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सत्ता में आते ही सबसे पहले होगी जाति जनगणना: राहुल गाँधी ने कहा- देश के 90% लोगों का मीडिया और न्यायपालिका में जगह नहीं

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने जाति जनगणना कराने की बात कही है। उन्होंने कहा कि जाति जनगणना कॉन्ग्रेस के लिए राजनीति नहीं है। यह उनके जीवन का मिशन है और वे इसे नहीं छोड़़ेंगे। उन्होंने चेतावनी वाले अंदाज में कहा कि कोई भी ताकत जाति जनगणना कराने से उन्हें नहीं रोक सकती। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस सरकार आते ही ऐसा किया जाएगा और ये उनकी गारंटी है।

राहुल गाँधी ने कहा, “ये मेरे लिए राजनीति नहीं है। ये मेरे लिए लाइफ मिशन है। इसे मैं छोड़ने वाला नहीं हूँ। मैं गारंटी से कह रहा हूँ… आप लिख लो…. आप लिख लो… जाति जनगणना को कोई शक्ति नहीं रोक सकती है। जितनी तेजी से इसे रोका गया, उतनी फोर्स से ये वापस आई। हिंदुस्तान के 90 परसेंट लोगों को ये बात समझ में आ गई है।”

उन्होंने आगे कहा, “भले वो आज खुलकर कह नहीं रहे हैं, लेकिन ये बात उनको समझ आ गई है कि हिंदुस्तान के संस्थागत ढाँचा में… हिंदुस्तान की इकॉनोमी में… हिंदुस्तान के ज्यूडिशियरी में… उनकी कोई जगह नहीं है और देश 90 परसेंट उनका है। जैसे ही हमारी सरकार आएगी, पहला काम जाति जनगणना होगा। अब आपको ये जो 90 परसेंट हैं, उन्हें बताना आपका (सभा में मौजूद लोगों का) का काम है।”

‘सामाजिक न्याय सम्मेलन’ में बोलते हुए राहुल गाँधी ने कॉन्ग्रेस के घोषणा पत्र को क्रांतिकारी मैनिफेस्टो बताया है। मीडिया पर हमला बोलते हुए उन्होंने कहा, “इनकी कंपनी में स्टेकहोल्डर्स कौन हैं? इनकी कंपनी में बड़े-बड़े पत्रकार हैं, एंकर हैं… मैंने इनके नाम निकाले। इनमें 95 प्रतिशत वाले लोग हैं ही नहीं। एक ओबीसी एंकर नहीं है, एक दलित एंकर नहीं है, एक दलित एंकर नहीं है।”

इसी तरह ज्यूडिशियरी की बात करते हुए उन्होंने कहा, “हमने कहा कि जब मीडिया में कोई नहीं है तो ज्यूडिशियरी को देखते हैं। हाई कोर्ट के कुल 650 जज हैं। 90 प्रतिशत आबादी वालों की इसमें भागीदारी सिर्फ 100 की है और वो भी छोटे-छोटे। जब तक आप सुप्रीम कोर्ट में पहुँचोगे, तब तक खतम।” उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि इन लोगों के साथ कितना अन्याय हो रहा है।

राहुल गाँधी ने पिछड़े शब्द को खत्म करने की बात कहते हुए कहा, “ये शब्द मुझे अच्छा नहीं लगता है। सबसे पहले हमें इसे खत्म करना है। भाजपा की पूरी मूवमेंट आपकी हिस्ट्री को मिटाने का है। एक तरह से आपको बीते हुए समय से काट दिया गया है। आपकी हिस्ट्री फूले जी हैं, आंबेडकर जी हैं। मगर यह बहुत चुने हुए लोगों की हिस्ट्री है… दो-तीन-चार लोगों की हिस्ट्री।”

राहुल गाँधी ने कहा, “फूलेजी जैसे करोड़ों लोग थे, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी खून-पसीना दिया। उनकी कोई बात नहीं करता।” उन्होंने यहाँ तक कहा कि आजादी की लड़ाई में 90 प्रतिशत वालों की केंद्रीय भूमिका थी। आजादी की लड़ाई पिछड़ा, दलित और आदिवासी ने लड़ी, लेकिन उनकी कोई बात नहीं करता।

राममंदिर की चर्चा करते हुए राहुल गाँधी ने कहा, “राम मंदिर बन गया और उसमें हमारा एक आदमी नहीं दिखा।” बता दें कि राहुल गाँधी भले ही दावा करें कि राम मंदिर की टीम रामेश्वर चौपाल भी हैं, जो खुद दलित हैं। इस तरह राहुल गाँधी ने झूठा एवं कई भ्रामक आरोप भाजपा सरकार पर लगाए।

अमेठी की जनता करे पुकार, रॉबर्ट वाड्रा अबकी बार… कॉन्ग्रेस दफ्तर के बाहर ही लगे पोस्टर, राहुल गाँधी की चर्चा के बीच ‘जीजा जी’ की दावेदारी

उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र में रॉबर्ट वाड्रा के पोस्टर लगाए गए हैं। ये वही सीट है, जहाँ से राहुल गाँधी ने 2004, 2009 और 2014 में जीत दर्ज की थी। हालाँकि, 2019 में उन्हें यहाँ से हार का सामना करना पड़ा था। वो केरल के वायनाड से जीतने में कामयाब रहे। इस बार अटकलें लगाई जा रही थीं कि राहुल गाँधी फिर से अमेठी से केंद्रीय महिला एवं बाल विकास और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री स्मृति ईरानी के खिलाफ ताल ठोकने जा रहे हैं।

लेकिन, उससे पहले अमेठी में उनके जीजा और प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट वाड्रा के पोस्टर लगा दिए गए हैं, ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या अमेठी के कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता ही राहुल गाँधी को नहीं चाहते हैं? पोस्टरों पर लिखा है – अमेठी की जनता करे पुकार, रॉबर्ट वाड्रा अबकी बार। निवेदक के रूप में ‘अमेठी की जनता’ लिखा हुआ है। गौरीगंज स्थित कॉन्ग्रेस कार्यालय के बाहर ही ये पोस्टर लगाए गए हैं। रॉबर्ट वाड्रा खुद भी वहाँ से चुनाव लड़ने की इच्छा जता चुके हैं।

उन्होंने कहा था कि अमेठी की जनता चाहती है कि वो वहाँ से चुनाव लड़ें और लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व करें। सोशल मीडिया पर सक्रिय रॉबर्ट वाड्रा अक्सर जयंती-पुण्यतिथि वाले पोस्टर अपनी तस्वीर के साथ पोस्ट करते रहते हैं। वाड्रा के मुताबिक, अमेठी की जनता मानती है कि स्मृति ईरानी को चुन कर उन्होंने गलती की और वो इस गलती को सुधारना चाहती है। उन्होंने दावा किया था कि अमेठी से कई लोग उन्हें फोन भी करते हैं। हालाँकि, सोनिया गाँधी के दामाद ने ये भी कहा था कि आखिरी फैसला पार्टी को लेना है।

अमेठी के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी ने अब तक उम्मीदवार की घोषणा ही नहीं की है। इसी बीच ‘जीजा जी’ की दावेदारी से वहाँ की राजनीति गर्म हो गई है। स्मृति ईरानी ने याद दिलाया कि कैसे लोग सफर के दौरान सीट पर रुमाल रख कर कब्ज़ा करते थे, अमेठी में वही हो रहा है। स्थानीय कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं में चर्चा है कि शुक्रवार (26 अप्रैल, 2024) को राहुल गाँधी वहाँ जाएँगे। अमेठी से संजय गाँधी एक बार, राजीव गाँधी 4 बार और सोनिया गाँधी भी एक बार सांसद रह चुकी हैं।

आपकी कमाई बच्चों को नहीं मिलेगी, पंजा छीन लेगा…. कॉन्ग्रेस की लूट जिन्दगी के साथ भी और जिन्दगी के बाद भी: छतीसगढ़ में हमलावर हुए PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छत्तीसगढ़ के सरगुजा में कॉन्ग्रेस पर बड़ा हमला बोला है। उन्होंने यहाँ कॉन्ग्रेस नेता सैम पित्रोदा के विरासत टैक्स वाले बयान को लेकर हमला बोला है। पीएम मोदी ने लोगों को चेताया है कि अगर कॉन्ग्रेस सत्ता में आई तो जीवन भर की कमाई छीन लेगी। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस की लूट जिन्दगी के साथ भी और जिन्दगी के बाद भी चलती है।

सरगुजा में पीएम मोदी ने भाजपा प्रत्याशी रेणुका सिंह के समर्थन में एक रैली को बुधवार (18 अप्रैल, 2024) को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने सम्पत्ति के दोबारा बँटवारे और मरने के बाद सम्पत्ति जब्त करने जैसे मुद्दों लेकर कॉन्ग्रेस को घेरा। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 2014 में उनके चुनाव प्रचार में अंबिकापुर वालों ने लाल किला बनाया था।

पीएम मोदी ने कहा, “भारत विरोधी INDI गठबंधन की कमजोर सरकार चाहते हैं जिसमें भ्रष्टाचार होता रहे और सब एक दूसरे से लड़ते रहें। कॉन्ग्रेस के शासन में नक्सल और आतंकवाद फैला। कॉन्ग्रेस का कुशासन और लापरवाही देश की बर्बादी का कारण है।”

उन्होंने कॉन्ग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के नक्सलियों को शहीद बताने को लेकर भी हमला बोला। पीएम मोदी ने कहा, “इसी कॉन्ग्रेस की सबसे बड़ी नेता आतंकवादियों के मारे जाने पर आंसू बहाती हैं। इस कारण कॉन्ग्रेस देश का भरोसा खो चुकी है।”

पीएम मोदी ने कहा कि कॉन्ग्रेस का मेनिफेस्टो मुस्लिम लीग की सोच को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि संविधान निर्माण के समय यह तय हुआ था कि आरक्षण धर्म के नाम पर नहीं होगा लेकिन वोटबैंक के कारण कॉन्ग्रेस ने इन महापुरुषों की बात नहीं मानी। कॉन्ग्रेस ने आंध्र प्रदेश में मुस्लिमों को आरक्षण देने की बात कही।

रैली में पीएम मोदी ने आरोप लगाया कि 2009 और 2014 के मेनिफेस्टो में भी कॉन्ग्रेस ने यह वादा किया था। पीएम मोदी ने कहा कि कॉन्ग्रेस सरकार ने मुस्लिम समुदाय की सभी जातियों को ओबीसी में डाल दिया और सामाजिक न्याय की हत्या की। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस संविधान बदल कर SC/ST और ओबीसी आरक्षण छीनकर अपने वोट बैंक देना चाहते हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस महिलाओं के आभूषणों का एक्सरे करवाएँगे। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सम्पत्ति एक विशेष वर्ग को बाँटी जाएगी। सैम पित्रोदा के विरासत टैक्स वाले बयान पर भी पीएम मोदी ने हमला बोला। उन्होंने कहा कि सैम पित्रोदा ने पहले मध्यम वर्ग पर ज्यादा टैक्स की वकालत की थी और अब इनहेरिटेंस टैक्स की बात कर रही है।

पीएम मोदी ने कहा, “आप जो अपनी मेहनत से सम्पत्ति जुटाते हैं, वह आपके बच्चों को नहीं मिलेगा बल्कि कॉन्ग्रेस का पंजा उसे छीन लेगा। कॉन्ग्रेस का मन्त्र है कि उनकी लूट जिन्दगी के साथ भी और जिन्दगी के बाद भी। जब आप जीवित रहेंगे तो आपको ज्यादा टैक्स से मारेगी, जीवित ना होने पर इन्हेरिटेंस टैक्स लाद देगी।” पीएम मोदी का यह भाषण आप नीचे लगे वीडियो में सुन सकते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के मूल स्वभाव पर कॉन्ग्रेस हमला कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया है कि कॉन्ग्रेस में बैठे अर्बन नक्सल अमेरिका को खुश करने के लिए यह बातें कर रहे हैं। पीएम मोदी इससे पहले भी कॉन्ग्रेस के सम्पत्ति दोबारा बाँटने को लेकर हमले बोल चुके हैं।

अमेरिका की यूनिवर्सिटी में आजादी के नारे और पुलिस पर हमला… फिलीस्तीन का समर्थन करने वालों पर सख्त हुआ US प्रशासन, 130+ गिरफ्तार

अमेरिका की यूनिवर्सिटियों में फिलीस्तीन के समर्थन में बढ़ रही प्रदर्शनबाजी पिछले दिनों आजादी के नारों तक पहुँच गई थी। वो वैसे ही आजादी के नारे थे जो जब कश्मीर में लगाए गए थे तो हिंदुओं के खिलाफ हिंसा हुई थी और दिल्ली में लगाए गए थे तो दंगे हुए थे।

अमेरिका में भी इन नारों के लगने के बीच खबर आई कि वहाँ सुरक्षाकर्मियों पर हमला हुआ है और कैंपस का जबरन माहौल बिगाड़ा जा रहा है। इन घटनाओं के बाद खबर है कि अब अमेरिकी प्रशासन सख्त हो गया है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों द्वारा सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों पर किए जा रहे हमले के बाद यूएस की अलग-अलग में यूनिवर्सिटियों से लोग हिरासत में लिए हैं।

न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में सोमवार को 133 प्रदर्शनकारी गिरफ्तार हुए थे जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया, लेकिन उनके ऊपर ये कार्रवाई इसलिए हुई क्योंकि पिछले दिनों यूनिवर्सिटी में NYPD (न्यूयॉर्क पुलिस डिपार्टमेंट) अधिकारियों पर हमला हुआ था। उन पर कुर्सी और बोतल फेंके गए थे। हमलों में कई अधिकारियों को चोटें आई थीं।

इसके बाद येल यूनिवर्सिटी में 60 लोग गिरफ्तार हुए जिनमें से 47 तो छात्र ही थे। आरोप था कि इनसे बहुत समय से कैंपस प्लाजा को खाली करने को कहा जा रहा था लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। उलटा इन्होंने कैंपस में कैंप लगा लिए थे। ऐसे में सुरक्षा के लिहाज से अधिकारियों को सारे कैंप तितर-बितर करके गिरफ्तारी की कार्रवाई करनी पड़ी।

कैलीफोर्निया स्टेट पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी में भी ऐसे प्रदर्शनों के कारण कैंपस बंद करना पड़ा और तीन गिरफ्तारियाँ हुईं। वहीं मिशिगन यूनिवर्सिटी में भी घेराव हटाने के दौरान 9 लोगों को पकड़ा गया था जिसके विरोध में सैंकड़ों लोग इकट्ठा हो गए थे।

बता दें कि अमेरिका की यूनिवर्सिटियों में जैसे जैसे फिलीस्तीन के लिए प्रदर्शन की गति बढ़ रही है उसे देखते हुए ही ये कार्रवाइयाँ हुई हैं। इनके कारण पूरे कैंपस पर प्रभाव पड़ रहा है। जो छात्र पढ़ना चाहते हैं वो पढ़ नहीं पा रहे। शिक्षकों को पर्सनल क्लासें रद्द करनी पड़ रही हैं। सेमेस्टर का अंतिम समय है लेकिन परीक्षा की बजाय ऑनलाइन क्लासेज पर शिफ्ट होना पड़ रहा है। कोलंबिया में अभिभावक कॉलेज प्रशासन की हालत देखते हुए अपनी जमा कराई फीसें वापस माँगने लगे हैं। जो प्रदर्शन नहीं कर रहे, वो छात्र अपनी सुरक्षा पर चिंता जताने लगे हैं।

ऐसे हालात देखते हुए कोलंबिया विश्वविद्यालय के अध्यक्ष मिनोचे शफीक ने मंगलवार शाम (स्थानीय समय) घोषणा की कि विरोध प्रदर्शन के आयोजकों को परिसर में फिलिस्तीन समर्थक विरोध शिविर को खत्म करने के लिए आधी रात तक समझौता कर लेने का समय दिया गया है। इस प्रदर्शन के कारण केवल और केवल तनाव बढ़ा है। छात्र असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि अगर उनकी सुनवाई नहीं होती तो वो वैकल्पिक विकल्पों पर विचार करेंगे।

‘सैम पित्रोदा हमारे गुरु’ कहकर कॉन्ग्रेस ने किया ‘मरने के बाद टैक्स’ वाला आइडिया खारिज: नुकसान से बचने के लिए ‘गोदी मीडिया’ पर निशाना

सैम पित्रोदा के विरासत टैक्स वाले बयान से कॉन्ग्रेस ने किनारा कर लिया है। कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद और संचार इंचार्ज जयराम रमेश ने इसे निजी बयान बताया है। खुद सैम पित्रोदा ने भी आरोप लगाया है कि उनके बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया। पित्रोदा ने बुधवार (24 अप्रैल, 2024) को एक बयान में सुझाव दिया था कि भारत में अमेरिका जैसा विरासत टैक्स होना चाहिए जिसके अंतर्गत किसी व्यक्ति के मरने के बाद उसकी 55% सम्पत्ति पर सरकार कब्जा कर लेती है।

जयराम रमेश ने इस बयान के विषय में ट्विटर पर लिखा, “पित्रोदा जी उन मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखते हैं जिनके बारे में वह बोलना जरूरी समझते हैं। लोकतंत्र में एक व्यक्ति अपनी बात रखने, चर्चा करने और व्यक्तिगत विचारों को लेकर बहस करने के लिए स्वतंत्र होता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पित्रोदा जी के विचार हमेशा कॉन्ग्रेस की पोजीशन को दर्शाते हैं। कई बार उनके विचार अलग होते हैं। अब उनकी टिप्पणियों को सनसनीखेज बनाकर दूसरे संदर्भ में पेश किया जा रहा है।”

सैम पित्रोदा ने स्वयं इस मामले में सफाई पेश की है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अमेरिका के विरासत टैक्स पर एक व्यक्ति के रूप में मैंने जो कहा, उसे गोदी मीडिया ने तोड़-मरोड़ कर पेश किया है ताकि प्रधानमंत्री कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र के बारे में जो झूठ फैला रहे हैं, उससे ध्यान भटका सके। प्रधानमंत्री की मंगलसूत्र और सोना छीनने की टिप्पणी बिल्कुल गलत है।” पित्रोदा के बयान को लेकर काफी विरोध हो रहा था।

सैम पित्रोदा ने इससे पहले मीडिया से बात करते हुए कहा था, “अमेरिका में एक विरासत कर (इनहेरिटेंस टैक्स) है। अगर किसी व्यक्ति के पास 100 मिलियन डॉलर है और जब वह मरता है तो वह केवल इसका 45% ही अपने बच्चों को दे सकता है, 55% सरकार के खजाने में जाता है। इस कानून के अनुसार, आपने अपने समय में सम्पत्ति बनाई और अब इसे जनता के लिए छोड़ दीजिए। पूरी नहीं तो कम से कम आधी तो जनता के लिए छोड़ ही दें। मुझे ये एकदम सही लगता है।”

इसके बाद सैम पित्रोदा ने इस कानून की वकालत में कहा था,”भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, भारत में अगर किसी के पास 10 बिलियन डॉलर (लगभग ₹82,000 करोड़) हैं और वह मरता है तो उसके बच्चों को पूरे 10 बिलियन डॉलर मिलते हैं। जनता को उसमे से कुछ नहीं मिलता। यह कुछ मामले हैं जिन पर बहस और विचार होगा। जब हम सम्पत्ति दोबारा से बाँटने के बारे में बात करेंगे तो इसका मतलब नए कानून और नीतियों पर बात करना होगा।”

पित्रोदा का बयान राहुल गाँधी के सम्पत्ति के सर्वे और उसे दोबारा बाँटने के वादों के बीच आया था। गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी लगातार देश के लोगों के सम्पत्ति के सर्वे की बात कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस के मेनिफेस्टो में भी सर्वे की बात की गई है। राहुल गाँधी ने यह भी कहा है कि सर्वे के बाद सम्पत्ति का दोबारा से बँटवारा किया जाएगा। अब इस मामले में पित्रोदा के बयान पर भारी विरोध के बाद कॉन्ग्रेस ने सफाई पेश की है।

जहाँ त्योहार में भी शांति नहीं, वहाँ लोग चुनाव के लायक नहीं: पश्चिम बंगाल में रामनवमी हिंसा पर कलकत्ता हाई कोर्ट सख्त, कहा – ‘टाल दिया जाए लोकसभा चुनाव’

राम नवमी के मौके पर हुई हिंसा को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट ने कड़ा रुक अपनाया है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि जहाँ दो समुदाय 8 घंटे की भी शांति नहीं बना सकते, वहाँ चुनाव की कोई जरूरत नहीं है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने मंगलवार (23 अप्रैल, 2024) को इस साल रामनवमी के दौरान हुई सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ी घटनाओं का न्यायिक संज्ञान लिया और हिंसा के मामलों की सुनवाई की।

रामनवमी पर पश्चिम बंगाल में भड़की सांप्रदायिक हिंसा को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि इस साल जिन निर्वाचन क्षेत्रों में सांप्रदायिक हिंसा भड़की है, उन जगहों पर वह लोकसभा चुनाव 2024 की मंजूरी नहीं देगी। अगर लोग शांति के साथ कोई जश्न नहीं मना सकते हैं, तब चुनाव आयोग से हमारी सिफारिश है कि ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव न हों।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस टीएस शिवगणनम ने कहा, “हम चुनाव आयोग से सिफारिश करेंगे कि जब लोग कुछ घंटों के लिए शांति के साथ पर्व नहीं मना सकते हैं तब उन्हें संसदीय प्रतिनिधि चुनने का अधिकार भी नहीं दिया जाना चाहिए। ऐसे में चुनाव (वहाँ पर) टाल दिए जाने चाहिए।”

हाई कोर्ट ने आगे कहा, “कुछ छोटी घटनाओं के चलते बड़ा धमाका हो सकता है। ऐसा नहीं होता कि ये सारी घटनाएँ पहले से सुनियोजित होती हैं। त्योहार के दिन…किसी आदमी के ऊपर कोई चीज सवार हो जाती है और वह (हो सकता है बाकी लोगों को भड़काए)…लेकिन इस तरह की असिहष्णुता दोनों तरफ से है।”

कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस दौरान यह भी कहा कि वह चुनाव आयोग के सामने बहरामपुर संसदीय क्षेत्र में होने वाले चुनाव को टालने का प्रस्ताव रखेगा। हिंसा की घटनाओं के बारे में हाई कोर्ट ने राज्य से हलफनामा माँगते हुए मामले को 26 मई तक के लिए स्थगित कर दिया है। इसमें याचिकाकर्ताओं की स्वीकारोक्ति भी दर्ज है कि यह पहली बार है कि बेहरामपुर में रामनवमी पर ऐसी हिंसा हुई।

हाई कोर्ट की बेंच ने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (एमआरएम) की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियाँ कीं, जिसमें मुर्शिदाबाद के बेलडांगा और शक्तिपुर में हिंसा की एनआईए या सीबीआई जाँच की माँग की गई थी। शक्तिपुर इलाके में यह हिंसा रामनवमी जुलूस के एक स्थानीय मस्जिद से गुजरने के तुरंत बाद हुईं, जिसमें कई लोग घायल हो गए थे। चीफ जस्टिस ने कहा कि समाचार रिपोर्टों की मानें तो कोलकाता में रामनवमी पर लगभग 33 कार्यक्रम आयोजित किए गए, लेकिन कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। फिर मुर्शिदाबाद में ये कैसे हुआ?

गौरतलब है कि देश भव में 17 अप्रैल 2024 को रामनवमी का त्योहार मनाया गया। इस दौरान पश्चिम बंगाल में कई जगहों पर हिंसा भड़की। कोलकाता पूरी तरह से शांत रहा, लेकिन अन्य हिस्सों से हिंसा की खबरें आई। यही नहीं, मुर्शिदाबाद में रामनवमी जुलूस के दौरान हिंसा के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग (ईसी) को ही जिम्मेदार ठहरा दिया था। हालाँकि चुनाव आयोग ने बंगाल में हिंसा होने पर 2 पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया, जिसमें मुर्शिदाबाद जिले के शक्तिपुर और बेलडांगा थाने के प्रभारी शामिल थे। ये अधिकारी अपने संबंधित अधिकार क्षेत्र में 17अप्रैल को हुई हिंसा को रोकने में विफल रहे थे। इसी मामले में हाई कोर्ट ने सरकार से सवाल पूछा है।

दंगे के लिए विरोध प्रदर्शन की जगहों को दिए गए थे हिन्दू नाम, खुले में हो रही थी लोगों को मारने की प्लानिंग: दिल्ली दंगे में सलीम को बेल से HC का इनकार

दिल्ली हाई कोर्ट ने 2020 दंगों के आरोपित सलीम मलिक उर्फ़ मुन्ना को सोमवार (22 अप्रैल, 2024) को जमानत देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि उसने दिल्ली दंगा की योजना बनाने में स्पष्ट रूप से भाग लिया था। कोर्ट ने इस दौरान दंगे को सेक्यूलर रूप देने के लिए विरोध प्रदर्शनों को हिन्दू नाम देने की योजना पर भी टिप्पणी की।

दिल्ली हाई कोर्ट दिल्ली दंगा के मामले में आरोपित सलीम मलिक की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहा था। जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस मनोज जैन की सदस्यता वाली बेंच ने इस मामले की सुनवाई की है। उन्होंने दंगों में सलीम मलिक की भूमिका के चलते उसे जमानत देने से इनकार किया।

कोर्ट ने कहा कि सलीम उस व्हाट्सएप ग्रुप का हिस्सा भले नहीं था जिसमें दंगे की योजना बनाई गई थी लेकिन वह उस बैठकों में शामिल था जहाँ लोगों को मारने की योजना पर काम हुआ था। कोर्ट ने इस मामले में कहा कि सलीम चाँद बाग़ की एक बैठक में भी शामिल हुआ था जिसमें दिल्ली को जलाने की खुले तौर पर बात की गई थी।

हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसी बातें किसी भी लोकतांत्रिक देश में स्वीकार नहीं की जा सकतीं। कोर्ट ने कहा कि इन बैठकों में हथियार खरीदने, लोगों को मारने और पेट्रोल बम तक खरीदने की बातें की गई। इसके अलावा इन बैठकों में लोगों की सम्पत्ति जब्त करने की बात की गई थी। कोर्ट ने कहा कि सलीम की दंगे के दौरान यह जिम्मेदारी थी कि वह गलियों में लगे CCTV कैमरे तोड़ दे या फिर उन्हें ढक दे।

कोर्ट ने कहा कि सलीम मलिक को जिस मामले में आरोपित बनाया गया है, उसमें उसके खिलाफ इस बात के काफी सबूत हैं कि उसने अपराध किया। कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों को एक बड़ी साजिश करार दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में दंगाइयों ने 2019 के दंगों से भी सबक लिया था और उस हिसाब से प्लानिंग की थी।

दंगे से पहले विरोध प्रदर्शनों के लिए चुने गए स्थानों के नाम हिन्दू और सेक्यूलर नामों पर रखने पर कोर्ट ने कहा कि ऐसा इसे सेक्यूलर दिखाने के लिए किया गया था। कोर्ट ने कहा कि लोगों को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है लेकिन हिंसा करने का नहीं।

दिल्ली दंगों की भी बात करें तो 4 मुख्य चरणों में इसकी साजिश रची गई थी। पहले चरण में PFI सहित अन्य इस्लामी संगठनों ने विश्वविद्यालयों में CAA के खिलाफ प्रदर्शन किया और छात्रों को भड़काया। दूसरे फेज में शाहीन बाग़ जैसे धरने हुए। तीसरे चरण में हिन्दू-विरोधी प्रतीकों और गतिविधियों की बाढ़ आ गई। चौथे चरण में वारिस पठान जैसों के घृणास्पद बयानों के बाद हिन्दुओं पर हमले शुरू हो गए।

मुस्लिम महिलाओं ने भी अपनी छतों से ईंट-पत्थर फेंके थे। मुस्लिम परिवार के लोग अपने छात्रों को पहले ही स्कूलों से ले गए थे। फैसल फारूक का स्कूल दंगाइयों का अड्डा बना। ताहिर हुसैन की फैक्ट्री दंगाइयों का बसेरा बनी। हिन्दुओं की दुकानों को चुन-चुन कर जलाया गया। पेट्रोल बम और पत्थरों का इस्तेमाल हुआ। इस दंगे में 50 से अधिक लोग मारे गए थे।

लोकसभा चुनाव में विदेशी पत्रकारों का प्रोपेगेंडा: खालिस्तानी समर्थक महिला पत्रकार के ‘वीजा प्रपंच’ की मीडिया ने ही खोली पोल, अब फ्री प्रेस के नाम पर ड्रामा

ऑस्ट्रेलियन पत्रकार अवनी डायस ने 20 अप्रैल 2024 को भारत छोड़ दिया। अब उन्होंने आरोप लगाया है कि भारत सरकार उनकी लोकसभा चुनाव कवरेज में अडंगा लगा रही है। उनका वीजा नहीं बढ़ रहा है। उन्हें परेशान किया जा रहा था, इसलिए उन्हें 20 अप्रैल को भारत छोड़ना पड़ा। उनके इस दावे की पोल खुल चुकी है, क्योंकि उन्होंने पहले वीजा ही अप्लाई नहीं किया था। उन्होंने वीजा अप्लाई किया, तो उनका वीजा जून माह तक बढ़ाया जा चुका था।

यही नहीं, उनके ही संस्थान के अन्य साथी लोकसभा चुनाव की कवरेज कर रहे हैं। ऐसे में अवनी डायस की बनाई पूरी कहानी की जब हवा निकल गई, तब भी ‘विदेशी पत्रकारों’ की एक लॉबी प्रोपेगेंडा फैलाने से बाज नहीं आ रही। कुछ पत्रकारों ने भारत सरकार को एक पत्र लिखा है और अवनी डायस के कथित ‘देश निकाले’ पर विरोध जताया है। हालाँकि अवनी डायस भारत और सनातन विरोधी प्रोपेगेंडा के लिए जानी जाती रही हैं, उनके कई कारनामे पहले भी पकड़े जा चुके हैं।

दरअसल, ये पूरा विवाद खड़ा हुआ मंगलवार (23 अप्रैल 2024) को, जब ऑस्ट्रेलिया की पत्रकार अवनी डायस ने एक्स पर दावा किया कि भारत सरकार ने उनका वीजा नहीं बढ़ाया, इसलिए उन्हें ‘मजबूरी में’ भारत छोड़ना पड़ा। डायस ने दावा किया कि ‘उनकी रिपोर्ट’ भारत सरकार को पसंद नहीं आई, इसलिए ऐसा किया गया। अवनी डायस जनवरी 2022 से नई दिल्ली में हैं और ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन(एबीसी) की दक्षिण एशिया ब्यूरो चीफ के तौर पर काम कर रही थी।

डायस ने अपने एक्स पोस्ट में लिखा, “पिछले सप्ताह मुझे अचानक भारत छोड़ना पड़ा। मोदी सरकार ने मुझसे ये कहते हुए वर्क वीजा बढ़ाने से इनकार कर दिया कि मेरी खबरें ‘लाइन क्रॉस’ करती हैं। मुझे ये भी बताया गया कि लोकसभा चुनाव की रिपोर्टिंग की भी मान्यता मुझे नहीं मिलेगी। मुझे मतदान के ‘उन’ दिनों में से एक में भारत छोड़ना पड़ा, जिसे मोदी ‘मदर ऑप डेमोक्रेसी’ कहते हैं।”

हालाँकि अवनी डायस ने कहा कि मुझे मेरी फ्लाइट से 24 घंटे पहले 2 माह का वीजा एक्सटेंशन मिल गया था, वो भी ऑस्ट्रेलियाई सरकार के हस्तक्षेप के बाद।

अवनी डायस के इन आरोपों के बाद इंडिया टुडे की पत्रकार गीता मोहन ने उनके सभी दावों की हवा निकाल दी। उन्होंने लिखा, “एबीसी की दक्षिण एशिया संवाददाता अवनी डायस का दावा कि उन्हें चुनाव कवर नहीं करने दिया गया, पूरी तरह से झूठा है और भ्रम फैलाने वाला है। सूत्रों के मुताबिक, वो वीजा नियमों का उल्लंघन करते हुए पकड़ी गई थी। इसके बावजूद उन्होंने जब अनुरोध किया, तब उनका वीजा बढ़ा दिया गया। खासकर चुनाव की कवरेज तक के लिए। उनका पिछला वीजा 20 अप्रैल 2024 तक का ही था। उन्होंने 18 अप्रैल 2024 को वीजा की फीस भरी और उनका वीजा जून के आखिर तक बढ़ा दिया गया। इसके बावजूद उन्होंने 20 अप्रैल को भारत छोड़ने का फैसला किया, जबकि उनके पास वैध वीजा था और उसे बढ़ाया भी जा चुका था।”

उन्होंने आगे लिखा, “रही बात चुनाव कवर करने की अनुमति मिलने की, तो ये बात भी तथ्यात्मक रूप से गलत है। क्योंकि सभी वीजा धारक (विदेशी) पत्रकारों को बूथ के बाहर से चुनाव को कवर करने की अनुमति है। अगर आपको बूथ के अंदर से कवरेज करनी है, तो उसके लिए विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। हालाँकि जबतक आपके वीजा के एक्सटेंशन को लेकर प्रक्रिया चल रही हो, तब तक ये अनुमति नहीं दी जाती। ये बात ध्यान देने योग्य है कि एबीसी के अन्य संवाददाताओं मेघना बाली और सोम पाटीदार को पहले ही चुनाव कवरेज के लिए अनमति पत्र मिल चुके हैं।”

गीता मोहन ने साफ कहा कि अवनी जो आरोप लगा रही हैं, वो पूरी तरह से गलत है, क्योंकि उनके साथी चुनाव की कवरेज कर रहे हैं। विदेशी पत्रकार होने के नाते किसी तरह की कोई रोक नहीं लगाई गई है। उनके पास वीजा नहीं था, लेकिन जब उन्होंने वीजा का समय बढ़ाने की अपील की, तो तुरंत उसे बढ़ा दिया गया। ऐसे में उनका दावा पूरी तरह से गलत है।

अवनी डायस के सभी आरोपों की हवा निकलने के बावजूद ‘विदेशी पत्रकारों’ ने एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए एक विरोध पत्र लिखा है, जिसे जॉन रीड नाम के पत्रकार ने एक्स पर साझा किया है। जॉन रीड ने लिखा, “खुला पत्र: एबीसी की अवनी डायस, जिन्हें ‘जबरदस्ती’ भारत से रिपोर्टिंग की ‘लाइन क्वॉस’ करने के आरोपों में बाहर निकाल दिया गया, उसपर विदेशी संववादाताओं का विरोध।” इस पत्र पर 30 ‘विदेशी पत्रकारों’ के नाम हैं।

खैर, इस प्रोपेगेंडा से इतर अवनी डायस से जुड़ा एक और मामला भी है। उसने कनाडा में हरदीप निज्जर की हत्या को भारत से जोड़ने की कोशिश करते हुए एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, जिस पर भारत सरकार रोक लगा चुकी है और यू-ट्यूब पर पर भी उसके मामले में नोटिस दिख रहा है। दरअसल, यो डॉक्यूमेंट्री न सिर्फ तथ्यात्मक रूप से गलत थी, बल्कि भारत के संवेदनशील सीमाई इलाकों में गलत तरीके से फिल्माई गई थी। उन लोकेशन पर शूट करने के लिए गलत तरीके से अनुमति हासिल की गई थी, जिसका बीएसएफ ने भी विरोध किया था।

उस डॉक्यूमेंट्री के निर्माण के समय डायस ने वीजा शर्तों का भी उल्लंघन किया था, जिसके बाद सरकार ने उन्हें चेताया था। अब बताया जा रहा है कि डायस को कोई और नौकरी मिल गई है, ऐसे में उन्होंने ‘नाखून कटाकर बलिदानी’ बनने का फैसला किया है, जो लोगों में सिर्फ भ्रम फैलाने और उसके भारत विरोधी प्रोपेगेंडा का महज एक हिस्सा मात्र भर है।

पहले भी भारत को लेकर प्रोपेगेंडा फैलाती रही हैं अवनी डायस

अवनी डायस भारत विरोधी, सनातन विरोधी लेखों के लिए जानी जाती है। उसने कई बार प्रोपेगेंडा फैलाने की कोशिश की, लेकिन हर बार एक्सपोज होती रही। इसी साल मार्च में अवनी डायस ने ब्रिसबेस में स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर पर खालिस्तानी कट्टरपंथियों के हमले को नकारते हुए कट्टरपंथियों को क्लीनचिट देने की कोशिश की थी। उन्हें इसे हिंदू समूहों का ही हमला करार दे दिया था। उनके दावों को खुद ऑस्ट्रेलियन हिंदू मीडिया ने एक्सपोज कर दिया था। एक फेसबुक पोस्ट में ऑस्ट्रेलियन हिंदू मीडिया ने अवनी डायस और उनकी साथी नाओमी सेल्वारत्नम को ‘ब्राउन सिपाही’ की संज्ञा दी थी।

जनवरी 2024 में अयोध्या में भगवान राम के भव्य मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को अवनी ने ‘हिंदू वर्चस्ववाद’ कहा था और बड़ी आसानी से हिंदुओं के 500 सालों के संघर्ष, राम मंदिर के इतिहास और उसे आक्रमणकारी बाबर के लोगों द्वारा 1956 में तोड़ने जाने को छिपा लिया था।

यही नहीं, मार्च 2022 में वो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ‘हिंदू सुप्रीमिस्ट मॉन्क’ भी कहा था। वो सीएए पर भी गलत जानकारियाँ फैलाती हुई पकड़ी जा चुकी है, जिसके बाद उसने अपना ट्वीट भी डिलीट कर दिया था।

हर सड़क पर लाउडस्पीकर से अजान सुनने का देखा था ख्वाब… लोगों का गुस्सा देख खुद की जमीन पर मस्जिद बनाने का प्लान भी कैंसल

कोरिया का पॉप स्टार गायक ‘किम दाऊद’ साल 2019 में मुस्लिम बनने के बाद से इस्लाम प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ता। हाल में उसने अपने इंस्टाग्राम पर जानकारी दी थी कि वो कोरिया में मस्जिद बनवा रहा है और इसके लिए उसने जमीन भी खरीद ली है।

किम ने यह सूचना देते हुए अपनी जो खुशी जाहिर की थी वो ज्यादा देर नहीं रह पाई क्योंकि स्थानीय विरोध और प्रशासन से सहयोग के बिना उसे ये योजना रद्द करनी पड़ी। वहीं जमीन के मालिक ने भी उससे किया कॉन्ट्रैक्ट तोड़ दिया।

किम द्वारा मस्जिद के लिए जमीन खरीदी जाने की बात मीडिया में काफी चर्चा में आई थी। उसने अपने यूट्यूब चैनल पर वीडियो डालकर घोषणा की थी कि थी कि वो मस्जिद के लिए जमीन ले चुका है। इस दौरान उसके हाथ में एक कॉन्ट्रैक्ट भी था जिसके अनुसार उसने 384.4 स्क्वॉयर मीटर जमीन योनजोंग द्वीप के इंचियन में 1 करोड़ 13 लाख 72 हजार 497 रुपयों में ली थी।

अपनी वीडियो में उसने इस प्रोजेक्ट के लिए डोनेशन माँगी थाी और इसके लिए बैंक जानकारी भी साझा की थी। उसने कहा था- “मुझे आर्थिक सहायता चाहिए ताकि मस्जिद बन सके। अगर आप मदद करना चाहते हैं तो यहाँ सहायता करें। बहुत मुश्किलें आएँगी लेकिन मुझे लगता है कि मैं कर लूँगा। जब तक कोरिया की हर सड़क आजान की खूबसूरत आवाज से नहीं गूँजता मैं अपना सर्वश्रेष्ठ करता रहूँगा।”

स्थानीयों से लेकर प्रशासन तक ने लताड़ा

किम के इस पोस्ट को दुनिया भर के इस्लामवादियों ने सराहा। लेकिन कोरिया के लोगों को किम का ये ढंग नहीं पसंद आया। उन्होंने उसका विरोध करना शुरू कर दिया और कहा- “अगर इस्लाम इतना ही पसंद है तुम्हें तो तुम अरब देश में चले जाओ… मस्जिद बन जाने से तो सिर्फ सिर्फ घर की कीमतें इलाके में कम होंगीं।”

स्थानीय विरोध के अलावा किम को इस काम के लिए प्रशासन की मंजूरी लेना भी मुश्किल काम हो गया। प्रशासन ने कहा कि दाऊद को जिस जगह मस्जिद बनानी है वहाँ पर सड़क की हालत देखते हुए इमारत बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।” वहीं योनहाप न्यूज एजेंसी ने बताया कि किम अभी उस भूमि के मालिक नहीं है जहाँ वो मस्जिद बनाने की बात कर रहे हैं। मालिक ने उनके साथ कॉन्ट्रैक्ट तोड़ दिया है।

मुस्लिम फेडरेशन का नहीं मिला समर्थन

इसके अतिरिक्त कोरिया सरकार के साथ आधिकारिक तौर पर पंजीकृत एकमात्र इस्लामी संगठन कोरिया मुस्लिम फेडरेशन (केएमएफ) ने पिछले हफ्ते कोरिया टाइम्स को बताया कि किम की मस्जिद बनाने की योजना उनकी निजी परियोजना है। समूह ने कहा, “कोरिया मुस्लिम फेडरेशन से जुड़ी देश भर की सभी मस्जिदें केएमएफ के नाम से पंजीकृत हैं, और किसी को भी किसी व्यक्ति के नाम पर पंजीकरण करने या मस्जिद के निर्माण के लिए धन जुटाने की अनुमति नहीं है।”

कोरियन मुस्लिम फेडरेशन के अनुसार, कोरिया में 19 मस्जिद हैं और 350000 कोरियन मुस्लिम हैं जबकि 150,000 मुस्लिम कोरिया से बाहर के आकर यहाँ रहते हैं। इनमें से 120,000 श्रमिक हैं और 30,000 छात्र और व्यवसायी हैं जोकि उज्बेकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और पाकिस्तान से आएँ हैं।

यौन उत्पीड़न का आरोप

गौरतलब है कि किम के ऊपर साल 2020 में यौन उत्पीड़न का इल्जाम भी लगा था। एक महिला ने दावा किया था कि किम ने 2019 में उनके साथ यौन उत्पीड़न किया। वीडियो वायरल होने के बाद किम ने इस संबंध में माफी भी माँगी थी। उन्होंने कहा था कि ऐसी घटना घटी है लेकिन उन्होंने समझौता कर लिया है।

बता दें कि इस समय किम के यूट्यूब पर 50 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर्स हैं और इंस्टाग्राम पर 30 लाख से ज्यादा फॉलोवर्स हैं। उसने 2019 सितंबर में ईसाई धर्म छोड़कर अपने मुस्लिम बनने का ऐलान किया था। इसके बाद ये पूर्व गायक अब चर्चा में आया है।

आपकी मौत के बाद जब्त हो जाएगी 55% प्रॉपर्टी, बच्चों को मिलेगा सिर्फ 45%: कॉन्ग्रेस नेता सैम पित्रोदा का आइडिया

कॉन्ग्रेस नेता सैम पित्रोदा ने मृत्यु के बाद लोगों की आधी सम्पत्ति जब्त करने के कानून की वकालत की है। उन्होंने इसके लिए अमेरिकी कानून का हवाला दिया है। पित्रोदा का बयान राहुल गाँधी के सम्पत्ति के सर्वे और उसे दोबारा बाँटने के वादों के बीच आया है।

ओवरसीज कॉन्ग्रेस के मुखिया सैम पित्रोदा ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “अमेरिका में एक विरासत कर (इनहेरिटेंस टैक्स) है। अगर किसी व्यक्ति के पास 100 मिलियन डॉलर है और जब वह मरता है तो वह केवल इसका 45% ही अपने बच्चों को दे सकता है, 55% सरकार के खजाने में जाता है। इस कानून के अनुसार, आपने अपने समय में सम्पत्ति बनाई और अब इसे जनता के लिए छोड़ दीजिए। पूरी नहीं तो कम से कम आधी तो जनता के लिए छोड़ ही दें। मुझे ये एकदम सही लगता है।”

इसके बाद सैम पित्रोदा ने इस कानून की वकालत में कहा, “भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, भारत में अगर किसी के पास 10 बिलियन डॉलर (लगभग ₹82,000 करोड़) हैं और वह मरता है तो उसके बच्चों को पूरे 10 बिलियन डॉलर मिलते हैं। जनता को उसमे से कुछ नहीं मिलता। यह कुछ मामले हैं जिन पर बहस और विचार होगा। जब हम सम्पत्ति दोबारा से बाँटने के बारे में बात करेंगे तो इसका मतलब नए कानून और नीतियों पर बात करना होगा।”

सैम पित्रोदा ने आरोप लगाया कि भारत के लोग अपने नौकरों को पैसा नहीं बांटते बल्कि उस पैसे से दुबई और विदेश घूमने टहलने जाते हैं। उन्होंने बताया कि कॉन्ग्रेस यदि सत्ता में आती है तो वह नौकरों और घर में काम करने वालों को कितना पैसा दिया जाए इसके लिए भी नियम बनाएगी।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी लगातार देश के लोगों के सम्पत्ति के सर्वे की बात कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस के मेनिफेस्टो में भी सर्वे की बात की गई है। राहुल गाँधी ने यह भी कहा है कि सर्वे के बाद सम्पत्ति का दोबारा से बँटवारा किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के इस चुनावी एजेंडे को लेकर हमला बोला है। उन्होंने कहा है कि कॉन्ग्रेस महिलाओं का मंगलसूत्र छीनना चाहती है। कॉन्ग्रेस के सम्पत्ति बँटवारे की योजना को लेकर सोशल मीडिया पर भी काफी विरोध हुआ है।