मृत शरीर के भी कुछ अधिकार होते हैं, सम्मानजनक अंतिम संस्कार के। दुर्भाग्य से, भारत देश में ये आतंकियों को तो सहज उपलब्ध है लेकिन बेचारे हिन्दुओं को नहीं।
नाइयों ने श्राद्ध के काम के लिए सामान ना होने का बहाना बनाया तो वहीं पुरोहितों ने मामला पुलिस के पास होने के चलते आने से मना किया। चंदन दास के परिजनों ने कहा कि असल वह डर है।
हिन्दू पीड़िता ने बताया है कि कमाल अशरफ उस पर एक और मुस्लिम इब्राहिम अहमद के साथ संबंध बनाने के लिए दबाव डाल रहा था। ऐसा ना करने पर उसके गुप्तांगों को चोट पहुँचाई गई।
कश्मीर से हिन्दुओं को भगा दिया गया, तो क्या उनकी संपत्तियाँ 'वक़्फ़ बाय यूजर' हो गईं? कल को मुर्शिदाबाद में भी यही होगा। सुप्रीम कोर्ट हिन्दुओं के मामले में क्यों माँगता है काग़ज़?