राणा अय्यूब जैसे लोग हों या फिर स्क्रॉल जैसे मीडिया गिरोह, अलीगढ़ काण्ड में अपराधियों के नाम असलम और जाहिद होने के कारण उन सबका रोना यही है कि अपराध को साम्प्रदायिक रंग दिया जा रहा है। उन्हें समझना होगा कि यह सांप्रदायिक रंग नहीं दिया जा रहा है, बल्कि जो जहर उन लोगों ने बोया था, ये उसी के रुझान देखने को मिल रहे हैं।
...लेकिन इस बार भी यही होना है। दलितों की तुलना जानवरों से करने वाले द वायर के इस पत्रकार को जनता फिर से अपना नायक बना देगी और उसके लिए यही उपलब्धि काफी होगी। हो सकता है अगले चुनाव में प्रशांत कनोजिया भी किसी सड़क पर चंदा माँगता हुआ नजर आए।
अलीगढ़ मुद्दे के साम्प्रदायिक न होने की वजह से अब भारत का समुदाय विशेष शर्मिंदा नहीं हैं, न ही बॉलीवुड की लम्पट हस्तियाँ शर्मिंदगी के बोझ से मेकअप पिघला पा रही हैं, न ही पत्रकारों में वो मुखरता देखने को मिल रही है कि वो अपनी बेटी से नज़रें नहीं मिला पा रहे कि वो उनके लिए कैसा समाज छोड़े जा रहे हैं।
जो विद्यार्थी गलत तरीके से पैसे देकर शिक्षक की नौकरी पा भी लें तो वे क्या पढ़ाएँगे और क्या नीति की बातें सिखाएँगे? बात सिर्फ शिक्षकों की नहीं है। धाँधली करके प्राप्त की गई किसी भी नौकरी के किसी भी पर पहुँचा अधिकारी क्या उस पद के साथ ईमानदार रह पाएगा? क्या वह आगे भी रिश्वतखोरी नहीं करेगा?
इनकी बिलों में हाथ डालना पड़े तो बेशक डालिए, ये चिंचियाते रहें, इन्हें पूँछ पकड़ कर बाहर निकालिए और इनसे पूछिए कि वो जो ट्वीट तुमने लिखा है कि हमें इसका राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए, वो तुम्हारे उसी बाप ने लिख कर दिया है जिसके नाम के कारण तुम हीरो और हीरोईन बने फिरते हो, या किसी पेड़ के नीचे नया ज्ञान प्राप्त हुआ है।
हिंदीभाषियों ने दक्षिण भारतीय भाषाओं की फ़िल्मों को एक ऐसा मार्केट दिया है, जिसकी व्यापकता देख कर हिंदी का विरोध करने वाले बेहोश हो जाएँ। बंधन प्यार से बनता है। जब वो टूटता है, तो विदेशी चीजें हमें अपना गुलाम बनाती हैं। इसे तोड़ने वालों, सावधान!
"हिन्दुओं पर इस्लामी आक्रांताओं के क्रूर अत्याचारों को रोमिला थापर जैसे इतिहासकारों ने निष्ठुरता से झुठला दिया, ताकि आधुनिक हिन्दुओं को अपने पूर्वजों के साथ हुए अत्याचारों की याद से दूर रख उन्हें हिन्दू राष्ट्र की (न्यायोचित, प्राकृतिक) माँग करने से रोका जा सके।" - लेखक ने यह माना लेकिन हिंदुओं के प्रति जहर...
रोजाना 17 लाख बच्चों का पेट भरने वाली एक संस्था को सिर्फ़ इसीलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि बच्चों को लहसुन-प्याज नहीं दिया जाता। सरकार द्वारा निर्धारित सभी मानकों पर खड़ा उतरने के बावजूद 'मिड डे मील' में जाति घुसेड़ कर इसे बदनाम किया जा रहा है।
तर्क हों तो आप लेख की शुरुआत विदेशी लेखक का नाम लेकर करें या फिर 'लगा दिही न चोलिया के हूक राजा जी' से, मुद्दे पर फ़र्क़ नहीं पड़ता। कुतर्क हों तो आप अपने पोजिशन का इस्तेमाल दंगे करवाने के लिए भी कर सकते हैं, कुछ लोग वही चाह रहे हैं।
जिसे धार्मिक कर्मकांडों को ढकोसला मानना है, वह काहे का हिन्दू, काहे का ब्राह्मण? उसके विचारों का बोझ हिन्दू क्यों उठाए? उसके विचारों के आधार पर ब्राह्मणों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है, जो हिन्दू ही नहीं है?