कबीरा इस संसार में भाँति-भाँति के कामरेड्स: कथा कामरेड क्रांति कुमार की

कामरेड क्रांति कुमार को लगने लगा कि JNU में ढपली हाथ में लेते ही वह भगत सिंह बन जाएगा, लेकिन वो यह भूल गया कि महज ढपली बजाने से अगर भगत सिंह बन जाते तो ऋषि कपूर को आज यूनेस्को ने बेस्ट भगत सिंह घोषित कर दिया होता।

CAA के विरोध से शुरू हुई क्रांति, छपाक फिल्म देखकर विरोध जाहिर करने में सिमट चुकी है। लड़ना फासीवाद से था, और लड़ टिकट खिड़की पर PVR में पानी की बोतल और झालमूड़ी ले जाने की परमिशन के लिए रहे हैं। इस सब किस्से से मुझे क्रांति कुमार की याद आती है। सीधा-सादा सर्वहारा क्रांति कुमार किस तरह से साथियों की देखा-देखी कामरेड क्रांति कुमार में तब्दील हो गया लेकिन क्रांति फिर भी न आई।

क्रांति कुमार एक आम इंसान हुआ करते थे, इसके बाद क्रांति कुमार ने सोशल मीडिया पर देखा कि व्यवस्था से हर वक़्त नाराज रहने वाले खूब डिमांड में हैं। यहाँ से क्रांति कुमार के जीवन में बड़ा बदलाव आया। अब क्रांति कुमार आम इंसान नहीं रहे। अब क्रांति कुमार कामरेड क्रांति कुमार हो गए हैं। कामरेड क्रांति कुमार ने ट्विटर पर संविधान पढ़ा था और राजनीति शास्त्र की बारीकियाँ उसने एक बुर्जुआ मित्र के साथ पिज्जा ऑर्डर करते वक़्त मुफ्त कूपन इस्तेमाल करते हुए सीखीं थीं।

कामरेड ने फेसबुक पुस्तकालय पर सुना था कि भगत सिंह भी कामरेड हुआ करते थे। क्रांति कुमार ने यह भी सुना था कि महिलाओं के वस्त्र पहनकर उनके विरोध को HD कैमरा जल्दी कैद कर लेता है। अब कामरेड ने सबसे पहले एक ढपली ली और एक पेटीकोट खरीद लिया, जिसके उसके हाल ही में उसके एक साथी ने ही बताया था कि जब सभी मर्द पेटीकोट पहनने लगेंगे तो यह नया कूल हो जाएगा। बुर्जुआ कामरेड ने फिर नव-कामरेड को गाँधी जी की याद दिलाते हुए कहा कि परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करो, यह कहते कहते नव-कामरेड ने वह वस्त्र धारण कर लिया और माथे पर बिंदी भी लगा ली।

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अब कामरेड बनने का आखिरी चरण था- विरोध। कामरेड क्रांति कुमार ने बुर्जुआ साथी से पूछा- “अब लगभग सभी औपचारिकताएँ पूरी हुईं साथी, ये बताओ अब विरोध किसका किया जाए?” साथी कामरेड ने क्रांति कुमार को तुरंत उसकी भूल याद दिलाते हुए कहा- “सुनो साथी, एक कामरेड कभी यह सवाल नहीं कर सकता कि किसका विरोध करें? याद रखो कि तुम्हें बस विरोध करना है, फिर चाहे किसी का भी हो।” क्रांति कुमार को शुरू में बात अटपटी लगी लेकिन यह सोचते हुए कि अगर उसने इसी बात का विरोध कर दिया तो कहीं उसकी नई-नई कामरेड वाली सदस्यता भंग ना हो जाए, क्रांति कुमार ने सर हिलाकर ‘ठीक’ का इशारा किया।

क्रांति कुमार ने सोशल मीडिया स्क्रॉल किया तो देखा कि नाराजगी से भरे हुए उसी के जैसे ही करोड़ों अन्य लोग किसी ना किसी मुद्दे से नाराज थे। कुछ व्यवस्था से नाराज थे, कुछ सरकार से, कुछ मनुवाद से, कुछ हिंदुत्व से, कुछ पितृसत्ता से, कुछ फासीवाद से… दूर कोने में एक छोटा सा ‘अल्पसंख्यक’ वर्ग ऐसा भी था जो सिर्फ पेटीकोट-बिंदी लगाए हुए इंसानों की पहचान न हो पाने से नाराज था। ख़ास बात यह थी कि नाराज होने के बावजूद भी यह वर्ग कामरेड नहीं था, इसने अपनी पहचान ‘अर्बन ट्रोल’ के रूप में बताई।

ट्रेंडिंग परेशानियों में CAA का विरोध और मोदी-शाह का विरोध देखकर क्रांति कुमार को मानो नाराज होने की दवा ही मिल गई। क्रांति कुमार को ध्यान आया कि कुछ चुनिंदा लोग तो मात्र मोदी-शाह के नाम से ही 2014 से नाराज हैं। उसे ध्यान आया कि रवीश कुमार जी से लेकर स्वरा भास्कर और अब अनुराग कश्यप जैसे बड़े नाम भी मोदी-शाह से नाराज हैं और निरंतर नाराज ही हैं, इस नाराजगी से एक दिन का भी अवकाश नहीं। उसके मन में तुरंत विचार आया कि यह सबसे सही ‘गोची’ है।

तुरंत क्रांति कुमार ने JNU जाकर CAA का विरोध करने की प्रतिज्ञा ली। और इसके लिए उसने सबसे पहले एक ढपली खरीद ली। ढपली के साथ उन्हें एक फिल्म का टिकट मुफ्त मिला। कामरेड क्रांति कुमार को लगने लगा कि JNU में ढपली हाथ में लेते ही वह भगत सिंह बन जाएगा, लेकिन वो यह भूल गया कि महज ढपली बजाने से अगर भगत सिंह बन जाते तो ऋषि कपूर को आज यूनेस्को ने बेस्ट भगत सिंह घोषित कर दिया होता।

एक समय था जब बाप सीना चौड़ा कर कहता था कि उसका बेटा क्रांति कुमार फलां कॉलेज से टॉपर निकला है। टॉपर ना सही तो बेटे के ग्रेजुएट होने में भी वह गर्व महसूस कर लेता था। अब बाप की खुशी इस बात में सिमट गई है कि क्रान्ति कुमार किसी कॉलेज में गया और वहाँ पेटीकोट पहनते हुए ढपली बजाकर प्रोग्रेसिव नजर आने लगा है। मने, बाप भी खुश और बेटे के भी शौक पूरे।

एक रोज क्रान्ति कुमार कॉलेज जाता है। शाम होते कामरेड क्रांति कुमार फैज़ को गुनगुनाते हुए घर लौटता है… ‘हम भी देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे।’ मांँ कहती है- हाथ-मुँह धुलकर खाना खा ले। कामरेड बेटा जवाबी हमले में कहता है- “माँ के हाथ का बना नहीं खाऊँगा, जब तक बाप किचन में जाकर खाना नहीं बनाएगा, तब तक वो भूख हड़ताल करेगा, गाँधी जी भी यही करते।”

इतना सुनकर दिल्ली की सर्दी में टीवी पर प्राइम टाइम में बर्निंग क्वेश्चन वाली डिबेट की अलाव ताप रहा बाप तिलमिलाया हुआ बिस्तर से फ़ौरन कम्बल त्यागकर उठता है। बेटे क्रांति कुमार के पिछवाड़े पर जोर की लात मारते हुए कहता है- “नालायक, हमारी तो पितृसत्ता में ही खूब निभी, मैं दफ्तर जाता, मेरी बीवी घर संभालती। तूझे परेशानी है तो आज से ही किचन में जाकर खाना-पकाना, चूल्हा-चौका सब तेरे हिस्से। अब लड़ पितृसत्ता से। गाँधी जी भी तो कहते थे- बी दी चेंज दैट यू विश टू सी इन दी वर्ल्ड।”

बापू का यह रूप देखकर और कुछ करने का नाम सुनकर क्रांति कुमार रूठ जाता है। जब लात पड़ी तब फैज़ भी नहीं आए, न बापू आए। अब मम्मी उसे मना रही है, क्रांति कुमार आज भी भूखा नहीं सोएगा।

पिछवाड़े पर पड़ी बाप की लात के दर्द से कराहते हुए क्रांति कुमार बस याद कर रहा है- कितना विरोध पेंडिंग रह जाएगा। सिस्टम और व्यवस्था से लड़ने के लिए उसने जो नारे लगाने के सपने देखे थे। स्वरा और दीपिका की फिल्म देखकर सत्ता पलटनी थी, क्रांति वाले हैशटैग चलाने थे। दर्द के इन पलों में फैज़-वैज की जगह कामरेड क्रांति कुमार को बस कबीर का वह दोहा याद आया, जो उसके साथियों ने ‘हम भी देखेंगे’ वाले व्हाट्सएप्प ग्रुप में शेयर किया था- “कबीरा इस संसार में भाँति-भांति के लोग… “

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