जियोपॉलिटिकल थ्योरिस्ट निकोलस स्पाईकमैन की एक थ्योरी है- ‘Those who control the rimland, control the heartland’ यानी समुद्र पर नियंत्रण रखने वाला ही जमीन की सत्ता तय करता है। आजकल की जियो पॉलिटिक्स के लिए यह 20वीं सदी का सिद्धांत है लेकिन भारत के लिए यह कोई नया विचार नहीं था। भारत यह जानता था कि जो समुद्र को समझता है, वही जमीन को सुरक्षित रख सकता है और इसी ज्ञान का सबसे बड़ा प्रतीक था एक मंदिर, जो सिर्फ पूजा का स्थल नहीं था बल्कि हिंद महासागर से जुड़ी एक पूरी सभ्यता का प्रवेश-द्वार था। उस मंदिर का नाम था- ‘सोमनाथ’।
सोमनाथ को केवल इतिहास की एक अलग-थलग घटना के रूप में देखना एक बड़ी ऐतिहासिक भूल है। आम तौर पर इसे महज इतना समझ लिया जाता है कि गजनी आया, मंदिर टूटा और कहानी समाप्त हो गया। जबकि सच यह है कि सोमनाथ एक लंबी और सुनियोजित श्रृंखला का पहला बड़ा प्रहार था। उस भारतीय समुद्री सभ्यता पर, जो सदियों से हिंद महासागर को अपने नियमों पर चला रही थी। अगर हम सोमनाथ को कच्छ, भरूच, सूरत, कोंकण और अंत में गोवा से जोड़कर नहीं देखते, तो इतिहास का असली पैटर्न कभी सामने ही नहीं आएगा।
11वीं सदी से पहले भारत को केवल जमीन तक सीमित मानना, उसके इतिहास को अधूरा पढ़ने जैसा है। भारत उस दौर में एक मैरी-टाइम पावर विदाउट एम्पायर था (maritime power without empire)। एक ऐसी समुद्री शक्ति, जो उपनिवेश नहीं बनाती थी लेकिन महासागरों में मौजूद थी। अरब सागर और हिंद महासागर में भारतीय व्यापारी, नाविक और तीर्थयात्री बिना किसी डर के आवाजाही करते थे।
पहली सदी का यूनानी ग्रंथ टपेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रीअन सीट (Periplus of the Erythraean Sea) यानी, एरिथ्रियन सागर का समुद्री वृत्तांत साफ बताता है कि भारत का व्यापारिक नेटवर्क ओमान, यमन, बसरा और पूर्वी अफ्रीका तक फैला हुआ था।
ये सारी बातें सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं हैं। भारत की समुद्री समझ कोई खोई हुई कहानी नहीं बल्कि एक जीवित परंपरा है बल्कि इसीका एक उदाहरण आज हमारे सामने है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक सलाहकार Sanjeev Sanyal इन दिनों INSV कौंडिन्य नाम के एक खास जहाज की यात्रा पर हैं। संजीव सान्याल खुद इस जहाज पर सवार होकर रोजाना इस यात्रा के अपडेट भी शेयर कर रहे हैं।
ये जहाज इसलिए भी खास है क्योंकि यह कोई आम नौसेना का जहाज नहीं है। यह जहाज बिल्कुल उसी तरह बनाया गया है, जैसे हजार साल पहले भारतीय व्यापारी जहाज बनाए जाते थे। इसमें एक भी लोहे की कील नहीं है। पूरा जहाज नारियल की रस्सियों से सिला हुआ है। यानी वही तकनीक, जिससे भारत मजबूती से कभी समुद्रों में मौजूद था। इस INSV कौंडिन्य जहाज की यात्रा गुजरात से शुरू हुई है और ओमान तक, लगभग 1400 किलोमीटर का समुद्री सफर तय कर रही है। भारतीय नौसेना का यह विशेष अभियान दुनिया को यह दिखाने के लिए है कि भारत की समुद्री विरासत कोई हवा हवाई बातें नहीं, बल्कि ये एक जाँची परखी, व्यावहारिक और वैश्विक प्रणाली रही है।
यह व्यवस्था किसी एक केंद्र से संचालित होने वाला सिस्टम नहीं थी, बल्कि कई हाथों में बँटा हुआ, फिर भी मजबूती से काम करने वाला एक डिसेंट्रलाइज्ड नेटवर्क था। इसका केंद्र राज्य नहीं, बल्कि मंदिर थे। मध्यकालीन भारत में विशेषकर 10वीं से 12वीं सदी के चोल और सोलंकी काल में मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं थे, बल्कि उस समय की अर्थव्यवस्था के केंद्रीय वित्तीय संस्थान के रूप में काम करते थे।
राजा और व्यापारी अपनी आय का बड़ा हिस्सा मंदिरों को दान करते थे, जिसे मंदिर तिजोरियों में बंद नहीं रखते थे। यह पूंजी व्यापारी गिल्डों और मर्चेंट यूनियनों को ब्याज पर दी जाती थी, ताकि वे सुमात्रा, जावा, जांजीबार और पूर्वी अफ्रीका तक की जोखिमपूर्ण समुद्री यात्राएँ कर सकें। समुद्र पार व्यापार में डूबते जहाज, लूट और मौसम जैसे बड़े जोखिम शामिल थे, जिन्हें कोई अकेला व्यापारी नहीं झेल सकता था लेकिन मंदिरों का विशाल खजाना इन नुकसानों को सहन कर सकता था। सफल होकर लौटने पर व्यापारी मुनाफे का एक हिस्सा मंदिर को अर्पित करते थे।
हिंदू समुद्री व्यापार संस्थागत था और इसमें मणिग्रामम और ऐन्नुरुवर जैसी श्रेणियाँ थीं, जिन्हें ‘पाँच सौ स्वामी’ भी कहा जाता था। इनके पास अपनी निजी सेनाएँ और नौसेनाएँ होती थीं, जो समुद्री डाकुओं से जहाजों की रक्षा करती थीं। पश्चिमी भारत में इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र था सोमनाथ। प्रभास पाटन का बंदरगाह हड़प्पा काल से सक्रिय था। रोमन साम्राज्य से लेकर पश्चिम एशिया और अफ्रीका तक का व्यापार यहीं से ऑपरेट होता था। द्वारका से लेकर सोमनाथ और खंभात तक फैला तटीय मार्ग केवल व्यापार का नहीं बल्कि तीर्थ, संस्कृति और सामाजिक जुड़ाव का मार्ग था। इस तरह से सोमनाथ केवल भगवान शिव का निवास नहीं था। वह समुद्री भारत का फाइनेंशियल, सांस्कृतिक और कानूनी केंद्र था।
इस्लाम की एंट्री और उम्मा का इकॉनमी आतंक
सातवीं सदी के बाद हिंद महासागर में अरब और फारसी व्यापारी उभरे, जिन्होंने अंजुवन्नम जैसे व्यापारिक संघ बनाए। हिंदू नेटवर्क जहाँ मंदिर और गिल्ड्स पर आधारित था तो वहीं जबकि इस्लामिक नेटवर्क मस्जिद और बाजार पर। दसवीं-ग्यारहवीं सदी तक मुस्लिम नेटवर्क ने हिंदू व्यापारियों को पीछे धकेलना शुरू किया।
इसी दौरान महमूद गजनवी का सोमनाथ हमला हुआ, एक सुनियोजित रणनीति, जिसमें लगभग 20 मिलियन दीनार की संपत्ति लूटी गई। सोमनाथ टूटने के बाद वहाँ मस्जिद नहीं बनी क्योंकि इसका उद्देश्य धर्म परिवर्तन नहीं बल्कि मंदिर की आर्थिक और कानूनी भूमिका समाप्त करना था। शिवलिंग का खंडन उस कानूनी-आर्थिक इकाई को खत्म करने जैसा था।
खिलाफत और इस्लामी सल्तनतों के लिए व्यापार पैसा कमाने की चीज नहीं बल्कि सत्ता बढ़ाने की रणनीति था। जब उन्होंने देखा कि हिंद महासागर का बड़ा हिस्सा एक ऐसे नेटवर्क के सहारे चल रहा है, जिसे न तलवार से जीता जा सकता है और न सीधे कंट्रोल किया जा सकता है, तो उन्होंने रास्ता बदल लिया और सीधी लड़ाई की जगह उस नेटवर्क की रीढ़ तोड़ने पर ध्यान दिया। इसी रणनीति का पहला बड़ा, प्रतीकात्मक वार था, गजनी के महमूद का सोमनाथ अभियान।
सोमनाथ के साथ केवल मंदिर नहीं टूटा बल्कि भारतीय समुद्री आत्मविश्वास भी क्षतिग्रस्त हुआ। यह हमला भारत को धार्मिक नुकसान के साथ-साथ स्ट्रेटेजिक और आर्थिक कमजोरियाँ पहुँचाने के लिए किया गया था। सोमनाथ उस समय समुद्री भारत का प्रतीक था और हमला हिंदू टेम्पल ट्रेड नेटवर्क पर निशाना था। उद्देश्य था सभ्यतागत मनोबल तोड़ना, जिसे आज हम अयोध्या, काशी और सोमनाथ में कल्चरल इकॉनमी के रूप में देख सकते हैं।
इस्लामिक आक्रमणों के बाद, धीरे-धीरे धर्मशास्त्रों में समुद्र पार करने को ‘काला पानी’ कहकर सामाजिक रूप से हतोत्साहित किया जाने लगा। यह एक भू-राजनीतिक हार को सामाजिक नियम में बदलने जैसा था। राधाकुमुद मुकर्जी अपनी किताब में बताते हैं कि कैसे प्राचीन भारत की जीवंत नेविगेशन परंपरा मध्यकाल में शिथिल हो गई।
यहीं एक अहम तुलना नजर आती है। जब पश्चिम में गजनी सोमनाथ को लूट रहा था, उसी समय पूर्व में राजेंद्र चोल अपनी नौसेना के साथ सुमात्रा पर आक्रमण कर रहे थे। चोलों ने आक्रामक नौसैनिक अभियानों से समुद्र में अपनी शक्ति दिखाई। वहीं. गुजरात और सोलंकी राजवंश वाले क्षेत्रों ने समुद्र को कभी कम नहीं आँका। उन्होंने इसे अपनी ताकत बनाया- एक ओर रक्षा के लिए ताकि दुश्मन आए तो समुद्री रास्तों से मुँहतोड़ जवाब दिया जा सके और दूसरी ओर व्यापार से आय बढ़ाने के लिए।
गजनी के हमले ने भारत की पश्चिमी भुजा को काट दिया। लेकिन भारत की पूर्वी भुजा कुछ और सदियों तक सक्रिय रही। यही कारण है कि भारत की समुद्री सभ्यता एक दिन में नहीं गिरी। उसे हिस्सों में तोड़ा गया।
सोमनाथ मंदिर परिसर में खड़ा ‘बाण स्तंभ’ इसका साफ सबूत है। यह स्तंभ दिखाता है कि प्राचीन भारतीय नाविकों को दिशा की समझ थी, खगोल का ज्ञान था और उन्हें यह भी पता था कि पृथ्वी गोल है। स्तंभ पर लिखा है कि इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक कोई जमीनी रुकावट नहीं है। आज के उपग्रहों ने साबित कर दिया है कि यह बात सही है।
सोमनाथ के बाद यही कहानी पूरे पश्चिमी तट पर दोहराई गई। भरूच, कोंकण और सौराष्ट्र के पुराने व्यापारिक नगर धीरे-धीरे दबाव में आने लगे। दिल्ली सल्तनत और उसके बाद मुगल साम्राज्य मूल रूप से जमीन पर टिकी हुई ताकतें थीं। उनकी शक्ति खेतों, किलों और सेनाओं पर थी, समुद्र पर नहीं। उन्होंने कभी एक मजबूत और संगठित नौसेना खड़ी करने की गंभीर कोशिश नहीं की।
यहाँ तक कि मुगलों को अपनी हज यात्राओं की सुरक्षा के लिए भी विदेशी नाविकों और बेड़ों पर निर्भर रहना पड़ा। यानी समुद्र उनके लिए शक्ति स्थापित करने का क्षेत्र नहीं था बल्कि एक ऐसी जगह थी जिसे दूसरों के भरोसे छोड़ा गया था। और यही दूरी धीरे-धीरे भारत को उसके समुद्र से और दूर ले जाती चली गई।
मुगल काल
1299 में जब अलाउद्दीन खिलजी की सेनाएँ दोबारा सोमनाथ पहुँचीं, तो मंदिर फिर तोड़ा गया और गुजरात को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया। इसके साथ ही केवल एक धार्मिक स्थल नहीं गिरा, बल्कि उस पूरे समुद्री तंत्र पर पहला स्थायी प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित हुआ। 14वीं सदी में गुजरात सल्तनत स्वतंत्र हुई। 15वीं सदी में यह प्रक्रिया और आगे बढ़ी, जब बहमनी सल्तनत और उससे निकली आदिलशाही ने कोंकण और गोवा पर कब्जा कर लिया। गोवा, जो कभी कदंब और फिर विजयनगर साम्राज्य का हिस्सा था, अब मुस्लिम शासन के अधीन चला गया। पश्चिमी तट पर हिंदू समुद्री प्रभुत्व की आखिरी बड़ी कड़ी भी यहीं टूट गई।
जहाँ-जहाँ इस्लामी व्यापारिक प्रभाव पहुँचा वहाँ केवल कारोबार नहीं फैला बल्कि मस्जिदें, सराय और स्थायी समुदाय भी स्थापित हुए। यह महज धर्म का प्रसार नहीं बल्कि खलीफाओं और इस्लामी सत्ता केंद्रों के संरक्षण में पनपा एक संगठित, समुदाय-आधारित व्यापारिक नेटवर्क था। इसी दौर में हिंद महासागर एक आर्थिक मार्ग से बदलकर राजनीतिक‑धार्मिक नेटवर्क का विस्तार बन गया।
उसी समय भारत का समुद्र से मानसिक जुड़ाव कमजोर पड़ चुका था। परिणामस्वरूप 15वीं सदी में जब पुर्तगाली गोवा पहुँचे तो उन्हें किसी संगठित भारतीय नौसेना का सामना नहीं करना पड़ा। 1498 में वास्को‑डी‑गामा एक ऐसे समुद्र में दाखिल हुआ जो कभी भारतीय जहाजों से भरा रहता था लेकिन अब लगभग खाली था। पुर्तगाली व्यापार नहीं, समुद्र पर प्रभुत्व स्थापित करने आए थे और 16वीं सदी तक उन्होंने हिंदू‑नेतृत्व वाले समुद्री नेटवर्क को लगभग समाप्त कर दिया।
11वीं से 16वीं सदी के बीच यह प्रक्रिया चरणबद्ध रही यानी पहले प्रतीक टूटे, फिर संस्थान कमजोर हुए, फिर प्रशासन बदला और अंततः समुद्र हाथ से निकल गया। महमूद गजनी ने जिसे प्रतीकात्मक रूप से शुरू किया उसे यूरोपीय शक्तियों ने संरचनात्मक रूप से पूरा किया। यह दो नेटवर्कों की टक्कर थी- एक विकेंद्रीकृत हिंदू टेम्पल नेटवर्क और दूसरा राज्य‑समर्थित, केंद्रीकृत इस्लामिक नेटवर्क। नतीजा यह हुआ कि भारत को धीरे‑धीरे उसके ही समुद्र से काट दिया गया और सदियों का समुद्री प्रभुत्व खो गया।
1951 में सोमनाथ का पुनर्निर्माण उस समुद्री भारत की स्मृति को वापस लाने का प्रयास था, जिसे सदियों पहले रणनीतिक रूप से मिटा दिया गया था। सरदार वल्लभभाई पटेल इसे सभ्यतागत आत्मविश्वास की वापसी मानते थे जबकि जवाहरलाल नेहरू तो इसे भारत के सेक्युलर ढाँचे के लिए खतरा मानते थे। इस करण वो हमेशा आशंकित ही रहे और यह आशंका दरअसल उस आत्मविश्वास की थी, जो समुद्र के रास्ते फिर लौट सकता था।
अल-बरूनी ने बहुत पहले लिखा था कि हिंदू अपने राज्य हार सकते हैं, अपने देवता नहीं। आज इसे थोड़ा और आगे बढ़ाकर कहा जा सकता है कि हिंदू सभ्यता को समुद्र से काटा जा सकता है लेकिन समुद्र की स्मृति उससे छीनी नहीं जा सकती। सोमनाथ से गोवा तक की यह कहानी सिर्फ मंदिर बनाम मस्जिद की नहीं है। यह उस क्षण की कहानी है जब एक सभ्यता को समझ में आ गया कि उसे हराने के लिए पहले उसे उसके समुद्र से अलग करना होगा।
Indo-Pacific में भारत की वापसी: एक अधूरी सभ्यता का पुनरागमन
मुगलों के आक्रमणों और उसके बाद की राजनीतिक प्रक्रियाओं ने सोमनाथ से गोवा तक भारत को धीरे-धीरे उसके समुद्र से काट दिया। लेकिन इतिहास कभी सीधी रेखा में नहीं चलता- सभ्यताएँ गिरती नहीं बल्कि लंबी अवधि में बदलाव के दौर लेती हैं। इसलिए आज जब हम ‘इंडो-पैसिफिक’ में भारत की मौजूदगी देखते हैं तो यह कोई अचानक बनी रणनीति नहीं बल्कि उस यात्रा की वापसी जैसी है जो लगभग हजार साल से अधूरी रही।
अक्सर ‘इंडो-पैसिफिक’ को अमेरिकी रणनीति या चीन-विरोधी गठबंधन के नजरिए से देखा जाता है, लेकिन यह अधूरा दृष्टिकोण है। यह क्षेत्र वही है जहाँ कभी भारतीय व्यापार, संस्कृति और नौसैनिक प्रभाव बिना औपनिवेशिक हस्तक्षेप के फैला हुआ था। चोल साम्राज्य की नौसैनिक यात्राएँ, दक्षिण-पूर्व एशिया में मौजूद भारतीय मंदिर और संस्कृत-तमिल शिलालेख इस बात के प्रमाण हैं कि भारत कभी केवल एक महाद्वीपीय राज्य नहीं बल्कि एक समुद्री सभ्यता था।
इतिहासकार के.ए. नीलकांत शास्त्री और आर.सी. मजूमदार बताते हैं कि चोल नौसेना ने श्रीलंका, सुमात्रा और मलय प्रायद्वीप तक सैन्य अभियान तो चलाए ही, साथ ही साथ व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों को भी सुरक्षित किया। यह कोई औपनिवेशिक कब्ज़ा नहीं था बल्कि ये कनेक्टिविटी और सिक्योरिटी का मॉडल था।
यही मॉडल पश्चिमी भारत में मंदिर-आधारित समुद्री नेटवर्क के रूप में दिखता है। समुद्र यहाँ अधिकार थोपने का साधन नहीं था बल्कि नियंत्रण का माध्यम था। इसीलिए भारत की मौजूदगी समुद्रों में थी लेकिन भारतीय साम्राज्य समुद्रों पर नहीं थोपे गए। भारत का समुद्री स्वभाव वर्चस्व का नहीं, प्रवाह का था।
गजनी से गोवा तक की ऐतिहासिक प्रक्रिया ने भारत को समुद्र से काट दिया और इसका सबसे गहरा असर यह हुआ कि भारत ने अपनी समुद्री कल्पना ही खो दी मुगल काल में शक्ति जमीन पर केंद्रित रही समुद्र को या तो अनदेखा किया गया या दूसरों के भरोसे छोड़ दिया गया अंग्रेजों के आने के साथ यह दूरी स्थायी हो गई और समुद्र भारतीय चेतना से लगभग अलग हो गया यही कारण है कि आजादी के बाद भी भारत दशकों तक एक जमीन-केंद्रित राज्य बना रहा
21वीं सदी में हालात बदल गए चीन का समुद्री विस्तार साउथ चाइना सी का सैन्यीकरण और हिंद महासागर में बढ़ती चीनी मौजूदगी ने भारत को वही सवाल फिर याद दिलाया जो सोमनाथ के बाद धीरे-धीरे भुला दिया गया था समुद्र किसका है यही सवाल भारत की इंडो-पैसिफिक सोच को सही संदर्भ में समझने की कुंजी है।
भारत आज हिंद महासागर क्षेत्र में नौसैनिक साझेदारियाँ बना रहा है, QUAD जैसे ढाँचों में शामिल हो रहा है और अपनी नौसेना को कैरियर केंद्रित बना रहा है यह किसी पश्चिमी एजेंडे की नकल नहीं बल्कि हमारी सभ्यतागत स्मृति की वापसी है INS विक्रांत या अंडमान-निकोबार कमान केवल सैन्य ठिकाने नहीं हैं वे उस टूटे हुए समुद्री भारत के प्रतीक हैं जो दोबारा खड़ा हो रहा है
इंडो-पैसिफिक हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाला विशाल क्षेत्र है जहाँ आज दुनिया का आधे से ज्यादा व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक गतिविधियाँ केंद्रित हैं भारत इसे स्वतंत्र, खुला और समावेशी इंडो-पैसिफिक कहता है इसका मतलब यह नहीं कि भारत प्रभुत्व चाहता है बल्कि यह कि कोई एक ताकत समुद्र को अपनी जागीर न बना ले 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शांग्री-ला डायलॉग में इसी दृष्टि को स्पष्ट किया था उन्होंने इंडो-पैसिफिक को वह जगह बताया जहाँ सभी देश प्रगति और समृद्धि के लिए साथ आ सकते हैं
यह कोई संयोग नहीं कि भारत आज नियम-आधारित व्यवस्था की बात करता है इसका अर्थ है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में नियम लागू हों मनमानी नहीं यह वही मॉडल है जो कभी हिंदू मंदिर नेटवर्क में था जहाँ व्यापार नियमों से चलता था तलवार से नहीं जहाँ समुद्र संपर्क का माध्यम था वर्चस्व का नहीं भारत की कोशिश यही है कि क्षेत्र में शांति बनी रहे व्यापार बढ़े और कोई दबंगई न करे।
यही कारण है कि भारत का इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण अमेरिकी या चीनी मॉडल से अलग दिखता है। चीन जहाँ समुद्र को शक्ति और ऋण के जरिए नियंत्रित करना चाहता है तो वहीं भारत सांस्कृतिक परिचितता, व्यापार की निरंतरता और रणनीतिक संयम पर जोर देता है। यह कोई नई नीति नहीं है बल्कि प्राचीन समुद्री सभ्यता की घर वापसी है।
अगर सोमनाथ उस क्षण का प्रतीक था जब भारत को समुद्र से काटा गया, तो इंडो-पैसिफिक में भारत की वापसी उस क्षण का संकेत है जब एक सभ्यता अपनी अधूरी कहानी को फिर से लिखना शुरू करती है। यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई है लेकिन इतना तय है कि जो सभ्यता कभी हिंद महासागर की धड़कन थी, वह हमेशा के लिए किनारे पर नहीं रह सकती।
और शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है। सोमनाथ का टूटना भारत की समुद्री हार नहीं था लेकिन उसी क्षण से समुद्र भारत की कहानी से बाहर होना शुरू हो गया। आज जो लौट रहा है, वह समुद्र नहीं बल्कि भारत की वही भूली हुई सभ्यतागत आदत है। यही हमारी समुद्री स्मृति है और शायद इसी स्मृति का पर्व हम आज सोमनाथ में मना रहे हैं।


