केरल का कोल्लम कभी काजू उद्योग की वैश्विक राजधानी माना जाता था। यहाँ काजू उद्योग से आने वाले रुपयों से लाइब्रेरी से लेकर होटल तक बने। इतना ही नहीं, दादा साहब फाल्के अवॉर्ड जीतने वाले निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन भी इसी उद्योग की वजह से फ़िल्में बना पाए।
सोने के इस नए दरवाजे के एक पल्ले पर माता लक्ष्मी और दूसरे पर आरती उकेरी गई है। दरवाजे के ऊपरी हिस्से में देवी दुर्गा, भगवान गणेश और हनुमान के साथ ही अन्य देवी-देवता भी होंगे।
पटनायक दावा करते हैं कि वेदों में कहीं भी भगवान शिव का ज़िक्र ही नहीं है। इसके बाद भारतीय इतिहास के बारे में ट्वीट करने वाला मशहूर ट्विटर हैंडल 'true Indology' ने उन्हें पलट कर जवाब में वह वैदिक ऋचा बता दिया, जिसमें भगवान शिव को उनके अन्य नामों शम्भु, शंकर, पशुपति के अलावा "शिव" नाम से भी नमस्कार किया गया है।
ये मंदिर 51 शक्तिपीठों की प्रतिकृतियाँ होंगी। रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने बताया है कि इसके साथ ही रॉक-कट मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध देवतामुरा और उन्नावकोटी पहाड़ियों के लिए एक हेलीकाप्टर सेवा भी शुरू की गई है।
सबरीमाला मंदिर बीते दिनों महिलाओं के प्रवेश को लेकर काफी चर्चा में रहा था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने के बाद लाखों श्रद्धालु (जिनमें महिलाएँ भी शामिल थीं) सड़क पर उतरे थे। केरल की सरकार ने इस विरोध-प्रदर्शन को दबाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल किया था।
एसजेटीए ने इन मठों को जगन्नाथ मंदिर की संपत्ति बता कर ढाहना शुरू कर दिया। सरकार का कहना है कि इन मठों के बिल्डिंग सुरक्षित नहीं हैं और इसीलिए इन्हें हटाना ज़रूरी है। लांगुली मठ 300 वर्ष पुराना था। इसे रैपिड एक्शन फाॅर्स और पुलिस की मौजूदगी में ढाह दिया गया। 900 वर्ष पूर्व निर्मित एमार मठ को भी नहीं बख्शा गया।
रंगराजन ने अर्चक पर झूठे आरोप को दुर्भाग्यपूर्ण और पुलिस के अधिकार-क्षेत्र के बाहर बताते हुए पुलिस पर उन्हें प्रताड़ित करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने राज्य के Endowments विभाग से दो सवाल भी पूछे......
हिन्दू खुद ही न इस मुद्दे पर जागरुक है न उद्वेलित, इसलिए सरकारें भी मस्त नींद से ग्रस्त हैं। जानना ज़रूरी है कि मंदिरों की हुंडी में, दान-पेटिका में जो पैसा श्रद्धालु अपने देवता के प्रति कृतज्ञता में, मंदिर के काम के लिए, पुजारी जी की आजीविका के लिए डालते हैं, उस पैसे पर सरकारें कैसे डाका डालती हैं।
समुदाय विशेष को यह सोचने की ज़रूरत है कि विवेकानंद के 'सर्व-धर्म-समभाव' वाले पन्ने पर क्यों विभाजन की खूनी दास्ताँ लिखी, क्यों मुस्लिम-बहुल कश्मीर को हिन्दू-बहुल भारत का साथ मंज़ूर नहीं और क्यों कश्मीरी पंडितों के साथ वो किया, जो उन्हें नहीं करना चाहिए था।