शक्ति का प्रत्युत्तर शक्ति से ही देना होगा, तभी म्लेच्छ शक्तियों की पराजय निश्चित होगी

आक्रमण दसों दिशाओं से हो रहा है। सनातन धर्म के ध्येय वाक्यों को, परंपराओं को, त्योहारों को, रीति-रिवाजों को या तो कालबाह्य करार दिया जा रहा है, या मैकाले-मुल्ला-मार्क्स के जारज पुत्र, ये नाबदानी कीड़े उन्हें हास्यास्पद बना कर पेश कर रहे हैं।

विजयादशमी के इस पावन अवसर पर जब “जयंती-उत्पाटन” कर सुबह आसन पर बैठा, तो कई तरह के विचार दिमाग में कौंधते रहे? बस, इन 20-25 वर्षों में आखिर यह कैसी प्रदूषणकारी हवा बही या फिर यह दूषण समाज में मौजूद ही था, क्वचित अब वह उघड़ गया है, क्वचित हम ही कुछ अधिक सावधान हो गए हैं, जो ये सारा तलछट अब मुख्यधारा बन गया है। आखिर, इसके अलावा और क्या कारण होगा कि कहीं माँ दुर्गा को मूलनिवासी-आंदोलन के नाम पर गालियाँ दी जा रही हैं, तो कहीं दुर्गा-मंडप से अजान दी जा रही है।

इधर एक नया बवाल चला है, रावण को ब्राह्मण, महात्मा सिद्ध करने का। अब तक तो छिटपुट लोग ही रावण-दहन के नाम पर अपनी कुत्सा और कुंठा निकालते थे, इस बीच “अपने अंदर के रावण को मारने” या फिर, भाँति-भाँति के कुतर्क से उसे सर्वश्रेष्ठ महानुभाव सिद्ध करने की होड़ मची है। इन सब से भी बात नहीं बनी, तो एक विदुषी पैदा हो गईं यह दावा करने को कि हिंदुत्व का तो निर्माण (प्रभु, अब उठा ही लो…) ही 20 वीं सदी में किया गया ताकि इसके दुर्गुणों को छुपाया जा सके।

ऐसे नाबदानी कीड़े इस देश में हैं, समाज में हैं, यहाँ की मुख्यधारा में हैं, यहाँ तक कि मुझ तक पहुँच जा रहे हैं जो तथाकथित न्यूज और इंटरनेट से ठीकठाक दूरी बरकरार रखता है। मैं यह सोच रहा हूँ और ‘राम की शक्ति पूजा’ मुझे याद आ रही है… खुद मर्यादा पुरुषोत्तम राम को भी जब निराशा घेरती है, वह पंक्तियाँ याद आती हैं,

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“बोले रघुमणि- “मित्रवर, विजय होगी न समर,
यह नहीं रहा नर-वानर का राक्षस से रण,
उतरीं पा महाशक्ति रावण से आमन्त्रण,
अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति।” (राम की शक्ति पूजा, निराला)

आक्रमण दसों दिशाओं से हो रहा है। सनातन धर्म के ध्येय वाक्यों को, परंपराओं को, त्योहारों को, रीति-रिवाजों को या तो कालबाह्य करार दिया जा रहा है, या मैकाले-मुल्ला-मार्क्स के जारज पुत्र, ये नाबदानी कीड़े उन्हें हास्यास्पद बना कर पेश कर रहे हैं।

राजनीतिक मसलों को धर्म और अध्यात्म में घुसेड़ कर ‘उलटबांसी’ के जरिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर का मसला बना रहे हैं। आपसी मारपीट या किसानों के गुस्से का शिकार बने लोगों को जबरन हिंदू आतंक (क्या सचमुच!) का शिकार बनाकर पेश करना कितना जायज है? ट्रेन की सीट के लिए हुए झगड़े को मॉब-लिंचिंग बनाना कहाँ तक जायज है? अखलाक को तो बारहां शहीद की तरह पेश किया जाता है, लेकिन डॉक्टर नारंग की चर्चा क्यों नहीं? अंकित की बात कोई क्यों नहीं करता?

और, ये नैरेटिव इस कदर आपके दिमाग पर बिठा दिया गया है कि नए-नकोर बच्चे रवीश या गौरी लंकेश को अपना आदर्श मान लेते हैं, जो केवल और केवल झूठ, नफरत और सांप्रदायिकता के पैरोकार हैं। वे उर्मिलेश यादव और पुण्य प्रसून या शेखर गुप्ता को पत्रकारिता का पैमाना मानता है, जो केवल और केवल एजेंडा-सेटर हैं, कॉन्ग्रेस-कम्युनिस्ट युति के पक्षकार हैं।
…और, फिर एक बार राम याद आते हैं…

“आया न समझ में यह दैवी विधान।
रावण, अधर्मरत भी, अपना, मैं हुआ अपर,
यह रहा, शक्ति का खेल समर, शंकर, शंकर!
करता मैं योजित बार-बार शर-निकर निशित,
हो सकती जिनसे यह संसृति सम्पूर्ण विजित,
जो तेजः पुंज, सृष्टि की रक्षा का विचार,
हैं जिसमें निहित पतन घातक संस्कृति अपार। (राम की शक्ति पूजा, निराला)

और, फिर उसी राम की शक्ति-पूजा के जाम्बवंत याद आते हैं, जो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम तक को बोध देने की शक्ति रखते हैं, यही तो है सनातनी पाठ, मर्यादा और शक्तिः-

विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,
हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,
तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर।
रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त
तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त,
शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन।
छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनन्दन! (राम की शक्ति पूजा, निराला)

जब स्वयं माँ अंबे का हाथ हमारे सिर पर आशीष के तौर पर सज्जित है, तो घबराहट कैसी? जब स्वयं बाबा भोलेनाथ हमारे जगत के खेल को अपने डमरू के वादन के साथ सहास्य देख और संभाल रहे हैं, तो बेचैनी कैसी?

हाँ, हमें मौलिक आराधना करनी होगी, शक्ति का प्रत्युत्तर शक्ति से ही देना होगा, शिव और शक्ति को एक साथ साधना ही होगा, तभी इन म्लेच्छ शक्तियों की पराजय निश्चित होगी। जब तक सिद्धि न हो, समर को टाल कर सिद्धि करनी होगी… बंधुओं और उस सिद्धि का समय अभी है, ठीक अभी…।

लेखक: व्यालोक पाठक

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