एक ओर पूरे भारत को अपने आप में समेटे हमारी सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली काशी है तो दूसरी ओर भारत की प्राचीनता और गौरव का केंद्र हमारा तमिलनाडु और तमिल संस्कृति है। ये संगम गंगा-यमुना के संगम जितना ही पवित्र है। सदियों पुरानी इस रिश्ते को पीएम मोदी ने नया मंच दिया और देश के दो महान संस्कृति के संगम की परिकल्पना की।
उच्च शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. विनीत जोशी (@Vineet_K26) ने बताया कि इस वर्ष काशी तमिल संगमम् 4.0 में तीन नई पहल होने जा रही हैं—पहली, तमिलनाडु के शिक्षक काशी आकर छात्रों को तमिल भाषा सिखाएंगे; दूसरी, काशी के छात्र तमिलनाडु जाकर तमिल सीखेंगे; और तीसरी, Sage Agasthya Vehicle… pic.twitter.com/Sy50Cz1Xyl
— Ministry of Education (@EduMinOfIndia) December 1, 2025
‘मन की बात’ में पीएम मोदी ने की अपील
काशी तमिल संगमम् में जनता से पीएम मोदी ने बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की। उन्होंने कहा कि विश्व की सबसे पुरानी भाषा तमिल और दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में एक वाराणसी का अद्भुत संगम है।
काशी तमिल संगमम् 2 दिसंबर से काशी नमो घाट पर शुरू हो रहा है। यह एक ऐसा मंच है जहाँ तमिल भाषा से प्रेम करने वाले पहुँचते हैं। इस आयोजन से वाराणसी के लोगों को भी नया अनुभव मिलता है।
पीएम मोदी ने कहा कि ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को मजबूत करने वाला यह कार्यक्रम दरअसल देश की एकता और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने का मार्ग है।
2 दिसंबर से काशी के नमो घाट पर शुरू हो रहे काशी-तमिल संगमम की थीम बहुत ही रोचक है – Learn Tamil – तमिल करकलम्
— Piyush Goyal (@PiyushGoyal) November 30, 2025
काशी-तमिल संगमम उन सभी लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बन गया है, जिन्हें तमिल भाषा से लगाव है।#MannKiBaat pic.twitter.com/aWBssO3yFi
तमिल और काशी का ऐतिहासिक संबंध रहा है
तमिल भाषा साहित्य में काशी और बाबा विश्वनाथ के प्रति अगाध श्रद्धा देखी जा सकती है। तमिल राजा काशी की यात्रा पर आया करते थे। 2300 साल पहले भी तमिलनाडु के नगर ग्रामों की गलियाँ काशी का बखाने करने वाले गीतों से गूँजा करती थीं।
कहा जाता है कि प्रथम तमिल संगम मदुरै में हुआ था जो पाण्ड्य राजाओं की राजधानी थी और उस समय अगस्त्य, शिव, मुरुगवेल आदि विद्वानों ने इसमें हिस्सा लिया था। इसके बाद जो द्वितीय संगम हुआ उसका केंद्र कपातपुरम में था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भारतीय प्राच्य इतिहास के प्रोफेसर रह चुके डॉक्टर विशुद्घानंद पाठक के मुताबिक, कपातपुरम का संगम ही इतिहास का सबसे बड़ा संगम था और उसमें उत्तर और दक्षिण के विद्वानों ने संगति की थी।
तमिल भाषा तो इतनी समृद्ध है कि इस भाषा में ‘अगटिटयम अगस्त्यम’ नामक एक व्याकरण ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है, जिसका रचना काल ईसा पूर्व का है।
15वीं शताब्दी में दक्षिण के राजा पराक्रम पांड्या भगवान शिव का एक मंदिर बनाना चाहते थे और काशी जाकर वे शिवलिंग लेकर आए थे। वहाँ से लौटते समय वे रास्ते में एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिये रुके और फिर जब उन्होंने यात्रा हेतु आगे बढ़ने की कोशिश की तो शिवलिंग ले जा रही गाय ने आगे बढ़ने से बिल्कुल मना कर दिया।
पराक्रम पंड्या ने इसे भगवान की इच्छा समझा और शिवलिंग को वहीं स्थापित कर दिया। इसे बाद में शिवकाशी नाम दिया गया। तमिलनाडु के जो भक्त काशी नहीं जा सकते थे, उनके लिये पांड्यों ने काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था, जो आज दक्षिण-पश्चिमी तमिलनाडु में तेनकाशी के नाम से जाना जाता है। ये तमिलनाडु और केरल से सटे सीमा पर मौजूद है।
2022 में हुआ पहला संगमम्
काशी तमिल संगमम् की शुरुआत 2022 में हुई। उस वक्त करीब 10 हजार तमिल प्रतिनिधि काशी पहुँचे थे। 19 नवंबर 2022 को इसकी औपचारिक शुरुआत पीएम मोदी ने की थी। उन्होंने दुनिया के सबसे प्राचीन भाषा तमिल को लेकर कहा था कि दुनिया जिसका गुणगान करती है, हम उसके गौरवगान में पीछे रह जाते हैं।
2023 में हुआ दूसरा संगमम्
दिसंबर 2023 में वाराणसी के नमो घाट पर दूसरा तमिल काशी संगमम् का आयोजन किया गया। इस सांस्कृतिक उत्सव के महत्व को बताते हुए पीएम मोदी ने कहा कि तमिल संगमम का मकसद तमिलनाडु और काशी, देश की दो सबसे जरूरी और पुरानी शिक्षा की जगहों के बीच सदियों पुराने रिश्तों को सेलिब्रेट करना, उन्हें पक्का करना और फिर से खोजना है। इस मौके पर वाराणसी तमिल संगमम् ट्रेन को हरी झंडी दिखाई और थिरुक्कुरल, मणिमेकलाई और दूसरे क्लासिक तमिल साहित्य के मल्टी लैंग्वेज और ब्रेल ट्रांसलेशन लॉन्च किया गया।
2025 में तीसरा संगमम्
15 फरवरी से 24 फरवरी को नमो घाट पर तीसरा काशी तमिल संगमम् का आयोजन किया गया। इसका मकसद दोनों प्राचीन सभ्यताओं का उत्सव मना और उसे मजबूत करना है। मंच काशी और तमिल के विद्वानों, विद्यार्थियों, दार्शनिकों, व्यापारियों, कारीगरों, कलाकारों को एक साथ आने और अपने अनुभवों को साझा करने का अवसर प्रदान करता है।
दिसंबर 2025 में ही काशी तमिल संगमम् 4 का आयोजन किया गया है। इसका आयोजन भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय और बीएचयू कर रहा है। 2 दिसंबर से 16 दिसंबर तक इस समागम में 10 हजार से ज्यादा तमिल प्रतिमिधियों के पहुँचने का अनुमान है।
काशी तमिल संगमग इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वाराणसी में काशी विश्वनाथ विराजमान हैं तो तमिलनाडु के रामेश्वरम में भगवान रामेश्वरम। दोनों जगह शिवमय है। दोनों ही जगहों पर संगीत, साहित्य और कला का अद्भुत संगम है।


