Saturday, July 20, 2024
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जनजातीय गौरव दिवस: जो ईसाई मिशनरी, अंग्रेज, इस्लामी आक्रांता… सबसे लड़े, 12 नायकों की गाथा एक साथ पढ़िए

युवावस्था में ही बिरसा मुंडा अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में नायक बन कर उभरे और जनजातीय समूह ने उन्हें अपना नेता माना। 25 से भी कम उम्र में उन्होंने देश के लिए बलिदान दे दिया।

भगवान बिरसा मुंडा की जयंती ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के तौर पर मनाया जाता है। यह दिन उन नायकों को याद करने का है, जिन्होंने राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दिया। वे ईसाई मिशनरियों की धर्मांतरण की साजिशों से लड़े। अंग्रेजों से लड़े। इस्लामी आक्रांताओं से लड़े।

सबसे पहले बात भगवान बिरसा मुंडा की। युवावस्था में ही बिरसा मुंडा अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में नायक बन कर उभरे और जनजातीय समूह ने उन्हें अपना नेता माना। 25 से भी कम उम्र में उन्होंने देश के लिए बलिदान दे दिया। उनका जन्म छोटानागपुर पठार क्षेत्र में 1875 ईस्वी में हुआ था। ईसाइयों द्वारा संचालित एक विद्यालय में कुछ दिन पढ़ने के दौरान उन्हें जनजातीय वर्ग के धर्मांतरण की साजिशों का पता चला।

उन्होंने मुंडा और उराँव समुदाय को एकजुट किया। 1886-90 में वो चाईबासा के विद्रोह में शामिल रहे। 3 मार्च, 1900 को चन्द्रक्रधरपुर के जम्कोपाई जंगलों में जब वे अपने साथियों के साथ सो रहे थे, तभी अग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उनके संघर्ष और दबाव का ही नतीजा था कि ब्रिटिश सरकार को जनजातीय समुदाय के जमीन के अधिकारों के संरक्षण के लिए कानून बनाना पड़ा

अकाल पीड़ित जनता की सहायता के लिए उन्हें ‘धरती बाबा’ की उपाधि लोगों ने दी। 1897-1900 के बीच अंग्रेजों से उनका समाज का कई बार युद्ध हुआ। 1897 में उन्होंने तीर-कमान और तलवार से लैस साथियों के साथ खूँटी थाने पर हमला किया था। 1898 में तांगा नदी के किनारे संघर्ष हुआ। 1900 में डोमबाड़ी पहाड़ी पर संघर्ष हुआ। इस दौरान अंग्रेजों ने काफी क्रूरता की।

रघुनाथ शाह और शंकर शाह : मध्य प्रदेश का गोंडवाना, जिसे वर्तमान में जबलपुर के नाम से जाना जाता है, वहाँ के राजा शंकर शाह और उनके बेटे कुँवर रघुनाथ शाह ने अंग्रेजों से लड़ते हुए बलिदान दे दिया था। सितंबर 2021 में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने इन जनजातीय नायकों के सम्मान में ‘जनजातीय गौरव समारोह’ में शिरकत की थी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकूमत ने दोनों को तोपों से बाँधकर उनकी निर्मम हत्या कर दी थी। दोनों ने अपने आसपास के राजाओं को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट किया था। उनकी कविताओं ने शहरवासियों में विद्रोह की अग्नि सुलगा दी थी। हालाँकि, एक गद्दार के कारण इन दोनों को अंग्रेजों ने पकड़ लिया था।

खाज्या नायक : ये जनजातीय नायक गुमा नायक नाम के एक चौकीदार के बेटे थे। अंग्रेजों से लोहा लेते हुए ये बलिदान हुए थे। अंग्रेजों की भील-गोंड पलटन में सिपाही रहे खाज्या नायक सेंधवा-जामली चौकी से सिरपुर तक 24 मील लम्बे मार्ग की निगरानी का कार्य सौंपा गया था। 1831-51 तक नौकरी के बाद उन्होंने एक लुटेरे को एक व्यक्ति को लूटते देखा तो उस पर हमला किया। उसकी मौत हो गई तो इन्हें नौकरी से निकाल कर जेल भेज दिया गया। 1857 के युद्ध में उन्हें वापस बुलाया गया, लेकिन कैप्टन बर्च नाम के एक अंग्रेज अधिकारी ने उनके जाति-समुदाय और रंग-रूप पर भद्दी टिप्पणियाँ की। उन्होंने अपने साथियों के साथ अंग्रेजों को लूटा और कइयों को मार गिराया। बाद में 1860 में एक मुठभेड़ में वो बलिदान हुए। बड़वानी में उनका बड़ा प्रभाव था।

सीताराम कँवर : 1857 की क्रांति के दौरान उन्होंने बड़वानी राज्य के नर्मदा पार के क्षेत्र (जिनमें आज का निमाड़ क्षेत्र सम्मिलित है) में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक बड़े विद्रोह का नेतृत्व किया था। सतपुरा श्रेणी के भीलों में उन्होंने आज़ादी की अलख जगाई। तांत्या टोपे के साथ उनके संपर्क थे। 9 अक्टूबर, 1958 को उनका बलिदान हुआ था। उन्होंने एक साथ कई जगहों पर विद्रोह किया। होल्कर के राजा ने अंग्रेजों के साथ मिल कर इन्हें मारने का कुचक्र रचा। दिलशेर खान को एक बड़ी सेना के साथ भेजा गया था। गाँव वालों को बचाने के लिए ये अंग्रेजी सेना से भिड़ गए। उस युद्ध में 20 जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी बलिदान हुए थे।

भीमा नायक : इन्हें ‘निमाड़ का रॉबिनहुड’ भी कहा जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान भी कहा था कि जैसे मेरठ में मंगल पांडेय थे, वैसे ही मध्य प्रदेश में भीमा नायक। जनजातीय लोगों को एकजुट कर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से भिड़ने वाले भीमा नायक की कोई तस्वीर/स्केच तक अंग्रेजों के हाथ नहीं लग पाई। बड़वानी रियासत से लेकर महाराष्ट्र के खानदेश तक उनका प्रभाव था। 1857 के अम्बापानी युद्ध में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी। तात्या टोपे ने निमाड़ में उनसे मुलाकात की थी। 29 दिसम्बर, 1876 को पोर्टब्लेयर में उन्होंने अंतिम साँस ली। एक गद्दार की मुखबिरी के कारण उन्हें पकड़ा गया था।

रघुनाथ सिंह मंडलोई : ये खरगोन के जनजातीय समाज के ग्राम टांडाबरुड़ के रहने वाले थे। वो भिलाला जनजाति के नायक थे। अक्टूबर 1858 में बीजागढ़ के किले में अंग्रेजों ने उन्हें घेर लिया था। इसी दौरान उन्हें बंदी भी बना लिया गया था। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँका हुआ था।

सुरेंद्र साय: मात्र 18 वर्ष की उम्र से ही इन्होने अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठा लिया था। इनका जन्म 23 जनवरी, 1809 को संभलपुर के पास खिंडा में हुआ था। उन्होंने गोंड और बिंझल जनजातीय समुदाय के लोगों के हक़ की आवाज़ उठाई। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने देश के लिए योगदान दिया। इसके 5 वर्षों बाद उन्हें अंग्रेजों ने पकड़ लिया। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के असीरगढ़ किले में उन्हें कैद कर के रखा गया था। 23 मई, 1884 को उनका निधन हुआ। ये जनजातीय राजवंश के थे, लेकिन अंग्रेजों ने इन्हें नज़रअंदाज़ कर के राजा के निधन के बाद रानी को सत्ता सौंप दी और रिमोट से शासन चलाने लगे। डेबरीगढ़ में भी उन पर अग्रेजों ने जानलेवा हमला किया था, लेकिन वो वहाँ से किसी तरह बच निकले थे।

टंट्या भील: अंग्रेज इन्हें डकैत मानते थे, लेकिन ये एक स्वतंत्रता सेनानी थे। वो अंग्रेजों का धन लूट लेते थे और इसे गरीबों में बाँट देते थे। 19 अक्टूबर, 1889 को इन्हें अंग्रेजों ने मौत की सज़ा दे दी थी। इन्हें फाँसी से लटका दिया गया था। इनका जन्म बरदा तहसीन के पंधाना में 1840 के करीब में हुआ था। अंग्रेजों ने इनका साथ छल किया था। इन्हें माफ़ी देने के नाम पर पकड़ लिया गया था। 12 वर्षों तक इन्होने आक्रांता अग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। जनता भी इनका साथ देती थी। सभी उम्र के लोग प्यार से उन्हें ‘मामा’ कहते थे। गुरिल्ला युद्ध में पारंगत रहे टंट्या भील ने कई बार जेल तोड़ डाली थी। उनकी बहन के पति ने ही गद्दारी कर के उन्हें पकड़वा दिया था।

मंशु ओझा : ये इन जनजातीय योद्धाओं से कुछ पीढ़ी आगे के नायक हैं। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान इन्होने अंग्रेजों की नाक में दम किया था। नवंबर 1942 में अंग्रेजों ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया था। नरसिंहपुर जेल में इन्हें कैद कर दिया गया। कड़ी यातनाएँ दी गईं। लेकिन, इन्होंने अपने सपनों का आज़ाद भारत देखा। 28 अगस्त, 1981 को इनका निधन हुआ। रातामाटी में इनका जन्म हुआ था, लेकिन परिवार बाद में घोड़ाडोंगरी के बैतूल में रहने लगा। निर्धनता थी ही, शिक्षा-दीक्षा भी नहीं हो पाई थी। देशभक्ति गीत गाते हुए इन्होंने अपने साथियों के साथ मिल कर रेल की पटरियाँ उखाड़ी थीं। इनके पिता का नाम उमराव ओझा था।

रानी दुर्गावती: इनका जन्म 5 अक्टूबर, 1524 ईस्वी को हुआ था। ये अंग्रेजों के शासन से कई 3 सदी पहले की वीरांगना थीं। मध्य प्रदेश के गोंडवाना में उनका शासन था। जिस गढ़मंडला राज्य पर उनका शासन था, उसका केंद्र जबलपुर में था। उनके पति गौड़ राजा दलपत शाह की असामयिक मृत्यु हो गई थी। रानी दुर्गावती ने अपने नाबालिग

अपने नाबालिग बेटे वीर नारायण को गद्दी पर बिठाया। हालाँकि, शासन और राजकाज वही संभाला करती थीं। इलाहाबाद के मुग़ल आक्रांता आसफ खान के साथ इनका युद्ध हुआ। इनका शसन 1550-1564 तक चला था। अकबर के आदेश पर जब मुगलों ने उन पर आक्रमण किया, तब उन्होंने होने दीवान से कहा था कि गुलाम रहने से बेहतर है युद्ध के मैदान में सम्मान से मरना। युद्ध में इन्होंने मैदान छोड़ने या दुश्मन के हाथों मरने से अच्छा खुद की जान लेना उचित समझा।

मुड्डे बाई : मध्य प्रदेश के जनजातीय लोगों के लिए 9 अक्टूबर का दिन काफी खास रहता है, क्योंकि इस दिन 1930 में अंग्रेजों के विरुद्ध 400 आदिवासियों ने मिल कर जंगल सत्याग्रह आरंभ किया था।ग्रामीणों के इस सत्याग्रह से बौखलाए अंग्रेजों द्वारा मुड्डे बाई, रेनो बाई, देभो बाई और बिरजू भोई की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस गोलीकांड ने अंग्रेजों की क्रूरता का नया अध्याय लिखा। अंग्रेजों ने जंगल पर जनजातीय लोगों के अधिकार को कुचलते हुए उनके लकड़ी काटने तक पर प्रतिबंध लगा रखा था।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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