Wednesday, April 14, 2021
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आतंकी और पायलट अभिनंदन बराबर हैं ‘द वायर’ और जावेद नक़वी के लिए

नेशनलिज्म कोई शर्म की बात नहीं है। हर व्यक्ति को अल्ट्रा, मेगा, गीगा, पेटा, थेटा जो-जो नेशनलिस्ट हुआ जा सकता है, होना ही चाहिए। आप या तो नेशनलिस्ट हैं, या नहीं। नहीं हैं तो डूब मरिए, या पायरेट बनकर समुद्र में चक्कर लगाइए जहाँ देश का कॉन्सेप्ट नहीं होता।

जावेद नक़वी ने एक लेख लिखा है जो ‘द वायर’ में छपा है। ‘द वायर’ अपनी बेकार की पत्रकारिता के कारण ‘द लायर’ के नाम से जाना जाता है, और प्रोपेगेंडा फैलाने में आगे की पंक्ति में दाँत चियार के खड़ा मिलता है। इसलिए जब इस तरह की बेहूदगी इनके लेखों में दिखती है तो इन्हें सरेबाजार शाब्दिक कोड़े मारना ज़रूरी हो जाता है। 

हम और आप, पिछले दो दिनों से ‘जेनेवा कन्वेन्शन’ का नाम खूब सुन रहे हैं। यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जो संयुक्त राष्ट्र संघ के दायरे में आनेवाले देशों के बीच सर्वमान्य है। इसमें युद्ध बंदियों को लेकर कई प्रस्ताव हैं जिनका सम्मान हर देश को करना होता है। उसी में से एक बिंदु भारतीय पायलट विंग कमांडर अभिनंदन के लिए भी लागू होता है, जिसके प्रयोग से तीन दिनों के भीतर उन्हें वापस लाया जा चुका है। 

जावेद नक़वी ने एक भारतीय सेना के पायलट को बहाना बनाकर मानवाधिकारों की पिपहीं इतनी ज़ोर से बजा रहे हैं कि गले की नसें फूल गईं ये बताने में कि कश्मीर में पकड़े गए आतंकी और दुश्मन देश में पकड़े गए पायलट को एक ही तराज़ू में तौला जा सकता है। इसको कहते हैं धूर्तता कि जब आपके पास शब्द हों तो आप कुछ भी साबित करने पर उतर आते हैं।

और, वो शब्द अंग्रेज़ी के हों तो वैसे ही आदमी ह्यूमन राइट्स, प्रोफ़ेशनल न्यूट्रेलिटी, अमनेस्टी इंटरनेशनल सुनकर ही टेंशन में आ जाता है। लेकिन जावेद नक़वी ये भूल जाते हैं कि अब जनता जाग रही है और उसको माओवंशी गिरोह के हिन्दी-अंग्रेज़ी के बहुप्रचलित जारगन सुनाकर बहलाया नहीं जा सकता। उसके उलट, अब उनके हर ऐसे फ़र्ज़ीवाड़े को सामने लाया जाएगा, पोस्टमार्टम किया जाएगा और बताया जाएगा कि आख़िर लिखने वाले ने क्या खाकर इसे लिखा था। 

‘कश्मीरी पीपुल’, ‘अल्ट्रा नेशनलिज़्म’, ‘ह्यूमन राइट्स’, ‘प्रोफ़ेशनल न्यूट्रेलिटी’ … खखोर लिया भाई!

ख़ैर, लेख पर आते हैं जहाँ ये माहौल बनाने की कोशिश की गई है कि कैसे कश्मीर के आतंकी और जेलों में पड़े क़ैदी को भी वही ट्रीटमेंट मिलनी चाहिए जो जेनेवा कन्वेन्शन में पायलट के लिए उपलब्ध है। ये सारी बातें एक लॉबी को हवा देती हैं जिसके लिए ‘कश्मीर पीपुल’ और ‘भारतीय लोग’ अलग हैं। जावेद नक़वी ने यह बात भी आर्टिकल में सूक्ष्म तरीके से कई बार कह दी है।

जावेद जी, हेडलाइन में जो आपने ‘न्यू लव’ लिखा है, वो हमारा ‘नया प्यार’ नहीं है, ये भारतीय राष्ट्र की ताक़त है कि एक सरकार के समय में सौरभ कालिया की आँखें निकाल ली गई थीं, और दूसरे सरकार में युद्धबंदी बनाया गया हमारा हीरो तीन दिन में घर वापस आ रहा है। ये ‘नया प्यार’ नहीं है, ये नया भारत है जिसके लिए आतंकवादियों को निपटाना और देशवासियों की फ़िक्र करना नए कलेवर में उभर कर सामने आ रहा है। 

हे ब्रो, न्यू लव नहीं, नया भारत है ये! यू हैव नो चिल!

आपने लिखा है कि ‘कश्मीरी लोग, अल्ट्रा नेशनलिस्ट भारतीय लोगों द्वारा जेनेवा संधि में दिखाए जा रहे विश्वास से’ आश्वस्त महसूस कर सकेंगे। पहले तो ये कश्मीरी लोग और भारतीय लोग क्या होता है? ये अल्ट्रा नेशनलिस्ट क्या होता है? माओ की नाजायज़ औलादों द्वारा छेड़ा गया नया राग? अगर देश के लिए मरने-मिटने की बात, उसकी रक्षा हेतु सेना के सम्मान में खड़े होने की बात अल्ट्रा नेशनलिज्म है, तो सबको होना चाहिए। 

नेशनलिज्म कोई शर्म की बात नहीं है। हर व्यक्ति को अल्ट्रा, मेगा, गीगा, पेटा, थेटा जो-जो नेशनलिस्ट हुआ जा सकता है, होना ही चाहिए। आप या तो नेशनलिस्ट हैं, या नहीं। नहीं हैं तो डूब मरिए, या पायरेट बनकर समुद्र में चक्कर लगाइए जहाँ देश का कॉन्सेप्ट नहीं होता। ये फ़र्ज़ी ज्ञान बहुत दिनों से लम्पटों की लॉबी और पत्रकारिता का समुदाय विशेष हर जगह करता नज़र आता है। ये अल्ट्रा नेशनलिस्ट क्या होता है? राष्ट्रवाद बस राष्ट्रवाद है, उसमें विशेषण लगाकर गाली बनाने वाले लोग धूर्त चिरकुटों की परम्परा से आते हैं, इनको देखते ही, राह चलते धोते रहना चाहिए, शब्दों से! 

और क्या जावेद नक़वी से मान रहे हैं कि ‘कश्मीरी लोग’ राष्ट्रवादी नहीं हैं? अगर ऐसा मानते हैं तो किस सर्वेक्षण को आधार बनाया है? क्या ये सर्वेक्षण कारवाँ के ऐजाज़ अशरफ़ टाइप का तो नहीं जिसने नींद में सोचा कि भारतीय सेना के पक्ष में उतरने वाले लोग बड़े शहरों के हिन्दुओं के अपर कास्ट से आते हैं? ऐसा है तो कान पकड़िए और दस बार उठक-बैठक लगाकर कहिए ‘तौबा-तौबा’। 

आगे आपने ज्ञानधारा बहाई है कि भारत के ‘अल्ट्रा नेशनलिस्ट’ टीवी चैनलों और उन पर आने वाले ग़ुस्सैल मिलिट्री विश्लेषकों में ‘अनयुजुअली ऑड डिमांड’ उठती दिखी कि पाकिस्तान को जेनेवा संधि का सम्मान करना चाहिए। जावेद ब्रो, ऐसा है कि पायलट जब परसों पकड़ा गया, तो डिमांड क्या उसके पहले ही उठा देते लोग? और अपने पायलट की रिहाई के लिए ये तो लीगल तरीक़ा था, मेरी सहमति तो इसमें भी है कि भारत एक पायलट के लिए पाकिस्तान पर अटैक करे और उसे बताए कि उसकी औक़ात क्या है। 

अपने हीरो को वापस लाने के लिए माँग करना ‘अनयुजुअल’ कैसे है? क्यों नहीं माँग करेंगे? क़ानून है तो हमारे पक्ष में जब काम आएगा, हम उसका फ़ायदा क्यों नहीं उठाएँगे? इस आदमी को ‘अल्ट्रा नेशनलिस्ट’ से इतना प्रेम है कि भारतीय लोगों से लेकर (जिसमें पता नहीं ख़ुद को रखते हैं कि नहीं), भारतीय टीवी चैनलों को एंकर तक सब एक ही रंग में रंग दिए गए हैं। 

लम्पटई तो देखिए कि आर्टिकल में धीरे-धीरे युद्धबंदी और पायलट से किस तरीके से जावेद नक़वी ने विंग कमांडर अभिनंदन को ‘इंडियन कैप्टिव’ तक ला दिया। ये वामपंथियों की पुरानी अदा है कि शुरू में दिखाएँगे कि वो कितना सम्मान देते हैं, वो लिखेंगे कि भारतीय वायु सेना ने ये कर दिया, वो कर दिया, और अजेंडा मिडिल में घुसा देंगे। 

क्योंकि जब आप आदमी को आर्टिकल पढ़वाने के क्रम में ऐसी जादूगरी करके पायलट को इंडियन कैप्टिव बता देते हैं, तो आगे कश्मीरी आतंकियों को कश्मीर के जेलों में क़ैद ‘लोग’ कहकर समानता बताने में ज़्यादा दिक्कत नहीं होगी।  

पूरा आर्टिकल धूल झोंककर गधे को घोड़ा बताने का उपक्रम है। नॉर्थ-ईस्ट और कश्मीर के लोगों की चिंता आप मत कीजिए। नॉर्थ-ईस्ट में विकास के कार्यों की तेज़ी देखकर आप गिन नहीं पाएँगे, और वहाँ सरकार ने कि किस तरह से आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में बेहतरी हासिल की है, वो थोड़ा सर्च करने पर मिल जाएगा। 

कश्मीर की मूल समस्या आतंकवाद है। वहाँ हमारी सेना लगातार आतंकवादियों को मारकर, पत्थरबाज़ों को उनकी भाषा में जवाब देकर, वहाँ के समाज में ज़रूरी स्थिरता लाने की कोशिश में लगी हुई है, जिसने बिना वर्दी पहने बंदूक उठाई है, उसका मानवाधिकार नहीं होता, उसका एक ही अधिकार है: भवों के बीचों-बीच गोली खाना। 

मानवता के दुश्मनों को देश की सुरक्षा के लिए पचास साल पुरानी तकनीक के विमान से अत्याधुनिक जेट का पीछा करके मार गिराने वाले राष्ट्रीय धरोहर विंग कमांडर अभिनंदन जैसी विभूतियों से तौलना बंद कीजिए। इससे आपका अजेंडा निखर कर सामने आ जाता है। इसी कारण नेशनलिज्म में अल्ट्रा लगाकर उसको गाली बनाने की बेकार और घटिया कोशिशें की जाती हैं। 

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एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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