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जिन जस्टिस यशवंत वर्मा ने ‘कैश कांड’ में दिया इस्तीफा, उन्होंने 13 पन्नों का लिखा पत्र: पढ़ें- अपने ऊपर लगे आरोपों का क्या दिया जवाब?

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा देकर न्यायिक गलियारों में खलबली मचा दी है। उन्होंने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेजकर तत्काल प्रभाव से पद छोड़ने की घोषणा की है। यह इस्तीफा उस समय आया है जब उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया चल रही थी।

पूरा विवाद 14 मार्च 2025 को उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास के एक स्टोररूम में लगी आग से शुरू हुआ था। आग बुझाने के दौरान वहाँ से भारी मात्रा में कैश बरामद हुआ था, जिसके बाद से उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे थे। जस्टिस यशवंत वर्मा ने अब ‘जजों की जाँच समिति’ को एक 13 पन्नों का विस्तृत पत्र लिखा है।

जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस पत्र में पूरी घटना को अपने खिलाफ एक सुनियोजित साजिश बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूरी जाँच प्रक्रिया में उनके अधिकारों का हनन किया गया और उन्हें अपनी बेगुनाही साबित करने का कोई उचित मौका भी नहीं दिया गया।

छुट्टियों के बीच लगी आग और साजिश का दावा

जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि जिस दिन यह घटना हुई, वे वहाँ मौजूद नहीं थे। वे 12 मार्च 2025 को होली की छुट्टियों के लिए दिल्ली से बाहर गए हुए थे। वे एक ऐसे दुर्गम इलाके में थे जहाँ मोबाइल नेटवर्क बहुत कम काम कर रहा था। उन्हें 15 मार्च की रात करीब सवा एक बजे आग लगने की सूचना मिली। तब तक फायर सर्विस और पुलिस ने न केवल आग बुझा दी थी, बल्कि वहाँ मौजूद कैश के Video भी रिकॉर्ड कर लिए थे।

जस्टिस वर्मा का कहना है कि उन्हें इन Video या कैश के बारे में कोई जानकारी पहले से नहीं थी। उनके वापस आने से पहले ही ये वीडियो Supreme Court की बेवसाइट पर डाल दिए गए। मीडिया में इस खबर को इस तरह पेश किया गया जैसे वह सारा पैसा उनका ही हो। जस्टिस यशवंत वर्मा ने सवाल उठाया कि जब वे वहाँ थे ही नहीं, तो उन्हें इस कैश के लिए जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है? उनके अनुसार, यह उन्हें सार्वजनिक रूप से बदनाम करने की एक कोशिश थी।

स्टोररूम का रहस्य और सुरक्षा में सेंध

जस्टिस यशवंत वर्मा ने उस स्टोररूम की बनावट और इस्तेमाल पर भी कई चौंकाने वाले फैक्ट्स रखे हैं। उन्होंने बताया कि वह स्टोररूम मुख्य घर और उनके ऑफिस से बिल्कुल अलग बना हुआ था। वहाँ जाने के लिए पीछे के गेट का इस्तेमाल होता था, जहाँ कोई सुरक्षा तैनात नहीं थी। इस कमरे का इस्तेमाल घरेलु कर्मचारी, मेंटेनेंस स्टाफ और बाहरी लोग पुराना सामान रखने के लिए करते थे। वहाँ अक्सर कबाड़, पुराने बर्तन और बागबानी के औजार रखे जाते थे।

जस्टिस यशवंत वर्मा के मुताबिक, वह कमरा अक्सर बिना ताले के रहता था और चाबी उनके पास नहीं होती थी। वे खुद दो साल में सिर्फ चार या पाँच बार ही उस कमरे में गए थे। सबसे अहम बात यह है कि स्टोररूम के बाहर एक CCTV कैमरा लगा था, लेकिन उसका कंट्रोल जज साहब के पास नहीं था। उन्होंने कई बार इस कैमरे की फुटेज माँगी ताकि सच सामने आ सके, लेकिन जाँच एजेंसियों ने उन्हें फुटेज देने से बार-बार मना कर दिया। जस्टिस वर्मा के अनुसार, उनके पास सुरक्षा का कोई नियंत्रण नहीं था, फिर भी उन्हें जवाबदेह ठहराया गया।

जाँच प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ और पक्षपात

जस्टिस वर्मा ने जाँच करने वाली समितियों (IHC और इन्क्वायरी कमेटी) की कार्यप्रणाली पर कड़े प्रहार किए हैं। उन्होंने बताया कि अगस्त 2025 में बनी कमेटी से पहले एक इन-हाउस कमेटी (IHC) ने जाँच की थी। उस समय गवाहों के बयान जस्टिस यशवंत वर्मा की अनुपस्थिति में दर्ज किए गए। उन्हें गवाहों से सवाल पूछने या जिरह करने का कोई मौका नहीं दिया गया। जस्टिस यशवंत वर्मा ने लिखा कि IHC की रिपोर्ट गोपनीय होनी चाहिए थी, लेकिन इसे सार्वजनिक कर दिया गया।

जस्टिस यशवंत वर्मा ने आरोप लगाया कि जाँच समिति ने सिर्फ उन्हीं सबूतों को चुना जो उनके खिलाफ जा सकते थे। जो सबूत जस्टिस यशवंत वर्मा के पक्ष में थे, उन्हें जानबूझकर हटा दिया गया। उदाहरण के तौर पर उन्होंने ‘आधिकारिक फायर रिपोर्ट’ का जिक्र किया। इस सरकारी रिपोर्ट में कहीं भी कैश मिलने का कोई जिक्र नहीं था। साथ ही रिपोर्ट दिखाती थी कि अधिकारी आग बुझने के काफी बाद तक वहाँ मौजूद थे। जस्टिस वर्मा ने जब इस रिपोर्ट को गवाहों के सामने पेश करना चाहा, तो समिति ने उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं दी।

गवाहों को हटाने का संदिग्ध पैटर्न

पत्र का एक बड़ा हिस्सा गवाहों के साथ हुए व्यवहार पर केंद्रित है। जस्टिस वर्मा ने बताया कि जाँच के दौरान कुल 54 गवाहों में से 27 को बिना कोई कारण बताए हटा दिया गया। इसमें दिल्ली फायर सर्विस और दिल्ली पुलिस के वे वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे, जिनकी गवाही से यह सच सामने आ सकता था कि कैश को लेकर क्या खेल हुआ। जिरह में यह बात सामने आई थी कि बड़े अफसरों ने रात 12:15 बजे ही तय कर लिया था कि वे कैश मिलने की बात सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं करेंगे।

जस्टिस यशवंत वर्मा का तर्क है कि उस समय तक तो उन्हें आग की खबर भी नहीं थी, तो इसमें उनकी मिलीभगत कैसे हो सकती है? जैसे ही यह तथ्य सामने आया, उन अधिकारियों को गवाहों की सूची से निकाल दिया गया। इसी तरह उनके 3 निजी सुरक्षा अधिकारियों (PSO) के मामले में भी खेल हुआ। जब जस्टिस वर्मा ने उनके मोबाइल लोकेशन और गूगल रिकॉर्ड्स की जाँच की माँग की ताकि उनके झूठ को पकड़ा जा सके, तो कमेटी ने तुरंत तीनों PSO को गवाह के रूप में हटा दिया।

साबित करने का उल्टा भार और इस्तीफा

जस्टिस यशवंत वर्मा ने बड़े दुख के साथ लिखा कि उनके 13 साल के न्यायिक करियर में उन पर कभी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। इस मामले में भी उन पर सीधे कोई आरोप या सबूत नहीं है। पूरी जाँच सिर्फ ‘अनुमानों’ और ‘इशारों’ पर आधारित है। उनसे यह उम्मीद की गई कि वह उन बातों को गलत साबित करें जो उन्होंने की ही नहीं। आमतौर पर अभियोजन को दोष साबित करना होता है, लेकिन यहाँ जज साहब से अपनी बेगुनाही का सबूत माँगा जा रहा था।

जस्टिस यशवंत वर्मा ने लिखा कि उनसे ‘मल्टीपल नेगेटिंव’ साबित करने को कहा गया, जो कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्हें लगा कि यह जाँच केवल उन्हें हटाने के मकसद से की जा रही है, न कि सच जानने के लिए। अंत में उन्होंने फैसला किया कि वह इस अपमानजनक और अन्यायपूर्ण प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बने रहेंगे। जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा देते हुए लिखा कि वह संस्था के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और आत्मसम्मान के लिए पद छोड़ रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इतिहास एक दिन उनके साथ हुए इस व्यवहार का हिसाब जरूर करेगा।

सल्फ्यूरिक एसिड पर कुंडली मार के बैठा चीन, मिडिल ईस्ट तनाव के बीच सप्लाई चेन की बंद: समझें- कैसे बढ़ेगी खाद्य महँगाई, जिसकी तपिश आप तक भी पहुँचेगी

दुनिया इस समय एक ऐसे आर्थिक और भू-राजनीतिक संकट से गुजर रही है, जहाँ एक क्षेत्र में हुआ तनाव पूरे वैश्विक बाजार को प्रभावित कर रहा है। मीडिल ईस्ट में ईरान से जुड़े हालात, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बाधित आवाजाही और कच्चे माल की सप्लाई में आई रुकावटों के बीच अब चीन ने एक बड़ा कदम उठाया है।

चीन ने संकेत दिया है कि वह मई 2026 से सल्फ्यूरिक एसिड के निर्यात पर लगभग पूरी तरह रोक लगा देगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पहले से ही सल्फर की कमी और कीमतों में उछाल से वैश्विक बाजार दबाव में है। इस कदम का असर सिर्फ केमिकल सेक्टर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद, धातु, कृषि और महँगाई तक इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिलेगा।

क्या है चीन का फैसला और क्यों है अहम?

चीन ने अपने घरेलू बाजार को प्राथमिकता देते हुए सल्फ्यूरिक एसिड के निर्यात को रोकने की तैयारी कर ली है। इस प्रतिबंध में केवल इलेक्ट्रॉनिक-ग्रेड सल्फ्यूरिक एसिड को छूट दी जाएगी, जबकि स्मेल्टर से बनने वाला एसिड और सल्फर आधारित एसिड निर्यात के दायरे से बाहर हो जाएँगे।

यह फैसला इसलिए बेहद अहम है क्योंकि चीन इस क्षेत्र का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। 2025 में उसने लगभग 4.6 मिलियन टन सल्फ्यूरिक एसिड निर्यात किया था। चिली, इंडोनेशिया, मोरक्को, सऊदी अरब और भारत जैसे देश इस पर काफी हद तक निर्भर हैं।

2026 की शुरुआत में ही चीन ने जनवरी से अप्रैल तक निर्यात कोटा लागू कर दिया था, जिससे सप्लाई पहले ही घट चुकी थी। अब पूरी तरह प्रतिबंध लगने से बाजार में अचानक बड़ा गैप पैदा हो सकता है। चीन का यह कदम यह भी दिखाता है कि जब वैश्विक संकट गहराता है, तो देश अपनी घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए वैश्विक सप्लाई चेन की परवाह कम करने लगते हैं।

मिडिल ईस्ट में संकट और सप्लाई चेन पर उसका असर

इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण मिडिल ईस्ट में चल रहा संघर्ष है। ईरान से जुड़े घटनाक्रम के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक रास्तों में से एक है, जहाँ से तेल, गैस और उनसे जुड़े उत्पादों की सप्लाई होती है।

सल्फर सल्फ्यूरिक एसिड का मुख्य कच्चा माल है और मुख्य रूप से तेल और गैस रिफाइनिंग से निकलता है। दुनिया के कुल सल्फर उत्पादन का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है और समुद्री व्यापार का लगभग आधा हिस्सा इसी क्षेत्र पर निर्भर करता है।

चीन खुद अपनी जरूरत का 50% से ज्यादा सल्फर आयात करता है और उसमें भी मिडिल ईस्ट की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बाधित हुआ, तो यह सप्लाई लगभग कट गई। इसका सीधा असर चीन के घरेलू बाजार पर पड़ा, जहाँ कच्चे माल की कमी और कीमतों में तेजी देखने को मिली।

यही वजह है कि चीन ने निर्यात रोककर अपनी आंतरिक जरूरतों को सुरक्षित करने का रास्ता चुना।

कीमतों में उछाल और वैश्विक बाजार पर दबाव

जैसे ही कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित हुई, सल्फर की कीमतों में तेज उछाल आया। इसका सीधा असर सल्फ्यूरिक एसिड पर पड़ा, जिसकी कीमतें भी तेजी से बढ़ने लगीं। अब चीन के निर्यात रोकने से यह दबाव और ज्यादा बढ़ने की संभावना है। सल्फ्यूरिक एसिड फॉस्फेट आधारित खाद बनाने में बेहद जरूरी होता है।

ऐसे में इसकी कमी का मतलब है कि खाद उत्पादन महँगा हो जाएगा। इससे वैश्विक स्तर पर कृषि लागत बढ़ेगी और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी असर पड़ेगा। इसके अलावा कॉपर माइनिंग में भी इसका महत्वपूर्ण उपयोग होता है। चिली जैसे देश, जो दुनिया के सबसे बड़े कॉपर उत्पादक हैं, वहाँ उत्पादन का बड़ा हिस्सा सल्फ्यूरिक एसिड पर निर्भर करता है।

सप्लाई में कमी आने से कॉपर उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे धातु बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं। पहले से ही कुछ देशों में कीमतों में तेज वृद्धि देखी जा रही है और यदि यह प्रतिबंध पूरे साल जारी रहता है, तो यह स्थिति और गंभीर हो सकती है।

इंडस्ट्री, कृषि और सप्लाई चेन पर गहराता संकट

यह संकट केवल एक उत्पाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक चेन रिएक्शन की तरह पूरी इंडस्ट्री को प्रभावित कर रहा है। सल्फर की कमी से उत्पादन लागत बढ़ती है, जिससे सल्फ्यूरिक एसिड महँगा होता है और फिर इसका असर खाद, केमिकल और मेटल इंडस्ट्री पर पड़ता है।

इस समय स्थिति और जटिल इसलिए है क्योंकि सप्लाई के पारंपरिक रास्ते बाधित हैं। मिडिल ईस्ट के प्रमुख बंदरगाह, जहाँ से सल्फर का निर्यात होता है, सभी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भर हैं। यदि यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है, तो सप्लाई में बड़ा अंतर पैदा हो सकता है।

चीन के पास भी सीमित स्टॉक है, जो केवल कुछ हफ्तों या महीनों तक ही चल सकता है। हालाँकि देश वैकल्पिक स्रोतों जैसे उत्तरी अमेरिका या पूर्वी एशिया से आयात बढ़ाने की कोशिश कर सकता है, लेकिन इतनी बड़ी कमी को पूरी तरह भर पाना आसान नहीं होगा।

इसके अलावा यह समय कृषि के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जब बुवाई के लिए खाद की माँग सबसे ज्यादा होती है। ऐसे में सप्लाई और डिमांड के बीच का अंतर और ज्यादा बढ़ सकता है।

भारत पर असर: महँगाई, खेती और उद्योग पर दबाव

भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है। भारत भी चीन से सल्फ्यूरिक एसिड आयात करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है, इसलिए इस फैसले का सीधा असर यहाँ देखने को मिलेगा। सबसे पहले फॉस्फेट आधारित खाद की कीमतों में बढ़ोतरी होगी। DAP जैसे खाद के उत्पादन में सल्फ्यूरिक एसिड की बड़ी भूमिका होती है।

इसकी कीमत बढ़ने से किसानों की लागत बढ़ेगी और खेती महँगी हो जाएगी। जब खेती की लागत बढ़ती है, तो इसका असर सीधे खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ता है। इससे आम लोगों के लिए महँगाई बढ़ सकती है। इसके अलावा केमिकल और मेटल इंडस्ट्री पर भी दबाव बढ़ेगा।

उत्पादन लागत बढ़ने से कंपनियों को या तो कीमतें बढ़ानी होंगी या उत्पादन कम करना पड़ेगा। इससे आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है। भारत को अब वैकल्पिक स्रोतों से आयात करना पड़ेगा, जो संभवतः महँगे होंगे। इससे व्यापार संतुलन और विदेशी मुद्रा पर भी दबाव बढ़ सकता है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए संकेत

चीन का यह फैसला यह दिखाता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी ज्यादा आपस में जुड़ी हुई है और किसी एक क्षेत्र में संकट कैसे पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है। यदि मिडिल ईस्ट में स्थिति जल्दी सामान्य नहीं होती और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लंबे समय तक बाधित रहता है, तो यह संकट और गहरा सकता है।

ऐसे में सल्फर, सल्फ्यूरिक एसिड, खाद और धातुओं की कीमतों में लगातार अस्थिरता बनी रह सकती है। दुनिया के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह वैकल्पिक सप्लाई स्रोतों को कितनी जल्दी और प्रभावी तरीके से विकसित कर पाती है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह संकट अस्थायी नहीं रहेगा, बल्कि लंबे समय तक वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाए रखेगा।

यानी यह स्थिति केवल एक कमोडिटी की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक आर्थिक संकट का संकेत है, जिसमें भू-राजनीति, व्यापार और संसाधनों की उपलब्धता सभी एक साथ प्रभावित हो रहे हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह समय सतर्क रहने और वैकल्पिक रणनीतियाँ तैयार करने का है, ताकि इस वैश्विक झटके का असर कम किया जा सके।

ऐतिहासिक धोखों की छाया में कुर्द, अमेरिकी हथियारों के बावजूद ईरानी सीमा से लौटे लड़ाके: हर मोर्चे पर जीत कर भी हारे, समझें- तेहरान से न टकराने के पीछे की वजह

पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति के बीच कुर्दों की कहानी एक ऐसे समुदाय की दास्तान है, जिसे बार-बार इस्तेमाल किया गया, लेकिन कभी स्थायी पहचान या भरोसेमंद समर्थन नहीं मिला। डोनाल्ड ट्रंप के रविरा (05 अप्रैल 2026) के उस बयान ने इस बहस को फिर से जिंदा कर दिया, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि ईरान विरोधी कुर्द समूहों को अमेरिका की तरफ से हथियार दिए गए थे।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार (05 अप्रैल 2026) को एक चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने स्वीकार किया कि ईरान के सत्ताविरोधी प्रदर्शनकारियों को हथियार पहुँचाने के लिए अमेरिका ने कुर्दों का सहारा लिया था। लेकिन कुर्दों ने वो हथियार अपने पास रख लिए।

जब डोनाल्ड ट्रंप ने यह स्वीकार किया कि अमेरिका ने ईरान के विद्रोही कुर्दों को हथियार पहुँचाए, तो दुनिया को लगा कि शायद अब ईरान की सत्ता पलट जाएगी। लेकिन कुर्दों के पाँव ठिठक गए। वे ईरान की सीमा तक आए, हथियार उनके पास थे, सेना तैयार थी, लेकिन वे अंदर नहीं घुसे। क्यों? क्योंकि उन्हें मालूम था कि जिस दिन अमेरिका का स्वार्थ सिद्ध हो जाएगा, उन्हें फिर से पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ेगी।

इतिहास की किताबों में कई ऐसी कौमों का ज़िक्र है जिन्हें वक्त ने बेरहमी से कुचला, लेकिन ‘कुर्द’ (Kurds) एक ऐसी पहचान हैं जिन्हें वक्त के साथ-साथ दुनिया की हर बड़ी महाशक्ति ने इस्तेमाल किया और फिर बीच मझधार में मरने के लिए छोड़ दिया। ईरान में जो हुआ, वह उसी ‘ऐतिहासिक डर’ और ‘अतीत के ज़ख्मों’ का ताज़ा अध्याय है।

कौन हैं कुर्द?

कुर्द दुनिया के सबसे बड़े जातीय समूह हैं, जिनकी अपनी कोई स्वतंत्र राष्ट्र नहीं है। अनुमानित 30 से 45 मिलियन की आबादी वाले ये लोग मुख्य रूप से तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया में बंटे हुए हैं। उनकी भूमि जिसे वे कुर्दिस्तान कहते हैं, पहाड़ी इलाकों में फैली हुई है खासकर टॉरस और ज़ाग्रोस पर्वत श्रृंखलाओं के बीच। कुर्द भाषा इंडो-ईरानी परिवार की है, जिसमें कुर्मांजी (तुर्की, सीरिया में प्रमुख) और सोरानी (इराक, ईरान में) मुख्य बोलियाँ हैं। अधिकांश कुर्द सुन्नी मुस्लिम हैं, लेकिन यजीदी, शिया, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समूह भी हैं। उनकी संस्कृति में लोकगीत, नृत्य, कविता और स्वतंत्रता की भावना गहराई से जुड़ी हुई है।

कुर्दों का इतिहास सदियों पुराना है। प्राचीन काल में वे मेडेस जैसे समूहों से जुड़े माने जाते हैं, जिन्होंने 612 ईसा पूर्व असिरिया साम्राज्य को हराया था। इस्लाम के आगमन के बाद सातवीं शताब्दी में ‘कुर्द’ शब्द प्रचलित हुआ। सलाहुद्दीन अय्यूबी जैसे कुर्द योद्धा ने क्रूसेडर्स के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन आधुनिक युग में उनकी नियति धोखे और दमन की रही।

आधुनिक काल में मिले सिर्फ धोखे, 100+ साल से भटक रहे

कुर्दों के साथ धोखे की शुरुआत आज की नहीं है, यह एक सदी पुरानी है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) ढह रहा था, तब कुर्दों को पहली बार एक स्वतंत्र राष्ट्र का सपना दिखाया गया था।

दरअसल, प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब ओटोमन साम्राज्य का पतन हुआ, तब 1920 की सेवरेस की संधि में कुर्दिस्तान नाम के एक स्वतंत्र देश का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन जैसे ही तुर्की में मुस्तफा कमाल अतातुर्क का उदय हुआ, ब्रिटेन और फ्रांस ने अपने रणनीतिक हितों के लिए पाला बदल लिया। 1923 में Treaty of Lausanne हुई, जिसमें ‘कुर्दिस्तान’ के वादे को कूड़ेदान में डाल दिया गया। कुर्दों को चार अलग-अलग देशों तुर्की, इराक, सीरिया और ईरान के बीच बाँट दिया गया। यह वह पहला बड़ा विश्वासघात था जिसने कुर्दों को ‘दुनिया का सबसे बड़ा जमीन विहीन अल्पसंख्यक’ बना दिया।

आज कुर्दों की कुल आबादी लगभग 3.5 से 4 करोड़ के बीच है। वे मध्य पूर्व के एक ऐसे पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं जिसे अनौपचारिक रूप से ‘कुर्दिस्तान’ कहा जाता है, लेकिन नक्शे पर ऐसा कोई देश मौजूद नहीं है।

तुर्की में बुरी तरह से दमन

तुर्की में कुर्दों को लंबे समय तक अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ा। तुर्किए की सरकार ने उन्हें ‘पहाड़ी तुर्क’ कहकर उनकी अलग पहचान से इनकार किया और उनकी भाषा तथा संस्कृति पर पाबंदियाँ लगाईं। इसके जवाब में PKK (Kurdistan Workers’ Party) ने 1980 के दशक में सशस्त्र संघर्ष शुरू किया, जो आज तक जारी है। इस संघर्ष में अब तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं और कुर्द इलाकों में भारी सैन्य कार्रवाई होती रही है। हाल के वर्षों में तुर्की ने उत्तरी सीरिया में भी कुर्दों के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन चलाए, जिससे वहाँ बने उनके स्वायत्त क्षेत्र कमजोर पड़ गए।

इराक के सद्दाम काल में हुआ कत्लेआम

इराक में कुर्दों का अनुभव भी बेहद दर्दनाक रहा है। सद्दाम हुसैन के शासन में 1988 का हलब्जा केमिकल अटैक कुर्द इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है, जिसमें रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल से हजारों लोगों की मौत हुई। हालाँकि 1991 के खाड़ी युद्ध के बाद अमेरिका की दखल से उत्तरी इराक में कुर्दों के लिए ‘नो-फ्लाई ज़ोन’ बनाया गया और बाद में उन्हें सीमित स्वायत्तता मिली। 2005 में कुर्दिस्तान रीजनल गवर्नमेंट की स्थापना हुई, लेकिन 2017 में स्वतंत्रता जनमत संग्रह के बाद इराकी सरकार ने कई विवादित इलाकों पर दोबारा नियंत्रण कर लिया, जिससे कुर्दों की स्थिति फिर कमजोर हो गई।

दरअसल, 2003 में अमेरिकी आक्रमण के बाद सद्दाम का पतन हुआ और उत्तरी इराक में ‘कुर्दिस्तान स्वायत्त क्षेत्र’ बना। आज यही वह एकमात्र इलाका है जिसे कुर्द अपनी ‘सुरक्षित जमीन’ मानते हैं। इसी को खोने के डर से वे हाल ही में ईरान में घुसने से हिचक गए।

सीरिया में भी मिला धोखा

सीरिया में कुर्दों ने आईएसआई के खिलाफ लड़ाई में अहम भूमिका निभाई और अमेरिका के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिने गए। सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान कुर्दों (YPG/SDF) ने वह कर दिखाया जो दुनिया की बड़ी सेनाएँ नहीं कर पाई थीं। उन्होंने जमीनी लड़ाई में ISIS (इस्लामिक स्टेट) के दाँत खट्टे कर दिए। कोबानी की लड़ाई कुर्दों की वीरता का प्रतीक बन गई।

धोखा 2.0: अमेरिका ने ISIS के खिलाफ कुर्दों का भरपूर इस्तेमाल किया। लेकिन 2019 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक सीरिया से अमेरिकी सेना हटाने का फैसला कर लिया। इस फैसले ने कुर्दों को उनके सबसे बड़े दुश्मन तुर्की के सामने निहत्था छोड़ दिया। अमेरिका के हटते ही तुर्की ने सीरिया के कुर्द इलाकों पर हमला कर दिया और उस स्वायत्तता को लगभग खत्म कर दिया जिसे कुर्दों ने खून बहाकर हासिल किया था।

तुर्की कुर्दों को अपनी राष्ट्रीय अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। तुर्की के भीतर ‘कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी’ (PKK) पिछले 40 वर्षों से सशस्त्र संघर्ष कर रही है, जिसमें 40,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। रायटर्स की रिपोर्ट बताती है कि सीरियाई कुर्द आज भी शिविरों में नरकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।

तुर्की के भीतर कुर्दों की राजनीतिक पार्टी HDP के नेताओं को जेल में डाल दिया गया है। फिलहाल एक अनौपचारिक सीजफायर या ‘ठहराव’ की स्थिति है, लेकिन यह किसी शांति समझौते की वजह से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और आर्थिक मंदी की वजह से है। तुर्की इस वक्त अपनी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और सीरिया में रूस-ईरान के समीकरणों की वजह से सीधे बड़े युद्ध से बच रहा है, लेकिन कुर्दों पर दमन जारी है।

ईरान में लंबे समय से अधिकारों की माँग

ईरान में भी कुर्द लंबे समय से राजनीतिक अधिकारों और सांस्कृतिक स्वतंत्रता की माँग करते रहे हैं। ईरान में महसा अमीनी (जो खुद एक कुर्द थीं) की मौत के बाद भड़के प्रदर्शनों में कुर्द सबसे आगे थे। ट्रंप के खुलासे के मुताबिक, अमेरिका ने कुर्दों को हथियार दिए ताकि वे ईरान के भीतर सशस्त्र विद्रोह कर सकें। ईरान ने भी इसका बदला लेने के लिए इराक के कुर्द इलाकों पर मिसाइलें दागीं।

बीते महीनों में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान कुर्द इलाकों में कड़ी कार्रवाई हुई, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया और कई को कठोर सजा दी गई। इसी पृष्ठभूमि में जब अमेरिका की तरफ से हथियारों की आपूर्ति की खबर सामने आई और कुर्द लड़ाके ईरान सीमा तक पहुँचे, तो एक बार फिर इतिहास उनके सामने खड़ा था। उन्हें याद था कि 1975 में अल्जीयर्स समझौते के बाद अमेरिका और ईरान ने अचानक उनका समर्थन वापस ले लिया था और 1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान भी उन्हें अधर में छोड़ दिया गया था।

यही कारण है कि इस बार कुर्दों ने बेहद सतर्क रुख अपनाया। उन्हें अमेरिका और इजरायल से कोई स्पष्ट और दीर्घकालिक सुरक्षा गारंटी नहीं मिली थी। साथ ही, उन्हें इस बात का भी डर था कि अगर वे ईरान के खिलाफ खुलकर लड़ाई में उतरते हैं, तो इसका सीधा असर इराक में उनके स्वायत्त क्षेत्र पर पड़ सकता है, जिसे वे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहते। ईरान की सैन्य तैयारियों और सीमा पार हमलों ने भी कुर्दों को पीछे हटने पर मजबूर किया।

रायटर्स की टीम जब उत्तरी इराक (KRG) पहुँची, तो उन्होंने पाया कि कुर्द लड़ाके डरे हुए थे। उन्हें डर था कि अगर वे ईरान में घुसे, तो ईरान की सेना इराक में मौजूद उनकी इकलौती स्वायत्त सरकार को भी तहस-नहस कर देगी। उन्हें अमेरिका पर भरोसा नहीं था कि मुश्किल वक्त में वह उनके बचाव में आएगा। ऐतिहासिक धोखे ने उन्हें यह सिखा दिया है कि “हथियार तो दिए जा सकते हैं, लेकिन सुरक्षा की गारंटी नहीं।”

कुर्दों का इतिहास बताता है कि उन्होंने लगभग हर दशक में किसी न किसी देश में संघर्ष किया है, लेकिन हर बार उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। लाखों लोग विस्थापित हुए, हजारों गाँव नष्ट हो गए और अनगिनत लोगों की जान गई। इसके बावजूद उन्हें आज तक न तो एक स्वतंत्र राष्ट्र मिला और न ही स्थायी सुरक्षा की गारंटी। तुर्की, इराक, सीरिया और ईरान, चारों देशों में उनकी स्थिति अलग-अलग जरूर है, लेकिन एक चीज समान है: असुरक्षा और अविश्वास।

आज जब कुर्द लड़ाके ईरान की सीमा से लौटे हैं, तो यह सिर्फ एक सामरिक निर्णय नहीं, बल्कि इतिहास से सीखा गया सबक है। उन्होंने यह समझ लिया है कि बाहरी शक्तियों के भरोसे अपनी लड़ाई लड़ना हमेशा जोखिम भरा रहा है। इसलिए इस बार उन्होंने कदम पीछे खींचकर अपनी सीमित स्वायत्तता और अस्तित्व को बचाने को प्राथमिकता दी है। यही वजह है कि सदियों से लड़ने वाले ये योद्धा इस बार ठिठक गए, क्योंकि उन्हें लड़ाई से ज्यादा, अपने भविष्य की चिंता है।

कुर्दों के बारे में कुछ खास बातें

कुर्दों की कहानी सिर्फ युद्ध की नहीं है, बल्कि एक समृद्ध संस्कृति और अटूट जिजीविषा की भी है।

धर्मनिरपेक्ष ढाँचा: कुर्द मुख्य रूप से सुन्नी मुस्लिम हैं, लेकिन उनका समाज काफी हद तक धर्मनिरपेक्ष (Secular) है। उनके समाज में महिलाओं को जो सम्मान और अधिकार मिले हैं, वे मध्य पूर्व के अन्य देशों में दुर्लभ हैं।

महिला लड़ाके (YPJ): सीरिया में ISIS के खिलाफ लड़ाई में महिलाओं की एक पूरी सेना थी। उनका मानना था कि ISIS के आतंकी महिलाओं के हाथों मरने से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे वे जन्नत नहीं जा पाएँगे।

नोरूज़ (Nowruz): यह कुर्दों का सबसे बड़ा सांस्कृतिक त्यौहार है (नया साल), जो उनकी पहचान और प्रतिरोध का प्रतीक बन गया है।

पेशाबर्गा (Peshmerga): इसका शाब्दिक अर्थ है ‘वे जो मौत का सामना करते हैं’। यह इराकी कुर्दों की आधिकारिक सेना का नाम है।

भाषा का संघर्ष: तुर्की में दशकों तक ‘कुर्दिश’ भाषा बोलने और उसे लिखने पर प्रतिबंध था। कुर्दों को ‘पहाड़ी तुर्क’ कहकर उनकी पहचान मिटाने की कोशिश की गई।

पहाड़ों के अलावा कोई दोस्त नहीं

कुर्दों के बीच एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है- ‘No friends but the mountains’ (पहाड़ों के अलावा हमारा कोई दोस्त नहीं)। इतिहास गवाह है कि जब-जब कुर्दों ने किसी विदेशी ताकत (अमेरिका, ब्रिटेन, रूस या फ्रांस) पर भरोसा किया, उन्हें अंत में पहाड़ों में ही छिपना पड़ा।

ईरान की सीमा पर कुर्दों का रुक जाना कोई कायरता नहीं, बल्कि एक कड़वे अतीत से सीखा गया ‘रणनीतिक सबक’ था। वे जानते हैं कि वे इस्तेमाल होने के लिए बहुत बड़े हैं, लेकिन अपना देश पाने के लिए बहुत अकेले। आज कुर्द दुनिया के सामने एक सवाल की तरह खड़े हैं कि क्या न्याय सिर्फ उन देशों के लिए है जिनके पास नक्शे पर अपनी सरहदें हैं?

कुर्दों के भविष्य को लेकर वैश्विक जिम्मेदारी जरूरी

कुर्दों का मुद्दा सिर्फ मध्य पूर्व का क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है। यह मानवाधिकारों का एक बड़ा संकट है। अगर दुनिया के सबसे बड़े ‘स्टेटलेस’ (राज्यविहीन) समुदाय को इसी तरह फुटबॉल बनाया जाता रहा, तो यह क्षेत्र कभी शांत नहीं होगा।

इराक का मॉडल: क्या इराक की तरह ईरान, सीरिया और तुर्की में भी कुर्दों को स्वायत्तता मिलेगी? वर्तमान परिस्थितियों में इसकी संभावना कम दिखती है क्योंकि तुर्की इसे अपने अस्तित्व का सवाल मानता है।

भारत और कुर्द: भारत ने हमेशा कुर्दों के प्रति एक सहानुभूतिपूर्ण लेकिन सतर्क रवैया रखा है। भारत ‘संप्रभुता’ का सम्मान करता है, इसलिए वह खुलकर कुर्द देश का समर्थन नहीं करता, लेकिन इराकी कुर्दिस्तान के साथ भारत के व्यापारिक संबंध मजबूत हो रहे हैं।

अमेरिका की विश्वसनीयता: कुर्दों के साथ बार-बार हुए धोखे ने मध्य पूर्व में अमेरिका की विश्वसनीयता पर एक बड़ा धब्बा लगा दिया है। अब कोई भी स्थानीय शक्ति अमेरिका पर आँख मूँदकर भरोसा करने से पहले सौ बार सोचेगी।

कुर्दों की दास्ताँ हमें सिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ‘नैतिकता’ और ‘वादे’ का कोई स्थान नहीं होता, यहाँ सिर्फ ‘हित’ सर्वोपरि होते हैं। जब तक कुर्दों के पास अपनी कोई जमीन नहीं होगी, वे इतिहास के इन खूनी पन्नों में सिर्फ एक ‘मोहरे’ बनकर रह जाएँगे।

रिन्यूएबल एनर्जी में भारत ने मारी ऐतिहासिक छलांग, दुनिया में चीन-US के बाद तीसरे नंबर पर: समझें कैसे ब्राजील को पीछे छोड़ हरित उर्जा में बनाए नए कीर्तिमान

भारत ने क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगाते हुए दुनिया में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी के अनुसार, इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी की रिपोर्ट ‘रिन्यूएबल एनर्जी स्टैटिस्टिक्स 2026’ में भारत अब रिन्यूएबल एनर्जी स्थापित क्षमता के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है।

भारत ने इस सूची में ब्राजील को पीछे छोड़ दिया है और अब केवल चीन और अमेरिका उससे आगे हैं। यह उपलब्धि सिर्फ एक रैंकिंग नहीं, बल्कि भारत की तेजी से बदलती ऊर्जा रणनीति का संकेत है।

31 मार्च 2026 तक देश की कुल नॉन फॉसिल फ्यूल आधारित क्षमता 283.46 गीगावाट पहुँच चुकी है, जिसमें 274.68 GW रिन्यूएबल एनर्जी और 8.78 GW परमाणु ऊर्जा शामिल है।

खास बात यह है कि 2025-26 में ही 55.3 GW की रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई, जो अब तक की सबसे ज्यादा सालाना वृद्धि है। भारत ने जून 2025 में अपने कुल बिजली क्षमता का 50% हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल कर लिया, जो 2030 के लक्ष्य से पाँच साल पहले है। वहीं जुलाई 2025 में 203 GW की माँग में से 51.5% बिजली रिन्यूएबल स्रोतों से आई।

रिकॉर्ड ग्रोथ: बिजली उत्पादन और क्षमता में उछाल

वित्त वर्ष 2025-26 भारत के ऊर्जा सेक्टर के लिए बेहद अहम रहा। इस दौरान देश का कुल बिजली उत्पादन 1845.9 बिलियन यूनिट तक पहुँच गया। इसमें नॉन फॉसिल स्रोतों की हिस्सेदारी 29.2% रही, जबकि रिन्यूएबल ऊर्जा (बड़े जलविद्युत सहित) का योगदान 26.2% रहा।

ध्यान देने वाली बात यह है कि जहाँ एक तरफ कोयला आधारित बिजली उत्पादन में कमी आई, वहीं दूसरी ओर सौर और पवन ऊर्जा में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली। सौर ऊर्जा से 173.5 बिलियन यूनिट और पवन ऊर्जा से 106 बिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ। यानी अब भारत की ऊर्जा व्यवस्था धीरे-धीरे पारंपरिक ईंधनों से हटकर क्लीन एनर्जी की तरफ बढ़ रही है।

सौर और पवन ऊर्जा का दबदबा, गाँव-शहर तक पहुँच

भारत में रिन्यूएबल ऊर्जा की असली ताकत सौर और पवन ऊर्जा बनकर सामने आई है। मार्च 2026 तक सौर ऊर्जा की कुल क्षमता 150.26 GW पहुँच गई, जो 2014 के मुकाबले 53 गुना ज्यादा है।

साल 2025-26 में ही 44.61 GW सौर क्षमता जोड़ी गई, जो अब तक का सबसे बड़ा इजाफा है। इसमें रूफटॉप सोलर और PM KUSUM जैसी योजनाओं का बड़ा योगदान रहा। खासतौर पर रूफटॉप सोलर से लाखों घरों को फायदा मिला और ग्रामीण इलाकों में भी बिजली की पहुँच मजबूत हुई।

पवन ऊर्जा की बात करें तो इसकी क्षमता 56.09 GW तक पहुँच चुकी है। इस सेक्टर में भी 6.05 GW की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई। रिन्यूएबल ऊर्जा के साथ-साथ भारत ने इसके उपकरणों के निर्माण में भी ग्रोथ हुआ है। सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता 2014 के 2.3 GW से बढ़कर 2026 में करीब 172 GW हो गई है।

विंड टरबाइन निर्माण क्षमता भी बढ़कर लगभग 24 GW तक पहुँच गई है। सरकार ने GST को 12% से घटाकर 5% किया, जिससे लागत कम हुई और घरेलू उद्योग को बढ़ावा मिला। इसके अलावा बैटरी निर्माण और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए भी कई कदम उठाए गए हैं।

नई नीतियाँ, मजबूत सिस्टम और भविष्य की तैयारी

सरकार ने इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए कई अहम नीतियाँ लागू की हैं, जैसे REEIMS पोर्टल, VPPA व्यवस्था और CfD मॉडल। इनसे न सिर्फ पारदर्शिता बढ़ी है, बल्कि निवेशकों का भरोसा भी मजबूत हुआ है।

ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं के जरिए ट्रांसमिशन नेटवर्क को बेहतर बनाया जा रहा है, ताकि रिन्यूएबल ऊर्जा को आसानी से पूरे देश में पहुँचाया जा सके। साथ ही 345 GW क्षमता वाले ऊर्जा जोन भी चिन्हित किए गए हैं, जिससे भविष्य की योजना साफ हो सके।

ग्रीन हाइड्रोजन और स्किल डेवलपमेंट से नई रफ्तार

भारत का नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन भी इस बदलाव का बड़ा हिस्सा है। 19744 करोड़ रुपए के निवेश के साथ इसका लक्ष्य 2030 तक 5 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन करना है। इस मिशन से 8 लाख करोड़ रुपए तक का निवेश आने और 6 लाख नौकरियों के पैदा होने की उम्मीद है।

इस सेक्टर में काम करने वाले लोगों की जरूरत को देखते हुए 2025-26 में 1.24 लाख से ज्यादा लोगों को ट्रेनिंग दी गई है। इससे आने वाले समय में स्किल्ड वर्कफोर्स तैयार होगा और सेक्टर को और मजबूती मिलेगी।

भारत ने 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल एनर्जी क्षमता का लक्ष्य रखा है। मौजूदा रफ्तार को देखते हुए यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल नहीं लगता।

हालाँकि ग्रिड मैनेजमेंट, ऊर्जा भंडारण और सप्लाई चेन जैसी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, लेकिन जिस तरह से नीतियाँ, तकनीक और निवेश आगे बढ़ रहे हैं, उससे साफ है कि भारत आने वाले समय में दुनिया का स्वच्छ ऊर्जा नेता बन सकता है।

कॉन्ग्रेस ने जिन कर्नल पुरोहित को बनाया ‘भगवा आतंकवाद’ का शिकार, वो अब बनेंगे ब्रिगेडियर: सेना ने दी मंजूरी, जानें किस तरह सहना पड़ा अत्याचार

करीब 17 साल तक चले मालेगाँव ब्लास्ट केस में बरी होने के बाद भारतीय सेना के अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित को अब बड़ी राहत मिली है। उन्हें ब्रिगेडियर के पद पर प्रमोशन के लिए मंजूरी दे दी गई है।

यह फैसला उस लंबे दौर के बाद आया है। जब वह आतंकवाद जैसे गंभीर आरोपों का सामना करते हुए जेल में रहे, कोर्ट में लड़ाई लड़ी और अपने करियर को लगभग ठहरता हुआ देखा।

जुलाई 2025 में NIA की विशेष अदालत ने उन्हें और अन्य आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। इस केस में पूर्व बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत कुल सात लोग आरोपित थे, जिन्हें अदालत ने दोषमुक्त कर दिया।

कर्नल पुरोहित ने अपने करियर को हुए नुकसान को लेकर आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने कहा था कि लंबे समय तक चले मुकदमे और हिरासत के कारण उन्हें सेना में प्रमोशन के अवसर नहीं मिल पाए।

ट्रिब्यूनल ने उनकी बात को गंभीरता से लेते हुए उनके रिटायरमेंट पर रोक लगा दी थी। अब जब उन्हें प्रमोशन की मंजूरी मिल गई है।

क्या था मालेगाँव ब्लास्ट मामला

मालेगाँव ब्लास्ट 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगाँव में हुआ था। रमजान के दौरान एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल पर लगाए गए बम में विस्फोट हुआ, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई और लगभग 95 लोग घायल हो गए। इस घटना के बाद देशभर में हड़कंप मच गया था और जाँच एजेंसियों पर भारी दबाव था कि जल्द से जल्द आरोपित को पकड़ा जाए।

शुरुआत में इस मामले की जाँच महाराष्ट्र ATS ने की और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। बाद में साल 2011 में जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंप दी गई। इस केस में श्रीकांत प्रसाद पुरोहित, प्रज्ञा सिंह ठाकुर, मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, सुधाकर चतुर्वेदी, समीर कुलकर्णी समेत कई लोगों को आरोपित बनाया गया था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि यह एक संगठित साजिश थी, लेकिन अदालत में यह आरोप टिक नहीं पाए।

कैसे अदालत में कमजोर पड़ा पूरा केस

जब यह मामला अदालत में पहुँचा और गवाहों व सबूतों की जाँच शुरू हुई, तो धीरे-धीरे अभियोजन पक्ष का केस कमजोर होता चला गया। NIA कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए जा सके।

कर्नल पुरोहित पर आरोप था कि वे कश्मीर से RDX लेकर आए थे और उसका इस्तेमाल इस धमाके में किया गया, लेकिन कोर्ट में यह तक साबित नहीं हो पाया कि वे उस समय कश्मीर में तैनात थे। उनके घर से भी कोई विस्फोटक सामग्री नहीं मिली। फॉरेंसिक रिपोर्ट में भी आरडीएक्स के कोई निशान नहीं पाए गए।

इसी तरह साजिश से जुड़ी कथित बैठकों, कॉल रिकॉर्ड या किसी भी ठोस प्लानिंग का कोई प्रमाण अदालत में पेश नहीं किया जा सका। कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और सबूतों के अभाव में सभी आरोपितों को बरी करना जरूरी है।

कोर्ट ने क्या कहा

NIA की विशेष अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं, जो इस पूरे मामले की दिशा और निष्कर्ष को समझने के लिए बेहद अहम हैं। अदालत ने साफ कहा कि “आतंकवाद एक गंभीर अपराध है और इसे किसी भी धर्म या विचारधारा से जोड़ना उचित नहीं है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना अनिवार्य है।”

अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्य संदेह से परे दोष सिद्ध करने के मानक पर खरे नहीं उतरते। कोर्ट ने कई तकनीकी और प्रक्रियात्मक खामियों की ओर भी इशारा किया। उदाहरण के तौर पर, विस्फोटक सामग्री की जब्ती और उसके परीक्षण की प्रक्रिया में स्पष्टता का अभाव था।

कथित कबूलनामों को लेकर भी अदालत ने गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी आरोपित से दबाव या प्रताड़ना के तहत बयान लिया गया है, तो उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, गवाहों के बयानों में असंगतियाँ और विरोधाभास भी अदालत के सामने स्पष्ट रूप से सामने आए।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि केवल एक नैरेटिव या थ्योरी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उसके समर्थन में ठोस और प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद न हों। इसी आधार पर सभी आरोपितों को बरी किया गया।

कर्नल पुरोहित को क्या-क्या झेलना पड़ा

लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित के लिए यह मामला सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं था, बल्कि व्यक्तिगत, पेशेवर और मानसिक स्तर पर एक लंबा संघर्ष था। उनकी गिरफ्तारी नवंबर 2008 में हुई थी और उन्हें करीब 9 साल तक जेल में रहना पड़ा।

इस दौरान उनके खिलाफ मीडिया ट्रायल भी चला, जिससे उनकी छवि को काफी नुकसान पहुँचा। उनके परिवार को भी सामाजिक और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा।

कर्नल पुरोहित ने बाद में आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और उनसे जबरन कबूलनामे लेने की कोशिश की गई। उन्होंने यह भी कहा कि वे मिलिट्री इंटेलिजेंस के एक ऑपरेशन के तहत कुछ संगठनों के संपर्क में थे, लेकिन उनकी इस भूमिका को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया।

उनकी सेवा के दौरान मिलने वाले प्रमोशन और अन्य लाभ भी इस केस के चलते रुक गए। यही कारण था कि बरी होने के बाद उन्होंने AFT का रुख किया और अपने करियर की बहाली की माँग की।

भगवा आतंकवाद नैरेटिव और कॉन्ग्रेस की साजिश

इस केस के दौरान ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द काफी चर्चा में आया। उस समय केंद्र में UPA सरकार थी और इस शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श में बार-बार किया गया।

पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे के बयानों को लेकर भी काफी विवाद हुआ। बाद में खुद शिंदे ने माना कि आतंकवाद को किसी धर्म या रंग से जोड़ना सही नहीं था।

अदालत ने भी अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और किसी भी थ्योरी को केवल नैतिक आधार पर नहीं बल्कि ठोस सबूतों के आधार पर ही साबित किया जाना चाहिए।

कॉन्ग्रेस (UPA) की नेतृत्व वाली केंद्र की तत्कालीन UPA सरकार ने भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को जानबूझकर फँसाया था, जबकि सरकार को जानकारी थी कि वह ड्यूटी पर थे और खुफिया जानकारी जुटा रहे थे। हाल ही में सामने आए खुफिया दस्तावेजों से इसका खुलासा हुआ है।

बता दें कि मालेगाँव विस्फोट मामले में 2008 में गिरफ्तार किए गए लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को उस समय की सरकार और मीडिया ने ‘हिंदू आतंकवाद‘ की विचार को स्थापित करने के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को देशद्रोही बताया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कॉन्ग्रेस द्वारा ‘नो इनपुट अवेलेबल’ शब्द का इस्तेमाल सत्य के रूप में किया गया था। बाद में डीजीएमआई ने अधिक इनपुट के लिए परिणामी कार्यालयों को लिखा, लेकिन सरकार ने कोई फॉलोअप कार्रवाई नहीं की।

पेज 2 पर 4 लाइनें बताती हैं कि पूरा कॉन्ग्रेस नेतृत्व कर्नल पुरोहित के बारे में झूठ बोल रहा था। सेना के पत्र की लाइन 1 में कथित तौर पर निष्कर्ष निकाला गया है कि ‘लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित एक सोर्स नेटवर्क का संचालन कर रहे थे, जिसके माध्यम से उन्होंने खुफिया जानकारी प्राप्त की थी’। यह उस बात के विपरीत है, जिसे हमें यह मानने के लिए प्रेरित किया गया था कि ‘कोई इनपुट नहीं’ था।

एक और ‘अब्दुल’ ने दिखाई औकात, एक और हिंदू महिला की मिली सड़ती लाश: महाराष्ट्र में बच्चे की डिलीवरी के बाद ही सादिक हैवानियत पर उतरा, पढ़ें 9 ऐसे और मामले

हिंदू लड़कियाँ जब किसी इस्लामी कट्टरपंथी के झाँसे में आती हैं तो उन्हें ये मालूम चलने में काफी देर हो जाती है कि असल में उनका ‘अब्दुल’ अलग नहीं है। वो ये नहीं समझ पाती कि आज जिसके लिए वो समाज से ये कहती फिर रही हैं कि ‘मेरा अब्दुल वैसा नहीं है’, वहीं एक दिन उनकी निर्ममता से हत्या कर लाश ठिकाने लगा देगा।

हत्या ना भी कर पाया तो ऐसी हालत तो ऐसी कर ही देगा कि तुम खुद ही जीना ना चाहो। यहीं वजह है कि समय-समय पर ये बताना जरुरी हो जाता है कि किसी ‘अब्दुल’ के झूठे प्यार पर भरोसा कर हिंदू लड़कियाँ केवल ‘लव जिहाद’ का शिकार बन सकती हैं इससे ज्यादा कुछ नहीं।

महाराष्ट्र में सादिक ने की हिंदू बीवी की हत्या, पेट्रोल डालकर जलाया चेहरा

महाराष्ट्र के अकोला जिले से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। मामले में पुलिस ने आरोपित सादिक शाह तशरीफ शाह को गिरफ्तार कर लिया है। उस पर अपनी हिंदू बीवी रवीना पवार की हत्या करने और पहचान छिपाने के लिए उसके चेहरे को पेट्रोल डालकर जलाने का आरोप है।

रवीना ने हत्या से महज आठ दिन पहले ही एक बच्चे को जन्म दिया था। घटना सोमवार (6 अप्रैल 2026) को सामने आई, जब डाबकी रोड पुलिस स्टेशन क्षेत्र में स्थित अन्नपूर्णा माता मंदिर के पास एक 30 से 32 वर्षीय महिला का आंशिक रूप से जला हुआ शव मिलने की सूचना पुलिस को मिली।

सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची, पंचनामा किया और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया। महिला का चेहरा बुरी तरह से जला हुआ था, जिससे उसकी पहचान संभव नहीं हो सकी। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रेस नोट और सोशल मीडिया के जरिए जानकारी साझा की, जिसके बाद मृतका की पहचान रवीना पवार के रूप में हुई।

CCTV से हुआ खुलासा, बहन के घर में छिपा था सादिक

जाँच के दौरान शक की सुई उसके शौहर सादिक शाह पर गई, जो घटना के बाद फरार हो गया था। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए उसे वाशिम जिले के बार्शी टाकली इलाके में उसकी बहन के घर से गिरफ्तार कर लिया। जाँच में सामने आया कि सादिक और रवीना मूल रूप से वाशिम जिले के शेलू बाजार के रहने वाले थे और उन्होंने लव मैरिज की थी।

दोनों मुंबई में काम करते थे, लेकिन रवीना के प्रेग्नेंट होने के बाद हाल ही में डिलीवरी के लिए अकोला आए थे और किराए के मकान में रह रहे थे। पुलिस के अनुसार, दोनों के बीच अक्सर घरेलू विवाद होते थे, जो इस बार खतरनाक मोड़ पर पहुँच गए। आरोपित ने रवीना का गला घोंटकर हत्या कर दी और उसके बाद शव को मंदिर के पास फेंक दिया।

पहचान छिपाने के इरादे से उसने उसके चेहरे पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी और मौके से फरार हो गया। मामले की जाँच में इलाकों के CCTV फुटेज ने अहम भूमिका निभाई, जिसकी मदद से पुलिस ने आरोपित की लोकेशन ट्रेस की और उसे गिरफ्तार करने में सफलता पाई।

आरोपित की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने बाल कल्याण विभाग से समन्वय कर रवीना के बच्चे को उनके संरक्षण में सौंप दिया है, जहाँ अब उसकी देखभाल की जा रही है।

ये अकेला ऐसा मामला नहीं है, जहाँ हिंदू लड़कियों ने ‘अब्दुल’ को ‘वैसा’ नहीं समझा, फिर भी वो ऐसा ही निकला। ऐसे ही कुछ मामलों की पड़ताल हमने की।

मुंबई में हिंदू डॉक्टर ने दी जान, सुसाइट नोट में लिखी बॉयफ्रेंड फैजुल मोहम्मद की करतूत

मुंबई के एंटॉप हिल इलाके में एक हिंदू महिला डॉक्टर स्तुति सोनावने की आत्महत्या के मामले में पुलिस ने उनके बॉयफ्रेंड फैजुल मोहम्मद खान को गिरफ्तार किया था। पुलिस को डॉक्टर के कमरे से 6 पन्नों का एक भावुक सुसाइड नोट मिला था। इसमें फैजुल द्वारा किए गए मानसिक उत्पीड़न और शक का जिक्र था।

सुसाइड नोट के अनुसार, स्तुति और फैजुल की मुलाकात एक ऐप के जरिए हुई थी। स्तुति ने लिखा कि उनके बीच कई खुशहाल पल थे और फैजुल ने उनका जन्मदिन ताज होटल में भी मनाया था। बाद में फैजुल का व्यवहार बदल गया। फैजुल स्तुति पर शक करने लगा और उनके लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करने लगा, जिससे वे गहरे तनाव में चली गईं।

फैजुल स्तुति को बार-बार धमकियाँ देता था और कहता था, “तू एक दिन फ्रिज में मिलेगी”। स्तुति ने यह जानकारी अपनी सहेली को भी दी थी। इसी मानसिक तनाव के कारण उन्होंने 8 मार्च की 2026 की रात दुपट्टे से फाँसी लगाकर जान दे दी। डॉक्टर के पिता ने बताया कि 9 मार्च की सुबह जब दरवाजा तोड़ा गया, तब स्तुति का शव बरामद हुआ।

फरीदाबाद से मुजफ्फरनगर तक सेम पैटर्न: हिंदू पतियों की हत्या

इसी साल फरवरी में यूपी से हरियाणा तक मुस्लिम युवकों द्वारा हिन्दू पत्नियों को प्रेमजाल में फँसा कर पतियों की हत्या कराने का गंभीर मामला सामने आया था। फरीदाबाद और मुजफ्फरनगर में धोखे और अवैध संबंध का खुलासा होने पर पुलिस ने कड़ी कार्रवाई कर सादिक, रियाउल, कविता और सोनिया को गिरफ्तार कर लिया।

फरीदाबाद में पत्नी ने प्रेमी रियाउल के साथ मिलकर पति सुमन की हत्या कर उसका शव ट्रैक पर फेंक दिया। सुमन और उसकी पत्नी झारखंड के गोड्डा की रहने वाले थे, जबकि प्रेमी रियाउल पश्चिम बंगाल के मालदा का था। पत्नी कविता और उसका प्रेमी एक साथ फरीदाबाद के महाराजपुर में रह रहे थे।

दरअसल सुमन को उसकी पत्नी के अवैध संबंध की जानकारी हो गई थी। 30 नवंबर 2025 को सुमन की हत्या की गई और रेलवे ट्रैक पर शव रख दिया गया ताकि मौत की वजह का पता न चल सके। हालाँकि जाँच के दौरान सब सामने आ गया।

ऐसी ही एक घटना यूपी के मुजफ्फरनगर में हुई। यहाँ सोनिया ने अपने प्रेमी सादिक के साथ मिलकर पति संजीव उर्फ जीवन की गला घोंटकर हत्या कर दी और शव को कंबल में लपेट कर नाले में फेंक दिया था। सोनिया के मुताबिक, उसका प्रेम प्रसंग अपने ससुराल हरीनगर में रहने वाले सादिक से चल रहा था।

हत्या वाले दिन सोनिया ने पति संजीव को एक घर पर बुलाया था। वहाँ पहले से सादिक छिपा हुआ था। दोनों ने बेरहमी से रस्सी से गला घोंटकर संजीव की हत्या कर दी और शव को नाले में फेंक दिया। दोनों ही मामलों में हिंदू महिलाओं ने मुस्लिम प्रेमियों पर भरोसा कर अपनी जिंदगी पूरी तरह बर्बाद कर ली।

गुजरात में हिंदू लड़की के साथ लिव-इन में 3 बच्चों का अब्बू आबिद, युवती ने दी जान

गुजरात के वटवा इलाके से एक गंभीर मामला सामने आया थी। यहाँ एक मुस्लिम शख्स ने एक हिंदू लड़की को शादी का झाँसा देकर 2 साल तक धोखे में रखा। जब युवती को पता चला कि प्रेमी मोहम्मद आबिद का पहले ही निकाह हो चुका है और 3 बच्चों का अब्बू है तो वह यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने आत्महत्या कर ली।

युवती पिछले 2 साल से आरोपित मोहम्मद आबिद शेख के साथ सैयादवाड़ी में लिव-इन में रह रही थी। युवती के घरवालों ने उसे कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन आबिद के झूठे प्यार में पागल लड़की को लगा कि वह उससे शादी करेगा। असलियत तब खुली जब आबिद ने शादी से साफ इनकार कर दिया।

इसके बाद युवती को पता चला कि वह जिसे कुँवारा समझ रही थी, वह तो 3 बच्चों का अब्बा है। 22 जनवरी 2026 को युवती का शव उसके कमरे में मिला। परिवार का आरोप है कि आबिद अक्सर उनके साथ मारपीट करता था। हिंदू युवती के हाथ पर ब्लेड के निशान और आँखों के पास चोट भी मिली। आरोपित आबिद को जुहापुरा से गिरफ्तार किया गया था।

कर्नाटक में निकाह के लिए नहीं मानी रंजीथा तो रफीक ने बीच सड़क पर गला रेत डाला

कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के येल्लापुर कस्बे में 3 जनवरी 2026 को 30 वर्षीय दलित महिला की बीच सड़क पर चाकू मारकर हत्या कर दी गई। पुलिस के अनुसार, 4 जनवरी 2026 को हत्या का आरोपित रफीक इमामसाब भी जंगल में पेड़ से लटका पाया गया। जाँच के दौरान मृतका की पहचान कलम्मा नगर निवासी रंजीथा भानसोडे के रूप में हुई।

पुलिस ने बताया कि घटना वाले दिन रंजीथा अपने काम से घर लौट रही थी, तभी उस पर चाकू से हमला किया गया। हत्या का मुख्य आरोपित रफीक इमामसाब वारदात के बाद फरार हो गया था। प्रारंभिक जाँच में सामने आया कि आरोपित रंजीथा पर निकाह का दबाव बना रहा था। महिला और उसके परिवार ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था।

निकाह से इनकार के बाद आरोपित ने चाकू से हमला कर दिया। रंजीथा की करीब 12 साल पहले महाराष्ट्र के सोलापुर निवासी सचिन कटेरा से शादी हुई थी और उनका एक बेटा है। वह अपने पति से अलग रह रही थी और येल्लापुर में अपने परिवार के साथ रहती थी और एक सरकारी स्कूल में मिड-डे मील सहायक के रूप में काम करती थी।

हरियाणा में बिलाल ने 2 साल लिव-इन में रहने के बाद की उमा की गर्दन काटी

हरियाणा के यमुनानगर में बिलाल नामक शख्स को हिंदू प्रेमिका उमा की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। करीब दो साल से लिव इन में बिलाल के साथ रह रही उमा का गर्दन कटा हुआ शव बरामद हुआ था। उमा उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की रहने वाली थी। वह पहले से शादीशुदा थी और एक बच्चे की माँ भी थी।

वो बिलाल से शादी करने का कह रही थी लेकिन उसका दूसरी जगह निकाह तय हो गया था जिसके बाद वो उमा की हत्या की प्लानिंग करने लगा था। 14 दिसंबर 2025 को बिलाल का निकाह होना था, इससे पहले वह उमा को घुमाने के बहाने साथ लाया था। इस बीच बिलाल ने कार की सीट बेल्ट से उमा का गला घोंट दिया।

उसने शव की पहचान छिपाने के लिए उसकी गर्दन काट ली और पॉलिथीन में डालकर जंगल में फेंक दी। ताकि उसे कोई पहचान ना सके। पुलिस ने मर्डर को सुलझाने के लिए SIT गठित की थी और काफी तलाश के बाद जब पुलिस बिलाल के घर पहुँची तो उसके निकाह की तैयारी चल रही थी। मौके पर पहुँच कर पुलिस ने उसे अरेस्ट कर लिया।

गुजरात में फैजल पठान ने पहले बीवी की हत्या की फिर हिंदू गर्लफ्रेंड को भी मार डाला

गुजरात के नवसारी जिले में फैजल नासिर पठान को दो हत्याओं के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया था। पहले उसे हिंदू गर्लफ्रेंड रिया की हत्या मे गिरफ्तार किया गया। तभी खुलासा हुआ कि तीन महीने पहले आरोपित फैजल ने अपनी बीवी सुहाना का भी कत्ल किया था।

पुलिस को 29 अक्टूबर 2025 को खंडहर पड़े राइस मिल में महिला रिया का नग्न अवस्था में खून से लथपथ शव बरामद हुआ था। जाँच-पड़ताल के बाद पुलिस ने आरोपित फैजल नासिर पठान को गिरफ्तार कर लिया। फैजल ने बताया कि पैसों के लेनदेन पर हुए झगड़े के बाद उसने रिया की हत्या कर शव को खंडहर में छिपा दिया था।

पुलिस पूछताछ में ही फैजल नासिर ने बताया कि तीन महीने पहले जुलाई 2025 में उसने अपनी बीवी सुहाना को भी मार डाला था। उसने बताया कि सुहाना से परिवार के मर्जी के बिना निकाह किया था। इसके बाद दोनों के बीच मनमुटाव हुआ और तलाक हो गया। फिर फैजल ने सुहाना को उसी खंडहर में बुलाया और हत्या कर दी।

जबलपुर में अब्दुल समद ने पहले लक्ष्मी के पेट में घोंपा चाकू, फिर रेत दिया गला

जबलपुर के देवताल पहाड़ी पर 9 मई 2025 को 18 साल की लक्ष्मी अहिरवार की बेरहमी से हत्या हुई थी। इस खौफनाक हत्याकांड का खुलासा करते हुए पुलिस ने अब्दुल समद को गिरफ्तार किया था। हत्यारा नागपुर भागने की फिराक में था, लेकिन 48 घंटे के अंदर पुलिस ने उसे पकड़ लिया।

लक्ष्मी मूल रूप से छतरपुर के खजुराहो की रहने वाली थी। वह अपने परिवार के साथ जबलपुर में देवताल गार्डन के पास मंदिर निर्माण में मजदूरी करने आई थी। जनवरी 2025 में नागपुर में काम के दौरान उसकी मुलाकात अब्दुल से हुई। अब्दुल वहाँ वॉटर प्लांट में काम करता था। दोनों में दोस्ती हुई और फोन पर बातें शुरू हो गईं।

लक्ष्मी के खजुराहो लौटने पर अब्दुल ने उसे 10 हजार का मोबाइल गिफ्ट किया। लेकिन मई से लक्ष्मी ने उसकी कॉल्स उठाना बंद कर दिया। अब्दुल को शक हुआ कि लक्ष्मी किसी और लड़के से बात करती है। उसने लक्ष्मी के पुराने फोन की कॉल हिस्ट्री देखी, जिसमें खजुराहो के एक लड़के से बातचीत का पता चला।

लक्ष्मी ने अब्दुल के मुस्लिम होने की वजह से रिश्ता तोड़ने का फैसला किया। यह बात अब्दुल को बर्दाश्त नहीं हुई। उसने ठान लिया कि वह लक्ष्मी को सबक सिखाएगा। 7 और 8 मई को वह लक्ष्मी से मिलने जबलपुर आया। 9 मई को उसने मिठाई लाकर लक्ष्मी से कसम खाने को कहा कि वह किसी और से बात नहीं करती।

लक्ष्मी ने मिठाई खाने और कसम लेने से इनकार कर दिया। गुस्से में आगबबूला अब्दुल ने दो चाकू निकाले और लक्ष्मी पर ताबड़तोड़ वार किए। पहले पेट में चाकू घोंपा, फिर उसका गला रेत कर उसे मौत के घाट उतार दिया।

अब्दुल तो अब्दुल है, तुमसे मिलकर बदल थोड़े जाएगा

ये कुछ मामले आपके सामने हैं लेकिन कितनी ही घटनाएँ ऐसी होंगी, जिनका खुलासा ही नहीं हो सका। सोचने वाली बात है कि हर साल ऐसे मामले खबरों के रुप में सामने आते हैं, बावजूद इसके हिंदू लड़कियाँ-महिलाएँ लव जिहाद का शिकार बन रही हैं।

जैसे ही किसी अब्दुल से किसी हिंदू लड़की का प्रेम संबंध स्थापित होता है, उन्हें अपना समाज दुश्मन लगने लगता है और फिर वे कहती फिरती हैं कि ‘मेरा अब्दुल वैसा नहीं है।’ सच्चाई तो यहीं कि तुम उनके झाँसे में आकर धर्मांतरण के लिए भी राजी हो सकती हो, लेकिन अब्दुल तो अब्दुल ही रहेगा।

मिडिल ईस्ट अपडेट्स 07/04/26:अब तक 1800+ नाविक और 815000 लोग लौटे घर, जानिए सरकार ने और क्या-क्या बताया

ईरान युद्ध के कारण पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच, केंद्र सरकार ने 9 अप्रैल को रोज़ाना होने वाली अंतर-मंत्रालयी ब्रीफिंग आयोजित की। हालाँकि अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ़्ते के संघर्ष-विराम पर सहमति बन गई है, लेकिन उल्लंघन, शांति वार्ता की शर्तों में विरोधाभास और हिंसा के फिर से शुरू होने की आशंका के चलते स्थिति अभी भी नाज़ुक बनी हुई है।

MEA ने खाड़ी देशों के साथ भारत के जुड़ाव के बारे में जानकारी दी। प्रेस वार्ता के दौरान, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर संयुक्त अरब अमीरात का दौरा करेंगे, ताकि दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूती मिले।

MEA के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि हम पश्चिम एशिया में हो रहे घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रख रहे हैं और इस क्षेत्र के देशों के साथ लगातार संपर्क में हैं। जैसा कि पहले बताया गया था, विदेश मंत्री 11-12 अप्रैल 2026 को संयुक्त अरब अमीरात की आधिकारिक यात्रा पर जाएँगे। UAE के साथ संबंध को और मजबूत करने पर जोर देंगे और व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाएँगे। खाड़ी के दूसरे देशों से भी संपर्क साधा जा रहा है। पेट्रोलियम मंत्री 9-10 अप्रैल 2026 को कतर की यात्रा पर हैं।

अतिरिक्त सचिव (खाड़ी) असीम आर महाजन ने परिस्थिति की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि एक 24/7 कंट्रोल रूम और मिशन, एडवाइजरी, हेल्पलाइन और स्थानीय अधिकारियों के साथ तालमेल के जरिए लगातार मदद किया जा रहा है। 28 फरवरी को ईरान और इजराइल-अमेरिका के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से 815000 यात्री पश्चिम एशिया से वापस आ चुके हैं। UAE,सऊदी अरब, ओमान और कुछ हद तक कतर का एयरस्पेस खुला हुआ है। उन्होंने आगे कहा कि खाड़ी के जिन इलाकों में पाबंदियाँ हैं, वहाँ के लिए वैकल्पिक रास्तों का इंतजाम किया जा रहा है।

महाजन ने कहा कि भारत खाड़ी और पश्चिम एशिया के हालात पर करीब से नज़र रख रहा है, और एक 24/7 कंट्रोल रूम और मिशन, एडवाइज़री, हेल्पलाइन और स्थानीय अधिकारियों के साथ तालमेल के ज़रिए लगातार मदद दे रहे हैं। 28 फरवरी के बाद से 815,000 से ज़्यादा यात्री वापस आ चुके हैं, और उड़ानें उन देशों से चल रही हैं, जहाँ का एयरस्पेस खुला है। इनमें UAE, सऊदी अरब, ओमान और कुछ हद तक कतर शामिल हैं। जिन इलाकों में पाबंदियाँ हैं, जैसे- कुवैत, बहरीन, इजरायल और इराक, वहाँ के लिए वैकल्पिक रास्तों का इंतजाम किया जा रहा है। 2170 भारतीयों को आर्मेनिया और अजरबैजान के रास्ते ईरान से बाहर निकाला गया है। भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास जारी है।

पिछले 24 घंटों में किसी भी भारतीय जहाज या नाविक से जुड़ी कोई घटना सामने नहीं आई है।

बंदरगाह जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के संयुक्त सचिव मुकेश मंगल के मुताबिक, बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय, विदेश मंत्रालय (MEA) और भारतीय मिशनों के साथ अच्छा समन्वय है। पिछले 24 घंटों में किसी भी भारतीय जहाज या नाविक से जुड़ी कोई घटना सामने नहीं आई है और जहाज GreenAsha सुरक्षित रूप से JNPA पहुँच गया है।

उन्होंने कहा कि DG शिपिंग कंट्रोल रूम ने 5600 से ज्यादा कॉल और 12000 ईमेल का निपटारा किया है। इनमें पिछले 24 घंटों में आए 166 कॉल और 317 ईमेल शामिल हैं। अब तक 1800 से ज्यादा भारतीय नाविकों को सुरक्षित स्वदेश वापस लाया जा चुका है, जिनमें हाल ही में लौटे 49 नाविक भी शामिल हैं। बंदरगाहों पर काम सामान्य रूप से चल रहा है और नाविकों के कल्याण और समुद्री गतिविधियों में कोई रुकावट न आए, यह सुनिश्चित करने के प्रयास लगातार जारी हैं।

वैश्विक आपूर्ति में रुकावट के बावजूद दवाओं की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। फार्मास्यूटिकल्स विभाग के आधिकारिक प्रतिनिधि और रसायन उर्वरक मंत्रालय के संयुक्त सचिव सत्यप्रकाश ने माना कि ईरान युद्ध के कारण दवा बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की वैश्विक आपूर्ति में रुकावट आई है। हालाँकि, भारत में दवाओं की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं।

संकट में फार्मा क्षेत्र को सहारा देने के लिए केंद्र सरकार ने 40 पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर सीमा शुल्क घटाकर शून्य कर दिया है।

इसके अलावा, सरकार प्रमुख मंत्रालयों के साथ समन्वय कर रही है ताकि प्रोपलीन, अमोनिया और मेथनॉल जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। ये चीजें आइबुप्रोफेन जैसी दवाओं के लिए जरूरी हैं। मंत्रालय ने बताया कि मॉर्फोलिन और पैकेजिंग सामग्री की आपूर्ति का प्रबंधन भी किया जा रहा है।

संयुक्त सचिव ने कहा, “पश्चिम एशिया संकट के कारण फार्मा इनपुट की वैश्विक आपूर्ति में रुकावट आई है, जिसका असर सॉल्वैंट्स और APIs (दवाओं में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल) पर पड़ा है। हालाँकि दवाओं की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। इस क्षेत्र को सहारा देने के लिए सरकार ने 40 पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर सीमा शुल्क घटाकर शून्य कर दिया है। फार्मा और पेट्रोकेमिकल्स के बीच मजबूत जुड़ाव को देखते हुए, सरकार प्रमुख मंत्रालयों के साथ समन्वय कर रही है ताकि प्रोपलीन, अमोनिया और मेथनॉल जैसे महत्वपूर्ण इनपुट की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। ये आइबुप्रोफेन जैसी दवाओं के लिए जरूरी हैं।”

उन्होंने कहा कि मेथनॉल की आपूर्ति अभी भी हालाँकि चिंता का विषय बनी हुई है। घरेलू उत्पादक आगे आ रहे हैं और लॉजिस्टिक्स को मजबूत किया जा रहा है। मॉर्फोलिन और पैकेजिंग सामग्री जैसे अन्य इनपुट का प्रबंधन भी किया जा रहा है। उम्मीद है कि स्थिति जल्द ही सामान्य हो जाएगी। कुल मिलाकर, सरकार दवाओं के उत्पादन में किसी भी तरह का व्यवधान नहीं आने देना चाहती है। इस पर सरकार की कड़ी नजर है।

LPG में घरेलू ग्राहकों को प्राथमिकता

पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने गुरुवार को मीडिया को बताया कि पश्चिम एशिया संकट के कारण भारत में LPG की सप्लाई पर असर पड़ा है, क्योंकि देश की 60% LPG जरूरतें आयात से पूरी होती हैं। सरकार ने घरेलू ग्राहकों को प्राथमिकता दी है। इसके अलावा ऑनलाइन बुकिंग 98% तक पहुँच गई है, और OTP आधारित LPG डिलीवरी 92% पर है।

मंत्रालय ने माना कि सप्लाई चेन में रुकावटों के कारण कमर्शियल LPG पर असर पड़ा है। हालाँकि इसे लगभग 70% तक बहाल कर दिया गया है।

संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा के मुताबिक, “घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी गई है, और 100% सप्लाई सुनिश्चित की गई है। किसी भी LPG डिस्ट्रीब्यूटर के पास स्टॉक खत्म होने की कोई रिपोर्ट नहीं मिली है। 51 लाख से ज्यादा घरों में LPG सिलेंडर की डिलीवरी हुई। हमारी ऑनलाइन बुकिंग 98% तक पहुँच गई है। OTP आधारित LPG डिलीवरी 92% पर है। कमर्शियल LPG पर कुछ असर पड़ा है। हालाँकि इसे लगभग 70% तक बहाल कर दिया गया है। फार्मास्यूटिकल्स, फूड, पॉलीमर्स, कृषि, पैकेजिंग और पेंट्स जैसे सेक्टरों के लिए थोक गैर-घरेलू LPG सप्लाई भी बहाल कर दी गई है।”

इसके अलावा, पेट्रोलियम मंत्रालय ने बताया कि छात्रों और मजदूरों की मदद के लिए 5 kg LPG सिलेंडरों की सप्लाई बढ़ा दी गई है। तेल मार्केटिंग कंपनियों ने लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए कैंप भी लगाए गए हैं।

मंत्रालय के मुताबिक, “छात्रों और मजदूरों की मदद के लिए 5 kg LPG सिलेंडरों की सप्लाई बढ़ा दी गई है। पिछले हफ़्ते में, तेल मार्केटिंग कंपनियों ने 2000 से ज्यादा जागरूकता कैंप लगाए। एक ही दिन में 1.06 लाख से ज्यादा 5 kg सिलेंडर बिके, जबकि फरवरी में औसत बिक्री लगभग 77,000 थी। 23 मार्च से अब तक ऐसे लगभग 10 लाख सिलेंडर बिक चुके हैं।”

अरफा के लिए US-इजरायल की मार से तबाह हुआ ईरान ‘विश्वगुरु’, वो सुपरपॉवर भी: ‘उम्माह’ के लिए कुछ भी करेगा ‘इस्लामी’ इकोसिस्टम, समझें इनका दोहरापन

अरफा खानम शेरवानी जिन्हें हम सब ‘अरफा’ के नाम से जानते हैं, एक बार फिर अपने दोगले चेहरे का प्रदर्शन कर रही हैं। बुधवार (08 अप्रैल 2026) को ही उन्होंने दो पोस्ट किए। पहले पोस्ट में लिखा कि “ईरान उभर के सामने आया है” और दूसरे में सीधे घोषणा कर दी- “I have no hesitation in saying that after defeating America, Iran is now the ultimate ‘Vishwa Guru’ of the world”। फिर ईरान दूतावास की पोस्ट को कोट करते हुए लिख दिया, “Hello Superpower 👋”। वाह रे अरफा! विश्वगुरु? सचमुच?

याद दिला दें कि जब भारत के संदर्भ में ‘विश्वगुरु’ शब्द आता है तो इन कॉन्ग्रेसियों और इस्लामी इकोसिस्टम वालों को चिढ़ मच जाती है। जब पीएम मोदी ने जब भारत को विश्वगुरु बनाने की बात की तो इन्हें हँसी आ गई, ट्रोलिंग शुरू हो गई। लेकिन आज अस्थाई संघर्ष-विराम के मौके पर अचानक ईरान को ‘विश्वगुरु’ और ‘सुपरपावर‘ बताने लगी हैं। समझते भी हैं ये लोग कि विश्वगुरु होने का मतलब क्या होता है? या फिर बस उम्माह का झंडा लेकर घूमने का बहाना चाहिए?

अरफा, कल तक तुम अयातोल्ला की ख़िलाफ़त कर रही थीं। महिला अधिकार, मानवाधिकार, फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन के नाम पर ईरान की तानाशाही को कोस रही थीं। फिर अचानक अमेरिका के खिलाफ़ ‘इस्लामी उम्माह’ का नारा लगाने लगीं।

और अब? अस्थाई सीजफायर होते ही ईरान को विश्वगुरु साबित करने में जुट गईं।

क्यों?

क्योंकि तुम्हारा सहोदर पाकिस्तान वहाँ दलाली करने लगा था। बात अब उम्माह की हो गई है ना?

वर्ना उसी ईरान के मूल निवासियों (पारसियों) को भारत ने अपने घर में पनाह दी है। बिना किसी परेशानी के। वे यहाँ फल-फूल रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, पढ़ रहे हैं, परिवार चला रहे हैं। लेकिन अरफा को समस्या भारत से इस बात की है कि वो तमाम झंझावातों के बीच भी अपने सभी लोगों का ख्याल रख रहा है। उसी ईरान से लोगों को बाहर निकालकर ला रहा है, जिसमें अधिकतर इसके मुस्लिम भाई ही हैं। फिर भी इन नमकहरामों के मन में भारत के प्रति इतनी घृणा बैठी हुई है कि बर्बाद हो चुके ईरान में उन्हें विश्वगुरु दिखने लगा है।

इसे ही कहते हैं दोगलापन। ये खाएँगी भारत का, भारत की हवा-पानी, भारत की आजादी, भारत की मीडिया में छूट, भारत की सिक्योरिटी। लेकिन गाएँगी ईरान का, पाकिस्तान का, लेबनान का, गाजा का… या हर उस जगह का जहाँ इनके उम्माह वाले दिखेंगे। हाँ भाई, क्यों नहीं? क्योंकि ये तो ‘काफिरों’ का देश है ना। तो इनका प्रेम ‘अपने’ उम्माह भाइयों पर ही रहेगा। चाहे वहाँ लाखों मार दिए जाएँ (अयातोल्लाओं की ओर से) या इनके बंधु पूरी दुनिया को बम-धमाकों में उड़ाते रहें जन्नत के नाम पर।

अभी उसी ईरान से तस्वीरें सामने आई हैं, जिसमें अपने पुलों को बचाने के लिए ईरान महिलाओं और बच्चों की ह्यूमन चेन बना रहा है। महिलाएँ, बच्चे – जिनकी सुरक्षा के नाम पर अरफा पहले चिल्लाती थीं- आज उनको ढाल बनाकर पुल बचा रहे हैं। और अरफा? उन्हें ‘विश्वगुरु’ कह रही हैं। वाह रे दोगलों! कल तक महिला-वाद के नाम पर अयातोल्ला को कोसती थीं, आज वही महिलाएँ ह्यूमन शील्ड बन रही हैं तो मुँह बंद। क्योंकि अब उम्माह का मुद्दा आ गया।

अरफा तुम The Wire की सीनियर एडिटर हो, AMU की एलुम्ना हो। तुम्हारा पूरा इकोसिस्टम कॉन्ग्रेस और इस्लामी लॉबी का है। तुम्हें हमेशा ‘सेकुलरिज्म’ का ढोंग रचाना पड़ता है। लेकिन जब बात अपनी आती है तो असली चेहरा सामने आ जाता है। पाकिस्तान से प्यार, ईरान से प्यार, गाजा से प्यार – लेकिन भारत? भारत तो बस ‘फासीवादी’ है, ‘इस्लामोफोबिक’ है। भारत ने ईरानियों को शरण दी, उनको सुरक्षा दी, लेकिन तुम्हें ये सहन नहीं होता। क्योंकि तुम्हारा दिल कहीं और बसता है। तुम्हें भारत की तरक्की, भारत की मजबूती, भारत की विश्व पटल पर बढ़ती पहचान कभी रास नहीं आई।

देखो अरफा, विश्वगुरु बनने के लिए सिर्फ़ एक युद्ध में अमेरिका से टकराना काफी नहीं होता। विश्वगुरु वो होता है जो अपने नागरिकों की रक्षा करे, महिलाओं को आजादी दे, बच्चों को भविष्य दे, अर्थव्यवस्था को मजबूत करे। ईरान में आज महिलाएँ हिजाब के नाम पर कोड़े खा रही हैं, विरोध करने पर जेल जा रही हैं। लेकिन तुम्हें वो ‘सुपरपावर’ दिख रहा है। क्योंकि तुम्हारा एजेंडा हिंदुस्तान को नीचा दिखाना है। तुम चाहती हो कि भारत हमेशा ‘दूसरे’ देशों के मुकाबले छोटा दिखे।

ये दोगलापन सिर्फ़ तुम्हारा नहीं, पूरे उस इकोसिस्टम का है जिसमें तुम खड़ी हो। कल अमेरिका दुश्मन था, आज ईरान हीरो बन गया। कल पाकिस्तान ‘पीस’ का दूत था, आज ईरान ‘विश्वगुरु’। कल महिला अधिकार, आज उम्माह। कल सेकुलर, आज इस्लामी ब्रदरहुड। ये चरित्रहीनता है। ये नमकहरामी है।

अरफा, तुम भारत में बैठकर ईरान का गान गा सकती हो। लेकिन हकीकत ये है कि भारत ने तुम्हें वो आजादी दी है जो ईरान में कभी नहीं मिलेगी। तुम बिना हिजाब के घूम सकती हो, बिना डरे बोल सकती हो, बिना जेल गए आलोचना कर सकती हो। लेकिन तुम्हें ये आजादी भी भारत से ही मिली है। फिर भी तुम्हारा दिल ईरान और पाकिस्तान के लिए धड़कता है।

ये ही तो दुख की बात है। भारत तुम्हें खिला-पिला रहा है, लेकिन तुम्हारा प्रेम ‘अपने’ उम्माह भाइयों के लिए है। बर्बाद ईरान में विश्वगुरु ढूँढ रही हो, जबकि असली विश्वगुरु वो देश है जो तुम्हें शरण दे रहा है। लेकिन तुम्हारा? वाह रे दोगलों… वाह!

‘पूरे सभ्यता का कर दूँगा नाश’ से लेकर ‘लोगों को मारकर आया मजा’ तक: पढ़िए 40 दिन में कितने हिंसक हुए ट्रंप, कभी बौराए हुए थे नोबेल सम्मान के लिए

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने 8 युद्ध रुकवाने के नाम पर नोबल शांति पुरस्कार की माँग की थी, लेकिन पुरस्कार नहीं मिला। फिर क्या था, ट्रंप ने दिखाया अपना असली रंग। नोबल देने वाली समिति से लेकर नार्वे, डेनमार्क और दूसरे नाटो के सदस्यों, कनाडा और कई देशों को धमकाते-धमकाते वेनेजुएला और फिर ईरान पर हमलावर हो गए।

ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने कभी युद्ध जीत लेने की बात कही, तो कभी ईरान को गालियाँ दी। इतना ही नहीं, उन्होंने एक रात में ईरानी सभ्यता को नष्ट करने और ‘पाषाण युग’ में भेज देने का दावा भी किया। साथ ही, यह भी कहा कि ईरानी हमले का ‘टारगेट’ पूरा कर लिया गया है। रिजीम बदल दिया गया है, क्योंकि सारे बड़े नेता मारे गए हैं। पिछले करीब 40 दिनों में उनके बयान से अंदाजा लगाया जा सकता है कि ‘विश्वशांति के दूत’ बनने वाले ट्रंप का चाल, चरित्र और चेहरा क्या है।

युद्ध की शुरुआत से लेकर सीजफायर तक ट्रंप ने कई विध्वंसक बयान दिए। अमेरिका और इजरायल के हमले में जब ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की मौत हो गई थी, तो उन्होंने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि खामेनेई ने उन्हें दो बार मारने की कोशिश की, इसलिए उसे मार दिया।

मोज्तबा खामेनेई के जिंदा रहने की बात कहते हुए कहा था कि नए सुप्रीम लीडर खामेनेई ज्यादा दिनों तक सुरक्षित नहीं रह पाएगा। ट्रंप ने कहा कि जो नए लीडर बन सकते थे वे ज्यादातर मर चुके हैं।

ईरानी युद्धपोत को डुबोने पर ‘मजा’ आया

ईरान का युद्धपोत IRIS डेना जब हिन्द महासागर में श्रीलंका के तट के पास से गुजर रहा था तो अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो हमले से ईरान के आधुनिक युद्धपोत IRIS डेना को डुबो दिया। अमेरिका ने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत करीब 46 ईरानी शिप को समुद्र में डुबोने का दावा किया। इस पर राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उनके सैनिकों को ईरानी शिप पर कब्जा करने से ज्यादा उन्हें डुबोने में मजा आता है।

एक रात में सभ्यता के अंत की धमकी

सीजफायर से पहले 7 अप्रैल 2026 को उन्होंने ईरान को धमकाते हुए कहा था कि आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है, जो वापस कभी नहीं आएगी। उन्होंने कहा कि वो ऐसा नहीं चाहते हैं, लेकिन अगर ईरान ने समझौता नहीं किया तो ऐसा ही होगा।

ईरान युद्ध के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने कई बार ईरान को पूरी तरह तबाह करने की धमकी दी। अमेरिकी अल्टीमेटम से 48 घंटे पहले भी उन्होंने कहा कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका ‘ईरान को उड़ा देगा’।

ट्रंप ने कहा, “हम ईरान के साथ अच्छी तरह बातचीत कर रहे हैं। लेकिन हम किसी नतीजे तक नहीं पहुँचे हैं। समझौते की अच्छी संभावना है। अगर नहीं हुआ, तो मैं वहाँ सब कुछ उड़ा दूँगा।”

गालियाँ देते हुए नरक में भेजने की दी धमकी

राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को 6 अप्रैल को एक बार फिर तबाह करने की धमकी दी। सोशल मीडिया पर गालियाँ देते हुए उन्होंने कहा कि पावर प्लांट डे और ब्रिज डे- दोनों एक साथ मनाएँगे वरना होर्मुज खोल दो। तुम लोगों को नरक में पहुँचा देंगे। ईरान के होर्मुज नहीं खोलने पर गालियाँ दी और ‘पाषाण युग में पहुँचा’ देने की बात कही।

इतना ही नहीं दो हफ्ते के सीजफायर के बाद भी ईरान को धमकाते हुए कहा कि अमेरिकी सेना मध्यपूर्व में रहेगी और असली समझौता नहीं हुआ तो ‘ बड़े और ज्यादा तेज हमले शुरू हो जाएँगे।’

होर्मुज स्ट्रेट को लेकर नाटो देशों को धमकी

उन्होंने होर्मुज खोलने के लिए नाटो देशों से मदद माँगी और जब ज्यादातर नाटो देशों ने मदद देने से इनकार कर दिया तो कहा कि उन्हें नाटो देशों की जरूरत नहीं है। वह अपने दम पर होर्मुज को खुलवा सकते हैं। इसके बाद उन्होंने कहा कि होर्मुज के बगैर भी उनका काम चल सकता है, क्योंकि अमेरिका के पास रूस- चीन से ज्यादा खुद का तेल है और जिन देशों को होर्मुज से तेल मँगवाने की जरूरत है, वे इसके लिए कोशिश करें। अमेरिका को इसकी जरूरत नहीं है।

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका किसी देश की मदद नहीं करेगा, उन्हें अपने लिए खुद खड़ा होना होगा। इसके अलावा ट्रंप ने अमेरिका से तेल खरीदने का भी विकल्प दिया। लेकिन सीजफायर से पहले ईरान को होर्मुज नहीं खोलने पर पावर प्लांट, तेल ढाँचे को नष्ट करने की धमकी दे डाली थी।

ट्रंप ने युद्ध के दौरान यहाँ तक कहा कि ईरान अमेरिका के लिए बड़ी संख्या में तेल टैंकर भेज रहा है। ट्रंप के मुताबिक ईरान ने पहले 10 और अब कुल 20 बड़े तेल टैंकर अमेरिका को भेज रहा है, जो स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से होकर गुजरेंगे। जबकि ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को इजरायल और अमेरिका के लिए बंद करने की बात कही थी।

पाषाण युग से स्वर्ण युग तक की बात

जो राष्ट्रपति ट्रंप एक हफ्ते पहले ईरान को पाषाण युग में पहुँचा देने की बात कह रहे थे, वे एक हफ्ते में ही पलट गए। ईरान और अमेरिका में दो हफ्ते के सीजफायर के बाद ‘स्वर्ण युग’ की बात कही। इस ऐतिहासिक बदलाव की बात उन्होंने सोशल मीडिया ट्रूथ पर की। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि दुनिया में तेल की आवाजाही के लिए अहम होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने के लिए कहा है। ईरान इस रास्ते पर अपना नियंत्रण रखेगा।

जिस ट्रंप ने पहले ईरान के बिजली घरों और पूलों को निशाना बनाने के लिए डेडलाइन दी थी, उसने ईरान के पुनर्निमाण की प्रक्रिया शुरू करने और मध्यपूर्व के ‘स्वर्णयुग’ की बात की।

खुद को शांति का दूत बताया था ट्रंप ने

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नोबल शांति पुरस्कार चाहिए था। उन्होने दुनियाभर में युद्ध रुकवाने का श्रेय लेते हुए कहा था कि दुनिया का कोई प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति उनके नजदीक नहीं हैं, जिन्होंने 8 युद्ध रुकवाए हों।

जिन युद्धों को रुकवाने का जिक्र किया, उसमें पाकिस्तान के खिलाफ भारत का ऑपरेशन सिंदूर भी शामिल है। इसके अलावा कंबोडिया और थाइलैंड. कोसोबो-सर्बिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और रवांडा, इजरायल-ईरान, मिश्र-इथियोपिया, आर्मेनिया-अजरबैजान शामिल है। इन युद्धों को रुकवाने की बात करते करते उन्होंने 15 से ज्यादा बार ‘ऑपरेशन सिंदूर’ खत्म करवाने की बात की। लेकिन सच यही है कि ऑपरेशन सिंदूर रोका गया था। इसके पीछे पाकिस्तान की गिड़गिड़ाकर युद्धविराम की भीख माँगना था, न की ट्रंप की दखलंदाजी।

शांति पुरस्कार नहीं मिलने के बाद ट्रंप आक्रामक नजर आए। उन्होंने नोबल पुरस्कार देने वाली कमेटी पर सवाल उठाए और नॉर्वे को भी धमकाया। वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को रातों रात घर से उठाकर अपने देश ले गए और वेनेजुएला को अपने इशारों पर चलने के लिए विवश कर दिया। उन्होंने खुद को कार्यकारी राष्ट्रपति तक घोषित कर दिया। दरअसल ट्रंप की नजर वेनेजुएला के तेल भंडार पर थी, जिस पर अब अमेरिका का नियंत्रण है।

ट्रंप का आक्रामक रवैया उस वक्त भी सामने आया जब उसने ‘रेयर अर्थ मेटल्स’ की बहुलता वाले ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के लिए डेनमार्क को अल्टीमेटम दे दिया। उन्होंने नाटो देशों को मजबूर करने की कोशिश की, कि वे अमेरिका का समर्थन करें।

बृहत अमेरिका बनाने की मंशा से उन्होंने कनाडा को अमेरिका में मिलाकर 51वां राज्य बनाने की बात कही। इसका कनाडा में काफी विरोध भी हुआ।

विश्वशांति के लिए पुरस्कार पाने की लालसा रखने वाले ट्रंप ने शांति को काफी पीछे छोड़ दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से बाहर निकलने की घोषणा कर दी और अमेरिकन फंडिंग रोक दी। विश्वभर को टैरिफ की धमकी देकर अपनी शर्तों पर ट्रेड डील करने वाले राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर सीधा आक्रमण भी किया। इजरायल के साथ मिलकर 28 फरवरी को जिस युद्ध की उन्होंने शुरुआत की, उसका मकसद ईरान को परमाणु संपन्न बनने से रोकने का बताया गया। इस दौरान ईरान को ‘जानवर’, ‘पाषाण युग में भेजना’, ‘नरक में भेजना’, तबाह कर देने से लेकर गालियाँ तक दे डाली।

ईरानी उड़ाए मजाक, नेटीजन्स कहे अमेरिका का ‘दलाल’: मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच घुसे पाकिस्तान को हर ओर से पड़ रही लात, जानिए कैसे दोनों देशों को गुमराह करने में आतंकिस्तान का हाथ

अमेरिका और ईरान के बीच 6 हफ्तों से चल रही भीषण जंग पर दो हफ्ते के लिए ‘ब्रेक’ तो लग गया है, लेकिन इस ब्रेक के पीछे ‘शांतिदूत’ बनने की कोशिश करने वाले पाकिस्तान की अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थू-थू हो रही है। खुद को मध्यस्थ बताने वाला पाकिस्तान अब ‘दलाली’ के आरोपों और सोशल मीडिया पर भद्दी गालियों का सामना कर रहा है। वजह है… सीजफायर की शर्तों को लेकर पैदा की गई वो गफलत, जिसने ईरान और इजरायल को फिर से आमने-सामने खड़ा कर दिया है।

प्रस्तावों की गफलत: ईरान के 10-सूत्रीय प्लान में लेबनान का जिक्र

ईरान ने युद्धविराम के लिए 10 शर्तों का एक प्रस्ताव रखा था, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बातचीत के लिए एक सही आधार माना। इस प्रस्ताव में ईरान ने मुख्य रूप से तीन बड़ी माँगें रखी थीं, पहली यह कि अमेरिका भविष्य में दोबारा हमला न करने की पक्की गारंटी दे, दूसरी यह कि व्यापार के लिए बेहद जरूरी ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ वाले समुद्री रास्ते पर ईरान का ही कब्जा बना रहे, और तीसरी सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि लेबनान में हिजबुल्लाह समेत तमाम मोर्चों पर चल रही जंग को तुरंत रोका जाए।

यही लेबनान वाला मुद्दा इस पूरे समझौते में विवाद और फजीहत की सबसे बड़ी वजह बन गया। दरअसल, पाकिस्तान ने बीच में पड़कर ईरान को यह यकीन दिला दिया था कि अमेरिका लेबनान में भी हमले रोकने के लिए तैयार है। लेकिन जैसे ही सीजफायर शुरू हुआ और इजरायल ने लेबनान पर ताबड़तोड़ बमबारी जारी रखी, वैसे ही पाकिस्तान के दावों की पोल खुल गई। इससे यह साफ हो गया कि पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच तालमेल बैठाने के बजाय गलत जानकारी फैलाई थी, जिसके कारण अब उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी किरकिरी हो रही है।

जेडी वेंस का करारा जवाब: ‘लेबनान शामिल ही नहीं था’

जब लेबनान हमलों पर सवाल उठा, तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान ने ‘कन्फ्यूजन’ पैदा की है। जेडी वेंस ने कहा, “लेबनान का मुद्दा सीजफायर की शर्तों में शामिल ही नहीं था। ईरानियों को शायद गलतफहमी हुई या गलत जानकारी दी गई।” ट्रंप और नेतन्याहू ने भी साफ कर दिया कि यह सीजफायर सिर्फ ईरान और अमेरिका के बीच है, लेबनान के हिजबुल्लाह के लिए नहीं। पाकिस्तान ने अपनी ‘पीठ थपथपाने’ के चक्कर में दोनों पक्षों को अलग-अलग बातें बता दीं, जिसका नतीजा अब गालियों के रूप में सामने आ रहा है।

सोशल मीडिया पर ‘आतंकिस्तान’ की शामत: ईरानियों ने भी लताड़ा

पाकिस्तान को केवल भारत ही नहीं, बल्कि अब ईरानी नागरिक भी जमकर खरी-खोटी सुना रहे हैं। सोशल मीडिया पर #FuckPakistan ट्रेंड कर रहा है। खुद को ईरानी बताने वाले अकॉउंट्स पाकिस्तान को जमकर लताड़ रहे हैं और साथ ही भारत की तारीफ कर रहे हैं।

ثنا ابراهیمی (Sana Ebrahimi) ने साफ लिखा, “ईरानियों के पाकिस्तान से नफरत करने के कई कारण है।” फिर, “पाकिस्तान को फिर से भारत बना दो। मैं उस देश पर भरोसा नहीं करती जिसने ओसामा बिन लादेन को पनाह दी।” उन्होंने यहाँ तक कहा कि ‘जम्मू-कश्मीर भारत का है।’

کاپیتان (The Captwin) ने लिखा, “पाकिस्तानी बिना इंटरनेट के शहबाज का बचाव करने कैसे आएँगे?”, अन्य पोस्ट में लिखा, “पाकिस्तान बम।” इन्होंने भारतीय मीम्स की तारीफ की और 1971 में भारत के सामने 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों के सरेंडर की याद दिलाई।

صادُقِ زَمَند (Zamandaam) ने तंज कसा, “एक ऐसा देश जो आतंकवाद का पालना है और परमाणु बम की धमकी देता है, वो शांति कराएगा? पाकिस्तान और शांति? मज़ाक है क्या! पाकिस्तान, बांग्लादेश और मौजूदा पाकिस्तान को ‘ग्रेटर भारत’ (Greater India) में मिला देना चाहिए।”

इसके अलावा, यूजर ने लिखा, “ईरान का सबसे ज़्यादा परेशान करने वाला पड़ोसी पाकिस्तान है। यह सचमुच एक बेकार और घटिया देश है। पाकिस्तान से हमेशा एक गंदी, पिछड़ी, अंधविश्वासी और प्रदूषित सी वाइब आती है। सच कहूँ तो, मुझे हमेशा से पाकिस्तान और पाकिस्तानियों से नफरत रही है। मुझे उम्मीद है कि भारत इस बेकार और गंदे देश का किस्सा हमेशा के लिए खत्म कर देगा।”

डूब मरने की सलाह और कड़वा सच

पाकिस्तान की हालत आज उस बिन बुलाए बाराती जैसी है जो शादी में क्रेडिट लेने के चक्कर में जूते खा रहा है। एक तरफ उसका अपना मुल्क आर्थिक तंगहाली में डूबा है, और दूसरी तरफ वह दो परमाणु शक्तियों के बीच ‘शांतिदूत’ बनने का स्वांग रच रहा था। पाकिस्तान ने सोचा था कि वह इस मध्यस्थता के जरिए दुनिया में तारीफ बटोरेगा, लेकिन उसकी ‘कॉपी-पेस्ट’ कूटनीति ने उसे दुनिया के सामने एक ‘मैसेंजर बॉय’ और ‘दलाल’ बनाकर छोड़ दिया है।

ईरानियों का यह कहना कि ‘पाकिस्तान उनके पड़ोस का सबसे गंदा और बेकार देश है’, यह बताने के लिए काफी है कि मजहब के नाम पर भी पाकिस्तान की कोई इज्जत नहीं बची है। भारत की विदेश नीति जहाँ स्वतंत्र और अडिग है, वहीं पाकिस्तान आज भी ‘किराए के बिचौलिए’ से ज्यादा कुछ नहीं बन पाया। कुल मिलाकर, पाकिस्तान के लिए यह सीजफायर ‘गले की हड्डी’ बन गया है, न निगलते बन रहा है, न उगलते।