सामाजिक मुद्दे

किसानों को जिम्मेदार ठहरा कर नाकामी छिपाने वालो, जरा प्रदूषण के असली कारकों पर भी गौर कर लो

पंजाब-हरियाणा का पानी किसान पी जाता है। दिल्ली में प्रदूषण भी किसान ही फैलाता है। ऐसी दलीलें देकर असली समस्याएँ छिपाई जा रही हैं। अगर आप सोचते हैं कि किसान 14 लाख की मशीन ख़रीद कर कटाई करे तो आपको जमीनी समझ नहीं। सरकारें और एमएनसी के इस जाल के जंजाल को समझिए।

काले बाल ब्राह्मणों की साजिश, मूल निवासियों को दो हर जगह नीले बाल: दिलीप सी मंडल

सत्ता के लिए भीम को मीम के साथ आना पड़ा। गेस्टहाउस कांड वाले बुआ-भतीजा हो गए। बात दलितों की कभी हुई ही नहीं, बात हमेशा गणित की, सीट पाने की, सत्ता में पहुँचने की थी। लालू-मुलायम-माया-सोनिया आदि ने दलितों-गरीबों को दलित और गरीब रखने पर विशेष काम किया।

हिन्दुओं को भला-बुरा कह ‘कूल’ बनीं शबाना: बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, दूसरी बीवी सुभान अल्लाह

कम्बोडिया के गणेश की प्रतिमा को लेकर हिन्दू धर्म को गाली देने पर हो सकता है कि शबाना आज़मी 'कूल' कही जाएँ लेकिन यह सवाल तो बनता है कि क्या उन्होंने बकरीद पर ख़ुद के मजहब को कोई सीख दी है? अन्य मजहबों को बधाई और हिन्दू धर्म को सीख- वाह बॉलीवुड वाह।

ओवैसी जी, मदरसों से बाहर आओ, आतंकी के जनाजे में जाना बंद करो, ‘हलाला’ को निजी मसला मत कहो, सुधार होगा

ओवैसी ने कभी यह सोचा है कि मदरसों में जो सीमित शिक्षा मिलती है, उसके आधार पर क्या मुस्लिमों को नौकरी मिलेगी? क्या वो मुख्यधारा का हिस्सा बनने को तैयार हैं? क्या मजहबी शिक्षा के साथ-साथ दुनिया के हर कोने में प्रचलित शिक्षा को मुस्लिम स्वीकारेगा? या फिर वो आज भी गणित और विज्ञान को 'शैतान' की बातें मान कर आगे बढ़ने की आस लगाए रहेगा?

सोचिएगा कामरेड! कैसे बदला ‘उत्तम खेती, मध्यम बान, नीच चाकरी, भीख निदान’ की कहावतों का देश

दिल्ली जैसे राज्यों में अंग्रेजों के दौर से ही गाय पालने पर पाबंदियाँ हैं। आस-पड़ोस के राज्यों से जब पशु घटे और खेत में पुआल जलने लगा तो धुआं दिल्ली तक भी पहुँचने लगा। अब साँस लेने में दिक्कत हो रही हो, तो परेशानी की जड़ में भी जाने की सोचिएगा कामरेड।

‘हम दो, हमारे दो’ कहने से मजहब विशेष और लिबरलों को अपने ऊपर हमला होता क्यों दिखता है?

परिवार नियोजन कार्यक्रम न आज का है और न इससे जुड़े विज्ञापनों में हिंदू वेशभूषा वालों को दिखाने का चलन। पर, इससे कभी हिंदू भावना आहत नहीं होती। केवल समुदाय विशेष को 'हम दो' धर्म पर हमला दिखता है।

एक ने बेटी की ख़ातिर तो दूसरे ने पति के लिए लाँघी चौखट: स्वाति सिंह, किरण तिवारी जैसों से रोशन हौसले का दीया

एक के सामने जाति की चादर ओढ़े प्रभावशाली राजनीतिक ​बिरादरी था, तो दूसरे के सामने धर्म की खाल में लिपटे दरिंदे हैं। बावजूद इसके इन्होंने जो जज्बा दिखाया वो बताता है कि हमें विरासत के नाम पर उड़ान भरती महिलाओं से ज्यादा इनके हौसले की दरकार है।

कटी गर्दन हाथ में ले कर बनानी थी वीडियो, बाप खुश, बीवी खुश… लेकिन घृणा कौन फैला रहा? हिन्दू!

सबके अंत में एक ही मकसद: कमलेश तिवारी की गर्दन काटनी है। ये किसी व्यक्ति की सोच नहीं है, ये सामूहिक सोच है जो किसी व्यक्ति के माध्यम से फलित होती है। कमलेश तिवारी की हत्या अशफाक और मोइनुद्दीन ने ही नहीं, एक मजहब ने की है जो ऐसे लोगों को रोकना तो छोड़िए, उनकी निंदा तक नहीं कर पाता।

वामपंथी और जिहादी एक दूसरे के पर्याय हैं, इसीलिए अभी इनकी साथ-साथ सुलग रही है, पहचानिए इन्हें

भारत में हर जिहादी वामपंथी हो गया है, और वामपंथियों में तो जिहादियों की रक्तधारा तो है ही। इसलिए दोनों सुर में सुर मिला कर चलते हैं। एक जिहादी, जो स्वयं को वामपंथी कहता है, वो अचानक से अपने कपड़े उतार कर मुसलमान हो जाता है क्योंकि उसके मजहब को कुछ लोग कोस रहे हैं।

हिन्दू, मुस्लिम से घृणा करने लगा है: कमलेश की हत्या के बाद वामपंथी हिन्दू को ही गुनहगार कह रहे हैं!

आपसी दुश्मनी में लोग कई बार क्रूरता की हदें पार कर देते हैं। लेकिन ये दुश्मनी आपसी नहीं थी। ये दुश्मनी तो एक हिंसक विचारधारा और मजहबी उन्माद से सनी हुई उस सोच से उत्पन्न हुई, जहाँ कोई फतवा जारी कर देता है, और लाख लोग किसी की हत्या करने के लिए, बेखौफ तैयार हो जाते हैं।

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