नदी जोड़ो परियोजना Part I में आपने पढ़ा कि भारत के लिए ये मेगा प्रोजेक्ट क्यों जरूरी है। अब Part II में पढ़ें कि इस मेगा प्रोजेक्ट का फ्लैगशिप प्रोजेक्ट यानी केन-बेतवा नदी लिंक प्रोजेक्ट क्या है। क्या यह प्रोजेक्ट वाकई सूखाग्रस्त बुंदेलखंड की तस्वीर और तकदीर बदलने में कामयाब हो पाएगा? पढ़ें सबकुछ विस्तार से…
भारत सरकार ने सोमवार (10 अगस्त 2026) को राज्यसभा में कहा कि भारत के अतिमहत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना में शीर्ष पर केन-बेतवा नदी लिंक प्रोजेक्ट है। फिलहाल इसी को पूरा करने पर भारत सरकार का जोर है। इसके अलावा सभी प्रोजेक्ट्स पर राज्य सरकारें अपने हिसाब से काम कर रही हैं।
वहीं राष्ट्रीय महत्व की एक और परियोजना पोलावरम इरिगेशन प्रोजेक्ट (PIP) को आंध्र प्रदेश सरकार और पोलावरम प्रोजेक्ट अथॉरिटी (PPA) मिलकर पूरा कर रहे हैं। ये गोदावरी और कृष्णा नदी को जोड़ने वाला प्रोजेक्ट है, जो फाइनल स्टेज में है। इस प्रोजेक्ट को अब तक केंद्र सरकार से ₹20,658 करोड़ की मदद मिल चुकी है। राज्यसभा में जल शक्ति मंत्रालय के केंद्रीय राज्यमंत्री राज भूषण चौधरी ने इस बारे में पूछे गए सवाल पर लिखित में जवाब दिया है।
अब आते हैं मूल मुद्दे पर। दरअसल, भारत में नदियों को आपस में जोड़कर राष्ट्रीय जल ग्रिड बनाने के दशकों पुराने सपने को जब धरातल (Ground Level) पर उतारने की ऐतिहासिक शुरुआत हुई, तो इसके लिए जिस पहली परियोजना को चुना गया, वह है- ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ (Ken-Betwa Link Project – KBLP)।
देश के पहले ‘रिवर-लिंकिंग मॉडल’ की शुरुआत और केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट
राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA) द्वारा चिन्हित की गई 30 अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण (Inter-Basin Water Transfer) परियोजनाओं में से केन-बेतवा पहली ऐसी राष्ट्रीय परियोजना बनी, जिस पर केंद्र सरकार, मध्य प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने औपचारिक और ऐतिहासिक सहमति जताई। 8 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने इस परियोजना के लिए ₹44,605 करोड़ की विशाल धन राशि को मंजूरी दी।
यह महत्वाकांक्षी परियोजना मुख्य रूप से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैले मध्य भारत के सबसे सूखाग्रस्त, पिछड़े और सामाजिक-आर्थिक रूप से उपेक्षित क्षेत्र बुंदेलखंड (Bundelkhand) की किस्मत और तस्वीर बदलने के इरादे से बनाई गई है।

भौगोलिक दृष्टिकोण से देखें तो केन और बेतवा दोनों ही नदियाँ मध्य प्रदेश से निकलती हैं। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से निकलने वाली बेतवा और कटनी जिले से निकलने वाली केन नदी उत्तर पूर्व दिशा की ओर बहते हुए अंततः उत्तर प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर यमुना नदी में जाकर मिल जाती हैं।
केंद्रीय जल आयोग (CWC) और NWDA के गहन हाइड्रोलॉजिकल अध्ययनों (Hydrological Studies) के अनुसार, केन नदी बेसिन में उसकी अपनी कृषि, पेयजल और भविष्य की स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के बाद भी मानसूनी बारिश के दौरान भारी मात्रा में जल ‘अधिशेष’ (Surplus) बच जाता है। यह अधिशेष पानी हर साल उफान के रूप में बहकर यमुना में गिरता है और अंततः समुद्र में बेकार चला जाता है।

दूसरी ओर बेतवा नदी का बेसिन एक ‘कमी वाला बेसिन’ (Deficit Basin) है। बेतवा नदी के आसपास के इलाकों (विशेषकर ऊपरी और मध्य बेसिन) में कृषि, उद्योगों और पेयजल के लिए पानी की भारी किल्लत बनी रहती है। इसी जल असंतुलन को संतुलित करने के लिए केन नदी के अधिशेष पानी को 221 किलोमीटर लंबी नहर के जरिए मोड़कर बेतवा नदी में पहुँचाने का वैज्ञानिक खाका तैयार किया गया।
दौधन बाँध और 221 किमी लंबी लिंक नहर है परियोजना का केंद्र बिंदु
केन-बेतवा लिंक परियोजना सिविल इंजीनियरिंग और जल प्रबंधन का एक बेहद जटिल, आधुनिक और विशाल ढाँचा है। इस परियोजना की पूरी कार्यप्रणाली मुख्य रूप से दो बड़े इंजीनियरिंग संरचनात्मक घटकों पर टिकी हुई है-
- दौधन बाँध (Daudhan Dam): परियोजना का मुख्य केंद्र बिंदु और रीढ़ मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों की सीमा पर केन नदी पर बनने वाला दौधन बाँध (Daudhan Dam) है। दौधन बाँध की ऊँचाई लगभग 77 मीटर और लंबाई लगभग 2,031 मीटर प्रस्तावित है।
दौधन बाँध के तहत बनने वाला डैम एक बहुउद्देशीय (Multipurpose) जलाशय होगा, जिसकी कुल जल भंडारण क्षमता लगभग 2,853 लाख घनमीटर (Million Cubic Meters – MCM) होगी। इसका मुख्य कार्य मानसून के दौरान केन नदी के प्रचंड जलप्रवाह को रोकना और उसे साल भर के उपयोग के लिए सुरक्षित रखना है।

- 221 किलोमीटर लंबी मुख्य लिंक नहर (Main Link Canal): दौधन बाँध के जलाशय से एक विशाल, कंक्रीट-लाइन्ड (concrete-lined) मुख्य लिंक नहर निकाली जाएगी। यह नहर लगभग 221 किलोमीटर लंबी होगी, जिसमें से करीब 21 किलोमीटर का हिस्सा उत्तर प्रदेश की सीमा में और बाकी हिस्सा मध्य प्रदेश में होगा।
इंजीनियरिंग चमत्कार के तौर पर नहर के मार्ग में प्राकृतिक ढलान (Gravity Flow) का अधिकतम उपयोग किया गया है। लेकिन जहाँ भौगोलिक बाधाएँ या ऊँचे इलाके आते हैं, वहाँ आधुनिक लिफ्ट पंपिंग स्टेशन (Lift Pumping Stations), भूमिगत सुरंगें (Tunnels) और एक्वाडक्ट्स (Aqueducts) बनाए जा रहे हैं ताकि पानी बिना किसी रुकावट के बेतवा नदी के ऊपरी बेसिन तक पहुँच सके।
नहर के मार्ग में पड़ने वाले स्थानीय तालाबों, चंदेलकालीन बावड़ियों और अन्य छोटी नदियों (जैसे बीना, ओर आदि) को भी इस मुख्य नहर प्रणाली से जोड़ा जाएगा ताकि रास्ते में पड़ने वाले सैकड़ों ग्रामीण इलाकों को सीधे पानी दिया जा सके।
2 चरणों में पूरा होगा केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट
केन-बेतवा परियोजना के विशाल आकार, भारी भरकम बजट और तकनीकी जटिलता को देखते हुए प्रशासनिक सुगमता के लिए इसके क्रियान्वयन को दो प्रमुख चरणों (Phase-I & Phase-II) में विभाजित किया गया है-
केन-बेतना लिंक प्रोजेक्ट फेज-1: पहले चरण का मुख्य ध्यान केन नदी के जल को रोकने और उसे बेतवा तक पहुँचाने के प्राथमिक ढाँचे पर केंद्रित है। इसके तहत मुख्य निर्माण कार्य किए जाएँगे, जिसमें दौधन बाँध का निर्माण, 221 किमी लंबी मुख्य लिंक नहर, लोअर ओर परियोजना (Lower Orr Project), कोठा बैराज (Kotha Barrage) और दो पावर हाउस बनाए जा रहे हैं।
इसके अलावा बिजली उत्पादन के लिए दौधन बाँध स्थल पर दो मुख्य पावर हाउस स्थापित किए जाएँगे, जिनकी कुल क्षमता 103 मेगावाट जलविद्युत (Hydro Power) और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा (Solar Power) पैदा करने की होगी।
चरण-1 का प्राथमिक लक्ष्य छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़ और बांदा जैसे सबसे ज्यादा जल-संकटग्रस्त सीमावर्ती जिलों को तत्काल पेयजल और सिंचाई का पानी उपलब्ध कराना है।

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट फेज-2: दूसरे चरण में बेतवा नदी और उसकी सहायक नदियों पर पूरक संरचनाओं (Subsidiary Structures) का निर्माण किया जाना है ताकि स्थानांतरित पानी का कुशल वितरण हो सके। इसके तहत 3 प्रमुख परियोजनाओं का निर्माण शामिल है-
- बीना कॉम्प्लेक्स बहुउद्देशीय परियोजना (Bina Complex Multipurpose Project): इसके तहत सागर जिले में बीना और उसकी सहायक नदियों पर बाँध व नहरें बनाई जाएँगी।
- कोठा बैराज (Kotha Barrage): विदिशा जिले में बेतवा नदी पर बैराज निर्माण किया जाएगा।
- लोअर ओर परियोजना (Lower Orr Project): शिवपुरी और गुना जिलों के लिए ओर नदी पर बाँध बनाए जाएँगे।
चरण-2 का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केन नदी से लाया गया पानी बेतवा के कैचमेंट एरिया में अंतिम छोर पर स्थित खेत तक पहुँचे और किसी भी स्तर पर पानी का नुकसान न हो।
बुंदेलखंड के जिलों को होने वाले प्रत्यक्ष लाभ बहुत ज्यादा
बुंदेलखंड मध्य भारत का एक ऐसा ऐतिहासिक क्षेत्र है जो पिछले कई दशकों से भीषण सूखे, कुओं और हैंडपंपों के सूखने, गरीबी और बड़े पैमाने पर खेतिहर मजदूरों के पलायन (Migration) के लिए जाना जाता है। बुंदेलखंड क्षेत्र मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुल 13 जिलों में फैला हुआ है। केन-बेतवा परियोजना को इस पूरे इलाके के लिए एक ‘संजीवनी बूटी’ के रूप में देखा जा रहा है।
मध्य प्रदेश के 10 जिलों छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, निवाड़ी, दमोह, सागर, दतिया, विदिशा, शिवपुरी और रायसेन में कुल 6.35 लाख हेक्टेयर इलाके की सिंचाई होगी। इसके साथ ही 41 लाख आबादी को पेयजल मिलेगा। भूजल रिचार्ज होने के साथ ही कृषि कार्य में भी स्थायित्व आएगा।
वहीं उत्तर प्रदेश के 4 जिलों बाँदा, महोबा, झांसी और ललितपुर की 2.51 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी। 21 लाख आबादी को हर घर नल से जल मिलेगा। साथ ही बांदा और महोबा जिलों में सूखे का लगभग खात्मा हो जाएगा।
दरअसल, गर्मी के दिनों में इन 13 जिलों में जलस्तर खतरनाक रूप से नीचे चला जाता है। ग्रामीणों को पानी के एक-एक मटके के लिए 3 से 4 किलोमीटर दूर पैदल भटकना पड़ता है। इस परियोजना के पूरा होने से न केवल हर घर को साफ पेयजल मिलेगा, बल्कि मवेशियों के पीने और स्थानीय उद्योगों के लिए भी पानी की निरंतर उपलब्धता बनी रहेगी।
सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जल के वितरण का गणित
NWDA और जल शक्ति मंत्रालय की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) के अनुसार, केन-बेतवा लिंक परियोजना के सामाजिक-आर्थिक आँकड़े बेहद क्रांतिकारी बदलाव का इशारा करते हैं। जिसमें-
साल भर सिंचाई (Annual Irrigation): परियोजना के पूरी तरह चालू होने पर हर साल कुल 10.62 लाख हेक्टेयर (10,62,000 hectares) कृषि योग्य भूमि में वार्षिक सिंचाई हो सकेगी। इसमें से 6.35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र मध्य प्रदेश में सिंचित होगा तो 2.51 लाख हेक्टेयर क्षेत्र उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त जिलों में सिंचित होगा।। इसके अलावा 1.76 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को मौजूदा नहर प्रणालियों के सुदृढ़ीकरण से पानी मिलेगा। सिंचाई का यह नियमित साधन बुंदेलखंड के किसानों को मानसून की अनिश्चितता से पूरी तरह आजाद कर देगा, जिससे वे साल में केवल एक फसल के बजाय दो या तीन फसलें (रबी, खरीफ और जायद) उगा सकेंगे।

सुरक्षित पेयजल (Safe Drinking Water): केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से बुंदेलखंड की लगभग 62 लाख आबादी (41 लाख मध्य प्रदेश में और 21 लाख उत्तर प्रदेश में) को पाइपलाइन और नलों के जरिए 24 घंटे सुरक्षित और साफ पीने का पानी मिलेगा। इससे दूषित जल से होने वाली बीमारियों (Water-Borne Diseases) पर रोक लगेगी और महिलाओं को पानी ढोने की शारीरिक परेशानी से मुक्ति मिलेगी।
औद्योगिक जल आपूर्ति (Industrial Water Supply): उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बन रहे ‘डिफेंस औद्योगिक कॉरिडोर’ (Defense Industrial Corridor), स्थानीय कृषि प्रसंस्करण इकाइयों (food processing units) और छोटे-मझोले उद्योगों के लिए लगभग 62 MCM पानी विशेष रूप से आवंटित किया गया है। पर्याप्त पानी मिलने से बुंदेलखंड में नए औद्योगिक निवेश का मार्ग प्रशस्त होगा।
जलविद्युत उत्पादन और भूजल रिचार्ज का प्रभाव
स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन (Clean Energy Generation): दौधन बाँध पर स्थापित होने वाले दो पावर स्टेशनों के माध्यम से कुल 103 मेगावाट हाइड्रो पावर (Hydro Power) का उत्पादन किया जाएगा। इसके अलावा जलाशय के सतह और नहर के किनारों पर 27 मेगावाट सौर ऊर्जा (Solar Power) संयंत्र स्थापित किए जाएंगे।
इस तरह कुल 130 मेगावाट स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन होगा। इस बिजली का उपयोग प्राथमिक रूप से परियोजना के अपने लिफ्ट सिंचाई पंपों (Lift Irrigation Pumps) को चलाने में किया जाएगा और बची हुई बिजली स्थानीय ग्रामीण ग्रिड को दी जाएगी, जिससे बिजली संकट दूर होगा।
भूजल रिचार्ज (Groundwater Recharge): बुंदेलखंड का अधिकांश धरातलीय ढाँचा कठोर चट्टानों (Hard Crystalline Rocks) से बना है। यहाँ बारिश का पानी स्वाभाविक रूप से आसानी से जमीन के भीतर नहीं रिस पाता, जिसके कारण लगातार ट्यूबवेलों के इस्तेमाल से भूजल स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका था।
जब 221 किलोमीटर लंबी विशाल लिंक नहर और दौधन बाँध का विशाल जलाशय बनेगा, तो आसपास के दर्जनों किलोमीटर के क्षेत्र में निरंतर सीपेज (Seepage) और जल रिसाव होगा। इससे पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र का वाटर टेबल (Water Table) कई मीटर ऊपर उठेगा। सूखे पड़े पारंपरिक कुएँ, बावड़ियाँ और बोरवेल खुद ब खुद जीवित हो उठेंगे, जो सूखे के समय सुरक्षा कवच का काम करेंगे।
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कायापलट से पलायन पर लगेगा स्थाई ब्रेक
बुंदेलखंड की सबसे बड़ी सामाजिक त्रासदी रही है-‘मजबूरी का पलायन’ (Forced Migration)। पानी के अभाव में फसलें जल जाने के कारण हर साल मानसून खत्म होते ही लाखों युवा, छोटे किसान और पूरे के पूरे परिवार दिल्ली, मुंबई, सूरत और अहमदाबाद जैसे महानगरों में दिहाड़ी मजदूरी करने चले जाते थे।
केन-बेतवा परियोजना इस मानवीय और आर्थिक दुष्चक्र को तोड़ने की क्षमता रखती है, इससे होने वाले लाभों में-
- फसल विविधीकरण (Crop Diversification): अब तक किसान सिर्फ ज्वार, बाजरा या कम पानी वाली तिलहन फसलों तक सीमित थे। सिंचाई का पानी मिलने से वे गेहूँ, चना, सरसों, दलहन के साथ-साथ हरी सब्जियां, फल और नकदी फसलों (Cash Crops) की खेती कर सकेंगे।
- स्थानीय रोजगार का सृजन: खेतों में साल भर काम रहने से कृषि मजदूरों को गाँव में ही रोजगार मिलेगा। साथ ही डेरी फार्मिंग (Dairy Farming), पशुपालन और मत्स्य पालन (Fisheries) को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा।
- आर्थिक स्थिरता: कृषि में पैदावार और कमाई निश्चित होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, जिससे पलायन की दर में भारी कमी आएगी।
पर्यावरणीय प्रभाव और पन्ना टाइगर रिजर्व पर गहरा संकट (जरूरी मुद्दा)
जहाँ एक तरफ केन-बेतवा लिंक विकास और खुशहाली के वादे करती है, वहीं दूसरी तरफ इसका सबसे विवादास्पद, संवेदनशील और चिंताजनक पहलू है – पर्यावरण और वन्यजीवों पर पड़ने वाला विनाशकारी प्रभाव।
पन्ना टाइगर रिजर्व (Panna Tiger Reserve) का डूबना: दौधन बाँध का निर्माण मध्य प्रदेश के विश्वप्रसिद्ध पन्ना टाइगर रिजर्व (PTR) के ठीक पेट यानी उसके कोर एरिया के भीतर हो रहा है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, बाँध बनने की वजह से पन्ना टाइगर रिजर्व की कुल 5,803 हेक्टेयर वन भूमि पूरी तरह से जलमग्न हो जाएगी। इस 5,803 हेक्टेयर में से लगभग 4,141 हेक्टेयर क्षेत्र पन्ना का ‘कोर टाइगर हैबिटैट’ (Core Tiger Habitat) है।
पन्ना वही टाइगर रिजर्व है जिसने 2009 में अपने सभी बाघों को खोने के बाद एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बाघ पुनरुद्धार कार्यक्रम के जरिए अपनी आबादी दोबारा बसाई थी। बाँध के कारण बाघों के शिकार करने का क्षेत्र और उनके गलियारे (Corridors) हमेशा के लिए दो हिस्सों में बँट जाएँगे।
हालाँकि सरकार और Wildlife Institute of India (WII) का दावा है कि पन्ना के नुकसान की भरपाई के लिए ₹1,000 करोड़ से अधिक की एक विशेष योजना बनाई गई है। इसके तहत आसपास के रानीपुर वन्यजीव अभयारण्य (यूपी) और नौरादेही (एमपी) के जंगलों को पन्ना से जोड़कर एक विशाल ‘ग्रेटर पन्ना लैंडस्केप’ बनाया जा रहा है ताकि बाघ आसानी से विचरण कर सकें।
केवल बाघ ही नहीं, केन नदी का यह क्षेत्र विश्व स्तर पर संकटग्रस्त गिद्धों (Vultures) का सबसे बड़ा प्राकृतिक घोंसला स्थल (Nesting Site) है। बाँध बनने से गिद्धों की दुर्लभ प्रजातियों के चट्टानी आवास पानी में डूब जाएंगे। इसके अलावा केन नदी में पाए जाने वाले घड़ियाल (Gharial Sanctuary) और दुर्लभ जलीय जीवों के प्राकृतिक प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
विशाल जलाशय और नहर निर्माण के लिए पन्ना के घने जंगलों से लगभग 20 लाख से अधिक विशाल और पुराने पेड़ों को काटा जाना तय है, जिसकी भरपाई केवल नए पौधे लगाकर तुरंत नहीं की जा सकती।
केन-बेतवा प्रोजेक्ट के पक्ष में विशेषज्ञों की राय: इस प्रोजेक्ट समर्थकों का तर्क है कि 62 लाख लोगों की प्यास बुझाना और लाखों एकड़ बंजर खेतों को सींचना किसी भी अन्य नुकसान से बड़ा मानवीय धर्म है। बुंदेलखंड को गरीबी से निकालने का कोई और बड़ा विकल्प उपलब्ध नहीं है।
आलोचकों और पर्यावरणविदों का पक्ष: जल विशेषज्ञों का तर्क है कि केन नदी को ‘सरप्लस’ बताना वैज्ञानिक रूप से गलत है। मानसून के दौरान केन का उफान ही बुंदेलखंड के अपने पारितंत्र और यमुना को जीवित रखता है। केन का पानी खींचने से केन नदी खुद आने वाले समय में सूख सकती है।
आलोचकों का मानना है कि अरबों रुपये खर्च करके जंगलों और बाघों के आवास को डुबोने के बजाय, यदि बुंदेलखंड के पारंपरिक चंदेल और बुंदेला कालीन हजारों तालाबों, बावड़ियों, वाटरशेड प्रबंधन (Watershed Management) और चेक डैमों का जीर्णोद्धार किया जाता, तो बेहद कम लागत और बिना किसी पर्यावरणीय नुकसान के बुंदेलखंड का जल संकट हल हो सकता था।
वॉटरमैन ऑफ इंडिया राजेंद्र सिंह ने भी रखा अपना पक्ष: भारत के वॉटरमैन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह इस योजना की कड़ी खिलाफत कर रहे हैं। उन्होंने ऑपइंडिया के एसोसिएट ए़़डिटर श्रवण शुक्ल से फोन पर बातचीत में कहा, “नदी जोड़ो योजना भारत को तोड़ने की भयानक योजना है। ये संवैधानिक रूप से भारत की नदियों के तिहरे अधिकार (केंद्र, राज्य और पंचायतों-म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन का हक) को तोड़ने की कोशिश है।”
राजेंद्र सिंह ने दावा किया इस योजना को मनमोहन सिंह सरकार ने मंजूरी दे दी थी, लेकिन हमारे विरोध के बाद और हमारा पक्ष सुनने के बाद मनमोहन-राहुल-सोनिया गाँधी ने इसे रोक दिया था। अब सिर्फ पैसों के बंदरबाँट की वजह से ये योजना चल रही है। उन्होंने दावा किया कि ये योजना कतई सफल नहीं होगी। उन्होंने कहा कि इस योजना का हश्र भी सतलुज ब्यास लिंक की तरह ही होगा, जिसमें आजतक पानी नहीं आया।
राजेंद्र सिंह ने कहा कि इस भयानक प्रोजेक्ट को भारत के लिए उपयोगी नहीं मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं इस प्रोजेक्ट के 100 नुकसान गिना सकता हूँ, जबकि सरकार फायदे बताती है कि सूखा खत्म होगा, पानी आ जाएगा। उन्होंने कहा कि जब केन और बेतवा के कैचमेंट में एक बराबर बारिश होती है, तो केन में ज्यादा पानी का दावा कैसे किया जा रहा है। उन्होंने PSI-देहरादून की एक स्टडी रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें केन नदी के पानी को सरप्लस नहीं माना गया है।
दौधन बाँध से विस्थापन का दर्द, मुआवजे का घोटाला और ST लोगों का जनाक्रोश: रिपोर्ट्स
कागजी नक्शों और सरकारी रिपोर्ट्स में ‘विकास की विशाल गंगा’ के रूप में दिखाई देने वाले केन-बेतवा प्रोजेक्ट से जुड़ी कुछ जमीनी समस्याएँ भी मौजूद हैं। जुलाई 2026 की मीडिया रिपोर्ट में सामने आया है कि छतरपुर और पन्ना जिलों के दौधन बाँध के डूब क्षेत्र में आने वाले गाँवों में आज भारी तनाव और अनिश्चितता का माहौल है।
आदिवासियों का बेघर होना और विस्थापन (Displacement Crisis): दौधन बाँध के जलाशय में पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में बसे दौधन, खरयानी, पचमढ़ी, ढोढन, मैनारी और पलकोहा जैसे दर्जनों आदिवासी गाँव पूरी तरह जलमग्न हो जाएँगे। यहाँ पीढ़ियों से रहने वाले गोंड और बैगा आदिवासी अपनी पुश्तैनी जमीनों, जंगलों और सांस्कृतिक पहचान को खोने के मुहाने पर खड़े हैं।
मई 2026 में प्रकाशित ‘द हिंदू’ के ‘फ्रंटलाइन’ की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, विस्थापित होने वाले ST परिवारों को पन्ना के जंगलों से बाहर निकालकर जिन अनजान और बंजर इलाकों में बसाने की योजना है, वहाँ न तो खेती के लायक जमीन है और न ही आजीविका के साधन। लोगों का कहना है, “जंगल और नदी ही हमारी माँ और आजीविका हैं, हमें मुआवजा नहीं, अपनी जमीन चाहिए।”
मुआवजे का घोटाला और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप (Compensation Scam): दौधन बाँध के डूब क्षेत्र के गाँवों में मुआवजा वितरण को लेकर बड़े पैमाने पर धांधली और भ्रष्टाचार की खबरें राष्ट्रीय सुर्खियों में हैं।
और द न्यू इंडिया एक्सप्रेस की (26 जुलाई 2026) रिपोर्ट्स के मुताबिक, छतरपुर और पन्ना जिला प्रशासन के निचले स्तर के कर्मचारियों और भू-माफियाओं के गठजोड़ ने फर्जी सर्वे रिपोर्ट तैयार की हैं। आरोप हैं कि बाहरी रसूखदार लोगों ने बाँध की घोषणा होते ही ST परिवारों की कीमती जमीनों को कौड़ियों के भाव खरीद लिया और अब वे करोड़ों रुपये का सरकारी मुआवजा हड़प रहे हैं।
दैनिक भास्कर ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि मुआवजा पाने के लिए भी लोगों को रिश्वत देनी पड़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, असली विस्थापित ग्रामीणों को पुनर्वास नीति के तहत सही मुआवजा और पारदर्शी पुनर्वास पैकेज (Rehabilitation Package) नहीं मिल पा रहा है। विस्थापित ग्रामीण मुआवजे में धाँधली को लेकर कड़ाके की ठंड और बारिश के बावजूद महीनों से सड़कों पर धरना देने को मजबूर हैं।
इसी सामाजिक असंतोष और विस्थापन के दर्द ने केन-बेतवा प्रोजेक्ट को एक बहुत ही संवेदनशील राजनीतिक और नैतिक मोड़ पर ला खड़ा किया है।
बहरहाल, ऐसे प्रशासनिक और राजनीतिक समस्याओं का हल सरकार को ही ढूँढना होगा, क्योंकि ऐसी छोटी समस्याओं के लिए राष्ट्रीय महत्व के बड़े प्रोजेक्ट्स को रोका नहीं जा सकता। क्योंकि ये प्रोजेक्ट न केवल बुंदेलखंड के लिए जरूरी है, बल्कि इस प्रोजेक्ट का असर देश के दूरगामी भविष्य पर भी पड़ेगा।

प्रोजेक्ट की लागत, समयसीमा और वर्तमान स्थिति (Project Status)
वित्तीय स्वीकृति और लागत (Financial Cost): इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए अनुमानित कुल लागत कई बार बढ़ चुकी है। हालाँकि दिसंबर 2021 में केंद्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृत कुल लागत ₹44,605 करोड़ है। इस कुल लागत में से 90% हिस्सेदारी (लगभग ₹39,317 करोड़) केंद्र सरकार द्वारा अनुदान और ऋण के रूप में दी जा रही है, जबकि केवल 10% लागत मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारें मिलकर वहन करेंगी।
सरकार ने परियोजना को पूरा करने के लिए 8 वर्ष की समयसीमा तय की थी। आधिकारिक लक्ष्य के अनुसार, इसे 2029-2030 तक पूरी तरह से बनाकर चालू करने की योजना है।
वर्तमान स्थिति (Current Ground Status – 2026): केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट को संचालित करने के लिए विशेष प्राधिकरण केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट अथॉरिटी (KBLPA) का गठन किया है।
दौधन बाँध स्थल पर शुरुआती इंफ्रास्ट्रक्चर, अप्रोच रोड और लिंक नहर के लिए भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition) की प्रक्रिया जारी है।

क्या केन-बेतवा मॉडल भारत की दूसरी नदी जोड़ो परियोजनाओं का आधार बन सकता है?
केन-बेतवा लिंक परियोजना केवल बुंदेलखंड के दो जिलों में बनने वाला बाँध या नहर भर नहीं है। यह परियोजना वास्तव में पूरे भारत में प्रस्तावित अन्य 29 अंतर-बेसिन नदी जोड़ो परियोजनाओं के लिए एक ‘नेशनल टेस्ट केस’ (National Test Case) है। पूरी दुनिया और भारत के नीति निर्माता इस बात पर गहराई से नजर गड़ाए हुए हैं कि यह मॉडल धरातल पर कैसा प्रदर्शन करता है। ऐसे में अगर…
केन-बेतवा सफल होता है: अगर यह परियोजना अपने तय समय, स्वीकृत बजट और पर्यावरणीय संतुलन के साथ सफलतापूर्वक पूरी हो जाती है और बुंदेलखंड के 62 लाख लोगों को सूखा व गरीबी से मुक्ति दिलाती है, तो यह साबित हो जाएगा कि भारत में बड़े पैमाने पर अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण संभव है। इससे हिमालयी और प्रायद्वीपीय घटक के अन्य 29 प्रस्तावित लिंकों (जैसे मानस-संकोश-तीस्ता या महानदी-गोदावरी) के लिए राजनीतिक, सामाजिक और जनता के बीच सहमति बनाना बेहद आसान हो जाएगा।
अगर केन-बेतवा विफल या विवादित होता है: अगर केन-बेतवा परियोजना अत्यधिक वित्तीय देरी, बजट वृद्धि (cost overrun), मुआवजे के घोटालों, विस्थापित आदिवासियों के भारी असंतोष या पन्ना के पारिस्थितिकी तंत्र की स्थाई तबाही का पर्याय बनती है, तो भविष्य में भारत में किसी भी अन्य दो नदियों को आपस में जोड़ने की राष्ट्रीय योजना पर हमेशा के लिए बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
इसलिए केन-बेतवा परियोजना की सफलता या विफलता केवल बुंदेलखंड का भाग्य तय नहीं करेगी, बल्कि यह 21वीं सदी में भारत के पूरे राष्ट्रीय जल प्रबंधन, रिवर-लिंकिंग विजन और पर्यावरण नीति का भविष्य तय करने वाली सबसे महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी।
(भारत की नदी जोड़ो परियोजना Part III में पढ़िए: भारत की बाकी प्रमुख नदी जोड़ो परियोजनाएँ, हिमालयी और प्रायद्वीपीय (Peninsular) लिंकों का पूरा गहन विश्लेषण, हिमाचल-पंजाब-राजस्थान और जम्मू-कश्मीर से जुड़े आधिकारिक प्रस्ताव। इसके साथ ही जानिए दुनिया भर के सबसे बड़े जल स्थानांतरण प्रयोगों का सच- चीन का South–North Water Transfer Project, अमेरिका का California State Water Project, पाकिस्तान का Indus Basin Irrigation System, स्पेन का Tagus–Segura Transfer और ऑस्ट्रेलिया की Snowy Mountains Scheme।
इन प्रोजेक्ट्स से समझिए भारत के लिए इनसे क्या सबक हैं, क्या हैं पर्यावरणीय चुनौतियाँ, जलवायु परिवर्तन का असर और अंतिम निष्कर्ष कि क्या नदी जोड़ो योजना भारत की जल क्रांति बन सकती है या यह सबसे कठिन और पेचीदा राष्ट्रीय परियोजनाओं में से एक साबित होगी…)


