिन इन सभी बंधनों को तोड़ देती है। जमींदार और मजदूर एक ही रंग में भीगते हैं। बेटा बाप के पैर छूता है और फिर उन्हें गुलाल से पोत देता है। कोई बुरा नहीं मानता। कोई छोटा नहीं महसूस करता। यह जादू कैसे होता है? मैंने बहुत सोचा इस पर।

इसका जवाब ब्रज की होली में मिलता है। श्यामवर्ण कृष्ण और गौरवर्णा राधा। जब कृष्ण राधा के गाल पर रंग लगाते हैं, तो वे वर्ण-भेद को, रंग-भेद को एक हँसी में उड़ा देते हैं। यह कोई आधुनिक प्रगतिशील विचार नहीं है, यह हमारी परंपरा में हज़ारों साल से मौजूद है।

वाराणसी की तंग गलियाँ हों, मथुरा के खुले आँगन हों, अवध के गाँव हों या बुंदेलखंड के मेले, होली हर जगह वही काम करती है। भेद को रंगों में बहा देती है। यह समावेशी भारत का मूल विचार है, किसी से उधार नहीं लिया, हमारी अपनी ज़मीन से उगा हुआ।

रंग बाहर के नहीं, भीतर के भी

एक बात जो अक्सर हम भूल जाते हैं वह यह कि होली केवल बाहरी उत्सव नहीं है। इसका एक भीतरी आयाम भी है, और वह शायद ज़्यादा ज़रूरी है।

गुलाल का लाल रंग, जीवन और प्रेम का संकेत है। हल्दी का पीला, ज्ञान और शुभता का। प्रकृति का हरा, नवीनता और विकास का। जब हम एक-दूसरे पर ये रंग लगाते हैं तो अनजाने ही हम एक-दूसरे में उस परम चेतना को स्वीकार कर रहे होते हैं जिसे वेदांत ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ कहता है। हर चेहरे में वही दिव्य प्रकाश।

और होलिका दहन? वह भी केवल एक प्रतीक नहीं है। हमें उस अग्नि में अपना अहंकार डालना है, अपनी ईर्ष्या, अपना क्रोध, अपनी घृणा। यह वार्षिक आत्मशुद्धि का अवसर है। मन की होली, आत्मा की होली।

आज की होली: क्या हम इसके योग्य हैं?

यह प्रश्न मुझे खुद से भी पूछना होगा। क्या हम होली को उसकी गरिमा के साथ मना रहे हैं?

रासायनिक रंग जो बाज़ार में बिकते हैं, वे त्वचा को नुकसान पहुँचाते हैं। आँखों को और पर्यावरण को भी। यह उस होली का अपमान है जो टेसू और हल्दी से खेली जाती थी, जो देह को नुकसान नहीं, शक्ति देती थी। सुखद बात यह है कि देश भर में प्राकृतिक रंगों की ओर लौटने का एक जागरूक आंदोलन बढ़ रहा है। यह छोटी-सी वापसी है, पर बहुत ज़रूरी है।

पानी का सवाल भी है। जब देश के कई हिस्सों में पानी की किल्लत हो तो हज़ारों लीटर पानी बर्बाद करना क्या उचित है? अनेक समुदायों ने सूखी होली की परंपरा अपनाई है। मुझे लगता है यह कोई समझौता नहीं, यह होली की असली भावना के और करीब जाना है।

होली अब दुनिया की है

एक बात मुझे गर्व से भरती है। होली आज चालीस से अधिक देशों में मनाई जाती है। लंदन में, न्यूयॉर्क में, सिडनी में, टोक्यो में। वहाँ के लोग जो हमारी भाषा नहीं जानते, हमारे शास्त्र नहीं पढ़े, वे भी इस रंगोत्सव में शामिल होना चाहते हैं।

क्यों? क्योंकि इस पर्व में कुछ ऐसा है जो भाषा और सीमा से परे है। जो किसी को भी छू लेता है। यह उस सभ्यता की ताकत है जो जीवन को उत्सव की तरह जीना जानती है।

उत्तर प्रदेश इस विरासत का हृदय है। राम और कृष्ण की यह भूमि, तुलसीदास और सूरदास की यह वाणी-भूमि, कबीर और मीराबाई का यह रंग-मंच। कबीर ने ज्ञान की होली खेली जिसमें विवेक के रंग आत्मा को रँगते हैं। मीरा ने होली को दिव्य प्रेम का उन्माद माना। यह विरासत अतीत नहीं है, यह एक जीती-जागती शक्ति है जो आज भी हमें दिशा देती है।

जब तक रंग हैं, होली है

होली शाश्वत क्यों है? क्योंकि इसका सवाल शाश्वत है। जब तक दुनिया में अंधेरा है, प्रकाश की ज़रूरत रहेगी। जब तक दीवारें हैं, रंगों की ज़रूरत रहेगी। जब तक दिल में ठंडक है, बसंत की घोषणा की ज़रूरत रहेगी।

भारत ने दुनिया को एक विचार दिया है- जीवन उत्सव है। होली उस विचार की सबसे रंगीन, सबसे खुली, सबसे निर्भीक अभिव्यक्ति है।

इस होली पर, जब होलिका दहन हो तो एक पल रुकिए। अपने भीतर झाँकिए। जो जलाना हो, जला दीजिए। और जब रंग खेलें, तो हर चेहरे में वह दिव्य प्रकाश देखिए जिसे कोई रंग ढक नहीं सकता और कोई अंधकार बुझा नहीं सकता।

बुर्के में कैद, 9 साल की उम्र में निकाह, तालीम पर पाबंदी… खामेनेई को नहीं सुहाती थी ईरानी महिलाओं की स्वच्छंदता, बना दिया मजहबी कट्टरपंथ का गुलाम

ईरान में महिलाएँ अब खामेनेई की मौत पर जश्न मना रही हैं। सालों से अधिकारों से वंचित, पर्दे में रहने को मजबूर महिलाओं का मानना है कि अब वह इस्लामी क्रांति से पहले जैसी आजादी का लुत्फ उठा पाएँगी। पिछले कुछ सालों से ईरान में महिलाओं का अधिकार सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा रहा है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ महिलाएँ कई बार सड़कों पर उतर चुकी हैं।

हाल ही में विरोध प्रदर्शन करने वाली एक महिला की तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें वह खामेनेई की तस्वीर से सिगरेट सुलगाते हुए नजर आई थी। खामेनई की मौत पर वह जश्न मनाते भी नजर आई। दरअसल महिलाओं का ये जश्न 1979 में इस्लामी क्रांति के बाद लगी पाबंदियों से ‘आजादी’ को लेकर है। दशकों से सख्त धार्मिक और सामाजिक पाबंदियों में जी रही महिलाओं को अब नई रौशनी मिलती दिख रही है।

इस्लामी क्रांति 1979 से पहले महिलाओं को पढ़ने- लिखने, हिजाब नहीं पहनने और सामाजिक राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने की आजादी थी। सबसे अहम बात यह है कि 1979 से पहले जब मुहम्मद रजा पहलवी के वक्त लोगों को धार्मिक आजादी थी। चाहे वह किसी भी धर्म को माने, ये उसका निजी मसला माना जाता था। किसी धर्म के आधार पर सत्ता नहीं चलती थी।

महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर हिजाब पहनने पर रोक थी। धार्मिक पहचान जाहिर करने पर रोक लगाया गया था। 8 जनवरी 1936 को कश्फ ए हिजाब का कानून लागू किया गया। इसके मुताबिक, महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर किसी तरह की धार्मिक पहचान दिखाने की इजाजत नहीं थीं। यूँ कहें कि महिलाओं को हिजाब पहनने पर प्रतिबंध था।

हिजाब पहनने के लिए बाध्य किया गया

इस्लामी क्रांति के बाद स्कूल जाने वाली छोटी-छोटी बच्चियों को भी काला हिजाब पहनने के लिए मजबूर किया गया। स्कूल में टीचर स्कर्ट टॉप पहनकर आती थीं, उन्हें नकाब और बुर्का पहनना अनिवार्य कर दिया गया। पहले स्कूल में लड़के-लड़कियाँ सभी एक साथ पढ़ते थे। पढ़ाने वाले भी पुरुष और महिला दोनों होते थे।

स्कूलों में फ्रेंच जैसी विदेशी भाषाएँ आम थी। किसी तरह की धार्मिक किताब पढ़ाने की मजबूरी नहीं थी। लेकिन इस्लामी क्रांति ने ऐसे स्कूलों को बंद करवा कर लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग स्कूल की व्यवस्था की। लड़कियों के स्कूल में सिर्फ महिलाओं की एंट्री होती थी। सभी महिलाएँ बुर्के में ढँकी होती थी। यहाँ तक कि छोटी-छोटी बच्चियाँ, जो पहले स्कर्ट-शर्ट पहनकर आती थीं, उन्हें हिजाब पहनकर स्कूल आना पड़ता है।

ग्राफिक नॉवेल राइटर और एनीमेशन आर्टिस्‍ट मरजान सतरापी के मुताबिक, शुरुआत में कई बच्चियाँ हिजाब नहीं पहनती थीं। एक दिन कट्टरपंथियों ने स्कूल जा रही बच्चियों को जबरदस्ती हिजाब पहना दी। लड़कियाँ डरते हुए स्कूल के अंदर भागीं। इसके बाद स्कूलों को नियम की अनदेखी करने पर कठोर कार्रवाई की गई।

इस्लामी क्रांति के बाद सत्ता में आए अयातुल्लाह खोमैनी का मानना था कि महिलाओं का काम पति की सेवा करना, बच्चे पैदा करना, घर में रहना और परिवार की देखभाल करना है।

कट्टर इस्लामिक कानून आ जाने के बाद अंग्रेजी, फ्रेंच जैसी विदेशी भाषाओं पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। विदेशी संगीत, कपड़ों और थियेटरों पर रोक लग गई। इसका पालन नहीं करने पर जेल भेज दिया जाता था या कोड़ों की सजा दी जाती थी।

लेखक नॉवेल ने बताया है कि 1979 के बाद लड़कियों और महिलाओं की हालत बदत्तर हो गई। इस दौरान अमीर घर की 20 लाख महिलाएँ और लड़कियाँ अपना देश छोड़ कर चली गईं।

9 साल की लड़कियों का निकाह

महिलाओं के निकाह की उम्र जो 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले 18 साल थी, उसे घटा कर 13 साल कर दिया गया। हालाँकि ईरानी कानून के तहत जबरदस्ती निकाह नहीं किया जा सकता, लेकिन लड़कियों को निकाह के लिए बचपन में ही मजबूर किया जाता है, चाहे उसकी मर्जी हो या नहीं हो।

कानून के मुताबिक, 13 साल की लड़कियों का निकाह, उसकी मर्जी से या बिना मर्जी के ईरान में धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक आधार पर सही है। 13 साल से कम उम्र होने पर भी उसकी मर्जी से उसके परिवार वाले निकाह कर सकते हैं। यहाँ तक कि अब्बू की मर्जी या कानूनी इजाजत से 8 साल और 9 महीने (9 लीप ईयर) की उम्र में भी उसका निकाह हो सकता है।

ईरान के स्टैटिस्टिकल सेंटर के मुताबिक, 2023 में 18 साल से कम उम्र की लड़कियों के निकाह करीब 135000 रजिस्टर्ड हुए। हालाँकि जो निकाह रजिस्टर्ड नहीं हुए उनकी संख्या इससे ज्यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर कोई लड़की यह कहती है कि उसे निकाह के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो कानून के मुताबिक उसे जुल्म माना जाएगा।

हालात ऐसे हैं कि लड़की को सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिलती है। इसके अलावा लड़की की उम्र, फैमिली बैकग्राउंड, पढ़ाई-लिखाई और उसकी सोशियो-इकॉनॉमिक हालात के आधार पर तय होता है कि उसे निकाह के लिए मजबूर किया जा रहा है या नहीं।

दरअसल कानून में 9 साल की उम्र में निकाह की इजाजत दी गई है। 13 साल से उसकी मर्जी के बगैर भी निकाह करने की मान्यता है। ऐसे में कानूनी सुरक्षा भी महिला को नहीं मिल पाती है।

मुस्लिम महिलाएँ सिर्फ मुस्लिम व्यक्ति से निकाह कर सकती है और एक वक्त में एक की बीवी रह सकती है। लेकिन पुरुषों को 4 बीवियों को एक साथ रखने की इजाजत है। इतना ही नहीं अस्थाई तौर पर भी बीवियों को रखे जाने की इजाजत दी गई है।

इस्लामी क्रांति से पहले महिलाओं को वोट देने का अधिकार था

1979 से पहले महिलाओं को लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल होने का अधिकार था। ईरान दुनिया के उन कुछ मुल्कों में शामिल है, जहाँ महिलाओं को वोट देने का अधिकार था। संसद में चुनकर आने का अधिकार था। विमेन पर्सनल लॉ 1967 के अंतर्गत महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गये थे।

लड़कियों के निकाह की उम्र 18 साल तय की गई। इसके लिए लड़कियों की इच्छा अनिवार्य थी। लेकिन इस्लामी क्रांति ने महिलाओं को 200 साल पीछे भेज दिया। खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामी शासन ने महिलाओं से सारी स्वायत्ता, स्वतंत्रता और अधिकार छीन लिए।

आज हालात ये है कि ईरान के समाज और उसके कानूनी सिस्टम में पुरुष और महिलाओं के बीच भेदभाव काफी गहरा है। महिलाओं और लड़कियों को पुरुषों और लड़कों से कम अधिकार प्राप्त हैं। उनकी हैसियत कम आंकी जाती है।

हर लड़की या महिला के लिए पुरुष अभिभावक अनिवार्य

मेल गार्जियनशिप कानून के मुताबिक, हर लड़की और महिला का एक पुरुष अभिभावक अनिवार्य कर दिया गया। वह न तो स्कूल या कॉलेज बगैर इजाजत के जा सकती है और न ही निकाह कर सकती है। यहाँ तक कि महिलाओं को संपत्ति खरीदने, यात्रा करने के लिए, बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए पुरुष अभिभावक की लिखित अनुमति अनिवार्य है।

ऐसे देश,जहाँ पहले महिलाएँ प्रतिनिधित्व करती थीं, वैज्ञानिक बनती थीं, उच्च शिक्षा प्राप्त कर आजादी से जिंदगी बिताती थीं,वहाँ उन्हें किसी के रहमोकरम पर रहने के लिए मजबूर कर दिया गया।

कॉस्मैटिक्स के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध

सजना-सवँरना महिलाओं का हक माना जाता है। लेकिन इस्लामी क्रांति ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। महिलाएँ किसी तरह के सौन्दर्य प्रसाधन का इस्तेमाल नहीं कर सकती थीं। व्यूटी पार्लर गैरकानूनी थे। बाल कटवाना भी बैन था। हालाँकि महिलाएँ चोरी-छिपे ब्यूटी पार्लर अपने घर पर ही चलाती थीं और महिलाएँ बुर्का पहनकर वहाँ पहुँचती थीं।

‘गश्त ए एरशाद’ लाकर शरिया कानून लागू किया गया

गश्त ए एरशाद 2006 को लागू कर ईरान में शरिया कानून लागू किया गया था। इसके माध्यम से एक गश्त एक एरशाद यानी मोरैलिटी पुलिस की नियुक्ति की गई थी, जो ये पता लगाता था कि सार्वजनिक जगहों या निजी जिंदगी में भी कौन महिला या पुरुष इस्लामी कानून का पालन नहीं कर रहा है। इसने महिलाओं की घर के अंदर की आजादी भी छीनने की कोशिश की। यही वजह है कि महिलाएँ का विद्रोह कई बार इस्लामी क्रांति के बाद देखा गया।

गोली मारकर खत्म कर सकते थे EX-मुस्लिम की जिंदगी, पर चाकुओं से रेता क्योंकि हर ‘काफिर’ में खौफ भरना चाहते थे इस्लामी कट्टरपंथी

गाजियाबाद के लोनी इलाके में जुमे के दिन 27 फरवरी 2026 की सुबह EX-मुस्लिम सलीम वास्तिक पर जानलेवा हमला किया जाता है। दो नकाबपोश हमलावर चाकू, पेपर कटर और अन्य धारदार हथियारों से वास्तिक के गले और पेट पर वार करते हैं। इससे साफ है कि हमलावर का मकसद सिर्फ मौत नहीं, बल्कि ‘दर्दनाक’ मौत देना था।

दो दिन के भीतर उत्तर प्रदेश पुलिस हमलावरों में से एक अमरोहा के मोहम्मद जीशान को मुठभेढ़ में ढेर कर देती है। जीशान के पास से एक मेड इन इटली पिस्टल, 14 कारतूस, पेपर कटर और एक मोटरसाइकिल बरामद की जाती है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब हमलावरों के पास मजबूत और सटीक निशाने वाली इटली की पिस्टल थी, तो सलीम वास्तिक को चाकू से क्यों काटा गया?

यह हमला किसी साधारण रंजिश का परिणाम नहीं था बल्कि एक सुनियोजित और सोच समझकर किया गया कृत्य था। जिस तरह से सलीम वास्तिक पर हमला किया गया, वह साफ संकेत देता है कि मकसद केवल उनकी जान लेना नहीं था बल्कि समाज में डर का माहौल पैदा करना भी था। हमलावारों ने जानबूझ कर पिस्टल के बजाए चाकू से हमला किया। यह गुलाम-ए-नबी की सजा ‘सर तन से जुदा’ का पाक उदाहरण था, जो कट्टरपंथी अक्सर ‘काफिरों’ के लिए इस्तेमाल करते हैं।

यह घटना उस कट्टरपंथी सोच को उजागर करती है, जो अपने मजहब के खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकते, ‘गुस्ताख-ए-नबी’ और ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाने लग जाते हैं। सलीम भी इसीलिए इन कट्टरपंथियों का निशाना बने। वो एक विद्वान व्यक्ति थे। उन्होंने अपनी दीनी तालीम पूरी की थी। इस्लाम को लेकर उनकी अच्छी-खासी समझ थी। उन्हें इस्लाम में खामियाँ साफ दिखती थीं, वह सार्वजनिक तौर पर इसे कबूल भी कर चुके थे।

उनके अनुसार कुरान को अल्लाह ने नहीं लिखा है और यह जबरन थोपा जा रहा है। यही वजह रही कि वास्तिक ने इस्लाम छोड़ा और अपने यूट्यूब चैनल के जरिए इस्लाम की खामियों और मजहब में महिलाओं की आजादी और हलाला जैसी कृत्यों को लेकर आवाज उठाने लगे। उन्होंने यह भी कहा कि सच्चा मुस्लिम आतंकवादी है। यह सभी ओपिनियन वास्तविक ने कुरान के हवाले से ही दिए हैं।

लेकिन इसके बावजूद यह कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों को रास नहीं आया। वे हिंसा के रास्ते पर जाने के लिए बहानें खोज ही लेते हैं। कभी धर्म के नाम पर, तो कभी धर्म के लिए। उन्होंने वास्तिक के खिलाफ फरमान निकाला। वास्तिक का इस्लाम के खिलाफ बोलना इन कट्टरपंथियों को नागवारा और हत्या की साजिश रची। लेकिन उनके लिए यह हत्या कोई मामूली नहीं, बल्कि समाज के लिए उदाहरण पेश करने वाली होनी चाहिए थी।

इटली की पिस्टल होने के बावजूद आसान मौत देने के बदले कट्टरपंथियों ने ‘कसाईनुमा’ मौत का रास्ता चुना। वास्तिक को चाकुओं से गोदा गया। उनके गले, छाती और पेट को चाकुओं से काटा गया। तब तक जब तक वो मर न जाए। लेकिन गनीमत रही कि हमले के कारण वह बेहोश होकर गिर पड़े, जिससे हमलावरों को लगा कि वास्तिक मर गए और वे मौके से फरार हो गए। वास्तिक को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। आज वो दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं।

पुलिस के बयान में सामने आया कि हमला करने वाले अपराधी अपने मकसद को अंजाम देने के लिए दोबारा से घटनास्थल पर आए थे। हमलावरों को पता लगा कि सलीम सिर्फ घायल है, तो वो घटनास्थल पर जाकर एक बार फिर हमला करने के लिए पहुँचे। हमले में AIMIM के कुछ कट्टरपंथी नेता के भी नाम सामने आए हैं, सलीम के बेटे ने उनके खिलाफ FIR दर्ज करवाई है।

साफ है कि सलीम वास्तिक के जरिए कट्टरपंथियों ने उदाहरण पेश कर दिया। वह बताना चाहते हैं कि कोई भी इस्लाम के खिलाफ बोलेगा तो उसका भी यही हश्र होगा। फायरिंग करते, तो शायद ‘काफिरों’ पर उतना असर नहीं डालता। वास्तिक पर हमला गुलाम-ए-नबी की शान में गुस्ताखी करने के कारण किया गया, और ये उसी ‘सर तन से जुदा’ के नारे का लाइव उदाहऱण है, जो कट्टरपंथी गली-मोहल्लों और सड़कों पर ‘काफिरों’ के लिए चींख-चींखकर देते हैं।

‘सर तन से जुदा’ का नेक्सस, PAK कनेक्शन और टेलीग्राम पर जश्न: ‘मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर’ से जुड़े थे Ex मुस्लिम सलीम की गर्दन रेतने वाले सगे भाई जीशान-गुलफाम

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के लोनी में इस्लामिक कुरीतियों और मजहबी कट्टरता के खिलाफ आवाज उठाने वाले एक्स मुस्लिम सलीम वास्तिक पर हुए जानलेवा हमले के मामले में कई बड़े खुलासे हुए हैं। जाँच में सामने आया है कि हमला किसी व्यक्तिगत विवाद का नहीं बल्कि एक संगठित कट्टरपंथी नेटवर्क और सोशल मीडिया के जरिए फैलाई जा रही नफरत का नतीजा था। पता चला है कि सलीम के हमलावर जीशान और गुलफाम एक कट्टरपंथी ग्रुप ‘मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर’ से जुड़े थे।

मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर ग्रुप: टेलीग्राम पर फैला कट्टरपंथ का जाल

जाँच एजेंसियों के अनुसार, इस हमले के पीछे एक कथित कट्टरपंथी संगठन से जुड़ा ‘मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर’ नामक टेलीग्राम ग्रुप अहम कड़ी के रूप में सामने आया है। इस ग्रुप से करीब 18,200 लोग जुड़े हुए हैं। ग्रुप पर लगातार कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा था और हिंसा को खुलकर समर्थन मिल रहा था।

हमले के बाद इसी ग्रुप पर सलीम की घायल अवस्था की तस्वीरें वायरल की गईं और भड़काऊ संदेश लिखे गए। एक पोस्ट में लिखा गया, “एक्स मुस्लिम सलीम को अस्पताल पहुँचा दिया गया है, पूरा वीडियो चाहिए?” ऐसे बयानों के जरिए ग्रुप में हिंसा का महिमामंडन किया गया। बड़ी संख्या में इस कट्टरपंथी ग्रुप के सदस्यों ने इन पोस्ट पर लाइक और कमेंट कर अपना समर्थन दिया।

जाँच में यह भी सामने आया कि इसी नेटवर्क के जरिए पाकिस्तान के एक यूट्यूबर ने खुलेआम सलीम और अन्य हिंदूवादी नेताओं को जान से मारने की धमकी दी थी। उसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें सीधे तौर पर हत्या के लिए उकसाया गया। इसी उकसावे से प्रभावित होकर आरोपित जीशान और गुलफाम सलीम पर हमले के लिए तैयार हुए।

रमजान और जुमे का दिन: साजिश की सुनियोजित टाइमिंग

पुलिस जाँच में खुलासा हुआ है कि हमले की तारीख और समय भी पूरी तरह सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। रमजान का महीना और शुक्रवार यानी जुमे का दिन जानबूझकर चुना गया ताकि वारदात को मजहबी रंग देकर कट्टरपंथी सोच को मजबूत किया जा सके।

हमलावर तड़के लोनी पहुँचे, सलीम के घर से ही उसका पीछा किया और उसके साथ नमाज पढ़ने वाली जगह तक गए। वहाँ से वे उसके कार्यालय तक पहुँचे और मौके पर बाइक से उतरकर अचानक गले पर धारदार हथियार से हमला कर दिया। हमले का तरीका इतना क्रूर था कि साफ संकेत मिलता है कि सिर धड़ से अलग करने की मंशा थी।

हालाँकि, शोर मचने पर आरोपित भाग निकले। जाँच एजेंसियों का मानना है कि इस वारदात का तरीका उदयपुर के कन्हैया लाल और लखनऊ के कमलेश तिवारी हत्याकांड से मिलता-जुलता है, जहाँ वैचारिक मतभेद के चलते कट्टरपंथियों ने सुनियोजित तरीके से हमला किया था।

दो सगे भाई, एक साजिश: कारपेंटर से हमलावर तक का सफर

सलीम पर हमला करने वाले दोनों आरोपित सगे भाई हैं। मुठभेड़ में मारा गया जीशान और उसका फरार भाई गुलफाम मूल रूप से अमरोहा के सैदनगली गाँव के रहने वाले थे और खोड़ा कॉलोनी में किराए के मकान में रहकर कारपेंटर का काम करते थे।

पुलिस के अनुसार, जीशान खुद भी एक यूट्यूब चैनल चलाता था और कट्टरपंथी विचारधारा से गहराई से प्रभावित था। वह लगातार मेहदी मॉडरेटर ग्रुप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के संपर्क में था। पाकिस्तानी यूट्यूबर की अपील और भड़काऊ वीडियो से प्रभावित होकर दोनों भाइयों ने सलीम पर जानलेवा हमला करने का फैसला किया।

हमले के बाद उन्होंने टेलीग्राम ग्रुप पर वारदात की जिम्मेदारी लेते हुए फोटो पोस्ट की और खुलेआम जश्न मनाया। घटना के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्त चेतावनी और पुलिस की सक्रियता के चलते मुठभेड़ हुई, जिसमें जीशान मारा गया। अब पुलिस फरार आरोपित गुलफाम की तलाश में लगातार दबिश दे रही है।

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति पर हमले का नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के जरिए फैल रहे कट्टरपंथ, विदेशी उकसावे और संगठित नफरत के खतरनाक गठजोड़ का गंभीर उदाहरण बनकर सामने आया है। जाँच एजेंसियाँ पूरे नेटवर्क को खंगालने में जुटी हैं ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी साजिश को समय रहते नाकाम किया जा सके।

चीन का माल निकला बेकार, इजरायल-US के सामने फेल HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम: जानें- ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ में अमेरिका ने कौन-से हथियार किए इस्तेमाल

अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी 2026 को ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम से सैन्य कार्रवाई शुरू की। दोनों देशों ने ईरान पर ताबड़तोड़ हमले किए, जिसमें ईरान के कई शहरों में भारी तबाही हुई। इन हमलों में US ने आधुनिक हथियारों और ड्रोनों का इस्तेमाल किया। ये हथियार इतने ताकतवर हैं कि चीन से खरीदे गए ‘HQ-9B’ एयर डिफेंस सिस्टम से भी ईरान खुद को बचाने में नाकाम रहा।

सबसे पहले जानते हैं कि ईरान के खिलाफ अमेरिका ने किन-किन हथियार और मिसाइलों का इस्तेमाल किया और उनकी विशेषताएँ क्या हैं?

टॉमहॉक क्रूज मिसाइल

सबसे प्रमुख हथियार ‘टॉमहॉक क्रूज’ मिसाइल है। यह लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल है, जिसे युद्धपोत या पनडुब्बी से छोड़ा जाता है। इसकी मारक क्षमता 1600 किलोमीटर तक मानी जाती है और यह जमीन पर बने सटीक सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम होती है। यह बहुत कम ऊँचाई पर उड़ती है, जिससे इसे रडार से पकड़ना मुश्किल होता है।

F-35 फाइटर जेट

F-35 एक आधुनिक स्टेल्थ लड़ाकू विमान है, जिसे रडार आसानी से पकड़ नहीं पाता। यह दुश्मन की सीमा में चुपचाप घुसकर हमला करने में सक्षम है। यह हवा से हवा और हवा से जमीन दोनों तरह के मिशन कर सकता है। इसमें आधुनिक सेंसर और सटीक बम-मिसाइल लगाने की क्षमता होती है।

F/A-18 फाइटर जेट

F/A-18 बहुउद्देश्यीय फाइटर जेट है, जिसे अक्सर एयरक्राफ्ट कैरियर से उड़ाया जाता है। यह तेज गति से दुश्मन के ठिकानों पर हमला कर सकता है। इसमें अलग-अलग तरह की मिसाइल और बम लगाए जा सकते हैं। यह हवाई लड़ाई और जमीन पर हमले, दोनों में काम आता है।

LUCAS कमीकाजे ड्रोन

LUCAS एक बिना पायलट के हमला करने वाला ड्रोन है, जो क्ष्य के ऊपर मंडराता है और मौका मिलते ही टकराकर विस्फोट कर देता है। इसे सस्ता और तेजी से इस्तेमाल करने के लिए बनाया गया है। ऐसे ड्रोन छोटे ठिकानों या वाहनों को निशाना बनाने में कारगर होते हैं।

HIMARS रॉकेट सिस्टम

HIMARS एक चलती-फिरती रॉकेट लॉन्चर गाड़ी है, जो जमीन से ही दूर तक रॉकेट दाग सकती है। इसे जल्दी तैनात किया जा सकता है और फायर करने के बाद तुरंत स्थान बदला जा सकता है। यह दुश्मन के गोदाम, मिसाइल साइट या सैन्य ठिकानों को सटीक निशाना बनाने में इस्तेमाल होता है।

पेट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम

पेट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम अमेरिका का जमीन से दागा जाने वाली रक्षा प्रणाली है, जिसे दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमानों को हवा में ही मार गिराने के लिए बनाया गया है। इसमें ताकतवर रडार लगा होता है, जो दूर से ही खतरे को पहचान लेता है। अमेरिका इसे कई युद्ध में इस्तेमाल कर चुका है, इसे अमेरिका की हवाई सुरक्षा की ढाल माना जाता है।

THAAD

टर्मिनल हाई अल्टीट्यू एरिया डिफेंस (THAAD) अमेरिका का एक उन्नत मिसाइल रक्षा सिस्टम है, जिसे खासतौर पर बैलिस्टिक मिसाइलों को बहुत ऊँचाई पर ही रोकने के लिए बनाया गया है। यह दुश्मन की मिसाइल को वायुमंडल के अंदर या उसके किनारे पर ही नष्ट कर देता है, ताकि नीचे जमीन पर कोई नुकसान न हो।

इस सिस्टम में AN/TPY-2 नाम का बेहद ताकतवर रडार लगा होता है, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर से खतरे को पहचान सकता है। THAAD की खास बात यह है कि यह विस्फोटक वारहेड का इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि सीधे टक्कर मारकर मिसाइल को नष्ट करता है, जिससे सटीकता और सुरक्षा दोनों बढ़ जाती हैं।

चीन का ‘HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम’ भी ईरान को नहीं बचा सका

अमेरिका के ये ताकतवर हथियार ईरान में तबाही मचा रहे हैं। इन हमलों ईरान खुद को बचाने में नाकाम दिख रहा है। खासकर चीन से हाल ही ईरान ने खरीदा ‘HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम‘ पूरी तरह से कमजोर साबित हुआ।

बता दें कि यह वही डिफेंस सिस्टम है, जिसे पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में खुद को बचाने के लिए इस्तेमाल किया था, लेकिन तब भी यह सिस्टम भारत के हमलों को नहीं रोक सका था। अब ईरान में इसके कमजोर प्रदर्शन के बाद इस डिफेंस सिस्टम की सैन्य विशेषज्ञ इसकी क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं।

हालाँकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह सिस्टम पूरी तरह खराब नहीं है, बल्कि संभव है कि अमेरिका और इजरायल की संयुक्त और बेहद ताकतवर वायुसेना ने इसे एक साथ कई दिशाओं से इतना दबाव में डाल दिया कि यह संभल नहीं पाया।

यह भी कहा जा रहा है कि खाड़ी देशों में तनाव बढ़ने के बाद ईरान ने जल्दबाजी में अपनी रक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश की थी, जिससे तैयारी पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाई।

कैसे काम करता है चीन का HQ-98 एयर डिफेंस सिस्टम?

HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम को चीन की कंपनी चीन एयरोस्पेस साइंस एंड इंडस्ट्री कॉरपोरेशन (CASIC) ने बनाया है। इसे रूस के S-300PMU और अमेरिका के पैट्रियट PAC-2 सिस्टम से प्रेरणा लेकर बनाया गया, लेकिन बाद में इसे पूरी तरह चीन का स्वदेशी सिस्टम बना दिया गया।

इसका पहला परीक्षण साल 2006 में हुआ था और पिछले लगभग 10 साल से यह सक्रिय सेवा में है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इसकी मारक क्षमता लगभग 260 किलोमीटर है और यह करीब 50 किलोमीटर ऊँचाई तक जाकर दुश्मन के मिसाइल या विमान को गिरा सकता है।

चीन ने इस सिस्टम को अपने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इळाकों जैसे बीजिंग, तिब्बत और दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में तैनात किया हुआ है। इससे साफ है कि HQ-9B चीन के एयर डिफेंस नेटवर्क का एक अहम हिस्सा है। जहाँ तक ईरान की बात है, खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के दौरान ईरान ने अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए चीन के साथ ‘तेल के बदले हथियार’ समझौते के तहत HQ-9B खरीदा था।

US के हमले में कैसे नाकाम साबित हुआ HQ-9B डिफेंस सिस्टम?

ईरान ने HQ-9B को अपनी लंबी दूरी की सुरक्षा परत के रूप में शामिल किया। ईरान की एयर डिफेंस व्यवस्था कई स्तरों में बनी है। लंबी दूरी के लिए HQ-9B, S300PMU-2 और बावर-373 तैनात हैं। मध्यम दूरी के लिए खोरदाद-15 और राद (Raad) सिस्टम हैं। छोटी दूरी की सुरक्षा के लिए Tor-M2, Pantsir-S1, Zolfaqar और कंधे से दागे जाने वाले MANPADS मिसाइल सिस्टम शामिल हैं।

अमेरिका के हमले की धमकी के बीच ईऱान ने HQ-9B को अपने सबसे महत्वपूर्ण ठिकानों के आसपास तैनात किया था, जैसे नतांज परमाणु केंद्र, फोर्डो एनरिजमेंट सुविधा, IRGC के मिसाइल और ड्रोन बेस और तेहरान व इस्फहान के पास के एयरबेस। इसके बावजूद अमेरिका और इजरायल के हमलों में बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ, जिससे इस सिस्टम की वास्तविक क्षमता और तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

गुजरात में देश के पहले सेमीकंडक्टर प्लांट से उत्पादन शुरू, PM मोदी ने किया उद्घाटन: जानें- मेक इन इंडिया को कैसे मिल रही गति

आज भारत की तकनीकी यात्रा में एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के साणंद में अमेरिकी कंपनी माइक्रोन टेक्नोलॉजी द्वारा 22,516 करोड़ रुपए की लागत से स्थापित देश के पहले सेमीकंडक्टर एटीएमपी (ATMP) संयंत्र का उद्घाटन किया। यह परियोजना केवल गुजरात ही नहीं, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के लिए भी एक ऐतिहासिक मील का पत्थर मानी जा रही है।

उद्घाटन से पहले प्रधानमंत्री ने सानंद में रोड शो किया और बाद में समारोह को संबोधित करते हुए इसे भारत के सेमीकंडक्टर सपने की बड़ी उपलब्धि बताया। इस अत्याधुनिक संयंत्र में दुनिया के सबसे बड़े रेज़्ड-फ्लोर क्लीनरूम में से एक बनाया गया है, जो लगभग 5 लाख वर्ग फुट क्षेत्र में फैला है।

वर्तमान में यहाँ करीब 2000 कर्मचारी कार्यरत हैं। संयंत्र के पूर्ण क्षमता से संचालित होने पर लगभग 5000 प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित होंगे, जिनमें दिव्यांगजनों के लिए विशेष प्रावधान शामिल हैं। इसके अलावा, लॉजिस्टिक्स, आपूर्ति श्रृंखला और सहायक उद्योगों के माध्यम से लगभग 15000 अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा होने की संभावना है।

सेमीकंडक्टर संयंत्र की नींव: ATMP क्या है?

सेमीकंडक्टर (चिप्स) के निर्माण की पूरी प्रक्रिया को मुख्यतः दो बड़े चरणों में बांटा जाता है। इस संयंत्र की वास्तविक भूमिका और महत्व को समझने के लिए इन दोनों चरणों को जानना बेहद जरूरी है।

1 फ्रंट-एंड (फैब्रिकेशन/वेफर फैब्रिकेशन):  यह चरण सेमीकंडक्टर निर्माण का सबसे जटिल, महंगा और अत्याधुनिक हिस्सा माना जाता है। इसमें शुद्ध सिलिकॉन के पिंडों (इंगॉट) से बेहद पतले वेफर तैयार किए जाते हैं। इन वेफर्स पर नैनोमीटर स्तर (जैसे 3nm, 5nm) पर फोटोलिथोग्राफी, एचिंग, डोपिंग और डिपोजिशन जैसी उन्नत तकनीकों की मदद से सूक्ष्म ट्रांजिस्टर, सर्किट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक घटक बनाए जाते हैं।

यह उच्च तकनीकी निर्माण प्रक्रिया विश्व की अग्रणी कंपनियां जैसे TSMC (ताइवान), इंटेल (अमेरिका) और सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स (दक्षिण कोरिया) संचालित करती हैं। इस चरण में अरबों डॉलर का निवेश, अत्यंत नियंत्रित और स्वच्छ क्लीनरूम वातावरण, तथा अत्याधुनिक मशीनरी की आवश्यकता होती है।

2 बैक – एंड ( ATMP / असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग, पैकेजिंग – OSAT): सेमीकंडक्टर निर्माण का दूसरा प्रमुख चरण ‘असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग’ (ATMP) है। इसमें वेफर से अलग किए गए सूक्ष्म चिप्स (डाई) को सावधानीपूर्वक असेंबल किया जाता है, उनकी गुणवत्ता और प्रदर्शन की कठोर जांच (टेस्टिंग) की जाती है, फिर उन्हें मार्क कर सुरक्षित पैकेजिंग के माध्यम से अंतिम उत्पाद के रूप में तैयार किया जाता है।

यह चरण पूरी वैल्यू चेन का लगभग 30–40% हिस्सा माना जाता है। इसके लिए कुशल तकनीकी जनशक्ति, अत्याधुनिक स्वचालित परीक्षण प्रणाली और उन्नत पैकेजिंग तकनीकों की आवश्यकता होती है।

उल्लेखनीय है कि माइक्रोन टेक्नोलॉजी के सानंद स्थित संयंत्र में वेफर निर्माण (फैब्रिकेशन) नहीं होता। यहां माइक्रोन के वैश्विक निर्माण केंद्रों अमेरिका, सिंगापुर, ताइवान आदि में तैयार उन्नत DRAM (डायनेमिक रैंडम एक्सेस मेमोरी) और NAND (फ्लैश मेमोरी) वेफर्स को प्रोसेस कर अंतिम मेमोरी उत्पादों में बदला जाता है।

यह संयंत्र AI, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, डेटा सेंटर, स्मार्टफोन, सर्वर, ऑटोमोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए अत्याधुनिक मेमोरी और स्टोरेज समाधान तैयार करेगा, जिससे भारत की तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला को वैश्विक स्तर पर मजबूती मिलेगी।

ATMP कार्यप्रणाली:

जब सिलिकॉन वेफर किसी फैक्ट्री में बनकर तैयार होता है, तो उसे सीधे किसी मशीन या डिवाइस में नहीं लगाया जा सकता। वह उस समय सिर्फ कच्चे माल की तरह होता है। ATMP प्लांट में इसके बाद चार मुख्य प्रक्रियाएँ की जाती हैं।

1 संयोजन : एक बड़ी सिलिकॉन वेफर को डायमंड : एक खास मशीन (सॉ) की मदद से वेफर को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है, जिन्हें चिप या डाई कहा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को डाइसिंग कहते हैं। इसके बाद इन चिप्स को एक सुरक्षित बेस (सब्सट्रेट) पर लगाया जाता है, ताकि उन्हें आसानी से इलेक्ट्रॉनिक सर्किट से जोड़ा जा सके।

2 परीक्षण : प्रत्येक चिप की कार्य क्षमता इसके बाद चिप की जाँच की जाती है। देखा जाता है कि क्या यह ज्यादा तापमान सहन कर सकती है? क्या इसकी डेटा स्पीड सही और पर्याप्त है?

अगर चिप में कोई भी सामान्य खराबी या कमी मिलती है, तो उसे तुरंत रिजेक्ट कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया का मकसद यही होता है कि ग्राहकों तक सिर्फ अच्छी और बेहतरीन क्वालिटी वाली चिप्स ही पहुँचें।

3 मार्किंग: जो चिप्स टेस्ट में पास हो जाती हैं, उन पर लेजर की मदद से कंपनी का नाम (जैसे माइक्रोन), बैच नंबर और बाकी जरूरी तकनीकी जानकारी लिखी जाती है।

4 पैकेजिंग : यह आखिरी चरण होता है। चिप बहुत नाजुक और संवेदनशील होती है, इसलिए उसे नमी, धूल और दूसरी बाहरी चीजों से बचाने के लिए प्लास्टिक, सिरेमिक या एपॉक्सी रेजिन की परत में अच्छी तरह सील कर दिया जाता है। इसके बाद यही तैयार चिप हमें मोबाइल या लैपटॉप के मदरबोर्ड पर लगी हुई दिखाई देती है।

‘मेड इन इंडिया’ का कानूनी और कमर्शियल आधार

भारत में ‘मेड इन इंडिया‘ का कोई एक तय और सभी पर लागू होने वाला कानून नहीं है। अलग-अलग सेक्टर और सरकारी योजनाओं के हिसाब से इसके नियम तय किए जाते हैं।

सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में यह तय करने के लिए कि कोई उत्पाद ‘मेड इन इंडिया’ है या नहीं, कुछ खास मानकों और शर्तों के आधार पर वर्गीकरण किया जाता है।

इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) और संशोधित ATMP/ओसैट योजना:

इस परियोजना को इस योजना के तहत मंजूरी मिल चुकी है। योजना में साफ कहा गया है कि ATMP और आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (ओसैट) जैसी सुविधाएँ भी सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का अहम हिस्सा हैं।

इस योजना के तहत मंजूर परियोजनाओं को केंद्र सरकार से 50% तक वित्तीय मदद मिलती है और राज्य सरकार की तरफ से अलग से प्रोत्साहन दिया जाता है (जैसे गुजरात में 20%)। यह आर्थिक सहायता तभी मिलती है जब परियोजना भारत में लगाई जाए और उसका उत्पादन स्वदेशी यानी देश में बना हुआ माना जाए।

वैल्यू एडिशनऔर मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस का स्थान: सेमीकंडक्टर की पूरी वैल्यू चेन में ATMP/OSAT चरण करीब 30–40% तक वैल्यू एड करता है। इसी स्टेज पर असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग जैसे अहम काम होते हैं। इसके लिए खास तकनीकी विशेषज्ञता, एडवांस टेस्टिंग सिस्टम और क्लीनरूम जैसी आधुनिक सुविधाओं की जरूरत होती है।

माइक्रोन के मामले में ये सभी प्रक्रियाएँ भारत में की जाती हैं, इसलिए तैयार प्रोडक्ट को भारतीय उत्पाद माना जाता है। भले ही वेफर विदेश से आते हों, लेकिन अंतिम उत्पाद जैसे SSD या DRAM मॉड्यूल पर मुख्य और महत्वपूर्ण काम भारत में ही होता है।

सरकारी योजनाओं में वर्गीकरण: ATMP/OSAT को ISM और सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के तहत सेमीकंडक्टर निर्माण का ही हिस्सा माना जाता है। जब इस परियोजना को मंजूरी दी गई थी, तब सरकार ने साफ कहा था कि इस प्लांट में बने उत्पादों को ‘मेड इन इंडिया’ के नाम से बेचा और निर्यात किया जाएगा।

प्लांट के उद्घाटन के बाद जारी रिपोर्टों और सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों में भी इसका जिक्र है, जहाँ इसे ‘भारत में बना पहला सेमीकंडक्टर मेमोरी मॉड्यूल’ बताया गया है।

वैश्विक प्रथा और भारतीय नीति: दुनिया के कई देशों में ATMP/OSAT को ही घरेलू उत्पादन माना जाता है। जैसे मलेशिया और वियतनाम में OSAT सुविधाओं को वहीं का मैन्युफैक्चरिंग माना जाता है।

भारत में भी ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य के तहत यह जोर दिया जाता है कि वैल्यू चेन का एक बड़ा और अहम हिस्सा देश के अंदर विकसित हो। भले ही शुरुआती कच्चा माल बाहर से आता हो, लेकिन अगर मुख्य प्रोसेस और वैल्यू एडिशन भारत में हो रहा है, तो उसे घरेलू उत्पादन ही माना जाता है।

बिना किसी मिलावट के भी ‘मेड इन इंडिया’ क्यों?

निर्माण प्रक्रिया के बिना भी महत्वपूर्ण वैल्यू एडिशन : ATMP में बेहद कुशल कर्मचारियों, आधुनिक मशीनों और क्लीनरूम जैसी उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया से उत्पाद की लागत और उसकी बाजार कीमत दोनों में अच्छा-खासा इजाफा होता है। सरकारी योजनाओं में भी इसे सेमीकंडक्टर निर्माण का अहम और जरूरी हिस्सा माना गया है।

सरकारी प्रोत्साहनों की संरचना: ATMP/OSAT के लिए संशोधित योजना में 50% तक केंद्र सरकार की सहायता और 50% तक राज्य सरकार की मदद का प्रावधान है। इससे साफ पता चलता है कि सरकार इसे स्वदेशी उत्पादन का हिस्सा मानती है। अगर इसे ‘मेड इन इंडिया’ नहीं माना जाता, तो इतनी बड़ी आर्थिक मदद और प्रोत्साहन देने का कोई मतलब ही नहीं बनता।

व्यापार और निर्यात के दृष्टिकोण से: इस प्लांट में बने उत्पादों को भारतीय उत्पाद के तौर पर विदेशों में निर्यात किया जा सकता है, जिससे देश के व्यापार संतुलन को बेहतर करने में मदद मिलती है। इन्हें ‘मेड इन इंडिया’ के रूप में पेश करने से ब्रांड की पहचान मजबूत होती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुँच बनाना भी आसान हो जाता है।

भविष्य की रणनीति: भारत अभी कम निवेश और कम जोखिम वाले ATMP/OSAT सेक्टर पर ध्यान देकर सेमीकंडक्टर की वैल्यू चेन में कदम रख रहा है। इससे आगे चलकर बड़े मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने की मजबूत नींव तैयार होगी। इसी वजह से सरकार इसे एक पूरा और मान्य उत्पाद मानती है।

माइक्रोन टेक्नोलॉजी का सानंद ATMP प्लांट ‘मेड इन इंडिया‘ माना जाता है, क्योंकि इसमें असेंबली से लेकर पैकेजिंग तक का ज्यादातर वैल्यू एडिशन भारत में ही होता है। यह परियोजना ISM (भारत सेमीकंडक्टर मिशन) के तहत मंजूर है और इसे सरकारी प्रोत्साहन भी मिलते हैं।

यह वर्गीकरण भारत की लंबी रणनीति का हिस्सा है, पहले बैक-एंड क्षमताएँ मजबूत करना और फिर फ्रंट-एंड मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ना। इससे देश को आयात कम करने, निर्यात बढ़ाने और आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। यह एक सोच-समझकर उठाया गया व्यावहारिक और रणनीतिक कदम है, जो भारत को भविष्य में वैश्विक सेमीकंडक्टर हब बनाने की दिशा में आगे बढ़ाता है।

देश और गुजरात के लिए संभावित लाभ और रणनीतिक महत्व

माइक्रोन टेक्नोलॉजी के सानंद ATMP प्लांट का उद्घाटन भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के लिए एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम है। यह प्लांट सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं है, बल्कि देश और राज्य दोनों के लिए आर्थिक, औद्योगिक, रोजगार, तकनीकी और रणनीतिक फायदों के नए दरवाजे खोल रहा है।

आर्थिक लाभ

आयात पर निर्भरता में कमी: अभी भारत अपनी जरूरत की लगभग सभी मेमोरी चिप्स जैसे DRAM और NAND पूरी तरह आयात करता है। इनमें से बड़ा हिस्सा चीन, ताइवान, कोरिया और अमेरिका जैसे देशों से आता है।

यह नया प्लांट भारत में ही मेमोरी मॉड्यूल जैसे SSD, DDR5, LPDDR5, HBM और NAND फ्लैश का निर्माण शुरू करेगा। इससे आयात पर निर्भरता काफी कम होगी। नतीजतन, देश का आयात बिल घटेगा, व्यापार घाटा कम होगा और विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी।

निर्यात और विदेशी मुद्रा में वृद्धि : इस प्लांट में होने वाला उत्पादन मुख्य रूप से वैश्विक बाजार को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डेटा सेंटर, क्लाउड कंप्यूटिंग, स्मार्टफोन और ऑटोमोबाइल सेक्टर में हाई-परफॉर्मेंस मेमोरी की माँग तेजी से बढ़ रही है।

माइक्रोन टेक्नोलॉजी के इस प्लांट से बनने वाले उत्पाद विदेशों में निर्यात किए जाएँगे। इससे भारत को विदेशी मुद्रा प्राप्त होगी और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

औद्योगिक गुणक प्रभाव: यह प्लांट सिर्फ अपने भीतर ही रोजगार नहीं देगा, बल्कि इसके आसपास की कई कंपनियों और सेक्टरों को भी काम मिलेगा। जैसे लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग सामग्री सप्लायर, टेस्टिंग उपकरण बनाने वाली कंपनियाँ, क्लीनरूम तकनीक देने वाले सप्लायर, बिजली और जल प्रबंधन से जुड़ी कंपनियाँ। इससे गुजरात और आसपास के इलाकों में नए उद्योग और सेवा क्षेत्र विकसित होंगे, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बड़ा फायदा मिलेगा।

रोजगार और कौशल विकास

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार: जब यह प्लांट पूरी क्षमता से काम करेगा, तब यहाँ करीब 5000 सीधे रोजगार के मौके बनेंगे। इनमें ऑपरेटर, तकनीशियन, इंजीनियर और क्वालिटी कंट्रोल स्टाफ जैसी नौकरियाँ शामिल होंगी। इनमें से ज्यादातर पद स्थानीय युवाओं के लिए होंगे।

इसके अलावा करीब 15,000 अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा होंगे, जैसे सप्लाई चेन, ट्रांसपोर्ट, कैंटीन, सुरक्षा और मेंटेनेंस से जुड़े काम। इससे आसपास के इलाके में रोजगार के बड़े अवसर तैयार होंगे।

कौशल विकास और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण : यह प्लांट आधुनिक क्लीनरूम तकनीक, ऑटोमैटिक टेस्टिंग सिस्टम, एडवांस पैकेजिंग और सख्त क्वालिटी कंट्रोल जैसी प्रक्रियाओं में प्रशिक्षण देगा।

इससे हजारों युवाओं को हाई-टेक और उच्च स्तर का कौशल सीखने का मौका मिलेगा। आगे चलकर यही ट्रेनिंग उन्हें दूसरे सेमीकंडक्टर प्लांट्स में काम करने के लिए भी तैयार करेगी।

गुजरात के लिए विशेष लाभ

सेमीकंडक्टर हब के रूप में स्थापना : सानंद अब धीरे-धीरे भारत के सेमीकंडक्टर हब के रूप में पहचान बना रहा है। इससे गुजरात में और भी सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों जैसे फैब्रिकेशन यूनिट्स, डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी प्लांट्स के आने की संभावना बढ़ गई है।

औद्योगिक विकास और अवसंरचना : इस प्लांट के आसपास बिजली, पानी, सड़कें, लॉजिस्टिक्स पार्क और क्लीनरूम सप्लायर जैसी सुविधाओं का विकास होगा। इससे आसपास के इलाकों में एक पूरा औद्योगिक क्लस्टर तैयार होगा, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था और उद्योगों के लिए नए अवसर खोलेगा।

राज्य के राजस्व में वृद्धि : इससे राज्य के राजस्व में बढ़ोतरी होगी जैसे GST, कॉरपोरेट टैक्स, रोजगार से और निर्यात से। गुजरात सरकार ने 20% तक का प्रोत्साहन भी दिया है, जिसका लंबी अवधि में फायदा बहुत बड़ा होगा।

सहायक उद्योगों का विकास : तेल के बाद भारत अभी सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा इलेक्ट्रॉनिक्स के आयात पर खर्च करता है। चिप्स की पैकेजिंग अगर देश के भीतर ही होती है, तो स्मार्टफोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) जैसी चीजों की उत्पादन लागत घट जाएगी। इससे सीधे तौर पर आम लोगों को भी फायदा मिलेगा।

आज के समय में सेमीकंडक्टर एक बड़ा अवसर बन गया है। जिसके पास चिप्स हैं, वही ताकत रखता है। चीन और ताइवान के बीच बढ़ते तनाव के चलते दुनिया अब एक भरोसेमंद और सुरक्षित सप्लाई चेन की तलाश में है।

माइक्रोन टेक्नोलॉजी का सानंद ATMP प्लांट यह साबित करेगा कि भारत हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग के लिए पूरी तरह तैयार है। इससे भविष्य में एप्पल, टेस्ला और अन्य बड़ी कंपनियों के लिए भारत में निवेश और उत्पादन करना आसान होगा।

सानंद संयंत्र सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता, औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन, कौशल विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक नई शुरुआत है। यह गुजरात को सेमीकंडक्टर हब के रूप में स्थापित कर रहा है और देश को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे ला रहा है।

यह कदम ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को हकीकत में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले सालों में इस संयंत्र का असर भारत की अर्थव्यवस्था और वैश्विक स्तर पर उसकी स्थिति में साफ नजर आएगा।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजरात में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)








हिंदू घृणा में चूर मृणाल पांडे की ‘द्रौपदी’ की छवि बिगाड़ने की कोशिश, पोल खुलने पर सनातनी विद्वान को किया ब्लॉक: वामपंथी मानसिकता की असलियत आई सामने

कॉन्ग्रेसी नेशनल हेराल्ड की पत्रकार मृणाल पांडे की हिंदू घृणा छिपाए नहीं छिपती, वह बार-बार सामने आ ही जाती है। ताजा मामले में उन्होंने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करते हुए महाभारत की ‘द्रौपदी’ की छवि बिगाड़ने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर जैसे ही उनकी टिप्पणी वायरल हुई, लोगों ने उनके दावे पर सवाल उठाने शुरू कर दिए और पुराणों व महाभारत के संदर्भों के साथ तथ्य सामने रखे।

लेकिन जैसे ही मृणाल पांडे एक्सपोज होने लगी, तो उन्होंने सवाल पूछने वालों को ही ब्लॉक करना शुरू कर दिया। यह वही वामपंथी सोच है जिसमें पहले एकतरफा नैरेटिव गढ़ा जाता है, फिर जब सच सामने आता है तो असहमति की आवाज दबाने की कोशिश की जाती है।

पहले मृणाल पांडे ने रश्मिका के संदर्भ में ‘द्रौपदी’ पर कसा तंज

दरअसल, साउथ एक्ट्रेस रश्मिका मंदाना और एक्टर विजय देवरकोंडा की शादी की फोटो पर एक यूजर ने लिखा था कि यह जोड़ी ‘महाभारत के द्रौपदी और अर्जुन’ जैसी वाइब्स दे रहा है। इसी पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए मृणाल पांडे ने एक तरफ से महाभारत की सभी स्त्रियों को निशाना बनाते हुए कहा, “उम्मीद है कि दुल्हन की किस्मत द्रौपदी, कुंती, गांधारी, तारा, मंदोदरी, अहिल्या से बहुत अलग होगी।”

मृणाल की बात का जवाब देते हुए ‘एक्स’ यूजर नमिता बाल्यान ने महाभारत की इन सभी स्त्रियों के प्रभावशाली व्यक्तित्व की जानकारी दी। नमिता ने कहा, “द्रौपदी, कुंती, गाँधारी, तारा, मंदोदरी और अहिल्या सभी बेहद शक्तिशाली, साहसी, धैर्यवान और अपने समय की बहुत महत्वपूर्ण महिलाएँ थीं। उनका योगदान सिर्फ उनके विवाह या वैवाहिक जीवन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी मजबूती और समझदारी का परिचय दिया।”

मृणाल को जवाब देते हुए नमिता कहती हैं, “ऐसी महान महिलाओं को केवल उनकी ‘शादी’ के आधार पर आँकना न सिर्फ अधूरी जानकारी दिखाता है, बल्कि उनकी भूमिका को छोटा करने जैसा है। यह सोच खुद में पिछड़ी हुई है, जबकि पोस्ट करने वाला व्यक्ति खुद को प्रगतिशील बताने की कोशिश कर रहा था।”

अहंकारी मृणाल ने द्रौपदी को गलत रूप में किया पेश

मृणाल पांडे का अहंकार ‘द्रौपदी’ का नाम गलत संदर्भ में पेश करने तक भी शांत नहीं हुआ, तो उन्होंने गलत धारणाएँ बनाकर महाभारत और द्रौपदी की छवि को तोड़-मरोड़कर पेश करना शुरू कर दिया है। मृणाल ने द्रौपदी को ‘चिदग्निकुंड सम भूता’ कहा, यानी उनके अनुसार ‘द्रौपदी’ भीतर की प्रचंड अग्नि से उत्पन्न हुई थीं।

नमिता के कमेंट पर जवाब देते हुए मृणाल लिखती हैं, “इसने उनके कीमती और युवा वर्षों को जरूर प्रभावित किया होगा। इतना बड़ा आघात मन पर गहरी छाप छोड़ गया होगा। उदाहरण के तौर पर द्रौपदी को चिदग्निकुंड सम भूता कहा गया है, यानी वह भीतर की प्रचंड अग्नि से उत्पन्न हुई थीं। इसका मतलब है कि उनके व्यक्तित्व में अंदर की आग, आक्रोश और आत्मसम्मान की तीव्र शक्ति दिखाई देती है।”

मृणाल की गलत धारणाओं का सामने आया सच

मृणाल पांडे की महाभारत और द्रौपदी को लेकर तोड़-मरोड़कर पेश किए गए तथ्यों पर जब हिंदू संस्कृत स्कॉलर नित्यानंद मिश्रा ने सच्चाई सामने रखी तो यह उन्हें रास नहीं आया। उन्होंने विस्तार से बताया कि द्रौपदी के बारे में जो दावा किा गया, वह न तो महाभारत के मूल पाठ में मिलता है और न ही उसके प्रामाणिक संस्करणों में।

मिश्रा ने साफ कहा कि महाभारत के क्रिटिकल एडिशन में कहीं भी द्रौपदी को ‘चिदग्निकुण्डसम्भूता’ नहीं कहा गया है। यह शब्द महाभारत का नहीं है। उन्होंने समझाया कि ‘चिदग्निकुण्डसम्भूता’ शब्द दरअसल ‘देवी ललिता’ के लिए आता है, जिसका उल्लेख ललिता सहस्ननाम में मिलता है और जिसे ब्राह्माण्ड पुराण से जोड़ा जाता है। यानी जिस शब्द को द्रौपदी से जोड़कर पेश किया गया, उसका महाभारत से कोई संबंध ही नहीं है।

नित्यानमंद मिश्रा ने यह भी बताया कि इस शब्द का अर्थ भी गलत बताया गया। चित या चिद का अर्थ ‘चेतना’ होता है, न कि भीतर का क्रोध। ‘चिदग्निकुण्डसम्भूता’ का सही अर्थ है चेतना की अग्नि की वेदी से उत्पन्न। इसे भीतर की प्रचंड आक्रोश की आग से जन्मी बताया संस्कृत के मूल अर्थ को बदल देना है।

उन्होंने विद्वानों के अनुवाद और पारंपरिक व्याख्याओं को हवाला देते हुए कहा कि संस्कृत ग्रंथों के शब्दों का अर्थ संदर्भ और परंपरा के आदार पर समझना चाहिए, मनमाने ढंग से नहीं।

यह सच सामने आने के बाद मृणाल पांडे का हिंदुओं और उनके इतिहास को गलत तरीके से पेश करने वाला नैरेटिव नही ढहता नजर आया। इसके बाद अपनी टिप्पणी को सुधारने, माफी माँगने या पोस्ट डिलीट करने के बजाए उन्होंने नित्यानंद मिश्रा को ही ब्लॉक कर दिया।

कंगना से कफील खान तक: मृणाल पांडे की हिंदू-घृणा की लिस्ट

ये वही मृणाल पांडे हैं, जो एक महिला के चुनावी मैदान में उतरने पर गाली देती हैं। जब कंगना रनौत को बीजेपी ने मंडी लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया, तो यही पांडे ने ‘मंडी में सही रेट मिलता है?’ जैसा आपत्तिजनक इशारा कर दिया। खुद को नारीवादी बताने वाली पांडे का नारीवाद बीजेपी को निशाना बनाने के सामने गिर गया और उन्होंने महिला को निशाना बनाना चुना, जो बीजेपी का चेहरा है।

दूसरी तरफ जब गोरखपुर के BRD मेडिकल कॉलेज कांड के आरोपित रहे कफील खान जेल से बाहर आए, तो मृणाल पांडे की खुशी छिपाए नहीं छिपी। उन्होंने खान की तुलना भगवान श्रीकृष्ण से कर डाली। जिस मामले में मासूम बच्चों की मौत हुई, उसमें आरोपी रहे व्यक्ति को भगवान से जोड़ना लोगों को बेहद आपत्तिजनक लगा। तब भी पांडे नहीं हिचकिचाई।

उनकी हिंदू-घृणा यहीं खत्म नहीं होती। कोलकाता पोर्ट का नाम श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर रखे जाने के बाद भी पांडे ने जहर उगला था। पांडे ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम ‘बंदर‘ से जोड़ा। इतना ही नहीं एक बार महाकाल के दर्शन करने वाले सिख नेता का मजाक उड़ाते हुए पांडे ने कहा कि स्वर्ण मंदिर कब जाओगे?

झूठ फैलाओ, सवाल उठे तो ब्लॉक करो: वामपंथियों का तय पैटर्न

मृणाल पांडे का ताजा मामला केवल एक बयान का विवाद नहीं है, बल्कि उस सोच की झलक है जो लंबे समय से वामपंथी इकोसिस्टम में देखने को मिलती रही है। पहले आधी अधूरी जानकारी के आधार पर नैरेटिव बनाया जाता है, हिंदू धर्म और परंपराओं पर सवाल खड़े किए जाते हैं और उसे प्रगतिशील बहस का नाम दिया जाता है। लेकिन जैसे ही कोई तथ्य और ग्रंथों के संदर्भ के साथ जवाब देता है, वही लोग असहज हो जाते हैं। बहस करने का दावा करने वाले अचानक संवाद से पीछे हटते नजर आते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में भी यही देखने को मिला। जब तक उनकी बात पर सवाल नहीं उठे, तब तक सोशल मीडिया पर बयान जारी रहे। लेकिन जैसे ही संस्कृत विद्वानों और आम लोगों ने प्रमाणों के साथ गलतियाँ बताई, जवाब देने के बजाए ब्लॉक करने का रास्ता चुना गया। यह वामपंथी विमर्श का पुराना तरीका है। पहले आरोप लगाओ, फिर विरोध होने पर खुद को पीड़ित दिखाओ और आखिर में असहमति की आवाज ही बंद कर दो।

यही वजह है कि इसे प्रतिशोध की राजनीति कहा जाता है। जब तर्क खत्म हो जाते हैं तो बहस भी खत्म कर दी जाती है और सामने को ही गायब कर दिया जाता है। गलत सूचना फैलाने के लिए कोई माफी नहीं, कोई पछतावा नहीं। मृणाल पांडे का मामला भी उसी पैटर्न की एक और मिसाल बन गया, जहाँ सवालों का जवाब देने के बजाए सवाल पूछने वालों को ब्लॉक कर दिया गया। यह दिखाता है कि झूठ फैलाने वाले वामपंथी, असलियत सामने आते ही कितनी आसानी से पीछे हट जाते हैं।

हिंद महासागर में चीन की घेराबंदी की तैयारी कर रहा भारत, अंडमान-निकोबार में ₹15000 करोड़ के प्रोजेक्ट को मंजूरी: जानें- मलक्का स्ट्रेट में कैसे बदलेगा खेल

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में भारत ने बड़े स्तर पर हवाई ढाँचे के विस्तार की योजना शुरू कर दी है। इस योजना का मकसद एक ओर पर्यटन और विकास को बढ़ावा देना है, तो दूसरी ओर हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों का जवाब देना भी है। द्वीप समूह के प्रशासक एडमिरल डीके जोशी ने शुक्रवार (27 फरवरी 2026) को दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान इस पूरी योजना की टाइमलाइन और उद्देश्य को स्पष्ट किया।

ग्रेट निकोबार में बनेगा नया हवाई अड्डा

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह नया हवाई अड्डा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी हिस्से ग्रेट निकोबार द्वीप पर बनाया जाएगा। यह स्थान मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) से करीब 40 समुद्री मील (Nautical Miles) की दूरी पर है। मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है और यहाँ से वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। चीन के अधिकतर ऊर्जा आयात भी इसी मार्ग से आते हैं।

करीब 15,000 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाला यह हवाई अड्डा 2 रनवे वाला होगा और यहाँ बड़े सैन्य और नागरिक विमान उतर सकेंगे। एडमिरल जोशी ने कहा कि योजना के अनुसार लगभग 3 साल में यहाँ से पहली उड़ान शुरू हो जाएगी। यह परियोजना रक्षा मंत्रालय के मार्गदर्शन में आगे बढ़ाई जा रही है।

2 मौजूदा सैन्य हवाई पट्टियों का होगा विस्तार

नई परियोजना के साथ-साथ द्वीप समूह में मौजूद दो नौसैनिक हवाई अड्डों के रनवे को भी बढ़ाया जा रहा है। इनमें उत्तरी अंडमान द्वीप के डिगलीपुर स्थित INS कोहासा और ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे के पास स्थित INS बाज शामिल हैं। ये दोनों अड्डे द्वीप समूह के उत्तरी और दक्षिणी छोर पर स्थित हैं और लगभग 750 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में फैले हुए हैं।

एडमिरल जोशी ने बताया कि इन दोनों हवाई पट्टियों को जल्द ही लगभग 3 किलोमीटर लंबा बना दिया जाएगा ताकि भारी सैन्य विमान भी आसानी से उतर सकें। इनका उपयोग सैन्य और कमर्शियल दोनों तरह की उड़ानों के लिए किया जाएगा।

श्री विजय पुरम एयरपोर्ट का होगा विस्तार

एडमिरल जोशी का कहना है कि द्वीप समूह की राजधानी श्री विजय पुरम (पहले पोर्ट ब्लेयर) के हवाई अड्डे पर अभी कई बाधाएँ हैं। वहाँ अभी केवल एक दिशा से ही विमान उतर और उड़ान भर सकते हैं। इस समस्या को देखते हुए भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने मौजूदा हवाई अड्डे के दक्षिण में एक नया स्थान चुना है।

इसमें 2-3 किलोमीटर लंबे रनवे और एक समानांतर टैक्सी ट्रैक बनाया जाएगा। इसके चलते इसकी संचालन क्षमता काफी बढ़ जाएगी। इसके अलावा ग्रेट निकोबार में बनने वाला ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा भी 2 रनवे वाला होगा। हालाँकि, पहले चरण में केवल एक 3 किलोमीटर लंबा रनवे बनाया जाएगा।

पर्यावरणीय और कानूनी पहलू

ग्रेट निकोबार परियोजना एक पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। चिंगेनह में जहाँ यह हवाई अड्डा विकसित किया जाना है वो उन गाँवों में से एक है जिन्हें 2004 की सुनामी के बाद खाली कराया गया था।

इस परियोजना को लेकर मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक पहुँचा था। अधिकरण ने अपने फैसले में कहा कि पर्यावरण मंजूरी की शर्तों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं और हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है। इसके बाद परियोजना को स्वीकृति मिल गई थी।

चीन पर काबू पाने में मिलेगी मदद

मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है। यह संकरा समुद्री रास्ता हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है और इसी के जरिए एशिया, यूरोप, मध्य-पूर्व और अफ्रीका के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार होता है। अनुमान है कि वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग एक तिहाई हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है।

भौगोलिक दृष्टि से यह मलक्का जलडमरूमध्य, मलेशिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया के बीच स्थित है। इसकी चौड़ाई कुछ स्थानों पर केवल 2.8 किलोमीटर तक रह जाती है, जिससे यह क्षेत्र सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील बन जाता है। यदि किसी कारणवश यह मार्ग अवरुद्ध हो जाए तो पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंखला पर तत्काल और गहरा प्रभाव पड़ सकता है। इसी वजह से दुनिया की बड़ी शक्तियाँ इस क्षेत्र पर करीबी नजर रखती हैं।

पिछले एक दशक में चीन ने अपनी समुद्री शक्ति में उल्लेखनीय विस्तार किया है। चीन की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया और अफ्रीका से आता है, जो मलक्का जलडमरूमध्य के रास्ते ही चीन पहुँचता है। इस निर्भरता को कई विश्लेषक ‘मलक्का दुविधा‘ (Malacca Dilemma) के रूप में देखते हैं यानि अगर इस मार्ग पर नियंत्रण या अवरोध हो जाए तो चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर संकट आ सकता है।

भारत के लिए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है क्योंकि ये द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य की पश्चिमी एंट्री के निकट स्थित हैं। भौगोलिक रूप से देखें तो भारत इन द्वीपों के माध्यम से उस समुद्री मार्ग के बेहद करीब मौजूद है, जहाँ से एशिया का विशाल व्यापारिक यातायात गुजरता है।

भारत ने इन द्वीपों पर पहले से ही त्रि-सेवा कमान (Andaman and Nicobar Command) स्थापित कर रखी है जो सेना, नौसेना और वायुसेना की संयुक्त कमांड है। अब यदि यहाँ हवाई पट्टियों का विस्तार और लॉजिस्टिक सुविधाओं का विकास किया जा रहा तो यह भारत की समुद्री निगरानी क्षमता को कई गुना तक बढ़ा सकता है।

अंडमान-निकोबार में सैन्य ढाँचे के विस्तार से भारत की समुद्री निगरानी, पनडुब्बी-रोधी क्षमता, त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया और रणनीतिक प्रतिरोध (Deterrence) की क्षमता में वृद्धि हो सकती है। इससे भारत न केवल चीनी गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी रख सकेगा बल्कि हिंद महासागर में अपनी भूमिका को भी अधिक सशक्त और निर्णायक बना पाएगा।

इसके साथ ही, समुद्र के नीचे बिछी कम्युनिकेशन केबलों की सुरक्षा भी मजबूत होगी। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए भी यह कदम महत्वपूर्ण है क्योंकि वे भारत को क्षेत्र में संतुलन कायम रखने वाली ताकत के रूप में देखते हैं।

हवाई अड्डों के साथ-साथ द्वीप के समग्र विकास की योजना

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सिर्फ हवाई अड्डे ही नहीं बनाए जा रहे हैं बल्कि पूरे द्वीपों को विकसित करने की बड़ी योजना चल रही है। एडमिरल जोशी ने बताया कि यहाँ बंदरगाहों को बेहतर बनाया जा रहा है, तेल की खोज पर काम हो रहा है, दूरसंचार यानी मोबाइल और इंटरनेट कनेक्शन मजबूत किए जा रहे हैं और पर्यटन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

इन सभी कामों का मकसद है कि द्वीप आर्थिक रूप से मजबूत बनें और देश की सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभा सकें। यहाँ हवाई अड्डों और सैन्य अड्डों का विस्तार भारत की सेना को आधुनिक और मजबूत बनाने की योजना का हिस्सा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते हालात को देखते हुए यह कदम भारत की रणनीतिक ताकत बढ़ाने में मदद करेगा।

अगले 3 साल में जब नई उड़ानें शुरू होंगी तो इससे न सिर्फ इलाके का विकास होगा बल्कि देश की सुरक्षा भी और मजबूत होगी। यह परियोजना भविष्य में एक बड़ी उपलब्धि साबित हो सकती है।