इंडिया टुडे ने अब वह स्कूल और हेडमास्टर खोज निकाला है जहॉं कभी रिया चकवर्ती ने पढ़ाई की थी। इसके जरिए भी इंटरव्यू की तरह ही इमेज गढ़ने की कोशिश की गई है।
राजदीप को ना ही रिया चक्रवर्ती से और ना ही सुशांत सिंह राजपूत से ही संवेदना है। वह बस TRP की रेस में किसी तरह खुद को खबरों में बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं।
पेट्रोल बम, एके-47, मानव बम और अत्याधुनिक हथियारों के बरअक्स एक स्वयंसेवक की लाठी यकीनन नाकाफी है, भले उसके मन में पहाड़ों सा साहस है लेकिन व्यवहारवाद यही कहता है कि बंदूक के आगे लाठी काम नहीं आती।
लेफ्ट-लिबरल्स को यह सवाल खुद से पूछना चाहिए कि क्या 'माय लाइफ माय रूल्स' का 'वोक' नारा भी सिर्फ पादुकोण या कपूर परिवार की बेटियों के अधिकारों के लिए ही है?