चलते-चलते कोरोना तक पहुँचे हैं। एक वर्ष पहले से किसी आशा में बैठे थे। विशेषज्ञ को लाकर चैनल पर बैठाया। वो बोला; इतने बिलियन संक्रमित होंगे। इतने मिलियन मर जाएँगे।
पश्चिम बंगाल में चुनाव समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। इस दौरान हिंसा की कई घटनाएँ सामने आई है। क्या नतीजों के बाद दशकों पुराना राजनीतिक हिंसा का दौर थमेगा?
स्वदेशी वैक्सीन पर दिन-रात अफवाह फैलाने वाले आज पूछ रहे हैं कि सब को वैक्सीन पहले क्यों नहीं दिया? क्या कोरोना वॉरियर्स और बुजुर्गों को प्राथमिकता देना 'भूल' थी?
गिद्धों की पाँत फिर से वैसे ही बैठ गई है। फिर से हेडलाइन के आगे प्रश्नवाचक चिन्ह के सहारे वक्तव्य दिए जा रहे हैं। नेताओं द्वारा फ़र्ज़ी प्रश्न उठाए जा रहे हैं। शायद फिर उसी आकाँक्षा के साथ कि भारत कोरोना के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई हार जाएगा।
ये स्वीकारना होगा कि इसकी शुरुआत तभी हो गई थी जब बिहार में चुनाव हो रहे थे। लेकिन तब 'स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर' वालों ने जैसे नियमों से आँखें मूँद ली थी।
ऐसा लगता है कि कॉन्ग्रेस ने मान लिया है कि सोनिया या राहुल के पत्र गंभीरता नहीं जगा पाते। उसके पास किसी भी तरह के पत्र को विश्वसनीय बनाने का एक ही रास्ता है और वह है मनमोहन सिंह का हस्ताक्षर।