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दुनिया का सबसे बड़ा डेटा ऑपरेटर बना रिलायंस Jio, चीन की सरकारी कंपनी को छोड़ा पीछे: 5G उपभोक्ताओं के मामले में भी बनाया रिकॉर्ड

भारत का सबसे बड़ा डेटा ऑपरेटर रिलायंस Jio अब दुनिया में शीर्ष स्थान पर पहुँच गया है। डेटा ट्रैफिक खर्च के मामले में कंपनी के ये उपलब्धि हासिल की है। इसने ‘China Mobile’ को पीछे छोड़ दिया है। Jio के नेटवर्क पर कुल ट्रैफिक 40.9 एक्साबाइट तक पहुँच गया है, जबकि ‘China Mobile’ के मामले में ये आँकड़ा 38 एक्साबाइट है। ये आँकड़े जनवरी से लेकर मार्च 2024 तक के हैं। ग्लोबल एनालिटिक्स फर्म Tefficient ने ये आँकड़े जारी किए हैं।

इतना ही नहीं, 5G उपभोक्ताओं के मामले में भी रिलायंस Jio दुनिया में दूसरे नंबर पर स्थित है। दुनिया भर में इसका दूसरा सबसे बड़ा 5G सब्स्क्राइब्स बेस है, इसके 10.80 करोड़ उपभोक्ता हैं। Jio का 28% से भी अधिक डेटा ट्रैफिक इसके 5G उपभोक्ताओं से ही आ रहा है। एक एनालिस्ट प्रेजेंटेशन के दौरान Tefficient ने ये आँकड़े जारी किए हैं। Jio का एवरेज रेवेन्यू पर ईयर (ARPY) से पता चलता है कि JioBharat फोन का इस्तेमाल करने वालों की भी संख्या बढ़ी है।

साथ ही इसने प्रमोशनल प्लान्स के तहत अनलिमिटेड 5G डेटा भी अपने उपभोक्ताओं को ऑफर किया है। नए यूजरों को जोड़ने में Jio की गति तेज़ है। अगले कुछ वर्षों में इसका मार्केट शेयर के साथ-साथ राजस्व भी बढ़ने की भविष्यवाणी की गई है। उम्मीद जताई जा रही है कि जून में लोकसभा चुनाव 2024 खत्म होने के तुरंत बाद Jio का डेटा ट्रैफिक 20-25% बढ़ने की उम्मीद जताई गई है। 5900 शहरों में जियो का वायरलेस ब्रॉडबैंड सर्विस AirFibre पहुँच गया है।

AirFibre में प्रतिदिन का औसत डेटा खर्च 13 गीगाबाइट है। ये JioFibre से 30% अधिक है। एक तरह से Jio का 30% डेटा ट्रैफिक का लोग मुफ्त में फायदा उठा रहे हैं, ऑफर के तहत। Jio के उपभोक्ता 28.70 GB हर महीने उपयोग में ला रहे हैं। वहीं भारती Airtel के मामले में ये आँकड़ा 22.5 GB है। सर्वे करने वाली संस्था का मानना है कि टेलीकॉम कंपनियाँ फ़िलहाल डेटा के बदले ज्यादा कमाई नहीं कर रही हैं, ऐसे में वित्तीय वर्ष 2025 में इसमें बढ़ोतरी होने की संभावना है।

‘नहीं बदल सकते आपकी सोच’: EVM-VVPAT मामले में प्रशांत भूषण से बोला सुप्रीम कोर्ट, सुरक्षित रखा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और वोटिंग पर्ची दिखाने वाली मशीन (VVPAT) के 100% मिलान को लेकर दायर की गई याचिकाओं पर अपना निर्णय बुधवार (24 अप्रैल, 2024) को सुरक्षित रख लिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान चुनाव आयोग से कुछ तकनीकी जानकारी माँगी। उसने कहा कि केवल किसी के शक के आधार पर हम EVM के विरुद्ध निर्देश जारी नहीं कर सकते।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की सदस्यता वाली बेंच ने EVM-VVPAT मामले की सुनवाई की। उसने चुनाव आयोग से पूछा कि क्या EVM और VVPAT में लगी माइक्रोकंट्रोलर यूनिट अलग-अलग हैं और केवल एक बार ही उनमें प्रोग्रामिंग की जा सकती है।

इस चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि वोटिंग मशीन, VVPAT और, स्टोरेज यूनिट तीनों में ही अलग माइक्रोकंट्रोलर लगे हैं जिनको केवल एक ही बार प्रोग्राम किया जा सकता है। उनसे कोई छेड़छाड़ नहीं हो सकती। इस दौरान एक याचिकाकर्ता के लिए पेश हो रहे वकील प्रशांत भूषण जोर डालते रहे कि इसके माइक्रोकंट्रोलर को दोबारा प्रोग्राम किया जा सकता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि VVPAT में डाला गया प्रोग्राम ही गड़बड़ हो सकता है।

इसको लेकर कोर्ट ने उन्हें झिड़क दिया। कोर्ट ने कहा कि आप अगर पहले ही किसी चीज को बुरा मान चुके हैं तो हम आपकी सोच नहीं बदल सकते। कोर्ट ने भूषण से कहा कि वह चुनावों को नियंत्रित नहीं कर सकता और ना ही एक अन्य संवैधानिक संस्था (चुनाव आयोग) को नियंत्रित कर सकता है।

कोर्ट में एक वकील ने दावा किया कि देश में ऐसे सॉफ्टवेयर मौजूद हैं जिसने चुनाव गड़बड़ किए जा सकते हैं। हालाँकि, कोर्ट ने इसको खारिज करते हुए कहा हम इस शंका के आधार पर तो कोई आदेश जारी नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि इस प्रक्रिया में कोई सुधार की कोई बात है तो हम जरूर वह करेंगे। कोर्ट ने उदाहरण दिया कि वह पहले VVPAT को अनिवार्य बना कर और पर्चियों को गिनती को 1% से बढ़ा कर 5% कर यह कर चुके हैं।

कोर्ट ने कहा EVM-VVPAT के मामले में कहा कि जिन लोगों ने याचिकाएँ लगाई हैं वह खुद गडबडियों को लेकर एकदम पुष्ट नहीं हैं बल्कि उन्हें शंका है। कोर्ट ने कहा कि जब उसने इस मामले में समाधान पूछा तो एक व्यक्ति ने कहा कि वापस बैलट पेपर लगा दो। कोर्ट ने यह सारी दलीलें सुनने के बाद मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया।

गौरलतब है कि सुप्रीम कोर्ट में EVM और VVPAT के मिलान को लेकर याचिकाएँ डाली गई हैं। इन याचिकाओं में माँग की गई है कि EVM में डाले गए वोट का VVPAT से निकलने वाली पर्चियों से 100% मिलान किया जाए। चुनाव आयोग ने कहा है कि इससे चुनाव प्रक्रिया धीमी हो जाएगी और नतीजे घोषित करने में 7 दिन से अधिक लगेंगे।

आपकी निजी संपत्ति पर ‘किसी समुदाय या संगठन का हक है या नहीं’, सुप्रीम कोर्ट कर रहा विचार: CJI की अध्यक्षता में 9 जजों की संविधान पीठ कर रही सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में निजी संपत्ति को ‘समुदाय का भौतिक संसाधन’ मानने को लेकर 32 साल पुरानी एक याचिका पर सुनवाई की है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ ने इस पर सुनवाई शुरू की है। इससे पहले इस मामले पर तीन सदस्यों वाली पीठ और फिर बाद में 7 सदस्यों वाली पीठ सुनवाई कर चुकी है।

इस मामले पर सुनवाई करते हुए CJI चंद्रचूड़ ने मंगलवार (23 अप्रैल 2024) को कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने पुरानी और जर्जर हो चुकीं असुरक्षित इमारतों को अधिगृहीत करने के लिए एक कानून बनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कानून इसलिए बनाया गया, क्योंकि किरायेदार इन इमारतों से हट नहीं रहे और मकान मालिकों के पास मरम्मत के लिए पैसे नहीं हैं।

CJI चंद्रचूड़ ने कहा, “तकनीकी रूप से ये स्वतंत्र स्वामित्व वाली संस्थाएँ हैं, लेकिन कानून (म्हाडा अधिनियम) का कारण क्या था… हम कानून के सिद्धांतों पर टिप्पणी नहीं कर रहे हैं और इसका परीक्षण नहीं किया गया है’। पीठ इस बात पर विचार कर रही है कि निजी संपत्तियों को संविधान के अनुच्छेद 39 (B) के तहत ‘समुदाय का भौतिक संसाधन’ माना जा सकता है या नहीं। 

CJI ने समुदाय में स्वामित्व और एक व्यक्ति के अंतर का उल्लेख किया। उन्होंने निजी खदानों का उदाहरण दिया और कहा, “वे निजी खदानें हो सकती हैं, लेकिन व्यापक अर्थ में ये समुदाय के भौतिक संसाधन हैं।” बेहद सघन रूप से बसे मुंबई की इन इमारतें जर्जर हो गई हैं और इन असुरक्षित इमारतों में किरायेदार रह रहे हैं। इन कारण मानवीय क्षति पहुँचने का खतरा हमेशा बरकरार रहता है।

निजी संपत्ति को लेकर क्या रहे हैं पहले के निर्णय?

सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालत के समक्ष एकमात्र सवाल अनुच्छेद 39 (बी) की व्याख्या का था, न कि अनुच्छेद 31सी का, जिसकी वैधता 1971 में 25वें संवैधानिक संशोधन से पहले अस्तित्व में थी। इसे केशवानंद भारती मामले में 13 न्यायाधीशों की पीठ ने बरकरार रखा है।

इस पर CJI चंद्रचूड़ ने साल 1997 में मफतलाल इंडस्ट्रीज का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राय दी है कि अनुच्छेद 39 (बी) की 9 जजों की पीठ द्वारा व्याख्या की आवश्यकता है। मफतलाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस दृष्टिकोण को स्वीकारना मुश्किल है कि अनुच्छेद 39 (बी) के तहत समुदाय के भौतिक संसाधन में निजी स्वामित्व वाली चीज़ें आती हैं।

दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 39 (B) में प्रावधान है कि राज्य अपनी नीति को यह सुनिश्चित करने की दिशा में निर्देशित करेगा कि ‘समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार वितरित किया जाए जो आम लोगों की भलाई के लिए सर्वोत्तम हो’।

बता दें कि साल 1977 में रंगनाथ रेड्डी मामले में कोर्ट की बहुमत ने स्पष्ट किया है कि समुदाय के भौतिक संसाधनों में निजी संपत्ति शामिल नहीं है। वहीं, जस्टिस अय्यर का अलग रूख था। इसी तरह 1983 में संजीव कोक मामले में 5 न्यायाधीशों की खंडपीठ ने जस्टिस अय्यर पर भरोसा किया और इस बात को नज़रअंदाज करते हुए कहा कि यह अल्पसंख्यक दृष्टिकोण था। 

इसके आधार पर ही 22 साल पहले 2002 में सात जजों के संविधान पीठ ने इसे 9 जजों के पीठ को भेजा था। दरअसल, इसकी व्याख्या जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर के अल्पमत दृष्टिकोण से उपजी है। उन्होंने कहा था कि सामुदायिक संसाधनों में निजी संपत्तियाँ शामिल हैं। 

क्या है महाराष्ट्र सरकार का कानून?

दरअसल, इमारतों की मरम्मत के लिए महाराष्ट्र आवास एवं क्षेत्र विकास प्राधिकरण (MHADA) कानून 1976 के तहत इन मकानों में रहने वाले लोगों पर उपकर लगाता है। इसका भुगतान मुंबई भवन मरम्मत एवं पुनर्निर्माण बोर्ड (एमबीआरआरबी) को किया जाता है, जो इन इमारतों की मरम्मत का काम करता है।

अनुच्छेद 39 (बी) के तहत दायित्व को लागू करते हुए म्हाडा अधिनियम को साल 1986 में संशोधित किया गया था। इसमें धारा 1A को जोड़ा गया था, जिसके तहत भूमि और भवनों को प्राप्त करने की योजनाओं को क्रियान्वित करना शामिल था, ताकि उन्हें जरूरतमंद लोगों को हस्तांतरित किया जा सके।

संशोधित म्हाडा कानून (Maharashtra Housing and Area Development Authority Act) में अध्याय VIII-A है में प्रावधान है कि राज्य सरकार अधिगृहीत इमारतों और जिस भूमि पर वे बनी हैं, उसका अधिग्रहण कर सकती है, यदि 70 प्रतिशत रहने वाले ऐसा अनुरोध करते हैं।

साल 2019 में महाराष्ट्र की राज्य विधानसभा ने इस कानून में फिर से संशोधन किया। इसके तहत भूस्वामियों के लिए संपत्ति बहाल करने के लिए समय सीमा निर्धारित की गई थी, अन्यथा उसे राज्य सरकार संपत्ति को अपने कब्जे में ले लेगी। इसको लेकर भूस्वामियों का कहना है कि राज्य सरकार उनकी जमीनों पर कब्जा करके उसे बिल्डरों को दे देगी।

बता दें कि इस समय मुंबई में लगभग 13,000 अधिगृहीत इमारतें हैं, जिनके जीर्णोद्धार या पुनर्निर्माण की आवश्यकता है। हालाँकि, किरायेदारों के बीच या डेवलपर की नियुक्ति पर मालिकों और किरायेदारों के बीच मतभेदों के कारण उनके पुनर्विकास में अक्सर देरी होती रहती है।

क्या है याचिका में?

दरअसल, महाराष्ट्र सरकार के कानून के खिलाफ जमीन के मालिकों ने कई याचिकाएँ दायर की हैं। प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन ने अध्याय VIII-A को चुनौती देते हुए दावा किया है कि प्रावधान मालिकों के खिलाफ भेदभाव करते हैं और अनुच्छेद 14 के तहत समानता के उनके अधिकार का उल्लंघन करते हैं। यह मुख्य याचिका साल 1992 में दायर की गई थी। इसके अलावा, 15 याचिकाएँ भी दी गई हैं।

इस मामले को तीन बार पाँच सदस्यीय पीठ और एक बार सात न्यायाधीशों वाली बड़ी पीठों के पास भेजा जा चुका है। आखिरकार 20 फरवरी 2002 को इसे 9 न्यायाधीशों की पीठ को भेज दिया गया। इसी मामले पर CJI चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में जस्टिस हृषिकेश रॉय, बीवी नागरत्ना, सुधांशु धूलिया, जेबी पारदीवाला, मनोज मिश्रा, राजेश बिंदल, सतीश चंद्र शर्मा और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल हैं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया है कि सामुदायिक संसाधनों में कभी भी निजी स्वामित्व वाली संपत्तियाँ शामिल नहीं हो सकती हैं। उन्होंने जस्टिस अय्यर के दृष्टिकोण को मार्क्सवादी समाजवादी नीति का प्रतिबिंब बताया। उनका कहना है कि इस नीति का नागरिकों के मौलिक अधिकारों को प्रधानता देने वाले संविधान द्वारा शासित लोकतांत्रिक देश में कोई स्थान नहीं है।

सालों से कॉन्ग्रेस करती आई है देश के लोगों की संपत्ति छीनने की कोशिश, मनमोहन सिंह की सरकार के समय भी रचा गया था षड्यंत्र: सैम पित्रोदा का आइडिया नया नहीं

कॉन्ग्रेस नेता सैम पित्रोदा के ‘विरासत कर (Inheritance Tax)’ वाले बयान पर काफी बवाल हो गया है। आम जनता से लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके लिए उनपर निशाना साधना शुरू कर दिया है। पार्टी की मंशा पर इतने सवाल उठ गए हैं कि कॉन्ग्रेसियों ने सामने आकर सैम पित्रोदा के बयान के खिलाफ ही सफाई देनी शुरू कर दी है। ऐसे दिखाया जा रहा है जैसे विरासत के बँटवारे की बात उनकी पार्टी ने नहीं उठाई, जबकि हकीकत यह है कि जो आज सुर सैम पित्रोदा के मुँह से निकले, वो कॉन्ग्रेस पार्टी 10-12 साल से गुनगुना रही है, बस किसी का ध्यान इस पर पहले नहीं गया था।

इंटरनेट पर यदि सर्च करके देखें तो पता चलेगा कि एक व्यक्ति विशेष की संपत्ति का कुछ हिस्सा उसके मरने के बाद सरकार को देने पर चर्चा कॉन्ग्रेस 2011 से करने को आतुर है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब, यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम इस पर चर्चा चाहते थे अब सैम पित्रोदा हैं जिन्हें कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता अपना गुरु मानते हैं।

संबंधित रिपोर्ट्स

मीडिया रिपोर्ट्स देखें तो साल 2011 से 2014 के बीच में कई बार ये मुद्दा उठाया गया था। कभी देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के नाम पर तो कभी देश के गरीबों की चिंता करने के नाम पर। आज भी ये मुद्दा इसी आड़ में उठाया गया है। लेकिन इसके तहत होना क्या है वो जान लीजिए।

अभी के समय में अगर एक व्यक्ति अपने जीवन भर में 10 लाख पूँजी इकट्ठा करता है तो उस पूँजी पर उसके उत्तराधिकारी का अधिकार होता है लेकिन अगर ये कर लागू होता है तो व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी पूँजी उत्तराधिकारी को आधी ही मिलेगी और आधी सरकार को चली जाएगी।

साल 1953 से साल 1985 तक ऐसा कानून भारत में लागू भी था जिसे एस्टेट ड्यूटी कहा जाता था। इसका उद्देश्य आर्थिक असमानता को दूर करना था। हालाँकि, जब इससे ऐसा नहीं हुआ और जटिलताएँ बढ़ती गईं, उसके बाद इस कानून को समाप्त कर दिया गया। खुद तत्कालीन वित्त मंत्री वीपी सिंह ने इस पर राय दी थी कि यह समाज में संतुलन लाने और धन के अंतर को कम करने में विफल रहा। अब उसी कानून की चर्चा दोबारा कॉन्ग्रेस पार्टी कर रही है।

बता दें कि विरासत कर का कॉन्सेप्ट कई देशों में चल रहा है। लेकिन कितना कारगर है ये नहीं कहा जा सकता। जापान में सरकार को 55% टैक्स जाता है, साउथ कोरिया में 50%, जर्मनी में 50 %, फ्रांस में 45%, इंगलैंड में 40%, यूएस में 40%, स्पेन में 34 %, आयरलैंड में ये टैक्स 33% है।

टिकट देकर वापस माँग रही कॉन्ग्रेस, उम्मीदवार दिखा रहे ठेंगा: अब अपने ही प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव प्रचार कर रही पार्टी

लोकसभा चुनाव 2024 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाले एनडीए के सामने अपने अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली इंडी गठबंधन तमाम अंतर्विरोधों से जूझ रही है। केरल में कॉन्ग्रेस और वामदलों की आपसी लड़ाई चल रही है, तो पंजाब में आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस की। गुजरात में उसके कैंडिडेट का नामांकन खारिज हो गया, तो मध्य प्रदेश की खजुराहो सीट पर उसकी सहयोगी सपा के कैंडिडेट का।

बात राजस्थान में पहुँची, तो यहाँ तीन पार्टियों के साथ गठबंधन करने के बाद भी उसके सामने नई मुसीबत खड़ी हो गई है। एक तो कॉन्ग्रेस पार्टी को हर सीट पर दमदार कैंडिडेट नहीं मिल रहे और कहीं कैंडिडेट आखिरी समय में मिल गए, और उन्होंने नामांकन दाखिल कर भी दिया, तो अब कॉन्ग्रेस की कार्यकर्ताओं की ड्यूटी लगानी पड़ रही है अपने ही कैंडिडेट को हराने के लिए।

जी हाँ, राजस्थान की बाँसवाड़ा-डूंगरपुर लोकसभा सीट पर कॉन्ग्रेस की यही हालत है। इस लोकसभा सीट पर कॉग्रेस पार्टी और भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) के बीच चुनावी गठबंधन को लेकर बातचीत 2023 के विधानसभा चुनाव के पहले से चल रही थी। लेकिन गठबंधन फाइनल नहीं हो पाया। आखिर में भारत आदिवासी पार्टी ने अपने विधायक राज कुमार रोत को उम्मीदवार घोषित कर दिया। राज कुमार रोत ने नामांकन दाखिल कर दिया और तभी कॉन्ग्रेस ने अरविंद डमोर को टिकट दे दिया। उन्होंने भी नामांकन दाखिल कर दिया। फिर दोनों दलों में समझौता हो गया। नामांकन वापसी के दिन जब समझौता हुआ, तो कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने उम्मीदवार अरविंद डमोर को नामांकन वापस लेने के लिए ढूँढना शुरू कर दिया।

समय बीत गया, अरविंद डमोर ने नामांकन वापस नहीं लिया। यहाँ से बीजेपी के टिकट पर महेंद्रजीत सिंह मालवीय मैदान में हैं। वो अबतक कॉन्ग्रेस में थे। चार बार के विधायक रहे थे और अभी विधायकी और कॉन्ग्रेस पार्टी छोड़कर बीजेपी में आए हैं। बड़े नेता माने जाते हैं। उन्हें हराने के लिए कॉन्ग्रेस और बीएपी ने हाथ तो मिला लिया, लेकिन अब रास्ते में आ गए खुद कॉन्ग्रेस के ही उम्मीदवार अरविंद डमोर

अरविंद डमोर ने कह दिया है कि वो नाम वापस नहीं लेंगे। चूँकि बीएपी पार्टी के साथ कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ लोग कोई गठबंधन नहीं चाहते, ऐसे में वो राहुल गाँधी की इज्जत बचाने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन दोराहे पर खड़े हो गए हैं कॉन्ग्रेस के नेता। पार्टी के नेताओं को प्रचार करना पड़ रहा है कि वो अरविंद डमोर को वोट न दें, भले ही वो कॉन्ग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी हैं। क्योंकि अब कॉन्ग्रेस और बीएपी के बीच समझौता हो गया है, ऐसे में कॉन्ग्रेस के लोग बीएपी को वोट करें। हालाँकि अरविंद डमोर कह रहे हैं कि वो पूरी ताकत से चुनाव लड़ रहे हैं। अरविंद का कहना है कि बीएपी से गठबंधन के विरोधी कॉन्ग्रेसी खेमे का उन्हें पूरा समर्थन हासिल है। वो चुनाव में जीत दर्ज करेंगे।

अब चुनाव परिणाम कुछ भी हों, लेकिन ये साफ है कि बाँसवाड़ा-डूँगरपुर लोकसभा सीट पर कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता अपनी ही पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव प्रचार कर रहे हैं। बीएपी ने भी पूरा जोर लगाया हुआ है और ये कोशिश कर रही है कि कॉन्ग्रेस के वोट उसे मिले। वहीं, बीजेपी के प्रत्याशी महेंद्रजीत मालवीय कॉन्ग्रेस के पुराने नेता रहे हैं। ऐसे में अपने प्रभाव वाले कॉन्ग्रेसी वोटों को तो वो अपने पास खींच ही रहे हैं, साथ ही उनके विरोध के वोट भी बीएपी और कॉन्ग्रेस में बंट रहे हैं। इस सीट पर 26 अप्रैल को मतदान किया जाएगा। ऐसे में चुनावी जीत किसे मिलती दिख रही है, ये अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। हालाँकि आखिरी नतीजों के बारे में पता तो 4 जून को ही लग पाएगा।

लोकसभा ही नहीं, विधानसभा उप-चुनाव में भी यही हाल

बाँसवाड़ा-डूँगरपुर लोकसभा सीट से बीजेपी के उम्मीदवार महेंद्रजीत सिंह मालवीय चुनाव लड़ रहे हैं। वो अभी तक बागीदौरा विधानसभा से विधायक थे। उन्होंने विधानसभा से भी इस्तीफा दे दिया। ऐसे में यहाँ उपचुनाव हो रहे हैं। कॉन्ग्रेस में कन्फ्यूजन सिर्फ लोकसभा सीट को लेकर ही नहीं है, बल्कि बागीदौरा विधानसभा सीट पर उप-चुनाव को लेकर भी है। यहाँ से कॉन्ग्रेस ने पहले टिकट दिया कमल कांत कटारा को, लेकिन किसी कारणों से वो नामांकन ही दाखिल नहीं कर पाए। उनकी जगह पर कॉन्ग्रेस के सिंबल पर कपूर सिंह ने पर्चा दाखिल कर दिया।

लेकिन लोकसभा सीट जैसा मामला यहाँ भी फंस गया, क्योंकि इस उप-चुनाव को लेकर भी कॉन्ग्रेस और बीएपी में सहमति बन गई। अब यहाँ से कॉन्ग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए सुभाष तंबोलिया बीजेपी के उम्मीदवार हैं। उनके मुकाबले बीएपी ने विधानसभा चुनाव में हारे जयकृष्ण पटेल को फिर से मैदान में उतारा है। वहीं, कॉन्ग्रेस के सिंबल पर कपूर सिंह दावेदारी पेश कर रहे हैं। उन्हें भी कॉन्ग्रेस ने नाम वापस लेने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने भी नामांकन वापस नहीं लिया और अब पूरी ताकत से चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में अब कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता उप-चुनाव में भी यही दुहाई दे रहे हैं कि कॉन्ग्रेस के समर्थक वोटर कॉन्ग्रेस को वोट न देकर बीएपी को अपना वोट दें। खैर, यहाँ भी 26 अप्रैल को मतदान होगा और नतीजे 4 जून को सामने आएँगे।

‘संपत्ति सर्वे’ पर पलटे राहुल गाँधी: कहा- सिर्फ जानना चाहता हूँ कि कितना अन्याय हुआ है, पहले कहा था – लोगों की संपत्ति छीन कर दोबारा बाँटेंगे

देशवासियों की सम्पत्ति का सर्वे करने वाले बयान से राहुल गाँधी ने पलटी मार ली है। उनका कहना है कि इस मामले में एक्शन लेने की बात उन्होंने नहीं की है। इससे पहले राहुल गाँधी ने कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने पर देश के लोगों की सम्पत्ति का सर्वे करवाने की बात कही थी, इसके साथ ही इस सम्पत्ति को दोबारा बाँटने की भी बात कही गई थी।

राहुल गाँधी ने दिल्ली स्थित जवाहर भवन ने यह बाते कहीं। यहाँ सामाजिक न्याय सम्मेलन में हिस्सा ले रहे थे। इसे कॉन्ग्रेस ने आयोजित किया था। इस आयोजन में उन्होंने अपने सर्वे और एक्स रे वाली बात का बचाव किया है। राहुल गाँधी ने कहा, “मैंने अभी तक यह नहीं कहा है कि हम कार्रवाई करेंगे। मैं तो बस इतना कह रहा हूँ कि हम पता लगाएँगे कि कितना अन्याय हुआ है।”

राहुल गाँधी का कहना है कि उन्होंने जबसे सामाजिक न्याय की बात की है, तब से प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा ने उन पर हमले करना चालू कर दिया है। राहुल गाँधी ने कहा कि देश के लोगों की सम्पत्ति का एक्सरे करने से समस्या पता चलेगी। गौरतलब है कि राहुल गाँधी ने इससे पहले देश के लोगों की सम्पत्ति का सर्वे करवाया जाएगा। यह सर्वे सम्पत्ति के दोबारा से बँटवारे को लेकर किया जाएगा। इससे सम्पत्ति बाँटने में सहायता मिलेगी।

राहुल गाँधी ने इस सामाजिक न्याय सम्मेलन में जातिगत जनगणना को लेकर भी बात की। उन्होंने कहा, “ये मेरे लिए राजनीति नहीं है। ये मेरे लिए लाइफ मिशन है। इसे मैं छोड़ने वाला नहीं हूँ। मैं गारंटी से कह रहा हूँ… आप लिख लो…. आप लिख लो… जाति जनगणना को कोई शक्ति नहीं रोक सकती है। जितनी तेजी से इसे रोका गया, उतनी फोर्स से ये वापस आई। हिंदुस्तान के 90 परसेंट लोगों को ये बात समझ में आ गई है।”

राहुल गाँधी के सम्पत्ति के सर्वे और दोबारा बाँटने की बातों के बीच कॉन्ग्रेस नेता सैम पित्रोदा ने विरासत टैक्स की बात भी की है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए बताया कि अमेरिका में किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसकी 55% सम्पत्ति सरकार ले लेती है और पित्रोदा को यह सही लगता है। भारत में ऐसा कानून नहीं है। उनके इस बयान से कॉन्ग्रेस ने दूरी बना ली थी। कॉन्ग्रेस ने इसे उनकी निजी राय बताया है। पीएम मोदी ने इसको लेकर बताया है कि कॉन्ग्रेस जिन्दगी के साथ और जिन्दगी के बाद लूट की नीति रखती है।

‘हमने इजाजत दी नहीं, फिर आप बाहर कैसे निकल गए?’: 7 मई तक बढ़ाई गई मनीष सिसोदिया की हिरासत अवधि, जज ने वकील को लगाई फटकार

दिल्ली के पूर्व उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की हिरासत अवधि 7 मई, 2024 तक बढ़ा दी गई है। उनकी माँग है कि फ़िलहाल उन पर आरोप तय नहीं किए जाएँ। इस याचिका पर राउज एवेन्यू कोर्ट ने जाँच अधिकारियों से जवाब माँगा है। वहीं दलील पूरी होते ही मनीष सिसोदिया के वकील कोर्ट से बाहर चले गए, जिस पर जज ने जताई और कहा कि ऐसा उन्होंने पहली बार देखा है। इस पर वकील ने माफ़ी माँगते हुए कहा कि हमें वॉकआउट नहीं करना चाहिए था।

याचिकाकर्ता की तरफ से दलील दी गई कि जाँच अभी तक चल ही रही है। हालाँकि, CBI ने इसका विरोध किया। याचिका में कहा गया कि खुद IO ने 4 महीने के भीतर जाँच पूरी करने की बात कही थी, लेकिन अब तक जाँच चल ही रही है। कहा गया कि कोर्ट के आदेश के बाद गिरफ़्तारी हुई और बयान दर्ज किया गया, ऐसे में अभी चार्ज फ्रेम करने पर सुनवाई शुरू नहीं होनी चाहिए। वहीं CBI ने कहा कि अब तक जितनी चार्जशीट दाखिल हुई है उस पर हम बहस करेंगे।

हालाँकि, कोर्ट ने कहा कि अभी तक याचिका की प्रति उस तक नहीं पहुँची है। मनीष सिसोदिया को तिहाड़ जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए ही बुधवार (24 अप्रैल, 2024) को पेश किया गया। कोर्ट ने इस दौरान मनीष सिसोदिया के वकील से इस बात को लेकर नाराज़गी जताई कि वो बिना अनुमति लिए बाहर निकल गए थे। कोर्ट ने कहा कि हमने तो बाहर जाने के लिए कहा ही नहीं था। उधर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और BRS नेता K कविता की हिरासत अवधि भी 7 मई तक बढ़ाई जा चुकी है।

बता दें कि 24 अप्रैल, 2024 को ही मनीष सिसोदिया की हिरासत अवधि खत्म हो रही थी। वो शराब घोटाले में जेल में बंद हैं। कोर्ट ने CBI को निर्देश दिया है कि इस मामले में एक तालिका बना कर बयान और सबूत दिखाए जाएँ। 26 फरवरी, 2023 को ही मनीष सिसोदिया को गिरफ्तार किया गया था, ऐसे में वो 1 साल 2 महीने से जेल में बंद हैं। वहीं अरविंद केजरीवाल भी इसी के तहत मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जेल में बंद हैं। शराब घोटाले में किकबैक लेकर प्राइवेट प्लेयर्स को फायदा पहुँचाने का आरोप है।

कर्नाटक में OBC के भीतर नौकरी-एडमिशन-चुनाव में सभी मुस्लिमों को आरक्षण, कॉन्ग्रेस सरकार ने दी थी सुविधा: बोला पिछड़ा आयोग – ये सामाजिक न्याय के खिलाफ

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस पार्टी SC, ST और OBC समाज का आरक्षण छीन कर मुस्लिमों को देना चाहती है। कर्नाटक के आँकड़े इसकी पुष्टि भी करते हैं। वहाँ सभी शैक्षिणक संस्थानों एवं सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों की सभी जातियों को OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) के अंतर्गत आरक्षण की सुविधा दी गई है। ‘राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ (NCBC) की प्रेस विज्ञप्ति से भी इस पर मुहर लगती है। यानी, पीएम मोदी के आरोपों में दम है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जो हक़ बाबासाहेब ने दलितों, पिछड़ों एवं जनजातीय समाज को दिया, कॉन्ग्रेस और I.N.D.I. गठबंधन वाले उसे मजहब के आधार पर मुस्लिमों को देना चाहते हैं। एक चुनावी जनसभा के दौरान उन्होंने कॉन्ग्रेस को वो चुनौती देना चाहते हैं कि वो वादा करे कि संविधान में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और OBC को जो आरक्षण मिला है, उसे वो कम कर के मुस्लिमों में नहीं बाँटेगी। इस बयान के बाद कॉन्ग्रेसियों ने पीएम मोदी की आलोचना शुरू कर दी थी।

कर्नाटक में 2011 की जनगणना के हिसाब से मुस्लिम कुल जनसंख्या का 12% हैं। आरक्षण के नियमों की कैटेगरी 2B में मुस्लिमों की सभी जातियों को शामिल किया गया है। वहीं कैटेगरी 2A में भी मुस्लिमों की 19 जातियाँ हैं। वहीं कैटेगरी 1 में 17 जातियाँ इस्लामी हैं। NCBC के दौरे में भी इसकी पुष्टि हुई थी। यहाँ तक कि स्थानीय निकाय के चुनावों में भी जो सीटें OBC समाज के लिए आरक्षित हैं वहाँ मुस्लिमों को चुनाव लड़ने की इजाजत है।

NCBC ने बताया था कि मुस्लिम भी सामुदायिक विभाजन से अछूते नहीं हैं और वहाँ भी विभाजन है। शेख, सैयद और पठान की अर्थित स्थिति अच्छी है, वहीं समाजिक भेदभाव के खिलाफ पिछड़े मुस्लिम अगड़ों का विरोध भी करते हैं। कॉन्ग्रेस सरकार ने 30 मार्च, 2002 को अध्यादेश जारी कर ये फैसला लिया गया था। शिक्षा एवं रोजगार में मुस्लिमों को आरक्षण दिया गया। सरपंच से लेकर नगपालिका और जिला परिषद अध्यक्ष तक के पदों पर OBC के 32% रिजर्वेशन के अंतर्गत मुस्लिम भी आते हैं।

NCBC ने कर्नाटक की इस नीति को सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध बताया है। पिछले साल NCBC ने ग्राउंड पर जाकर आरक्षण की स्थति का पता लगाया था। आयोग का कहना है कि ऐसे में मुस्लिमों में जो जातियाँ शिक्षिक-सामाजिक रूप से पिछड़ी हैं उनकी भी हकमारी हो रही है। सभी मुस्लिमों को पिछड़े समाज में डालना इस समाज की विविधता और जटिलता को नज़रअंदाज़ करने के जैसा है। इस तरह पीएम मोदी का ये आरोप ठीक है और ये आशंका है कि कॉन्ग्रेस सत्ता में आने पर पूरे देश में ये फॉर्मूला बड़े स्तर पर लागू कर सकती है।

पिछड़े और कमजोर वर्ग की मुस्लिम जातियों कुंजरे (रायन), जुलाहे (अंसारी), दुनिया (मंसूरी), कसाई (कुरैशी), फकीर (अल्वी), हज्जाम (सलमानी), मेहतर (हलालखोर), धोबी (हवारी), लोहार-बढ़ई (सैफी), मनिहार (सिद्दीकी), दर्जी (इदरीसी) शामिल हैं जो दलित में आते हैं और खुद को पसमांदा कहते हैं। अनुच्छेद 15(4) एवं 16(4) के तहत मुस्लिमों की अगड़ी जातियों शेख, सैयद और पठान को भी नौकरी-एडमिशन में आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है।

फर्जी मेजर बनकर मोहम्मद फारूक दिखा रहा था पुलिस को भौकाल, तलाशी हुई तो निकला शराब तस्कर: महाराष्ट्र में गिरफ्तार, लाखों की दारू बरामद

फर्जी मेजर बनकर शराब तस्करी करने वाले राहिल शेख उर्फ मोहम्मद फारूक शेख को महाराष्ट्र के नंदुरबार में गिरफ्तार किया गया है। मोहम्मद फारूक गुजरात के वडोदरा का रहने वाला है और महाराष्ट्र के नंदुरबार में आता जाता था। उसका काम ही मेजर की यूनिफॉर्म पहनकर शराब तस्करी करने का था। काफी दिन उसने मेजर की वर्दी पहन पहनकर अपना फर्जीवाड़ा चलाया लेकिन हाल में उसका भंडाफोड़ तब हुआ जब वो पुलिस के आगे अपनी शेखी बघारने लगा।

दरअसल, हुआ यूँ कि महाराष्ट्र के नंदुरबार में वाहन चेकिंग के दौरान ट्रैफिक जाम हो गया था। इस बीच मोहम्मद फारूक सेना के प्रमुख रैंक वाले अधिकारी की वर्दी पहनकर कार से उतरा और पुलिस पर चिल्लाने लगा। इसी बीच कांस्टेबल उसके पास आया और मेजर समझकर उसे सलाम किया। इसके बाद जब महाराष्ट्र पुलिस ने अपनी तसल्ली के लिए उससे पूछताछ करनी शुरू की तो उसकी सारी शेखी निकल गई।

नंदुरबार पुलिस ने फर्जी मेजर बने राहिल की जाँच की तो उसकी कार में डेढ़ लाख की विदेशी शराब की बोतलें मिलीं। जब पुलिस ने इनके बारे में पूछा तो भी वह खुद को आर्मी ऑफिसर बताता रहा। पुलिस को संदेह हुआ तो उसकी आईडी की जाँच की गई और फिर पता चला कि उसका आईडी भी नकली ही था।

ऑपइंडिया को जब इस घटना की सूचना मिली तो हमने नंदुरबार पुलिस थाने में संपर्क किया। पुलिस ने हमें पुष्टि करते हुए बताया कि आरोपित मोहम्मद फारूक शेख को गिरफ्तार किया गया है। वो रहने वाला महाराष्ट्र के जलगाँव का है लेकिन वर्तमान में वडोदरा के गोरवा में रह रहा था। वह सेना की वर्दी पहनकर महाराष्ट्र से शराब की गाड़ी भरकर गुजरात ले जाता था ताकि सीमा पार करने में समस्या न हो। इस बार वह पकड़ लिया गया।

ऑपइंडिया ने जब गोरवा थाने में संपर्क किया तो इस मामले में पुलिस अधिकारी सिद्धराज सिंह ने बताया कि उन्होंने आरोपित के घर की तलाशी भी ली है। उसके पास से करीबन 3.67 लाख रुपए की विभिन्न ब्रांड की विदेशी शराब मिली हैं। इसके अलावा सेना की एक जोड़ी वर्दी भी बरामद की गई है।

अब पुलिस इस मामले में आगे की जाँच कर रही है कि उसे ये शराब की बोतलें आखिर कहाँ से मिलीं। नंदुरबार पुलिस चार दिन की रिमांड पर रखकर आरोपित से पूछताछ कर रही है। इसके बाद गोरवा पुलिस ट्रांसफर वारंट के आधार पर अपनी कार्रवाई करेगी। दोनों राज्य की पुलिसें पता लगा रही हैं कि सेना का फर्जी मेजर बनकर फारूक कहाँ-कहाँ घूमा और कितनी अवैध गतिविधियाँ कीं? अभी सामने आया है कि मोहम्मद फारूख शेख ने पाँच साल पहले एक मैट्रिमोनियल साइट के जरिए शाहिदा को बेवकूफ बनाकर उससे शादी की थी, उसने खुद को सेना से रिटायर हुआ बताया था।

सिर्फ हिंदुओं (गैर-मुस्लिमों) की 55% संपत्ति पर कब्जा करेगी कॉन्ग्रेसी सरकार, इस्लाम मानने वालों के पास रहेगी 100% दौलत: मुस्लिम पर्सनल लॉ से समझिए कॉन्ग्रेस का खेल

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने वादा किया है कि वो सत्ता में आएँगे, तो अमीरों से पैसे छीन लेंगे और गरीबों में बाँट देंगे। कॉन्ग्रेस पार्टी सत्ता में आने के बाद लोगों की संपत्ति की जाँच कराएगी और अगर संपत्ति ज्यादा होगी, तो उसे सरकार अपने कब्जे में ले लेगी। फिर इस संपत्ति को उन्हें दे देगी, जिनके पास संपत्ति कम है। वैसे सुनने में ये बड़ा क्रांतिकारी आईडिया लगता है, लेकिन हकीकत में कितना खतरनाक है, इसका अंदाजा ही किसी को नहीं है।

इस बीच, राहुल गाँधी ही नहीं, उनकी माँ सोनिया गाँधी के करीबी और कॉन्ग्रेसी थिंक टैंक के बड़े चेहरे सैम पित्रोदा ने जले पर नमक छिड़कने और नए जख्म देने की कोशिश करते हुए भारत में अमेरिकी कानून की बात कह दी। उनके मुताबिक, अमेरिका में किसी व्यक्ति के मरने के बाद उसकी संपत्ति का 45 प्रतिशत हिस्सा ही उत्तराधिकारियों को मिलता है, बाकी सरकार ले लेती है। उन्होंने कहा कि सत्ता में आने के बाद कॉन्ग्रेस इस पर भी सोचेगी।

सिर्फ हिंदुओं पर ही असर?

कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में दावा किया है कि वो सारे ‘पर्सनल लॉ’ वापस लाएगी। वो शरिया के भी पक्ष में है। वो तीन तलाक के भी पक्ष में है और तमाम वो गैर-हिंदू कानून, जिसपर कोर्ट रोक लगा चुकी है और मोदी सरकार कानून बना चुकी है, वो उन्हें वापस लाएगी। वो आर्टिकल 370 भी वापस लाएगी और 35ए भी। इसका सीधा सा मतलब है कि पहले की तरह ही जम्मू-कश्मीर में पूरे देश से अलग कानून चलने लगेगा। मुस्लिमों के सारे विवादों, जिसमें उत्तराधिकार कानून भी है, वो सब पर्सनल लॉ के दायरे में आ जाएँगे।

कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने के बाद हिंदुओं (कॉन्ग्रेस के मेनिफेस्टो के मुताबिक, पर्सनल लॉ से छेड़छाड़ नहीं) के उत्तराधिकार नियम में बदलाव लाया जाएगा, जिसमें हिंदुओं की मौत की सूरत में उसका 55 प्रतिशत हिस्सा सरकार के हाथ में चला जाएगा। और वेल्थ री-डिस्ट्रीब्यूशन के नाम पर वो अन्य लोगों में बाँट दिया जाएगा। ये तो वही बात हो गई, जिंदगी के साथ भी कॉन्ग्रेस की वसूली और मरने के बाद भी वसूली। यानी फर्क सिर्फ हिंदुओं पर पड़ेगा और उन समुदायों पर, जिनपर हिंदुओं के कानून लागू होते हैं। खासकर संपत्ति का मामला, जिसमें हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन धर्म जैसे सनातनी हैं।

इस्लाम में इस तरह से होता है विरासत का बंटवारा

इस्लाम में संपत्ति का बंटवारा शरीयत एक्ट 1937 के जरिए होता है। इसके लिए उत्तराधिकारी पर्सनल लॉ के तहत तय होते हैं। किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसकी संपत्ति में बेटे, बेटी, विधवा और माता-पिता को हिस्सा मिलता है। बेटी को बेटे से आधी संपत्ति देने का प्रावधान है। विधवा को संपत्ति का छठाँ हिस्सा मिलता है। ये चौथाई या आठवाँ हिस्सा भी हो सकता है। कोई सीधा उत्तराधिकारी न होने की सूरत में चौथाई, बेटा-पोता होने पर आठवाँ हिस्सा।

वैसे मुस्लिम परिवार में जन्मे बच्चे को जन्म के साथ ही संपत्ति में अधिकार नहीं मिलता है। इसके लिए जरूरी है कि किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसके उत्तराधिकारी अंतिम संस्कार करें। उसके सारे कर्ज चुकाए। इसके बाद संपत्ति की कीमत या वसीयत निर्धारित की जारी है और फिर शरिया कानून के अनुसार संपत्ति को रिश्तेदारों में बाँटा जाता है। एक बात और खास है, वो है संपत्ति का सरकार के कब्जे में न जाना। न ही कोई व्यक्ति अपनी पूरी संपत्ति का वसीयत कर सकता है और न ही सरकार किसी मुस्लिम की पूरी संपत्ति को कब्जा कर सकती है, क्योंकि मुस्लिमों में उत्तराधिकार के लिए पति-पत्नी, माता-पिता, बेटा-बेटी, दूसरी-तीसरी पत्नी, पोता-पोती सबकी हिम्मेदारी लग सकती है, लेकिन पूरी संपत्ति वसीयत नहीं की जा सकती।

हालाँकि अब कॉन्ग्रेस सैम पित्रोदा के बयान से पलड़ा झाड़ती दिख रही है। एक तरफ तो जयराम रमेश सैम पित्रोदा को गुरु और मार्गदर्शक बताकर उनके बयान को ‘निजी’ बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ सैम अपने बयान को तोड़ने मरोड़ने का आरोप लगा रहे हैं, साथ ही कह रहे हैं कि वो बस उदाहरण दे रहे थे। ये अलग बात है कि उदाहरण देने के बाद उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि हम भारत में इस तरह की चीजों के बारे में सोच सकते हैं। खैर, अब लोकसभा चुनाव का मंच सज चुका है। जनता के हाथ में फैसले की ताकत है। अब ये जनता ही तय करेगी कि उसे पूरे देश में एक समान कानून व्यवस्था चाहिए या फिर बहुसंख्यकों की संपत्तियों को छीनने की बात करने वाली पार्टी की सत्ता।