Sunday, September 27, 2020
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खोखले लिबरलो, वामपंथियो! तुमने ढंग से पत्रकारिता की होती, तो हमारी ज़रूरत ही नहीं पड़ती

हर वो व्यक्ति जो खुल्लमखुल्ला गालियाँ दे रहा है भाजपा या मोदी को, उसे तुरंत लिंग छील कर लिबरल गैंग की सदस्यता दे दी जा रही है। बाज़ार में शोर किया जा रहा है कि ये आदमी लिबरल है। उसे भी कुछ साबित नहीं करना, कोई मापदंड नहीं, बस ज़िप खोलनी है, नंगा होना है, सबको पता चल जाता है कि महोदय लिबरल हैं, नंगे तो खैर हैं ही।

कल हमारी अंग्रेजी साइट की एडिटर नुपुर ने दो ट्वीट किए और लिखा कि हमें वो (लेफ्ट-लिबरल गिरोह) घृणा से इसलिए देखते हैं क्योंकि उनके निकम्मेपन के कारण ही हमें आना पड़ा। अगर वो अपनी कलम नहीं बेचते, तो हमें कलम उठाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। पत्रकारिता क्या है, क्या होनी चाहिए, ये आज के दौर में चर्चा का विषय ज़रूर है, लेकिन पत्रकारिता के नाम पर क्या हो रहा है, वो हमारे दौर से छुपा नहीं है।

अगर पत्रकारिता सही होती रहती तो ‘मीडिया’ के पहले ‘मेन्स्ट्रीम’ और ‘सोशल’ जैसे शब्द नहीं लगाने होते। मीडिया तो मेनस्ट्रीम ही होनी चाहिए। आपने ‘सोशल मीडिया’ को अलग कर दिया क्योंकि मेन्स्ट्रीम अपने काम से भटक रहा था। तकनीक की कमी कहिए या कुछ और, सोशल मीडिया को आने में समय ज़रूर लगा लेकिन सही मायनों में मीडिया या सूचना का लोकतांत्रीकरण अब ही हो पाया है। अब मीडिया के तोप सोशल मीडिया के आगे रोजाना नंगे हो रहे हैं।

2014 के बाद जो हुआ, और उससे पहले जो हो रहा था, वो न सिर्फ राजनैतिक तौर पर ‘मोदी से पहले’ और ‘मोदी के बाद’ के नाम से जाना जाएगा, बल्कि पत्रकारिता के संदर्भ में भी एक नेता या विचारधारा को लेकर इन दो कालखंडों में भारतीय मीडिया को पढ़ाया जाएगा। मोदी के आने से पहले मीडिया ने, जिसने सालों से अपनी आत्मा डॉक्टर फॉस्टस की तरह लूसिफर रूपी कॉन्ग्रेस को गिरवी रख दी थी, सोचा भी नहीं था कि उसके साल भर की मेहनत के बावजूद वो आ ही जाएगा, और ऐसे आएगा कि सब कुछ बदल जाएगा।

इसलिए, 2012-13 में भारतीय मीडिया में सिर्फ टोन में बदलाव आया था। उन्होंने 2002 पर काफी समय तक सुई घुमाई। यूट्यूब पर करन थापर द्वारा मोदी को पानी पिलाने वाले वीडियो ही चलते रहे। उन्हें लगा कि हर बार की तरह, झूठ और प्रलाप के साथ, स्टूडियो से रैली करने वाली पत्रकारिता और एंकरों के सहारे वो इनएविटेबल को रोक लेंगे। मोदी इनएविटेबल का पर्याय बन कर आया, और लोकतांत्रिक संख्याबल के साथ आया।

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इसलिए 2014 के बाद इन माओवंशी कामपंथी लम्पटों के गिरोह को लगा कि अगर इन्होंने रिपोर्टिंग की टोन को बदलने के साथ-साथ हिटलर के गोएबल्स वाली नीति नहीं अपनाई, तो लम्बे दौर में उनका अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। फिर अभ्युदय हुआ चोरों के नए गिरोह का जिसमें क्विंट, वायर, स्क्रॉल जैसे अजेंडाबाजों ने बीबीसी और एनडीटीवी जैसे पुराने पापियों की सवारी करते हुए जगह बनानी शुरू की।

फिर इन्होंने अपनी पुरानी, आजमाई हुई नीति अपनाई। अंग्रेजी में फेक न्यूज का कारोबार करना शुरू किया। इनका पूरा कच्चा-चिट्ठा आपको हमारी वेबसाइट के ‘फैक्ट चेक’ सेक्शन में मिल जाएगा। फेक न्यूज सिर्फ गलत खबर फैलानी नहीं होती, फेक न्यूज वैसे स्तंभ भी हैं, ओपिनियन आर्टिकल्स भी हैं जहाँ आप अपनी घटिया सोच और मनोवृति से पिक्सल काले करते हैं जिसमें तथ्य शून्य होता है, कल्पना पूरे सौ प्रतिशत।

अब मैं दो पैराग्राफ लिखूँगा जो आपको विशेष रूप से पढ़ना चाहिए। याद कीजिए कि भारत अचानक से असहिष्णु कैसे हो गया था! याद कीजिए कि जिस रोहित वेमुला के सुसाइड नोट में विनती थी कि उसकी मौत को राजनैतिक रंग न दिया जाए, उसके साथ क्या हुआ! याद कीजिए मोदी को किस तरह की मीडिया कवरेज मिली चुनावों के दौरान (दोनों बार) और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की छवि कैसे धूमिल करने की लगातार कोशिशें होती रहीं। याद कीजिए कैसे कठुआ कांड ने वैश्विक पटल तक तहलका मचा दिया था। याद कीजिए गौरी लंकेश की हत्या को कैसे दिखाया गया था। याद कीजिए कि इन्होंने ‘जय श्री राम’ को कैसे आतंक का नारा बनाने की कोशिश की।

अब याद कीजिए जुनैद को और उन तमाम गौरक्षकों को, पुलिस वालों को जिन्हें गौतस्करों ने मौत के घाट उतार दिया। अब याद कीजिए रोहित वेमुला के बाद आत्महत्या करने वाले कई दलित छात्र-छात्राओं को जिनका नाम भी आप नहीं जानते। याद कीजिए ममता बनर्जी और अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुए मजहबी दंगों को। याद कीजिए उन दसियों बच्चियों को जिनका बलात्कार मौलवियों ने मदरसे और मस्जिदों में किया। याद कीजिए गौरी लंकेश से पहले मार डाले गए बाईस पत्रकारों को जिन्हें ट्वीट भी नसीब नहीं हुआ। याद कीजिए उन ग्यारह खबरों को जहाँ समुदाय विशेष ने ‘जय श्री राम’ बुलवाने की झूठी बात फैलाई ताकि उन्हें कवरेज मिले।

अगर पहले के सारे मुद्दों की सही, तथ्यपरक, बिना अजेंडा की रिपोर्टिंग के साथ, दूसरे पैराग्राफ के सारे मुद्दों की रिपोर्टिंग, उसी प्रभाव से हुई होती तो ऑपइंडिया की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। हमारे जैसे लोग स्थापित पत्रकारों को कोसते हुए अपनी बात नहीं कहते। हम कुछ और मुद्दों पर लिखते, कुछ और बातें भी करते। लेकिन नैरेटिव पर कब्जे की लड़ाई में वैसे लोगों को आना पड़ा जो कहीं और थे, कुछ और कर रहे थे। अगर इस जहरीले नैरेटिव पर हमने हमला न किया होता, तो भारत की छवि के साथ-साथ पूरा समाज बिखर चुका होता क्योंकि हर ‘शांतिप्रिय’ यह सोचता कि हिन्दू उसे घर से बाहर निकलते ही काट देगा!

दो बार की कड़ी हार, घुटते साँस से भी गाली देते वामपंथी

2019 में वामपंथी लम्पटों और उनके बापों को पता चल गया कि उनकी लड़ाई अभिजात्यता की चाशनी में लिपटे अंग्रेजीदाँ चाटुकारों से नहीं है। तब उन्होंने नैरेटिव को मोड़ने की कोशिश की। पहले उन्होंने सोचा कि मोदी आएगा ही नहीं, फिर सोचा कि आएगा भी तो बहुमत नहीं मिलेगा, फिर सोचा कि इसके मंत्री घोटाला करेंगे तब घेरेंगे, फिर सोचा कि इसकी नीतियों से नुकसान होगा तब ढोल पीटेंगे, फिर सोचा कि टाइम बीतने पर सब कुछ बिखर जाएगा, फिर सोचा कि अगला चुनाव तो जीत ही नहीं पाएगा, फिर सोचा कि जीत भी गया तो बहुमत तो नहीं पाएगा, फिर सोचा…

ये बस सोचते रहे, और कुछ भी नहीं हुआ। सरकार की कुछ नीतियाँ गलत रही होंगी, आशा के अनुरूप फल नहीं मिले होंगे, लेकिन मोदी सरकार ने साबित किया कि उनका लक्ष्य न तो देश को तबाह करना है, न ही राष्ट्र के नाम पर पार्टी को मजबूत करना। वामपंथी चिरकुट लगातार लेख लिखते रहे, हर योजना को, हर नीति को बेकार कह कर डिसमिस करते रहे, लेकिन लोगों का भरोसा जगता गया।

यही भरोसा एनडीटीवी से लेकर स्क्रॉल, वायर, क्विंट, प्रिंट, बीबीसी आदि ने खोया। वामपंथियों और तथाकथित लिबरलों की एक खासियत है कि ये अपने दोगलेपन के खेल में इतने माहिर हैं कि ये परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं। ये अटल बिहारी को कट्टर कहते थे, फिर आडवाणी कट्टर हुए, फिर मोदी कट्टर हुए, फिर योगी कट्टर हुए। इस कट्टरपन की शृंखला में हर दूसरे के आते ही पहले को इन्हीं लम्पटों ने संत मान लिया। आज कल नए कट्टर अमित शाह हुए हैं।

2014 में जब मोदी आ गया था, तब इनकी चाल यह थी कि इसकी छवि को सुधरने ही न दिया जाए। लगातार निजी आक्षेप से लेकर वैसी बातों को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया गया जिससे राष्ट्रीय तो छोड़िए, उस नेता के घर के बाहर के लोगों को भी फर्क नहीं पड़ता हो। सरकार और उसकी कार्यशैली पर सवाल नहीं हुए, सवाल इस पर उठे कि मोदी ने बीए किया है कि नहीं, मोदी की पत्नी क्यों उनके साथ नहीं है, मोदी हर रोज नए कपड़े क्यों पहनता है, मोदी राहुल गाँधी से डिबेट क्यों नहीं करता, मोदी एनडीटीवी को इंटरव्यू क्यों नहीं देता… ये थे राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे!

दुर्भाग्य से सोशल मीडिया के बूम से आम आदमी तक सच्चाई पहुँचने लगी। वैसे लोग जो अनौपचारिक रूप से फेसबुक पर पोस्ट करते थे, उन्हें एक दूसरे धड़े की उभरती मीडिया ने जगह देनी शुरू की। लोगों को जब अपने बीच के लोग सच बताने लगे, तो इस मीडिया को जगह मिली। साथ ही, इन अजेंडाबाजों की दुकान के शटर पर पत्थर फेंके जाने लगे।

दो ट्वीट कर के लिबरल बनने का शॉर्ट-‘कट’

अब इन्हें रिपोर्ट नहीं मिल रहे तो पूरा फोकस ही ‘वैचारिक स्तंभों’ यानी ओपिनियन पर केन्द्रित कर दिया है। हर वो व्यक्ति या पत्रकार जो खुल्लमखुल्ला गालियाँ दे रहा है भाजपा या मोदी को, उसे तुरंत लिंग छील कर लिबरल गैंग की सदस्यता दे दी जा रही है। बाज़ार में शोर किया जा रहा है कि ये आदमी लिबरल है। उसे भी कुछ साबित नहीं करना, कोई मापदंड नहीं, बस ज़िप खोलनी है, नंगा होना है, सबको पता चल जाता है कि महोदय लिबरल हैं, नंगे तो खैर हैं ही।

इसी ओपिनियनबाजी में, तथाकथित सोशल वर्कर, एक्टिविस्ट, फलाँ मामलों के स्वघोषित जानकार, फर्जी की फाइस्टी फेमिनिस्ट से लेकर नकारे, कुंठित और पूर्वग्रह से ग्रस्त लोगों को एक ही विषय पर लगातार लिखने कहा जाता है। हर लेख का निष्कर्ष पहले से तय होता है कि अमित शाह और नरेन्द्र मोदी अब भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ बना ही देगा, ये दोनों समुदाय विशेष को हंट कर रहे हैं, प्रेस फ्रीडम को दबाया जा रहा है, डर का माहौल है, अघोषित आपातकाल यही है…

सत्य यह है कि मोदी सरकार के पाँच सालों में सिवाय इनके लेखों के इनका एक भी आरोप सही साबित नहीं हो पाया। न कोई घोटाला, न नीतिगत असफलता, न इकोनॉमी बर्बाद हुई, न दंगे हुए, न अल्पसंख्यक कहीं भी डर से जी रहा है। इसी मीडिया ने ये पूरा माहौल मैनुफैक्चर किया और पूरी कोशिश की कि लोग इनके हर अजेंडा को पत्थर की लकीर मान कर आगे बढ़ जाएँ।

हुआ इसके उलट यह बात कि अखलाख की भीड़ हत्या की हुई, तो ऐसे दसियों मामले सामने आए जहाँ इस्लामी भीड़ ने निर्दोष हिन्दू को काट दिया, रेत दिया, पीट कर मार दिया। बात गाय चुरा कर भागते मजहबी गौतस्करों की हुई तो दसियों मामले ऐसे सामने आए जहाँ गौरक्षकों को, पुलिस वालों को इन्हीं गौतस्करों ने जान से मार दिया, उन पर गोली बारी की। बात कट्टरपंथियों के डरे होने की हुई और कई मामले ऐसे सामने आए जहाँ उन्होंने बिना किसी कारण हिन्दू काँवड़ियों पर पत्थरबाजी की, उनके कई मंदिरों को लगातार तोड़ा।

इनके अजेंडे को बार-बार दूसरे धड़े के पत्रकारों ने बेहतर लेख और तथ्य के साथ काटा। परिणाम सामने है कि अब इन्हें पढ़ने वाले वही हैं जिनके भीतर अज्ञानता का अंधेरा है या फिर मतलब के विचारों को तथ्य मानने की विवशता। साथ ही, अगर आप इनके सोशल मीडिया पोस्टों पर जाएँ तो सहमति और असहमति दिखाने वालों का अनुपात बहुत कुछ बता देगा।

हमें नीचा दिखाने की नाकाम कोशिश

जब इन नग्न लेनिनवंशियों को इन्हीं के अंदाज में पटखनी दी जाने लगी तो बिलबिलाने लगे। ये कहने लगे कि हमारे शब्द गलत हैं, पत्रकारिता की शैली मर्यादा में नहीं है। कहा जाने लगा कि ये लोग तो गाली देते हैं। अरे शोना बाबू, काम गाली खाने वाला करोगे तो क्या तुम्हारी आरती उतारी जाए? लोगों में जहर बोने का काम तुम करोगे, हर दिन लोगों को डराओगे कि सामने वाले ने अगर ललाट पर तिलक लगाया है तो वो तुम्हें गली में छुरा मार देगा। हर लेख में लोगों को आने वाले बहुत बुरे भविष्य की मनगढ़ंत तस्वीर दिखाने का काम तुम करो, ताकि वो आदमी मन में इतनी घृणा पाल ले कि आईसिस तक से हिन्दुओं के खात्मे के लिए मदद माँगने लगे, और चाहते हो कि हम जो लेख लिखें, वो तुमसे पहले एडिट करवा लें!

ऐसे नहीं होता है। तुम अपनी दोगलई करो, हम अपनी पत्रकारिता करेंगे। हमारे शब्दों का चुनाव हम करेंगे। शब्द स्वतंत्र रूप से गाली नहीं होते, संदर्भ उन्हें गाली बनाता है, कटाक्ष बनाता है, परिहास बनाता है, विशेषण बनाता है। इसलिए, हमें ज्ञान देना बंद करो और तथ्यों के साथ पत्रकारिता करो, क्योंकि तुम्हारे लिखने से यह साबित नहीं हो जाता कि तबरेज को ‘जय श्री राम’ न बोलने के लिए भीड़ ने मार दिया। तुम पुलिस केस बनने से पहले अपराधी तलाश लेते हो, फिर उसमें धर्म घुसा देते हो, फिर एक नारा, फिर किसी दूर के संबंधी का भाजपा कनेक्शन ढूँढ लाते हो, और इसे ग्राउंड रिपोर्ट कह देते हो।

वो दिन बीत गए। पत्रकारिता तथ्यों से होगी, नैरेटिव से नहीं। नैरेटिव ही बनाना है तो वो हम बनाएँगे कि दो महीने तुम भले ही ‘जय श्री राम’ वाली खबरें खूब घुमाओ, हम उतने ही दिन में वैसी हर खबर के गलत होने का सबूत तुम्हारे मुँह और नितंब, दोनों पर, खींच कर मारेंगे ताकि आवाज कहीं से न निकले। नैरेटिव ही बनाना है तो हम बनाएँगे कि कठुआ जैसे कांड तो एक-दो ही हैं, मौलवियों द्वारा बच्चियों के बलात्कार की जितनी खबरें बोलोगे, तारीख के साथ दिखाएँगे और तुम गिन नहीं पाओगे। नैरेटिव ही बनाना है तो हम बनाएँगे इस्लामी आतंकी आक्रांताओं ने सैकड़ों साल पहले भी हमारे मंदिर तोड़े और आज भी तोड़ रहे हैं। नैरेटिव ही बनाना है तो हम बनाएँगे कि पचास बार तुमने कैसे हिन्दुओं पर हुए हेटक्राइम पर कुछ नहीं बोला, जिसमें अपराधी के मुस्लिम होने की ख़बर आई।

ये नहीं चलेगा। लेकिन हाँ, तुम्हारी नग्नता का सर्कस चलते रहना चाहिए। इससे हमें फायदा है। हमें सिर्फ हेडलाइन पढ़ कर पता चल जाता है कि तुम्हारी खबर जबरदस्ती का एंगल लिए हुए है। हमें पता चल जाता है कि हमें कहाँ ढूँढना है और असली खबर दस मिनट में सामने आ जाती है कि तुमने ये पूरी स्टोरी सिर्फ हिन्दुओं को नीचा दिखाने के लिए की थी। इसलिए, बने रहो। अपने उसूलों से समझौता करते रहो। तुम्हें लगता है कि मेफिस्टोफिलीस लूसिफर के आदेश पर तुम्हारी मदद कर रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है।

तुम्हारे चौबीस साल बीत जाएँगे। घड़ी में सात बजेगा। तुम घबरा कर याद करोगे कि जो निर्णय तुमने व्यक्तिविशेष की घृणा के कारण लिए और समाज को उससे क्षति पहुँचाई, वो कितने घातक थे। फिर मध्यरात्रि में नर्क के दूत आएँगे, तब तुम गिड़गिड़ाओगे, सही करने की कसमें खाओगे। लेकिन तुम्हें छोड़ा नहीं जाएगा। तुम्हारे दोस्तों को सुबह एक लाश मिलेगी, वो तुम्हारी तरह की पत्रकारिता की लाश होगी, क्षत-विक्षत।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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