"अंकित शर्मा और उनके साथ कुछ लोग ताहिर के मकान के पास पहुँचे ही थे कि दंगाइयों की भीड़ झपट पड़ी। हमें ताहिर के घर में खींचने की कोशिश की। मैंने अपना हाथ झटके से छुड़ा लिया और वहाँ से दौड़ पड़ा। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वह तीनों ग़ायब थे।"
इस्लामी भीड़ और उनकी तैयारी को देखकर ऐसा लग रहा था कि वह पहले तो हिंदुओं की दुकानों और फिर हमारे मकानों को अपना निशाना बनाना चाहते थे। अच्छा हुआ दिल्ली पुलिस का कि उसने समय रहते हालातों को काबू में कर लिया।
अंकित शर्मा को 6 लोगों ने लगातार 2 से 4 घंटे तक 400 बार चाकुओं से गोदा होगा। साथ ही, उनकी आँत को शरीर से बाहर निकाल दिया था। फोरेंसिक डॉक्टरों ने कहा कि इस तरह से यातना का शिकार और क्षत-विक्षत बॉडी उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा।
जानकारी मिली कि इस्लामी भीड़ हिंदुओं के घरों को अपना निशाना बना रही है। हमने अपने-अपने चारों बच्चों को मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से निकाला और दूसरी गली में एक परिचित के घर पहुँचा दिया। हम इतने डर गए कि सोमवार को पूरे दिन और पूरी रात भूखे प्यासे बच्चों के साथ घर में कैद रहे।
मंदिर पर कब्ज़ा करने के साथ-साथ आसपास के घरों पर भी मुस्लिम भीड़ ने कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद मंदिर की छत से हिन्दुओं पर पत्थरबाजी शुरू हो गई। साथ ही ताहिर हुसैन की इमारत की छत से भी पत्थरबाजी हो रही थी।
चाँदबाग़ में एक पुल है, जिसके दूसरी तरफ़ मुस्लिम बहुल क्षेत्र हैं। स्थानीय लोग इस पुलिया को 'बॉर्डर' भी कहते हैं। ताहिर ने घर इस तरीके से बनाया है कि उससे चारों ओर का इलाक़ा कवर हो और अंदर जो भी लोग हों, वे एकदम सुरक्षित रहें।
26 फरवरी का यह वीडियो ताहिर हुसैन की शह पर हुए दंगे का एक और सबूत है। पढ़िए, कैसे मंदिर में फँसे पंडित और उनकी पत्नी को कुछ हिंदुओं ने जान जोखिम में डाल बचाया। कहाँ हैं उनकी दो जवान बेटियाँ?
"हमारी बहन-बेटियों को भी लाठी उठानी पड़ी है। दंगाई आएँगे तो सबसे ज्यादा ख़तरा उन्हें ही है। हमने अपनी बहन-बेटियों को कह रखा है कि अगर हमें कुछ हो जाएँ तो वो पहले अपनी जान बचाएँ या ख़ुद मर जाएँ।"
23 फ़रवरी की शाम दंगाई शाहदरा में घुसे। दिलबर सिंह नेगी को निशाना बनाया। हाथ, पैर काट दिए। फिर पास की दुकान में लगी आग में झोंक दिया। इसके बाद वहॉं भगदड़ मच गई। नेगी के परिजन इतने दहशत में हैं कि अब भी मौके पर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे।