Monday, April 19, 2021
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थूकने वाले लोग: अगर हर हिन्दू सबा नकवी वाले लॉजिक से सोचने लगे तो क्या होगा

क्या भारत का मुस्लिम तब भी ये सोचेगा कि ये दवाई तो हलाल नहीं है क्योंकि इसे बनाने वाली कम्पनी का मालिक, वहाँ काम करने वाले कर्मचारी, वैज्ञानिक आदि गैरमुस्लिम हैं, उसमें दवाई का नाम प्रिंट करने वाला आदमी गैरमुस्लिम है? इतनी घृणा लेकर नफरती अहमद कहाँ जाएगा?

सबा नकवी ने एक वीडियो शेयर किया और बाकायदा बताया कि वो सिर्फ पत्रकार ही नहीं, बल्कि दिल्ली में बेस रखने वाली पत्रकार हैं। दिल्ली लगा देने से वजन आ जाता है। उसके बाद उन्होंने ऐसी बकैती छाँटी कि दिल्ली से बाहर रहने वाले पत्रकार बाप-बाप करने लगे। ख़ैर, सुश्री नकवी जी ने फरमाया कि उन्होंने कुछ खबरें सुनीं जहाँ समुदाय विशेष के सब्जी वालों को मुहल्लों में लोग घुसने नहीं दे रहे।

फिर सबा जी, नामानुसार बहने लगीं, कभी इधर, कभी उधर। सबा मतलब ‘सुबह की हवा’। सुबह की ताजी हवा वाले नाम के साथ ऐसी बासी बात बताई सब जी ने कि क्या कहा जाए- ‘बताओ तुम्हें पता है सिप्ला कम्पनी का मलिक कौन है?’, ‘शाहरुख खान का नाम सुना है’, ‘अजीम प्रेम जी का नाम सुना है’, ‘ताजमहल वाष्पीकृत हो जाए?’, ‘हम चले जाएँ यहाँ से?’।

फिर मैं सोचने लगा कि इतना ज़हर अगर किसी हिन्दू के भीतर आ जाए, और ऐसा शातिरपन भी कि एक रैंडम सी बात को पूरे भारत में लागू होने वाले उदाहरण की तरह बता कर, चार मुस्लिमों और ताजमहल का नाम गिनवा कर, विक्टिम कार्ड स्वाइप करने लगे, तो कैसा दिखेगा?

सबा नकवी के वीडियो में एक फेक न्यूज का भी जिक्र है ताकि बातों को वजन मिले। अंग्रेजी में बोलती हैं तो वजन वैसे ही बढ़ जाता है। दिल्ली में बेस्ड हैं, तो दस-बारह किलो उधर का बन जाएगा! सबा नकवी के लहजे से अगर कोई हिन्दू वीडियो बनाएगा तो कैसा लगेगा?

अगर सबा नकवी के पास एक-दो अपुष्ट खबरें हैं कि किसी मुहल्ले में हिन्दुओं ने समुदाय विशेष के सब्जीवाले को घुसने नहीं दिया, तो मेरे पास तो कई खबरें हैं जिसमें शेरू मियाँ के थूक लगा कर फल बेचने से ले कर, किसी मुस्लिम द्वारा तरबूज में थूक लगा कर काटने की खबर है, किसी जावेद का खुद को संजय बता कर थूक लगा कर सब्जी बेचना आदि शामिल है।

एक हिन्दू अगर सबा नकवी वाले हिसाब से सोचेगा तो…

नमस्कार! मैं नंदन हूँ, छोटे से गाँव गोपालपुर में रहता हूँ। कई दिनों से खबरें सुन रहा हूँ कि विशेष मजहब के लोग सब्जियों और फलों में थूक-थूक कर बेच रहे हैं। मैंने कई वीडियो भी देखे हैं जिसमें कहीं वो चाकू पर थूक कर तरबूज काट रहा है, तो कहीं अपना नाम संजय बता कर हिन्दुओं के मुहल्ले में जाता है, सब्जी पर थूकता है और बेचता है। जबकि उसका असली नाम जावेद है।

इस समुदाय को हिन्दुओं से इतनी घृणा क्यों है? और क्या वो इतने मूर्ख हैं कि वो सोचते हैं कोई बाद में उनकी थूकी सब्जी ले जाएगा और बिना धोए बना लेगा? लेकिन, कोरोना के समय में अगर समुदाय विशेष वाले फलों और सब्जियों पर थूक कर बेच रहे हैं, तो हमारा कर्तव्य बनता है कि न सिर्फ स्वयं को, बल्कि पूरे समाज को ऐसे लोगों की मजहबी घृणा के बारे में सूचित करें, और उन्हें मरने से बचाएँ।

इस महामारी के फैलने का एक तरीका ‘थूक’ भी है। समुदाय विशेष के लोग ये जानते हैं, और वो हिन्दू मुहल्ले में सब्जी बेचने आते हैं, और थूक कर बेचते हैं। इनकी मंशा क्या है? कि हर हिन्दू मुहल्ले में कोरोना एक व्यक्ति से दूसरे तक फैल जाए? हम तो नहीं जानते कि जो बेचने आया है उसमें लक्षण हैं या कल को हो जाएगा, लेकिन वो अपनी तरफ से तो पूरी कोशिश कर रहा है कि अगर एक प्रतिशत भी चान्स है, तो वो थूक कर हिन्दुओं को कोरोना से मार दे।

आप सोचिए कि डॉक्टरों पर कोरोना के मजहबी मरीज थूक रहे हैं। क्या लक्ष्य है इनका? ये चाहते हैं कि कोरोना फैले, सारे हिन्दू मर जाएँ और गजवा-ए-हिन्द का सपना पूरा हो? हिन्दू इलाकों में कोई थूक कर दस रुपए का नोट छोड़ रहा है, कोई वीडियो बना रहा कि ‘ये लोग, मैंने 500 के नोट पर थूक दिया, अब काफिरों को दूँगा’।

क्यों! क्या इस सवाल का कोई जवाब है सिवाय इसके कि हिन्दुओं को सीधे तौर पर निशाना बनाया जा रहा है? क्या ये लोग जानते हैं कि दवाई कि कितनी बड़ी कम्पनियों के मालिक गैर-मुस्लिम हैं? क्या इन्हें पता है कि इन्हीं में से कोई कम्पनी दवाई बनाएगी और उससे ईरान के भी मुस्लिमों का उपचार होगा, अमरीका के भी, भारत के भी और शायद चीन के भी।

क्या भारत का मुस्लिम तब भी ये सोचेगा कि ये दवाई तो हलाल नहीं है क्योंकि इसे बनाने वाली कम्पनी का मालिक, वहाँ काम करने वाले कर्मचारी, वैज्ञानिक आदि गैरमुस्लिम हैं, उसमें दवाई का नाम प्रिंट करने वाला आदमी गैरमुस्लिम है? इतनी घृणा लेकर नफरती अहमद कहाँ जाएगा? आखिर, भारत के गैर मुस्लिमों से इतनी घृणा का क्या कारण है? मैं चैलेंज करता हूँ नफरती लोगों को कि जा कर बड़ी कम्पनियों के नाम देखो, घर में रखी दवाइयाँ देखो, और फिर उसके मालिक का नाम देखो।

और हाँ, किन-किन मंदिरों ने कितने करोड़ का दान दिया है ये भी पता करो। महावीर मंदिर पटना से ले कर तिरुपति बालाजी, सिद्धीविनायक, गोरखनाथ मंदिर, समेत शायद ही कोई ऐसा बड़ा मंदिर होगा जो प्रधानमंत्री के फंड में आर्थिक मदद देने से ले कर अपने इलाके के गरीबों को भोजन नहीं दे रहा। टाटा, अम्बानी, अडानी, महिन्द्रा आदि कम्पिनयों के भी हिन्दू-मुस्लिम होने का पता करोगे?

अक्षय कुमार से भी पूछोगे? नाम तो सुना होगा उसका भी? अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर, धोनी, कोहली सबके नाम तो पता होंगे? तुम्हारी घृणा का आहार बन कर धरती से गायब हो जाएँ ये लोग? गुलजार, प्रसून जोशी गीत लिखना छोड़ दें? अमित त्रिवेदी, शंकर महादेवन से ले कर हर हिन्दू संगीतकार के संगीत को धरती से गायब कर दिया जाए?

भारत के मंदिर देखें हैं? उनकी स्थापत्य कला देखी है जिसमें दस-दस ताजमहल खो जाएँगे? बम मार दें सारे मंदिरों पर क्योंकि वो तुम्हें पसंद नहीं और ले-दे कर हर बार ताज महल का नाम ले लेते हो! बलात्कारी मुगलों, लुटेरे मुगलों, हत्यारे मुगलों द्वारा बनाई गई चीजों को छोड़ कर बाकी सब में डायनामाइट बाँध दें, ताकि तुम्हारे हिन्दू-घृणा में डीपफ्राइ किए कलेजे को ठंढक मिले?

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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