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शादी जहीर इकबाल और सोनाक्षी सिन्हा की, बवाल UP के कुशीनगर में: आजाद आलम की पोस्ट से बिगड़ा माहौल, FIR के बाद पुलिस ने पकड़ा

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में सोनाक्षी सिन्हा की शादी पर डाली गई एक पोस्ट को लेकर साम्प्रदायिक तनाव फ़ैल गया। अपनी पोस्ट में आज़ाद आलम नाम के युवक ने सोनाक्षी के शौहर को अंधभक्तों का जीजा बताया था। आज़ाद आलम की पोस्ट वायरल होने के बाद सोमवार (24 जून 2024) को हिन्दू समाज के लोग सड़क पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे। पुलिस ने हालात को शांत करवाया और मामले में FIR दर्ज कर ली। आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है।

यह मामला कुशीनगर के विशुनपुरा का है। यहाँ के गाँव ठाढ़ीभार निवासी रविवार (23 जून) को आज़ाद आलम ने अपने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली। पोस्ट में उसने जहीर इक़बाल और सोनाक्षी सिन्हा की एकसाथ खींची गईं 3 तस्वीरों को अटैच किया था। कैप्शन के तौर पर उसने लिखा, “सोनाक्षी सिन्हा जी आपको शादी मुबारक, और अंधभक्तों को उसका जीजा मुबारक।” इसी पोस्ट के साथ आलम ने सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इक़बाल का इंग्लिश में हैशटैग भी लगाया।

अगले दिन सोमवार को यह पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। हिन्दू पक्ष के लोग सड़क पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे। उन्होंने आज़ाद आलम पर कड़ी कार्रवाई की माँग शुरू कर दी। मामले की सूचना मिलते ही पुलिस फ़ौरन मौके पर पहुँची। लोग कार्रवाई की माँग को लेकर अड़े हुए थे। पुलिस ने नाराज लोगों को समझा कर शांत करवाया। लगभग 2 घंटे तक माहौल अस्त-व्यस्त रहा। पुलिस ने आज़ाद आलम के खिलाफ FIR दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया है।

मोहम्मद अतिउल्लाह का बेटा आज़ाद आलम गाँव में BDC का चुनाव लड़ चुका है। अपने चुनाव प्रचार में उसका नारा था, “उनका जो फर्ज है वो अहल ए सियासत जानें, मेरा पैगाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे।” आज़ाद आलम खुद को शेख और डॉक्टर भी बताता है। वह जिस ठाढ़ीभार के जिस इलाके में रहता है उसे शेखपट्टी बुलाया जाता है। आरोपित के खिलाफ आईटी एक्ट सहित अन्य धाराओं में कार्रवाई हुई है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

NEET-UG विवाद: क्या है NTA, क्यों किया गया इसका गठन, किस तरह से कराता है परीक्षाओं का आयोजन… जानिए सब कुछ

नीट-यूजी ( NEET-UG ) परीक्षा को लेकर विवादों में घिरे राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी ( NTA ) सुधार की जरूरत को दखते हुए एक पैनल का गठन किया गया है। केंद्र सरकार ने शनिवार (22 जून 2024) को परीक्षाओं के पारदर्शी और निष्पक्ष संचालन को सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञों की एक हाई लेवल कमेटी बनाने की घोषणा की है। ये कमेटी एनटीए की संरचना, कार्यप्रणाली, परीक्षा प्रक्रिया, पारदर्शिया और डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल को बेहतर बनाने की सिफारिश करेगा।

इस कमेटी की अध्यक्षता भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष और आईआईटी कानपुर के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के अध्यक्ष डॉ. के राधाकृष्णन करेंगे। पैनल के अन्य सदस्यों में शामिल हैं –

डॉ. रणदीप गुलेरिया, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के पूर्व निदेशक
प्रोफेसर बी.जे. राव, कुलपति, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय
प्रो. राममूर्ति के, प्रोफेसर एमेरिटस, सिविल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी मद्रास
पंकज बंसल, पीपल स्ट्रॉन्ग के सह-संस्थापक और कर्मयोगी भारत के बोर्ड सदस्य
प्रो. आदित्य मित्तल, आईआईटी दिल्ली में छात्र मामलों के डीन
गोविंद जायसवाल, संयुक्त सचिव, शिक्षा मंत्रालय (सदस्य सचिव)

शिक्षा मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, उच्च स्तरीय पैनल पूरी परीक्षा प्रक्रिया का विश्लेषण करेगा और सिस्टम की दक्षता बढ़ाने के तरीके सुझाएगा। पैनल राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी की मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) की व्यापक समीक्षा करेगा और उन्हें मजबूत बनाने के उपाय सुझाएगा। इसके अतिरिक्त, सदस्य हर चरण में अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र की सिफारिश करेंगे।

कैसे बना था एनटीए?

सरकार ने एनटीए में सुधार के लिए एक पैनल की घोषणा की है। सवाल ये खड़ा होता है कि एनटीए आखिर है क्या और क्यों इसका गठन किया गया था? दरअसल, एनटीए जैसी संस्था के गठन की माँग काफी पुरानी थी, लेकिन इसका गठन 7 साल पहले किया गया था। एनटीए का गठन परीक्षा प्रक्रिया को सुधारने और राज्य स्तरीय परीक्षा एजेंसियों और कई अन्य एजेंसियों की कमियों को दूर करने के लिए की गई थी।

वैसे, एनटीए की स्थापना के पीछे साल 1992 की कार्ययोजना कार्यक्रम से जुड़ी सिफारिशें हैं, जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य एंट्रेंस टेस्ट की बात कही गई थी। ये बात राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में भी थी, जिसमें ऐसी एजेंसी की जरूरत पर जोर दिया गया था।

साल 2010 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) के निदेशकों की एक समिति ने स्वायत्तता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कानून के माध्यम से एजेंसी की स्थापना की सिफारिश की थी। अमेरिका में शैक्षिक परीक्षण सेवा (ETS) की तर्ज पर एजेंसी के विकास को 2013 में आगे बढ़ाया गया, जब मानव संसाधन विकास मंत्रालय (अब शिक्षा मंत्रालय) ने योजना तैयार करने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया। NTA की स्थापना की आधिकारिक घोषणा 2017 में की गई, जिसके बाद कैबिनेट ने इसे मंजूरी दे दी।

एनटीए की माँग राज्य स्तरीय परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं में कमियों तथा उन छात्रों के लिए प्रक्रिया को सरल बनाने की आवश्यकता से उत्पन्न हुई, जिन्हें स्वतंत्र रूप से कई प्रवेश परीक्षाएँ उत्तीर्ण करनी होती हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “एनटीए की स्थापना का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कई सारे एंट्रेंस टेस्ट की वजह से छात्रों पर काफी दबाव पड़ता है, जिसे बदलने की जरूरत है।”

राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी

साल 2017 में केंद्र सरकार ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत उच्च शिक्षा विभाग के तहत एक स्वायत्त निकाय के रूप में राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) की स्थापना की। यह उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश और फेलोशिप के लिए परीक्षा आयोजित करता है। वर्तमान में, यह JEE Main, NEET-UG, NET, CMAT और GPAT सहित इंजीनियरिंग, चिकित्सा, प्रबंधन और फार्मेसी जैसे क्षेत्रों में प्रवेश और भर्ती के लिए विभिन्न राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएँ आयोजित करने के लिए जिम्मेदार है। कुल मिलाकर एनटीए उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए 15 अत्यधिक प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षाएँ आयोजित करता है।

एनटीए को पहले साल 25 करोड़ का बजट मिला और इसने 5 सितंबर 2018 को अपना कामकाज चालू किया। पहले साल में एनटीए ने सिर्फ UGC-NET परीक्षा आयोजित की। साल 2019 के बाद से इसने धीरे-धीरे अन्य परीक्षाओं की जिम्मेदारी संभालनी शुरू कर दी। मौजूदा समय में एनटीए के पास 2546 से अधिक परीक्षा सेंटर हैं।

एनटीए आधिकारिक तौर पर सोसायटी (पंजीकरण) अधिनियम, 1860 के तहत एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत है। शुरुआत में यह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा कराई जाने वाली परीक्षाओं के साथ-साथ अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) द्वारा नामित सीएमएटी और जीपीएटी परीक्षाओं का संचालन करता था।

मौजूदा समय में यूपीएससी के पूर्व अध्यक्ष प्रदीप कुमार जोशी एनटीए की अगुवाई कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में 14 सदस्यीय टीम एनटीए का काम देख रही है, जिसमें तीन आईआईटी, दो एनआईटी और दो आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के निदेशकों के साथ-साथ अन्य शैक्षिक और चिकित्सा विशेषज्ञ और नौकरशाह शामिल हैं। एनटीए परीक्षा की तैयारी से लेकर सेंटर निर्धारण और परीक्षा के पेपर बनाने से लेकर परीक्षा कराने संबंधी हरेक काम को “वैज्ञानिक तरीके” से संभालता है, और पूरी प्रक्रिया के दौरान विषय विशेषज्ञों और मनोचिकित्सकों से परामर्श करता है।

एनटीए से कई विवाद भी जुड़े

साल 20221 में जेईई-मेन्स परीक्षा के दौरान रूसी हैकर मिखाइल शार्गेन ने एनटीए के सॉफ्टवेयर को ही हैक कर लिया और 800 से अधिक उम्मीदवारों को इसका फायदा पहुँचा। एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस हैकिंग के चलते छात्रों के पेपर दूसरे लोगों ने दिए। इसके अलावा एनटीए द्वारा आयोजिक कई परीक्षाओं में परीक्षार्थियों की संख्या कम-ज्यादा होने के भी मामले सामने आए थे, हालाँकि ये इतने बड़े विवाद नहीं थे कि इससे कोई बड़ा हंगामा मचता। बावजूद इसके कि काफी छात्र इन गड़बड़ियों से प्रभावित हुए।

बीते कुछ सालों में एनटीए द्वारा आयोजित परीक्षाओं में ग्रेस मार्क्स देने में पारदर्शिता की कमी, परीक्षा केंद्रों पर टेक्निकल दिक्कतें, हैकिंग/फिक्सिंग के कई आरोप भी लगे हैं। हालाँकि ऐसी समस्याओं की वजह से परीक्षा केंद्रों की चयन प्रक्रिया में भी बदलाव किया गया था।

परीक्षा केंद्रों का चयन कैसे करता है एनटीए?

एनटीए का दावा है कि वह परीक्षा केंद्रों के चयन के लिए कठोर प्रक्रिया का पालन करता है। शुरुआत में, यह एक सूची से संभावित केंद्रों की पहचान करता है जिसमें सीबीएसई और एनटीए द्वारा पहले इस्तेमाल किए गए सरकारी स्कूल शामिल हैं। इनकी लिस्ट बनाने के बाद इन परीक्षा केंद्रों की बैकग्राउंड जाँच की जाती है कि कहीं अतीत में कोई सेंटर अवैध गतिविधियों में तो शामिल नहीं रहा था। एक बार अंतिर सूची तैयार होती है, तो नए सेंटर्स की भी जाँच की जाती है कि कहीं इन सेंटर्स के पीछे दागी यानी गलत लोगों का हाथ तो नहीं है। इसके लिए थर्ड पार्टी एजेंसियों की भी मदद ली जाती है।

एनटीए जिन परीक्षा केंद्रों को चुनता है, वहाँ मौजूद बुनियादी ढाँचे की भी जाँच करता है। सेंटर पर लोगों के बैठने, परीक्षा देने की व्यवस्था है या नहीं, या कहीं इनका किसी कोचिंग सेंटर से तो कोई जुड़ाव नहीं है। यही नहीं, एनटीए परीक्षा केंद्रों को चुनते समय यह भी ध्यान रखता है कि उन सेंटर्स पर दिव्याँग लोगों को कोई परेशानीं तो नहीं होने वाली। इसके साथ ही अगर किसी सेंटर से जुड़ी कोई अवैध गतिविधि पाई जाती है, तो सेंटर को तुरंत ब्लैक लिस्ट भी कर दिया जाता है। इस दौरान सेंटर के एंट्री और एग्जिट वाली जगहों की भी जाँच की जाती है।

अब केंद्र सरकार ने एनटीए में सुधार के लिए जिस कमेटी का गठन किया है, उसके सुझावों को ध्यान में रखते हुए एनटीए परीक्षाओं में सुधार की कोशिशें करेगा। एनटीए ने पहले भी मिले सुझावों को लागू किया था और आगे भी ऐसा किए जाने की उम्मीद है। ताकि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में होने वाली संभावित गड़बड़ी को रोका जा सके।

अंग्रेज कोच ने किया इशारा और बीच मैच में भुइयाँ पर लोटने लगा अफगान क्रिकेटर, बांग्लादेश की हार से अधिक गुलबदीन नायब की ‘नौटंकी’ की चर्चा: ऑस्ट्रेलिया T20 वर्ल्ड कप से बाहर

T20 वर्ल्ड कप में मंगलवार (25 जून, 2024) को अफगानिस्तान और बांग्लादेश के बीच महत्वपूर्ण मुकाबला खेला गया, जिसमें अफगानिस्तान ने बांग्लादेश को 8 रनों से मात दे दी। बारिश के कारण मैच में DLS मेथड से जीत-हार तय हुई। इस तरह अफगानिस्तान पहली बार T20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल तक पहुँच गया, वहीं ऑस्ट्रेलिया बाहर हो गई। अफगानिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 115 रन जड़े थे, DLS के हिसाब से बांग्लादेश को 19 ओवर में 113 रन बनाने थे लेकिन वो 105 पर ऑलआउट हो गई।

इस मैच को बारिश के आने-जाने और नवीन-उल-हक़ के अलावा राशिद खान की गेंदबाजी के लिए भी जाना जाएगा। अफगानिस्तान ने अच्छी बल्लेबाजी की, वरना लिटन दास 49 गेंदों पर 54 रन बना कर नॉटआउट रहे। वहीं एक छोर से विकेट गिरते रहे। नवीन-उल-हक और राशिद खान, दोनों ने किफायती गेंदबाजी भी की और 4-4 विकेट भी झटके। अफगानिस्तान की तरफ से रहमतुल्लाह गुरबाज ने सर्वाधिक 43 रनों की पारी खेली थी, वो धीमी थी लेकिन काम आ गई।

इस मैच को एक और चीज के लिए याद किया जाएगा – गुलबदीन नायब के ‘ड्रामे’ के लिए। अफगानिस्तान के बॉलिंग ऑलराउंडर गुलबदीन नायब ने तगड़ी गेंदबाजी करते हुए 2 ओवर में मात्र 5 रन दिए हुए एक विकेट भी झटका। वहीं अफगानिस्तान की गेंदबाजी के दौरान अचानक एक ऐसा मौका भी आया जब वो खड़े-खड़े मैदान में गिर पड़े। उन्होंने हैमस्ट्रिंग इंजरी का नाटक किया, लेकिन इसके बाद उन्होंने गेंदबाजी भी कराई। अफगानिस्तान की जीत के बाद सबसे तेज़ वही दौड़े।

ये आश्चर्य की बात है क्योंकि हैमस्ट्रिंग इंजरी के बाद खिलाड़ी को मैदान छोड़ना पड़ जाता है, लेकिन गुलबदीन नायब इसके बाद तेज़ गेंदबाजी भी करते दिखे और तेज़ी से दौड़ते हुए भी। बताया जा रहा है कि कोच जोनाथ ट्रॉट ने खिलाड़ियों को मैच को धीमा रखने का इशारा दिया था, क्योंकि DLS से अफगानिस्तान उस समय आगे था। इसीलिए, गुलबदीन नायब ने ये ड्रामा किया। एक समय ऐसा आया जब 105 रन पर बांग्लादेश था और 3 रन से पीछे था, अचानक बारिश आ गई।

हालाँकि, फिर विकेट गिरा और बांग्लादेश आगे हो गई। अब गुरुवार (27 जून, 2024) की सुबह अफगानिस्तान का मुकाबला दक्षिण अफ्रीका से होगा। जो जीतेगा, वो फाइनल में जाएगा। वहीं दूसरी तरफ भारत का मुकाबला इंग्लैंड से है। इस तरह राशिद खान ने 9 बार T20 इंटरनेशनल में 4 विकेट लिया है, उन्होंने बांग्लादेश के शाकिब-अल-हसन का रिकॉर्ड तोड़ा जो ये कारनामा 8 बार कर चुके हैं। राशिद खान ने अंत में कहा कि गुलबदीन नायब को चोट आई थीं और सोशल मीडिया पर क्या चल रहा इससे फर्क नहीं पड़ता।

हिंदुओं का गला रेता, महिलाओं को नंगा कर रेप: जो ‘मालाबर स्टेट’ माँग रहे मुस्लिम संगठन वहीं हुआ मोपला नरसंहार, हमें ‘किसान विद्रोह’ पढ़ाकर करते रहे गुमराह

केरल का मालाबार क्षेत्र एक बार फिर चर्चा में है। इस्लामी संगठन इसे एक अलग राज्य बनाने की माँग करने में लगे हैं। इन संगठनों की नजर इस क्षेत्र पर इसलिए इतनी है क्योंकि यहाँ मुस्लिमों की संख्या अन्य क्षेत्रों के मुकाबले अधिक है और संगठन जानते हैं कि उन्हें यहाँ पैठ बनाने में मुश्किल नहीं आएगी। उनकी इस तरह की मानसिकता भले ही मुस्लिमों को एक बार को जायज लगे, लेकिन हिंदुओं के लिए ये कितना बड़ा खतरा हो सकता है इसे जानने के लिए एक सदी पहले हुए मोपला हिंदू नरसंहार को याद करने की जरूरत है।

मोपला हिंदू नरंसहार के बारे में इतिहास की किताबों में कम जिक्र है। कारण वामपंथी लेखक हैं। उनके द्वारा लिखे गए इतिहास में इसे ‘किसान विद्रोह और मोपला दंगे’ जैसे शीर्षक के साथ समेटा गया है जबकि हकीकत यह है कि यह एक हिंदू नरसंहार था जहाँ मोपला के मुस्लिमों ने हिंदुओं को पकड़-पकड़कर निर्मम ढंग से मारा था। पुरानी रिपोर्ट्स बताती हैं कि 1921 में दक्षिण मालाबार में कई जिलों में मुस्लिमों की जनसंख्या सबसे ज्यादा थी। कुल जनसंख्या का वो 60% थे।

आज जिस तरीके से मुस्लिम बहुलता के कारण मालाबार को लेकर इस्लामी संगठन अपनी अलग राज्य की माँग उठाते हैं, उस समय भी इस्लामी कट्टरपंथियों की कुछ की यही मानसिकता थी। 1921 में जब असहयोग आंदोलन के बदले कॉन्ग्रेस खिलाफत आंदोलन को समर्थन कर रही थी और हिंदुओं को उनके साथ मिलकर रहने को कहा जा रहा था उस वक्त मालाबार के मोपला मुस्लिमों को लगा था कि वो लोग खुद से अंग्रेजों को भगा देंगे और मालाबार क्षेत्र में अपना इस्लामी राज्य स्थापित कर लेंगे, लेकिन उससे पहले उनका मकसद था कि वो जमीन से हिंदुओं को भगाकर उसे पवित्र करें।

वैसे तो क्षेत्र में मोपला मुस्लिमों ने 1896 से मालाबार क्षेत्र में ‘काफिरों’ की हत्या की तमाम घटनाओं को अंजाम दिया था। मगर, 1921 में हालात ये कर दिए गए थे कि उस साल बताया जाता है कि इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा 10,000 से अधिक हिंदू उस इलाके में मौत के घाट उतारा जा चुका था। उस समय मुस्लिमों ने अपने जिहाद की शुरुआत ‘नारा-ए-तकबीर’ और ‘अल्लाहु अकबर’ के साथ की थी और उसके बाद हिंदुओं को पकड़कर कहीं गोली मारी गई थी। कहीं जल्लाद से हिंदुओं की गर्दन कटवाकर उनकी खोपड़ियों को एक-एक करके कुएँ में फेंका गया था।

कुछ कहानियाँ तो ऐसी हैं जिन्हें सुन आत्मा सिहर जाए। जैसे मोपला में इस्लामी दंगाइयों ने एक 7 महीने गर्भवती महिला को मारने के लिए पहले उसका पेट फाड़ा था, फिर उसके से बच्चा निकालकर दोनों को मौत के घाट उतारा था। इसके अलावा इन मोपला दंगाई जिन्हें विद्रोही कहकर सम्मान देने का प्रयास होता है इन्होंने एक हिंदू महिला को उसके पति और भाई के आगे नंगा करके उसका रेप किया था। एक महिला मारकर फेंक दी गई थी जिसकी भूखी बच्ची उसके शव के आगे बैठ उसके स्तन से एक दो बूंद दूध के लिए तरस रही थी।

आरएसएस विचारक जे नंदकुमार ने साल 2021 में इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया था कि टीपू सुल्तान की हार के बाद मालाबार में हिंदुओं की वापसी हुई थी। वहाँ वो आकर बसने लगे थे, अपनी जमीनें वापस लेने लगे थे। इसी के बाद वहाँ नरसंहार होने शुरू हुए थे। 1792 से लेकर 1921 कर वहाँ कई बड़े नरसंहार हुए जिनमें मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं पर हमले किए गए मगर इतिहास में इसे सिर्फ किसान आंदोलन आदि कहा जाता रहा और हिंदुओं की हत्या करने वालों को स्वतंत्रता संग्रामी।

जे नंनदकुमार ने ऑपइंडिया से बातचीच में हैरान करने वाला खुलासा किया था। उन्होंने बताया था कि मोपला हिन्दू नरसंहार में जिन मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदुओं के साथ रक्तपात किया, बर्बरता की, हत्याएँ कीं… उन्हीं के परिवार वालों (वंशजों) को अभी भी पेंशन इस नाम पर दी जा रही है कि वो तो स्वतंत्रता सेनानी थे।

आरएसएस विचारक ने इतिहास में दिए गए गरीब-कुचले मुस्लिमों वाले एंगल को खारिज कर बताते हैं कि मोपला हिंदू नरसंहार में जिन हिंदुओं को मारा गया, उनमें एक भी जमींदार ऐसे नहीं थे, जो बड़े जमींदार थे। कत्लेआम में सामान्य मजदूरों को मारा गया। पिछड़े जाति के लोगों को मारा गया। सही में जो उस वक्त जमींदार थे, वो मुस्लिम जमींदार थे और उन लोगों ने ही मोपला हिंदू नरसंहार का प्लान किया था।

आज उसी मालाबार इलाके में फिर से मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल खेला जा रहा है जहाँ एक सदी पहले खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने के चक्कर में महात्मा गाँधी तक ने हिंदुओं के मोपला में हो रहे कत्लेआम पर अपनी आँख बंद कर ली थी। कोई इस मुद्दे पर बोलने को तैयार नहीं था क्योंकि खिलाफत आंदोलन को समर्थन देने के बाद ये डर था कि मुस्लिम नाराज हो जाएँगे। एक सदी पहले जो डर कॉन्ग्रेस के नेताओं में था। आज वही डर वामपंथी नेताओं में देखने को मिल रहा है। केरल को तोड़ने की माँग सरेआम हो रही है मगर फिर भी कोई इस पर कुछ बोलने को तैयार नहीं है। भाजपा प्रमुख ने तो इस रवैये को देखते हुए ये भी कहा है कि केरल में कॉन्ग्रेस हो या वामपंथियों की सरकार, हर कोई अपनी तुष्टिकरण की राजनीति के लिए इस समुदाय के आगे घुटनों में आ जाता है।

बता दें कि केरल के ‘मालाबार’ को अलग राज्य बनाने की माँग को हवा देने का काम हाल में सुन्नी युवाजन संगम के नेता मुस्तफा मुंडुपारा ने किया है। उनका कहना है कि मालाबार के लोग अन्य लोगों के बराबर टैक्स देते हैं, लेकिन उन्हें सुविधाएँ सबके बराबर नहीं मिलतीं। मालाबार को केरल से निकालकर अलग राज्य बनाने की माँग पहली दफा नहीं है। साल 2021 में यही माँग अन्य मुस्लिम संगठन ‘सुन्नी स्टूडेंट फेडरेशन’ के मुखपत्र सत्यधारा के संपादक अनवर सादिक फैसी ने उठाई थी। उस संगठन का कहना था कि मालाबार क्षेत्रों में मुस्लिम बहुल इलाकों को अलग करके एक अलग राज्य बनाना चाहिए। मालूम हो कि इस्लामी संगठन समय समय पर केरल के मालाबार को अलग करने की माँग सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि वहाँ मुस्लिमों की आबादी अच्छी-खासी है और ये संगठन जानते हैं कि अगर इस क्षेत्र पर कब्जा हो गया तो वो अपनी मनमानियाँ कर पाएँगे।

नोट: साल 2021 में मोपला नरसंहार के 100 साल पूरे होने पर ऑपइंडिया ने ‘मोपला दंगा नहीं हिंदू नरसंहार’ पर विस्तृत रिपोर्टें की थी। आप इन्हें लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

लोकसभा स्पीकर के लिए आम सहमति नहीं, होगा चुनाव: भाजपा की तरफ से ओम बिरला उम्मीदवार, कॉन्ग्रेस ने K सुरेश को उतारा

भारत के संसदीय इतिहास में फिर एक बार लोकसभा स्पीकर के पद के लिए चुनाव होंगे। 18 वीं लोकसभा के स्पीकर पद के लिए भाजपा ने 17वीं लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला जबकि कॉन्ग्रेस ने आठ बार के सांसद कोडिकुन्निल सुरेश को चुनाव में उतारा है।

सोमवार (24 जून, 2024) से चालू हुए 18वीं लोकसभा के पहले सत्र में सबसे पहले नवनिर्वाचित सांसदों को शपथ दिलाई गई। सोमवार को 262 लोकसभा सांसदों ने शपथ ली। मंगलवार (25 जून, 2024) को लोकसभा के बाकी 281 सांसद शपथ लेंगे। उन्हें प्रोटेम स्पीकर भर्तृहरि महताब सांसद पद की शपथ दिलाएँगे।

लोकसभा में अब स्पीकर पद का चुनाव होना है। सामान्यतः यह परम्परा रही है कि लोकसभा स्पीकर पद का चुनाव नहीं होता, उसे पक्ष और विपक्ष आपस में सहमति से चुन लेते हैं। अभी तक यही परम्परा रही है। हालाँकि, इस बार कॉन्ग्रेस के अड़ियल रवैये के चलते स्पीकर पद के लिए चुनाव होगा।

भाजपा ने स्पीकर पद के लिए 17 वीं लोकसभा के स्पीकर रहे कोटा सांसद ओम बिरला को फिर से उतारा है जबकि कॉन्ग्रेस ने मवेलीकारा से सांसद के सुरेश को मौक़ा दिया है। ओम बिरला और के सुरेश ने स्पीकर पद के लिए नामांकन भी कर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ओम बिरला के प्रस्तावक बने हैं। वहीं सुरेश के प्रस्तावक कॉन्ग्रेस समेत अन्य कई पार्टियों के नेता भी बने हैं।

स्पीकर के पद के लिए चुनाव 26 जून, 2024 को होने हैं। इस दिन सभी सांसद नए स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का चुनाव करेंगे। संसद के भीतर NDA का पलड़ा भारी लग रहा है, ऐसे में ओम बिरला के स्पीकर निर्वाचित होने के ही कयास हैं। लोकसभा के भीतर NDA के पास 290 से अधिक सांसदों का समर्थन है जबकि कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाले INDI गठबंधन के पास 240 से कम सांसद हैं। कॉन्ग्रेस के स्पीकर पद कि जिद को लेकर ही चुनाव की नौबत आ रही है।

बुलडोजर देख मस्जिद के ऊपर चढ़ गई मुस्लिम औरतें भी, MCD ने अवैध निर्माण ढहाया: दिल्ली के मंगोलपुरी में कार्रवाई रोकने को पहले बनाई ‘मानव दीवार’, फिर पथराव

दिल्ली के मंगोलपुरी में MCD ने मस्जिद ने अवैध निर्माण पर एक्शन लिया है। यहाँ MCD ने एक मस्जिद के अवैध हिस्से को भी गिरा दिया। मस्जिद के अवैध निर्माण को हटाने के दौरान काफी हंगामा हुआ। हंगामे के बीच मस्जिद के अवैध हिस्से को गिरा दिया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगोलपुरी के वाई ब्लॉक में में मंगलवार (25 जून, 2024) सुबह पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों के साथ MCD की टीम पहुँची। यहाँ टीम कुछ अवैध निर्माणों को गिराने पहुँची थी। इन अवैध निर्माण की शिकायत की गई थी। इन अवैध निर्माण में एक मस्जिद का हिस्सा भी शामिल था।

जब MCD और सुरक्षाबल यहाँ पहुँचे तो बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएँ और पुरुष मस्जिद के ऊपर चढ़ गए और इस कार्रवाई का विरोध करने लगे। इसके बाद उन्होंने टीम को घेर भी लिया। इसके बाद हँगामा करने वाली भीड़ ने पुलिस और MCD पर पथराव भी किया, ऐसी सूचना भी सामने आई है।

बताया गया कि मुस्लिम महिलाओं और पुरुषों ने मस्जिद के अवैध हिस्से को बचाने के लिए एक मानव दीवाल बना दी। यह भी सूचना सामने आई कि कुछ हिस्सा तोड़ने के बाद MCD की टीम ने यहाँ काम रोक दिया। MCD के अधिकारियों ने बताया कि निर्माण ज्यादा मजबूत है और उसको तोड़ने के लिए बड़ी मशीनें लानी पड़ेंगी।

मंगोलपुरी से कुछ लोगों को हिरासत में लिए जाने की सूचना है। गौरतलब है कि दिल्ली में MCD लगातार पिछले कुछ समय से अतिक्रमण पर कार्रवाई कर रहा है। मंगोलपुरी का अतिक्रमण भी एक शिकायत के बाद हटाया जा रहा था।

इससे पहले यह भी सामने आया था कि दिल्ली की जामा मस्जिद ने भी एक सार्वजनिक पार्क पर कब्जा किया हुआ है, इसे लेकर मोहम्मद अर्सलान नाम के व्यक्ति ने याचिका दायर की थी। इस मामले में पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने ये कब्जा वापस न ले पाने के लिए MCD को फटकारा है।

जूलियन असांजे इज फ्री… विकिलीक्स के फाउंडर को 175 साल की होती जेल पर 5 साल में ही छूटे: जानिए कैसे अमेरिका को हिलाया, कैसे हुई रिहाई की डील

अमेरिकी आर्मी समेत दुनिया भर के नेताओं और सरकारों पर तमाम खुलासे करने के वाले विकिलीक्स के मुखिया जूलियन असांजे जेल से छूट गए हैं। असांजे ने अमेरिकी कोर्ट के साथ एक डील कर ली है, इसके बाद उन्हें छोड़ा गया है। जूलियन असांजे इंग्लैंड की जेल में पाँच साल पहले ही काट चुके हैं।

जूलियन असांजे के बारे में उनकी पत्नी स्टेला असांजे ने एक्स (पहले ट्विटर) पर जानकारी देते हुए लिखा, “जूलियन अब आज़ाद हैं, हम शब्दों में आपके प्रति अपनी कृतज्ञता नहीं बता सकते। आपने ही इस सपने को साकार करने के लिए वर्षों तक काम किया है। धन्यवाद।”

जूलियन असांजे के मुक्त होने को लेकर उनकी कम्पनी विकीलीक्स ने लिखा, “जूलियन असांजे रिहा हो गए हैं। बेलमार्श जेल में 1901 दिन बिताने के बाद 24 जून की सुबह वह जेल से बाहर आ गए। लंदन के हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत दी है और दोपहर में स्टैनस्टेड एयरपोर्ट पर उन्हें रिहा कर दिया गया, जहाँ से वह विमान से ब्रिटेन से रवाना हो गए।”

विकीलीक्स ने बताया, ”2×3 मीटर की कोठरी में पाँच साल से अधिक समय तक, दिन में 23 घंटे अलग-थलग रहने के बाद, वह जल्द ही अपनी पत्नी स्टेला असांजे और अपने बच्चों से फिर से मिलेंगे, उनके बच्चे अपने पिता को केवल जेल में बंद जानते हैं। विकीलीक्स ने सरकार के भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के हनन की अभूतपूर्व कहानियाँ प्रकाशित कीं, जिसमें बड़े और ताकतवर लोगों को उनके कार्यों के लिए जवाबदेह बनाया गया। चीफ एडिटर के रूप में, जूलियन ने इन सिद्धांतों और लोगों के जानने के अधिकार के लिए बड़ी कीमत चुकाई।”

कौन हैं जूलियन असांजे?

52 वर्षीय जूलियन असांजे एक ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार हैं। उन्होंने 2006 में विकीलीक्स नाम की एक संस्था बनाई थी। विकीलीक्स का काम उन लोगों की आवाज को जनता तक पहुँचाना था जो सरकार या बड़ी कम्पनियों के भ्रष्टाचार को उजागर करना चाहते थे। विकीलीक्स ने इसके लिए इन्टरनेट का जरिया चुना था। वर्ष 2010 में असांजे ने विकिलीक्स के माध्यम से लाखों कागजों को सार्वजनिक कर दिया। इन कागजों से अमेरिकी फ़ौज के ईराक और अफगानिस्तान में ऑपरेशन पर भी काफी जानकारियाँ थी।

इन कागजों में बताया गया था कि कैसे यहाँ अमेरिकी फ़ौज स्थानीय जनता पर अत्याचार कर रही है और साथ ही पकड़े गए लोगों को यातनाएँ दे रही है। इसमें अमेरिका के गुआंतानामो बे में रखे गए कैदियों के साथ हुए पाशविक व्यवहार की जानकारी भी दी गई थी। इसके बाद अमेरिका के खिलाफ दुनिया भर में माहौल बन गया था और उस पर सेना वापस बुलाने का दबाव बनने लगा था। विकिलीक्स ने 2007 में अमेरिकी फ़ौज के एक हेलिकॉप्टर द्वारा किए गए हमले की जानकारी भी दी थी, इसमें 12 निर्दोष मारे गए थे, इनमें से दो पत्रकार थे।

जूलियन असांजे इन लीक्स के बाद लंदन में मौजूद थे, उनके खिलाफ एक महिला ने स्वीडन में यौन शोषण का मुकदमा भी दर्ज करवा दिया था। असांजे के खिलाफ इसके लिए गिरफ्तारी का वारंट भी जारी किया गया था। अमेरिका भी उनके प्रत्यर्पण की माँग कर रहा था। उन्होंने 2012 में लंदन स्थित इक्वाडोर दूतावास से शरण माँगी थी और यहीं रहने लगे थे। उन्होंने शंका जताई थी कि अमेरिका में उनके साथ कुछ भी किया जा सकता है।

जूलियन असांजे को दी गई शरण 2019 में वापस ले ली गई थी। इसके बाद उन्हें लंदन पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया गया था। वह यहाँ जेल में बंद कर दिए गए थे। उनके प्रत्यर्पण को लेकर अमेरिका ने कई बार इंग्लैंड से अपील की थी लेकिन इंग्लैंड के कोर्ट ने उनका प्रत्यर्पण रोक दिया था।

अमेरिका से क्या डील हुई?

जूलियन असांजे पर अमेरिका में कई मुकदमे चल रहे थे। अमेरिका उन्हें 18 मामलों का सामना करना पड़ रहा था, इन मामलों में दोषी पाए जाने पर अमेरिकी कोर्ट उन्हें 175 साल तक की सजा सुना सकते थे। इसी दौरान असांजे की अमेरिकी न्याय विभाग से बातचीत भी चल रही थी। अब यह जानकारी सामने आई है कि असांजे और अमेरिका के बीच डील हो गई है।

इसके अंतर्गत असांजे अमेरिका में अपने ऊपर लगाए गए एक आरोप में खुद को दोषी मान लेंगे, जिसके तहत उन्हें पाँच वर्ष की सजा दी जाएगी। यह पाँच वर्ष की सजा वह लंदन में पहले ही काट चुके हैं, ऐसे में उन्हें अब जेल नहीं जाना होगा। इस डील के बारे में और जानकारियाँ आगे साफ़ होंगी।

‘जिन्होंने इमरजेंसी लगाई वे संविधान के लिए न दिखाएँ प्यार’: कॉन्ग्रेस को PM मोदी ने दिखाया आईना, आपातकाल की 50वीं बरसी पर देश मना रहा ‘ब्लैक डे’

25 जून 2024 को आपातकाल की 50वीं बरसी है। भारतीय जनता पार्टी इस दिन को पूरे देश में काले दिवस के तौर पर मना रही है। इसे लेकर उनके पार्टी दफ्तरों के बाहर पोस्टर भी लगा है जिसमें आपातकाल को लोकतंत्र का काला दिवस कहा गया है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ ट्वीट किए हैं। अपने ट्वीट में उन्होंने कॉन्ग्रेस को उनकी पुरानी नीतियाँ याद दिलाईं। इसके साथ ही पीएम मोदी ने उन लोगों को भी याद किया है जिन्हें इसका विरोध करने की कीमत चुकाई थी।

अपने पहले ट्वीट में पीएम मोदी ने कहा, “आज का दिन उन सभी महान पुरुषों और महिलाओं को श्रद्धांजलि देने का दिन है, जिन्होंने आपातकाल का विरोध किया। #DarkDaysOfEmergency हमें याद दिलाती है कि कैसे कॉन्ग्रेस पार्टी ने बुनियादी स्वतंत्रता को नष्ट कर दिया और भारत के संविधान को कुचल दिया, जिसका हर भारतीय सम्मान करता है।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने अगले ट्वीट में कहा, “तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने हर लोकतांत्रिक सिद्धांत को दरकिनार कर देश को जेलखाना बना दिया, जो भी कॉन्ग्रेस से असहमति जताता था उसे प्रताड़ित किया जाता था।” पीएम मोदी ने बताया कि उस समय सामाजिक रूप से इस तरह की नीतियाँ लागू की गईं, जिससे सबसे कमजोर वर्गों को निशाना बनाया जा सके।”

आगे पीएम मोदी ने कहा, “जिन लोगों ने इमरजेंसी लगाई, उनकी हमारे संविधान के प्रति अपमा प्यार जताने का कोई अधिकार नहीं है। ये लोग वही हैं, जिन्होंने अनगिनत मौकों पर अनुच्छेद 365 लागू किया। प्रेस की स्वतंत्रता को खत्म करने के लिए विधेयक लाया गया, संघवाद को नष्ट किया गया और संविधान के हर पहलू का उल्लंघन किया।”

आखिर ट्वीट में पीएम मोदी लिखते हैं, “जिस मानसिकता की वजह से आपातकाल लगाया गया था, वह आज भी उसी पार्टी में जिंदा है। जिसने इसे लगाया था, वे अपनी प्रतीकात्मकता के जरिए संविधान के प्रति अपने तिरस्कार को छिपाते हैं, लेकिन भारत के लोगों ने उनकी इन हरकतों को देखा है और यही वजह है कि उनको बार-बार खारिज किया है।”

बता दें कि आज के दिन सोशल मीडिया पर भाजपा द्वारा एक वीडियो भी साझा की जा रही है। इस वीडियो में दिखाया गया है कि पचास साल पहले जैसे कॉन्ग्रेस के हालात थे, वैसे ही हाल आज भी हैं। इसमें बताया गया है कि इंदिरा गाँधी ने 50 साल पहले सत्ता में बने रहने के लिए आपातकाल लागू किया था। ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि 1971 वाले लोकसभा चुनाव में रायबरेली से इंदिरा गाँधी के खिलाफ खड़े हुए राजनारायण ने इंदिरा की जीत को चुनौती दी थी।

उन्होंने दावा किया था कि इंदिरा ने सत्ता सरकारी मशीनरी और संसाधनों का दुरुपयोग करके हासिल की है। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में ये आरोप सही पाए गए और इंदिरा गाँधी का निर्वाचन रद्द हुआ। साथ ही इंदिरा पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी गई। उस समय इंदिरा ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहाँ भी उन्हें मामले में तुरंत राहत नहीं मिली। जब इंदिरा गाँधी को लगा कि उनका सत्ता से बाहर होना तय है, तब उन्होंने राष्ट्रपति के साथ बैठक के बाद देश में आपातकाल लागू किया और नागरिकों के मौलिक अधिकार उनसे छीन लिए गए।

इधर केरल का नाम बदलने की तैयारी में वामपंथी, उधर मुस्लिम संगठनों को चाहिए अलग राज्य: ‘मालाबार स्टेट’ की डिमांड को BJP ने बताया राष्ट्र की अखंडता से समझौता

केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ किए जाने की चर्चाओं के बीच खबर है कि राज्य में सुन्नी युवाजन संगम के नेता मुस्तफा मुंडुपारा ने एक अलग मालाबार राज्य की माँग का मुद्दा उठाया है। मुस्तफा ने मालाबार के स्कूलों में सीटों की कमी पर आयोजित एक प्रदर्शन में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि दक्षिणी केरल और मालाबार के लोग समान टैक्स देते हैं तो फिर उन्हें एक जैसी सुविधाएँ मिलनी चाहिए।

मुस्तफा ने अपने बयान में कहा, “जब हम ऐसा अन्याय दक्षिणी केरल और मालाबार में देखते हैं और फिर अगर किसी हिस्से से अलग मालाबार राज्य की माँग आती है तो हम उन्हें दोष नहीं दे सकते। मालाबार के लोग और दक्षिणी केरल के लोग समान कर दे रहे हैं। हमें भी समान सुविधाएँ मिलनी ही चाहिए। इस माँग को अलगाववाद कहने का कोई मतलब नहीं है। अगर मालाबार एक राज्य बन ही जाए तो देश में क्या होगा।”

भाजपा प्रमुख ने उठाए सवाल

मुस्तफा मुंडुपरा के भाषण के बाद अब तक इस पर कोई एक्शन नहीं लिए जाने पर केरल के भाजपा प्रमुख के सुरेंद्र मुख्यमंत्री पिनराई विजयरन और विपक्ष के नेता सतीशन पर बरसे। उन्होंने कहा कि जिन्हें लगता है कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया पर बैन लगाने से केरल में कट्टरपंथी ताकतें खत्म हो गई हैं, वह गलत हैं। अलग राज्य की माँग एक दुस्साहस है और इस मुद्दे पर पिनराई विजयरन और सतीशन की चुप्पी ये बताती है कि राज्य में कॉन्ग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियाँ घुटनों पर हैं। वोट के लिए वो बेशर्मी से राष्ट्रीय अखंडता से समझौता कर रही हैं।

2021 में भी उठी मालाबार अलग करने की माँग

मालूम हो कि पहली बार नहीं है जब मालाबार को केरल से अलग करने की बातें उठी हों, इससे पहले समस्त केरल सुन्नी स्टूडेंट फेडरेशन ने ऐसी माँग साल 2021 में उठाई थी। एसकेएसएसएफ के मुखपत्र सत्यधारा के संपादक अनवर सादिक फैसी द्वारा केरल से मालाबार क्षेत्र के मुस्लिम बहुल इलाकों को अलग करके एक नया राज्य ‘मालाबार’ बनाने की माँग की थी। फैसी ने कहा था, कोझिकोड को नए बने मालाबार राज्य की राजधानी बनाया जाना चाहिए। यह माँग मालाबार क्षेत्र में मुस्लिम बहुलता के कारण उठाई गई थी।

मालाबार में मुस्लिमों की संख्या

बता दें कि मुस्तफा ने जिस मालाबार क्षेत्र को अलग राज्य घोषित करने की माँग की है उसमें त्रिशूर, पलक्कड़, मल्लापुरम, कोझिकोडे, वायनाड, कन्नूर और कासरगोड जैसे इलाके आते हैं। इन इलाकों में मुस्लिमों की संख्या की बात करें तो 2011 में जनगणना डाटा के अनुसार- त्रिशूर में मुस्लिमों की संख्या 17.07% है, पलक्कड़ में 27.96% है, मल्लापुरम में इनकी आबादी 70.24% है, कोझिकोडे में 37.66% है, वायनाड में 28.65% है, कन्नूर में 29.43% है और कासरगोड मे 37.24% है।

केरल नहीं ‘केरलम’

उल्लेखनीय है इन दिनों केरल का नाम बदलकर केरलम किए जाने पर भी चर्चा तेज है। सोमवार (24 जून 2024) को विधानसभा में केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ किए जाने का प्रस्ताव भी पारित हुआ। इस प्रस्ताव को विपक्षी कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ और सत्ता पक्ष ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने प्रस्ताव पेश करते हुए केंद्र से संविधान में राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने की गुजारिश की है। इससे पहले यही प्रस्ताव 2023 में भी केरल विधानसभा में पारित किया गया था लेकिन कुछ कारणों से इसे दोबारा पेश किया गया। इसके पीछे तर्क यही दिया गया कि राज्य का नाम मलयालम में ‘केरलम’ है इसलिए इसे यही नाम दिया जाए।

ब्रिटानिया के लिए बंगाल की फैक्ट्री बनी बोझ, बंद करने का लिया फैसला: नैनो प्लांट पर विवाद के बाद टाटा ने भी छोड़ा था राज्य, BJP बोली- ये तोलाबाजी का नतीजा

देश में बिस्किट बनाने वाली प्रमुख कंपनी ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता स्थित अपनी 77 वर्ष पुरानी फैक्ट्री को बंद करने का निर्णय लिया है। ब्रिटानिया ने इस निर्णय के संबंध में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को सूचित किया है।

ब्रिटानिया ने 20 जून, 2024 को स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी में बताया है कि कोलकाता के तारातला स्थित फैक्ट्री के स्थायी कर्मचारियों ने कम्पनी द्वारा दी गई स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को स्वीकार कर लिया था। तारातला फैक्ट्री, मुंबई के बाद ब्रिटानिया की भारत में दूसरी सबसे पुरानी फैक्ट्री है। इसकी स्थापना 1947 में हुई थी।

ब्रिटानिया ने यह भी बताया है कि कम्पनी पर इस फैक्ट्री के बंद होने का कोई असर नहीं पड़ने वाला है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ब्रिटानिया प्रबंधन ने कम्पनी के संविदा कर्मचारियों के साथ VRS को लेकर चर्चा भी शुरू कर दी है।

तारातला फैक्ट्री के बंद होने का असर लगभग 150 कर्मचारियों पर असर पड़ने की उम्मीद है। ब्रिटानिया का यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है जब कम्पनी लागत के मुकाबले मुनाफा निकालने की चुनौतियों से जूझ रही है। इससे पहले मुंबई और चेन्नई में भी ब्रिटानिया की पुरानी फैक्ट्रियों को भी बंद किया गया था।

बताया गया है कि कंपनी ने अपने कर्मचारियों के साथ VRS पर सीधे समझौता कर लिया है और उनकी बचे हुए नौकरी के सालों के आधार पर उनको ग्रेच्युटी और पीएफ के अलावा ₹13 लाख से ₹22 लाख तक के VRS पैकेज की पेशकश की है।

बताया गया है कि ब्रिटानिया ने 2018 में इस फैक्ट्री के 11 एकड़ के प्लॉट के लिए लीज को रिन्यू किया था। यह लीज 2048 तक वैध है। हालाँकि, ब्रिटानिया ने अब इस फैक्ट्री में उत्पादन जारी रखना लागत के अनुरूप नहीं पाया है। तब फैक्ट्री को बंद नहीं किया गया था लेकिन अब यह भी बताया कि ब्रिटानिया इस जमीन के बड़े हिस्से को इसके असल मालिक SMPT (पूर्व में कलकत्ता पोर्ट ट्रस्ट) को जमीन का कुछ हिस्सा वापस करने पर विचार कर रहा है।

इस बीच, ब्रिटानिया के निकलने पर राज्य की विपक्षी पार्टी भाजपा ने भी हमला बोला है। भाजपा आईटी सेल के मुखिया ने कहा है कि बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस ‘तोलाबाजी’ (अवैध वसूली या कमीशन लेना) और ‘यूनियनबाजी’ में लगी हुई है, जिसके कारण लगातार उद्योग धंधे राज्य से बाहर जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि पहले CPM ने इसे बर्बाद किया और फिर TMC ने इसके ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी। वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर भी ब्रिटानिया फैक्ट्री के बंद होने को कई यूजर्स ने राज्य में कुछ साल पहले टाटा के बाहर जाने जैसा बताया है।

भारत में खाने पीने का सामान बनाने वाली बड़ी कम्पनियों में से एक ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज बंगाल को अपना तीसरा सबसे बड़ा बाजार मानती है, बंगाल कम्पनी के लिए ₹900 करोड़ से अधिक का व्यापार देता है। ब्रिटानिया कोलकाता के अलावा बिहार, ओडिशा, असम और उत्तर प्रदेश में अपने प्लांट चलाती है।

ब्रिटानिया ने 2016 में बंगाल में दूसरी इकाई की योजना पर बातचीत चालू की थी। ब्रिटानिया की योजना थी कि वह 2018 तक इससे उत्पादन चालू कर देगी लेकिन राज्य में कई जगह जमीन की तलाश करने के बावजूद, योजना साकार नहीं ही सकी। वहीं दूसरी तरफ कंपनी ने 2018 में अपने असम प्लांट का उद्घाटन भी कर दिया दिसम्बर 2023 में बिहार में भी एक फैक्ट्री लगा दी।

गौरतलब है कि ममता बनर्जी की वाली टीएमसी सरकार के व्यापार विरोधी रवैये के कारण पश्चिम बंगाल से बाहर निकलने वाली ब्रिटानिया कोई पहली कंपनी नहीं है। इससे पहले टाटा मोटर्स ने भी सिंगूर में टाटा नैनो प्लांट को लेकर विवादों के चलते राज्य छोड़ दिया था।

वर्ष 2006, में बंगाल की वामपंथी सरकार ने सिंगूर और हुगली में लगभग 1,000 एकड़ जमीन अधिग्रहित की थी। इसके बाद, इसने राज्य में रोजगार बढ़ाने के लिए यह जमीन टाटा मोटर्स को दे दी थी। टाटा मोटर्स यहाँ नैनो कार का प्लांट लगाना चाहती थी।

हालाँकि तब बंगाल में विपक्ष की नेता और तृणमूल कॉन्ग्रेस मुखिया ममता बनर्जी ने जमीन अधिग्रहण का विरोध किया था। इसको लेकर काफी बवाल हुआ था। टाटा मोटर्स के शोरूम पर तक हमले हुए थे। परिणामस्वरूप, टाटा मोटर्स को सिंगूर प्लांट को स्थगित करना पड़ा था, टाटा मोटर्स तब तक सिंगूर संयंत्र में ₹1,000 करोड़ से अधिक का निवेश कर चुकी थी।

बंगाल में हुए इस हंगामे के बाद टाटा मोटर्स ने गुजरात के सानंद में अपना प्लांट स्थापित किया था। टाटा मोटर्स ने गुजरात में इस प्लांट का 2010 में उद्घाटन किया था। टाटा नैनो के साणंद प्लांट का उद्घाटन गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और टाटा समूह के अध्यक्ष रतन टाटा ने किया था।