बिना जुबाँ लड़खड़ाए कश्मीर समस्या को इस्लामी आतंक जनित समस्या कहना ज़रूरी

1989 का कश्मीरी पंडितों का पलायन तो घाटी से उनका सातवाँ पलायन था। शाह मीर, औरंगज़ेब, अब्दुल्लाओं और आज के जमात-ए-इस्लामी या बुरहान, इन सभी के द्वारा किया गया रक्तपात इस्लामिक वर्चस्व की मानसिकता की ही देन रही।

प्रत्येक महाशिवरात्रि, कश्मीर का इतिहास अपने गुनहगारों से कुछ प्रश्न करता है, मगर वो अनसुने रह जाते हैं। आखिर इतिहास की सुध लेने की परवाह किसे है? जनमानस की स्मृतियों में तो सिर्फ 1947 से निरंतर जलता कश्मीर ही बचा है। 5000 वर्षों के भव्य इतिहास का मानो लोप ही हो गया हो। वो तो भला हो कल्हण रचित “राजतरङ्गिनी” का, जिसने पुस्तकालयों में ही सही कश्मीर के उस वैभवशाली अतीत को ज़िंदा रखा।

अगर 14वीं शताब्दी के पूर्व और उसके बाद के कश्मीर का इतिहास देखेंगे तो उन लक्षणों की पहचान करना आसान हो जाएगा, जो कश्मीर की वर्तमान दुर्गति के कारणों की ओर इंगित कर सके। इस्लामिक सत्ता के पूर्व के कश्मीर का इतिहास, विकास और वैभव के शिखर पर विराजमान सभ्यता का इतिहास है, वहीं उसके बाद का इतिहास रक्तरंजित और निरंतर संघर्षों से भरा हुआ है।

वर्तमान प्रचलित नाम ‘कश्मीर’ का पहला उद्धरण पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी और उसकी टीकाओं में पाया जाता है। महाभारत और रामायण के अतिरिक्त नीलमत पुराण, कश्मीर का विवरण देने वाला प्रमुख संस्कृत ग्रंथ है। कम्बोजों तथा सारस्वत ब्राह्मणों द्वारा एक ऐसी सभ्यता का निर्माण हुआ, जहां अध्यवसायियों, कवियों, चिकित्सकों और शिक्षकों की भरमार थी और यह सभ्यता उत्तरोत्तर गौरव को प्राप्त होती रही, जब तक 14वीं शताब्दी में शाह मीर द्वारा कश्मीर पर कब्ज़ा नहीं कर लिया गया। इसके बाद ध्वंस और विनाश की एक ऐसी रीत चली, जिसने कश्मीर के सामाजिक ढाँचे को छिन्न-भिन्न कर दिया और उन्नति के सारे मार्ग अवरुद्ध कर दिए। कला, चिकित्सा और स्थापत्य का केंद्र कश्मीर साम्प्रदायिकता, घृणा और मार-काट की आग में झोंक दिया गया। 1989 का कश्मीरी पंडितों का पलायन तो घाटी से उनका सातवाँ पलायन था। शाह मीर, औरंगज़ेब, अब्दुल्लाओं और आज के जमात-ए-इस्लामी या बुरहान, इन सभी के द्वारा किया गया रक्तपात इस्लामिक वर्चस्व की मानसिकता की ही देन रही।

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समस्या के समाधान हेतु पहले उसकी पहचान करना ज़रूरी होता है। कश्मीर में जो आतंकवाद की आग लगी है, उसमें पाकिस्तान इस्लामिक कट्टरपंथ रूपी पेट्रोल ही तो डालता है। शाह मीर और औरंगज़ेब की हिन्दू बनियों और ब्राह्मणों को सबक सिखाने वाली छवि का ही प्रसार किया जाता है। यदि हम कश्मीर समस्या का समाधान चाहते हैं, तो बिना ज़ुबाँ लड़खड़ाए इसे इस्लामिक आतंकवाद जनित समस्या कहना सीखना होगा। यह कहना होगा कि पाकिस्तान की चाल मात्र कश्मीर बनाम भारत बनाने की नहीं है, बल्कि मुस्लिम कश्मीर बनाम हिन्दू भारत बनाने की है। यही कारण है कि वहाँ कश्मीरी पंडितों के होने से उन्हें समस्या है। अगर ऐसा नहीं होता तो अलगाववाद की जड़ें हमें जम्मू-कश्मीर के अन्य हिस्सों जैसे कि जम्मू और लेह-लद्दाख में भी देखने को मिलतीं, जबकि ऐसा नहीं है।

कश्मीर में अलगाववाद को बल मिलता है पैन-इस्लामिज़म से, जो खिलाफत आंदोलन के या उससे भी पूर्व के उस विचार से प्रभावित है, जिसमें दुनिया के सभी मुसलमानों को राष्ट्रीय सीमाओं को परे हटाकर एक झंडे के नीचे खड़े होने को अपना आदर्श मानता है। हालाँकि यह विचार कितना हास्यास्पद है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्तमान में सबसे ज्यादा तथाकथित इस्लामिक देश ही आपसी संघर्षों में उलझे हुए हैं।

यदि कश्मीर समस्या का निवारण चाहिए तो ऐसे इस्लामिक चरमपंथियों तथा उनके बनाए चरमपंथी विचार के प्रचार-प्रसार के ढाँचे को तोड़ना होगा। कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के मध्य ही नए आदर्शों और मूल्यों की स्थापना करनी होगी, जो भारतीय राष्ट्रीय विचार से साम्य रखते हों। प्रत्येक बुरहान के समक्ष राइफलमैन औरंगज़ेब खड़े करने होंगे। इस प्रकरण में उदारवादी मुसलमानों की भूमिका और भी आवश्यक हो जाती है। यह अनिवार्य है कि मुस्लिम समुदाय का उदारवादी तबका मुखर होकर अपनी भारतीय पहचान के साथ खड़ा हो और कह सके कि उसकी धार्मिक या मज़हबी पहचान व राष्ट्रीय पहचान में अंतर्विरोध नहीं है।

प्रचार और प्रोपेगेंडा का उत्तर देने के लिए अपने दृष्टिकोण में स्पष्टता और निश्चितता लानी होगी, फिर किसी भी प्रकार के चरमपंथी प्रोपेगेंडे को तोड़ने के लिए सरकार और सरकारी एजेंसियों को भी अपने प्रचार तंत्र को उतना ही सुदृढ़ रखना होगा। स्कूली और उच्च शिक्षा तथा संचार प्रमुख माध्यम है, जिससे ‘भारत एक राष्ट्र’ के विचार को उस ‘कश्मीरी अवाम’ तक पहुँचाया जा सकता है, जो वहाँ गए पर्यटकों से पूछते हैं – तुम भारत से हो! इसके लिए ज़रूरी है कि भारत सरकार का इन पर पर्याप्त नियंत्रण हो। भारत का राजनैतिक नेतृत्व दृढ़ता दिखाए, जिससे कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास संभव हो, साथ ही शेष भारत के लिए कश्मीर के रास्ते खुले। यह सुनिश्चित करने के उपरान्त ही कश्मीर को इस्लामिक आतंकवाद के गड्ढे़ से निकाला जा सकेगा।

पलायन के उपरान्त विश्व भर में बिखरा कश्मीरी पंडित समुदाय जब हेराथ का (महाशिवरात्रि) का पर्व मना रहा होगा तो निश्चित तौर पर वे आक्रांताओं के प्रत्युत्तर में सतत जलती रहने वाली ज्योति का पुण्य स्मरण भी कर रहे होंगे। शायद शिवभक्तों को किसी दिन डल का किनारा और चिनारों की छाँव नसीब हो। कश्यप के पुत्रों के कश्मीर लौटने के उपरान्त ही कश्मीर में शांति के दिन लौटेंगे।

लेखक: शशांक शेखर सिंह

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