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SFI के गुंडों के बीच अवैध संबंध, ड्रग्स बिजनेस… जिस महिला प्रिंसिपल ने उठाई आवाज, केरल सरकार ने उनका पैसा-पोस्ट सब छीना, हाई कोर्ट से राहत

केरल की वामपंथी सरकार ने एसएफआई के गुंडों के खिलाफ बयान देने पर एक कॉलेज की महिला प्रिंसिपल के खिलाफ तमाम कदम उठाए। उन्हें पद से हटा दिया और फिर सरकार के खिलाफ बोलने जैसे चार्ज लगाकर उनके रिटायरमेंट के समय उन पर जाँच बैठा दी। यही नहीं, उनका ट्रांसफर भी कर दिया। महिला प्रिंसिपल ने कॉलेज कैंपस में एसएफआई के गुंडों द्रावा ऑर्गनाइज क्राइम, नशा जैसे कामों में लिप्त रहने का आरोप लगाया था, जिसके बाद एसएफआई के गुंडों ने उन्हें घंटों तक कॉलेज परिसर में ही बंधक बना लिया था, लेकिन गुंडों पर कार्रवाई करने की जगह केरल की वामपंथी सरकार ने महिला प्रिंसिपल पर ही कर दी। हालाँकि अब केरल हाई कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई है।

ऑनमनोरमा की रिपोर्ट के मुताबिक, ये मामला केरल के कासरगोड स्थित सरकारी कॉलेज का है, जहाँ सीपीआई-एम की अगुवाई वाली वापमंथी सरकार ने एसएफआई के खिलाफ स्टैंड लेने वाली प्रिंसिपल डॉ रेमा एम. को प्रताड़ित किया। केरल सरकार ने कोशिश की, कि प्रिंसिपल को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली स्कीम्स का फायदा भी न मिल पाए और वो कोर्ट कचहरी के ही चक्कर काटती रहें। लेकिन केरल हाई कोर्ट के जस्टिस ए मुहम्मद मुस्ताक और जस्टिस शोबा अन्नम्मा इआपेन की बेंच ने केरल सरकार के मंसूबों को नाकामयाब बनाते हुए प्रिंसिपल के खिलाफ बैठाई गई 2 इन्कवॉयरी को खत्म कर दिया। डॉ रेमा एम. 31 मार्च 2024 को रिटायर हो गईं, लेकिन उनके खिलाफ जारी विभागीय जाँच की वजह से उन्हें अब तक रिटायरमेंट का कोई भी लाभ नहीं मिल पाया था। कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई के बाद 9 अप्रैल को फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे 21 मई 2024 को वेबसाइट पर अपलोड किया गया। इस मामले में केरल हाई कोर्ट ने ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ के मुद्दे पर भी अहम बात कही है।

क्या था मामला, जिसकी वजह से प्रिंसिपल की आई शामत?

केरल सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री आर बिंदू ने पहले तो कासरगोड गवर्नमेंट कॉलेज की प्रिंसिपल को पद से हटा दिया था, तो उसके बाद उच्च शिक्षा निदेशालय ने उनका ट्रांस 200 किमी दूर कोझीकोडे जिले में कर दिया था। ये सब तब हुआ, जब प्रिंसिपल ने एक ऑनलाइन पोर्टल को दिए इंटरव्यू में एसएफआई के गुंडों और छात्रों के एक गुट पर बाकी छात्रों पर अत्याचार करने, आपस में अवैध संबंध रखने और ड्रग्स के इस्तेमाल का आरोप लगाया था। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, ‘अगर प्रिंसिपल ने एसएफआई के खास सदस्यों पर आरोप लगाए हैं, तो ये मामला एसएफआई के खिलाफ बोलने का है, सरकार के खिलाफ बोलने का नहीं। लेकिन सरकार ने बिना किसी स्वतंत्र जाँच के उनके खिलाफ विभागीत जाँच बैठा दी और कार्रवाई भी कर दी।’

इस मामले में केरल सरकार ने कॉलेजिएट एजुकेशन डिपार्टमेंट के डिप्टी डायरेक्टर सुनील जॉन, प्रो गीता ई और सीनियर क्लर्क श्यामलाल आईएस की सदस्यता वाली एक जाँच समिति बनाई थी, जिसने एसएफआई के कासरगोड यूनिट सेक्रेटरी अक्षय एमके द्वारा की गई शिकायत की जाँच की। इस कमेटी ने डॉ रेमा को किसी अन्य कॉलेज में ट्रांसफर किए जाने का सुझाव दिया, लेकिन एसएफआई के खिलाफ लगाए गए किसी भी आरोप की जाँच नहीं की। इस मामले में कोर्ट ने कहा, “ये जाँच कमेटी तो सिर्फ याचिकाकर्ता के खिलाफ एकतरफा जाँच के लिए बनाई गई लगी, न कि कॉलेज में चल रही समस्याओं को लेकर।” इस मामले में कोर्ट ने एक माह पहले ही उनके खिलाफ विभागीय जाँच हटा दी थी, लेकिन विस्तृत फैसला अब आया है।

प्रिंसिपल और एसएफआई का विवाद

इस मामले में 10 फरवरी 2023 को एसएफआई के सदस्यों ने डॉ रेमा से पीने के पानी को लेकर शिकायत की थी। उन्होंने उसी दिन कॉलेज के सुप्रीटेंडेंट को फिल्टर ठीक कराने एवं पानी की समस्या दूर करने का आदेश दे दिया था, लेकिन उसी दिन एसएफआई के नेता डॉ रेमा के चैंबर में पहुँचे और उन्होंने फिल्टर को लेकर सफाई देने की माँग की। इस मामले में 22 फरवरी को एसएफआई के गुंडों ने मीडिया में बयानबाजी की कि प्रिंसिपल ने छात्रों को गालियाँ दी है। उसी दिन एसएफआई से जुड़े करीब 60 गुंडों ने प्रिंसिपल को ही सुब 10.30 से लेकर दोपहर 2 बजे तक बंधक बनाए रखा। यहाँ तक कि उन्हें शौचालय तक इस्तेमाल नहीं करने दिया गया। यही नहीं, एसएफआई से जुड़ी छात्राओं ने उनके साथ हाथापाई भी की। उन्हें पुलिस ने आकर बचाया।

इस मामले के 2 दिन बाद 23 फरवरी 2023 को केरल की मंत्री आर बिंदू ने उन्हें प्रिंसिपल के पद से हटा दिया। इस दौरान एसएफआई के गुंडों ने ऐलान किया कि वो प्रिंसिपल को कॉलेज कैंपस में कदम तक नहीं रखने देंगे। इसके अगले दिन प्रिंसिपल का बयान न्यूज पोर्टल में छपा था, जिसमें उन्होंने एसएफआई के गुंडों की करतूतों को दुनिया के सामने रखा था।

कागरगोड कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ रेमा एम ने कहा था कि उन्होंने छात्र-छात्राओं को शारीरिक संबंध बनाते देखा है और वो कैंपस में ड्रग्स भी इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने एसएफआई के गुंडों पर अवैध गतिविधियों और अन्य छात्रों पर अत्याचार करने के भी आरोप लगाए। इस मामले में केरल सरकार ने उन्हें शो-कॉज नोटिस भेजा था कि उन्होंने कॉलेज का नाम बदनाम किया है। उन्होंने नोटिस के जवाब में कहा था कि ‘मैंने पूरे कॉलेज के खिलाफ कोई बात नहीं की, मैंने कुछ छात्रों के खिलाफ ही बात की, क्योंकि उसी कॉलेज में मेरी बेटी भी पढ़ती है।’ लेकिन उनके जवाब से असंतुष्ट केरल सरकार ने 3 सदस्यीय कमेटी बनाकर उनके खिलाफ जाँच बैठा दी।

15 2023 को कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें बताया गया कि डॉ रेमा एम ने सरकारी कर्मचारी नियमन 1960 से जुड़े रूल 62 और 63 को तोड़ा है। ऐसे में दंड स्वरूप उन्हें दूसरे कॉलेज ट्रांसफर किया जा सकता है। इसके बाद 9 जुलाई 2024 को उनका ट्रांसफर 200 किमी दूर कर दिया गया था। और फिर ये कानूनी लड़ाई शुरू हुई।

लगातार प्रताड़ना, सरकार और हाई कोर्ट

केरल सरकार के फैसले के खिलाफ प्रिंसिपल डॉ रेमा एम ने केरल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में अपील की। ट्रिब्यूनल ने सरकार से कहा कि वो रेखा एम को किसी नजदीकी कॉलेज में ट्रांसफर करे, न कि 200 किमी दूर। उनका रिटायरमेंट 31 मार्च 2024 को होना है, ऐसे में उन्हें राहत दी जाए। इसके बाद सरकार ने उन्हेंने दूसरे कॉलेज ट्रांसफर कर दिया, लेकिन ट्रिब्यूनल ने उन्हें प्रिंसिपल पद से हटाने के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं दिया था, ऐसे में उन्होंने हाई कोर्ट का रूख किया। हाई कोर्ट ने सर्विस कंडक्ट रूल 62 और 63 में की गई कार्रवाई को निरस्त कर दिया।

हाई कोर्ट ने कहा, “डॉ रेमा एम ने एसएफआई यूनिट और उसके सदस्यों के खिलाफ बोला था। न कि सरकार के खिलाफ या सरकार और छात्रों के बीच संबंधों पर।” रूल 62 कहना है कि कोई सरकारी कर्मचारी ऐसे बयान नहीं दे सकता, जिससे सरकार और आम जनता के बीच अविश्वास बढ़े। लेकिन अगर कोई कन्फ्यूजन है, तो रूल 63 के मुताबिक, किसी बयान को जारी करने से पहले सरकार की परमिशन लेनी पड़ती है। जजों ने देखा कि डॉ रेमा ने एसएफआई के गुंडों के खिलाफ अपनी बात रखी थी, साथ ही उन्होंने ऐसे पूर्व छात्रों के बारे में भी बात की थी, जो अब भी कॉलेज में आते हैं और अवैध गतिविधियों को अंजाम देते हैं। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “याचिकाकर्ता इस देश की नागरिक है और वो अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत अपने विचार रखने को स्वतंत्र हैं।” इस मामले में 22 मार्च 2024 को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था।

खास बात ये है कि एक तरफ केरल हाई कोर्ट ने इस मामले में 22 मार्च 2024 को फैसला सुरक्षित रख लिया था, तो दूसरी तरफ उसके 2 दिन बाद ही 24 मार्च 2024 को केरल सरकार ने उनके खिलाफ नया मेमो जारी कर दिया, जिसमें उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अगस्त 2022 में एक छात्रा को एडमिशन लेने से रोक दिया थ, क्योंकि वो अपने पिता के साथ नहीं आई थी। उस छात्रा ने कन्नूर यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रा के सामने 23 अगस्त 2022 को ही शिकायत दर्ज करा दी थी। डॉ रेमा ने इसके जवाब में कहा कि ऐसा नियमों के चलते किया गया, क्योंकि एंटी-रैगिंग फोरस और एंटी डावरी फोरम के फॉर्म्स पर पिता के हस्ताक्षर अनिवार्य थे।

इस मामले में 19 अक्टूबर 2024 को यूनिवर्सिटी सिंडिकेट ने डॉ रेमा के खिलाफ पैनल एक्शन का सुझाव दिया था, जिसमें सिंडिकेट ने पाया था कि डॉ रेमा ने ‘अपनी सीमाओं का उल्लंघन किया’। लेकिन हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि उनके खिलाफ पहली इन्क्वॉयरी ही इसलिए बैठाई गई थी, ताकि उन्हें रिटायरमेंट का लाभ न मिल सके और पेंशन से जुड़ी सुविधाओं से वंचित किया जा सके। दूसरे मेमो पर भी हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि दूसरा मेमो कुछ और नहीं, बल्कि पहले मेमो को ही आगे बढ़ाने का प्रयास है, ताकि प्रिंसिपल रेखा एम को पेंशन और अन्य सुविधाओं से वंचित किया जा सके।

हल्द्वानी बनभूलपुरा दंगा केस: मुख्य आरोपित अब्दुल मलिक के खिलाफ जारी 2.44 करोड़ के रिकवरी नोटिस पर HC की रोक, वसूली को बताया था अवैध

उत्तराखंड के हल्द्वानी जिले के बनभूलपुरा इलाके में हुई सांप्रदायिक हिंसा के मामले में मुख्य आरोपित अब्दुल मलिक के खिलाफ नगर निगम द्वारा जारी 2.44 करोड़ रुपए की रिकवरी नोटिस पर नैनीताल हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। बनभूलपुरा में इसी साल 8 फरवरी 2024 से हुई हिंसा में 5 लोगों की मौत हो गई थी, तो दर्जनों लोग घायल हो गए थे। इस हिंसा में करोड़ों की संपत्ति को नुकसान पहुँचा था। अब्दुल मलिक कई दिनों की फरारी के बाद गिरफ्तार हुआ था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तराखंड हाई कोर्ट के जस्टिस मनोज कुमार तिवारी की सिंगल बेंच ने अब्दुल मलिक को राहत दी। शुक्रवार (24 मई 2024) को अब्दुल मलिक द्वारा जारी याचिका पर सुनवाई करते हुए नैनीताल हाई कोर्ट ने वसूली नोटिस पर रोक लगा दी। अब्दुल मलिक के खिलाफ हल्द्वानी नगर निगम ने 2.44 करोड़ की रिकवरी के लिए नोटिस जारी किया था। अब्दुल मतीन इसके खिलाफ हाई कोर्ट पहुँचा था, जहाँ से उसे राहत मिल गई।

बता दें कि हल्द्वानी नगर निगम की ओर से बनभूलपुरा में हुए दंगे में नुकसान के बदले में आरोपित अब्दुल मलिक को नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा 470 के तहत 2.424 करोड़ रुपए का नोटिस 12 फरवरी 2024 को भेजा गया था। नोटिस में तीन दिन के अंदर यह धनराशि नगर निगम कार्यालय में जमा करने को कहा गया था। नोटिस में कहा गया कि दंगे में कई लोगों की जान व करोड़ों रुपए के सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचा था और इस केस में अब्दुल मलिक मुख्य आरोपित है। ऐसे में नुकसान के भरपाई के लिए यह रिकवरी नोटिस जारी किया गया है।

इस मामले में धनराशि जमा नहीं करने पर हल्द्वानी के तहसीलदार की ओर से आरोपित को 25 अप्रैल 2024 को वसूली नोटिस जारी किया था। आरोपित ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके बाद हाई कोर्ट ने ये फैसला सुनाया है।

हाई कोर्ट में अब्दुल मलिक की ओर से इस नोटिस को गलत बताया गया। अब्दुल मलिक के वकील ने कहा कि अभी अब्दुल मलिक इस केस में आरोपित है, उसके खिलाफ दोष सिद्धि नहीं हुई है, ऐसे में उससे अभी वसूली नहीं की जा सकती। इसलिए ये रिकवरी नोटिस गलत है, इस पर रोक लगाई जाए। अब्दुल मलिक की ओर से अहरार बेग ने बतौर वकील हाई कोर्ट में ये याचिका दायर की थी, जिसके बाद कोर्ट ने इस रिकवरी नोटिस पर रोक लगा दी।

गौरतलब है कि पुलिस ने अब्दुल मलिक को 8 फरवरी को हुए उपद्रव में आरोपित बनाया है। आरोप है कि अब्दुल मलिक ने ही सरकारी जमीन पर फर्जी दस्तावेज बनाकर वहाँ मस्जिद और मदरसे का निर्माण करवाया था। मलिक इस जमीन को अपना बता रहा था। उस सरकारी भूमि पर अवैध मदरसे और मस्जिद को तोड़ने के दौरान स्थानीय लोगों ने पुलिस, नगर निगम और पत्रकारों पर हमला बोला था। आगजनी और पथराव में पाँच लोगों की जान गई है, जबकि 8 करोड़ से अधिक की सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचा था।

18 साल से ईसाई मजहब का प्रचार कर रहा था पादरी, अब हिन्दू धर्म में की घर-वापसी: सतानंद महाराज ने नक्सल बेल्ट रहे इलाके में जलाई सनातन की अलख, गूँजा ‘जय श्री राम’

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर में सतानंद महाराज की ‘वनवासी राम कथा’ में एक ईसाई पादरी ने घर-वापसी की है। पत्रसपोटा नाम का ये पादरी 18 वर्षों से ईसाई मजहब के प्रचार-प्रसार में लगा था, लेकिन अब उसने अपनी भूल स्वीकार करते हुए स्वेच्छा से हिन्दू धर्म अपना लिया है। इस दौरान उसने खुलासा किया गोमांस खिला कर हिन्दुओं का धर्म भ्रष्ट किया जा रहा है। इस ‘वनवासी राम कथा’ में अब तक 80 परिवारों के 200 लोगों ने हिन्दू धर्म में घर-वापसी की है।

हिन्दू धर्म में वापस आने वाले पादरी ने बताया कि विभिन्न इलाकों में जाकर उसने ईसाई मजहब को फैलाने का काम किया था, लेकिन 1 वर्ष पहले उसे भाजपा के साथ काम करने का मौका मिला। उक्त पादरी ने बताया कि उसने श्रीमद्भागवत कथा के दौरान सतानंद महाराज का प्रवचन सुन कर उसे हृदय में ऐसा लगा कि पहले उसे किसी ने ये क्यों नहीं बताया। उक्त पादरी ने कहा कि अगर पहले ही उसने ये सब सुन लिया होता तो शायद इतना विलंब नहीं होता।

उक्त पादरी ने इस दौरान ये कामना की कि सतानंद महाराज यूँ ही सतत प्रवचन करते रहें। इस दौरान लोगों ने और उक्त पादरी ने भी ‘जय श्री राम’ का नारा भी लगाया। वहीं घर-वापसी करने वाले एक अन्य शख्स ने कहा कि पूरे छत्तीसगढ़ में, पूरे भारत देश में जितने भी सनातनी ईसाई मजहब में गए हैं, उन्हें वापस लाने के लिए RSS और सतानंद महाराज द्वारा प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सतानंद महाराज का प्रवचन उन्हें अंदर से सुसज्जित करता है।

सतानंद महाराज ने इस दौरान कहा कि गोमांस खिला कर धर्म-परिवर्तन कराया जाना एक बड़ा षड्यंत्र है। गौमाता के पंचगव्य से इन सभी का शुद्धिकरण किया गया। इस दौरान एक व्यक्ति ने तुलसी की कंठी धारण कर के मांस-मदिरा का भी त्याग कर दिया। उन्होंने कहा कि विधर्मी हमारे भाइयों को तोड़ने के लिए षड्यंत्र रचते हैं, जब हम किसी को बहकाने की जगह प्रेम से स्वीकार करते हैं। उन्होंने कहा कि धन देकर बहकाया जाता है, ‘तुम्हारे भीतर भूत है’ कह कर उन्हें ठीक करने का लालच देकर ईसाई मजहब में लाया जाता है।

उन्होंने कहा, “तुम बाइबिल को शास्त्र कहते हो, शास्त्र सिर्फ सनातन धर्म में था। अगर तुम्हें हमसे इतनी घृणा है तो हमारे मन्त्र ॐ का इस्तेमाल क्यों करते हो, हमारे देवी-देवताओं की प्रतिमाओं में येशु को क्यों दिखाते हो? हनुमान जी की मोम की मूर्ति बनाई जाती है, उन्हें धूप में रख कर पिघला दिया जाता है और बच्चों को कहा जाता है कि जब ये खुद को नहीं बचा सके तो तुम्हें क्या बचाएँगे।” इस दौरान जनजातीय समाज का 50 लाख राम नाम जप भी चल रहा है। 400 लोगों ने मांस-मदिरा छोड़ने की भी शपथ ली है।

रामेश्वर कैफे ब्लास्ट केस में निकला लश्कर-ए-तैयबा का भी कनेक्शन, सजायाफ्ता आतंकी शोएब अहमद मिर्जा गिरफ्तार : बेंगलुरु NIA ने किया अरेस्ट

रामेश्वरम कैफे ब्लास्ट केस का लश्कर-ए-तोएबा से भी कनेक्शन निकला है। इस केस की जाँच कर रही राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने शुक्रवार (24 मई 2024) को पाँचवें आतंकी शोएब अहमद मिर्जा उर्फ छोटू को गिरफ्तार किया है। एनआईए ने चार राज्यों में छापेमारी के बाद शोएब अहमद मिर्जा को पकड़ा है। शोएब कर्नाटक के हुबली का रहने वाला है। वो आतंकवाद के मामले में दोषी ठहराया जा चुका है और सजा काटने के बाद जब रिहा हुआ, तो फिर से आतंकवाद फैलाने में जुट गया था। शोएब अहमद मिर्जा उर्फ छोटू की उम्र 35 वर्ष है। वो लश्कर-ए-तैयबा (LeT) से जुड़ा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शोएब अहमद मिर्जा उर्फ छोटू दक्षिण भारत में सक्रिय कट्टर इस्लामिक आतंकियों में से एक है। एनआईए की जाँच में पाया गया कि शोएब मिर्जा, जो पहले लश्कर-ए-तैयबा बेंगलुरु मामले में दोषी ठहराया गया था, जेल से रिहा होने के बाद एक नई साजिश में शामिल हो गया। जाँच में यह सामने आया कि अहमद मिर्जा ने साल 2018 में अब्दुल मतीन ताहा को एक ऑनलाइन हैंडलर से मिलवाया, जिसके विदेश में होने का संदेह था। अहमद ने उनके बीच एन्क्रिप्टेड संचार के लिए एक ईमेल आईडी भी दी थी। बेंगलुरु के रामेश्वरम कैफे ब्लास्ट में अब्दुल मतीन ताहा मुख्य आरोपित है। उसने धमाके को अंजाम दिया था और वो पश्चिम बंगाल से गिरफ्तार हुआ था।

बता दें कि अब्दुल मतीन ताहा को 12 अप्रैल 2024 को कोलकाता में एक और आरोपी मुसाविर हुसैन शाजिब के साथ गिरफ्तार किया गया था। एनआईए ने मंगलवार (21 मई 2024) को इस विस्फोट के पीछे की पूरी साजिश का पर्दाफाश करने और अन्य आरोपितों की पहचान करने के लिए कई राज्यों में छापेमारी की थी। एनआईए की टीम ने इस सिलसिले में कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में 11 स्थानों पर छापेमारी की थी।

इंजीनियर सोहैल को किया था गिरफ्तार

इससे पहले, 21 मई 2024 को एनआईए ने बेंगलुरु के कुमारस्वारी लेआउट और बन्शांकरी में भी छापेमारी की थी। ये छापेमारी रामेश्वरम कैफे ब्लास्ट के मुख्य आतंकियों मुसाविर हुसैन शाजिब और अब्दुल मतीन ताहा से पूछताछ के बाद मिली जानकारी के आधार पर की गई थी, जिन्होंने इस धमाके की प्लानिंग कर धमाके को अंजाम दिया था। एनआईए के अधिकारियों ने आँध्र प्रदेश अनंतपुर जिले में स्थिति रायदुर्गम कस्बे में एक रिटायर्ड हेडमास्टर अब्दुल के घर पर भी छापेमारी की थी। इस छापेमारी में हेडमास्टर अब्दुल और उसके बेटे सोहैल से उनके बैंक खातों को लेकर पूछताछ की गई। दोनों के खातों में काफी पैसे मिले। सोहैल बेंगलुरु में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम करता है। इस पूछताछ के बाद एनआईए ने सोहैल को गिरफ्तार कर लिया था। इस केस में शोएब अहमद मिर्जा के साथ अब तक कुल 5 आतंकी गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

गौरतलब है कि बेंगलुरु के ब्रुकफील्ड में आईटीपीएल रोड स्थित कैफे में एक इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) के जरिए विस्फोट हुआ था, जिसमें कई ग्राहक और स्टाफ सदस्य घायल हो गए थे। 1 मार्च 2024 को बेंगलुरु के रामेश्वरम कैफे में हुए ब्लास्ट की जाँच के दौरान एनआईए ने पूरे भारत में 29 जगहों पर छापेमारी की थी। एनआईए इस केस में हैंडलर की भूमिका और इस ब्लास्ट के पीछे की बड़ी साजिश को लेकर लगातार जाँच कर रही है।

‘घेरलू खान मार्केट की बिक्री कम हो गई है, इसीलिए अंतरराष्ट्रीय खान मार्केट मदद करने आया है’: विदेश मंत्री S जयशंकर का भारत विरोधी गिरोह पर प्रहार

भारत में मीडिया का एक गिरोह है, जो मोदी सरकार के आने से पहले ये तक की दलाली करता था कि कौन केंद्रीय मंत्री बनेगा। उसे सरकार के हर फैसले पहले से पता होते थे। मीडिया के इस गिरोह को ‘खान मार्केट गैंग’ भी कहा गया। आज इनमें से अधिकतर YouTube के प्रोपेगंडाबाज बन चुके हैं। अब केंद्रीय विदेश मंत्री S जयशंकर ने कहा है कि ये ‘खान मार्केट’ बहुत बड़ा है, इसका एक वैश्विक वर्जन भी है जिसे अब ‘इंटरनेशनल खान मार्केट’ कह सकते हैं।

ANI के साथ इंटरव्यू में केंद्रीय विदेश मंत्री S जयशंकर ने कहा कि आज देश में एक खास सोच प्रक्रिया है, या यूँ कहें कि एक खास अधिकार प्रक्रिया है, जिसका बहुत अच्छा वर्णन हम ‘खान मार्केट गिरोह’ के रूप में करते हैं। उन्होंने कहा कि वो बताना चाहते हैं कि एक ‘अंतरराष्ट्रीय खान मार्केट’ भी है। उन्होंने कहा कि ये लोग यहाँ के ‘खुद को अधिकार संपन्न मानने वाले’ लोगों से जुड़े हुए हैं, उनके साथ सहज महसूस करते हैं, उन्हें जानते हैं, खुद को उनकी तरह ही मानते हैं।

भारत विरोधी इकोसिस्टम पर वार करते हुए सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने कहा कि घेरलू खान मार्केट में बिक्री की कमी हो गई है, इसीलिए ‘अंतरराष्ट्रीय खान मार्केट’ को लगता है कि उसे आगे आकर इनलोगों की मदद की ज़रूरत है। S जयशंकर ने इस दौरान सेक्स स्कैंडल में फँसे प्रज्वल रेवन्ना की बात भी की। उनका पासपोर्ट क्यों नहीं जब्त किया गया या उन्हें विदेश क्यों जाने दिया गया, इन सवालों पर उन्होंने कहा कि MEA (केंद्रीय विदेश मंत्रालय) को इस संबंध में 21 मई, 2024 को ही कर्नाटक सरकार से अनुरोध प्राप्त हुआ और हम प्रक्रिया के हिसाब से ही काम करते हैं।

केंद्रीय विदेश मंत्री ने कहा कि प्रेस और थिंक टैंक से लेकर प्रोफेसर तक शामिल हैं, जो भारतीय राजनीति की दिशा को अपने हिसाब से बदलना चाहते हैं। विभिन्न रैंकिंग में भारत को नीचे दिखाने की कोशिश को उन्होंने भारत को हतोत्साहित करने की मंशा करार दी। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे विदेशी मीडिया ने खुल कर कहा कि फलाँ नेता और पार्टी भारत के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार और बड़े बहुमत से सत्ता में आएगी, दक्षिण भारत में सीटें दोगुनी होंगी।

कोलकाता में 2 महीने लागू रहेगी धारा-144, धार्मिक-राजनीतिक सभाओं की नहीं होगी अनुमति : कमिश्नर ने जारी किया आदेश, खास इनपुट के बाद फैसला

कोलकाता में 28 मई से अगले 2 माह के लिए धारा-144 लागू की जा रही है। सुरक्षा से जुड़े खास इनपुट के बाद कमिश्नर ने ये फैसला लिया है। कोलकाता में 28 मई से 26 जुलाई तक धारा 144 लागू रहेगी। इस आदेश के लागू होने के बाद कोलकाता की सड़कों पर बिना इजाजत किसी तरह की सभा, जुलूस, रोड शो या कोई अन्य सभा आयोजित नहीं की जा सकेगी।

सीपी विनीत गोयल ने एक नोटिस जारी कर यह जानकारी दी है। नोटिस के मुताबिक, कोलकाता में हिंसक कार्यक्रमों का दौर चल रहा है। इससे कोलकाता की सड़कों पर हिंसा की घटनाएं बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में हिंसक घटनाओं को रोकने के लिये 144 धारा लागू की जा रही है। नोटिस में यह भी कहा गया है कि धारा 144 लागू होने के दौरान कोलकाता की सड़कों पर पांच या उससे अधिक लोग इकट्ठा नहीं हो सकते हैं।

इस दिशानिर्देश के मुताबिक 28 मई से 26 जुलाई तक हेयर स्ट्रीट पुलिस स्टेशन, बहूबाजार पुलिस स्टेशन और कोलकाता ट्रैफिक गार्ड मुख्यालय के तहत केसी दास क्रॉसिंग, विक्टोरिया हाउस और उसके आसपास के इलाकों में धारा 144 लागू रहेगा। इन इलाकों में कहीं भी पांच से अधिक लोग इकट्ठा नहीं हो सकेंगे। पुलिस के मुताबिक इन इलाकों में मतदान से पहले अशांति की आशंका है। इसी वजह से कोलकाता पुलिस ने ये फैसला लिया है।

बता दें कि कोलकाता में पीएम मोदी भी एक रोड शो करेंगे। उससे पहले धारा 144 लागू करने पर बीजेपी ने ममता सरकार पर हमला बोला है। बीजेपी ने कहा है कि कोलकाता पुलिस ने ममता बनर्जी सरकार के दबाव में ये फैसला लिया है, ताकी बीजेपी की चुनावी गतिविधियों को प्रभावित किया जा सके।

पाकिस्तानी पत्रकार को महँगा पड़ा ‘Mr. IPL’ से पंगा लेना, शाहिद अफरीदी को वर्ल्ड कप का ब्रांड एम्बेस्डर बनाए जाने के बाद उछल रहा था

भारत और पाकिस्तान के बीच हर मामले में मुकाबला कड़ा ही होता है। बात क्रिकेट की करें और खासकर विश्वकप मुकाबलों की, तो भारत हमेशा पाकिस्तान पर भारी ही पड़ा है। इस बीच, आईसीसी ने पाकिस्तान के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी को अगले महीने से वेस्टइंडीज और अमेरिका में होने जा रहे टी-20 विश्वकप के लिए ब्रैंड एंबेसडर बनाया है। इसके बाद एक पाकिस्तानी पत्रकार ने भारत के स्टार क्रिकेटर रहे सुरेश रैना से पंगा ले लिया, जिसके बाद सुरेश रैना ने पूरे पाकिस्तान को उसकी ‘औकात’ याद दिला दी।

दरअसल, इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) ने पाकिस्तान के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी को टी20 वर्ल्ड कप 2024 का एम्बैसडर चुना है। अफरीदी से पहले युवराज सिंह, क्रिस गेल और उसेन बोल्ट को आईसीसी टी20 वर्ल्ड कप 2024 के लिए ब्रांड एंबेसडर बना चुका है। आफरीदी का नाम सबसे आखिर में जुड़ा है। लेकिन जैसे ही अफरीदी को ब्रैंड एंबेसडर बनाए जाने की घोषणा हुई, वैसे ही एक पाकिस्तानी पत्रकार इमरान सिद्दीकी ने सुरेश रैना को टैग कर तंज कसने की कोशिश की, लेकिन उसका ये दाँव उल्टा पड़ गया।

इमरान सिद्दिकी एक्स पर सुरेश रैना को टैग करते हुए लिखा, ‘आईसीसी ने शाहिद अफरीदी को आईसीसी टी20 वर्ल्ड कप 2024 का एम्बैसडर चुना है। हेलो सुरेश रैना।’ इमरान ने इस पोस्ट के साथ अफरीदी को फोटो के साथ-साथ रैना की भी एक फोटो शेयर की, जिसमें वो कॉमेंट्री करते हुए नजर आ रहे हैं। उसके इस तंज पर सुरेश रैना ने ऐसा जवाब दिया, कि सभी लाजवाब हो गए।

सुरेश रैना ने इमरान सिद्दीकी के पोस्ट को कोट करते हुए लिखा, ‘मैं आईसीसी एंबेसडर नहीं हूँ, लेकिन मेरे घर में 2011 आईसीसी वर्ल्ड कप है, तुमको मोहाली का वो मैच याद है? उम्मीद करता हूँ इससे तुम्हारी कई न भूलने वाली यादें ताजा हो गई होंगी।’

बता दें कि भारत ने साल 2011 का क्रिकेट विश्वकप जीता था। उस विश्वकप के सेमीफाइनल में भारतीय टीम ने मोहाली में पाकिस्तानी टीम को बुरी तरह से मात दी थी। भारत ने उस मैच में पाकिस्तान को 29 रनों से धोया था। मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर मैन ऑफ द मैच रहे थे, जिन्होंने 85 रनों की धाँसू पारी खेली थी। सुरेश रैना ने उस मैच में 39 गेंदों पर नॉटआउट 36 रनों की पारी खेलते हुए भारत को 260 रनों के स्कोर तक पहुँचाया था। उस पाकिस्तानी टीम के कप्तान शाहिद अफरीदी ही थे और बाद में भारतीय टीम ने फाइनल मुकाबले में श्रीलंका को हराया था और 50 ओवरों के विश्वकप को दूसरी बार जीता था। वहीं, पाकिस्तानी टीम का प्रदर्शन उसके बाद के हर विश्वकप में बेहद खराब रहा है, जबकि भारतीय टीम 2015 में सेमीफाइनल तक पहुँची थी, तो 2019 और 2023 में भारतीय टीम फाइनल में हारी थी।

‘ईसाई धर्मांतरण और सेक्स करने के लिए दबाव बनाती है महिला टीचर’: जिस छात्र ने लगाया आरोप हाईकोर्ट ने उसके खिलाफ जाँच का दिया आदेश, स्कूल बोला – डांस के दौरान…

इलाहाबाद उच्च-न्यायालय ने हाल ही में उस छात्र के खिलाफ जाँच का आदेश दिया, जिसने अपने शिक्षिका पर इसे धर्मांतरण के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया था। उक्त छात्र ने ये भी आरोप लगाया था कि शिक्षिका उसके साथ यौन संबंध बनाने का भी दबाव दे रही थी। जस्टिस अरविंद सिंह सांगवान और राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने ये आदेश दिया। हाईकोर्ट को एक स्वतंत्र जाँच के बारे में सूचना मिली थी, जिसमें दावा किया गया था कि छात्र की कुछ करतूतों को छिपाने के लिए शिक्षिका पर ये आरोप लगाए गए हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में उक्त छात्र के किरदार की जाँच आवश्यक है, क्योंकि इस स्वतंत्र जाँच में निकले निष्कर्षों की पुष्टि होती है तो उक्त छात्र और उसके पिता के खिलाफ आपराधिक मामला चलाया जा सकता है। छात्र के पिता ने ही इस मामले में FIR दर्ज करवाई थी। कानपुर के पुलिस कमिश्नर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि वो साइबर सेल को इस मामले की जाँच सौंपे, जो पता लगाएगी कि कहीं छात्र ने शिक्षिका के नाम से कोई फेक सोशल मीडिया आईडी तो नहीं बनाई थी।

कानपुर के उक्त स्कूल के प्रिंसिपल ने इस संबंध में याचिका दायर की थी। छात्र के पिता की शिकायत पर जुडिशल मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद इस मामले की FIR दर्ज की गई थी। पिता ने दावा किया था कि 30 सितंबर, 2023 को जब उन्होंने अपने नाबालिग बेटे का मोबाइल फोन चेक किया तो उसमें शिक्षिका के मैसेज मिले, जिसमें वो सेक्स करने के लिए दबाव बना रही थी। चाइल्ड वेलफेयर कमिटी के पास भी इसकी शिकायत दर्ज है। आरोपों के बाद महिला टीचर को नौकरी से निकाल दिया गया था।

स्कूल ने एक स्थानीय रिटायर्ड सिविल सेवा अधिकारी, एक अन्य स्कूल के प्रिंसिपल और एक स्कूल के कर्मचारी का पैनल बनाते हुए उन्हें इस मामले की जाँच की जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके निष्कर्ष में बताया गया कि एक डांस प्रतियोगिता के दौरान छात्र ने शिक्षिका का मोबाइल फोन लेकर उसके नाम से फेक आईडी बना ली थी। इसके बाद उसने उस फेक आईडी का इस्तेमाल कर के चैटिंग करना और उस पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। स्कूल का कहना है कि छात्र के आरोप बेबुनियाद हैं।

‘नाम खराब करने के लिए दुर्भावनापूर्ण हरकत’: कोर्ट ने मेधा पाटकर को ठहराया दोषी, दिल्ली LG से जुड़ा है मामला

दिल्ली की साकेत कोर्ट ने शुक्रवार (24 मई) को सामाजिक कार्यकर्ता और नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर को मानहानि मामले में दोषी ठहराया है। उनके खिलाफ तत्कालीन केवीआईसी अध्यक्ष वीके सक्सेना (अब दिल्ली एलजी) की ओर से याचिका दायर की गई थी। इस मामले में अब मेधा पाटकर को जेल और जुर्माना, दोनों ही तरह की सजा मिल सकती है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये केस 21 साल पुराना था। साल 2000 से ही वीके सक्सेना और मेधा पाटकर कोर्ट की लड़ाई में उलझे थे। साल 2000 में मेधा पाटकर ने अपने खिलाफ आपत्तिजनक ऐड छापने के मामले में वीके सक्सेना पर केस दर्ज कराया था। इसके जवाब में वीके सक्सेना, जो उस समय केवीआईसी के अध्यक्ष थे, उन्होंने मेधा पाटकर पर 2 केस दर्ज कराए थे। जिस केस में मेधा पाटकर दोषी पाई गई हैं, वो साल 2003 में दर्ज कराया गया था।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, साकेत कोर्ट के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने मेधा पाटकर को आपराधिक मानहानि का दोषी पाया है। कानून के मुताबिक, उन्हें सजा के तौर पर दो साल की जेल या जुर्माना या फिर दोनों मिल सकते हैं।

कोर्ट ने कहा कि, मेधा पाटकर ने आईपीसी की धारा 500 के तहत दंडनीय अपराध किया है। उसे इसके लिए दोषी ठहराया जाता है। उनकी हरकतें जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण थीं, जिसका उद्देश्य शिकायतकर्ता के अच्छे नाम को खराब करना था। उनके कार्यों ने वास्तव में जनता की नजर में उसकी प्रतिष्ठा और साख को काफी नुकसान पहुँचाया है।

कोर्ट ने पाया कि पाटकर ने अपने बयान में सक्सेना को कायर कहा और हवाला लेनदेन में उनकी संलिप्तता का आरोप लगाया था, ये न केवल मानहानिकारक थे, बल्कि नकारात्मक धारणाओं को भड़काने के लिए भी तैयार किए गए थे। यह आरोप कि सक्सेना गुजरात के लोगों और उनके संसाधनों को विदेशी हितों के लिए गिरवी रख रहे थे, उनकी ईमानदारी और सार्वजनिक सेवा पर सीधा हमला था।

जानकारी के मुताबिक, साल 2000 में मेधा पाटकर और वीके सक्सेना के बीच तनातनी हुई थी। उस समय वीके सक्सेना अहमदाबाद बेस्ड एनडीए नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के अध्यक्ष थे। उन्होंने अपने खिलाफ टीवी पर आपत्तिजनक बयानबाजी को लेकर 2 केस दर्ज कराए थे। मेधा पाटकर ने उनके खिलाफ प्रेस में भी बयान जारी किया था।

राजीव गाँधी की हत्या के बाद चुनाव आगे बढ़ाने से कॉन्ग्रेस को ऐसे हुआ था फायदा, चुनाव आयुक्त रहे TN शेषन को आडवाणी के खिलाफ मिला टिकट: कहानी 1991 की

अब जब लोकसभा चुनाव 2024 अपने अंतिम चरण में है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धुआँधार प्रचार अभियान अब भी जारी है। गुरुवार (23 मई, 2024) को इंडिया टीवी के कार्यक्रम ‘सलाम इंडिया’ में रजत शर्मा ने उनका इंटरव्यू लिया। ये कार्यक्रम ‘भारत मंडपम’ में आयोजित किया गया था। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई मुद्दों पर बात की, जिसमें से एक चुनाव आयोग की निष्पक्षता का भी था। विपक्षी दल अक्सर आरोप लगाते रहे हैं कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है।

PM मोदी ने याद दिलाया 33 साल पुराना इतिहास

डेढ़ घंटे के इस वीडियो में 55:20 के बाद का हिस्सा आप देखेंगे तो पाएँगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बात की है कि कैसे विपक्ष के लोग चुनाव आयोग को गाली देते हैं। इसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस को आईना दिखाने के लिए इतिहास का सहारा लिया। उन्होंने नियम समझाया कि हमारे देश की चुनावी व्यवस्था कहती है कि मतदान से पहले किसी उम्मीदवार की मृत्यु हो जाए तो उस सीट पर चुनाव स्थगित होता है और उसकी तारीख़ बाद में आई है।

इसके बाद उन्होंने कहा, “कोई मुझे बताए कि राजीव गाँधी नाम का एक व्यक्ति संसदीय चुनाव का उम्मीदवार था। आतंकवाद में उनकी हत्या हो गई। उनकी सीट पर चुनाव रुकनी चाहिए थी। लेकिन, उस समय के चुनाव आयोग ने पूरे देश का चुनाव रोक दिया। कोई लॉजिक नहीं था। करीब 21-22 दिन दिए गए। उनकी अस्थियाँ लेकर देश भर में यात्रा निकाली गई और फिर चुनाव हुआ। देश के इलेक्शन कमिश्नर, बाद में उन्होंने खुद कॉन्ग्रेस प्रत्याशी बन कर लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव लड़ा।”

बता दें कि विपक्षी नेता अक्सर ‘Level Playing Field’ न होने की बात करते हैं और कहते हैं कि भाजपा सरकारी मशीनरी अपने पक्ष में होने के कारण फायदे में है। इसी का जवाब देते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने इस घटना को याद किया और पूछा कि ये कौन सा ‘लेवल प्लेयिंग फिल्ड’ था? कुछ भी हो, 33 वर्ष पहले हुई इस घटना की याद दिला कर प्रधानमंत्री ने एक नई चर्चा तो छेड़ ही दी है। आइए, जानते हैं 1991 के उस चुनावी घटनाक्रम के दौरान क्या हुआ था।

चंद्रशेखर सरकार का गिरना और राजीव गाँधी की हत्या

उस समय TN शेषन देश के मुख्य चुनाव आयुक्त हुआ करते थे। राजीव गाँधी ने ही तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार पर दबाव डाल कर दिसंबर 1990 में उन्हें ये पद दिलवाया था। उस सरकार को बाहर से कॉन्ग्रेस का समर्थन था। तत्कालीन कानून मंत्री सुब्रमण्यन स्वामी ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई थी। सुब्रमण्यन स्वामी ने ही मई 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिराने के लिए सोनिया गाँधी और AIADMK की जयललिता की बैठक करवाई थी। आज भी वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भला-बुरा कहते रहते हैं।

1991 में मध्यावधि चुनाव हुए थे। उससे पहले चंद्रशेखर की सरकार गिर गई थी, क्योंकि कॉन्ग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया था। मार्च 1991 में हरियाणा के 2 पुलिसकर्मियों को राजीव गाँधी के आवास के बार चाय पीते हुए पाया गया। पार्टी ने आरोप लगाया था कि ये दोनों CID से हैं और राजीव गाँधी की जासूसी कर रहे थे। उस समय 197 सीटों वाली कॉन्ग्रेस सत्ता से बाहर थी, लेकिन उसने VP सिंह की सरकार गिरने के बाद चंद्रशेखर को समर्थन दिया था, जिन्होंने 64 सांसद तोड़ते हुए ‘समाजवादी जनता पार्टी’ बनाई थी।

उस समय हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला की सरकार थी, जो चंद्रशेखर की पार्टी का अहम हिस्सा थे। गुस्साए राजीव गाँधी ने चंद्रशेखर की सरकार गिरा दी। 6 मार्च, 1991 को चंद्रशेखर बहुमत साबित करने में नाकाम रहे और मई में चुनावों की घोषणा हो गई। 20 मई को पहला चरण संपन्न हुआ। इसके अगले ही दिन तमिलनाडु के श्रीपेरूम्बदुर में राजीव गाँधी की श्रीलंका के उग्रवादी संगठन LTTE ने हत्या कर दी। चुनाव स्थगित कर दिया गया। इसके बाद 12 और 15 जून को चुनाव हुए।

राजीव गाँधी की हत्या के बाद चुनाव क्यों स्थगित हुआ, इसका कोई स्पष्ट कारण नज़र नहीं आता। राजीव गाँधी अमेठी से चुनाव लड़ रहे थे, जहाँ उनकी हत्या से 1 दिन पहले ही वोट डाले जा चुके थे। जब बाद में परिणाम जारी हुए तो राजीव गाँधी ने 53.13% मत पाकर जीत दर्ज की थी। उन्हें 1.87 लाख वोट प्राप्त हुए थे, जबकि भाजपा के रवींद्र प्रताप 75,000 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे। बाद में अमेठी में उपचुनाव हुआ, जिसमें कॉन्ग्रेस के सतीश शर्मा विजयी रहे।

दिल्ली में यमुना नदी के किनारे उनकी माँ इंदिरा गाँधी की समाधि के नज़दीक ही राजीव गाँधी का भी अंतिम संस्कार 24 मई, 1991 को हुआ। उससे पहले उनके शव को लेकर तीन मूर्ति भवन से लेकर शक्ति स्थल तक ये यात्रा निकाली गई। 33 सैनिकों की 5 पलटन आगे और 5 पलटन पीछे इस दौरान चल रही थी। राजीव गाँधी के अंतिम संस्कार के लिए 10 क्विंटल लकड़ी का इस्तेमाल किया गया था, जिसमें 4 क्विंटल चन्दन की लकड़ी थी।

जो TN शेषन चुनाव स्थगित किए जाने के समय मुख्य चुनाव आयुक्त थे, उन्होंने 1999 के लोकसभा चुनाव के दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी के टिकट पर भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण अडवाणी के खिलाफ चुनाव लड़ा। वो 1.89 लाख वोटों से चुनाव हार गए। इससे पहले वो 1997 में भारत के राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ चुके थे, लेकिन कॉन्ग्रेस की तरफ से उतारे गए KR नारायणन से हार गए थे। TN शेषन को मात्र 5% वोट ही प्राप्त हुआ था।

राजीव गाँधी की हत्या के बाद कॉन्ग्रेस को फायदा

राजीव गाँधी की हत्या के बाद हुए एग्जिट पोल से स्पष्ट पता चला था कि कॉन्ग्रेस पार्टी को चुनाव में इसका फायदा मिल रहा है। उनकी हत्या से पहले हुए एग्जिट पोल में कॉन्ग्रेस को 190 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया था जबकि हत्या के बाद 265. कॉन्ग्रेस ने 244 सीटें जीती भी। ग्रामीण इलाकों में, और मुस्लिम समुदायों द्वारा कॉन्ग्रेस के पक्ष में मतदान बढ़ा। राजीव गाँधी की हत्या से पहले 211 सीटों पर मतदान हुआ था, जबकि हत्या के बाद 332 सीटों पर।

हत्या से पहले जहाँ-जहाँ चुनाव हुए वहाँ कॉन्ग्रेस पार्टी को 5.7% नुकसान हुआ, जबकि हत्या के बाद जिन सीटों पर चुनाव हुए वहाँ कॉन्ग्रेस को 1.6% का फायदा हुआ। वोटर टर्नआउट भी बढ़ा था। हत्या से पहले बिहार में ये 56% था, हत्या के बाद 63% हो गया। बिहार में पहले कॉन्ग्रेस 6% वोटों के घाटे में थी, राजीव गाँधी की हत्या के बाद 1.8% के फायदे में आ गई। सबसे अधिक बदलाव तो कॉन्ग्रेस के पक्ष में राजस्थान में हुआ था।

वहाँ पार्टी पार्टी को 2% वोटों का फायदा हो रहा था, लेकिन राजीव गाँधी की हत्या के बाद हुए चुनावों में पार्टी को 14% वोटों का फायदा हुआ। वोटर टर्नआउट भी 5% बढ़ा। आंध्र प्रदेश में TDP को 9% वोटों का नुकसान हुआ। बिहार और राजस्थान में भाजपा को घाटा हुआ। राजीव गाँधी की हत्या को कॉन्ग्रेस ने अपने पक्ष में जम कर भुनाया, चुनाव आयोग ने किसके इशारे पर ये सब किया होगा ये बताने की ज़रूरत नहीं है। तभी TN शेषन को आगे चल कर प्रत्याशी बनाया गया।

उम्मीदवार की मौत हो जाए तो… क्या कहता है नियम?

आइए, अब आपको बताते हैं कि किसी उम्मीदवार की मौत होने की स्थिति में चुनाव का क्या होता है। 1951 के लोक प्रतिनिधित्व कानून (Representation of Peoples Act) में कहा गया है कि अगर चुनाव के दौरान किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के प्रत्याशी की मौत हो जाती है तो धारा-52 के तहत उक्त सीट पर मतदान स्थगित किया जा सकता है। नामांकन की आखिरी तारीख़ को सुबह 11 बजे से लेकर मतदान शुरू होने तक की अवधि के बीच में अगर उम्मीदवार की मौत होती है तो ये नियम लागू होता है।

इसके बाद RO (रिटर्निंग ऑफिसर) को चुनाव आयोग को तथ्यों से अवगत कराना होता है। फिर चुनाव आयोग संबंधित राजनीतिक को किसी अन्य प्रत्याशी को नामांकित करने के लिए कहता है। इसके लिए एक सप्ताह का समय दिया जाता है। अगर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की सूची पहले ही तैयार की जा चुकी है तो उसे रद्द कर के नई सूची तैयार की जाती है। प्रकाशित की गई नई सूची में मृत उम्मीदवार की जगह नए नामांकित उम्मीदवार का नाम होता है।

लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान भी ऐसी घटना हुई है। मुरादाबाद में चुनाव संपन्न होने के 1 दिन बाद ही भाजपा प्रत्याशी कुँवर सर्वेश सिंह का निधन हो गया। वो बीमार थे। उनका निधन मतदान के बाद हुआ है, इसीलिए इस स्थिति में मतगणना तक रुका जा सकता है। क्योंकि, अगर किसी और प्रत्याशी की जीत हुई तो उपचुनाव की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी, लेकिन अगर कुँवर सर्वेश सिंह मरणोपरांत विजयी होते हैं तो चुनाव रद्द कर उपचुनाव कराया जाएगा।

ताज़ा उदाहरण हम मध्य प्रदेश के बैतूल का भी ले सकते हैं। यहाँ BSP उम्मीदवार अशोक भलावी की हार्ट अटैक के कारण मौत हो गई थी। इस सीट पर दूसरे चरण में मतदान होना था, लेकिन इसे तीसरे चरण तक के लिए टाल दिया गया। व्यवस्था दी गई कि अगर नया उमीदवार बसपा उतारती है तो उसे नामांकन दाखिल करना होगा, पूर्व से नामांकित उम्मीदवारों की स्थिति ज्यों की त्यों रहेगी। किसी एक सीट पर ऐसी घटना होने के कारण पूरे देश में चुनाव रद्द नहीं किया जाता।