Thursday, July 16, 2020
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राम मंदिर की जगह स्कूल-अस्पताल बनवाने की बात करने वाले बुद्धिमानों के नाम कुछ बातें

जहाँ भी मंदिर था वहाँ तो बिना किसी संशय के पहले से बड़ा मंदिर बने ताकि उन मुसलमान बलात्कारी आतंकवादियों और उनकी शैतान औलादों को यह ध्यान में रहे कि काल करवट ले कर दोबारा जब उसी भगवान के अनुयायियों को शक्ति देता है, तो वो वही भगवान है जो अपनी रक्षा को खड़ा होता दिख रहा है।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

एक ट्वीट पढ़िए। हैंडल वाले का नाम मुसलमानों वाला है, बाबरी मस्जिद को लेकर जज्बाती है और इमोशनल हो कर लिखता है: अयोध्या में पाँच सौ साल पुरानी एक मस्जिद हुआ करती थी। उस मस्जिद को आतंकवादियों ने 6 दिसंबर 1992 को तोड़ दिया। इन आतंकवादियों पर अदालती कार्रवाई होनी चाहिए और सरकारी खर्चे पर वहाँ एक मस्जिद अवश्य ही बननी चाहिए। और हाँ, एक स्मारक भी बनाई जानी चाहिए वहाँ। वही न्याय होगा। हैशटैग रीबिल्ड बाबरी मस्जिद!

आसिफ खान का ट्वीट

जज्बाती मुसलमान आसिफ खान ने बाबरी को तोड़ते हुए लोगों की तस्वीर भी साथ में लगाई। आसिफ खान एक महत्वपूर्ण बात भूल गया कि भारत का इतिहास 500 साल पुराना नहीं है, न ही कोई ‘सरयू घाटी सभ्यता’ सोलहवीं शताब्दी में आई थी। उस पुराने मस्जिद के पहले वहीं और भी पुराना मंदिर था। उस पुराने मंदिर को इस्लामी आतंकियों ने तोड़ा था। इसलिए न्याय की इच्छा करने वाले पहले तो हिन्दुओं के साथ न्याय करें और उन आतंकियों के पूरे खानदान को कोर्ट में ला कर पूछें कि क्या अपने बाप-दादाओं के आतंक के लिए माफी माँगते हो? फिर उनसे उस मंदिर के निर्माण के लिए पैसे लिए जाएँ और वहाँ राम हो।

कल अयोध्या राम मंदिर मामले की सुनवाई खत्म हो गई, हिन्दुओं को लग रहा है कि फैसला उनके पक्ष में आएगा, मुसलमान सोच रहे हैं कि कुछ सेकुलर टाइप बात हो जाएगी। मुसलमान पक्ष की तरफ से बार-बार विचित्र दलीलें भी दी गईं जिसमें वराह की मूर्ति को बच्चों का खिलौना कहने से ले कर दीवारों पर संस्कृत में उकेरे श्लोकों को ‘मस्जिद/दरगाह/ईदगाह बनाने वाले मजदूरों ने लिख दिया होगा’ जैसी बातें शामिल हैं।

फिर सुन्नी वक्फ बोर्ड ने शर्तें रखीं कि वो अपना दावा छोड़ देंगे अगर सरकार अयोध्या के 22 मस्जिदों के रखरखाव की जिम्मेदारी ले, जहाँ मंदिर है या मस्जिद है, उसे उसी सूरत में देखा जाए (यानी उस पर कहीं भी कोई केस न करे), और एक कमिटी बना कर यह देखा जाए कि ASI के नियंत्रण में जो भी धार्मिक/मजहबी स्थल हैं, उनकी स्थिति क्या है।

सुन्नी वक्फ बोर्ड दावा रखे, छोड़े या धरती पर से गायब ही हो जाए, उससे इस केस पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। ये कितनी महीन बात है कि जिस अयोध्या में इस्लामी आतंकियों के विध्वंस की इबारत हर तरफ लिखी हुई है, वहाँ के मस्जिदों के रखरखाव का जिम्मा सरकार ले। वही सरकार जो हिन्दुओं के मंदिरों से आने वाली आय और खर्चे पर अपना नियंत्रण रखती है। मतलब, एक तरीके से हिन्दुओं के मंदिरों का खर्चा उन मस्जिदों के रखरखाव के लिए जाए, जो हो सकता है कि किसी मंदिर को ही तोड़ कर बनाई गई हो।

अब बात क्यूट लोगों की

फैसला तो भी आए, क्यूट लोगों ने दो तरह के प्रपंच फैलाने शुरु कर दिए हैं। पत्रकार शिरोमणि फेसबुक पर ज्ञान दे रहे हैं कि टीवी मत देखिए और मंदिर-मस्जिद मत कीजिए, सामाजिक सौहार्द बनाए रखिए। सही बात है, सामाजिक सौहार्द बना रहना चाहिए। इसके लिए उन लोगों को ज्यादा कोशिश करनी चाहिए जो बात-बात पर पत्थर ले कर ऐसे खड़े हो जाते हैं मानो कंगारुओं की तरह थैली के साथ पैदा हुए, और जीवन भर ज्ञान की जगह राह चलते वही पत्थर इकट्ठा किया जो इनकी अक्ल पर पड़े थे।

हिन्दुओं का क्या है, बुनियादी तौर पर सहिष्णु लोग, कभी एक मस्जिद नहीं तोड़ी, न किसी को जबरदस्ती कन्वर्ट किया, न लव-जिहाद टाइप के घटिया खेल खेलते हैं, न ही व्हाट्सएप्प मैसेज पढ़ कर आतंकियों को बचाने पत्थर ले कर पुलिस और सेना की राह में खड़े हो जाते हैं, न ही रात के एक बजे छतों पर बैठ कर मुसलमानों को मजहबी जुलूसों पर पत्थर बरसाते हैं… ऐसे लोग तो फंडामेंटली सौहार्दप्रेमी हैं। दूसरे पक्ष वालों को पत्रकारश्रेष्ठ के आह्वान पर थैलियों के पत्थर खाली कर के, सामाजिक समरसता और सर्वधर्म समभाव हेतु भव्य मंदिर के निर्माण हेतु गगनभेदी ध्वनि में ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करना चाहिए।

दूसरे तरह के क्यूटाचरण करने वाले वो क्यूट प्राणी हैं जो ऐसा कहते ही नहीं, मानते भी हैं, कि मंदिर-मस्जिद से क्या मिलने वाला है, वहाँ एक स्कूल या अस्पताल बनवाना चाहिए लाखों लोगों का भला होगा। सुनने में बहुत कर्णप्रिय और तार्किक लगता है ये वाक्य। लगता है कि कितनी सही बात कह दी गई है। आश्चर्य होता है कि आज के साम्प्रदायिक दौर में भी ऐसी भावना के साथ, मानवता के लिए सोचने वाले लोग हैं।

क्या सच में ऐसा है? एक समय मैं भी यही सब सोचा करता था। फिर मुझे याद आया कि जिस धर्म के हजारों बड़े मंदिर तोड़ दिए गए, उनकी आस्था पर सिर्फ इस मकसद से हमला किया गया कि ये टूट जाएँ और यह विश्वास करने लगें कि उनका भगवान भी स्वयं के घर की रक्षा नहीं कर पा रहा, और अंततः दूसरे मजहब में मतपरिवर्तन के साथ चले जाएँ, उस धर्म के लोग जब अपनी आस्था को पहचानने को खड़े हुए हैं तो उन्हें स्कूल और हॉस्पिटल की याद दिलाई जा रही है?

हिन्दुओं के लिए मंदिर उनके जीवन का हिस्सा है। स्कूल और कॉलेज की बात करने वालों के नालंदा विश्वविद्यालय की याद दिलाना चाहूँगा। साथ ही यह भी कहूँगा कि जिसने उस विश्वविद्यालय को तोड़ा, उसके वंशजों को, उसके नाम को याद करने वालों को, उस बलात्कारी आतंकवादी मुसलमान बख्तियार खिलजी को महान योद्धा मानने वालों को अपनी जमीन, अपना पैसा और अपना पसीना दे कर हजारों स्कूल और कॉलेज खुलवा कर भारतीय समाज को शिक्षित करने की बात सोचनी चाहिए।

जिन लुटेरों और आतंकियों को कुछ लोग सिर्फ इसलिए महान बताते हैं, और उसे महान लिबरल शासक कहते हैं क्योंकि उसने हिन्दुओं को सताया, उसके मंदिर ध्वस्त किए और लाखों को तलवार की नोक पर मुसलमान बनाया, उनके वंशजों और मानने वालों के हाथ लाखों हिन्दुओं का रक्त है। इसलिए बेशक स्कूल भी बने और अस्पताल भी, लेकिन वो मुसलमानों की जमीन पर बने, उसके पैसों से बने। इस पाप का प्रायश्चित वही लोग करें, जिन्होंने हिन्दू आस्था पर आघात किया था।

जहाँ भी मंदिर था वहाँ तो बिना किसी संशय के पहले से बड़ा मंदिर बने ताकि उन मुसलमान बलात्कारी आतंकवादियों और उनकी शैतान औलादों को यह ध्यान में रहे कि मंदिर तोड़ कर तुम उसके भगवान द्वारा स्वयं को न बचा पाने का उपहास तो कर सकते हो, लेकिन काल करवट ले कर दोबारा जब उसी भगवान के अनुयायियों को शक्ति देता है, तो वो वही भगवान है जो अपनी रक्षा को खड़ा होता दिख रहा है।

हिन्दुओं के लिए इस्लामी आतंक बिलकुल नई चीज थी

हिन्दुओं को रौंदा गया क्योंकि वो तैयार नहीं थे। उन्हें यह पता ही नहीं था कि कोई पतित व्यक्ति या मजहबी उन्मादियों का समूह किसी दूसरे की भूमि पर कब्जा करने भी आ सकता था। उन्हें यह बात इसलिए पता नहीं थी क्योंकि उन्होंने कभी इस तरह की बातों पर विचार ही नहीं किया था, उनके सामने यह परिस्थिति कभी आई ही नहीं कि ऐसा करने की ज़रूरत क्या है?

जब आपके पास अपना जीवन जीने के और मानवता की भलाई के लिए कार्य करने के अलावा और कोई उद्देश्य ही न हो, तो फिर आप किसी ऐसी लड़ाई की तैयारी कैसे करेंगे जो आपकी कल्पना या तार्किकता से परे हो। जिस धर्म के लोग अपनी गोष्ठियों का अंत ‘प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो’ से करते हों, उनके लिए यह सोचना कि किसी दूसरे मजहब के लोगों पर आक्रमण कर के, उनकी आस्था के प्रतीकों को आग लगा कर, उसके ज्ञान के भंडार को तबाह कर के, अपनी सत्ता स्थापित करना स्वभाविक है, समझ से परे है।

इसलिए हिन्दू कभी भी तैयार नहीं था। ऐसे इस्लामी आतंकी दरिंदों के लिए तो बिलकुल नहीं जो सिर्फ लूटने नहीं आते थे, बल्कि बलात्कार करना, मंदिर तोड़ना, गाँवों में आग लगाना उनके लिए आनंद देने वाली बातें थीं। इसलिए शक्ति के प्रदर्शन से एक पूरी पीढ़ी कुचल दी गई, उसका इतिहास मिटा दिया गया। उसके बाद जो इतिहास लिखा गया उसमें हमने प्रेरक कहानी में उस आतंकवादी की कहानी पढ़ी जो सत्रहवीं बार के आक्रमण में सफल होता है। उसके बाद जो इतिहास लिखा गया उसमें उन्मादी मुसलमान शासकों को उदारवादी बताया गया।

उसके बाद जो इतिहास लिखा गया उसमें यह बताया गया कि भारत की सांस्कृतिक विरासत तो उन्हीं मुगलों की दी गई है। फिर हमें ताजमहल दिखा दिया गया, फिर हमें लाला किला दिखा दिया गया, फिर हमें उनकी कब्रें दिखा दी गईं और कहा गया कि देखो, इनके बापों ने तुम्हें लूटा, बलात्कार भी किया, लेकिन बिरयानी की रेसिपी भी तो दी। फिर एक धोखे से स्कोडा-लहसुन तहजीब का वास्ता दिया जाने लगा कि अल्पसंख्यक हैं, इन्हें इनके हिसाब से चलने दो, बजाने दो लाउडस्पीकर, उन्हीं लाउडस्पीकरों से मजहबी उन्माद का ज़हर भरने दो शुक्रवार की शामों को, थोड़ा सहन करना सीखो, बड़े दिलवाले बनो।

हम सब कुछ बने। हमने बलात्कारी मुसलमानों के नाम उसी जगह शहर बसा दिया जहाँ नालंदा के खंडहर मौजूद हैं। हमने इस्लामी आतंकियों के नाम सड़के बनवा दीं और याद किया कि भारत में तो जो भी व्यवस्था है इन्हीं शासकों ने दी है। हमें कहा गया कि धन्यवाद दो इन्हें कि ये अंग्रेजों की तरह लूट कर कहीं ले नहीं गए, यहीं बसे रहे। कितना क्यूट तर्क है! मैं तुम्हारे घर में घुसूँ, तुम्हारी माँ-बहनों का बलात्कार करूँ, गहने-जेवर लूट लूँ, और उसी मकान के एक कमरे में रहने लगूँ और अपने भोजन के लिए तुम्हीं से बिरयानी बनवाऊँ, और बाद में मेरे समर्थक, तुम्हारे संबंधियों को यह बताते फिरें कि कैसे कृतघ्न लोग हो, तुम्हें बिरयानी बनानी सिखाई, शांति से साथ रहना सिखाया और तुम लोग बस उसके पीछे ही पड़े हो!

इसलिए स्कूल-कॉलेज-अस्पताल नहीं, बनेगा तो मंदिर ही

उसी ऐतिहासिक मजहबी गलती को धार्मिक रूप से सही करना ज़रूरी है। जो स्कूल-अस्पताल का तर्क देते हैं, उनके लिए मेरे पास एक समाधान है। मुसलमान भाइयों को नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद की ज़रूरत नहीं होती। वो सड़कों पर, पार्कों में, रेलवे ट्रैक से लेकर किसी भी खाली जगह पर अपने पाक इलाके की तरफ सर करते हुए नमाज पढ़ सकते हैं। इसलिए, मानवता की भलाई और सामाजिक सौहार्द के लिए उन्हें नई मस्जिदों की जगह स्कूल और अस्पताल ही बनवाने चाहिए।

हो सके तो पुराने स्थलों को भी उसी हिसाब से मेकओवर कर के स्कूल-कॉलेज आदि बनवा देना चाहिए। लाखों लोगों का भला होगा। लोगों को ज्ञान मिलेगा, बीमारियों से (जिसमें मानसिक बीमारी भी आती है) निजात मिलेगी और वो बाजारों में फटने से, कहीं बम रखने से, किसी आतंकी वारदात को अंजाम देने से बच जाएँगे। इसलिए जिन्हें जिस चीज की ज़रूरत है, उन्हें वह मुहैया कराई जाए।

हिन्दुओं के साथ तो समस्या है कि वो मंदिर में ही पूजा कर सकते हैं। जितना बड़ा मंदिर, उतने ज्यादा लोग एक साथ, मूर्ति को पूजने आते हैं। इससे लाखों नहीं, करोड़ों लोगों का भला होता है। देखिए, हमारी किताबों में लिखा है कि पूजा आदि के लिए मंदिर का होना ज़रूरी है। उसमें जो मूर्ति होती है, उसकी प्राण-प्रतिष्ठा के बाद वो पूरा इलाका ही जाग्रत हो जाता है और उसमें देवी/देवता का अंश प्रकट हो जाता है। इसलिए मंदिर जितने ज़्यादा होंगे, उतने ही ज़्यादा हिन्दुओं का लाभ होगा, वो धार्मिक बनेंगे।

हिन्दुओं के ज्यादा धार्मिक होने से सबको फायदा है क्योंकि हिन्दू कभी भी सामूहिक रूप से धार्मिक हो कर, योजनाबद्ध तरीके से किसी दूसरे मजहब या रिलीजन वालों पर हमला नहीं करता, जमीन नहीं हड़पता, बलात्कार नहीं करता, विश्वविद्यालयों में आग नहीं लगाता। वो धार्मिक होता है तो हर जीव से प्रेम करता है, प्राणियों में सद्भावना देखता है, विश्व के कल्याण की बातें करता है। उसको अपने धर्म के प्रचार द्वारा ‘कन्वर्जन’ जैसी बेहूदगी नहीं करनी होती। कुल मिला कर हिन्दू जब धार्मिक होता है तो वो चिल्ड-आउट रहता है और आदरपूर्वक एक दूसरे को ‘जय श्री राम, ब्रो!’ कह कर आनंद पाता है।

वहीं दूसरे मजहब के लोग जब मजहबी होते हैं, तो उन पर दबाव आता है कि तुमने पाँच काफिरों को अपना बनाया या नहीं, जवान हो गए लेकिन लव जिहाद तो किया ही नहीं, तुमने जन्नत में इंतजार में बैठी 72 हूरों के लिए तो अपने आप को फोड़ा ही नहीं! इतने ज्यादा मजहबी नहीं भी हुए तो भी, आतंकी वारदातों पर मौन सहमति तो देते ही हैं कि हमें क्या, हमारे लोग थोड़े ही मरे हैं। हमारे तो आतंकी भी मरेंगे तो हमारे नेता कह ही देंगे कि हमारे लोग सरकार में होते तो उन्हें फाँसी नहीं होती।

हिन्दुओं को कट्टर बता कर, उन्हें सद्भावविरोधी बताने की साजिशें

यही अंतर है। और ये अंतर बुनियादी है। ये अंतर इतना व्यापक है इसलिए बीच-बीच में इस तरह की बातें होती हैं जिसमें उनके हजारों सालों के आतंक को, लाखों गिराई गई लाशों को, हजारों तबाह किए मंदिरों के अपराध को किसी बिगड़ैल लड़के द्वारा किसी दूसरे को ‘जय श्री राम‘ कहलवाने की बात के बराबर रख दिया जाता है। तब ‘जय श्री राम’ के नारे की भयावहता उस नारे के समकक्ष हो जाती है जो आईसिस के झंडे पर छपा है। आप सोचिए कि हजारों लोगों को जिस संगठन में मजहबी उन्माद के नाम पर मार दिया, उसके अपराध का भार, किसी एक लड़के द्वारा किसी को थप्पड़ मारने के बराबर कर दिया जाता है।

ये अंतर इतना व्यापक और बुनियादी है इसीलिए ‘भगवा आतंक’ जैसे शब्दों की रचना की जाती है ताकि उसे इस्लामी आतंक के समकक्ष रखा जा सके। ताकि कहा जा सके कि हिन्दू भी तो आतंकी हैं। सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए ऐसी बातों को तूल दिया गया कि दूसरे मजहब का सर्वव्याप्त आंतक एक फर्जी आरोप वाले ‘हिन्दू टेरर’ के सामने बौना पड़ जाए।

फिर जब परतें उतरने लगीं, किलों में दरार पड़ने लगे, सत्य सर उठाने लगा तो चोरों को शहीद बताने की मुहिम चली। हर अपराध के पीछे ‘जय श्री राम’ घुसाया जाने लगा, ताकि ‘हिन्दू आतंकी’ की थ्योरी जिंदा रहे। सारी खबरें गलत साबित हुईं, सबने माना कि उन्होंने बस ऐसे ही ‘जय श्री राम’ वाली बात जोड़ दी। लिंच तो हिन्दू भी बहुत हुए, मुसलमानों से अधिक हुए, मुसलमानों द्वारा हुए, लेकिन उन खबरों को छापा ही नहीं गया। गौरक्षकों की मुसलमानों द्वारा लगातार हत्याएँ होती रहीं, और उल्टे कहा जाता रहा कि गौरक्षक ही आतंकी हैं।

मंदिर हजार साल पहले भी तोड़े गए थे, मंदिर आज भी चाँदनी चौक में तोड़े जाते हैं। तब घोड़े पर बाहर से आए मुसलमान आतंकी होते थे, अब यहीं बसे वो अल्पसंख्यक होते हैं जो स्कोडा-लहसुन तहजीब का चूरण फाँकते हुए शिवलिंग पर पेशाब करते हैं, विसर्जन के जुलूस पर पत्थर फेंकते हैं, काँवड़ियों पर पत्थर फेंकते हैं, दुर्गा पूजा की मूर्तियों की गर्दन तोड़ते हैं, रामनवमी के जुलूस पर चप्पल फेंकते हैं… कितनी बार, और कितनी घटनाएँ गिनाऊँ इन ‘डरे हुए’ लोगों की ?

हमें हमारे मंदिर लौटा दो, पत्थरबाजी बंद करो

स्कूल-अस्पताल हम तब भी बनवाते थे, अब भी बनवा रहे हैं। उसका बजट अलग है। संस्कृति और आस्था का बजट अलग है। वो भी ज़रूरी है, ये भी ज़रूरी है। वो वर्तमान सुधारने के लिए ज़रूरी है, ये भूत में हुई गलतियों को वर्तमान में सुधार कर, भविष्य में सनातन आस्था के दीप को प्रज्ज्वलित रखने के लिए आवश्यक है। किसी की आस्था या धार्मिक विश्वास से किसी को नुकसान न पहुँच रहा हो, तो उसके अस्तित्व में आने या न आने पर चर्चा की गुंजाइश खत्म हो जाती है। यहाँ आस्था पूजा के लिए है, खिलाफत लाने के लिए नहीं कि पूरी धरती एक ही मजहब के नीचे आनी चाहिए, नहीं आई तो रास्ते में आने वाले काफिरों को काटते चलो, ऊपर एक सुइट बुक है।

इसलिए तर्क चाहे कितना भी क्यूट क्यों न लगे, उसे उसके क्यूटत्व पर मत स्वीकारिए। उसके पीछे के विचारों को परखिए। मंदिर से सद्भाव फैलता है, शांति आती है, लोग धार्मिक काम करने को प्रेरित होते हैं। और इस धर्म में कभी भी यह नहीं सिखाया गया कि दस गैर-हिन्दू को हिन्दू बना दो, पूरी धरती पर सनातन धर्म का ही शासन रहे, यहाँ किसी गैर-हिन्दू पर धर्म के नाम पर ट्रक चढ़ा दोगे तो स्वर्ग में अप्सराएँ रोमेंटिक गीत गाएँगी और यू विल हैव अ गुड टाइम देयर! ये हिन्दुओं में नहीं होता।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
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