तर्क हों तो आप लेख की शुरुआत विदेशी लेखक का नाम लेकर करें या फिर 'लगा दिही न चोलिया के हूक राजा जी' से, मुद्दे पर फ़र्क़ नहीं पड़ता। कुतर्क हों तो आप अपने पोजिशन का इस्तेमाल दंगे करवाने के लिए भी कर सकते हैं, कुछ लोग वही चाह रहे हैं।
जिसे धार्मिक कर्मकांडों को ढकोसला मानना है, वह काहे का हिन्दू, काहे का ब्राह्मण? उसके विचारों का बोझ हिन्दू क्यों उठाए? उसके विचारों के आधार पर ब्राह्मणों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है, जो हिन्दू ही नहीं है?
अगर आप रोजगार के तमाम आँकड़ों को न मान कर ‘मैं जब मुखर्जीनगर पहुँचा तो वहाँ सारे युवा बेरोज़गार थे’ वाला लॉजिक लेकर चलिएगा तो मैं कहूँगा कि ‘मैं जब सायबर हब पहुँचा तो वहाँ सारे लोग लाखों की सैलरी पाने वाले थे, भारत बदल गया है, बेरोज़गारी शून्य प्रतिशत है’।
आमतौर पर समितियों की सिफारिश (अभी वाली नेशनल एजुकेशन पालिसी ड्राफ्ट भी) करीब पाँच सौ पन्ने का मोटा सा बंडल होता है जिसे कौन पढ़ता है, या नहीं पढ़ता, हमें मालूम नहीं। ऐसी सभी सिफारिशों से मेरी एक और आपत्ति ये भी होती है कि ये किस आधार पर बनी है ये पता नहीं होता।
स्वरा भास्कर के लिए ऑर्गेज्म यानी संभोग के दौरान चरमसुख पाना लैंगिक समानता का मसला हो सकता है, उन तमाम औरतों को लिए नहीं जिनके लिए ज़िंदा रहना ही सबसे बड़ा संघर्ष है।
कहाँ से आता है इतना दुस्साहस कि किसी के धार्मिक स्थल पर घुस कर उनके धर्म को नकली कहा जाए, उसका मजाक उड़ाया जाए? और कहीं से नहीं, हमारी तथाकथित ‘सेक्युलर’ व्यवस्था से ही...
गौतम गंभीर की गुरुग्राम वाली घटना को लेकर दी गई 'सेकुलरिज्म और सहिष्णुता' वाली प्रतिक्रया 'भेंडिया आया' वाली कहानी को चरितार्थ करती है। एक सप्ताह भी नहीं हुआ और गौती पीएम मोदी की 'छपास और दिखास' वाली सलाह को भूल गए। और, जब सच सामने आया तो...
बार-बार मुझे मेरे धर्म से अवगत मत कराइए। बार-बार मत बताइए कि मुझे डरने की जरूरत है। ट्विटर-टीवी से बाहर अधिकांश मुस्लिमों का जीवन आम है, आप जैसा ही है। आप जो कर रहे हैं वो बिलकुल उतना ही साम्प्रादायिक है जितना एक मुस्लिम से कहना कि वो अपना राष्ट्रवाद साबित करे।
क्या सही में ज़िम्मेदार सरकारी अफ़सरों पर इन बच्चों की हत्या का मुकदमा चलेगा? क्या विभाग के मंत्री पर ग़ैर-इरादतन हत्या का केस चलेगा? या फिर सिस्टम के सबसे निचले कर्मचारी को महीने भर के लिए निलंबित कर पल्ला झाड़ लिया जाएगा?
विपक्ष ने मुद्दे नहीं उठाए। विपक्ष ने सनसनी बनाने पर ज़्यादा ध्यान दिया। जस्टिस लोया की मौत को मुद्दा बनाया गया, गलत वित्तीय ज्ञान परोस कर अमित शाह के बेटे की कम्पनी को मुद्दा बनाया गया, अजित डोभाल के बेटों पर माहौल बनाने की कोशिशें हुई, नोटबंदी पर लाशें पैदा की गईं, जीएसटी पर उन व्यापारियों के नुकसान की बात हुई जो कहीं थे ही नहीं!