Wednesday, April 21, 2021
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लिबरलों को मिली ‘रूदन कक्ष’ हेतु 5 वर्गफीट जमीन, रवीश को पेपर रोल, राठी-कामरा के लिए ChiRAnDh योजना

जहाँ रवीश कुमार को अनपढ़ रवीश भक्तों से जोड़ने के लिए सरकार द्वारा पेपर रोल देने का निर्देश है, वहीं कामरा-राठी जैसे लौंडों के लिए जज ने चिरकुट रोजगार एवम् नल्लारोधी धमाका (ChiRAnDh) योजना बनाने के आदेश दिए हैं।

राममंदिर पर फैसला आ गया। मेरी निजी राय में कम से कम 50 साल और लगते तो सही रहता। आप कहेंगे कि अजीत जी आप पगला गए हैं। वो तो ठीक है कि मैं पगला गया हूँ, लेकिन भारत के सेकुलर तंत्र का क्या? ‘हम भारत के सेकुलर लोग’ का क्या जिसे संविधान के 382वें संशोधन में जोड़ा जाएगा? ‘इंडिया दैट इज भारत’ का क्या जिसे संविधान में ‘हिन्दुस्तान’ नहीं लिखा गया है?

बात समझिए कि सबको ‘ले’ कर चलना होता है। कोर्ट और सरकारें कई बार ऐसा कर चुकी हैं। अतः, पचास साल बाद अगर एक सरकार होती जहाँ ‘स्कोडा लहसुन तहजीब’ का लहसुन वाला हिस्सा प्रबल होता, उनके बुद्धिजीवी (जो हमेशा हिन्दू आतंक से शांति चाहते हैं) बड़ी संस्थाओं में बैठे होते, तब जा कर एक सेकुलर फैसला आता जो इतिहास में सबको स्वीकार्य होता।

अभी तो ज़फ़रयाब गिलानी कह रहे हैं कि मस्जिद अल्लाताला की संपत्ति है, और शरीयत यह कहता है मस्जिद किसी को दी नहीं जा सकती। इस बात पर गिलानी जी ने कुछ खास नहीं बोला कि शरीयत उनके मजहब वालों को आतंकवादी बन कर किसी दूसरे की जमीन पर मस्जिद बनाने से रोकता है या उसको बढ़ावा देता है। क्योंकि ज़फ़रयाब टाइप के लोगों का तर्क यही है कि धरती तो 1528 से शुरु हुई है जब मीर बाक़ी ने मस्जिद बनाई।

जो भी हो, मैं इस फैसले से, एक खाँटी सेकुलर व्यक्ति के तौर पर, बहुत ठगा हुआ महसूस कर रहा हूँ। सुप्रीम कोर्ट ने ‘द वायर’ जैसी मीडिया संस्थाओं द्वारा दिए गए तर्कों की पूरी तरह से अनदेखी कर दी है कि तुलसीकृत मानस में तो कहीं लिखा ही नहीं है कि अयोध्या एक तीर्थस्थल है। सही बात है क्योंकि ‘वायर’ के निकम्मे पत्रकारों को यह कहाँ से पता होगा कि मानस लिखी भले ही चार सौ साल पहले गई है, लेकिन उसका कथानक बाल्मीकि रामायण के समय का है। ‘वायर’ के हिसाब से राम के काल में ही उनके दर्शन को मॉरीशस से हिन्दू जाया करते थे, ऐसा कहीं नहीं लिखा है। ख़ैर मनाइए कि ‘वायर’ ने ये नहीं कहा कि आसमान से प्रकट हुई ‘क़ुरान’ में भी राम का जिक्र नहीं है, तो हिन्दू झूठ बोल रहे हैं।

कोर्ट की मुख्य बातें जो आपको कहीं नहीं मिलेंगी

शायद ध्यान हो कि भारत की आबादी का एक बहुत छोटा हिस्सा हमेशा से विवादित जगह पर ‘स्कूल, कॉलेज या अस्पताल’ बनवाने की बातें करता था। सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बैंच के सातवें जज ने अपने अलग फैसले में लिखा कि चूँकि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है, तो उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देते हुए, उनकी माँगों पर भी कोर्ट ने विचार किया है। इसी के मद्देनज़र, पाँच जजों के फैसले के बाद, उनके विलाप हेतु, हिन्दुओं से दुराग्रह के साथ कुल पाँच वर्गफीट जमीन ‘रूदन कक्ष’ हेतु देने की बात कही गई है।

सातवें जज ने यह भी कहा कि उस कमरे में एक साथ दो-दो लिबरल ही जा सकते हैं। एक रोए तो दूसरा उसकी पीठ पर हाथ फेरे। लेकिन ऐसे कमरे में तरूण तेजपाल टाइप के लोगों को अकेले ही जाने कहा गया है। साथ ही, जज साहब ने बताया कि केन्द्र सरकार यह तय करेगी कि कमरे का डिजाइन कैसा होगा ताकि लिबरलों के विलाप में कमी न आए। गुप्त सूत्रों ने बताया है कि वहाँ मोदी, शाह और योगी जी की तस्वीरें, कम ऊर्जा का उपयोग करने वाली एलईडी टीवी पर, वालपेपर के तौर पर मोंटाज में चलती रहेंगी।

लिबरल ग्रुप की सहअध्यक्षा सागरिका ने कहा है कि वो इस फैसले की कॉपी पर गौर कर रही हैं, कोई आकर जब बताएगा कि उसमें लिखा क्या है, और इस पर उन्हें क्या नहीं बोलना चाहिए तब ही वो इस पर राय दे पाएँगी। गौरतलब है कि सागरिका जी ने आँखों पर वेल्डिंग करते वक्त पहने जाने वाला चश्मा लगाए हुआ था।

मोदी दो दशमलव शून्य के बाद बेरोजगारी की राह पर चल रहे ध्रुव राठी, कुणाल कमरा जैसे टुटपुँजिया लौंडों को लिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को नई नीति बनाने का सुझाव दिया है। पाँच जजों की बेंच के छठे जज ने फैसला ट्वीट करते हुए कहा कि मोदी सरकार के दोबारा आने से पहले ही बेरोजगारी दर बढ़ गई है, और अयोध्या पर आए फैसले से कामरा-राठी टाइप के लौंडों के स्थान विशेष में दर्द उठेगा। दर्द उठने को ले कर जज साहब ने आगे कहा कि ये लोग आयुष्मान योजना का लाभ ले कर फ्री में इलाज कराएँगे जिससे अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।

अतः, सरकार से अपील करते हुए जज साहब ने कहा, “कुछ दे दीजिए बेचारों को… मन लगा रहेगा इनका भी। कोई चिरकुट रोजगार एवम् नल्लारोधी धमाका (ChiRAnDh) योजना बना दीजिए ताकि इनका यूट्यूब चलता रहे।” अमित शाह जी ने इस बात पर कहा है कि ‘संबद्ध मंत्रालय’ इस पर स्वतः कार्य करेगा, और हर बात के लिए उनके पास आने की जरूरत नहीं है।

इसके साथ ही तीसरे तरह के गिरोह को भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बोल्ड अक्षरों में जगह दी है। यह गिरोह मीडिया के अजेंडाबाजों के लिए है जिन्होंने हमेशा यह दुहाई दी है कि हिन्दू समाज मजहब विशेष में डर पैदा कर रहा है। ‘डर का माहौल’ की प्रसूता रवीश कुमार जी के लिए सुप्रीम कोर्ट की पतली बेंच के सबसे अंत में बैठे जज ने कहा है कि रवीश कुमार को भारत सरकार तीन किलोमीटर लम्बी पोस्ट लिखने के लिए कागज का एक ‘रोल’ दे क्योंकि फेसबुक पर, इंडियन एक्सप्रेस के लेख के अनुसार, SC, हिन्दू OBC और हिन्दू सवर्णों से आर्थिक और शैक्षणिक रूप से कहीं बहुत पिछड़े मजहब विशेष वाले नहीं हैं, जो उन्हें पढ़ते हों।

साथ ही, कोर्ट ने नोट किया कि जो मजहबी नाम वाले लोग फेसबुक पर हैं भी, उनमें से अधिकतर मनोहर पर्रिकर से ले कर सुषमा स्वराज आदि की मृत्यु और उरी, पुलवामा जैसे नृशंस हमलों पर ‘हा-हा’ करते नजर आते हैं। कोर्ट के अनुसार ऐसे लोग फेसबुक पर और कुछ करते नहीं, तो रवीश जी किलोमीटर लम्बी अजेंडाबाजी कहाँ से पढ़ पाएँगे। अतः, सरकार को निर्देश देते हुए जज साहब ने कहा कि उन्हें हर दिन बाथरूम में ही रोल पहुँचा दिया जाए, ताकि वो अपनी अजेंडाबाजी विष्ठा डिजिटल से भौतिक रूप में भी फैला सकें।

इसके बाद फैसले में एक बात जो ध्यान देने योग्य थी वो यह है कि बिग बीसी, स्क्रॉल, क्विंट, एनडीटीवी, वायर जैसे मीडिया संस्थानों को कोर्ट ने कहा है कि अगर उन्हें दर्द हो रहा है तो वो एकाध दिन की छुट्टी ले सकते हैं। इस पर राजदीप सरदेसाई ने जज साहब से ट्वीट के जरिए पूछा है कि क्या सरकार प्रेस क्लब में पूरे दो दिन हैप्पी आवर्स का प्रावधान रखवा सकती है? जज ने कहा कि वो मोदी जी से बात करें। इस पर राजदीप ने कहा कि उनका न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ चुका है।

साथ ही ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाले ओवैसी जैसे नेताओं के लिए जज साहब ने कहा कि उन्हें भी पाँच एकड़ जमीन मुहैया कराई जाए ताकि वो वहाँ एक रैली करें, और भीड़ को संबोधित करते हुए, रोज सुबह-शाम, ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम्’ आदि का नारा लगवाएँ ताकि उन लोगों का मुँह बंद हो जाए जो कहते हैं कि भारत का ‘शांतिप्रिय’ राष्ट्र से प्रेम नहीं करता। साथ ही, उनसे यह भी आदरपूर्वक आग्रह किया गया है कि वो धार्मिक सद्भाव के लिए एक मिसाल पेश कर सकते हैं अगर वो ‘भारत माता की जय’ आदि के साथ-साथ ‘जय श्री राम’ का नारा भी लगाएँ। इससे हिन्दुओं को अच्छा महसूस होगा और शांति व्यवस्था बनी रहेगी। ओवैसी या उसके पंद्रह मिनटी भाई ने इस पर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी है, मुँह घुमा कर चले गए।

गंजे लौंडे प्रतीक द्वारा संचालित ऑल्ट न्यूज और पंक्चर का व्यवसाय करने वाले जुबैर नामक व्यक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ खास नहीं कहा। इस पर परमसम्माननीय श्री अजीत भारती जी ने जज साहब को पर्सनली कहा है कि फेक न्यूज फैला कर, इंटरनेट पर चलते चुटकुलों और मीमों की फैक्टचेकिंग करने वाले इन लम्पटद्वय के लिए कुछ तो किया ही जाना चाहिए। इस पर जज साहब ने कहा कि श्री भारती एक ट्वीट लिख कर लोगों से अपील कर दें कि इस गंजे को कोई पैसे न दे। इससे गंजे और पंक्चर वाले का जुबैर का बहुत फायदा भी हो जाएगा और कोर्ट पर यह आरोप भी नहीं लगेगा कि कोर्ट अब ऐसे टुच्चे लोगों के लिए भी विशेष प्रावधान करने लगी है।

कोर्ट की जजमेंट 1000 पन्नों से ऊपर है, और मैं लिखते वक्त भी उसे पढ़ ही रहा हूँ, अतः, आगे कुछ और भी आएगा तो बताता रहूँगा।

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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