जनरल बख्शी का मज़ाक उड़ाने वालो, लॉन्ड्री ही चलाओ क्योंकि पत्रकारिता तुम्हारे वश की बात नहीं

ज़रूरी है कि हम सब मेजर जनरल गगनदीप बख्शी के बारे में थोड़ा-बहुत जान लें। उनके बारे में जानना इसीलिए भी आवश्यक है ताकि आगे जब भी ऐसे 'हे गाइज' टाइप लोग हमारे रक्षकों का मज़ाक बनाएँ, हम उन्हें करारा सबक सिखाएँ।

आजकल एक नया चलन चला है। हर एक ऐसे व्यक्ति का मज़ाक बनाया जाता है, जिसने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया हो, बलिदान दिया हो, ज़िंदगी खपा दी हो या देशहित में अपना शरीर गलाया हो। मीडिया के नए ब्रीड में आवारा की तरह दिखने वाले और हार्दिक पांड्या से कॉपी किए गए अंग्रेजी एक्सेंट में ‘हे गाइज’ बोलने वाली ये टोली ‘कूल’ बनने के लिए नीचता पर उतर आई है। न्यूज़लांड्री के अभिनन्दन शेखर ने मेजर जनरल गगनदीप बख्शी का मज़ाक बनाते हुए एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें टीवी डिबेट्स में उनके अंदाज को लेकर उनपर तंज कसा गया है। इस वीडियो में अभिनन्दन शेखर मेजर जनरल बख्शी की नक़ल करने की कोशिश में कुत्ते-बिल्लियों की आवाज़ें निकालते हैं और उनके कुछ क्लिप्स दिखा कर ‘कूल’ बनने की कोशिश करते हैं।

ऊपर दिए गए इस वीडियो में मेजर जनरल बख्शी का मज़ाक बनाना उतना दुःखद नहीं है जितना कि कुछ लिबरल्स का आकर इस वीडियो को बढ़ावा देना। तथाकथित अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने इस वीडियो को रीट्वीट करते हुए लिखा कि जीडी बख्शी ‘National Embarrassment’ हैं। ये वही लोग हैं जिनके लिए आतंकवादी तो सहानुभूति के पात्र हैं लेकिन उन आतंकवादियों से लोहा लेकर नागरिकों की रक्षा करने वाले राष्ट्रीय परेशानी। इन लोगों समझाना भैंस के आगे आगे बीन बजाने के बराबर है। स्वरा भास्कर और अभिनन्दन शेखर जैसे लोगों को हम पाठ पढ़ाएँगे लेकिन उस से पहले ज़रूरी है कि हम सब मेजर जनरल गगनदीप बख्शी के बारे में थोड़ा-बहुत जान लें। उनके बारे में जानना इसीलिए भी आवश्यक है ताकि आगे जब भी ऐसे ‘हे गाइज’ टाइप लोग हमारे रक्षकों का मज़ाक बनाएँ, हम उन्हें करारा सबक सिखाएँ।

किश्तवार में पाकिस्तानी मंसूबे को किया नाकाम

कश्मीरी पंडितों की व्यथा किसी से छिपी नहीं है। अपने ही देश में शरणार्थी बनने को मज़बूर हो गए इन पंडितों ने कभी हथियार नहीं उठाया और जहाँ भी रहे, देशहित में अपना योगदान देते रहे। फ़िल्म इंडस्ट्री से लेकर पत्रकारिता तक परचम लहराने वाले कश्मीरी पंडित आज तक अपनी मातृभूमि नहीं लौट सके हैं। उन्हें सबकुछ छोड़ना पड़ा- अपनी संपत्ति, घर-बार.. सबकुछ। कइयों को तो मार दिया गया। इस बारे में लगभग कुछ न कुछ सबको पता है। लेकिन, कश्मीरी पंडितों को घाटी से भगाने के बाद पाकिस्तान के मंसूबे और भी ख़तरनाक हो चले थे। इसके बाद आतंकियों, अलगाववादियों व पाकिस्तान समर्थित ताक़तों की नज़र जम्मू कश्मीर में रह रहे डोगरा लोगों पर पड़ी। किश्तवार जिले में डोगराओं को निशाना बनाया जाने लगा। उनका भी हाल कश्मीरी पंडितों जैसा करने का कुचक्र रचा गया।

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लेकिन, इसी दृश्य में एक ऐसे नायक ने एंट्री ली, जिसके रहते पाकिस्तान और आतंकियों के इरादे असफल हो गए। यह इतना सरल नहीं था। मेजर जनरल बख्शी द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘Kishtwar Cauldron‘ में इस ऑपरेशन की चर्चा की गई है। 2013 में ईद के दौरान एक हिन्दू बाइक सवार मुस्लिम जलूस के बीच फँस गया और उसके साथ बदतमीजी की गई। राष्ट्रविरोधी नारे लगाए गए व उनके बाद भड़के दंगों में कई लोगों की मौत हो गई। आतंकियों की इस बौखलाहट के पीछे वो घाव था जो बख्शी ने उन्हें दिया था। जम्मू से डोगराओं को भगाना आज भी आतंकियों की ‘To Do List’ में है लेकिन हमें मेजर जनरल बख्शी को धन्यवाद करना चाहिए कि उन्होंने इस कुचक्र पर ऐसा प्रहार किया कि अब वे चाह कर भी ऐसा करने में सफल नहीं हो सकते।

भारत के सबसे अनुभवी काउंटर-इंसर्जेन्सी कमांडर्स में से एक जीडी बख्शी को अक्टूबर 2000 में इस क्षेत्र में सेक्टर कमांडर के रूप में तैनात किया गया। परिस्थितियों को नियंत्रित करने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। 2001 में 13 डोगरा हिन्दुओं को निर्ममतापूवक मार डाला गया। उनमे महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। जीडी बख्शी ने इसके बाद आतंकियों के ख़िलाफ़ चौतरफा प्रहार शुरू किया। एक महीने के अंदर-अंदर इस नरसंहार को अंजाम देने वाले सभी आतंकियों का खदेड़-खदेड़ कर उनका काम तमाम कर दिया गया। जीडी बख्शी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने इस जोख़िम भरे ऑपरेशन को अंजाम दिया। डोडा-किश्तवार इलाक़े का भूगोल थोड़ा अलग है। दक्षिण में हिमाचल, पूर्व में कारगिल और पश्चिम में पीर-पंजाल से लगे इस क्षेत्र में आतंकियों ने भारतीय सेना से बचने के लिए पनाह ली थी।

उस समय डोडा में सैन्य उपस्थिति कम थी। इस कारण पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई ने इस इलाक़े का गलत प्रयोग करना शुरू कर दिया था। मानवाधिकार कार्यकर्ता चुप बैठे थे। मीडिया इन ख़बरों को तवज्जो नहीं देती थी। राजनेता डोगराओं की फिक्र नहीं करते थे। डोगरा लगातार पलायन कर रहे थे। उनका नरसंहार हो रहा था। ऐसे समय में जीडी बख्शी ने स्थिति को नियंत्रित किया। 2005 के एक ख़बर में जीडी बख्शी ने साफ़-साफ़ कहा था कि डोगराओं व उनके गाँवों को बचाना उनकी प्राथमिकता है और उसके लिए वह कुछ भी करेंगे। सड़कों की अनुपस्थिति में उन पहाड़ियों पर आतंकियों से लोहा लेना कितना कठिन कार्य रहा होगा, आप सोच सकते हैं। डोडा में आतंकियों का आना 1991 के बाद से ही प्रारम्भ हो गया था।

क्या आपको पता है कि मेजर जनरल जीडी बख्शी अपने परिवार की बात न मान कर सेना में शामिल हुए थे? उनके भाई सृष्टि रमन बख्शी जम्मू कश्मीर राइफल्स का हिस्सा थे। मात्र 23 वर्ष की उम्र में वे एक माइंस ब्लास्ट में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। जिसने अपने भाई को इतनी कम उम्र में खो दिया, वो भी देश की रक्षा हेतु- उस आदमी का मज़ाक बनाने में क्या स्वरा ब्रिग्रेड को शर्म नहीं आती? इसके बावजूद युवा गगनदीप ने एनडीए का फॉर्म भरा और आल इंडिया मेरिट लिस्ट में दूसरे स्थान पर आए। इस व्यक्ति की जिजीविषा को आप समझ सकते हैं। उन्होंने वोलंटरी रूप से कारगिल में अपनी पोस्टिंग कराई- एलओसी से मात्र 5 किलोमीटर दूर।

आपको यह भी बता दें कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर के सबसे कठिन क्षेत्रों में से एक किश्तवार में भी पोस्टिंग स्वेच्छा से ही कराई थी। डोगराओं की वापसी के बाद उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया गया। यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। उन्हें कारगिल में उनके योगदान के लिए विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। अभी भी वे किसी न किसी रूप में देशहित में कार्य करते रहते हैं और टीवी चर्चाओं में भी हिस्सा लेते हैं।

जीडी बख्शी का मज़ाक बनाने की कोशिश कर ख़ुद मज़ाक बन रहे

अगर कोई व्यक्ति अपनी भावनाओं को ज़ाहिर करता है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप उसके चरित्र हनन पर उतर आएँ। सावरकर की प्रशंसा करना अपराध नहीं है। अपने कठिन और लम्बे अनुभवों के आधार पर अगर जीडी बख्शी कुछ कहते हैं तो उन्हें सुना जाना चाहिए क्योंकि आप किसी एसी कमरे में बैठ कर सेना का मज़ाक बनाते हैं जबकि उन्होंने सीमा पर आतंकियों से लोहा लिया है, आपकी रक्षा के लिए। कुत्ते-बिल्ली की आवाज़ निकालने से आप ‘कूल’ नहीं बन जाएँगे और न ही अपने पिता के उम्र के एक सैन्य अधिकारी का अपमान कर आपको कुछ हासिल होगा।

किसी भी देश में अपने सेना के वेटरन्स का सम्मान किया जाता है, उनके लिए तालियाँ बजती है, बच्चों को उनका सम्मान करना सिखाया जाता है। भारत में भी ऐसा होता रहा है लेकिन आज मुट्ठी भर गिरोह विशेष के लोग उनका मज़ाक बना कर युवा पीढ़ियों को दिग्भ्रमित करने का कार्य कर रहे हैं।

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संदिग्ध हत्यारे
संदिग्ध हत्यारे कानपुर से सड़क के रास्ते लखनऊ पहुंचे थे। कानपुर रेलवे स्टेशन के सीसीटीवी से इसकी पुष्टि हुई है। हत्या को अंजाम देने के बाद दोनों ने बरेली में रात बिताई थी। हत्या के दौरान मोइनुद्दीन के दाहिने हाथ में चोट लगी थी और उसने बरेली में उपचार कराया था।

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