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‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा असली मालिकों को सौंपा जाए’: जैन संतों उस मंदिर का किया दौरा, जिसे मुस्लिम आक्रांता कुतुबद्दीन ऐबक ने तोड़कर बना दिया मस्जिद

मंगलवार (7 मई) की सुबह, मुनि सुनील सागर के नेतृत्व में जैन समुदाय ने राजस्थान के अजमेर जिले में 12वीं सदी की मस्जिद अढ़ाई दिन का झोंपड़ा तक नंगे पैर मार्च किया। उन्होंने कहा कि एएसआई द्वारा संरक्षित इस जगह पर पूजा-अर्चना करना सदियों से उनका रिवाज रहा है। इस दौरान उन्हें रोकने की कोशिश की गई।

एएसआई ने संपत्ति को संरक्षित स्मारक घोषित किया है। स्थानीय लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिश ये कहते हुए की, कि जैन मुनि बिना कपड़े पहने मस्जिद में प्रवेश नहीं कर सकते। भिक्षुओं ने तर्क दिया कि ऐसे ही रहना और अढ़ाई दिन का झोपड़ा में जाना उनका अधिकार है। जैन संतों के साथ विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि 12वीं शताब्दी में मस्जिद में बदलने होने से पहले यह स्थान कभी एक संस्कृत विद्यालय था।

जैन संतों और उनके अनुयायियों ने अपनी यात्रा के दौरान मस्जिद के केंद्रीय क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया। मुनि सुनील सागर ने स्थल पर पत्थर के मंच पर दस मिनट तक प्रवचन किया। उन्होंने कहा “भवन उसके असली मालिकों के नियंत्रण में होनी चाहिए। अगर यहाँ पूजा-अर्चना करना हमारी परंपरा रही है तो ऐसा करना भी चाहिए। इसे सर्वोच्च पद के अधिकार की मंशा की ओर नहीं ले जाना चाहिए। हमें सावधान रहना चाहिए। जब हम तथ्यों को स्वीकार किए बिना दूसरे की संपत्ति पर अपना अधिकार जताते हैं, तो यह शत्रुता को बढ़ावा देता है। हमें सद्भाव के लिए प्रयास करना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए।”

टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए मुनि सुनील सागर ने कहा, “आज मैंने अढ़ाई दिन का झोपड़ा का दौरा किया और पाया कि यह महज एक झोपड़ी (झोपड़ा) नहीं बल्कि एक महल है। मैंने रामायण और महाभारत के कई प्रतीक देखे। मुझे हिंदू आस्था की टूटी हुई मूर्तियाँ भी मिलीं, फिर भी ये विडंबना है कि इसे मस्जिद कहा जाता है। उन्होंने कहा, “हमें संपत्ति पर उचित स्वामित्व को स्वीकार करना चाहिए। हमें भी पूजा करने का अधिकार है और ऐसे अधिकारों पर किसी का एकाधिकार नहीं है। इतिहास विकसित होता है और परिस्थितियाँ भी। धर्म हमें दया, प्रेम और अहिंसा सिखाता है।”

अढ़ाई दिन का झोपड़ा का इतिहास

मूल रूप से एक शानदार संस्कृत कॉलेज (सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय) जिसमें ज्ञान और बुद्धि की हिंदू देवी माता सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है, इस इमारत का निर्माण महाराजा विग्रहराज चतुर्थ द्वारा करवाया गया था। वह शाकंभरी चाहमान या चौहान वंश के राजा थे। कई दस्तावेज़ों के अनुसार, मूल इमारत चौकोर आकार की थी। इसके प्रत्येक कोने पर एक टावर था। भवन के पश्चिमी तरफ माता सरस्वती का मंदिर था। 19वीं शताब्दी में वहाँ सिक्का भी मिला था, जो 1153 ई. की थी। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि सिक्के के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मूल इमारत का निर्माण 1153 के आसपास हुआ था।

हालाँकि, कुछ स्थानीय जैन किंवदंतियाँ बताती हैं कि इमारत का निर्माण 660 ईस्वी में सेठ विरमदेव काला द्वारा करवाया गया था। इसका निर्माण एक जैन तीर्थस्थल के रूप में किया गया था और पंच कल्याणक मनाया जाता था। उल्लेखनीय है कि इस स्थल पर उस समय के जैन और हिंदू दोनों वास्तुकला के तत्व मौजूद हैं। अढ़ाई दिन का झोपड़ा के इतिहास पर ऑपइंडिया की रिपोर्ट यहाँ पढ़ सकते हैं।

‘संपत्तियों पर कब्जा करना और उसे अपनी संपत्ति घोषित करना वक्फ बोर्ड का स्वभाव’: श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में बोला हिंदू पक्ष- 1968 का समझौता अमान्य

उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद में हिंदू पक्ष ने मंगलवार (7 मई 2024) को इलाहाबाद हाई कोर्ट में तर्क दिया। हिंदू पक्ष ने बताया कि वक्फ बोर्ड की किसी भी संपत्ति पर अतिक्रमण करने और उसे अपनी संपत्ति घोषित करने की सामान्य प्रथा है। हिंदू पक्ष की अधिवक्ता रीना एन सिंह ने अदालत से वक्फ बोर्ड को इस तरह की प्रथा चलाने की अनुमति नहीं देने का आग्रह किया।

हिंदू पक्ष ने यह दलील तब दी, जब इलाहाबाद हाई कोर्ट मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर से सटे शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की माँग वाली मुकदमे को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था। यह चुनौती मुस्लिम पक्ष ने दी है। न्यायमूर्ति मयंक जैन श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह ढाँचा विवाद से संबंधित 18 मुकदमों की समेकित पोषणीयता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।

हिंदू पक्ष की वकील रीना सिंह ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय को सूचित किया कि मुस्लिम पक्ष ने दावा किया है कि दोनों पक्षों के बीच 1968 के समझौते ने संपत्ति को वक्फ संपत्ति में बदल दिया है। रीना सिंह ने कहा कि इस संपत्ति के मालिक भगवान हैं, जो उस समझौते में एक पक्ष के रूप में नहीं थे। इसलिए यह समझौता अमान्य हो गया।

अधिवक्ता रीना सिंह ने आगे कहा कि वक्फ अधिनियम और पूजा स्थल अधिनियम के प्रावधान इस मामले में प्रासंगिक नहीं थे। इससे पहले 2 मई की सुनवाई में उन्होंने तर्क दिया था कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि संरक्षित स्मारक और राष्ट्रीय महत्व का स्मारक, दोनों है। इस तरह, यह प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 के अधीन होगा, ना कि पूजा स्थल अधिनियम के।

उन्होंने आगे कहा कि पूजा स्थल अधिनियम के साथ-साथ वक्फ अधिनियम के प्रावधान इस मामले में लागू नहीं होते हैं। रीना सिंह ने इस मामले में दर्जन भर से अधिक तथ्य रखे। उन्होंने दलील दी कि ASI की जाँच में पुरातात्विक खनन के दौरान ईदगाह के अंदर स्थित कुएँ से श्रीकृष्ण के मूल गर्भगृह के मंदिर की आठ फुट की चौखट मिल चुकी है। उस चौखट के आगे के भाग पर नक्काशी की हुई है।

उन्होंने आगे कहा कि इस चौखट के पीछे के भाग में ब्राह्मी लिपि में अंकित है कि यह भगवान वासुदेव का महास्थान है। यह चौखट मथुरा के सरकारी म्यूजियम में रखी हुई है। उन्होंने कहा कि खनन में राधा-कृष्ण की मूर्तियों के अवशेष भी मिले हैं। उन्होंने भारत सरकार के अंतर्गत आने वाले डिपार्मेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के अंतर्गत ‘इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑफ वेदाज’ के रिकॉर्ड को भी रखा।

इसके आधार पर रीना सिंह ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म और महाभारत के तमाम घटनाओं के वास्तविक समय का जिक्र करते हुए अपने तथ्यों को रखा। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और महाभारत काल के दौरान मस्जिद का कहीं कोई जिक्र ही नहीं था। इसके अलावा, उन्होंने देश के पूर्व राष्ट्रपति और भारत रत्न अब्दुल कलाम की पुस्तक ‘इग्नाइटेड माइंड्स’ का भी जिक्र किया।

इस किताब का हवाला देते हुए रीना सिंह ने कहा कि इसके पाँचवें अध्याय में साफ तौर पर इस बात का जिक्र किया गया है कि भारत का मूल धर्म सनातन संस्कृति और वह इस्लाम से अत्यधिक पुराना है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 15 मई 2024 को होगी। हिंदू पक्ष की दलीलें पूरी होने के बाद मुस्लिम पक्ष अपनी दलीलें पेश करेगा। मुस्लिम पक्ष की ओर से अधिवक्ता तस्नीम अहमदी पेश हुए।

बताते चलें कि मथुरा में यह विवाद 13.37 एकड़ जमीन के मालिकाना हक को लेकर है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि के पास 10.90 एकड़ जमीन है, जबकि शाही ईदगाह ढाँचा के पास 2.50 एकड़ जमीन है। ये पूरी ज़मीन हिंदू पक्ष की है। लंबे समय से चल रहे संघर्ष ने विवादित ढाँचे के निरीक्षण की अनुमति देने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के साथ एक बड़ा मोड़ ले लिया है।

मणिपुर सरकार ने 5457 अवैध प्रवासियों की पहचान की, बायोमेट्रिक सैंपल जुटाए: मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने देश से निकालने की कार्रवाई शुरू की

मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने बुधवार (8 मई) को बताया कि सरकार ने राज्य में 5457 अवैध प्रवासियों की पहचान की है। इनके निर्वासन की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार अवैध अप्रवासियों को मानवीय सहायता प्रदान कर रही है और चिंताजनक स्थिति के बावजूद सरकार इस मामले को संवेदनशीलता के साथ संभाल रही है।

सोशल मीडिया साइट एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए सीएम सिंह ने कहा, “5457 अवैध प्रवासियों की हुई पहचान, बायोमेट्रिक रजिस्टर्ड। सरकार ने 7 मई 2024 तक मणिपुर के कामजोंग जिले में कुल 5457 अवैध अप्रवासियों का पता लगाया है। इनमें से 5173 अवैध अप्रवासियों का बायोमेट्रिक डेटा एकत्र किया गया है। उनके निर्वासन की प्रक्रिया चल रही है।”

बता दें कि पिछले सप्ताह 38 अवैध अप्रवासियों को मणिपुर से म्यांमार निर्वासित किया गया था। इस तरह 8 मार्च के बाद से निर्वासित किए गए म्यांमार के अवैध प्रवासियों की कुल संख्या 77 हो गई है। इस संबंध में मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने 2 मई 2024 को जानकारी दी थी।

उन्होंने कहा था, “…बिना किसी भेदभाव के हमने म्यांमार से आए अवैध प्रवासियों के निर्वासन का पहला चरण पूरा कर लिया है। इसके तहत 38 और प्रवासी आज मोरेह के माध्यम से मणिपुर, भारत छोड़ रहे हैं। पहले चरण में कुल 77 अवैध अप्रवासियों को निर्वासित किया गया है।”

उन्होंने आगे कहा था, “हैंडओवर समारोह के दौरान एक भारतीय नागरिक को भी म्यांमार से वापस लाया गया। राज्य सरकार अवैध अप्रवासियों की पहचान जारी रखे हुए है और साथ ही बायोमेट्रिक डेटा भी दर्ज किया जा रहा है। आइए अपनी सीमाओं और देश को सुरक्षित रखें।”

‘इस्लामी रिवाज अपनाओ नहीं तो मार देंगे’: 14 साल की दलित नाबालिग से इब्राहिम खान करता था रेप, जबरन पढ़वाता था नमाज

महाराष्ट्र में मुंबई पुलिस ने इब्राहीम खान के खिलाफ लव जिहाद, एससी-एसटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट समेत कई मामलों में एफआईआर दर्ज की है। इब्राहीम खान ने 14 साल की हिंदू लड़की से रेप किया और निकाह का झाँसा देकर अपने पास रखा। यही नहीं, उसने हिंदू लड़की को नमाज पढ़ने और धर्म परिवर्तन कराने के लिए दबाव डाला। वो उसे रोजा रखने के लिए भी मजबूर करता था।

ये मामला शुक्रवार (3 मई 2024) को सामने आया। जब पीड़ित बच्ची ने पुलिस से संपर्क किया। ऑपइंडिया के पास एफआईआर की कॉपी मौजूद है। एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, लड़की के माता-पिता की मौत हो चुकी है। इब्राहीम खान उसके पड़ोस में रहता था। वो अक्सर उसके घर आया करता था। उसने नवंबर 2023 में पीड़ित को अपने घर बुलाया और उसका रेप किया। बच्ची अपनी बहन के साथ रहती है। बच्ची को उसने उसके परिवार समेत मार डालने की धमकी भी दी।

पीड़ित ने पुलिस को दी शिकायत में बताया है कि 8 नवंबर 2023 को इब्राहीम खान ने उससे कहा कि वो उसे पसंद करता है और उसके साथ पूरी जिंदगी बिताना चाहता है। उसने नाबालिग हिंदू बच्ची को निकाह के लिए प्रपोज किया। लड़की ने समय माँग कर अपना पीछा छुड़ाया, लेकिन 11 नवंबर को जब वो अपने घर में अकेले थी, तब इब्राहीम खान उसके घर में घुस आया और उसके साथ छेड़छाड़ की। इसके बाद उसने लड़की के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। उसने एक बार फिर से लड़की को निकाह का झाँसा दिया और फिर जबरदस्ती उसका रेप किया।

एफआईआर में पीड़ित ने बताया, “इब्राहीम खान ने कहा कि वो मेरे साथ रहना चाहता है, अपने माता-पिता के साथ नहीं, क्योंकि वो उसे पसंद करता है। इब्राहीम ने कहा कि वो किराए पर कमरा लेगा और उसके साथ खुशी से रहेगा। मैंने मना कर दिया, लेकिन उसने मेरे साथ जबरदस्ती की और कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है।”

इब्राहीम खान ने लड़की के साथ दिसंबर 2023 में भी रेप किया। उसने लड़की को धमकाया कि अगर वो उसकी बात नहीं मानेगी, तो वो उसे मार देगा। यही नहीं, वो एक बार लड़की को पास की मस्जिद में ले गया और उसे इस्लामिक नियमों के साथ रोजा रखने को कहा। लड़की ने बताया कि उसे लव जिहाद का अंदेशा हो गया था, इसलिए वो भागने की कोशिश कर रही थी, लेकिन इब्राहीम खान ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। वो 3 मई 2024 को एक बार फिर से लड़की के घर में घुस गया और उसके साथ मारपीट करते हुए उसे जान से मारने की धमकी दी। इस मामले में पुलिस ने इब्राहीम खान के खिलाफ सेक्शन 376 और सेक्शन 376 (3), पॉक्सो एक्ट के सेक्शन 4 और 8 के साथ ही एससी-एसटी एक्ट में मामला दर्ज किया है।

औरंगाबाद का नाम छत्रपति संभाजीनगर और उस्मानाबाद का नाम धाराशिव करना गलत नही: बॉम्बे हाई कोर्ट ने खारिज कीं चुनौती देने वाली याचिकाएँ

बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार (8 मई 2024) को औरंगाबाद और उस्मानाबाद का नाम बदलने के महाराष्ट्र सरकार के निर्णय के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने औरंगाबाद का नाम बदलकर छत्रपति संभाजीनगर और उस्मानाबाद का नाम बदलकर धाराशिव करने के सरकार फैसले को बरकरार रखा।

बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और जस्टिस आरिफ डॉक्टर की खंडपीठ ने कहा कि शहरों के नाम बदलने की अधिसूचना अवैध नहीं थी। कोर्ट ने कहा, “हमें यह मानने में कोई झिझक नहीं है कि शहरों और राजस्व प्रभागों का नाम बदलने वाली अधिसूचनाएँ किसी भी बुराई से ग्रस्त नहीं हैं।”

दरअसल, दोनों शहरों के नाम बदलने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले के खिलाफ संबंधित जिलों के निवासियों सहित व्यक्तियों द्वारा उच्च न्यायालय के समक्ष कई याचिकाएँ दायर की गईं। याचिकाओं में कहा गया है कि राज्य सरकार ने वर्ष 2001 में औरंगाबाद का नाम बदलने के अपने प्रयास को विफल कर दिया था।

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि यह निर्णय संविधान के प्रावधानों की पूरी तरह अवहेलना है। उस्मानाबाद का नाम बदलने के खिलाफ दायर याचिका में कहा गया था कि उस्मानाबाद का नाम बदलकर धाराशिव करने से धार्मिक और सांप्रदायिक नफरत भड़क सकती है। इससे धार्मिक समूहों के बीच दरार पैदा हो सकती है।

याचिका में दावा किया गया था कि यह बदलाव भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के विपरीत है। इसमें यह भी बताया गया था कि सन 1998 में महाराष्ट्र सरकार ने उस्मानाबाद का नाम बदलकर धाराशिव करने का प्रयास किया था, लेकिन असफल रही। इसलिए इन बदलावों पर फिर से रोक लगाई जाए।

जवाब में महाराष्ट्र सरकार ने कहा कि ‘उस्मानाबाद’ का नाम बदलकर ‘धाराशिव’ करने से न तो कोई धार्मिक या सांप्रदायिक नफरत पैदा हुई, बल्कि अधिकांश लोगों ने उस्मानाबाद का नाम बदलकर धाराशिव करने पर जश्न मनाया। सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया कि नाम बदलना एक समुदाय के प्रति नफरत फैलाने के उद्देश्य से राजनीति से प्रेरित कदम था।

बता दें कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी (एमवीए) की पिछली सरकार ने 29 जून 2021 को अपनी कैबिनेट की बैठक में दोनों शहरों का नाम बदलने का फैसला किया था।औरंगाबाद शहर और राजस्व मंडल का नाम बदलकर ‘छत्रपति संभाजीनगर’ कर दिया गया, जबकि उस्मानाबाद का नाम बदलकर ‘धाराशिव’ कर दिया गया।

इसको लेकर कहा गया कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार ने राजनीतिक लाभ के लिए कथित तौर पर अनधिकृत तरीके से इस मुद्दे को अपनी आखिरी कैबिनेट में उठाया। इसके बाद शिवसेना में टूट हुई मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली नई सरकार ने 16 जुलाई 2022 को उद्धव सरकार के फैसले की फिर से पुष्टि की।

नगर कीर्तन पर खालिस्तानी छाया, PM मोदी की हत्या वाली झाँकी निकाली: भारत ने कनाडा को रगड़ा, कहा- कट्टरपंथियों का पनाहगाह न बने

कनाडा के टोरंटो में खालिस्तान समर्थकों ने रविवार (5 मई 2024) को नगर कीर्तन के दौरान झाँकी निकाली। इस झाँकी में पीएम मोदी को जंजीरों से कैद दिखाया गया। ठीक उसी तरह से, जैसा पिछले साल पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी की हत्या को दिखाने वाली झाँकी निकाली गई थी। खालिस्तानी तत्वों के नगर कीर्तन के दौरान इस झाँकी पर भारत सरकार ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। भारत सरकार ने खालिस्तान समर्थक परेड में ‘हिंसा का जश्न’ मनाने के लिए कनाडा की आलोचना की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कनाडा के टोरंटो में स्थित माल्टन काउंटी में खालिस्तान के समर्थकों ने एक नगर कीर्तन परेड निकाला था, लेकिन इस परेड में पीएम मोदी को बंधक बनाने जैसी झाँकी निकाली गई और भारत विरोधी नारेबाजी की गई थी। इस दौरान खालिस्तान के समर्थन में भी जमकर नारेबाजी हुई। इस मामले का भारत सरकार ने संज्ञान लिया है।

भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि जैसा कि आप जानते हैं, हमने कनाडा में हमारे राजनीतिक नेतृत्व के खिलाफ चरमपंथी तत्वों द्वारा इस्तेमाल की जा रही हिंसक छवि के बारे में बार-बार अपनी चिंताएँ उठाई हैं। पिछले साल हत्या का चित्रण करने वाली एक झाँकी हमारे पूर्व प्रधानमंत्री को एक जुलूस में दिखाया गया था। पूरे कनाडा में भारतीय राजनयिकों के खिलाफ हिंसा की धमकी वाले पोस्टर भी लगाए गए।

कनाडा को चेताते हुए जायसवाल ने कहा कि हम कनाडा में अपने राजनयिक प्रतिनिधियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और उम्मीद करते हैं कि कनाडा सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि वे बिना किसी डर के अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में सक्षम हों। उन्होंने आगे कहा कि हम कनाडा सरकार से फिर से अपील करते हैं कि वह कनाडा में आपराधिक और अलगाववादी तत्वों को सुरक्षित पनाहगाह और राजनीतिक स्थान देना बंद करे।

नगर कीर्तन परेड का आयोजन ओंटारियो गुरुद्वारा कमेटी द्वारा किया गया था, जहाँ झाँकियों और भाषणों ने आक्रामक रूप से भारतीय राजनीतिक हस्तियों को निशाना बनाया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सलाखों के पीछे दिखाया गया था। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों द्वारा घोषित आतंकवादी परमजीत मंड और अवतार सिंह पन्नू जैसे लोगों ने 6 किलोमीटर लंबी परेड में भड़काऊ भाषण दिए।

गौरतलब है कि पिछले साल सितंबर में खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंटों की संभावित संलिप्तता बताते हुए कनाडाई प्रधानमंत्री ट्रूडो ने आरोप लगाए थे। आरोपों के बाद से नई दिल्ली और कनाडा की राजधानी ओटावा के बीच संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं। हालाँकि, नई दिल्ली ने ट्रूडो के आरोपों को “बेतुका” बताते हुए खारिज कर दिया था। इस मामले में कुछ दिन पहले ही तीन भारतीय सिखों को कनाडा में गिरफ्तार किया गया था। भारत सरकार ने आरोप लगाया है कि कनाडा ऑर्गनाइज क्राइम में शामिल लोगों को वीजा देकर शरण देता है।

प्रोपेगेंडा ‘खतरे में मुसलमान’ का, पर भारत में हिंदुओं की हिस्सेदारी 8% घटी: इस्लामी आबादी का शेयर 5 फीसदी बढ़ा, ईसाई भी फले-फूले

भारत में खतरे में मुसलमान नैरेटिव उतना ही पुराना है, जितनी पुरानी तुष्टिकरण की राजनीति है। केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनने के बाद इस नैरेटिव को और हवा दी गई है। शायद ही कोई दिन बीतता है जब मुस्लिम पीड़ित का प्रोपेगेंडा न चलाया जाता हो। लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है। भारत की जनसंख्या में मुस्लिमों की हिस्सेदारी बढ़ी है। वहीं हिंदुओं का हिस्सा घटा है।

यह वास्तविकता एक अध्ययन से सामने आई है। इससे जुड़े आँकड़े प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की साइट पर उपलब्ध हैं। इसमें 1950 से लेकर 2015 के बीच भारत में जनसांख्यिकी में आए बदलाव के बारे में जानकारी दी गई है।

ये अध्य्यन समझाता है कि पिछले 65 साल में हिंदू किसी के लिए खतरा नहीं बने, उलटा देश की जनसंख्या बढ़ने के बावजूद उनका प्रतिशत पहले के मुकाबले कम हुआ है। इस रिपोर्ट से वो सारे दावे भी धराशायी होते है जो ये कहते रहे कि हिंदुओं के तादाद में ज्यादा होने से मुस्लिमों पर खतरा हो सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, 1950 से लेकर 2015 के बीच, भारत में बहुसंख्यक आबादी में 7.82% की उलेखनीय गिरावट आई है। पहले हिंदू 84.68 फीसदी थे और अब सिर्फ 78.06 रह गए हैं। जबकि इसी अवधि के दौरान अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी में वृद्धि दर्ज की गई है। रिपोर्ट बताती है कि 1950 में मुस्लिम आबादी का हिस्सा 9.84 प्रतिशत था और 2015 में बढ़कर 14.09 प्रतिशत हो गया।

इसी तरह ईसाई समुदाय भी 2.24% से 2.36% (5.38%) तक पहुँचा है। सिखों की जनसंख्या में हिस्सेदारी भी 1.24% से बढ़कर 1.85% (6.58) हुई है। बौद्ध समुदाय भी 0.05% से 0.81% तक पहुँचा है। वहीं पारसी और जैनों में हिंदुओं की तरह आँकड़े में गिरते देखे गए हैं। जैनों की पहले जो संख्या 0.45% थी वो अब 0.36 हो गई है और पारसियों की 0.03% से गिरकर 0.004 तक आ गई।

रिपोर्ट में प्रकाशित अंश

अब इन आँकड़ों से यह तो स्पष्ट हो गया है कि भारत में रहने वाले हिंदू किसी के लिए खतरा नहीं रहे। अगर ऐसा होता तो अल्पसंख्यकों की संख्या में ऐसी बढ़त नहीं देखने को मिलती। इसके अलावा इस बात से ये भी साबित होता है कि हिंदू हर धर्म के प्रति सहिष्णु हैं क्योंकि भारत में कभी ऐसी साजिशों का खुलासा नहीं हुआ कि वो दूसरे मजहब के लोगों को लालच देकर अपने धर्म में परिवर्तित करवा रहे हैं… उलटा इस बात के प्रमाण जरूर हैं कि दूसरे मजहब के लोग हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने के लिए बकायदा प्लान के तहत काम करते हैं औ उन्हें धर्म पथ से भ्रमित करने की कोशिश करते रहे हैं या उन्हें जबरन अपना मजहब कबूल करवाते हैं।

ऐसे प्रयासों का ही एक नतीजा रिपोर्टों के आँकड़ों में हिंदुओं की जनसंख्या में हिस्सेदारी कम होती मिलती है और दूसरे समुदाय की बढ़ी हुई। पिछले दिनों ऐसे कई मामले सामने आए जब खुलेआम इस्लामी कट्टरपंथी ने सरेआम भारत को इस्लामी मुल्क बनाने की मंशा को जगजाहिर किया, सीमाओं पर ‘मुस्लिम पट्टी’ बनाने की साजिश रची गई। भारत को शरिया के हिसाब से चलने की नसीहत दी और हिंदुओं को काफिर कहकर उनके प्रति नफरत भरी। भारत में ये स्थिति अभी के समय में भले ही चिंताजनक नहीं लग रही हो, लेकिन भविष्य में इसके नतीजे हिंदुओं के लिए बुरे हो सकते हैं।

कुछ लोग शायद सोचें समुदाय की हिस्सेदारी 7-8 फीसद कम-ज्यादा होने का बवाल नहीं मचाया जाना चाहिए। लेकिन, इस बात को गौर से समझिए कि जिस रिपोर्ट के आधार पर आपको ये पता चलता है कि भारत में बहुसंख्यक हिंदुओं की संख्या पिछले 65 सालों में कम हुई है और अल्पसंख्यक मुस्लिमों की गिनती बढ़ी है। वही रिपोर्ट के अगर कुछ और हिस्सों को पढ़ें तो देश के पड़ोसी मुल्कों में हुए जनसंख्या बदलाव की जानकारी भी आपको मिलेगी।

आपके देश में हिंदू बहुसंख्यक होने के बावजूद लगातार कम हो रहे हैं और दूसरी और अल्पसंख्यकों की संख्या बढ़ रही है। अगर ये सामान्य होता तो ऐसे आँकड़े हर देश में देखने को मिलते। मगर नहीं, आप अगर इस्लामी मुल्कों से तुलना करेंगे तो आपको पता चलेगा कि ये सामान्य बदलाव नहीं है।

बांग्लादेश की बहुसंख्यक आबादी 1950 में 76 फीसद थी, आज भी उतनी की उतनी है। लेकिन हिंदुओं के साथ ऐसा नहीं है। 1950 में उस क्षेत्र में 23% हिंदू थे और अब केवल 8% बचे हैं। इसी प्रकार से पाकिस्तान में 1950 में कुल मुस्लिमों की आबादी 84% थी और अब 93% हो गई है वो भी तब जब पाकिस्तान से 1971 में बांग्लादेश अलग हो गया है। जबकि हिंदुओं की जनसंख्या में हिस्सेदारी पाकिस्तान में 65 साल पहले 13% थी और अब सिर्फ 2% रह गई है। अफगानिस्तान में भी मुस्लिम बहुल हैं और उनमें भी 0.3 का ही लेकिन बढ़त देखने को मिली है। वो 1950 में 99.4 थे और अब 99.7 हो गए हैं।

तो ऐसा नहीं है कि जिस देश में जो समुदाय बहुसंख्यक होता है उनके आँकड़े बढ़ना-घटना सामान्य चीज है। अगर ये सामान्य होता तो भारत में भी इसकी झलक देखने को मिलती ही… या फिर उस नेपाल में जहाँ भारत की तरह हिंदुओं की आबादी घटी है। 1950 में नेपाल में हिंदुओं की संख्या 84% थी जो 2015 में 81% ही रह गई। इसके अलावा सबसे बड़ी बात जिस पर हमें विचार करने की जरूरत है वो ये है कि एक तरफ पड़ोसी मुल्कों और हमारे देश में मुस्लिमों की पॉपुलेशन लगातार बढ़ रही है और दूसरी तरफ भारत और नेपाल में हिंदुओं की तादाद तब भी घटी हुई है जब इस्लामी मुल्कों से सताए जाने के बाद वहाँ के हिंदू भी यहाँ आश्रय लेने यहाँ आ रहे हैं।

पुंछ में वायुसेना जवानों पर हमला करने वाले आतंकियों की पहचान आई सामने, पाक फौज का पूर्व कमांडो भी शामिल

4 मई, 2024 को जम्मू कश्मीर के पुंछ में वायुसेना की एक गाड़ी पर हमला करने वाले आतंकियों की पहचान हो गई है। उनकी कुछ फोटो भी सामने आई हैं। पता चला है कि हमला करने वालों में से एक आतंकी पाक फौज का पूर्व जवान है। सुरक्षाबल इनकी तलाश में लगे हुए हैं।

सामने आई जानकारी के अनुसार, पुंछ में वायुसेना के काफिले पर हमला करने वाले तीनों आतंकियों के नाम इलियास फौजी, अबू हमजा और हदून हैं। इनमें से इलियास फौजी पहले पाकिस्तान की फौज में कमांडो था और बाद में वह भारत में आतंक फैलाने आ गया। इसके अलावा अबू हमजा लश्कर-ए-तैयबा का कमांडर है।

यह तीनों आतंकी PAFF नाम के आतंकी संगठन से जुड़े हुए हैं। यह आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद और हिजबुल मुजाहिद्द्दीन पर शिकंजा कसने के बाद बनाया गया था। इन तीनों की तस्वीरें भी सामने आई हैं, जिनमें यह हथियार लिए हुए दिखते हैं। इनकी तलाश में सुरक्षाबल पुंछ और राजौरी के इलाके में बड़ा सर्च अभियान चला रहे हैं।

गौरतलब है कि 4 मई को पुंछ में वायुसेना जवानों की एक गाड़ी पर आतंकी हमला हुआ था। वायुसेना के जवान सीमाई इलाके से एक ट्रक में लौट रहे थे। हमले में आतंकियों ने ट्रक को अचानक घेर कर गोलियाँ बरसाईं थी। इस हमले में पाँच जवान घायल हुए थे। बाद में एक जवान विकी पहाड़े की मौत हो गई थी।

इस हमले के विषय में और भी जानकारी सामने आई है। स्थानीय लोगों ने बताया कि हमले के दिन फायरिंग लगभग 20 मिनट तक जारी रही। इस कारण से बच्चे डर गए। स्थानीयों ने बताया कि इस इलाके में वायुसेना के लोग अकसर आते थे और बच्चों को टॉफ़ी बाँटा करते थे। स्थानीयो ने बताया कि वह आतंकियों को देख नहीं पाए क्योंकि हमला घने जंगल के बीच हुआ।

इन आतंकियों की जानकारी सामने आने से एक दिन पहले मंगलवार (7 मई, 2024) को सुरक्षाबलों को कश्मीर में बड़ी सफलता मिली है। कश्मीर के कुलगाम में दो आतंकियों को सुरक्षाबलों ने मार गिराया। मारे जाने वाले आंतकियों में कमांडर बासित डार भी शामिल था। वह कश्मीरी पंडितों और सिख शिक्षक समेत पुलिस अफसर की हत्या के मामले फरार था।

गोवा के जिस 7 स्टार होटल में ठहरे थे CM केजरीवाल, उसका खर्चा दिल्ली शराब घोटाले में गिरफ्तार चनप्रीत ने उठाया: ED ने सुप्रीम कोर्ट में कहा- हमारे पास पर्याप्त सबूत

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की गिरफ्तारी के खिलाफ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की याचिका पर मंगलवार (7 मई 2024) को सु्प्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सीएम केजरीवाल की गिरफ्तारी का बचाव करते हुए भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने कोर्ट में कहा कि एजेंसी के पास केजरीवाल के खिलाफ सबूत हैं। इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।

न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की पीठ ने ASG राजू से पूछा कि सीएम केजरीवाल चुनाव से ठीक पहले गिरफ्तारी की कार्रवाई की आलोचना करने के हकदार हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ये भी पूछ सकते हैं कि ईडी ने गवाहों से उनके बारे में सटीक सवाल क्यों नहीं पूछे और कथित तौर पर काफी पहले उनकी संलिप्तता उजागर होने के बावजूद उनकी गिरफ्तारी में देरी क्यों नहीं हुई।

इस पर राजू ने बताया कि अगर केंद्रीय एजेंसी ने प्रारंभिक जाँच के दौरान गवाहों के सामने केजरीवाल का नाम रखा होता तो यह स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण होता। ASG राजू ने यह तर्क दिया कि अपने तरीके से जाँच करना जाँच अधिकारी का विशेषाधिकार है। इसमें समय लगता है, क्योंकि गवाह जो कहते हैं उसकी पुष्टि करनी होती है और अवैध लाभ आदि का खुलासा करना होता है।

एएसजी ने आगे कहा, “हमारे पास सबूत है कि गोवा चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल के ठहरने का पूरा खर्च इसी चनप्रीत सिंह ने चुकाया था। हमने पाया है कि गोवा चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल गोवा में ग्रैंड हयात नामक 7-सितारा भव्य होटल में रुके थे। उस समय उनके बिलों का कुछ हिस्सा दिल्ली सरकार के सामान्य प्रशासनिक विभाग द्वारा भुगतान किया गया था।”

ASG राजू ने आगे कहा, “इसका कुछ हिस्सा चनप्रीत सिंह द्वारा भुगतान किया गया था। चनप्रीत सिंह वही व्यक्ति हैं, जिसने नकदी प्राप्त की। यह उसके बैंक खातों से स्पष्ट है। उस नकदी का भुगतान आंशिक रूप से गोवा चुनाव के दौरान गोवा के एक 7-सितारा होटल में अरविंद केजरीवाल के बिलों का भुगतान करने के लिए किया गया था। हमें इसके दस्तावेजी सबूत मिले हैं।”

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, ASG राजू ने कहा कि चनप्रीत सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं है कि यह राजनीति से प्रेरित मामला है। जहाँ तक ​​ईडी का सवाल है, इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। हमारा सबूतों से मतलब है और हमारे पास प्रमाण हैं।”

इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि वह चुनाव को ध्यान में रखते हुए आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत देने पर विचार कर सकता है, लेकिन शर्त यह होगी कि वह आधिकारिक कार्य नहीं करेंगे। यह मामला गुरुवार या अगले सप्ताह सूचीबद्ध होने की संभावना है।

फर्जी आधार कार्ड बनवाकर केरल में रह रहे हैं 50000 घुसपैठिए, पश्चिम बंगाल-असम में बनवाई नकली पहचान: मिलिट्री इंटेलिजेंस के हवाले से रिपोर्ट में बताया

फर्जी आधार कार्ड के सहारे 50,000 से अधिक विदेशी घुसपैठिये केरल में रह रहे हैं। यह घुसपैठिये बांग्लादेश, म्यांमार और श्रीलंका से आए हैं। बड़ी संख्या में भारतीय अपराधी भी देश छोड़ने के लिए फर्जी आधार कार्ड का सहारा ले रहे हैं। यह खुलासा मिलिट्री इंटेलिजेंस ने किया है।

ऑनमनोरमा के अनुसार, यह फर्जी आधार कार्ड असम के नगांव और मधुपुर, पश्चिम बंगाल में दिनाजपुर और नादिया तथा केरल के पेरम्बवूर में आधार कार्ड सेंटरों पर बनाए गए हैं। इन आधार कार्ड सेंटरों में सुरक्षा में सेंधमारी की गई है। यहीं से बड़ी मात्रा में घुसपैठियों ने फर्जी आधार कार्ड जारी करवा लिए हैं और केरल में रह रहे हैं।

इससे पहले केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसियाँ भी इस बात का अंदेशा जता चुकी हैं कि घुसपैठिये फर्जी आधार कार्ड के सहारे केरल में घुस रहे हैं। यह जानकारी सामने आने के बाद सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने सीमाई इलाकों में अपनी सतर्कता बढ़ा दी है। कोस्ट गार्ड ने भी अपनी गश्त को बढ़ाया है।

रिपोर्ट में सामने आया है कि आधार कार्ड बनाने के सिस्टम को अपने हिसाब से चला कर फर्जी दस्तावेज जारी किए जा रहे हैं। केरल में मौजूद आधार कार्ड सेंटर को झारखंड और पश्चिम बंगाल में बैठे लोग चला रहे हैं। ऐसा ही एक मामला केरल के मलप्पुरम में सामने आया जहाँ एक आधार कार्ड सेंटर को पश्चिम बंगाल से चलाया जा रहा था।

रिपोर्ट में बताया गया है कि केरल में ऐसे इलाकों में नकली आधार कार्ड काफी मात्रा में बन रहे हैं जहाँ बाहर से आने वाले कामगार काम करते हैं। यहाँ गलत सूचनाओं के सहारे आधार कार्ड बन रहे हैं। इनमें फोटो बदल कर कई आधार कार्ड बनाए जाने की बात सामने आई है।

इससे पहले भी रिपोर्ट में सामने आ चुका है जिसमें अवैध रोहिंग्या घुसपैठिये बांग्लादेश सीमा से घुस कर भारत में मृतकों की पहचान का इस्तेमाल कर रहे थे। वह मृतकों के नाम से पहचान पत्र बनवा रहे थे। इस मामले में NIA ने भी जाँच की थी। तमिलनाडु में कुछ लोगों को इस मामले में गिरफ्तार किया गया था।