सामाजिक मुद्दे

बृजभूषण सिंह POCSO मामले में बरी, उनका विरोध कर एक बनी MLA… दूसरा किसान मोर्चा का अध्यक्ष: लेकिन उन महिलाओं की लड़ाई हो गई...

क्या इन झूठे दावों, झूठी दलीलों का खामियाजा हर उस महिला को भुगतना पड़ेगा, जो भविष्य में सचमुच किसी यौन उत्पीड़न का शिकार हो सकती है?

वामपंथियों, लिबरल वोक ब्रिगेड और हिन्दू-विरोधी ताकतों से सवाल: तुम्हारे दोहरे मापदंड अब छिप क्यों नहीं पा रहे हैं?

जब भी 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' और 'धर्मनिरपेक्षता' की बात आती है, तथाकथित उदारवादी सेक्युलर गिरोह और वोक लिबरल्स सबसे पहले सामने आते हैं।

देश से प्रतिभाओं का पलायन, आरक्षण की जड़ें और मेरिट का सवाल: राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के सामने सबसे बड़ी चुनौती

हमारे देश में आरक्षण की वजह से हर वर्ष लाखों होनहार और प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएँ उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका, कनाडा, यूके, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी जैसे देशों का रुख करते हैं। वे वहीं शिक्षा अर्जित करते है और फिर वहीं बस जाते हैं।

पीड़ित पर ही ‘गंगा जमुनी तहजीब’ ढोने का भार, ‘द वायर’ के पत्रकार उमर राशिद और उसके ‘लव जिहाद’ का एक सबक यह भी:...

ये फर्जी नैतिकतावादी संतुलन दोनों ही मामलों में दिखा, रुचिका शर्मा के भी और उमर राशिद ने जिस लड़की के साथ बर्बरता की, उसके मामले में भी।

अगर ज्योति मल्होत्रा मुसलमान होती… आज शोर मचाने वाले ‘इकोसिस्टम’ ही डाल रहा होता पर्दा, खेल रहा होता विक्टिम कार्ड

वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी ज्योति के नाम की आड़ में प्रोपेगेंडा चला रहे हैं, दावा कर रहे हैं कि अगर ज्योति मुस्लिम होती तो नरेटिव अलग होता।

1 महिला ने 8 पर किया रेप का केस, सारे निकले फर्जी… गैंगरेप का 1 केस निकला ‘निजी दुश्मनी’ में फँसाने की साजिश: क्या...

वक्त आ गया है कि हमारा देश जेंडर न्यूट्रल लॉ अपनाए , न्याय ऐसा हो जो लिंग के आधार पर न हो, बल्कि सच्चाई और निष्पक्षता पर आधारित हो।

‘ड्रम में राजा’… मुस्कान-साहिल ने केवल सौरभ को ही काटकर सील नहीं किया, इस संवेदनहीन समाज को भी कर दिया है बेपर्दा: कुछ तो...

मेरठ का सौरभ हत्याकांड समाज में मजाक बनाकर रह गया। इससे सोशल मीडिया की मानसिकता पर सवाल उठाए गए। लोगों ने जमकर रील्स, मीम्स शेयर की।

कभी हथौड़ा लेकर ‘शक्ति प्रदर्शन’, कभी शिक्षकों से बदसलूकी: गली के गुंडों की फोटोकॉपी बने छात्र नेता, अब बिगड़ैल राजनीति पर अंकुश समय की...

जो प्रत्याशी या संगठन धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल नहीं करता, या उसके इस्तेमाल में झिझकता है; उसे कमजोर मान लिया जाता है। पूरी चुनावी व्यवस्था इतनी दूषित हो चुकी है कि सही और सकारात्मक  साधनों से लड़कर चुनाव जीतना लगभग असंभव है।

खतरे में है हर हिंदू, सरकारी सुरक्षा के भरोसे हम जीवनभर नहीं बैठ सकते… पर कवर्धा का ‘सुरक्षा मॉडल’ आत्मसात तो कर ही सकते...

कवर्धा के ​हिंदू जिस तरह दुर्गेश देवांगन के परिवार की ढाल बने, क्या उसी तरह हर पीड़ित हिंदू परिवार का हम बन सकते हैं सुरक्षा कवच?

दरगाह की डेग से चर्च की वाइन तक में दिखती है ‘सेवा’, पर नजर नहीं आता संतों-मंदिरों का परोपकार… क्योंकि हम मजहब देख नहीं...

पहली बार नहीं है जब हिंदू संत या धार्मिक संगठन किसी तरह के परोपकारी कार्य कर रहे हो, सालों से ऐसा हुआ, लेकिन वामपंथियों ने कभी उसका प्रचार नहीं होने दिया।

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