स्क्रॉल डॉट इन: यहाँ मोदी-विरोध की खबरों का पंक्चर ठीक किया जाता है

स्क्रॉल वालों ने ममता को फासीवादी, तानाशाह, लोकतंत्र की हत्यारिन, आदि नहीं कहा। अगर ये कहेंगे भी तो खानापूर्ति करते हुए, माइल्ड ट्रीटमेंट के साथ पूछेंगे कि 'क्या ममता के बंगाल की हिंसा मोदी के उद्भव के कारण हिन्दुओं के भीतर छिपी घृणा की अभिव्यक्ति है?'

स्क्रॉल डॉट इन एक प्रोपेगेंडा पोर्टल है लेकिन स्वयं को ‘फ्री प्रेस’ और ‘ऑल्टरनेट जर्नलिज़्म’ के नाम पर भुनाता है। मीडिया के गिरोह विशेष, या यूँ कहें कि गैंग का यह एक महत्वपूर्ण सदस्य है जिसकी खबरों पर वामपंथी ईकोसिस्टम के लिबटार्ड क़समें खाते हैं, और चरमसुख पाते हैं।

ऐसा नहीं है कि इनके संस्थान में जो एडिटर बैठे होंगे, उन्हें यह बात मालूम नहीं होगी कि कभी-कभी कुछ बातों को सवालिया निशान के साथ रिपोर्ट बना कर रख देना भी पक्ष लेने जैसा ही होता है। यह बात आम पाठकों को शायद पता नहीं हो, लेकिन पत्रकारों को बेहतर पता होता है। हालाँकि, नैतिकता जैसी चीज तो ऐसे पोर्टलों के लिए सेमिनारों में बोलने के लिए बनी है, इसलिए ये इनका प्रयोग नहीं करते।

जब ट्वॉयलेट पेपर खत्म हो जाता है तो आप ढूँढते हैं कि वो कहाँ रखा हुआ है। इसी क्रम में जब स्क्रॉल वेबसाइट पर यह देखने पहुँचा कि क्या इन्होंने ममता बनर्जी के बंगाल में हो रहे चुनावी हिंसा पर कुछ लिखा है? तो, कुछ नहीं मिला। कुछ नहीं से मतलब यह नहीं है कि चुनावी हिंसा की बात थी ही नहीं, बल्कि थी और वो तृणमूल के नेता के बयान पर आधारित थी कि भाजपा के गुंडे बंगाल में मार-पीट कर रहे हैं।

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फिर मुझे याद आया आज से ठीक एक साल पहले का समय जब बंगाल चुनावों के दौरान इतनी ज्यादा हिंसा हुई कि रवीश कुमार के हर फेसबुक पोस्ट पर लोगों ने सवाल उठाना शुरू किया कि वो बिहार में हो रही झड़पों पर तो रोने-गाने लगते हैं, बंगाल पर क्यों नहीं लिख रहे। फिर एक दिन रवीश के ज़मीर ने ललकारा और उन्होंने देश को बताया कि बंगाल में हिंसा हो रही है। ये बात और है कि उन्हें ये बात पता नहीं थी कि वहाँ की मुख्यमंत्री कौन है, पुलिस संविधान के किस लिस्ट में आती है, कानून व्यवस्था का ज़िम्मा किसका है। उन्होंने खानापूर्ति की थी।

स्क्रॉल ने भी वही किया है। बंगाली भोजन पर आर्टिकल है, विद्यासागर पर आर्टिकल है कि बंगाली बच्चों की वर्णमाला का ज्ञान उन्हीं की किताब से आया है, ममता के मीम पर भी लेख है, लेकिन आप स्क्रॉल करते जाइए आपको पता चलेगा कि बंगाल की चुनावी हिंसा पर यहाँ न तो रिपोर्ट है, न ओपिनियन। और भी बहुत ज़्यादा ज़रूरी बातों पर लेख है कि मोदी ने डिजिटल कैमरा कब इस्तेमाल किया था, क्योंकि वो जानना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। फिर आप ‘यस्टरडे’ में पहुँच जाते हैं।

Scroll.in के पोर्टल का स्क्रीन ग्रैब जहाँ बंगाल में हर तरफ ख़ुशहाली है

लेकिन इन सब में एक बात जो उभर कर सामने आई वो यह है कि मोदी यहाँ छाए हुए हैं, भले ही नकारात्मक बातों को लिए। मुख्य ख़बर मीडिया की न्यूट्रेलिटी को लेकर है कि मोदी का विचार ख़तरनाक है। हालाँकि, यह बात स्क्रॉल की लीड बने, तो मज़ेदार हो जाती है। मतलब स्क्रॉल मीडिया की निष्पक्षता पर लेख लिख रहा है।

हम उस पर भी नहीं बात करने वाले क्योंकि स्क्रॉल और मीडिया न्यूट्रेलिटी की बातें करना वैसा ही जैसे आईसिस वाला शांति के बारे में बताने लगे अपने सामूहिक नरसंहार वाले विडियो के पहले कुछ सेकेंडों में।

मेरा ध्यान राहुल गाँधी से जुड़ी एक ख़बर पर गया जहाँ, आप ने सही गेस किया, मोदी की ही बात हो रही थी। एक तो राहुल गाँधी को लोग सीरियस लेने लगते हैं, और उसकी बातों को चुनाव के दौरान छापते हैं, फिर भी राहुल गाँधी, जिनके मुँह में रवीश कुमार सवाल के साथ जवाब भी ठूँस देते हैं कि क्या उनको लगता है कि विपक्ष को मीडिया में जगह नहीं मिल रही, कहते हैं कि उन्हें जगह नहीं मिलती। ये बोलते हुए उनके डिम्पल भी पड़ते हैं।

राहुल गाँधी ने कुछ भी सेंसिबल नहीं बोला होगा, या स्क्रॉल के लिए भी उनकी नीति या विजन को लेकर कही बातें ज़रूरी नहीं लगी होंगी, इसी कारण उन्होंने भी वो हिस्सा उठाया जिससे उन्हें ज़्यादा हिट्स आते। आज कल मोदी ही पक्ष में हैं, मोदी ही विपक्ष में। पक्ष वाले भी मोदी-मोदी कह रहे हैं, विपक्ष वाले भी मोदी-मोदी ही कह रहे हैं। तो स्क्रॉल भी, जो कि विपक्ष में ही खड़ा है, भले ही साइट का एक्सेन्ट भगवा हो, मोदी-मोदी से ही दुकान चला रहा है।

मोदी का इंटरव्यू

इससे पहले की आगे बढ़ूँ, एक संदर्भ बताना ज़रूरी है। हाल ही में दीपक चौरसिया ने प्रधानमंत्री मोदी का इंटरव्यू लिया था, जिसमें साक्षात्कार के अंत में दीपक चौरसिया ने मोदी से कहा कि वो कोई कविता सुना दें। मोदी ने अपने स्टाफ़ से कुछ पन्ने मँगवाए और कविता पढ़ी। पन्ने कैमरे में भी क़ैद हुए और वहाँ यह भी दिखा कि मोदी को पूछा गया वही सवाल पहले से प्रिंट किया हुआ था।

कुछ लोगों के कान खड़े हो गए, और वो दुनिया को यह बताने लगे कि इंटरव्यू तो स्क्रिप्टेड था। आम आदमी भी सोचने लगता है कि पहले से सवाल दे दिए गए थे, और रवीश जी जैसे विद्वान कहते हैं कि फ़िक्स था, तो फ़िक्स ही रहा होगा। लोगों को यह बात पता नहीं होती कि आपको अपने स्कूल की मैगजीन के लिए भी अगर किसी शिक्षक का इंटरव्यू लेना हो, तो भी प्रक्रिया यही है कि आपको अपने सवाल बताने होते हैं, ताकि सामने वाले तैयार रहे।

जिसका भी आप इंटरव्यू लेने वाले हैं, पहले तो उसकी सहमति होनी चाहिए। दूसरी बात आपको एक प्रीइंटरव्यू के तौर पर सारे सवाल अपने सामने वाले को बताने होते हैं। ये उसकी इच्छा है कि वो किस सवाल की आपको अनुमति दे, किसकी नहीं।

ख़ासकर ऐसे मौक़ों पर जिसमें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, गृहमंत्री, रक्षामंत्री, वित्तमंत्री आदि हों, तो उनके सचिव और कार्यालय के ऊपर होता है कि सारे प्रश्नों को देखें, छाँटे, संपादित करें। फिर वो इंटरव्यू लेने वाले के पास भेजा जाता है। अगर वो इनके कार्यालय द्वारा भेजे गए लिस्ट से सहमत है तो इंटरव्यू का दिन और समय आदि तय करता है।

इतनी तैयारी दो बातों के लिए होती है। पहली ये कि हर पद की एक गरिमा होती है। रैली करते राजनेता और देश के प्रधानमंत्री में अंतर होता है। इसीलिए आप उसे पार्टी का नेता मानकर अपने हिसाब से कुछ भी पूछने को स्वतंत्र नहीं होते। दूसरी बात ये है कि अगर पहले बताया ना जाय तो एक घंटे चलने वाले इंटरव्यू में बोलने के लिए आँकड़े हर वक़्त आपके पास नहीं होते।

राहुल ने उड़ाया मजाक, स्क्रॉल ने हमें बताया

यही कारण है कि मोदी के पास जो पन्ने थे, उस पर सवाल पहले से लिखे हुए थे। इस पर राहुल गाँधी ने दीपक चौरसिया से एक बातचीत के दौरान उसी संदर्भ में पूछ लिया कि क्या मोदी ने जो जवाब दिए वो पहले से पन्ने पर लिखे हुए थे?

स्क्रॉल के मुताबिक़ ये जवाब इंटरनेट पर वायरल हो गया है। हो सकता है हो गया हो, जब हर दिन टिकटॉक पर ग्लास से मुँह पर पानी मार कर रोते हुए नवयुवकों का विडियो वायरल होता रहता है तो राजनीति के उभरते हुए नफरत-प्यार का टॉनिक बेचने वाले कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुटकुले क्यों वायरल नहीं होंगे।

हेडलाइन में इस बात को ऐसे जताया गया है मानो पूरी दुनिया के लोग इंटरव्यू की तैयारी नहीं करते और सारे सवालों के जवाब स्मृति के आधार पर देते हैं। और तो और, जिस विडियो की स्क्रॉल बात कर रहा है, वो सवाल मोदी द्वारा लिखी हुई एक कविता का था, जो स्क्रॉल के हिसाब से ‘डिड ही आन्सर फ़्रॉम हिज़ मेमरी’ होना चाहिए था। मतलब, कविता पूरी याद कर लेते, और तब सुनाते।

समस्या यहाँ यह है कि स्क्रॉल ने इसे इस हिसाब से रखा है जैसे मोदी के पास पन्ने पर लिखा हुआ जवाब का होना विश्व की ऐसी पहली घटना है। एडिटर जानते होंगे कि प्रधानमंत्री के इंटरव्यू के सारे सवाल पीएमओ या उनके स्टाफ़ के पास होते हैं, ताकि वो सही आँकड़े या रेफरेंस के हिसाब से तैयारी कर सकें। लेकिन जब पत्रकारिता की जगह मज़े लेना ही उद्देश्य हो तो राहुल गाँधी के क्यूट डिम्पल पर, उन्हें समोसा कैसा लगा, इन बातों पर भी पत्रकारिता होती रहनी चाहिए।

स्क्रॉल को मैं ज्ञान नहीं दे रहा क्योंकि वो ज्ञान लेने की स्थिति से बाहर जा चुके हैं। जिन्हें मोदी फासिस्ट और लोकतंत्र का हत्यारा दिखता है, लेकिन ममता के बंगाल में तृण और मूल सब हरे-हरे हैं, तो ऐसे लोग और क्या पत्रकारिता करेंगे। मैंने सोचा कि साइट पर खोजूँ जहाँ इन्होंने ममता से रवीश कुमार ब्रांड वाले कड़े सवाल किए होंगे कि मरने वाले चाहे भाजपा के हों, या तृणमूल के, पुलिस तो बंगाल सरकार की है, तो ममता ने क्या उपाय किए इस संदर्भ में?

‘लोगों की लटकती लाशों का सिलसिला कब थमेगा ममता जी?’, ‘पंचायत चुनावों से लेकर, विधानसभा चुनाव और अब लोकसभा चुनाव तक, बंगाल हिंसा का पर्याय क्यों बन गया है?’, ‘आपके राज्य में हर मुहर्रम और दुर्गा पूजा से लेकर अब सरस्वती पूजा और रामनवमी तक दंगे क्यों होते हैं?, ‘आपके राज्य में बर्धमान, धूलागढ़, पुरुलिया, मालदा, कालियाचक, इल्लमबाजार, हाजीनगर, रानीगंज, मुर्शीदाबाद, जलांगी, मिदनापुर, आसनसोल आदि जगहों पर लगातार दंगे क्यों हो रहे हैं?’

स्क्रॉल ने ऐसे सवाल नहीं उठाए हैं। स्क्रॉल वालों ने ममता को फासीवादी, तानाशाह, लोकतंत्र की हत्यारिन, आदि न तो कहा, न शायद कह पाएँगे क्योंकि इनके अजेंडा को यह सूट नहीं करता। अगर ये कहेंगे भी तो रवीश की ही तरह खानापूर्ति करेंगे और माइल्ड ट्रीटमेंट के साथ लिखेंगे कि ‘क्या ममता के बंगाल की हिंसा मोदी के उद्भव के कारण हिन्दुओं के भीतर छिपी घृणा की अभिव्यक्ति है?’

क्योंकि घूम-फिर कर, सारी हिंसाएँ, सारे दंगे, एक व्यक्ति के सत्ता में आने के कारण हो रहे हैं। ममता के पास पुलिस है, लेकिन हिन्दुओं के मन से कानून का ख़ौफ़ मोदी के आने से निकल गया है और वो बंगाल में दंगे कर रहे हैं। कितना क्यूट है ना स्क्रॉल? बिलकुल राहुल गाँधी के डिम्पल्स की तरह।

इसीलिए कहता हूँ, कि स्क्रॉल को तेज़ी से स्क्रॉल करते रहिए, जैसे आप ट्वॉयलेट पेपर के रोल के साथ करते हैं। ट्वॉयलेट पेपर कम से कम अपने ऊपर फ़्री प्रेस तो नहीं लिखता, और अपना नीयत कार्य भी करता है, स्क्रॉल तो खैर… जाने दीजिए!

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