Friday, October 2, 2020
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BHU की परम्पराओं को ख़त्म करने की साजिश: प्रशासन ने दिए आधे-अधूरे जवाब तो फिर से धरने पर बैठे छात्र

"आने वाले समय में अगर ऐसा ही रहा तो नित्य जीवन में भी परंपरा का पालन करने वाले छात्र यहाँ आना छोड़ देंगे तो शायद प्रशासन की मंशा फलित हो जाए लेकिन आज जिस तरह से हम संघर्ष कर रहे हैं इसके पीछे भी हमारे गुरुओं का आशीर्वाद, उनकी सीख और परंपरा ही है। हम इतनी आसानी से नहीं सब कुछ नष्ट नहीं होने देंगे।"

काशी हिन्दू विश्विद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति की उच्च स्तरीय जाँच की माँग चल ही रही थी। इस बीच आज जब विश्विद्यालय प्रशासन द्वारा छात्रों से माँगी गई 10 दिन की समय सीमा भी समाप्त हो गई। तो छात्र संकाय प्रमुख के पास अपनी माँगों के लिखित जवाब के लिए के लिए पहुँचे, जहाँ प्रशासन ने पहले अनसुना किया फिर संकाय के गेट का घेराव कर बैठे छात्रों को प्रशासन के कहने पर SVDV के ही साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष उमाकांत चतुर्वेदी द्वारा कुछ आधे-अधूरे जवाब थमाए गए। इससे नाराज और असंतुष्ट छात्र पुनः धरने पर बैठ गए हैं।

अब SVDV के छात्रों का कहना है कि यह धरना तभी समाप्त होगा जब उनकी माँग पूरी होगी क्योंकि वे कुछ अनुचित नहीं माँग रहे हैं। वो परंपरा और धर्म की रक्षा के लिए जीने वाले छात्र हैं। हिन्दू धर्म और इसकी सनातन परम्पराएँ उनके लिए सब कुछ हैं अतः प्रशासन द्वारा थोपे गए किसी गैर हिन्दू को गुरु मानने को तैयार नहीं है।

बता दें कि बीएचयू संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में डॉक्टर फिरोज खान की नियुक्ति पर दस दिन बाद भी सही जवाब न मिलने के विरोध में छात्रों ने संकाय के गेट पर ही धरना शुरू कर दिया है। इस दौरान संकाय प्रमुख और साहित्य विभागाध्यक्ष पर नियमों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए छात्रों ने नारे लगाते हुए कार्रवाई की माँग की।

इससे पहले डॉ. फिरोज खान की SVDV में नियुक्ति में गड़बड़ी के विरोध में 7 से 21 नवंबर तक कुलपति आवास के सामने बैठे छात्रों को बीएचयू प्रशासन ने दस दिन के भीतर जवाब देने की लिखित सहमति दी थी। 30 नवंबर को दस दिन बीतने के बाद सोमवार (दिसंबर 2, 2019) को संकाय प्रमुख ने जो अधूरा जवाब दिया, उससे छात्र सहमत नहीं हुए और विरोध में पुनः धरने पर बैठ गए। संकाय में पठन-पाठन पहले से ही बंद है। साथ ही छात्रों ने 5 दिसंबर से होने वाली परीक्षा का बहिष्कार करने की भी चेतावनी दी है।

SVDV के छात्रों के प्रश्नों पर साहित्य विभाग का जवाब

संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के साहित्य विभाग में क्या अन्य सभी विभागों के सदृश ही शॉर्ट लिस्टिंग हुई?

जवाब- हाँ, वैसे ही हुई।

क्या शॉर्ट लिस्टिंग में सम्मिलित व्यक्ति संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के पारंपरिक (सनातन धर्म) संबंधित नियमों को ध्यान में रखकर किया गया?

जवाब- साहित्य विभाग में नियुक्ति हेतु आवेदनों की शॉर्ट लिस्टिंग विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में शिक्षकों और अन्य शैक्षिककर्मियों की नियुक्ति हेतु न्यूनतम अर्हता और उच्चतर शिक्षा में मानकों के रख-रखाव हेतु अन्य उपाय संबंधी विनियम, 2018 के अनुसार की गई है।

इस शॉर्ट लिस्टिंग में यूजीसी के किस नियम को अपनाया गया?

जवाब- शॉर्ट लिस्टिंग प्रक्रिया में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में शिक्षकों और अन्य शैक्षिक कर्मियों की नियुक्ति हेतु न्यूनतम अर्हता तथा उच्चतर शिक्षा में मानकों के रख-रखाव हेतु अन्य उपाय संबंधी विनियम, 2018 के खंड 3 एवं 4 और परिशिष्ट द्वितीय तालिका 3 (ए) के प्रावधानों को अपनाया गया है।

इस नियुक्ति में क्या विश्वविद्यालय प्रशासन ने विश्वविद्यालय संविधान के अनुसार नियुक्ति प्रक्रिया संपन्न की है?

जवाब- इसका उत्तर विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा दिया जाएगा। 

क्या बीएचयू संविधान के 1904, 1906, 1915, 1951, 1966 एवं 1969 को केंद्र में रखकर नियुक्ति किया गया है?

जवाब- इसका उत्तर विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा दिया जाएगा।

प्रशासन के कहने पर साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष द्वारा दिया गया जवाब

संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय द्वारा जारी उत्तर को आंदोलकारी छात्रों ने मजाक बताया। ऑपइंडिया से हुई बातचीत में चक्रपाणि ओझा का कहना है, “आज 11 दिन बाद प्रशासन ने SVDV के ही साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष को उत्तर देने के लिए भेजा किन्तु वह पूरे प्रश्नों का उत्तर ही नहीं दे पाए और जिसका दिया वह भी अस्पष्ट तथा बिना प्रमाण के।

छात्रों ने असंतुष्टि जाहिर करते हुए पुनः धरने पर बैठ गए

प्रशासन के कहने पर विभागाध्यक्ष द्वारा दिए गए जवाबों पर शशिकांत मिश्र, आनंद मोहन झा, कृष्ण कुमार सहित कई छात्रों ने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए। छात्रों ने इन जवाबों पर जब काउंटर सवाल किए तो प्रशासन की तरफ से अभी तक इन प्रतिप्रश्नों और पहले के प्रश्नों का कोई जवाब नहीं आया है।

SVDV के छात्रों द्वारा पूछे गए प्रति प्रश्न

  1. अगर हर विभागों में शॉर्टलिस्टिंग की एक ही प्रक्रिया अपनाई गई है तो, एक ही व्यक्ति की अलग-अलग विभागों में स्कोरिंग पॉइंट्स में अंतर क्यों है?
  2. धर्म विज्ञान संकाय के पारंपरिक (सनातन धर्म) के नियमों को शॉर्टलिस्टिंग में ध्यान रखा गया या नहीं? इसके उत्तर में UGC 1018 के अधिनियम का हवाला दिया गया। मतलब पूछा आम और बताया इमली।
  3. अगर UGC के 2018 अधिनियम के तहत नियुक्ति हुई तो साक्षात्कार में 0 व 100% नम्बर कैसे दिए गये? क्योंकि 0 व फुल नम्बर देने का कोई प्रावधान नहीं है।
  4. इस प्रश्न का उत्तर अभी तक प्रशासन खोज नहीं पाया।
  5. इसका भी उत्तर नहीं मिला।

SVDV के छात्रों ने ऑपइंडिया को बताया, “हमारे सवाल वही है किसी भी प्रश्न का प्रशासन ने सही जवाब नहीं दिया, बस गोलमोल जवाब देकर अपनी बात रखनी चाही जिसे हमने नामंजूर कर दिया और पुनः संघर्ष का रास्ता चुना है। अब भी मूल सवाल वही है कि क्या BHU एक्ट के नियमों को ताक पर रखकर नियुक्ति की गई है?

धरना समाप्त करने के लिए प्रशासन ने छात्रों से 10 दिन की मोहलत माँगी गई थी। छात्रों ने प्रशासन की बात मानते हुए और समुचित कार्रवाई के आश्वासन पर धरना बेशक समाप्त कर दिया लेकिन अपने आंदोलन को जारी रखा और अब जब छात्रों द्वारा दी गई 10 दिन की मोहलत समाप्त हो गई तो छात्र एक बार फिर से अपनी माँगों पर अडिग हैं।

डॉ. मुनीश मिश्र ने ऑपइंडिया से बात करते हुए प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगाए साथ ही इस समस्या के दूरगामी परिणाम की तरफ इशारा करते हुए एक और बात बताई। डॉ.मिश्र ने कहा,

“विश्वविद्यालय के एक्ट के अनुसार लॉ फैकल्टी में पहले हिन्दू लॉ (न्याय व मीमांसा दर्शन) को बतौर सब्जेक्ट पढ़ाया जाता था। आर के मिश्रा के डीन के रूप में कार्यकाल के दौरान इसको कोर्स से हटवा दिया गया। कुछ अध्यापक विरोध करते रहे पर उनकी बात नही सुनी गई और महामना व विश्वविद्यालय के संविधान को बदल दिया गया। वह परम्परा ही समाप्त हो गयी। जबकि अलीगढ़ में अभी भी मुस्लिम लॉ की पढ़ाई होती है।”

उन्होंने एक गंभीर प्रश्न खड़ा किया:

“क्या लॉ कॉलेज की तरह धर्म विज्ञान संकाय की परम्पराओं को खत्म करने की कहीं साजिश तो नही की जा रही है? पहले भी कई बार इस संकाय व संकाय के छात्रावास को परिसर से हटाने का यहीं के लोगों के द्वारा प्रयास किया गया है। यह संकाय हमेशा से प्रशासन की दृष्टि में उपेक्षित रहा है। जिसकी वजह से यहाँ अध्यापकों की संख्या एकदम न्यून है। 19 विषय पढ़ाने के लिए मात्र 37 अध्यापक। किसी किसी विषय मे मात्र एक ही अध्यापक हैं, जबकि यहाँ स्नातक, स्नातकोत्तर व पीएचडी के कोर्स के साथ ही 5 डिप्लोमा कोर्स भी हैं व सभी मे छात्र पढ़ रहे हैं। पढ़ाई को कवर करने के लिए 50 से ऊपर अतिथि अध्यापक व उतने ही शोध छात्रो के बदौलत कक्षाओं के संचालन किया जाता है। जिससे ये संस्थान प्रशासन की उपेक्षा के बाद भी चलता रहा।”

उन्होंने आरोप लगाया, “प्रशासन की उपेक्षा से ये ख़त्म नहीं हुआ, उपेक्षा का एकमात्र कारण ऐसे कुलपतियों का यहाँ आना भी रहा जो वामपंथी विचारधारा से प्रेरित थे। जिनकी हिन्दू धर्म और सनातन परम्पराओं में कोई रूचि नहीं रही। कॉन्ग्रेस के शासन के दौरान जब वामपंथ का बोलबाला रहा तभी BHU के संविधान से काफी छेड़छाड़ हुआ। इसे सेक्युलर बनाने के चक्कर में BHU के मूल ताने-बाने से भी छेड़छाड़ हुआ।”

चक्रपाणि ओझा ने इसमें एक और बात जोड़ी, “अब जब केंद्र में कहने को हिन्दू धर्म समर्थक सरकार है तो भी विश्विद्यालय के सनातन धर्म को समर्पित एक विभाग में मालवीय जी के मूल्यों और भावनाओं के खिलाफ एक गैर-हिन्दू की नियुक्ति कर यहाँ के पारम्परिक छात्रों को जिनका उद्देश्य ही पूजा-पाठ, कर्मकांड, हिन्दू धर्म के सिद्धांतों और सनातन परम्पराओं का प्रचार-प्रसार है। उन छात्रों को बाध्य किया जा रहा है कि वे एक मुस्लिम व्यक्ति को अपने शास्त्रों से जुड़े साहित्य और सनातन मूल्यों को शिक्षित करने का अधिकारी माने उसे अपने गुरु के रूप में स्वीकार करें।”

एक और छात्र शशिकांत मिश्र ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “आने वाले समय में अगर ऐसा ही रहा तो नित्य जीवन में भी परंपरा का पालन करने वाले छात्र यहाँ आना छोड़ देंगे तो शायद प्रशासन की मंशा फलित हो जाए लेकिन आज जिस तरह से हम संघर्ष कर रहे हैं इसके पीछे भी हमारे गुरुओं का आशीर्वाद, उनकी सीख और परंपरा ही है। हम इतनी आसानी से नहीं सब कुछ नष्ट नहीं होने देंगे।”

छात्रों का यह भी कहना है कि जब हम क्या चाहते हैं इसकी अधिकांश को समझ भी नहीं थी तो हम अपनी बात समझाने के लिए धरने पर बैठे तो आज जब धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए जागरूक शंकराचार्यों, पूर्व प्रोफेसरों, काशी विद्वत परिषद से लेकर तमाम विद्वानों, संतो-महंतों और देश के हिन्दू मान्यताओं में भरोसा रखने वाले लोगों का समर्थन और साथ हमारे साथ है तो भला पीछे कैसे हट सकते हैं। बता दें कि उक्त सभी द्वारा डॉ. फिरोज खान की धर्म विज्ञान संकाय में इस नियुक्ति के खिलाफ और मालवीय मूल्यों के संरक्षण के लिए मुखर विरोध दर्ज कराते हुए सभी छात्रों के समर्थन और नियुक्ति रद्द करने से लेकर इस पूरे मामले के समाधान के लिए विश्विद्यालय के विजिटर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को कई पत्र लिखे गए हैं। हाल ही में संकाय के छात्रों ने भी अपनी तरफ से प्रधानमंत्री मोदी और मानव संसाधन मंत्रालय को पत्र लिखा। तो वे अब इस समस्या के समाधान तक डटें रहने के निर्णय पर अडिग हैं, ऐसा ऑपइंडिया को आनंद मोहन झा ने बताया।

अब जब एक तरफ छात्र पुनः धरने पर बैठ गए हैं और उधर फिरोज खान आयुर्वेद संकाय के संस्कृत विभाग में इंटरव्यू दे चुके हैं और सूत्रों ने वहाँ उनके चयन की भी पुष्टि की है। फिरोज खान का एक और इंटरव्यू 4 दिसंबर को कला संकाय के संस्कृत विभाग में है तो ऐसे में बीएचयू में 7 दिसंबर को होने वाली कार्यकारिणी परिषद की बैठक को अहम माना जा रहा है। हालाँकि, अभी यह तय नहीं हो पाया है कि बैठक दिल्ली में होगी या बीएचयू परिसर में, लेकिन ऑपइंडिया सूत्रों के अनुसार बैठक में आगामी 23 दिसंबर को होने वाले विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में पदक, उपाधि, मुख्य अतिथि के नाम सहित संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति पर चर्चा अहम एजेंडा है। तो देखते हैं आगे क्या होगा? क्या प्रशासन अपनी गलती मानते हुए उसमे सुधर करेगा या छात्रों पर ही दबाव डालकर उन्हें तोड़ना चाहेगा? जो भी होगा अब छात्रों का आंदोलन एक नए मोड़ पर है। जो भी होगा उसका सभी को इंतजार है।

प्रशासन के अधूरे जवाबों से असंतुष्ट धरने पर बैठे छात्र

धरने पर फिर से बैठे आंदोलनकारी छात्र

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